भानुप्रतापपुर से लौटकर सुनील कुमार
रायपुर, 4 जून। प्रदेश की जनता से भेंट-मुलाकात का भूपेश बघेल का लंबा सिलसिला जिले के अफसरों के लिए इस सरकार के कार्यकाल का सबसे बड़ा मोर्चा बन गया है। एक दिन में एक विधानसभा के तीन अलग-अलग गांवों में जाकर जनता के बीच उनका हाल जानना, और उन पर वहीं अफसरों से बात करना, एक बड़ा जनसंपर्क है। अभी चुनाव को सवा साल से ज्यादा बचा है, और ऐसे में हर विधानसभा क्षेत्र के गांवों से इस हद तक रूबरू होना, और चीजों को सुधारने की कोशिश करना मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के लिए आईना देखने सरीखा साबित हो रहा है।

कल इस संवाददाता का रायपुर से उनके साथ जाकर बस्तर के कांकेर जिले के भानुप्रतापपुर विधानसभा क्षेत्र के तीन गांवों को देखना हुआ। मुख्यमंत्री अपने साथ प्रदेश के आधा दर्जन बड़े आईएएस-आईपीएस अफसरों को लेकर चल रहे थे, कुछ साथ में दूसरे हेलीकॉप्टर में थे, कुछ अलग से मौकों पर पहुंचे हुए थे। चूंकि पूरा इलाका नक्सल असर का है, पुलिस और सुरक्षा बलों की भारी मौजूदगी भी थी।

रायपुर हेलीपैड पर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की भारी मौजूदगी थी, और पता लगा कि भूपेश बघेल के आते और जाते, दोनों वक्त दर्जन भर से अधिक कैमरे जुट जाते हैं क्योंकि उनसे खबरों के लायक कुछ न कुछ मिल ही जाता है। वे देश के दो कांग्रेसी मुख्यमंत्रियों में से एक हैं, कांग्रेस के आज के एक सबसे ताकतवर नेता हैं, और मोदी-शाह से लेकर संघ और भाजपा तक को लेकर वे बेझिझक और बेधडक़ बोलते हैं, हर सवाल का खुलकर जवाब देते हैं, और इसलिए टीवी कैमरों के लिए वे राजधानी रायपुर में दिन में दो बार भी पसंदीदा रहते हैं। कुछ दूरी से खड़े रहकर इन सवाल-जवाब को देखना-सुनना दिलचस्प था क्योंकि सवाल बेधडक़ थे, और जवाब बेझिझक। रवानगी के पहले मीडिया से इस तेज रफ्तार बातचीत के बाद भूपेश रवाना हुए, तो भानुप्रतापपुर विधानसभा के गांव गितपहर पहुंचने पर हेलीकॉप्टर के नीचे आते हुए उनकी नींद टूटी। शायद हर दिन कई बार की ऐसी लैंडिंग से नींद टूटना जुड़ गया है।

बगल बैठे मुख्यमंत्री सचिवालय के सचिव भारतीदासन से मैंने पूछा कि कुछ दिन पहले छत्तीसगढ़ का जो हेलीकॉप्टर कै्रश हुआ है, जिसमें दोनों पायलट मारे गए, उसमें एक दिन पहले सरगुजा से कुछ अफसर भी लौटे थे? तो उनका कहना था कि सरगुजा से लौटे तीन अफसरों में वे भी थे, और वे उस हेलीकॉप्टर के आखिरी मुसाफिर भी थे। लेकिन सरकार में ऊंचे ओहदे ऊंचाई का डर खत्म कर देते हैं, इसलिए उस ताजा हादसे की न तो किसी को याद दिख रही थी, और न ही उसकी वजह से कोई आशंका ही थी। आम लोगों के बीच एक कार हादसे के बाद भी कार में चढऩा जारी रहता है, कुछ उसी तरह का हाल सरकार में हेलीकॉप्टर हादसे के बाद का है।

इस दौरे के दौरान हर गांव में भूपेश बघेल सबसे पहले वहां के मंदिर जा रहे हैं, और इस मामले में वे पिछले मुख्यमंत्री रमन सिंह से भी अधिक आस्थावान और धर्मालु हैं, जिनका ग्रामीण दौरा मंदिरों से परे भी रहता था। इस एक बात के अलावा धर्म से जुड़ी एक दूसरी बात भूपेश बघेल के लोगों से बातचीत का अनिवार्य हिस्सा है, और वह है गोठान, गोबर, गोमूत्र, दूध, और चारा। इन सबके लिए उनकी सरकार ने बड़ी महत्वाकांक्षी और व्यापक योजना बनाई है, और जनता की भीड़ के बीच जब वे लोगों तक माईक भिजवाकर उनसे सवाल करते हैं, तो उनमें गाय से जुड़े मुद्दे बहुत से रहते हैं। कुछ अरसा पहले भाजपा के एक बड़े नेता ने रायपुर में एक अनौपचारिक चर्चा में मुझसे कहा था कि छत्तीसगढ़ में गाय तो भाजपा के हाथ से निकल गई है, और खुद चलते हुए जाकर भूपेश बघेल के घर में खड़ी हो गई है।

भूपेश बघेल हर सभा के अंत में माईक से भारतमाता की जय और छत्तीसगढ़ महतारी की जय के नारे लगवाते हैं, कम से कम इन सभाओं के लोगों के बीच तो गौमाता के साथ-साथ भारतमाता पर भी भूपेश बघेल कब्जा करते चल रहे हैं।
एक जगह भाजपा के कुछ नौजवान काले झंडे लेकर प्रदर्शन कर रहे थे, तो भूपेश बघेल ने पुलिस अधिकारियों को कहा कि उन्हें रोकने की जरूरत नहीं है, उन्हें यहीं पर बुला लें, लेकर आएं कि उन्हें जो पूछना हो वे पूछें, और वे (भूपेश) भी पूछ सकें कि पेट्रोल-डीजल और गैस का क्या भाव चल रहा है।
भूपेश सरकार ने गाय से जुड़ी अर्थव्यवस्था को वैसे तो ग्रामीण विकास और रोजगार से जोडक़र बढ़ाने का काम किया है, लेकिन गाय का जैसा धार्मिक और राजनीतिक उपयोग जनसंघ के वक्त से आज की भाजपा पूरे देश में करते आ रही थी, वह मुद्दा अब छत्तीसगढ़ में भाजपा से निकलकर भूपेश के हाथ आ गया है, और वे दोनों हाथों से इस मुद्दे की धार्मिक और आर्थिक संभावनाओं को दुह रहे हैं। काम आसान भी नहीं है क्योंकि हजारों गोठान बन जाने के बाद भी जगह-जगह चारागाह बनाने के लिए सरकारी जमीन पाने में दिक्कतें आ रही हैं, और सरकारी जमीनों पर लोगों के कब्जे चले आ रहे हैं, जिन्हें लेकर कब्जाधारी अदालत तक भी जा रहे हैं।

कल के तीन गांवों में से एक जगह जब यह बात सामने आई तो भूपेश बघेल ने अफसरों को सीधा रास्ता सुझाया कि गोठान और चारागाह के लिए ऐसी जमीन ही छांटें जिसे लेकर कोई विवाद नहीं चल रहा हो। कुछ जगहों पर हो यह रहा है कि किसी एक नेता के अवैध कब्जे को हटवाने के लिए उसके विरोधी स्थानीय अफसरों को वही जमीन सुझा देते हैं, और फिर अवैध कब्जे की लड़ाई चलते रहती है। लेकिन ऐसी शुरूआती दिक्कतों से परे जगह-जगह महिलाएं बताती हैं कि उनके समूह कितना गोबर खरीद रहे हैं, और कितना खाद बनाकर बेच रहे हैं, उसमें कितने की बचत हुई है। लेकिन कई जगह ऐसे कई तजुर्बों की बात सुनते हुए यह बात हैरान करती है कि ऐसी महिलाओं के समूह आगे की कमाई के लिए दुधारू गाय नहीं पाल रही हैं, वे अपनी कमाई से बकरी पालन कर रही हैं, जिनमें उनको कमाई अधिक है। कहीं-कहीं पर वे गोबर-कारोबार के साथ-साथ मुर्गीपालन भी कर रही हैं, और कई लोगों को मुख्यमंत्री गाय पालने और मुर्गी पालने की सलाह भी दे रहे हैं, और यह भी बता रहे हैं कि अगर उनकी मुर्गियों से अंडे भी मिलने लगेंगे तो सरकार की पोषण आहार योजनाओं में उन्हें खरीद भी लिया जाएगा।
जवाबों का अंदाजा रहने से, भूपेश बघेल हर गांव के लोगों की सभा में कर्जमाफी और धान खरीदी के बारे में पूछते हैं, राजीव न्याय योजना के तहत किसानों को मिलने वाली मदद के बारे में भी। उन्हें अंदाज है कि इन सवालों के जवाब सकारात्मक ही रहेंगे, और वे अपनी कामयाबी लोगों के निजी तजुर्बे की जुबानी बखान करवा देते हैं। कर्जमाफी, धान खरीदी का भुगतान, और राजीव न्याय योजना के तहत धान पर अतिरिक्त भुगतान को लेकर इन तीन गांवों के हजारों लोगों के बीच से एक भी शिकायत सुनने नहीं मिली। बहुत से लोगों ने कहा कि उन्हें रकम बैंक खाते में आने की जानकारी फोन पर मिल गई है, लेकिन उन्होंने बैंक जाकर देखा नहीं है। भूपेश बघेल यह मजाक करने से नहीं चूकते कि अब लोगों को पैसों की मारामारी नहीं रह गई है, और हफ्तों-महीनों से खातों में पैसा आ गया है, और उसे निकालने भी नहीं गए हैं।
लेकिन सरकार के काम से जनता को शिकायतें न हों, ऐसा नहीं हो सकता। कई लोगों को राशन कार्ड न होने की शिकायत है, लेकिन ऐसे अधिकतर मामलों में जब मुख्यमंत्री लंबी बातचीत करके भी पारिवारिक असलियत पूछते हैं तो पता लगता है कि परिवार के विभाजन की वजह से कार्ड किसी एक के पास रह गया है, और दूसरे लोग बिना कार्ड के रह गए हैं। हर बैठक में मौजूद कलेक्टर से वे पूछते भी चलते हैं, और उसे बताते भी चलते हैं। कांकेर कलेक्टर ने सीएम के मंच के पास ही एक हिस्से में जिले के हर विभाग के अफसरों को इकट्ठा कर रखा है ताकि जब तक कोई ग्रामीण सभा के बीच से माईक पर अपनी दिक्कत बताए, तब तक उसके बारे में जानकारी विभागीय अफसर कलेक्टर ठीक उसी तरह दे दें जिस तरह विधानसभा में विपक्ष के सवालों के चलते हुए ही अफसर पर्ची पर तथ्य लिखकर अपने मंत्री को भिजवा देते हैं।
भूपेश बघेल अपने साथ चल रहे, और वहां पहुंचे हुए हर बड़े अफसर का परिचय, उन्हें खड़़े करके सभा में मौजूद सैकड़ों लोगों से करवाते हैं, और लोग देख लेते हैं कि काम न होने पर किन्हें जिम्मेदार मानना है। कुछ अफसर मुख्यमंत्री के दूसरे जिलों के दौरों से सबक ले चुके हैं, और वहां से आने वाली खबरों को पढक़र अपने जिले का हाल सुधार चुके हैं। कांकेर जिले के कलेक्टर ने कुछ लोगों के जाति प्रमाणपत्र की दिक्कतों के जवाब में मुख्यमंत्री को बताया कि अभी-अभी जिले में 21 हजार लोगों को जाति प्रमाणपत्र बांटे गए हैं, जिनके छूट गए हैं, उनके भी अब बन जाएंगे। 21 हजार का आंकड़ा मुख्यमंत्री को संतुष्ट कर देता है, और वे शिकायतकर्ता को अर्जी लेकर कलेक्टर से मिलने कह देते हैं। एक दूसरे जिले में सरकारी अस्पताल में दवाईयों के स्टॉक की जानकारी देखकर मुख्यमंत्री ने एक डॉक्टर को निलंबित कर दिया था, शायद उसी से सबक लेकर भानुप्रतापपुर के एक गांव दुर्गकोंदल के अस्पताल का दौरा किया, बहुत से मरीजों से बात की, और हलके अंदाज में यह भी बताया कि शायद एक जगह डॉक्टर निलंबित होने के बाद बाकी जगह सुधार कर लिया जा रहा है। साथ चल रहे अफसरों में जिले के प्रभारी सचिव अनिवार्य रूप से हैं, और कलेक्टर-एसपी के साथ-साथ प्रभारी सचिव पर भी यह तनाव कायम रहता है कि मुख्यमंत्री को कोई ऐसी शिकायत न मिले जिसका कोई जवाब अफसरों के पास न हो।
इस विधानसभा क्षेत्र के कांग्रेस विधायक, विधानसभा उपाध्यक्ष मनोज मंडावी हर गांव की सभा में मुख्यमंत्री से मांगों की लंबी-चौड़ी लिस्ट मंजूर करने का अनुरोध करते हैं, और कुछ ठोस बातों को मुख्यमंत्री मंजूर करने की घोषणा भी आखिर में कर देते हैं। एक मांग जो हर जगह लगातार रही, वह स्वामी आत्मानंद अंग्रेजी स्कूल की है, गांव-गांव में यह योजना लोगों का आकर्षण है। स्कूलों के बारे में दिलचस्प यह है कि हर सभा में किसी भी तरह के स्कूल की मांग करने वाली लड़कियां ही दिखती हैं, मानो लड़कियों में ही अधिक पढऩे की अधिक हसरत है। कोई लडक़े ऐसी मांग करते नहीं दिखे।
मुख्यमंत्री एक पाटे पर बैठे रहते हैं, और सामने मौजूद सैकड़ों लोगों के बीच कई सरकारी कर्मचारी कार्डलेस माइक्रोफोन लेकर लोगों तक पहुंचते हैं। तरह-तरह के लोग हाथ उठाते हैं, और मुख्यमंत्री छांट-छांटकर उनमें से कई लोगों को मौका देते हैं। पहले ही गांव गितपहर में एक नौजवान भूपेश बघेल को कका-कका कहकर ऐसे याराना अंदाज में बात कर रहा था कि सभा में मौजूद तमाम लोग जोरों से हॅंस पड़े। अब यह कका शब्द जहां से भी निकला हो, यह चल निकला है, और एक गांव की सभा में कका के साथ फोटो खिंचवाने की हसरत का पोस्टर लिए हुए कम कद-काठी वाला एक नौजवान बार-बार उठ खड़ा होता था, और दूसरे लोग उसे बिठाते थे।
एक गांव में लोगों ने बताया कि 1995-96 में एक सीबीआई जांच के सिलसिले में दिल्ली से आए अफसर वहां की जमीनों के सारे मूल नक्शे ले गए, जो आज तक वापिस नहीं आए हैं, और उन नक्शों के बिना उस गांव को सरकार की किसी भी योजना का फायदा नहीं मिल रहा है। नक्शा न होने की शिकायत को कलेक्टर ने भी सही बताया, और सीएम ने साथ चल रहे अफसरों से कहा कि मुख्य सचिव से भारत सरकार को इस बारे में चिट्ठी लिखवाई जाए और मूल नक्शा वापिस बुलवाया जाए।
आदिवासी बस्तर में तेन्दूपत्ता, महुआ, चिरौंजी का काम भी गांव के लोगों के बीच बड़ा काम है। भूपेश बघेल लोगों से महुआ बीनने के बारे में पूछते हैं, और फिर उन्हें बस्तर के ही एक जिले का तजुर्बा बताते हैं कि वहां पर लोगों ने महुआ के पेड़ों के नीचे जाल बांध दिया है, और टपके महुआ फल इंग्लैंड तक जाकर भारी दाम पर बिक रहे हैं क्योंकि उनमें मिट्टी या दूसरी गंदगी नहीं लगती। वे लोगों को समझाते चल रहे हैं कि महुआ और चिरौंजी के लिए फल के मौसम में पेड़ के नीचे ऐसा जाल बांधें ताकि बीनने की मेहनत बचे, मिट्टी न लगे, और वह विदेशों तक जाकर ऊंचे दाम पर बिक सके। ऐसी हर बैठक में दर्जनों लोग इलाज, अनुकम्पा नियुक्ति, दिव्यांग को मदद जैसी बातों को लेकर मौजूद थे, और हर जगह कार्यक्रम खत्म होने के पहले भूपेश बघेल लोगों की सभा के बीच घुसे, और हर किसी से उनका आवेदन लिया, किसी के साथ फोटो खिंचाई, तो किसी स्कूल की बच्चियों का बनाया हुआ कोई उपहार लिया। हर गांव में औसतन दो घंटे का समय, सैकड़ों अर्जियां, दर्जनों लोगों के माईक पर कहे हुए उनके दुख-दर्द के बाद मुख्यमंत्री का काफिला अगले गांव रवाना।
मुख्यमंत्री सचिवालय के एक अफसर ने कुछ ही दिन पहले यह बताया था कि इस दौरे के दौरान मुख्यमंत्री की घोषणाओं पर अमल और उन्हें मिली अर्जियों पर कार्रवाई के लिए तीस दिन का समय तय किया गया है ताकि वे पड़ी न रह जाएं। मुख्यमंत्री बस्तर में हर जगह दो मांग सौ फीसदी मंजूर कर रहे हैं, एक तो देवगुड़ी की, दूसरी घोटुल की। जहां भी यह मांग है, वे हर गांव के लिए उसे मंजूर कर रहे हैं, और कह रहे हैं कि आदिवासी संस्कृति के इन दो प्रतीकों में से घोटुल को बाहर बदनाम कर दिया गया था, और वे इसके गौरव को फिर से कायम करवाना चाहते हैं।
डीजीपी अशोक जुनेजा, एडीजी-नक्सल विवेकानंद सिन्हा, मुख्यमंत्री सचिवालय के सचिव भारतीदासन, आदिम जाति विभाग की संचालक शम्मी आबिदी सहित बस्तर के तमाम बड़े अफसर हर गांव की सभा में मौजूद थे, और मुख्यमंत्री इनमें से हर किसी का परिचय करवाते हुए स्थानीय जिले से उनका संबंध भी बताते चलते थे कि इनमें से कौन यहां कलेक्टर रह चुके हैं, और कौन जिला पंचायत सीईओ। जिला प्रशासन के लिए उस जिले में ऐसा हर गांव एक चुनौती लेकर आता है, और दो-चार ठोस शिकायतें भी बहुत सी कामयाबी पर पानी फेर सकती हैं। ऐसे में 90 विधानसभाओं के तीन-तीन गांवों से रूबरू होना मुख्यमंत्री को चुनाव के खासे पहले हकीकत का अहसास कराने वाला है, और अफसरों को भी कमर कसकर भिडऩे का एक मौका देने वाला है। गांवों की सभाओं के बाद शाम मुख्यमंत्री भानुप्रतापपुर में और बैठकें लेने वाले थे, एक दिन के लिए एक अखबारनवीस के लिए इतना काफी था, और भानुप्रतापपुर से लगातार सफर करके रायपुर लौटने तक भी आधी रात हो जाने वाली थी।