-अनिल अश्वनी शर्मा
छत्तीसगढ़ के अबूझमाड़ के गांव सालों से ‘अबूझ’ पहेली बने हुए हैं लेकिन डाउन टू अर्थ ने इन जंगल पहाड़ों में बसे गांवों का दौरा किया
सारांश
कांदाड़ी से खेरीपदा तक का सफर नालों और जंगलों से गुजरते हुए आदिवासी क्षेत्रों की बदहाल स्थिति दिखाता है।
अधूरे सरकारी निर्माण, एक कमरे के घर की योजना और बैंकिंग व्यवस्था में पारदर्शिता की कमी से ग्रामीण परेशान हैं।
मवेशियों व अनाज के भंडारण के लिए अलग जगह की जरूरत सरकार की योजना में नजरअंदाज हुई है।
कहने के लिए छत्तीसगढ़ के कांकेर जिले के कांदाड़ी गांव से खैरीपदा गांव बिल्कुल सटा हुआ है लेकिन कांदाड़ी गांव के एक घर से खैरीपदा गांव के घर तक पहुंचने में एक से सवा घंटा लग गए। जंगल की पगडंडियों से चलते हुए कम से कम 11 नाले पार करने पड़े। कहने के लिए ये नाले बहुत छोटे थे, लेकिन पानी कमर तक भरा हुआ था।
ऐसे में हर बार या तो तैर कर कर या लकड़ी के बड़े टुकड़े के सहारे पार करना पड़ता है।
हालांकि, साथ चलने वाले इसी गांव के निवासी सोमा ने कई नालों को तो झट से कूद कर पार कर लिया। सोमा ने कहा, इतने नाले हैं। ऐसे में यदि इस पर सडक़ निर्माण किया जाएगा तो स्वाभाविक रूप से इतनी पुलिया भी बनाने की जरूरत होगी। सरकार ने पास के गांव में सडक़ बनाने के नाम पर खानापूर्ति भर की है।
एकबारगी गांव के मुहाने से दूर तक गांव को निहारने पर सरकारी विकास का कोई निशान नहीं दिखता है। सरकार आदिवासी क्षेत्रों में विकास की बड़ी-बड़ी योजनाओं की घोषणा करते थकती नहीं है। लेकिन इन गांवों की हालत देख कर लगता है कि ये अभी भी प्राचीन काल में हैं।
खेरीपदा गांव में कुल 33 आदिवासी परिवार रहते हैं और जनसंख्या लगभग 200 है। कहने के लिए इस गांव के लोग पास के हाट जाते हैं। लेकिन इनकी दुनिया अभी भी अपने गांवों तक ही सीमित है। उनके लिए विकास खंड, तहसील, जिला, राज्य और देश जैसी किसी तरह की भौगोलिक सीमा मायने नहीं रखती है।
इसी गांव के मंगू से जब पूछा कि देश का सबसे बड़ा आदमी कौन है, तो उसका उत्तर था, सरपंच। वह मुख्यमंत्री, प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति जैसे शब्दों से अनजान है। हालांकि वे कहते हैं कि बहुत बरस पहले एक और बड़ा आदमी आया था, उनका नाम जोगी था (राज्य के पहले मुख्यमंत्री अजीत जोगी)।
वे नदी के पार पखांजुर आए थे। हमें वहां ले जाया गया था। जब पूछा गया कि कौन थे तो उसने कहा कि ये तो नहीं मालूम। बताया गया था कि वो बहुत बड़ा आदमी है और हम सबका भला करने आया है।
मंगू के रिश्तेदार सोमू ने बताया कि खेती तो हम केवल एक बार ही करते हैं, जो जून से शुरू होती है और अक्टूबर-नवंबर तक चलती है। इस इलाके के ज्यादातरआदिवासी धान की बुआई करते हैं। मंगू ने कहा कि खेती से इतना हो जाता है कि साल भर चल जाए। वे कहते हैं कि सिंचाई नहीं होने के कारण इसके बाद खेत ऐसे ही खाली पड़े रहते हैं।
उन्होंने बताया कि हमारी कमाई का एक बड़ा हिस्सा मई माह में तेंदुपत्ता से आता है। हालांकि काम तो दस दिन का ही होता है लेकिन पैसे ठीक मिल जाते हैं। उन्होंने शिकायत भरे लहजे में कहा कि अब ठेकेदार पैसा हमें तुरंत न देकर हमारे खाते में डलवा देते हैं। यह पैसा हमें कई हफ्तों बाद ही मिल पाता है।
ऊपर से बैंक वाले पता नहीं कितना देते हैं, हम तो अनपढ़ हैं हमें तो पता ही नहीं चलता कि हमारे खाते में कितन पैसा आया है और हमें कितना बैंक वाला दे रहा है। बैंक संबंधी शिकायत लगभग हर आदिवासी की है कि वे पढ़े-लिखे नहीं है तो उन्हें नकदी ही मिलनी चाहिए।