संपादकीय
न सिर्फ हिन्दुस्तान में बल्कि दुनिया के सबसे विकसित देशों में भी अंधविश्वास में जान देने वाले लोगों के मामले सामने आते ही रहते हैं। 2019 की एक घटना लोगों को याद होगी जब भारत की राजधानी दिल्ली के बुराड़ी के इलाके में एक परिवार के 11 लोगों ने पूजा-पाठ के बाद फांसी लगाकर जान दे दी थी। यह पूरा काम एक परिवार ने आपस में तय करके किया था, और 15 बरस से लेकर 80 बरस तक के 11 लोग बिना किसी संघर्ष के एक मत होकर मौत को ऐसे गले लगाया था। अब छत्तीसगढ़ के सक्ती में कल एक परिवार किसी तरह की तांत्रिक या आध्यात्मिक साधना करते हुए, जय गुरूदेव-जय गुरूदेव कहते हुए जान देने पर उतारू मिला। परिवार के दो जवान भाई मरे पड़े मिले, और परिवार की ही दो महिलाएं साधना सरीखा कुछ करते हुए मिलीं जो कि यह कह रही थीं कि वे मृत नौजवानों को जिंदा कर देंगी। उनकी दिमागी हालत असामान्य दिख रही थी, और पहली नजर में ऐसा लग रहा था कि ये कई दिनों के भूखे-प्यासे कोई तांत्रिक साधना कर रहे थे, और दोनों मौतें भूख-प्यास से हुई लग रही हैं। ऐसा पता लगा है कि उज्जैन के एक किसी तांत्रिक या गुरू के अनुयायी बनकर ये लोग इस तरह जान दे रहे थे। घर को बंद कर लिया था, और जय गुरूदेव-जय गुरूदेव का जाप कर रहे थे। जब घर से आवाज आना कम हो गई, तो पड़ोसियों ने दरयाफ्त की, और पुलिस को खबर की। कुछ लोगों का कहना है कि यह साधना स्वर्ग प्राप्ति के लिए या ब्रम्हलीन होने के लिए की जा रही थी।
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भारत तरह-तरह के पाखंडों से भरा हुआ देश है। यहां पर ईसाई-पादरी चंगाई सभा करते थे, जो कि अब कानून कड़े होने से कुछ कम हो रही हैं, या बंद सरीखी हो गई हैं। दूसरे कई धर्मों के लोग अलग-अलग किस्म से इलाज, भूत और चुड़ैल उतारने, किस्मत जगाने, गड़ा खजाना दिलवाने, दुश्मन को मारने, प्रेमिका को फंसाने जैसे कामों के लिए तरह-तरह की साधनाओं का पाखंड करते हैं। हर कुछ दिनों में खबर आती है कि किस तरह किसी तांत्रिक या मौलवी ने, बैगा-गुनिया ने संतान दिलवाने के नाम पर या किसी और तरह का झांसा देकर किसी लडक़ी या महिला से बलात्कार किया। खबरें आती रहती हैं, और लोग ऐसे झांसों में फंसते भी रहते हैं। देश के लोगों में अंधविश्वास रीढ़ की हड्डी के भीतर बोन मैरो तक में धंसा हुआ है, और उनसे हर तरह के काम करवाते रहता है।
हम बार-बार इस बात को लिखते हुए थक चुके हैं कि आध्यात्म, धर्म, अंधविश्वास, धर्मान्धता, और साम्प्रदायिकता के बीच कोई लकीरें खींची हुई नहीं हैं, इनके बीच कोई सरहद नहीं है। लोग एक बार आस्था के दायरे में घुसते हैं, तो उनके दिल-दिमाग जितने कमजोर होते हैं, उतनी ही मजबूत गिरफ्त में वे आ जाते हैं। आस्थावान कब भक्त बन जाते हैं, कब अंधभक्त, और कब वे पूरी तरह धर्मान्ध-अंधविश्वासी होकर पूरी जिंदगी झोंक देते हैं, यह उनको पता ही नहीं लगता। लोगों को याद होगा कि कुछ बरस पहले हरियाणा में रामपाल नाम का एक स्वघोषित ‘भगवान’ पुलिस से लंबे टकराव के बाद अपने आश्रम से भक्तों सहित गिरफ्तार किया गया था। गिरफ्तारी के पहले रामपाल और उसके भक्तों ने पुलिस के सामने समर्पण से मना कर दिया था, और हथियारों से पुलिस पर हमला भी किया था। करीब 20 हजार सुरक्षा जवानों ने रामपाल के सतलोक आश्रम को घेरने के बाद किसी तरह इस गुरू को गिरफ्तार किया था जिसे बाद में अदालत से उम्रकैद हुई। दस दिनों तक पुलिस और आश्रम के बीच यह मोर्चा चल रहा था, और इस दौरान पांच मौतें भी हुई थीं। एक खबर के मुताबिक रामपाल की गिरफ्तारी पर राज्य पुलिस के 50 करोड़ रूपए खर्च हुए थे, और यह सब कुछ एक अदालती आदेश पर अमल के लिए हुआ था।
किसी गुरू पर आस्था जब परले दर्जे की अंधश्रद्धा में बदल जाती है, तो वह किसी भी दर्जे की जानलेवा हिंसा में बदल जाती है। अंधविश्वासी दूसरों को मार भी सकते हैं, और खुद भी जान दे सकते हैं। अभी छत्तीसगढ़ के सक्ती जिले में जिस तरह यह परिवार जय गुरूदेव का जाप करते हुए दो नौजवान खो बैठा है, उसमें कुछ हैरानी इसलिए हो रही है कि यह एक आदिवासी परिवार बताया जा रहा है, और आदिवासी लोग आमतौर पर इस तरह की भक्ति से दूर रहते हैं। उनके बीच जादू-टोना, बैगा-गुनिया जैसी बातों का चलन तो रहता है, लेकिन वे ब्रम्हलीन होने के लिए इस तरह किसी गुरू का जाप करते भूख से मर जाएं, ऐसा तो सुनाई नहीं पड़ता था।
ऐसे अंधविश्वास के पीछे कई किस्म की वजहें हो सकती हैं। सबसे आम वजह हिन्दुस्तान में धर्म का पाखंड फैलाकर लोगों की तर्कशक्ति, और न्यायशक्ति को खोखला कर देना है। और धर्म का पाखंड तब तक स्थापित नहीं हो सकता, जब तक लोगों में सोचने की ताकत बची रहे। इसलिए तर्कोँ को खत्म करके जिस तरह से भारत में धर्म को मजबूत किया गया है, वह एक सबसे बड़ी वजह है। फिर धर्म के ही एजेंटों की तरह आसाराम से लेकर राम-रहीम तक, और रामपाल से लेकर दर्जनों दूसरे गुरूओं तक की दुकानें अंधविश्वास के बिना नहीं चल सकती। इसलिए गुरू के नाम पर ऐसा अंधविश्वास और मजबूत किया जाता है। फिर जब देश में सरकारों का काम कमजोर रहता है, अदालतें पीढिय़ों तक फैसला नहीं देतीं, जब चारों तरफ भ्रष्टाचार का साम्राज्य कायम हो जाता है, तब लोग अपने काम के लिए टोटकों पर जा टिकते हैं। वे कहीं मत्था टेककर, कहीं मनौती मानकर, कहीं कुछ चढ़ाकर अपना काम पूरा होने की उम्मीद करते हैं। और फिर इनमें जो परले दर्जे के अंधविश्वासी हो जाते हैं, वे कहीं अपनी जीभ काटकर चढ़ा देते हैं, कहीं गला काट देते हैं। और कुछ लोग तो अपने ही बच्चों की बलि चढ़ाते भी पकड़ाते हैं। यह पूरा सिलसिला देश और समाज में वैज्ञानिक चेतना खोखली हो जाने का एक सुबूत रहता है। भारत में पौराणिक कहानियों को प्रमाणित इतिहास बताने का जो सिलसिला चल रहा है, उसकी वजह से विज्ञान की साख अब किसी के लिए जरूरी नहीं रह गई है। यह सोच समाज में कोरोना-संक्रमण की तरह फैलती चली गई है, और कुदरत के करीब रहने वाला यह आदिवासी परिवार शहरी अंदाज के अंधविश्वासी-पाखंड का शिकार होकर जय गुरूदेव जपते हुए दो जिंदगियां खो बैठा।
पाखंड से छुटकारा पाने का कोई शॉर्टकट नहीं है। एक पीढ़ी अंधविश्वासी रहती है, तो इस सोच का डीएनए अगली कई पीढिय़ों तक चले जाता है। भारत आज बहुत बुरी तरह इसकी गिरफ्त में है, और मौतों के तो आंकड़े फिर भी सामने आ जाते हैं, मरने के पहले तक के जितने मामले रहते हैं, वे तो दिखते भी नहीं हैं। इस देश की सोच का पता नहीं क्या होगा, लोग अपने अंधविश्वास के चलते अपने परिवार की महिला, लडक़ी, और बच्चों को भी बलात्कारियों के पास झोंक देते हैं। वैज्ञानिक चेतना की अहमियत अभी भी लोगों को ठीक से समझ नहीं आ रही है, लेकिन दस-बीस बरस बाद जब हिन्दुस्तानी-चेतना की नींद खुलेगी, तब तक बड़ी देर हो चुकी होगी।
हिंसा की बहुत बड़ी-बड़ी घटनाओं से घिरे हुए छत्तीसगढ़ में चारों तरफ बड़े मुजरिमों की सहूलियत की अराजकता तो छाई हुई है, ढेर सारी ऐसी अलग-अलग घटनाएं हो रही हैं जो बताती हैं कि गैरमुजरिम, आम जनता के मन में भी नियम-कायदों के लिए, और दूसरों के हक के लिए एक हिकारत बैठ गई है। जो लोग पेशेवर मुजरिम नहीं हैं, वे लोग भी सडक़ों पर एक-दूसरे से इस तरह हिंसा के साथ निपट रहे हैं, कि मानो प्रदेश में कोई कानून लागू नहीं है। कहीं लोग खून-खराबा कर रहे हैं, कहीं गाडिय़ां तोड़ रहे हैं, और अंधाधुंध रफ्तार से गाडिय़ां चलाते हुए इंसानों और जानवरों को कुचलना तो आए दिन की बात हो गई है। अभी घर के बाहर खेल रहे एक बच्चे को कुचलती हुई अंधाधुंध कार ने उसकी जिंदगी ही छीन ली। लोगों के मन में अपने गैरकानूनी अधिकारों को लेकर एक अहंकार भर गया है, और दूसरों की जिम्मेदारियां लोग तय करने लगे हैं। सरकार और समाज दोनों को यह सोचना चाहिए कि अपराधियों से परे जब आम जनता की सोच इतनी अराजक हो जाए, तो उसके कैसे खतरनाक नतीजे हो सकते हैं।
हम अपने लंबे तजुर्बे से यह देखते हैं कि भारत जैसे देश में लोग अपनी जिंदगी में पहली बार सडक़ पर ट्रैफिक के नियम तोड़ते हुए ही लोग कानून के खिलाफ कुछ करते हैं। और जिन प्रदेशों में ट्रैफिक के नियम कड़ाई से लागू नहीं होते, वहां पर कानून तोडऩे का सिलसिला अगले स्टेज तक पहुंच जाता है। जहां पर सडक़ों पर कड़ाई बरती जाती है, वहां पर लोगों को अधिक बड़े जुर्म करने में वक्त लगता है। हम बार-बार सडक़ों पर ट्रैफिक सुधारने की बात इसीलिए करते हैं कि कमउम्र से ही लोगों के मन में यह न बैठ जाए कि कानून तोडऩे से कुछ नहीं बिगड़ता है। आज हम देखते हैं कि जो लोग मोटरसाइकिल का साइलेंसर फाडक़र चलते हैं, वे अंधाधुंध रफ्तार से भी गाडिय़ां दौड़ाते हैं, सडक़ों पर स्टंट दिखाते हैं, और फिर नियम तोडऩे का यह सिलसिला बढ़ते चले जाता है। यह बात हैरान करती है कि देश में ट्रैफिक के जो कड़े नियम बनाए गए हैं, उन पर अमल करने से छत्तीसगढ़ जैसे प्रदेश की सरकार मुंह चुराती है। कई जिलों से यह पता लगा है कि जैसे ही बिना हेलमेट वालों का चालान शुरू होता है, या बिना नंबर प्लेट गाडिय़ां, तेज आवाज करने वाले साइलेंसर पर रोकथाम शुरू होती है, सत्ता की तरफ से कुछ घंटों में ही दखल शुरू हो जाती है कि लोगों को नाराज क्यों किया जा रहा है? नतीजा यह होता है कि जब लोग पहले कुछ नियम तोड़ चुके रहते हैं, तो फिर मारपीट और हिंसा न करने के नियम तोडऩे की बारी आ जाती है।
राजनीतिक, धार्मिक, या सामाजिक, किसी भी तरह की भीड़ की गुंडागर्दी को जब सत्ता बर्दाश्त करती है, और बढ़ावा देती है, तो ऐसी भीड़ के तमाम लोग भीड़ में न रहने पर भी अकेले-अकेले भी कानून के खिलाफ काम करने को अपना हक मान लेते हैं। पुलिस के रोजमर्रा के कामकाज में राजनीतिक दखल छत्तीसगढ़ को एक ऐसी कगार पर पहुंचा चुकी है कि अब जनता का मिजाज अधिक, और अधिक अराजक होते चल रहा है। एक नतीजा यह भी निकल रहा है कि नाबालिग मुजरिम बढ़ते चल रहे हैं। इसे सीधे-सीधे गाडिय़ां दौड़ाने वाले नाबालिगों की सोच से जोडक़र देखा जाना चाहिए कि नियम-कायदे से हिकारत कभी थमती नहीं है, वह और अधिक बड़ा जुर्म करवाती है। सरकार और समाज दोनों के लिए सबसे आसान और सहूलियत का काम सडक़ और ट्रैफिक के नियम लागू करना है जिससे लोगों की सोच भी नियमों के सम्मान की होती चलेगी। लेकिन हम सरकार में यह सबसे मामूली इच्छाशक्ति भी नहीं देख रहे हैं। हमने बीते बरसों में कुछ ऐसे पुलिस अफसरों को देखा है जिन्होंने अपने जिलों में पूरी कामयाबी के साथ हेलमेट जैसे नियम लागू करवा दिए थे। उनको न अधिक पुलिस की जरूरत पड़ी, और न ही पुलिस का दूसरा काम रूका, सिर्फ राजनीतिक दखल से जिले की पुलिस को आजादी मिली, तो बड़ी आसानी से सब कुछ सुधर गया। सरकार को तो यह भी चाहिए कि नमूने के तौर पर कुछ चुनिंदा जिलों में ट्रैफिक के नियम सौ फीसदी लागू करवाकर देखे कि उसके बाद इन जिलों में गुंडागर्दी जैसे जुर्म अपने-आप घट जाते हैं या नहीं। इसे पायलट प्रोजेक्ट की तरह चलाया जा सकता है, या जानकार मनोवैज्ञानिकों से भी समझा जा सकता है कि सार्वजनिक जीवन के सबसे बुनियादी नियम-कानून लागू करने, और न करने का क्या फर्क पड़ता है।
जब सत्तारूढ़ पार्टी या नेताओं की तरफ से पुलिस को ट्रैफिक नियम तोडऩे पर भी कार्रवाई न करने को कहा जाता है, तो पुलिस को इससे कोई निजी नुकसान नहीं होता। वह कारोबारी ट्रांसपोर्टरों से चालान न करने की गारंटी बेचकर और पैसा कमाने लगती है, लेकिन इससे एक्सीडेंट बहुत बुरी तरह बढ़ते हैं, मौतें बढ़ती हैं, और कुल मिलाकर सरकार और समाज का बड़ा नुकसान होता है। सत्ता को चाहिए कि अपने हाथ नियम-कायदे लागू करने वाली पुलिस से दूर रखे। ऐसा न करने पर इसका नुकसान भी हम देखते हैं। इसी प्रदेश में किसी कोने में एक पार्टी, और किसी दूसरे कोने में किसी दूसरी पार्टी के मुजरिम बड़े-बड़े जुर्म करते हुए अब पुलिस परिवारों के कत्ल तक पहुंच गए हैं, और इससे बड़ा जुर्म और क्या हो सकता है? सत्ता और जनता को यह समझना होगा कि छोटे नियम तोडऩे की छूट उसी जगह नहीं थमती है, वह बढ़ते-बढ़ते सबसे वीभत्स और भयानक जुर्मों तक पहुंच जाती है। यह बात लोगों को कुछ जरूरत से ज्यादा आसान विश्लेषण लग सकती है, लेकिन हम आज की इस बात के एक-एक शब्द पर पूरी गंभीरता से कायम हैं कि जिंदगी में सबसे कमउम्र से ट्रैफिक के नियमों पर अमल करने का मिजाज अगर बनने लगता है, तो लोग आगे चलकर बाकी नियम-कानून का भी सम्मान कुछ अधिक हद तक कर सकते हैं, वरना तो हम हर दिन सडक़ों पर लोगों को चाकू चलाते देख ही रहे हैं।
नमूने के तौर पर हम राज्य के गृहमंत्री के अपने जिले और अपने विधानसभा क्षेत्र कवर्धा की बात करना चाहेंगे जहां के खूनी मंजर की शुरूआत जिस मौत से हुई थी, उसके बारे में कल मध्यप्रदेश की पुलिस ने खुलासा किया है। इस जिले से लगे हुए मध्यप्रदेश में कवर्धा के एक आदमी की लाश मिली थी जिसे खुदकुशी की शक्ल दी गई थी। लेकिन गांव के लोगों का शक था कि गांव के एक उपसरपंच ने यह कत्ल करवाया है। भीड़ ने जाकर इस उपसरपंच को उसके घर के भीतर ही मकान सहित जलाकर मार डाला था। इसके बाद हमलावर गिरफ्तार लोगों में से एक नौजवान को पुलिस ने पीट-पीटकर मार डाला था। अब पता लग रहा है कि उपसरपंच के परिवार ने ही वह पहला कत्ल करके खुदकुशी दिखाने की कोशिश की थी। लोगों के बीच कत्ल करने का ऐसा हौसला रातों-रात पैदा नहीं हो जाता है, और छत्तीसगढ़ जैसे शांत रहने वाले प्रदेश में यह हौसला एक बहुत खतरनाक नौबत है। इसे सुधारने की कोशिश सडक़ और ट्रैफिक से हो सकती है। (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)
किसी सरकारी दफ्तर में अगर भ्रष्टाचार नहीं है, तो वहां काम करने वाले लोग किसी की धमकी से कितना डरेंगे? अगर कोई धमकाकर उगाही करना चाहे, तो किसी भी मोटेतौर पर ईमानदार दफ्तर के लोग ऐसे व्यक्ति को पुलिस के हवाले करेंगे। लेकिन छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में केन्द्र सरकार के एक प्रमुख दफ्तर, पासपोर्ट ऑफिस में अभी जो हुआ है उससे एक मुजरिम तो उजागर हुआ है, खुद पासपोर्ट ऑफिस का भांडा फूट गया है कि उसके पास छुपाने को इतना कुछ है कि राह चलता कोई ब्लैकमेलर आकर उसे धमका सकता है, और पांच लाख रूपए नगद ऐंठकर ले जा सकता है। भला कौन सा सरकारी दफ्तर होगा जो पहली बार आए किसी परले दर्जे के धोखेबाज के झांसे में आकर, डर-सहमकर उसे पांच लाख नगद दे दे? लेकिन इस पासपोर्ट ऑफिस में ठीक वही हुआ। एक बड़ा सा आम सा दिखने वाला आदमी अपने आपको नागपुर से आया हुआ एंटी करप्शन ब्यूरो का अफसर बताते हुए पासपोर्ट ऑफिस में भ्रष्टाचार का आरोप लगाते हुए गिरफ्तारी की धमकी देने लगा, और छोडऩे के लिए दस लाख रूपए मांगने लगा। पासपोर्ट ऑफिस ने पांच लाख देकर छुटकारा पाया, फिर जब पता लगा कि वे ठगे जा चुके हैं, तो पुलिस में शिकायत की, और पुलिस ने उस आदमी को पड़ोस के एक शहर से गिरफ्तार किया।
हिन्दुस्तान से बाहर जाने वाले हर व्यक्ति को पासपोर्ट की जरूरत पड़ती है, और विदेश मंत्रालय के तहत आने वाला पासपोर्ट ऑफिस अखिल भारतीय सेवा के किसी अफसर के तहत काम करता है। पासपोर्ट जारी करते हुए यह ऑफिस सौ किस्म की जांच करता है, पुलिस से रिपोर्ट मंगवाता है, तब पासपोर्ट देता है। पूरा दफ्तर एक बड़ी हिफाजत के घेरे में काम करता है, और यहां पहुंचने वाले आम लोग नियमों के जाल में आतंकित रहते हैं। पासपोर्ट ऑफिस में अपनी बारी पहले लाने के लिए, कुछ नियमों की अनदेखी के लिए लोगों को बड़ी-बड़ी पहुंच लगानी पड़ती है, और हो सकता है कि इन्हीं सबमें भ्रष्टाचार इतना पनपता हो कि राह चलता धमकीबाज भी यहां से पांच लाख लेकर निकलता है। इस बार तो यह धोखेबाज पकड़ा गया, लेकिन बहुत से लोगों को इस दफ्तर की कमजोरी समझ आ गई है।
हम छत्तीसगढ़ राज्य सरकार के अलग-अलग दफ्तरों का हाल देखते हैं, तो हक्का-बक्का रह जाते हैं। सरकार का सबसे निचले स्तर का पटवारी ऑफिस किराए के भवन में चलता है, पटवारी कई लोगों को निजी तनख्वाह पर वहां रखता है, और मानो इसकी भरपाई के लिए लोगों से वसूली की जाती है, और एक-एक पटवारी करोड़पति हो जाते हैं। ऐसा ही हाल तहसील में भी रहता है जहां पर तहसीलदार के तहत बहुत से निजी कर्मचारी काम करते हैं, जिनका पैसा सरकार से नहीं आता, बल्कि उसी दफ्तर के भ्रष्टाचार से निकलता है, मजे की बात यह है कि पटवारी, तहसीलदार, आरटीओ जैसे बहुत से कमाऊ अमले हैं जहां पर गैरसरकारी लोग, अघोषित-निजी कर्मचारी कागज तैयार करते हैं, फाईलें बनाते हैं, और वे ही उन सरकारों को चलाते हैं। किसी भी प्रदेश के सरहद पर आरटीओ के लोग बाहर से आने वाली गाडिय़ों से वसूली के लिए लाठियां लिए हुए गिरोह की तरह खड़े रहते हैं, और ये सरकारी कर्मचारी नहीं रहते, बल्कि तनख्वाह या ठेके पर रखे गए गुंडे रहते हैं। ऐसा ही हाल जमीन-भवन की खरीदी-बिक्री वाले रजिस्ट्री ऑफिस का रहता है जहां पर एजेंट ही पूरा काम करवाते हैं, और इन एजेंटों के बिना कोई काम करवाना चाहे, तो उसका कभी काम ही न हो।
सरकार के पूरे ढांचे को ऐसे अदृश्य और अघोषित कर्मचारियों की जानकारी रहती है, लेकिन कोई भी सरकार इस व्यवस्था में छेड़छाड़ नहीं करती। संगठित भ्रष्टाचार चलाने वाले लोग आने वाली सरकार को यह बात अच्छी तरह समझा देते हैं कि व्यवस्था इसी तरह चलती है, और अगर कमाई जारी रखनी है, तो उनकी अघोषित सेवाएं जारी रखना ही सबसे अच्छा तरीका होगा। जेल से जिनका जरा सा भी वास्ता पड़ता है, उन्हें मालूम है कि वहां हर कैदी को हर किस्म की सहूलियतें खरीदने की पूरी आजादी रहती है। पीने-खाने से लेकर बदन दबवाने, और मालिश करवाने तक, अस्पताल में भर्ती होने तक, मर्जी से अदालत जाने या न जाने के लिए, अदालत आते-जाते किसी होटल में अपने परिवार के साथ घंटों रहने के लिए, रात अपने घर सोने चले जाने के लिए, अपने खास मुलाकातियों से अकेले में मिलने के लिए, और अपने परिवार-कारोबार की फाईलों पर दस्तखत के लिए अलग-अलग किस्म से भुगतान करना पड़ता है, और जानकार बताते हैं कि किस तरह जेलों के भीतर हर सहूलियत, हर काम का ठेका दिया जाता है, और अफसरों की कमाई का एक मोटा इंतजाम वहां रहता है। कैदियों से ओवरफ्लो होतीं जेलों के लिए हर किस्म के सामान की खरीदी एक बहुत बड़ा भ्रष्टाचार रहता है, और इसके बारे में विभाग को जानने वाले सभी लोगों को पूरी खबर रहती है।
प्रदेशों में पार्टियों सरकारों में आती-जाती रहती हैं। जब लोग विपक्ष में रहते हैं, तो वे सरकार के भ्रष्टाचार का भांडाफोड़ करते हुए आरोप लगाते हैं, और कभी-कभी सुबूत भी सामने रखते हैं। दूसरी तरफ जब विपक्ष के ऐसे लोग सत्ता पर आते हैं, तो विभागों के संगठित भ्रष्टाचार की अपनी जानकारी का इस्तेमाल खुद भी वैसा ही भ्रष्टाचार करने में करने लगते हैं। यह सिलसिला उन अफसरों की मेहरबानी से और बढऩे लगता है, जो कि हर सत्तारूढ़ पार्टी के लिए जरूरी रहते हैं। हमने रमन सिंह सरकार के कुछ सबसे भ्रष्ट अफसरों को देखा था जो कि उस वक्त के विपक्षी भूपेश बघेल की तोप के निशाने पर थे। लेकिन जैसे ही भूपेश बघेल मुख्यमंत्री बने, बड़े पैमाने का संगठित भ्रष्टाचार करने वाले ये अफसर उनके इतने चहेते बन गए, कि उनके रथ के सारथी बन गए, और अपने से कई दर्जा ऊपर के अफसरों को चाबुक मारकर चलाने लगे थे। अभी सुप्रीम कोर्ट इसी दौर पर गौर कर रहा है कि किस तरह रमन सिंह के कार्यकाल के सबसे भ्रष्ट अफसरों को बचाने के लिए अगले कांग्रेसी मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने हाईकोर्ट के जज से भी बात-मुलाकात की, और अपने नियुक्त किए गए महाधिवक्ता को भी कानून के इस कत्ल में जोत दिया था।
हमने बात शुरू तो की थी पासपोर्ट ऑफिस से, जिसने एक धमकी से हड़बड़ाकर सडक़ छाप दिख रहे एक धोखेबाज को पांच लाख रूपए दे दिए। लेकिन सरकारें अगर गौर करें, तो उनके बहुत से दफ्तर संगठित अपराध और भ्रष्टाचार का अड्डा बने रहते हैं, जिनके बारे में ऐसे दफ्तरों के बाहर के चायठेले और पानठेले वालों को भी सब पता रहता है, और अगर किसी को पता नहीं रहता है, तो वह बस सरकारों में बैठे बड़े-बड़े लोगों को पता नहीं रहता है। दरअसल भ्रष्टाचार की कमाई पलकों को बोझिल कर देती है, और अपने कमाऊ-कपूतों के कुकर्म दिखना बंद हो जाते हैं। (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)
छत्तीसगढ़ के सरगुजा के सूरजपुर जिले में जो हुआ है, वैसा हिन्दुस्तान के किसी भी दूसरे राज्य में सुनाई नहीं पड़ा। एक पेशेवर मुजरिम-गुंडे नौजवान को जिलाबदर किया गया था, लेकिन वह दौलत और राजनीतिक पहुंच की अपनी ताकत के साथ कानून के खिलाफ काम करते रहा। उसके जुर्म के धंधे पर कार्रवाई करती पुलिस को पिछले दो-तीन दिनों में ही उसने कड़ाही में खौलता तेल फेंककर जलाया, गाड़ी से कुचलने की कोशिश की, और एक हेडकांस्टेबल के घर पहुंचकर उसकी बीवी और बेटी को तलवार से मार डाला, और लाशों को ले जाकर बाहर खेतों में फेंक दिया। अब तक हिन्दुस्तान में कई जगहों पर यह तो सुनाई पड़ा था कि कार्रवाई करने वाली पुलिस, या दूसरे अफसर को मार दिया, लेकिन यह कहीं सुनाई नहीं पड़ा था कि पुलिस के परिवार के साथ ऐसा भयानक और खूंखार जुर्म किया गया हो। इसी छत्तीसगढ़ के दूसरे सिरे पर बस्तर के इलाके में नक्सली भी कई किस्म की हिंसा करते हैं, पुलिस-मुखबिरी की तोहमत लगाकर वे अपनी फर्जी जनसुनवाई करके कुछ लोगों को मार भी डालते हैं, लेकिन किसी पुलिस परिवार के साथ नक्सलियों ने भी आज तक ऐसा नहीं किया है जो कि एक राजनीतिक दल, कांग्रेस से रिश्ते का सार्वजनिक दावा करते हुए कबाड़ और दूसरे किस्म के धंधे करने वाले इस नौजवान ने किया है। इस एक घटना से छत्तीसगढ़ में चले आ रहे जुर्म के लंबे सिलसिले की फिल्म आंखों में कौंध जाती है, और ऐसा लगता है कि प्रदेश में कानून-व्यवस्था खत्म सी हो गई है।
प्रदेश के बहुत ताकतवर गृहमंत्री विजय शर्मा उपमुख्यमंत्री भी हैं, उनका अपना गृहजिला कवर्धा पिछले महीने भर में जितने किस्म की हिंसक अराजकता देख चुका है, वैसा शायद ही कभी उस जिले में, या किसी एक जिले में हुआ हो। अभी कुछ महीनों के भीतर छत्तीसगढ़ के एक दूसरे जिले, बलौदाबाजार-भाटापारा में जिस तरह सतनामी समाज के एक प्रदर्शन के बाद वहां के कलेक्टर और एसपी के दफ्तरों को जलाया गया, वैसा भी देश में कभी किसी और जगह पर नहीं हुआ था। इन बड़ी घटनाओं के बीच, और आगे-पीछे छत्तीसगढ़ में हिंसक और जानलेवा जुर्म, बलात्कार और गैंगरेप जैसे मामले इस हद तक बढ़े हुए दिख रहे हैं कि जैसा पहले कभी नहीं हुआ था। जादू-टोने की तोहमत लगाकर लोगों को थोक में मार डालने के मामले हो रहे हैं, और पशु व्यापारियों को गाय तस्कर बताकर खुलेआम मार डाला जा रहा है, और पुलिस ऐसे मामले को हल्का बनाने में जुटी हुई दिखती है। यह भी पहली बार ही हुआ है कि त्यौहारों पर जब पुलिस को अधिक चौकस रहना चाहिए, उसे कांवडिय़ों की आरती उतारने, और उन पर फूल बरसाने का हुक्म दिया गया, और फिर इस भक्तिभाव के वीडियो बनाकर उसे पुलिस के सबसे महान काम की तरह प्रचारित किया गया।
अचानक ही पूरे प्रदेश में जिस तरह बड़े पैमाने पर चाकूबाजी की वारदातें हो रही हैं, तरह-तरह के गैंगवॉर हो रहे हैं, उससे भी आम जनता दहशत में है। हालत यह है कि हर किस्म के हिंसक जुर्म में अब नाबालिग भी शामिल मिल रहे हैं, इससे लगता है कि मुजरिम बनने की औसत उम्र अब घटती चली जा रही है, और लोग बालिग बाद में बनते हैं, संगीन जुर्म पहले करते हैं। महिलाओं, नाबालिग बच्चियों, और छोटे बच्चों के खिलाफ, बूढ़े मां-बाप के खिलाफ हिंसक और जानलेवा जुर्म अंधाधुंध हो रहे हैं। हम यह तो नहीं कहते कि हर किस्म की निजी हिंसा पुलिस के रोकने लायक रहती है, लेकिन जिस तरह प्रदेश में सरकारी नशे के कारोबार के अलावा अवैध शराब, गैरकानूनी गांजा, और बहुत खतरनाक गैरकानूनी दूसरा सूखा नशा बढ़ते चल रहा है, उससे भी निजी हिंसा बढ़ती जा रही है।
राज्य के बड़े शहरों में करोड़पति कारोबारियों के जो महंगे ठिकाने तकरीबन पूरी रात गैरकानूनी धंधा करते हुए नशा बेच रहे हैं, वह पुलिस की भागीदारी के बिना तो मुमकिन नहीं दिखता। दूसरी तरफ कबाड़ के जैसे कारोबार से मिली आर्थिक और राजनीतिक ताकत से कल सूरजपुर में जो अभूतपूर्व और असाधारण हिंसा हुई है, वैसा कारोबार भी पुलिस की भागीदारी के बिना नहीं चल सकता। इस प्रदेश में महादेव ऑनलाईन सट्टे का जो रिकॉर्डतोड़ आकार का माफिया साम्राज्य चल रहा था, उसमें भी प्रदेश के दर्जनों नेताओं, और अफसरों के करोड़पति और अरबपति बनने की चर्चा है। कोयले के कानूनी धंधे पर एक गैरकानूनी रंगदारी टैक्स, शराब का पूरी तरह से अवैध कारोबार, और कई दूसरे किस्म के माफिया अंदाज के काम, इन सबने छत्तीसगढ़ को देश का एक सबसे बड़ा मुजरिम और भ्रष्ट राज्य बनाकर रख दिया है। जुर्म के धंधे में कमाई इतनी बड़ी है कि उसकी हिस्सेदारी बड़े-बड़े नेताओं, और अफसरों की नीयत खराब कर देती है। आज जब हम यह बात लिख रहे हैं, उसी वक्त छत्तीसगढ़ में कई जगहों पर रेत की अवैध खुदाई का संगठित माफिया काम कर रहा है, और करोड़ों की मशीनों और गाडिय़ों को जोतकर चलने वाला यह धंधा नेताओं और अफसरों से सेटिंग के बिना चलना मुमकिन नहीं रहता।
लेकिन इन तमाम बातों के बीच भी सूरजपुर की कल की घटना एक बहुत बड़े माफिया अंदाज की हिंसा है जो कि पुलिस की पूरी ताकत को एक चुनौती है, और पुलिस के बेकसूर परिवार के साथ सबसे भयानक दर्जे की हिंसा है। आधी-पौन सदी पहले इटली और अमरीका में माफिया की जो खबरें बाहर आती थीं, उनमें ऐसा होता था कि अदालत में मुजरिम को सजा दिलाने की कोशिश कर रहे सरकारी वकील, या जांच कर रहे पुलिस अफसर, या गवाह के परिवार का ऐसा कत्ल किया जाए। लेकिन हिन्दुस्तान में ऐसी दूसरी घटना याद नहीं पड़ती कि एक पुलिस कर्मचारी के ड्यूटी करने से खफा होकर एक संगठित अपराधी उसके परिवार को इतने वीभत्स और हिंसक तरीके से मार डाले। फिलहाल तो यह बात महत्वपूर्ण नहीं है कि जिस पर इन हत्याओं का शक है, और जो फरार है, वह कांग्रेस के छात्र संगठन से जुड़ा हुआ है या नहीं। अभी तो सबसे जरूरी यह है कि इसे जल्दी से जल्दी पकड़ा जाए, और कड़ी से कड़ी सजा दिलाई जाए। राज्य सरकार को, और खासकर पुलिस महकमे को यह देखना चाहिए कि किस तरह प्रदेश के पुलिस परिवारों के एक संगठन के संयोजक उज्जवल दीवान ने एक वीडियो बनाकर यह घोषणा की है पुलिस-परिवार का कत्ल करने वाले को पकडऩे वाले को 50 हजार रूपए नगद, और अगर उसे मुठभेड़ में मारा जाता है तो उस पर एक लाख रूपए नगद ईनाम संगठन देगा। यह राज्य सरकार के लिए आत्ममंथन का एक बड़ा मौका है कि कार्यकाल का एक साल पूरा होने के पहले ही पूरे प्रदेश में कानून-व्यवस्था जिस तरह खत्म हो जाने का अहसास प्रदेश के लोगों को हो रहा है, उसमें सरकार की कैसे सुधार की जिम्मेदारी बनती है। इसी सूरजपुर से एक दूसरी खबर आई है कि एक स्कूली छात्रा के साथ गैंगरेप की रिपोर्ट भी दर्ज नहीं की जा रही थी, और सरगुजा के सबसे बड़े कांग्रेस नेता, और पूर्व उपमुख्यमंत्री टी.एस. सिंहदेव की दखल के बाद दो दिन बाद रिपोर्ट दर्ज की गई। अगर यह नौबत सचमुच है, तो सरकार को बाकी तमाम काम छोडक़र प्रदेश में कानून-व्यवस्था पर लंबा विचार करना चाहिए। (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)
मुम्बई में कांग्रेस और एनसीपी के नेता रहे भूतपूर्व मंत्री बाबा सिद्दीकी के कत्ल को लेकर मीडिया में खबरें पटी पड़ी हैं, इसलिए भी कि फिल्म इंडस्ट्री के इलाके के पार्षद, विधायक, और मंत्री रहे इस नेता के इर्द-गिर्द फिल्मी सितारों के चेहरे दिखते रहते थे। इस बार जेल में बंद भारत के एक सबसे चर्चित गैंगस्टर लॉरेंस बिश्नोई गिरोह की तरफ से दावा किया गया है कि बाबा सिद्दीकी को उसके शूटरों ने मारा है क्योंकि वह सलमान खान का साथ देता है जिसे मारने की घोषणा इस गिरोह ने पहले से की हुई है। कुछ महीने पहले सलमान खान के घर पर गोलियां भी चलाई गई थीं, और तब से सलमान खान और उसके घर की हिफाजत पुलिस की तरफ से बढ़ा दी गई है। लेकिन पुलिस की हिफाजत अधिक मायने इसलिए नहीं रखती कि वाई केटेगरी की सुरक्षा बाबा सिद्दीकी को जान से मारने की धमकी के बाद दी गई थी, लेकिन मामूली नौजवान शूटरों ने आकर बाबा सिद्दीकी को खत्म कर ही दिया। अखबारी खबरें बताती हैं कि लगातार जेल में बंद रहकर लॉरेंस बिश्नोई अपने को तो दुश्मनों के हमले से बचा ही रहा है, वह जेल अफसरों की मेहरबानी से वहां से फोन पर दुनिया भर में बिखरे अपने गिरोह को चलाता है, और कत्ल करवाता है। कई भरोसेमंद खबरें बताती हैं कि दुनिया के दूसरे देशों में भी वह जुर्म करवाता है। जैसा कि उसके नाम से जाहिर है, लॉरेंस बिश्नोई बिश्नोई समुदाय से आता है, और इसी से लेकर सलमान खान से दुश्मनी की एक वजह सामने आई है।
लोगों को याद होगा कि 1998 में एक फिल्म की शूटिंग के दौरान राजस्थान के जोधपुर में सलमान खान वहां गए हुए थे, और वहां काले हिरण के शिकार का एक मामला उन पर दर्ज हुआ जो कि बरसों तक खबरों में बने रहा। बिश्नोई समुदाय काले हिरण को अपने आध्यात्मिक मुखिया भगवान जम्बेश्वर का अवतार मानता है, और इस घटना के बाद से पूरा समुदाय सलमान के खिलाफ रहा। लोगों ने ऐसी तस्वीरें देखी होंगी जिनमें बिश्नोई समुदाय की महिलाएं अपने बच्चे को दूध पिलाने के साथ-साथ काले हिरण के बच्चे को भी अपने स्तन से दूध पिलाते दिखती हैं। शिकार के मामले के बाद अखिल भारतीय बिश्नोई समाज के अध्यक्ष देवेन्द्र बुधिया ने सार्वजनिक रूप से यह सुझाया था कि सलमान खान को समाज के मंदिर में आकर अफसोस जाहिर करना चाहिए, और यह शपथ लेनी चाहिए कि वे वन्य जीवन और पर्यावरण को बचाने का काम करेंगे, उन्हें समुदाय से माफी मांगनी चाहिए, और समाज इस पर विचार करेगा। अब इसी तरह की कुछ बात भाजपा के एक नेता, पूर्व राज्यसभा सांसद हरनाथ सिंह यादव ने भी की है। उन्होंने कहा है कि काले हिरण को बिश्नोई समाज देवता की तरह पूजता है। आपने उसका शिकार किया जिसके कारण बिश्नोई समाज की भावनाएं बहुत आहत हुईं। इन भावनाओं का सम्मान करते हुए अपनी बड़ी गलती के लिए सलमान को समाज से माफी मांगना चाहिए।
इतने बरस पहले से काले हिरण के शिकार का मामला सलमान पर चले आ रहा था, और इस शिकार की घटना से आहत बिश्नोई समाज यह देखकर हैरान था कि एक अरबपति फिल्मी सितारा होने की वजह से सलमान के खिलाफ मामला किसी किनारे पहुंच ही नहीं रहा था। लेकिन भारत की न्याय व्यवस्था तो सभी लोगों के लिए मौजूद है, और पैसेवाले-ताकतवर लोगों में सलमान अकेले तो हैं नहीं जिन्हें न्याय व्यवस्था में रियायतें मिल रही हों। जिसके भी पास पैसा या ताकत है, उन सभी को न्याय व्यवस्था को तरह-तरह से प्रभावित करने का हक हासिल रहता है। लेकिन धार्मिक भावनाओं के चलते बिश्नोई समाज अधिक विचलित था, और फिर उसे लॉरेंस बिश्नोई की शक्ल में एक ऐसा गैंगस्टर हासिल है जो कि इस मुद्दे को किसी भी हद तक बढ़ाने की ताकत रखता है।
अब सवाल यह उठता है कि अलग-अलग धर्मों या सम्प्रदायों की भावनाओं को लेकर अगर भारत की न्याय व्यवस्था से परे इस तरह की एक समानांतर व्यवस्था लागू की जाए, और एक किस्म से बंदूक की नोंक पर किसी को आकर माफी मांगने को मजबूर किया जाए, तो भारत का कौन सा कानून ऐसी जिद का समर्थन करता है? और फिर किसी की जान लेने की धमकी के बाद उसे बचने के लिए ऐसी सलाह देना कहां तक जायज है? ऐसे सिलसिले का अंत कहां जाकर होगा? हमने भारत के पड़ोस के पाकिस्तान में ईशनिंदा के नाम पर किसी को भी पुलिस हिरासत से छीनकर उसकी भीड़त्या कर देने के कितने ही मामले देखे हैं। दुनिया में जिन और देशों में धर्मान्ध भीड़ का राज चलता है, वहां यही होता है। हिन्दुस्तान में भी गौरक्षा के नाम पर ऐसे कई कत्ल हुए हैं जिनमें भीड़ अपने आपको गौप्रेमी बताते हुए किसी भी पशु व्यापारी का कत्ल करने पर आमादा रहती है, और कई प्रदेशों में सरकारें भी ऐसे हत्यारों को बचाने के लिए ओवरटाइम मेहनत करने लगती हैं। अगर कत्ल की धमकी देकर किसी से ऐसी माफी मंगवाने का सिलसिला शुरू हो गया, तो फिर हमने पंजाब में भी कुछ गुरुद्वारों में मानसिक विचलित लोगों को गुरुद्वारे की बेअदबी करने का आरोप लगाती हुई भीड़ के हाथों मारे जाते देखा है। लोकतंत्र और न्याय व्यवस्था में यह सिलसिला बहुत खतरनाक है।
भारत को सोचना चाहिए कि आज गुजरात की जेल में बंद गैंगस्टर लॉरेंस बिश्नोई यह किस तरह का माफिया राज देश में चला रहा है? उसे यह भी सोचना चाहिए कि महाराष्ट्र में एक पखवाड़े पहले कत्ल की धमकी देने के बाद वाई केटेगरी सुरक्षा के बीच कांग्रेस-एनसीपी नेता का किस तरह कत्ल कर दिया जाता है, और सरकार देखती रह जाती है। इन दो राज्यों से परे देश में भी आज भाजपा की अगुवाई वाली सरकार है, और केन्द्र सरकार को यह सोचना चाहिए कि देश-विदेश तक फैले हुए जुर्म और आतंक के ऐसे साम्राज्य को खत्म करने के लिए उस पर कैसी जिम्मेदारी बनती है? (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)
अभी तीन बरस के एक बच्चे के कत्ल का मामला जब पुलिस ने सुलझाया तो पता लगा कि उसी का 19 बरस का चचेरा भाई हत्यारा था। परिवार के भीतर यह तनातनी थी कि इस बच्चे के पिता ने कुछ अरसा पहले अपने भतीजे के खिलाफ चोरी की रिपोर्ट लिखाई थी, और इसके बाद से आसपास के दूसरे लोग भी चाचा की देखादेखी इस नौजवान को चोर कहते थे। यह सुनकर थका हुआ यह नौजवान लगातार तनाव में रहता था, और उसने रिश्ते के चाचा से बदला लेने के लिए उसके छोटे बच्चे को मार डाला। इस घटना से कुछ बरस पहले की एक केन्द्रीय सुरक्षा बल के कैम्प की गोलीबारी याद आती है जिसमें साथी जवान किसी एक को नामर्द कहते हुए तरह-तरह के ताने देते थे, और उसने इसी तनाव में एक दिन कई साथियों को एक साथ गोली चलाकर मार डाला था। अमरीका में स्कूल-कॉलेज में गोलीबारी करके सामूहिक हत्या के कई मामले हर बरस सामने आते हैं, और उनमें एक वजह यह सामने आती है कि उस जगह पढ़ते हुए हत्यारे को लोगों के फिकरों का सामना करना पड़ता था, और उसी का बदला निकालने के लिए बाद में हथियारबंद होकर, जाकर हत्यारे ने बहुत से लोगों को मार डाला था। हिन्दुस्तान में हत्याओं के और भी बहुत से मामले ऐसे रहते हैं जिनमें लोगों के तानों से, या उनके खिल्ली उड़ाए जाने से थककर लोग किसी को मार डालते हैं। दूसरी तरफ यह हिंसा आत्मघाती भी हो जाती है, और स्कूल-कॉलेज के हॉस्टलों में कई ऐसी खुदकुशी होती हैं जिनमें सहपाठियों और साथियों के तानों और खिल्ली उड़ाने से थके हुए छात्र-छात्राओं ने खुदकुशी की होती है।
दरअसल लोगों में मानवीय कहे जाने वाले मूल्यों की बुनियाद ही कमजोर होती चल रही है। लोगों को अब आसपास के किसी तकलीफ से गुजर रहे इंसान के साथ हमदर्दी की बात नहीं सूझती। लोगों को किसी कमजोर को घेरकर परेशान करते हुए भी कुछ नहीं लगता। और अगर हम बोलचाल की भाषा को देखें, तो लोगों के मन में किसी कमजोर, बीमार, विकलांग, गरीब, और कुरूप समझे जाने वाले लोगों के लिए परले दर्जे की हिकारत रहती है। बहुत से कहावत और मुहावरे ऐसे तमाम लोगों की खिल्ली उड़ाने वाले रहते हैं, और इनके रूप-रंग को गाली की तरह इस्तेमाल भी करते हैं। कहीं मोटापा मखौल का सामान बन जाता है, तो कहीं गोरे रंग की चाह वाले हिन्दुस्तानियों के बीच काला रंग। ये बातें भारतीय फिल्मों में कई दशकों से चले आ रहे किरदारों से और मजबूत होती चलती हैं। किसी का काला रंग या उसका मोटापा कॉमेडी का सामान फिल्मों में भी माना जाता था, और अब कपिल शर्मा जैसे मशहूर कॉमेडी शो में भी वैसी ही गैरजिम्मेदारी दिखाई जाती है। अगर सही और गलत का फर्क करके फिल्म और ऐसे टीवी शो देखे जाएं, तो इनमें से अधिकतर को देखना मुमकिन नहीं रहता। पूरी तरह से गैरजिम्मेदार होकर ही इनका आनंद उठाया जा सकता है।
जो समाज अपने भीतर के किसी नाबालिग लडक़े पर चोरी का आरोप लगने पर उसे चोर कहते हुए उसे हिकारत से देखता है, वह समाज एक और मुजरिम पाने का ही हकदार रहता है। लेकिन हम मरने और मारने के जो आंकड़े सामने आते हैं उनसे परे जब देखते हैं, तो समझ पड़ता है कि साथियों और समाज के ओछे शब्दों की वजह से जाने कितने ही बच्चे और बड़े, महिलाएं या गरीब, बीमार या विकलांग हीनभावना का शिकार होकर जीते होंगे। चूंकि यह हीनभावना पुलिस रिकॉर्ड के मुताबिक हत्या-आत्महत्या जैसी नौबत में तब्दील नहीं होती है, इसलिए उससे परेशान लोगों की गिनती नहीं लगाई जा सकती। लेकिन सच तो यह है कि जो समाज अपने ही लोगों को परेशान और प्रताडि़त करने का शौक रखता है, वह समाज अपनी पूरी संभावनाओं तक कभी नहीं पहुंच पाता। अवसाद के शिकार लोग समाज के अच्छे, और उत्पादक सदस्य नहीं बन पाते। और किसी देश का कानून लोगों में मानवीय मूल्यों को नहीं जगा पाता, इसके लिए समाज के लोगों के बीच एक सकारात्मक सोच जरूरी रहती है जो कि किसी स्कूल-कॉलेज के कोर्स का हिस्सा नहीं हो सकती। इसे परिवार, पड़ोस, समाज, और स्कूल, इन सभी जगहों पर सकारात्मकता के लिए सक्रिय लोग ही पैदा कर सकते हैं, और बढ़ावा दे सकते हैं। लोगों को इसकी शुरूआत अपने घर से, खुद से, अपने बच्चों से, और परिवार के बाकी लोगों से करनी चाहिए। इसके लिए लोगों के मन में लोकतंत्र और मानवाधिकार के प्रति सम्मान होना चाहिए, प्राकृतिक न्याय की एक समझ विकसित की जानी चाहिए, और कमजोर की मदद करने जितनी रहम दिल में रहनी चाहिए। आज परिवार और उसके सदस्य जितने आत्मकेन्द्रित हो गए हैं, जितने मतलबपरस्त हो गए हैं, और जिंदगी में कामयाबी की परिभाषा इम्तिहानों के नंबर, और नौकरी की तनख्वाह तक जिस तरह सीमित रह गई है, उसमें लोगों का रहमदिल होना कोई खूबी नहीं गिनी जाती। समाज में जब तक महीन मानवीय मूल्यों का महत्व दुबारा कायम नहीं होगा, तब तक ऐसी नौबत आती रहेगी कि औरों के तानों से तनाव में आए लोग दूसरों के खिलाफ हिंसा करते रहेंगे, या आत्मघाती काम करेंगे, या मानसिक रूप से बीमार इंसान की तरह जिएंगे। हम जिस समाधान को सुझा रहे हैं, उसके लिए पूरे समाज का संवेदनशील होना जरूरी है, उसके लिए हर तरह से लोगों का बेहतर इंसान होना जरूरी है, उसका कोई शॉर्टकट नहीं हो सकता।
देश में खदानों और खनिजों की आवाजाही से पर्यावरण को होने वाले नुकसान की भरपाई के लिए खनिज रायल्टी का एक हिस्सा संबंधित जिलों को देने की एक नीति देश में चल रही है। इसके तहत खदान वाले जिले, और आसपास के प्रभावित होने वाले दूसरे जिलों के बीच खनिज रायल्टी का जिला खनिज निधि के तहत निर्धारित हिस्सा बंटता है, और इसका मुख्य मकसद यह रहा है कि पर्यावरण, इंसानों और पशुओं को होने वाले नुकसान की भरपाई की जा सके। इसे स्थानीय स्तर पर तय करने के लिए कलेक्टरों को अधिकृत किया गया, और राज्यों ने अपने हिसाब से इसमें थोड़े-बहुत फेरबदल भी किए। जिला खनिज निधि के तहत क्या-क्या काम हो सकते हैं, यह केन्द्र सरकार ने भी तय किया, और राज्य संबंधित जिलों की स्थानीय जरूरतों को देखते हुए उसमें कुछ छूट भी लेते रहे। यहां तक तो बात बड़ी सुहावनी लगती है, लेकिन जब बारीकियों में जाएं तो समझ पड़ता है कि कुछ खनिज-जिलों में सैकड़ों करोड़ रूपए सालाना का डीएमएफ बजट कलेक्टरों की मर्जी पर उनके पॉकेटमनी की तरह खर्च होता रहा, और जिन प्रदेशों में मुख्यमंत्री की पकड़ असंवैधानिक हद तक मजबूत रही, वहां पर डीएमएफ का पैसा मुख्यमंत्री की मनमर्जी से खर्च होते रहा।
अभी छत्तीसगढ़ में कांग्रेस सरकार के जाने के बाद भाजपा की सरकार पहले से ईडी और आईटी के बनाए हुए मामलों की जांच खुद भी कर रही है। इसे सीधे-सीधे पिछली सरकार के खिलाफ मौजूदा सरकार की दुर्भावना मान लेने से पहले यह समझ लेना जरूरी है कि ईडी और आईटी द्वारा किसी जुर्म का मामला बनाने पर भी उनके अधिकार उनके विभागों से संबंधित कानूनों तक सीमित रहते हैं। दूसरी तरफ राज्यों में जब इन जुर्मों से संबंधित मामलों में सरकारी अधिकारी भी जुड़े रहते हैं, तो उन पर राज्य के अलग-अलग कानून भी लागू होते हैं। छत्तीसगढ़ में आज यही हो रहा है। बीते बरसों से ईडी और आईटी के जो मामले चल रहे थे, वे अब राज्य सरकार की एजेंसियों के दायरे में भी जांच का सामना कर रहे हैं। इसी में डीएमएफ की जांच भी हो रही है, और खनिज संपन्न जिलों में ईडी ने छापे मारकर डीएमएफ के घोटाले पकड़े थे, और अब राज्य की जांच एजेंसी खुद भी केस दर्ज करके उस मामले को आगे बढ़ा रही है। शुरूआती जांच में ही यह पता लग रहा है कि डीएमएफ की रकम की बड़े पैमाने पर बंदरबांट हुई है। राज्य में पिछली कांग्रेस सरकार के रहते हुए भी यह जानकारी बड़ी आम थी कि जिलों में डीएमएफ की रकम से मनमाने काम करवाने, उन्हें मनमाने ठेकेदारों और सप्लायरों को दिलवाने का काम राज्य के कुछ चुनिंदा अफसर करते थे, जो कि राज्य को एक मुजरिम गिरोह की तरह चलाते-चलाते आज कई-कई मामलों में जेल में पड़े हुए हैं। जिन अफसरों की पेशाब से पिछली सरकार में चिराग जला करते थे, आज वे जेल में दूसरे कैदियों के साथ एक ही पखाना इस्तेमाल करने पर मजबूर हैं (अगर उन्हें जेल में सहूलियतें खरीदने की आम परंपरा का फायदा न मिल रहा हो तो)।
राज्य में कुछेक ऐसी योजनाएं रहती हैं जो प्रदेश के बजट से परे की रहती हैं, और जिनमें आने वाला पैसा जेब खर्च जैसा मान लिया जाता है। राज्य में किसी भी योजना के लिए अगर पेड़ काटे जाते हैं, तो सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले के तहत उसकी भरपाई के लिए नए वृक्षारोपण को ऐसे राज्यों को कटाई के अनुपात में भरपाई मिलती है। छत्तीसगढ़ को ऐसे हजारों करोड़ रूपए मिलते हैं, और वन विभाग के कुख्यात अफसर राज्य शासन हांकने वाले अपनी टक्कर के कुख्यात अफसरों के साथ मिलकर पूरे कैम्पा-मद को पॉकेटमनी की तरह खर्च करते आए हैं। अगर पिछली कांग्रेस सरकार के दौर के कैम्पा-मद के खर्च की बारीकी से जांच की जाए, तो सैकड़ों या हजारों करोड़ का भ्रष्टाचार उजागर होगा। सरकार में यह जानकारी आम रहती थी कि कैम्पा-फंड से क्या-क्या गलत काम हो रहा है, लेकिन जब शासन गले-गले तक ऐसे ही धंधों में डूबा हुआ था, तो कैम्पा वन विभाग का डीएमएफ सरीखा हो गया था। हजारों करोड़ रूपए सालाना के ऐसे मनमर्जी से खर्चने वाले फंड ने ऐसा भयानक भ्रष्टाचार खड़ा किया हुआ था कि उससे राज्य सरकार में घटिया सामान सप्लाई करने, घटिया काम करने, और गैरजरूरी खर्च करने का खून सरकारी मशीनरी के मुंह लग गया था। आज जांच एजेंसियां जितने किस्म के मामले उजागर कर चुकी हैं, वे सब एक किस्म से मौजूदा सरकार, भावी सरकारों, और दूसरे प्रदेशों की सरकारों, सबके लिए सबक की तरह भी हैं कि सरकार में रहते हुए क्या-क्या करने से जेल जाने की नौबत आती है। पता नहीं जेल में बैठे हुए अफसरों के कमाए हुए सैकड़ों करोड़ उनको जमानत के इंतजार में बरसों गुजारने, और फिर शायद बरसों की कैद काटने से अधिक महत्वपूर्ण लगते हैं या नहीं। फिलहाल यह बात तो साफ है कि जब शासन-प्रशासन के अच्छी तरह स्थापित, और संवैधानिक ढांचे से परे जब कुछ गिने-चुने अफसर और सत्ता के दलाल पूरे राज्य को खच्चर की तरह हांकते हैं, तो वे राज्य को तो बर्बाद करते ही हैं, वे खुद की बर्बादी की भी गारंटी करते हैं। इसमें कुछ देर हो सकती है, लेकिन अंधेर नहीं, कुल मिलाकर जेल में चक्की तो पीसना ही पड़ता है।
केन्द्र और राज्य की जांच एजेंसियां छत्तीसगढ़ को लेकर जितने तरह के मामले सामने रख चुकी हैं, उससे इस प्रदेश के राजनीतिक और सरकारी अमलों को जुर्म से दूर रहने की एक नसीहत मिलती है। ऐसा भी नहीं है कि ये अमले पूरी तरह भ्रष्ट और मुजरिम रहते हों, इनमें भी कुछ लोग तो हमेशा ही भले रहते हैं। ऐसा लगता है कि पीएससी, और यूपीएससी को अपने छांटे हुए लोगों के लिए छत्तीसगढ़ में रिफ्रेशर कोर्स चलाने चाहिए कि सरकार कैसे-कैसे नहीं चलानी चाहिए। जिस डीएमएफ और कैम्पा जैसे फंड का इस्तेमाल पर्यावरण को हो चुके नुकसान की भरपाई के लिए किया जाना चाहिए था, उन्हें नेताओं और अफसरों ने अपने पॉकेटमनी की तरह इस्तेमाल किया। डीएमएफ की तो जांच छत्तीसगढ़ की नई सरकार को ईडी की तरफ से विरासत में मिली है, लेकिन वन विभाग के कैम्पा फंड में तो अभी झांका भी नहीं गया है। सरकार को तुरंत ही कैम्पा के हजारों करोड़ का स्पेशल ऑडिट करवाना चाहिए ताकि अब आगे सत्ता के सभी भागीदार सावधान हो सकें, और जेल के बाहर अपने परिवारों सहित सुख से रह सकें।
देश के एक सबसे प्रतिष्ठित उद्योगपति रतन टाटा के गुजरने से एक बार फिर भारत की कार्पोरेट दुनिया और उसके सामाजिक सरोकारों पर चर्चा शुरू हुई है। कुछ लोगों ने सोशल मीडिया पर लिखा है कि देश में समाज सेवा करने में सबसे आगे दो कारोबारी रहे, एक पारसी रतन टाटा, और एक मुस्लिम अजीम प्रेमजी। कहने को कुछ दूसरे बड़े उद्योगपति भी जेब की चिल्हर सरीखी रकम दान में देते हैं, लेकिन अपनी दौलत का एक बड़ा हिस्सा, कमाई का एक बड़ा हिस्सा समाज सेवा में देने का काम गिने-चुने हिन्दुस्तानी कारोबारी करते हैं, और उनमें ये दो नाम सबसे ऊपर हैं। रतन टाटा और अजीम प्रेमजी दोनों की निजी जिंदगी की सादगी की चर्चा भी देखने लायक है। और अपनी बेतहाशा कमाई, कुबेर सरीखी दौलत का समाज के लिए इस्तेमाल उनके लिए सबसे बड़ी बात है। दूसरों के लिए कुछ करने को अपनी जिंदगी का मकसद बना लेना, दुनिया में कई और कारोबारियों ने भी किया है, और कुछ सबसे बड़े कारोबारियों ने यह अभियान भी चलाया है कि दूसरे अतिसंपन्न लोग अपनी आधी दौलत समाज के लिए दें। भारत में यह अभियान इक्का-दुक्का लोगों को ही छू पाया।
लेकिन इस चर्चा से थोड़ा सा परे एक दूसरी खबर भी आज की है कि महीने भर बाद रिटायर होने वाले सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश डी.वाई.चन्द्रचूड़ कुछ बेचैन हैं। उनका कहना है कि कार्यकाल खत्म हो रहा है इसलिए मेरा मन भविष्य और अतीत के बारे में आशंकाओं और चिंताओं से ग्रस्त है। उन्होंने अभी कानून के छात्रों के बीच कहा कि वे अपने को ऐसे सवालों से घिरे पा रहे हैं कि क्या उन्होंने वह सब हासिल किया जो करने का लक्ष्य रखा था? इतिहास उनके कार्यकाल का कैसा आंकलन करेगा? क्या वे चीजों को कुछ अलग तरीके से कर सकते थे? और क्या वे जजों और कानून के पेशेवरों की भावी पीढिय़ों के लिए कोई अच्छी विरासत छोडक़र जा रहे हैं? उन्होंने खुद ही इन सवालों का एक जवाब पेश किया है कि अधिकांश सवालों के जवाब उनके काबू से बाहर है, लेकिन उन्हें बस इतनी तसल्ली है कि पिछले दो बरस से सीजेआई रहते हुए वे हर दिन देश की सेवा पूरी लगन से करते रहे।
रतन टाटा और डी.वाई.चन्द्रचूड़ के कामकाज और व्यक्तित्व में कुछ भी एक सरीखा नहीं है लेकिन दोनों में एक चीज है कि अपने काम को उन्होंने बड़ी मेहनत से किया, और अपने काम को लेकर उनके मन में सवाल भी उठते रहे, जो कि किसी भी जिम्मेदार व्यक्ति के मन में कभी बंद नहीं होने चाहिए। हमारा मानना है कि जिंदगी के किसी भी दायरे में ऊपर पहुंचने वाले लोगों की अपनी सोच और मेहनत उनकी कामयाबी में एक बड़ा योगदान देती है। मेहनत तो मजदूर सबसे अधिक करते हैं, लेकिन ऊपर पहुंचने की जगहों पर पहुंचने वाले लोग जब एक मौलिक सोच के साथ, दूरदर्शिता और अनुशासन से मेहनत करते हैं, तो वह कुछ अलग रंग लाती है। इस मेहनत का एक हिस्सा लोगों को अपने सहयोगी तय करने में लगाना पड़ता है क्योंकि पिकासो या मकबूल फिदा हुसैन तो बिना सहयोगी के अकेले अपनी पेंटिंग बना सकते हैं, लेकिन कोई कारोबारी, समाजसेवी, या नेता ऐसा नहीं कर सकते। जहां कहीं एक टीम की जरूरत पड़ती है, वहां मुखिया के सामने सबसे बड़ी चुनौती काबिल सहयोगी छांटने की रहती है। हमारा एक मोटा अंदाज यह है कि कोई भी व्यक्ति अपने सबसे करीबी आधा दर्जन लोगों की औसत प्रतिभा से अधिक आगे नहीं बढ़ पाते। सबसे काबिल नेता या कारोबारी भी गलत सहयोगी छांटकर गहरे गड्ढे की तरफ बढ़ सकते हैं। देश के आज के सबसे बड़े कारोबारी भी अपनी कंपनियों में बहुत काबिल सहयोगियों की वजह से ही कंपनी को कामयाब कर पाते हैं। यही हाल राजनीति में रहता है। आज देश या किसी प्रदेश में कोई नेता बहुत कामयाब होते हैं, तो वे अपने राजनीतिक सहयोगियों, प्रशासनिक और दूसरे रणनीतिक सहयोगियों को छांटने की कामयाबी के बाद ही बाकी दायरे में कामयाबी की तरफ बढ़ सकते हैं।
इस बातचीत को हम जिंदगी के कुछ दूसरे दायरों की तरफ ले चलें, तो एक फिल्म निर्देशक अपने इर्द-गिर्द के आधा दर्जन सबसे करीबी लोगों को छांटकर ही सफल या असफल होते हैं। लेखक, संगीतकार, गीतकार, फोटोग्राफर, और कलाकार, ऐसे लोगों को छांटने में चूक करने वाले लोग कभी भी शानदार फिल्म नहीं बना पाते। ऐसा ही किसी टीवी चैनल, या अखबार के साथ भी होता है। कोई भी संपादक उतना ही अच्छा काम कर पाते हैं जितना कि उनके आसपास के आधा दर्जन लोगों के कामकाज का औसत रहता है। एक गलत सहयोगी को छांटना कुछ उसी तरह का रहता है जैसा कि कल एक मालवाहक गाड़ी में लदे हुए 20-25 लोगों का नहर में गिरना रहा क्योंकि ड्राइवर नशे में था। किसी सफर की कामयाबी इस पर टिकी रहती है कि गाड़ी कैसी है, और ड्राइवर कैसा है, साथ ही इस पर भी कि रास्ता कौन सा छांटा गया है। रतन टाटा उस पारसी समुदाय के थे जो कि अपने लोगों को आगे बढ़ाने के लिए जाना जाता है। लेकिन हमें टाटा की सबसे कामयाब इंडस्ट्री टाटा स्टील में उसके मुखिया एक दक्षिण भारतीय लंबे समय से दिखते चले आ रहे हैं। बड़ा उद्योग समूह अपनी अलग-अलग यूनिट के लिए कैसे लोगों को छांटता है, इस पर भी उसकी कामयाबी टिकी रहती है। लेकिन इसके साथ-साथ जो सवाल जस्टिस चन्द्रचूड़ के दिमाग में उठ रहा है कि इतिहास उनका मूल्यांकन कैसे करेगा, यह सवाल ऊंचाई पर पहुंचे हुए हर व्यक्ति के दिमाग में रहना चाहिए। इतिहास सिर्फ बड़े व्यक्तियों का लिखा जाता है, इसलिए बड़े व्यक्ति इतिहास लेखकों की अधिक खुर्दबीनी नजरों तले भी रहते हैं। और ऐसे में उन्हें अपने सामाजिक सरोकारों की बात भी सोचनी चाहिए, लोगों से अपने व्यवहार में इंसानियत के बेहतर मूल्यों को जिंदा रखना चाहिए, और बेहतर सहयोगी छांटने चाहिए। राजनीति, समाज, या कारोबार के अगुवा और मुखिया लोग सहयोगियों की अपनी पसंद की वजह से ही इतिहास में अच्छे या बुरे व्यक्ति की तरह दर्ज होते हैं। ऊंचे ओहदे पर पहुंचे हुए हर व्यक्ति को इस बारे में सबसे अधिक सावधान रहना चाहिए। दुनिया में लगातार ऐसी मिसालें सामने आती रहती हैं कि किन और कैसे सहयोगियों की वजह से कोई व्यक्ति अपनी संभावनाओं से बहुत पीछे रह गए।
हरियाणा और जम्मू-कश्मीर के चुनावी नतीजे बड़े दिलचस्प हैं। जम्मू-कश्मीर में 2014 के बाद अभी विधानसभा चुनाव हुए हैं, और वहां इस बीच संवैधानिक और राजनीतिक स्थितियां पूरी तरह से बदल चुकी हैं। इस बार वहां की स्थानीय पार्टी नेशनल कांफ्रेंस के साथ कांग्रेस के गठबंधन में 48 सीटें पाकर 90 सीटों की विधानसभा में बहुमत हासिल किया है, दूसरी तरफ 2014 के मुकाबले भाजपा ने भी चार सीटें अधिक जीती हैं। नेशनल कांफ्रेंस को पिछले 2014 के चुनावों के मुकाबले 27 सीटें अधिक मिली हैं जो कि सीधे-सीधे महबूबा मुफ्ती की पीडीपी के नुकसान से हासिल हुई हैं। महबूबा की पार्टी पिछले चुनाव के मुकाबले 25 सीटें खो चुकी हैं, और उसे कुल तीन सीटें मिली हैं। दिलचस्प बात यह भी है कि भाजपा ने अपनी पिछली 25 सीटों की गिनती बढ़ाकर 29 सीटें हासिल की हैं, और कांग्रेस ने पिछली 12 सीटों में से 6 सीटें खो दी हैं। एक दिलचस्प बात यह भी है कि कश्मीर में जितने अलगाववादी और पिछले आतंकी या उग्रवादी चुनाव लड़ रहे थे, सारे के सारे चुनाव हार गए। लोगों को याद रखना चाहिए कि जब कश्मीर से धारा 370 खत्म की गई थी, तो महबूबा मुफ्ती का बयान था कि इससे कश्मीर में आग लग जाएगी, लेकिन कश्मीर में एक पत्थर भी नहीं चला था। और न सिर्फ आतंक की घटनाएं, बल्कि पथराव की लंबी परंपरा भी खत्म हो गई थी। फौजी की मौजूदगी कश्मीर में हमेशा से रहती आई है, और उसके मौजूद रहते हुए भी आतंकी घटनाएं होती थीं, जो कि अब कम से कम कश्मीर-घाटी में न के बराबर हो गई हैं, शहरों में नागरिकों का पथराव खत्म हो गया। यह एक अलग बात है कि जम्मू का इलाका जो कि आतंकियों के असर के बाहर था, वहां आतंकियों के हमले बढ़े हैं। लेकिन धारा 370 खत्म करने के बाद से अब तक, और इस चुनाव के मतदान तक यह एक बड़ी कामयाबी दिख रही है। चाहे सरकार नेशनल कांफ्रेंस और कांग्रेस की बन रही हो, भाजपा ने सीटें बढ़ाई हैं, और पहले के मुकाबले वोट भी बहुत अधिक गिरे हैं। इस तरह चुनाव में पार्टियों, अलगाववादियों, भूतपूर्व आतंकियों, और जनता की बढ़ी हुई भागीदारी लोकतंत्र, और केन्द्र की मोदी सरकार की एक बड़ी कामयाबी रही। भाजपा किसी पार्टी से मिलकर सरकार चाहे न बना पा रही हो, लेकिन लोकतांत्रिक चुनावों का इतनी कामयाबी से होना छोटी बात नहीं है। जब पूरी दुनिया से मोदी सरकार ने पर्यवेक्षकों को इस चुनाव को देखने के लिए न्यौता दिया था, और कई देशों के पर्यवेक्षक कश्मीर चुनाव में पहुंचे भी थे, तो इससे कश्मीर के लोकतांत्रिक स्वरूप को एक नई अंतरराष्ट्रीय विश्वसनीयता भी मिली है।
अब उस हरियाणा की बात की जाए जो कि देश के बाकी हिस्से के कुछ अधिक करीब है, और जिस पर लोगों की नजरें लगी हुई थीं क्योंकि वहां भाजपा का राज चले आ रहा था, और इस बार तमाम एक्जिट पोल वहां कांग्रेस की भारी-भरकम जीत की भविष्यवाणी कर चुके थे, और भाजपा को साफ-साफ हरा चुके थे। ऐसे हरियाणा में भाजपा ने अकेले अपने दम पर, बिना किसी सहयोगी दल के, सरकार बनाने की जरूरत से दो सीटें ज्यादा पाकर भाजपा की एक बड़ी जीत साबित की है। जिस सत्तारूढ़ भाजपा के खिलाफ जनता की नाराजगी की चर्चा थी, वह भाजपा हरियाणा में तीसरी बार सरकार बना रही है, और सत्तारूढ़ रहते हुए भी उसने 8 सीटें अधिक हासिल की हैं, और उसे किसी सहयोगी दल की जरूरत भी नहीं है। यह एक अलग बात है कि पिछले कार्यकाल में उसके गठबंधन के साथी दल जेजेपी ने अपनी तमाम 10 सीटें खो दी हैं, और 8 सीटें भाजपा की बढ़ गई हैं। कांग्रेस पार्टी ने हालांकि 6 सीटें अधिक हासिल की हैं, लेकिन वह सरकार बनाने से कोसों दूर है। और अब देश में चर्चा यह हो रही है कि कांग्रेस के पक्ष में एक्जिट पोल एकतरफा क्यों जा रहे थे, और वह जीत से इतने पीछे क्यों धकेल दी गई?
चुनाव से 6 महीने पहले भाजपा ने अपना मुख्यमंत्री बदल दिया था, और मनोहरलाल के खिलाफ जितनी भी नाराजगी रही होगी, वह अगले मुख्यमंत्री नायब सैनी के हिस्से कम आई है। वोटरों को साढ़े चार बरस के, और उसके पहले के कार्यकाल के भी मुख्यमंत्री रहे मनोहरलाल को बेदर्दी से हटाए जाते देखकर एक तसल्ली मिली होगी, और सत्ता से वोटरों की नाराजगी इन 6 महीनों में घट गई दिखती है। दूसरी तरफ कांग्रेस पार्टी मतदान के दिन तक पार्टी के दो नेताओं, भूतपूर्व मुख्यमंत्री भूपिन्दर सिंह हुड्डा, और सांसद कुमारी सैलजा के बीच कुकुरहाव चलते रहा। इन दोनों के बीच बातचीत के रिश्ते भी नहीं रह गए थे, और चुनावी मंच पर राहुल गांधी को इन दोनों के हाथ एक साथ पकडक़र एकता का एक दिखावा भी करना पड़ा था। चर्चा यह रही कि सैलजा कांग्रेस छोडक़र भाजपा जा सकती हैं, वे जाहिर तौर पर चुनाव प्रचार से दूर रहीं, और हुड्डा बिना विधानसभा जीते मुख्यमंत्री बनने की हड़बड़ी में थे। हरियाणा में और भी बहुत सारे मुद्दे रहे, कुछ किसानों के, कुछ जातीय समीकरण के, और कुछ परिवारवाद और मौजूदा विधायकों की टिकट काटने के। हम बहुत बारीक विश्लेषण में जाना नहीं चाहते, लेकिन यह बात साफ है कि भाजपा की रणनीति इनमें से अधिकतर मुद्दों पर कामयाब रही, और उसका यह तीसरा कार्यकाल पिछली बार से 20 फीसदी अधिक विधायकों के साथ शुरू हो रहा है जो कि किसी भी पार्टी के लिए बहुत बड़ा सर्टिफिकेट है।
अब हरियाणा में कांग्रेस के हाथ आती दिख रही सरकार इस तरह फिसलकर निकल जाना कांग्रेस के लिए आत्ममंथन का एक बड़ा मौका है। दोनों पार्टियों के बीच एक बड़ा फर्क यह है कि भाजपा तकरीबन पूरे देश में अपने प्रदेश के नेताओं पर एक फौलादी पकड़ रखती है, मोदी और शाह की लीडरशिप के मुकाबले किसी नेता का कोई वजन नहीं है। नतीजा यह होता है कि भाजपा जब जिसे चाहे उसे नेता बना सकती है, जब जिसे चाहे उसे किसी ओहदे से हटा सकती है। उसने राजस्थान में पहली बार के विधायक को मुख्यमंत्री बना दिया, और देश के अपने एक सबसे वरिष्ठ विधायक, और एक सबसे वरिष्ठ मंत्री, बृजमोहन अग्रवाल को छत्तीसगढ़ मंत्रिमंडल से हटाकर महज सांसद बनाकर रख छोड़ा है। कांग्रेस के पास ऐसी कोई सहूलियत नहीं है। उसने छत्तीसगढ़ में अपने घरेलू वायदे को पूरा करके टी.एस.सिंहदेव को ढाई बरस के बाद मुख्यमंत्री बनाने की हिम्मत भी नहीं दिखाई, क्योंकि वह भूपेश बघेल के असाधारण दबाव तले दबी हुई थी। हो सकता है कि कांग्रेस इतने कम राज्यों में सत्ता पर रह गई है कि उसकी लीडरशिप का वजन खत्म हो चुका है, और उसके क्षेत्रीय जागीरदार जरूरत से अधिक मजबूत हो गए हैं। हरियाणा में भी कुछ ऐसा ही दिखता है जहां पर उसके पिछले मुख्यमंत्री भूपिन्दर सिंह हुड्डा कांग्रेस के दामाद रॉबर्ट वाड्रा के साथ जमीनों के कथित घोटालों में फंसे हुए हैं, और ईडी की जांच के घेरे में भी हैं, और ऐसा लगता है कि ऐसे में पार्टी के लिए हुड्डा को खफा करना मुमकिन भी नहीं था। कांग्रेस जब तक अपना खुद का घर नहीं सुधार लेती, तब तक वह वोटरों के बीच अधिक विश्वसनीयता नहीं पा सकती। पिछले आम चुनाव में उसकी सीटें जरूर बढ़ गई हैं, एनडीए और भाजपा की सीटें घट गई हैं, लेकिन कांग्रेस सत्ता से कोसों दूर भी रह गई है। सीट और वोट में चढ़ाव-उतार तब तक अधिक मायने नहीं रखते जब तक कि पार्टी सरकार बनाने के लायक न हो जाए। कांग्रेस को पहले तो अपने आपको एक मजबूत पार्टी बनकर दिखाना होगा, तभी जाकर वोटरों के बीच उसे मजबूत सरकार बनाने की संभावना वाली माना जाएगा।
अभी छत्तीसगढ़ के एक कस्बे में एक आदतन बदमाश ने शराब के नशे में हंगामा शुरू किया तो बर्दाश्त खो बैठे गांव के लोगों ने उसे पीट-पीटकर मार डाला। इस बदमाश के खिलाफ 15-20 मामले पुलिस में पहले से दर्ज थे, और वह अभी-अभी जेल से छूटकर बाहर आया था। आने के बाद अपनी बस्ती में वह लोगों को मारपीट कर शराब के लिए पैसे वसूल रहा था, इसी पर बात बढ़ी, और लोगों ने एकजुट होकर उसे मार डाला। मारने वालों में कुछ महिलाएं भी हैं जिन्होंने अपने पतियों के साथ मिलकर यह हत्या की। अब यह घटना तो एक कत्ल की तरह दर्ज है, लेकिन इससे कई किस्म के सवाल खड़े होते हैं।
अगर किसी आदतन बदमाश मुजरिम का आतंक किसी जगह बरसों से चले आ रहा है, और लगातार उसके जुर्म चल ही रहे हैं, सरकार की जिलाबदर करने जैसे कानूनी प्रावधान का भी इस्तेमाल इस आदमी पर होते नहीं दिखा है, और जेल से छूटकर आते ही वह फिर आतंक फैलाने लगा है, तो ऐसे में बस्ती के लोगों ने कानून अपने हाथ में लिया, और सामूहिक हमला करके इस बदमाश को मार डाला। पिछले बरसों के इसके छोटे-बड़े जुर्म अगर वक्त रहते इसे सजा दिला पाते, तो शायद यह नौबत नहीं आई होती। राह चलते लोगों को रोक-रोककर शराब के लिए पैसे मांगना, और न मिलने पर उन पर हमले करना लोग कब तक बर्दाश्त करते? और जब महिलाओं ने भी इस आदमी को खत्म करने के लिए हमले में बराबरी की हिस्सेदारी निभाई, तो बस्ती के लोग कितने थके हुए थे, यह जाहिर होता है। एक दूसरा मामला अभी कुछ हफ्ते पहले छत्तीसगढ़ के ही कवर्धा जिले में हुआ था जहां एक खुदकुशी के बाद उसकी हत्या होने के शक में गांव की भीड़ ने वहां के एक भूतपूर्व उपसरपंच के घर को घेरा, और मकान तो जला ही दिया, अपने ही समाज के इस नेता को पकडक़र मकान के भीतर जिंदा जलाया। इस गांव में भी इस उपसरपंच को दबंग माना जाता था, और लोगों ने एक शक के आधार पर ही उसकी ऐसी जान ले ली, परिवार के बाकी लोग किसी तरह बचे।
हम देश भर से अधिकतर प्रदेशों की ऐसी खबरें पढ़ते हैं कि कहां बलात्कार या छेडख़ानी के आरोपी जमानत पर छूटकर आते ही एक बार फिर शिकायतकर्ता लडक़ी या महिला के परिवार को प्रताडि़त करना शुरू करते हैं। पुलिस की कार्रवाई समय रहते नहीं होती, और गुंडों की दहशत में शिकायतकर्ता लडक़ी या महिला ही खुदकुशी को मजबूर हो जाती हैं। बहुत से मामलों में बलात्कारी या मवाली शिकायतकर्ता परिवार का जीना इस हद तक हराम कर देते हैं कि उनकी दुर्गति देखकर आगे लोग ऐसे मुजरिमों के खिलाफ रिपोर्ट भी लिखाने की हिम्मत नहीं करते। समाज में जब आदतन या पेशेवर हो चुके गुंडे-मवाली इस हद तक दबदबा कायम कर लेते हैं, तो फिर किसी दिन भीड़ हिसाब चुकता करते हुए भीड़त्या कर देती है।
ऐसी नौबत इसलिए भी आती है कि जिसका पुलिस थानों में रोज आना-जाना होता है, वे पुलिस के साथ कई तरह के गठजोड़ कर लेते हैं। पुलिस को भी इनसे एक संगठित फायदा होने लगता है, और पहली बार शिकायत करने आने वाले लोगों से पुलिस को उतना बंधा-बंधाया फायदा नहीं होता। इसलिए पुलिस की एक स्वाभाविक हमदर्दी पेशेवर मुजरिमों के लिए रहती है, जो कि परस्पर लाभ और परस्पर सद्भावना तक विकसित हो जाती है। अदालतों में मामलों की सुनवाई का हाल यह रहता है कि वे किसी किनारे पहुंचने का नाम नहीं लेते, और हर अदालती पेशी पर शरीफ शर्मसार होते हैं, और मवालियों से अदालती व्यवस्था मालामाल होती है। यह बात बहुत साफ है कि जब तक कानूनों पर ईमानदारी से असरदार अमल नहीं होगा, तब तक लोगों के मन में न्याय प्रक्रिया के लिए सम्मान नहीं रहेगा, फिर चाहे लोग किसी मुजरिम के कत्ल की सामूहिक हिम्मत जुटा पाएं, या नहीं। पुलिस और अदालत को अपनी इस जिम्मेदारी को समझना चाहिए जिसके पूरे न होने से भीड़ कानून अपने हाथ में लेती है। (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)
छत्तीसगढ़ में पिछली कांग्रेस सरकार में मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के एक सबसे करीबी दलाल-कारोबारी तांत्रिक के.के.श्रीवास्तव का मामला अब खुलते चले जा रहा है। केन्द्र और राज्य की कई तरह की एजेंसियों ने श्रीवास्तव के खिलाफ यह पाया है कि इसके बैंक खातों में रिक्शेवालों और जोमैटो जैसे खाना पहुंचाने वाले लोगों के बैंक खातों से जुटाए गए चार सौ करोड़ रूपए दिखाई पड़ रहे हैं। भूपेश सरकार के समय उनका सबसे करीबी निजी तांत्रिक माना जाता के.के.श्रीवास्तव कई जिलों के कलेक्टरों पर इतनी धाक रखता था कि वहां के सभी औद्योगिक ट्रांसपोर्ट के काम वही कंट्रोल करता था। धोखाधड़ी की एक रिपोर्ट के चलते वह गिरफ्तार होने को था कि अचानक फरार हो गया, और अब पुलिस उसे ढूंढते-ढूंढते फरार घोषित कर चुकी है, और उस पर ईनाम भी रखा है। किसी भी राज में सत्ता के ऐसे दलाल सत्ता को बेदखल करके छोड़ते हैं। हर सत्तारूढ़ पार्टी को, और सत्ता पर बैठे लोगों को पिछली सरकारों के कुकर्मों से, और दूसरे राज्यों की बुरी मिसालों से सबक लेना चाहिए। यह सबक सत्ता पर दुबारा आने के हिसाब से भी जरूरी होता है, और जेल जाने से बचने के लिए भी। सच तो यह है कि सत्ता अगर सबक लेती चले, तो यह उसके लिए एक बीमा पॉलिसी की तरह साबित हो सकती है। लेकिन ताकत के ओहदों का मिजाज ही उन पर बैठने वाले लोगों को बददिमाग कर देने का होता है। ऊंची कुर्सियों पर बैठकर भ्रष्टाचार करते, अनाचार करते, जुल्म और ज्यादती करते लोगों को कभी लगता ही नहीं है कि उनका राज कभी खत्म होगा। नतीजा यह है कि प्रदेश की पिछली कांग्रेस सरकार को निजी जागीर की तरह हांकने वाले छोटे-बड़े अफसर जेल में पड़े हैं, सत्तारूढ़ पार्टी के कोषाध्यक्ष फरार हैं, और सत्ता के दलाल देश की किसी अदालत से जमानत नहीं पा रहे हैं। सैकड़ों और हजारों करोड़ की काली कमाई किस काम की अगर लोगों को फरारी काटनी पड़ रही हो, उनकी गिरफ्तारी के लिए पुलिस ने ईनाम रखे हुए हों, और पोस्टर चिपकाए हुए हों। इन मिसालों से इनके बाद की सत्ता को सबक लेना चाहिए, वरना इन बाद वाले लोगों का पढ़ा-लिखा और अनुभवी होना बेकार है।
दुनिया के इतिहास में जब से लोगों को मौत समझ आने लगी तब से ही लोगों में अमर होने की भावना भी पैदा होने लगी। और कभी कबीलों के सरदारों को झांसा देकर कोई बैगा-गुनिया लोगों की बलि देते थे, कभी किसी का खून पिलाते थे, और कभी कोई पूजा-अनुष्ठान करते थे। दुनिया का इतिहास अमर होने की हसरत से भरा हुआ है। अब महज राजा नहीं रह गए जो कि ऐसी हसरत पर खर्च कर सकें, और दुनिया के संपन्न कारोबारी भी इसके लिए अंधाधुंध खर्च कर रहे हैं, और विज्ञान इस पर लगातार शोध कर रहा है, लगातार लोगों की औसत उम्र बढ़ती चली जा रही है, और दुनिया के अतिसंपन्न लोग अपने गुजरने के बाद अपनी लाश को रसायनों में लपेटकर इस तरह संभालकर रखवा रहे हैं कि कभी दुबारा जिंदा करना मुमकिन हो सके, तो उनका शरीर उस तकनीक का फायदा उठाने के लिए तैयार रहे। इसके अलावा तरह-तरह की तकनीकों से बीमारियों को दूर करना, सेहत को बेहतर करना, और बुढ़ापे को दूर धकेलना लगातार जारी है। दुनिया के अतिसंपन्न लोगों के इस्तेमाल के लिए ऐसी चिकित्सा और ऐसी तकनीक प्रयोगशालाओं से निकलकर बाजारों में आ रही है। हालांकि अभी यह बात साफ नहीं है कि अगर किसी तकनीक से सेहत सुधारी जा सकती है, और उम्र अधिक लंबी की जा सकती है तो क्या उससे बुढ़ापे के वे बढ़े हुए बरस अच्छी हालत में होंगे, या फिर वे अपने ही बदन पर बोझ बने हुए होंगे?
इस मुद्दे पर आज चर्चा की जरूरत इसलिए है कि कानपुर में बूढ़ों को जवान बनाने के नाम पर ठगी का एक इतना बड़ा मामला सामने आया है जो कि चिकित्सा विज्ञान का नाम लेकर तो धोखा दे ही रहा था, वह प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का नाम लेकर भी धोखा दे रहा था। ठोक-पीटकर दो लाख रूपए में बनाई गई एक मशीन को इजराइल से आई हुई मशीन बताकर लोगों को धोखा दिया जा रहा था, और इसे 25 करोड़ का बताकर लोगों से 60 दिन के इलाज के लाखों रूपए लिए जा रहे थे, और कहा जा रहा था कि इससे लोगों की उम्र 20-30 साल कम दिखने लगेगी। राजीव और रश्मि दुबे, पति-पत्नी की तरफ से लोगों को यह भी झांसा दिया गया था कि बाद में इस मशीन से इलाज की कतार इतनी लंबी हो जाएगी कि चार बरस तक नंबर नहीं आएगा, और यह देखकर लोगों ने हड़बड़ी में लाखों रूपए जमा किए, और नेटवर्क मार्केटिंग की तरह इसे आगे बढ़ाने पर लोगों को आकर्षक कमीशन भी देने की बात कही। बारह सौ लोगों से 35 करोड़ रूपए ठगकर यह जोड़ा फरार हो गया। और जो लोग इस मशीन में पांच बार बैठकर अपनी उम्र 20-30 बरस कम हो जाने की उम्मीद कर रहे थे, वे लोग अब मोटी रकम गंवाकर कुछ और बूढ़े ही हो गए हैं।
ऐसा लगता है कि हिन्दुस्तान में लोगों की अमर होने की चाह जितनी अधिक है, उतनी ही अधिक उनकी बेसब्री ठगा जाने की भी है। जिनके पास हर महीने जिंदा रहने के बाद कोई रकम बाकी है, वे मानो सूरज की रौशनी में भी टॉर्च या मोमबत्ती लेकर जालसाजों को ढूंढने निकले रहते हैं। वे मोबाइल पर बेसब्री से इंतजार करते रहते हैं कि कब किसी जालसाज का फोन आए, और किस तरह वे उसके खाते में रकम ट्रांसफर करें। किस तरह कब कोई लडक़ी उन्हें फोन करके कपड़े उतारने कहे, और कब वे वीडियो कॉल पर उसकी बात मानकर अपना जीवन धन्य करें। पूरी जिंदगी सीमित कमाई के काम-धंधे देखते हुए लोगों को अचानक अंधाधुंध कमाई पर भरोसा होने लगता है, और वे शेयर बाजार से लेकर क्रिप्टोकरेंसी तक के वॉट्सऐप समूहों पर पैसा झोंकने लगते हैं। यह सिलसिला खत्म होते दिखता ही नहीं है। कुछ तो ऐसे मामले सामने आ रहे हैं जिनमें लोग शादी करवाने के लिए लाखों-करोड़ों देने को उतारू रहते हैं। मेडिकल कॉलेज में दाखिले से लेकर सरकारी नौकरी तक जाने किस-किस काम के नाम पर लोग पैसे लुटाने एक पैर पर खड़े रहते हैं।
अब कानपुर का यह ताजा मामला तो एकदम ही भयानक इसलिए है कि जिनके पास जवानी वापिस पाने की हसरत पर लगाने के लिए लाखों रूपए थे, उनके पास कोई न कोई डॉक्टर जरूर रहे होंगे, और यह तो पक्का है कि उनमें से किसी भी डॉक्टर ने ऐसी सलाह नहीं दी होगी। आकर्षक औरत-मर्द का एक जोड़ा अगर लोगों को ऐसी अविश्वसनीय बात कहकर भी उन्हें इस हद तक ठग सकता है तो इस ठगी की कामयाबी के लिए ठग जितने होशियार थे, उससे अधिक बेवकूफ ठगाने वाले लोग थे। लोग अगर प्रधानमंत्री मोदी का नाम सुनकर यह मान लेते हैं कि मोदी इसी मशीन की वजह से हर दिन इतने घंटे काम कर पाते हैं, तो फिर हिन्दुस्तान में किसी भी पैसेवाले को तो कभी बूढ़ा दिखना ही नहीं था। अमिताभ बच्चन को अब तक अभिषेक बच्चन से अधिक जवान दिखना चाहिए था क्योंकि 25 करोड़ की मशीन तो वे अपने घर पर ही लगवा सकते थे, और तमाम खाली वक्त उसी में बैठे रह सकते थे। लोगों के पास जरूरत से कुछ अधिक पैसा, और हकीकत से कुछ अधिक बड़ी हसरत ने मिलकर ठगों का यह धंधा अच्छा-खासा चलवा दिया।
लोगों को याद होगा कि एक वक्त पैसे पेड़ों पर उगते हैं जैसे नारे लगाते हुए देश में सैकड़ों प्लांटेशन योजनाएं चली थीं, और आखिर में इनमें से हर एक झांसा साबित हुई। आज शेयर मार्केट, क्रिप्टोकरेंसी, सट्टा बाजार का यही हाल है। फिर कानपुर की इस ताजा ठगी में जिस तरह एक चेन-योजना सामने रखी गई थी, कि खुद जवानी खरीदने वाले लोग अगर अपने आसपास के लोगों को भी ऐसी जवानी बेच पाएंगे, तो उनकी आगे की जवानी मुफ्त मिल जाएगी, या उनको मोटी कमाई भी हो जाएगी। जब अपनी नाक कटा चुके लोग ईश्वर दिखाने के नाम पर बाकी लोगों की नाक कटवाने पर उतारू हो जाते हैं, तो फिर उन्हें साक्षात ईश्वर भी आकर नहीं रोक पाते। कानपुर में अच्छे-खासे बुढ़ापे तक पहुंचे हुए लोग अब पुलिस में रिपोर्ट लिखाए बैठे हैं कि जवानी न सही कम से कम उन्हें बुढ़ापे की जमा रकम तो वापिस मिल जाए। और इस किस्म से बेवकूफ बनने वाले लोगों के लिए कोई सरकारी सावधानी अभियान भी कारगर नहीं हो सकता क्योंकि जो अपनी जमापूंजी लुटाने पर आमादा हैं, उनमें से हर किसी के हाथ तो सरकार बांधकर नहीं रख सकती। फिर भी अच्छी बात यही है कि ठगी की यह तरकीब एक साथ पूरे देश में शुरू नहीं हुई, और बहुत लंबी भी नहीं चली। स्थानीय कबाड़ को ठोक-पीटकर जिसे 25 करोड़ की इजराइली मशीन बताया जा रहा था, उस पर लोगों को कुछ जल्दी ही शक हो गया, लेकिन तब तक भी लोगों के 35 करोड़ रूपए तो डूब ही गए। इससे लोगों को सबक लेना चाहिए कि पेड़ों पर रूपए न 30-40 बरस पहले फल पाए, और न अभी फल पाएंगे। रातोंरात करोड़पति बनने जैसी ही हसरत कुछ महीनों में जिंदगी की घड़ी 20-30 साल पहले सेट कर देने के भरोसे जैसी ही रहती है। लोगों को ऐसे झांसों पर अंधविश्वास के बजाय अपनी बड़ी साधारण सी समझबूझ पर भरोसा करना चाहिए। (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)
देश की राजधानी की खबर है कि एक महिला एक मोबाइल ऐप का इस्तेमाल करके अपनी आवाज पुरूष की आवाज में बदल लेती थी, और फिर एक दूसरे मोबाइल ऐप का इस्तेमाल करके अपने फोन से की गई कॉल को किसी और नंबर से आई हुई कॉल दिखा देती थी। नतीजा यह होता था कि फोन पाने वाले लोगों को अपने स्क्रीन पर कोई और नंबर दिखता था। यह दूसरा एप्लीकेशन बरसों से बाजार में है जिसमें फोन लगाने वाले अपनी मर्जी से कोई नंबर डाल सकते हैं, और पाने वालों को कॉल उस डाले गए नंबर से आई हुई दिखेगी। इसके अलावा एआई के इस्तेमाल से अब यह भी हो गया है कि किसी व्यक्ति की आवाज की रिकॉर्डिंग एआई में डालकर उसे कुछ मिनटों में ही प्रशिक्षित किया जा सकता है, और उसके बाद वह एआई उस व्यक्ति की आवाज में ही किसी से फोन पर बात भी करवा सकता है। दुनिया भर में ऐसे हजारों लोगों को हर दिन फोन मिल रहे हैं, जिनमें उनके बच्चों की आवाजों में उन्हें यह सुनने मिलता है कि उनका अपहरण हो गया है। और एआई की मदद से सामने से घरवालों के सवालों के जवाब भी उनके बच्चों की आवाज में मिलने लगते हैं जो कि अपहरणकर्ता बोलते रहते हैं। जिन लोगों के बच्चे टेलीफोन की पहुंच से दूर रहते हैं, उनके मां-बाप को इस तरह झांसा देना, और उगाही करना आसान रहता है। पिछले बरस अमरीकी संसद में एआई के खतरों पर एक कमेटी की सुनवाई में एक महिला ने बताया कि किस तरह अपराधियों ने उसे उसकी बेटी की आवाज में ही बात की, और वह रोती-सुबकती अपनी बेटी की आवाज से हिल गई थी। दुनिया भर में एआई की मदद से जितने तरह के झांसे आज दिए जा रहे हैं, उनसे लगता है कि लोग अब अपने घर के लोगों के नंबरों से आने वाली कॉल पर भी उनकी चीखती-चिल्लाती आवाज सुनकर भी एकदम से भरोसा न करें, क्योंकि वह नंबर भी झूठा गढ़ा जा सकता है, और वह आवाज भी।
यह सिलसिला बढ़ते ही जाना है क्योंकि एआई की मदद से बनने वाले ऐसे एप्लीकेशन हर दिन मुजरिमों के लिए एक नया औजार लेकर आ रहे हैं। आज तो लोग इसी को सबसे बड़ी शिनाख्त मानते हैं कि किस नंबर से फोन आ रहा है। लोग अपने स्क्रीन पर किसी नंबर को देखकर लाखों रूपए भी किसी के हवाले कर देते हैं। लेकिन अब बिल्कुल आम लोगों के हाथ लग चुके ऐसे खतरनाक एआई हथियार जिंदगी को बड़ा मुश्किल बना रहे हैं। देश की राजधानी की जिस घटना से हमने आज की यह बात शुरू की है, उसमें यह जालसाज महिला बड़े-बड़े अफसरों का नाम लेकर धमकाती थी, और अपना काम निकालती थी। अभी तक छोटे पैमाने पर यह जालसाजी इतनी ही होती थी कि लोग अपने प्रोफाइल फोटो की जगह किसी और का प्रोफाइल फोटो लगा लेते थे, और अपने नंबर पर नाम उस फोटो वाले का डाल लेते थे, तो धोखाधड़ी बहुत हद तक कामयाब हो जाती थी। देश के एक बड़े उद्योगपति को धोखा देने के लिए अभी भारत में साइबर-ठगों ने सुप्रीम कोर्ट की एक नकली ऑनलाईन सुनवाई गढ़ दी, और इस बहुत बड़े उद्योगपति को दो दिन डिजिटल अरेस्ट में रखकर उसे सुप्रीम कोर्ट की ‘सुनवाई’ दिखाई कि किस तरह उसकी कंपनी ने नकली पासपोर्ट का काम किया है। इसके बाद इन ठगों ने ‘सुप्रीम कोर्ट’ मुख्य न्यायाधीश बनकर ऑनलाईन यह हुक्म दिया कि यह उद्योगपति न तो अपने मोबाइल का कैमरा बंद करेगा, और न ही किसी को संदेश भेजेगा, या फोन करेगा। उसे सोते समय भी मोबाइल-कैमरा अपने सामने चालू रखने के लिए मजबूर किया गया। इस बड़े कारोबारी ने इन दो दिनों में सात करोड़ रूपए ठगों को ट्रांसफर कर दिए। जब पद्मश्री से सम्मानित हजारों करोड़ के कारोबार के मुखिया को सुप्रीम कोर्ट बनकर ऐसा झांसा दिया गया, तो आम लोगों की क्या बिसात है?
हम बार-बार साइबर-सावधानी के मुद्दे पर लिखते हैं, लेकिन यह भी समझने की जरूरत है कि जनता की जागरूकता की एक सीमा रहती है। हर दिन बाजार में आते ठगी के नए-नए औजारों और हथियारों की खबर हर किसी को नहीं हो सकती। लेकिन किसी देश की सरकार इतनी क्षमता रखती है कि वह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लगातार निगरानी रखकर, और अंतरराष्ट्रीय जांच एजेंसियों से ताजा जानकारी लेकर अपने देश के लोगों को सावधान कर सके, और अपने देश की साइबर ट्रैफिक पर की जा रही निगरानी से यह पता लगा सके कि ठगी के कौन-कौन से एप्लीकेशन और सॉफ्टवेयर कौन इस्तेमाल कर रहे हैं, और किन पर इस्तेमाल कर रहे हैं। लोगों की निजता भंग किए बिना भी सरकार ऐसा कर सकती है। साथ ही जनता से इस बात की इजाजत ली जा सकती है कि उनके नंबरों, और ईमेल एड्रेस या उनके सोशल मीडिया खातों पर सरकार धोखाधड़ी रोकने के लिए निगरानी रख सके। जिन लोगों को अपनी निजता की अधिक परवाह नहीं होगी, वे ऐसी इजाजत भी दे सकते हैं, और सरकार उन्हें धोखा देने की कोशिशों को कुछ अधिक आसानी से रोक सकती है।
ये तमाम कोशिशें इसलिए जरूरी हैं कि लोगों का फोन-इंटरनेट का इस्तेमाल लगातार बढऩा है, और उनके बैंक और दूसरे भुगतान के तरीके फोन-इंटरनेट पर ही रहने हैं, और ऐसे में उनको लूटना, ठगना, ब्लैकमेल करना, यह सब बढ़ते चलेगा। यह रक्तहीन-लूट लुटेरों को अपने घर, या किसी बगीचे में बैठे-बैठे एक फोन पर लाखों-करोड़ों कमा लेने का अनोखा मौका मुहैया करा रही है। हम लगातार देख रहे हैं कि अब रकम लूटने के लिए चाकू-पिस्तौल का इस्तेमाल पुरानी, और घटिया किस्म की तकनीक हो गई है। आधुनिक तकनीक लोगों को ऑनलाईन ठगना, और लूटना है। देश-प्रदेश की सरकारों को अपने नागरिकों को साइबर-हिफाजत दिलवानी चाहिए, वरना देशों को रोज की जिंदगी में साइबर तकनीक को बढ़ावा देने का कोई नैतिक अधिकार नहीं रह जाता। (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)
देश में शायद अब तक की सबसे बड़ी नक्सल-मुठभेड़ में कल बस्तर में सुरक्षाबलों ने 30 से ज्यादा नक्सलियों को मार गिराया। यह मुठभेड़ वहां के नारायणपुर और दंतेवाड़ा जिलों की सीमा पर हुई, और इसी दौरान मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय बीजापुर और दंतेवाड़ा जिलों के दौरे पर ही थे। यह शायद पहला मौका रहा होगा कि इतने करीब मुख्यमंत्री का दौरा चल रहा था, और इतनी बड़ी मुठभेड़ हो रही थी। कल रात तक लाशें बरामद हो रही थीं, और यह छत्तीसगढ़ की अब तक की सबसे बड़ी मुठभेड़ है, और कुछ महीने पहले ही, 16 अप्रैल को बस्तर के ही कांकेर में एक दूसरी मुठभेड़ में 29 नक्सली मारे गए थे। प्रदेश में विष्णुदेव साय सरकार के इन 9-10 महीनों में दो सौ से अधिक नक्सली मारे जा चुके हैं, जो कि अविभाजित मध्यप्रदेश के समय से लेकर अब तक का अभूतपूर्व और असाधारण रिकॉर्ड है। लेकिन इसके साथ-साथ जो दूसरी बड़ी बात इससे भी महत्वपूर्ण है, वह है सुरक्षाबलों को कम से कम नुकसान पहुंचना। पहले नक्सली हमलों में एक साथ दर्जनों सुरक्षा जवान शहीद होते थे। मुठभेड़ में भी राज्य और केन्द्र के सुरक्षाबलों की शहादत होती थी। लेकिन साय सरकार के आने के बाद से बस्तर की ऐसी कोई मुठभेड़ नहीं हुई है जिसमें सुरक्षाबलों को अधिक नुकसान हुआ हो। इसके साथ-साथ एक दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि बेकसूर लोगों को नक्सली बताकर मार डालने की जो तोहमत सुरक्षाबलों पर हमेशा लगती है, वह भी अब नहीं के बराबर हो गई है, और यह दर्ज करने लायक बात है कि ऐसी मुठभेड़ में आसपास के ग्रामीणों की मौतें भी बहुत ही कम हुई हैं। हम इस नौबत को केन्द्रीय गृहमंत्री अमित शाह की इस घोषणा से जोडक़र नहीं देखते कि मार्च 2026 तक देश से नक्सलवाद खत्म हो जाएगा। उनके कहने के पहले से राज्य में भाजपा सरकार के तहत पुलिस और सुरक्षाबल लगातार लगे हुए थे, और सरकार बनते ही जल्द ही नक्सल मोर्चों पर कामयाबी मिलने लगी थी।
बस्तर में पुलिस वही है, केन्द्रीय सुरक्षाबल भी वे ही हैं, उनकी गिनती में भी बहुत बड़ा इजाफा नहीं हुआ है, लेकिन ऐसा लगता है कि बस्तर के भीतर के इलाकों में जिस तरह सुरक्षाबलों के कैम्प आगे बढ़ते जा रहे हैं, और जिस तरह सरकार की नक्सल-समर्पण नीति के तहत बड़ी संख्या में नक्सली या नक्सल-समर्थक आत्मसमर्पण कर रहे हैं, उससे नक्सलियों की पकड़ उनके परंपरागत इलाकों पर से कमजोर हो रही है। जो इलाके पूरी तरह नक्सल कब्जे में थे, वहां भी सुरक्षाबल पहुंच रहे हैं, और उनके पीछे-पीछे सरकार की कुछ योजनाएं भी जा रही हैं। अविभाजित मध्यप्रदेश के समय दशकों तक शोषण, भ्रष्टाचार, और जुल्म का शिकार रहा बस्तर सरकार पर से इतने लंबे समय तक भरोसा खोया हुआ था कि वहां नक्सलियों को जगह मिली थी, और सरकारी तंत्र की विश्वसनीयता खत्म सरीखी थी। आज की वहां की सुरक्षाबलों की कामयाबी लंबे वक्त की मेहनत, और सरकारी बंदूकों की असाधारण बड़ी मौजूदगी दोनों की वजह से है। साथ-साथ यह भी हुआ है कि सरकार ने अपनी योजनाओं को नक्सलियों के हटने के बाद पैदा एक शून्य ने तेजी से आगे बढ़ाया है। ऐसा लगता है कि ग्रामीण आदिवासियों को कहीं मुखबिर बताकर, तो उन पर कोई और तोहमत लगाकर नक्सली उन्हें जनसुनवाई के नाम पर इंसाफ का आडंबर दिखाते हुए मार डालते आए हैं, उससे भी धीरे-धीरे जनता में नक्सलियों के लिए हमदर्दी खत्म हुई है। इस इलाके में नक्सल मौजूदगी और उनकी हिंसा से ऐसी खतरनाक नौबत बनी हुई थी कि वह न तो सिर्फ जनकल्याणकारी योजनाओं से सुलझनी थी, और न ही सिर्फ सरकारी बंदूकों से। इन दोनों का मिलाजुला इस्तेमाल, और नक्सलियों के आत्मसमर्पण को बढ़ावा देने से ऐसी मुठभेड़ की सुरक्षाबलों की योजना कामयाब हो पाई है।
राज्य में पिछली सरकार कांग्रेस के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल की थी, और अपने मंत्रिमंडल में बेताज बादशाह की तरह वे पूरा पुलिस महकमा भी अघोषित रूप से संभालते ही थे। आज बस्तर में कोई भी बड़े अफसर बदले नहीं हैं, और वे कांग्रेस सरकार के समय से अब तक बने हुए हैं। ऐसे में पांच बरस में कांग्रेस को जो कामयाबी नहीं मिली थी, वह अगर इन 9-10 महीनों में मिली है, तो उसके पीछे राज्य सरकार की राजनीतिक इच्छाशक्ति एक बड़ी वजह लगती है। फिर यह बात भी ध्यान रखना जरूरी है कि इस भाजपा सरकार के कार्यकाल में नक्सल मौतें दो सौ के करीब पहुंचने को हैं, लेकिन मानवाधिकार हनन की शिकायतें भी पांच-दस से अधिक मौतों को लेकर नहीं हैं। एक तरफ सुरक्षाबलों की अपनी हिफाजत, और दूसरी तरफ बेकसूरों को मार डालने की शिकायतें इतनी कम, यह छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद से कभी नहीं हो पाया था। भाजपा के पिछले मुख्यमंत्री डॉ.रमन सिंह के कार्यकाल में तो मानवाधिकार हनन की घटनाओं का सैलाब सा था। और उसकी कम से कम एक बहुत बड़ी वारदात में सुरक्षाबलों द्वारा की गई कोई डेढ़ दर्जन हत्याओं की रिपोर्ट आने पर भी पिछले मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने कोई कार्रवाई नहीं की थी।
आज की भाजपा सरकार कम अनुभवी है। मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय, और उनके दोनों उपमुख्यमंत्री जिनमें गृहमंत्री विजय शर्मा शामिल हैं, ये सभी पहली बार राज्य सरकार में हैं। विजय शर्मा ने सरकार में विचार-विमर्श के पहले ही खुद होकर नक्सलियों से शांतिवार्ता की पेशकश की थी, और उस बात को दर्जन भर बार दुहराया भी था, लेकिन बातचीत का वह सिलसिला कहीं से शुरू ही नहीं हो पाया। इसी दौरान मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने कुछ हफ्ते पहले राज्य के एसपी-आईजी की एक बड़ी बैठक ली थी, और उसमें भी नक्सल-मोर्चे को लेकर अमित शाह की तय की गई समय सीमा पर चर्चा हुई थी। गृहमंत्री कोई भी रहें, जिलों के कलेक्टर-एसपी मुख्यमंत्री के प्रति सीधे जवाबदेह भी रहते हैं, और ऐसा लगता है कि बस्तर में अधिकारियों को जुल्म ढहाए बिना कार्रवाई करने की जो छूट दी गई है, उससे यह कामयाबी हासिल हुई है। मुख्यमंत्री ने बार-बार यह भी कहा है कि उन्हें नक्सलियों का भी खून बहना ठीक नहीं लगता है, और उन्हें हिंसा छोडक़र लोकतंत्र की मूलधारा में आना चाहिए। लेकिन अभी तक कोई विश्वसनीय मध्यस्थ न होने से शांतिवार्ता की पहल भी शुरू नहीं हो पाई है।
लोकतंत्र में किसी भी तरह की विचारधारा को हथियारबंद आंदोलन की छूट नहीं मिल सकती है। हमने भारत के पड़ोस में नेपाल में माओवादियों को हथियार छोडक़र संसदीय चुनाव में शामिल होते देखा है। अभी-अभी श्रीलंका में एक माक्र्सवादी-माओवादी नेता राष्ट्रपति चुने गए हैं। दुनिया के कुछ और देशों में भी वामपंथी नेता या उनकी पार्टियां जीतकर सत्ता पर पहुंचे हैं। ऐसे में अब वक्त आ गया है कि भारत में भी नक्सली इस अंतहीन सशस्त्र संघर्ष को खत्म करें, कोई भरोसेमंद मध्यस्थ ढूंढकर सरकार से जनकल्याण के मुद्दों पर बात करें, और सीधे-सरल आदिवासियों पर बंदूकों की लड़ाई का संघर्ष न थोपें। छत्तीसगढ़ की साय सरकार ने नक्सलियों को खत्म करने के मोर्चे पर बहुत बड़ी कामयाबी हासिल की है। लेकिन जब नक्सली इस हद तक घिर गए हैं, और कमजोर हैं, तो यह एक बड़ा माकूल वक्त है कि उन्हें बातचीत के लिए तैयार किया जा सके। जब कोई हथियारबंद आंदोलन कमजोर होते चलता है, तो वह किसी समझौते या शांतिवार्ता के लिए तैयार भी होता है। फिलहाल जान की बाजी लगाकर, तमाम किस्म के खतरे उठाकर बस्तर के मोर्चे पर राज्य की पुलिस और केन्द्रीय सुरक्षाबलों के जो लोग तैनात हैं, कल की कामयाबी उनके नाम है क्योंकि उन्होंने लोकतंत्र को बचाने के लिए रात-दिन काम करके नक्सलियों को खत्म किया है। नक्सलियों का भी खून बहे बिना अगर उन्हें लोकतंत्र की मूलधारा में लाया जा सकता है, तो यह राज्य सरकार की एक अधिक बड़ी कामयाबी होगी, और सुरक्षाबलों पर हर दिन होने वाला करोड़ों का खर्च भी बचेगा।
कल छत्तीसगढ़ में हुए एक हरित शिखर सम्मेलन में मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने जलवायु परिवर्तन को दुनिया की सबसे बड़ी चुनौती बताया। उन्होंने छत्तीसगढ़ की इस खूबी को भी गिनाया कि प्रदेश का 44 फीसदी हिस्सा जंगल या पेड़ों से घिरा हुआ है, और इस बरस राज्य सरकार ने प्रदेश में चार करोड़ वृक्ष लगाए हैं। उन्होंने जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए छत्तीसगढ़ में की जा रही और कोशिशों का भी जिक्र किया। उनकी इस बात पर सोचते हुए यह सूझता है कि छत्तीसगढ़ जैसे किसी भी राज्य को जलवायु परिवर्तन की रफ्तार कम करने के लिए क्या-क्या करना चाहिए। यह राज्य तो आदिवासियों और गरीब जनता से भरा हुआ है, इसलिए यहां पर्यावरण को नुकसान पहुंचाना बड़ा सीमित रहता है। जिसके पास खर्च करने को अधिक न हो, वे धरती पर अधिक बोझ भी नहीं बनते। और छत्तीसगढ़ जैसा राज्य जंगलों के बीच बसाहट की वजह से भी, गरीबी की वजह से भी, और गैरशहरी आबादी भी काफी होने से पर्यावरण को नुकसान कम पहुंचाता है। दूसरी तरफ इस राज्य में पर्यावरण को जितने किस्म के खतरे हैं, उनमें से अधिकतर ऐसे खनिज और खनिज आधारित उद्योगों की वजह से हैं जो कि राज्य के बाहर भी पूरे देश के काम आते हैं। लोहा, कोयला, और इससे चलने वाले कारखाने, इनकी वजह से पर्यावरण को सबसे बड़ा नुकसान है, लेकिन इनकी खपत स्थानीय कम है, और देश के दूसरे हिस्सों के लिए ज्यादा है।
लेकिन जब पर्यावरण की चर्चा होती है तो एक-एक बूंद पानी को बचाना भी पर्यावरण को बचाना होता है, और इस नाते हमको लगता है कि हर राज्य को यह सोचना चाहिए कि वह बचत किन-किन चीजों की कर सकते हैं। अब जैसे भारत में केन्द्र और राज्य सरकारों के जितने मंत्री, अफसर, और संवैधानिक पदों पर बैठे हुए दूसरे ऐसे लोग जिन्हें जनता के पैसों पर सहूलियत मिलती है, उन पर जनता का खूब सारा खर्च होता है। बिजली, पानी, तनख्वाह, और रखरखाव का खर्च जाता तो जनता की जेब से है, लेकिन यह पर्यावरण पर भी भारी पड़ता है। सरकारी बंगलों और दफ्तरों में अंधाधुंध बड़े-बड़े निर्माण होते हैं, और फिर उसके हर हिस्से को एयरकंडीशंड करके सुख जुटाया जाता है। बहुत बड़े-बड़े लॉन बनते हैं, और फिर उनकी घास को हरा-भरा रखने के लिए अंधाधुंध पानी डाला जाता है। बड़े नेताओं, अफसरों, और बड़े जजों की गाडिय़ों के साथ तरह-तरह की दूसरी गाडिय़ां भी चलती हैं, उनसे ट्रैफिक पर दबाव पड़ता है, और साथ-साथ हर गाड़ी का ईंधन भी खर्च होता है। और अब तो केन्द्र सरकार और सुप्रीम कोर्ट ने अलग-अलग फैसलों से हर प्रदेशों में ऊंचे-ऊंचे ओहदों को दर्जनों तक पहुंचा दिया है, और इनमें से हर किसी को बंगलों की, कर्मचारियों की, और अंधाधुंध बिजली की सहूलियत जनता के पैसों से मिलती है। रिटायर होने वाले अफसर, और जज अब शायद कभी बेरोजगार नहीं रहेंगे, और उनके पुनर्वास के लिए इतने सारे ओहदे बन गए हैं कि वे जनता के हक की हिफाजत के नाम पर बने हैं, लेकिन वे जनता पर परजीवियों की तरह बोझ बन जा रहे हैं।
हमारा मानना है कि किसी भी राज्य को ऐसी बंगला संस्कृति से आजादी पानी चाहिए जो कि जनता के पैसों पर चलती है। इससे बेहतर यह है कि सरकारी और संवैधानिक ओहदों पर बैठे हुए लोगों को एक ऐसा मकान-भाड़ा मिले जिससे वे अपने खुद के घर में, या किराए के घर में रह सकें, और रखरखाव के एक भत्ते से काम चला सकें। यह बात हम सिर्फ सरकारी खजाने के खर्च को घटाने के लिए नहीं कह रहे, यह बात हम पर्यावरण पर बोझ घटाने के लिए भी कह रहे हैं। जब सब कुछ मुफ्त का मिलता है तो उसका इस्तेमाल भी बड़ी बेरहमी से होता है। कांग्रेस के लोगों के सामने गांधी का जीवन सादगी की एक मिसाल है, दूसरी तरफ भाजपा अपने पितृपुरूष दीनदयाल उपाध्याय की सादगी की चर्चा करती है। देश गरीब बना हुआ है, और जनता की जरूरतें किसी भी कोने से पूरी नहीं हो रही हैं। ऐसे में इन दोनों पार्टियों के नेताओं को सत्ता में आने पर भी सादगी पर बने रहना चाहिए, और जलवायु परिवर्तन में रोकथाम के लिए सादगी की मिसाल इसी स्तर से शुरू होगी, तभी वह नीचे तक असर कर सकेगी। आज जब मंत्री और बड़े अफसर बहुत बड़े-बड़े गैरजरूरी हॉल सरीखे दफ्तर के कमरे बना लेते हैं, और उन्हें खूब बिजली खर्च करके खूब ठंडा करके रखते हैं, तो फिर उनके नीचे के तमाम लोग भी इसी जीवनशैली और कार्य-संस्कृति पर अमल करते हैं। छत्तीसगढ़ के पहले वित्तमंत्री रामचन्द्र सिंहदेव राजघराने के होने के बावजूद जिस सादगी और किफायत से रहते थे, वह देखते ही बनती थी। इसी वजह से जोगी सरकार में वित्तमंत्री की हैसियत से वे सब पर सादगी लाद भी सकते थे। सरकारों को किफायत पर अमल इसलिए भी करना चाहिए कि उनकी अपनी कोई जेब नहीं होती है, और वे जनता के पैसों पर ही सुख-सुविधा जुटाती हैं।
पर्यावरण को बचाना, और किफायत बरतना, ये दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू हैं, और सत्ता की ऊंची कुर्सियों पर बैठे लोगों को अपने जीवन को मिसाल की तरह औरों के सामने पेश करना चाहिए। अपने पर एक पैसा भी खर्च करने के पहले उन्हें यह सोचना चाहिए कि क्या इतनी सहूलियत राज्य की बाकी जनता को भी हासिल है जो कि रियायती या बिना भुगतान के अनाज पर किसी तरह जिंदा है। (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)
फिलीस्तीनियों पर दशकों से चले आ रहे इजराइली फौजी जुल्म साल भर पहले इसी हफ्ते इजराइल पर फिलीस्तीनी हथियारबंद हमले की शक्ल में सामने आए, जिसमें हजार से कुछ अधिक नागरिकों को मार डाला गया, और सौ दो सौ इजराइलियों का अपहरण करके उन्हें फिलीस्तीनी ले जाया गया। इसके जवाब में इजराइल के फौजी हमलों ने फिलीस्तीन के गाजा शहर के मलबे में तब्दील कर दिया है, और 40 हजार से अधिक फिलीस्तीनियों को मार डाला है। जिन्हें इतिहास की न समझ है, और न उसमें दिलचस्पी है, वे इस मौजूदा टकराव को साल भर पहले शुरू हुआ मान रहे हैं, दूसरी तरफ इतिहास के जानकार लोग इसे पौन सदी पुराना इजराइली जुल्म जानते हैं जो कि फिलीस्तीनियों की जमीन पर अवैध कब्जे से शुरू हुआ, और अब फिलीस्तीन को दुनिया की सबसे बड़ी खुली जेल बनाकर इजराइली फौज उसे चारों तरफ से बंद करके बैठी है। आज फिलीस्तीनियों के हक की लड़ाई में भारत जैसा उसका परंपरागत दोस्त रहा देश दूर चले गया है, और उसकी सारी भागीदारी इजराइल से कारोबारी लेन-देन की वजह से इजराइल तक सीमित रह गई है। हालत यह है कि पिछले एक बरस में जब इजराइल को मजदूरों की भयानक कमी पड़ी, तो भारत सरकार ने देश के कुछ प्रदेशों में अभियान चलाकर इजराइल के लिए भारतीय कामगार जुटाए, और उन्हें जंग के दौर से गुजरते हुए देश में भेजा, जबकि आमतौर पर लड़ाई के खतरे से घिरे हुए देश से अपने नागरिकों को निकाला जाता है। यह तो खाड़ी के कुछ मुस्लिम देशों से, और ईरान से भारत का कई किस्म का मतलब जुड़ा हुआ है, इसलिए हिन्दुस्तान खुलकर इजराइल के साथ खड़ा हुआ नहीं है, लेकिन वह फिलीस्तीन को दवाईयां और राहत सामग्री भेजने से परे किसी भी तरह से फिलीस्तीन के हक के साथ नहीं है।
फिलीस्तीन के बगल में लेबनान में मौजूद फिलीस्तीन के हिमायती, और ईरान से फौजी मदद पाने वाले एक मुस्लिम हथियारबंद संगठन हिजबुल्ला के साथ इजराइल का एक नया मोर्चा खुल गया है, और हिजबुल्ला पर हमले के लिए इजराइल ने लेबनान पर फौजी चढ़ाई कर दी है। फिर ईरान और इजराइल के बीच अभी प्रतीकात्मक हमले हो रहे हैं, लेकिन एक खतरा यह दिख रहा है कि क्या यह मध्य-पूर्व में एक व्यापक जंग में तब्दील हो सकता है? पहले भी इस इलाके में हुए अलग-अलग जंग में आसपास के आधा दर्जन से अधिक देश काफी बर्बादी झेल चुके हैं, और इस बार एक खतरा यह दिखता है कि ईरान परमाणु हथियार बनाने के करीब पहुंचा हुआ देश है, और ऐसी आशंका से इजराइल उसके परमाणु ठिकानों को खत्म करने पर लंबे समय से आमादा है, और अगर ईरान पर इतना बड़ा इजराइली हमला होता है, तो आसपास के देश किसी न किसी तरफ से इसमें शामिल हो सकते हैं। अब दुनिया में सवाल यह उठ रहा है कि इजराइल की फौजी गुंडागर्दी के पीछे कौन जिम्मेदार है?
अमरीका को दूसरे देशों पर फौजी हमले करने की पुरानी लत लगी हुई है। उसने एक-एक करके दुनिया के कितने ही देशों पर फौजी हमले किए, वहां की सरकारें बदलीं, इराक जैसे देश पर उसने सीआईए के गढ़े हुए झूठे सुबूतों का हवाला देते हुए हमला किया था कि वहां पर जनसंहार के हथियार मौजूद हैं जिनमें रासायनिक हथियार भी शामिल हैं, लेकिन पूरे देश पर कब्जा कर लेने के बाद अमरीका को वहां एक धेले जितना सुबूत भी नहीं मिला, और बाद में अमरीकी पत्रकारों ने ही यह भांडाफोड़ किया कि राष्ट्रपति बुश ने सुबूतों का झूठा हवाला देते हुए यह हमला किया था। ऐसा अमरीका इजराइल की पीठ पर हाथ रखकर, उसे फौजी ताकत से लैस करके, मध्य-पूर्व में अपना मवाली बनाकर तबाही फैला रहा है। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में कुल पांच देशों के पास किसी भी प्रस्ताव और फैसले को वीटो करने का अधिकार है, और अमरीका में शायद अपने इतिहास के 89 वीटो में से 47 बार के वीटो का इस्तेमाल महज इजराइल की गुंडागर्दी, और उसके जुर्म को बचाने के लिए किया है। दुनिया के अधिकतर देश मिलकर भी संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में इजराइल का कुछ नहीं बिगाड़ सके क्योंकि अमरीका उसे अपनी गोद में बिठाकर रखता है। आज भी अमरीका एक तरफ फिलीस्तीनियों के लिए राहत भेजने का नाटक कर रहा है, और दूसरी तरफ वह इजराइल को लगातार बम भेज रहा है जिन्हें बेकसूर फिलीस्तीनियों पर थोक में बरसाया जा रहा है। बमों की यह सप्लाई गाजा में अब तक 41 हजार से अधिक लोगों को मार चुकी है जिनमें 18 हजार से अधिक तो महिलाएं और बच्चे हैं।
अमरीका सीरिया से लेकर अफगानिस्तान, और इराक तक अपनी सीधी फौजी दखल रख रहा है, और इन देशों में वह जितने लोगों को चाहे, उतने लोगों को मार रहा है, सरकारें पलट रहा है, वहां अपने पिट्ठू बिठा रहा है। ऐसे में फिलीस्तीन उसकी आंखों की किरकिरी बना हुआ है जो कि अपनी जमीन पर अमरीका के लठैत-गुंडे इजराइल को कब्जा करने के खिलाफ अब तक अड़ा हुआ है। आज मध्य-पूर्व और बाकी जगहों के मुस्लिम देश भी फिलीस्तीनियों का साथ देने के लिए नहीं खड़े हैं, क्योंकि अधिकतर पर अमरीका का किसी न किसी किस्म का दबदबा रहता है। और बहुत से मुस्लिम देश तो अमरीका की जेब में हैं, जो कि दिखावे के लिए भी फिलीस्तीनी जनाजों और कब्र के बगल से बिना रूके निकल जाते हैं। इसलिए जैसा कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने अमरीकी वीटो बताता है, अमरीका इजराइल की शक्ल में अपने भाड़े के हत्यारे को हथियार देकर उसे मध्य-पूर्व को काबू में करने के लिए इस्तेमाल कर रहा है। अपने शूटर का घर बसाने के लिए अमरीका को बेकसूर फिलीस्तीनियों को उनके अपने घरों से बेदखल करने में कुछ भी दुविधा नहीं हो रही, और इजराइल की हत्यारी साजिशों को बचाने के लिए अमरीका कहीं वीटो लेकर खड़ा है, तो कहीं अपने सांभा और कालिया की तरह के ब्रिटेन जैसे कुछ देशों का साथ भी जुटा लेता है। इस तरह आज इजराइल दुनिया के सबसे बड़े गुंडे, और माफिया सरदार का चहेता कातिल बना हुआ है, और मुस्लिम देशों के बीच का तथाकथित भाईचारा भी किसी को इजराइल के खिलाफ खड़े नहीं होने दे रहा। आज मध्य-पूर्व में जो नौबत आई है, उसके लिए अमरीका और इजराइल की यह गिरोहबंदी ही जिम्मेदार है, जो कि लाखों बेकसूरों को मारकर भी तेल के कुओं वाले इस इलाके पर कब्जा और एकाधिकार चाहती है। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के वीटो के प्रावधान को एक बार फिर तौलना चाहिए कि आज इससे अधिक अलोकतांत्रिक, और दुनिया के लिए घातक और कोई बात रह गई है क्या?
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अभी दिल्ली के एक पांच सितारा होटल में एक सम्मेलन में भाषण देने आए आईआईटी मुम्बई के एक प्रोफेसर की एक तस्वीर चारों तरफ फैल रही है। बड़े ऑलीशान होटल में बैठे वे लैपटॉप पर काम कर रहे हैं, और उनके मोजे बुरी तरह फटे हुए दिख रहे हैं। इस तस्वीर पर प्रो.चेतन सिंह सोलंकी की प्रतिक्रिया सामने आई है, उन्होंने कहा है-हाँ, मेरे मोजे फट गए हैं, उन्हें बदलने की जरूरत है, मैं ऐसा कर सकता हूं लेकिन प्रकृति ऐसा नहीं कर सकती, प्रकृति में सब कुछ सीमित है, प्रकृति अधिक बर्बादी बर्दाश्त नहीं कर सकती। उन्होंने आगे लिखा है- मैं जो भी खरीदता हूं उसका पूरा-पूरा इस्तेमाल करता हूं। अपनी प्रोडक्टिविटी बढ़ाने के लिए सबसे अच्छे गैजेट का उपयोग कर सकता हूं, लेकिन धरती पर कार्बन प्रदूषण कम से कम करने के लिए कम से कम चीजों का इस्तेमाल करता हूं। उन्होंने लिखा कि मोजे तो दूसरे आ सकते हैं मगर प्रकृति सीमित है। प्रो.सोलंकी को भारत के सोलर मैन या सोलर गांधी के रूप में जाना जाता है, और वे लगातार ऊर्जा और पर्यावरण बचाने की कोशिश में लगे दिखते हैं। वे आईआईटी मुम्बई में दो दशकों से पढ़ा रहे हैं, और सोशल मीडिया सहित दूसरी जगहों पर वे सामानों की कम खपत की वकालत करते हैं।
हमारे नियमित पाठकों को याद होगा कि हम भी लगातार खपत घटाने की वकालत करते रहते हैं। कई बार हम इसी कॉलम में लिखते हैं कि लोगों को अपने पास गैरजरूरी बच गए सामानों को उन लोगों के बीच बांट देना चाहिए जिन्हें उनकी जरूरत हो। अभी कुछ हफ्ते पहले ही इसी जगह हमने लिखा था कि लोगों को अपने उत्साही परिचितों के छोटे-छोटे समूह बनाकर और लोगों से संपर्क करके उनके पास के जरूरत खो चुके सामानों को जुटाना चाहिए, और उन्हें सबसे अधिक जरूरतमंद लोगों तक पहुंचाने का एक संगठन बनाना चाहिए। इससे धरती पर अधिक चीजों का बनना रूकेगा, और चीजों के निर्माण में पैदा होने वाला कार्बन भी बढऩा थमेगा। दिलचस्प बात यह है कि आज आईआईटी के एक प्रोफेसर अपनी खुद की मिसाल से बिना कुछ कहे हुए जिस तरह एक सोच को बढ़ा रहे हैं, उस सोच को तो एक सदी के भी पहले से गांधी बढ़ाते आए ही हैं। सादगी और किफायत, गांधी के बुनियादी उसूल थे, और उन्होंने अपनी खुद की जिंदगी को इसकी सबसे बड़ी मिसाल बनाकर रखा हुआ था। उन्होंने लोगों के सामने मिसाल पेश करने के लिए यह काम नहीं किया था, उनके लिए यह जीने का एक तरीका ही था, और शायद यही एक तरीका उनके लिए था। गांधी शायद अपनी आखिरी की आधी जिंदगी और किसी भी तरह से नहीं गुजार सकते थे, बजाय अंतहीन सादगी के।
हमने बीच-बीच में यह कोशिश भी की कि कोई मशहूर और लोकप्रिय खिलाड़ी या कलाकार इस बात के लिए तैयार हों कि वे एक-एक बच चुके दो अलग-अलग किस्म के मोजों को पहनना शुरू करें, तो उससे जो फैशन चलेगी, उससे लोगों के पास के इस तरह के कई सामान इस्तेमाल होने लगेंगे। धरती पर जींस और टी-शर्ट जैसे कपड़े पर्यावरण को बचाने में बहुत मददगार हैं क्योंकि टी-शर्ट को धोना आसान भी है, और जींस को रोज धोना भी नहीं पड़ता है। इन्हें इस्त्री भी नहीं करवाना पड़ता। ये घिस-घिसकर, रंग खोकर, और कहीं-कहीं से फटकर भी फैशन में बने रहने वाले कपड़े हैं, और बरस-दर-बरस इनका कुछ नहीं बिगड़ता। फेसबुक की कंपनी मेटा के मालिक मार्क जुकरबर्ग तकरीबन तमाम वक्त एक ही तरह की जींस, और एक ही रंग के टी-शर्ट पहने हुए दिखते हैं, और बड़े सीमित कपड़ों में काम चल जाता है। दुनिया का एक सबसे बड़ा कारोबारी इस तरह रहता है, और गरीबों के जनकल्याण के एक सबसे बड़े अर्थशास्त्री, भारत में बसे हुए यूरोपीय मूल के ज्यॉं द्रेज को भी बहुत साधारण सी जींस और बड़ी कम लंबाई के सूती कुर्ते में देखा जा सकता है, और वे बस एक जोड़ी अतिरिक्त कपड़ा लेकर सफर कर लेते हैं, कहीं सार्वजनिक नल पर भी नहा लेते हैं, और सडक़ किनारे बैठकर खा लेते हैं। होनहार वे इतने हैं कि नोबल पुरस्कार विजेता अर्थशास्त्री अमत्र्य सेन ने ज्यॉं द्रेज के साथ मिलकर आधा दर्जन से अधिक किताबें लिखी हैं, और वे लिखने का सारा श्रेय ज्यॉं को ही देते हैं। प्रो.सोलंकी और ज्यॉं द्रेज दोनों ही विश्वविद्यालयों में पढ़ाने वाले लोग हैं, और सादगी से रहते हैं।
हमारे पाठकों को याद होगा कि अभी कुछ हफ्ते पहले ही हमने या तो इसी जगह एडिटोरियल में, या हमारे अखबार के यूट्यूब चैनल, इंडिया-आजकल, के वीडिटोरियल में स्टारबक्स नाम की एक महंगी खानपान की चेन के बहिष्कार की बात कही थी। अभी इस अमरीकी कंपनी ने अपना नया मुखिया नियुक्त किया है जो अमरीका के कैलिफोर्निया में रहता है। कंपनी का मुख्यालय टेक्सास में है, और कंपनी की नीति के हिसाब से हफ्ते में कम से कम तीन दिन ऑफिस आकर काम करना जरूरी है। कंपनी ने अपने इस नए मुखिया से हुए अनुबंध में उसे घर से दफ्तर आने-जाने के लिए कंपनी का जेट विमान दिया है, और हर दिन 16 सौ किलोमीटर का सफर करके यह व्यक्ति ऑफिस पहुंचेगा, और फिर इतने ही सफर से घर लौटेगा। दुनिया में पर्यावरण की फिक्र करने वाले लोगों ने इस हत्यारे दर्जे की बर्बादी का विरोध किया है, और हमने भी कहा है कि हम इस ब्रांड का बहिष्कार करेंगे। यह एक अलग बात है कि वैसे भी इतनी महंगी जगह पर अपनी जेब के खर्च से जाना हमारे लिए आसान नहीं था।
दुनिया में सबसे अधिक चर्चित, अमरीकी राष्ट्रपति चुनाव में डोनल्ड ट्रंप, या कमला हैरिस के राष्ट्रपति बनने से पर्यावरण पर क्या फर्क पड़ेगा, इस पर भी अभी चर्चा चल रही है। इन दोनों की पर्यावरण नीतियां एकदम अलग-अलग हैं, और डोनल्ड ट्रंप की बददिमाग कारोबारी अक्ल का हाल यह है कि वह पर्यावरण बचाने की तमाम कोशिशों को ग्रीन-फ्रॉड कहता है। दूसरी तरफ मौजूदा अमरीकी राष्ट्रपति जो बाइडन और उनकी उपराष्ट्रपति कमला हैरिस ने पिछले करीब चार बरस में लगातार पर्यावरण बचाने, और जलवायु परिवर्तन को धीमा करने की कोशिशें की हैं। कल ही एक पॉडकास्ट की चर्चा में एक विशेषज्ञ ने यह बात गिनाई कि एक औसत अमरीकी की साल भर की सामानों की औसत खपत, चीनी के मुकाबले दो गुना है, और हिन्दुस्तानी के मुकाबले आठ गुना है। अब अमरीकियों से बहुत कम खपत वाले हिन्दुस्तानियों में भी सामानों की खपत और बर्बादी संपन्नता के अनुपात में साथ-साथ बढ़ती चलती हैं। लोग एक वक्त खदान मजदूरों के लिए बनाई गई जींस का इस्तेमाल तो करते हैं, लेकिन उसे भी भारी बर्बादी से बनने वाली बिजली की इस्त्री से ऐसा प्रेस करके पहनते हैं जिसका कुछ मिनट बाद ही पता नहीं चलता।
इसलिए चाहे प्रो.सोलंकी से हो, चाहे ज्यॉं द्रेज जैसे लोगों से हो, कहीं न कहीं सादगी और किफायत पर चर्चा जारी रहनी चाहिए। इस बात को शुरू करते समय हमको याद भी नहीं था कि आज 2 अक्टूबर, गांधी जयंती है। और गांधी जयंती के दिन सादगी और किफायत से अधिक आज और किस मुद्दे पर चर्चा की जरूरत है? कहने के लिए तो भारत के कुछ धर्मों में भी लोगों को गैरजरूरी संग्रह के खिलाफ नसीहत दी गई है, कुछ धर्मों में दान की महिमा गिनाई गई है, लेकिन लोगों से अपने सामानों का मोह छूटता नहीं है, और गैरजरूरी खरीददारी की हसरत बाजार के हमलावर इश्तहारों की मेहरबानी से लगातार बनी रहती है, बढ़ती चली जाती है। लोगों के इलेक्ट्रॉनिक सामान अपनी जिंदगी जी नहीं पाते हैं, और नए मॉडल्स आ जाने से लोग सबसे नया सामान अपने पास रहने की चाह से नई खरीदी करते रहते हैं। आईआईटी जैसे विश्वविख्यात संस्थान की तनख्वाह में नया मोजा खरीदना कोई बड़ी बात नहीं होगी, लेकिन खरीदने की ताकत रहते हुए फटी जुराबों से काम चलाना बड़ी बात है। यह एक अलग बात है कि आज की भौतिकतावादी दुनिया में बड़प्पन की पहचान कोई रखना भी नहीं चाहते।
उत्तरप्रदेश की राजधानी लखनऊ से एक दिल दहलाने वाली खबर आई है कि मोबाइल फोन पाने के लिए तीन नौजवानों ने ऑनलाईन ऑर्डर किया, और कैश ऑन डिलीवरी से पहुंचे मोबाइल को मुफ्त में पाने के लिए कुरियर कंपनी के डिलीवरी मैन को मार डाला, उसकी लाश उसी के सामानों के बैग में भरकर एक नहर में फेंक दी गई। उसके सामानों से दो मोबाइल मिले, और कुछ नगद रकम भी। मारने वाले दो लोग पकड़ा गए हैं, और एक की तलाश जारी है। यह मामला भयानक इसलिए है कि आज इस्तेमाल हो रहे या सील पैक मोबाइल को भी उनके हैंडसेट सीरियल नंबरों से तलाशा जा सकता है। इसके बाद भी मोबाइल लूटने और उसके लिए कत्ल करने का खतरा इन तीन नौजवानों को समझ नहीं आया। अब जेल के भीतर उम्र गुजारते हुए मोबाइल किसी काम का भी नहीं रहेगा। एक बड़े शहर में रहने वाले नौजवान जो कि ऑनलाईन खरीदी जानते हैं, वे न तो मारे गए नौजवान के मोबाइल फोन से अपने पकड़े जाने का खतरा समझ पाए, न ही लूटे गए मोबाइल फोन के संभावित उपयोग का खतरा उन्हें दिखा। यह तो लखनऊ पुलिस ने बात की बात में डिलीवरी मैन के फोन की आखिरी लोकेशन, उससे किए गए आखिरी कॉल, और इस टेलीफोन नंबर की आखिरी लोकेशन को देखकर ही लाश तलाश ली थी। टेक्नॉलॉजी की मेहरबानी से अब सब कुछ इतना आसान हो गया है कि पुलिस पुख्ता सुबूतों के साथ कुछ घंटों या एक-दो दिनों में ही इस किस्म के अधिकतर जुर्म सुलझा लेती है।
अब एक सवाल यह उठता है कि महंगे मोबाइल का इस किस्म का शौक लोगों को किस तरह मुजरिम बना रहा है। हम लगातार देख रहे हैं कि समाज में एक-दूसरे के देखादेखी, या इश्तहार देख-देखकर लोगों को महंगे गैजेट्स की चाह इतनी हो रही है कि कोई मां-बाप के पैसे चुराकर शौक पूरा कर रहे हैं, कोई मां-बाप से सामान न मिलने पर खुदकुशी कर रहे हैं, और कुछ लोग ब्लैकमेलिंग जैसे कई तरह के जुर्म करते हुए मर्जी के सामान जुटा रहे हैं। कई मामलों में यह भी सुनाई देता है कि नौजवान पीढ़ी किस तरह सामानों के मोह में तन बेचने को भी तैयार हो जाती है। ऐसा लगता है कि अपनी असल हैसियत को याद रखने के बजाय लोग दूसरों की नकल करने पर अपने को बेबस पाते हैं। बहुत से किशोर-किशोरियां अपने आसपास के बच्चों के महंगे सामान देखकर हीनभावना के शिकार होने लगते हैं, और ऐसे में आसपास के कुछ चालाक लोग उन्हें कुछ तोहफे देकर उनका शोषण करना बड़ा आसान पाते हैं। न सिर्फ महंगे सामान, बल्कि महंगी जीवनशैली लोगों की समझ छीन ले रही है, और लोग सोशल मीडिया पर अपनी एक बड़ी चकाचौंध और चमकीली दिखने वाली तस्वीर को गढऩे में लग जाते हैं। टीन एज बच्चों से लेकर किसी भी बड़ी उम्र के लोगों तक अब यह दबाव बने रहता है कि वे अपने आसपास के ऑनलाईन दोस्तों की बराबरी करते हुए अपने महंगे सामानों की नुमाइश करते चलें, ताकि किसी भी तरह से पीछे न रह जाएं। आज ऑनलाईन और दूसरे किस्म के बहुत से जुर्म शान-शौकत की चाह या उसके दिखावे की वजह से भी हो रहे हैं, और लोग दूसरों के फैशन के सामान, दूसरों के फोन जैसे गैजेट्स देख-देखकर हीनभावना में जा रहे हैं, और फिर उससे उबरने के लिए या तो अपने मां-बाप को ब्लैकमेल करते हैं, या फिर खुली दुनिया में किसी और को ब्लैकमेल करके जुर्म की कमाई से खर्च करना चाहते हैं।
आज की न सिर्फ नौजवान, बल्कि किसी भी तरह की पीढ़ी की इस दिक्कत का कोई आसान इलाज नहीं है। बाजार लोगों को खरीदी के लिए उकसाने में लगे रहता है, और इस उकसावे से बच पाना खासा मुश्किल काम रहता है। नई पीढ़ी तो क्या, अब तो पुरानी पीढ़ी को भी सादा जीवन-उच्च विचार की नसीहत देना आसान काम नहीं रह गया है। जब एक-दूसरे के देखादेखी हर किस्म के खर्चीले काम करने का एक दबाव बने रहता है, तो फिर आसपास के समझदार लोगों की नसीहत बहुत काम नहीं आती है। सादा जीवन एक किस्म की हीनभावना भरने लगता है, और आसपास के अपने से अधिक संपन्न लोगों का जीवन एक दबाव बनाने लगता है कि कुछ भी करके उनकी नकल की जाए।
देखादेखी का दबाव, और दिखावे की चाह मिलकर लोगों से कई तरह के गलत काम करवाते हैं। इसमें लोग दूसरों को मारने को भी तैयार हो जाते हैं, जैसा कि अभी लखनऊ की इस वारदात में हुआ है, या अपने आपको खत्म करने को भी तैयार हो जाते हैं जैसा कि देश में हर दिन कहीं न कहीं से आता है कि मनपसंद मोबाइल न मिलने पर किसी बच्चे ने अपने को खत्म कर लिया। अब ऐसी एक-एक खबर हजारों दूसरे लोगों पर एक दबाव पैदा करती है कि वे चाहे कर्ज लेकर ही सही, अपने बच्चों की फरमाइश पूरी करें, क्योंकि ऐसा न करने पर उनकी जिंदगी पर एक खतरा मंडरा सकता है। बहुत कम मां-बाप ऐसे होंगे जो कर्ज लेकर भी अपने बच्चों की नाजायज मांगों को भी पूरा न करें। यह सिलसिला बच्चों और नई पीढ़ी को यह भी सिखा देता है कि वे जिद करके क्या-क्या हासिल कर सकते हैं।
इसका एक ही आंशिक इलाज हमें दिखता है कि बच्चों के सामने सादगी को एक मिसाल की तरह पेश किया जाए। मां-बाप खुद भी अगर सादगी बरतेंगे, उपकरणों, और फैशन पर सीमित खर्च करेंगे, अपने बच्चों को स्कूल-कॉलेज में, और दोस्तों के बीच सादगी से रहना सिखाएंगे, तो हो सकता है धीरे-धीरे उन पर भी असर हो, और उनके आसपास के दायरे पर भी। लेकिन कुछ अतिसंपन्न और गैरजिम्मेदार लोग ऐसे भी रहते हैं जो अपने बच्चों को अपनी संपन्नता का एक टुकड़ा देने को ही अपनी मोहब्बत मान लेते हैं। नतीजा यह होता है कि संपन्नता की ताकत इन बच्चों को औरों के लिए एक बुरी मिसाल तो बना ही देती है, इसके साथ-साथ यह ताकत उन्हें कुछ और किस्म के जुर्म में भी फंसा देती है, जो कि एक अलग मुद्दा है, और उसे हम आज यहां जोडऩा नहीं चाहते हैं। बच्चों को विरासत में अगर सादगी सिखाएंगे, तो वे जिंदगी में कई किस्म की दिक्कतों से बच जाएंगे। सादगी सिर्फ गरीबों के लिए जरूरी नहीं है, अमीर लोग भी अगली पीढ़ी को सादगी सिखा सकते हैं। (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)
छत्तीसगढ़ सरकार ने सरकारी डॉक्टरों की निजी प्रैक्टिस को लेकर अपना बरसों पुराना एक ऑर्डर दुबारा जारी किया, तो बड़ी खलबली मच गई है। सरकारी सेवा शर्तों में जिन डॉक्टरों को नॉन प्रैक्टिसिंग अलाउंस मिलता है, वे भी धड़ल्ले से बाहर बाजार में प्रैक्टिस करते हैं। सेवा शर्तों में उन्हें महज अपने घर पर मरीज देखने की छूट रहती है, लेकिन अधिकतर सरकारी डॉक्टर बाजार में क्लिनिक खोलकर, या बड़े अस्पतालों से जुडक़र वहां नाम की तख्ती लगाकर प्रैक्टिस करते हैं। सरकारी नौकरी में जितने सर्जन और एनेस्थेटिस्ट हैं, वे या तो अपने नर्सिंग होम चलाते हैं, या किसी और निजी अस्पताल में हर दिन घंटों काम करते हैं। यह सब कुछ नियमों के खिलाफ है, लेकिन विधायक बनने के पहले से नेता ऐसे डॉक्टरों के मरीज रहते हैं, बड़े-बड़े अफसर अपने परिवारों को लेकर इन्हीं डॉक्टरों के क्लिनिक जाते हैं, और इसलिए आदेश निकालने से ज्यादा सरकार इनका कुछ नहीं बिगाड़ पाती।
अब अगर सरकारी मेडिकल कॉलेजों को देखें, तो वहां पढ़ाने वाले, और कॉलेज के अस्पताल के बाहर निजी प्रैक्टिस करने वाले डॉक्टर सबसे अधिक ताकतवर होते हैं क्योंकि सत्ता के सर्वोच्च लोगों को जब जरूरत पड़ती है, तो ये सीनियर डॉक्टर ही सबसे पहले बुलाए जाते हैं, और इन्हीं की राजनीतिक पहुंच सबसे अधिक होती है। इसके साथ-साथ इस हकीकत को अनदेखा करना ठीक नहीं होगा कि सरकारी मेडिकल कॉलेजों को पढ़ाने के लिए डॉक्टर मिल नहीं रहे हैं, और खुद सरकार तरह-तरह का फर्जीवाड़ा करके राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग की टीम आने पर मेडिकल कॉलेजों में प्राध्यापक-चिकित्सकों की फर्जी हाजिरी दिखाती है, और किसी तरह मेडिकल सीटें रद्द होने के खतरे को टालती है। ऐसी हालत में जब चिकित्सा-प्राध्यापक मिल ही नहीं रहे हैं, तब निजी प्रैक्टिस के नियम को उन पर लागू करके उन पर कोई कार्रवाई करना भला कैसे मुमकिन हो सकेगा? इसलिए जहां डिमांड से बहुत कम सप्लाई है, वहां पर डॉक्टरों की कमी के बाद उन पर कोई नियम नहीं लादे जा सकते हैं। ऐसा तभी हो सकता है जब मेडिकल कॉलेज की हर कुर्सी भरी रहे, और सरकार मनमानी करने वाले चिकित्सक-प्राध्यापकों को हटाने की हालत में रहे। ऐसा तो पूरे देश में कहीं भी नहीं है क्योंकि उत्तर भारत के हिन्दीभाषी प्रदेशों में मेडिकल कॉलेजों की ही कमी है, और नए कॉलेज न खुल पाने की एक वजह प्राध्यापकों की कमी भी है। दूसरी तरफ दक्षिण भारत के राज्यों में राष्ट्रीय औसत से अधिक मेडिकल कॉलेज हैं, और वहां दक्षिण भारतीय प्राध्यापक पूरे के पूरे लग जाते हैं।
अब जहां पर जरूरत के मुकाबले डॉक्टरों की कमी है, वहां पर हाल यह है कि देश के बहुत से बड़े-बड़े अस्पतालों में काम करने वाले डॉक्टर भी उन अस्पतालों से परे अपने निजी क्लिनिक भी कुछ घंटे चलाते हैं, और प्राइवेट प्रैक्टिस करते हैं। हो सकता है कि उनके निजी क्लिनिक में आने वाले मरीजों में से जिनको अस्पताल में भर्ती करने की जरूरत पड़ती होगी, उन मरीजों से इन बड़े अस्पतालों को कारोबार मिलता होगा, और इसीलिए अस्पताल अपने इन विशेषज्ञ डॉक्टरों को निजी प्रैक्टिस की छूट भी देते होंगे। दरअसल डॉक्टरी का पेशा, और इलाज का कारोबार, इन दोनों की प्राथमिकताएं बिल्कुल अलग-अलग होती हैं, और इनमें जब सरकारी व्यवस्था त्रिकोण का तीसरा कोण बन जाती है, तो यह पूरा मामला बड़ा जटिल हो जाता है। देश में जब तक विशेषज्ञ चिकित्सकों की उपलब्धता नहीं बढ़ेगी, तब तक निजी और सरकारी अस्पतालों के बीच विशेषज्ञ डॉक्टरों की खींचतान इसी तरह बनी रहेगी। दूसरी तरफ यह भी समझने की जरूरत है कि कोई भी मेडिकल कॉलेज अस्पताल सीधे विशेषज्ञ चिकित्सक नहीं उगलते। वे पहले तो एमबीबीएस डॉक्टर बनाते हैं, और फिर उनके अनुपात में एक बहुत छोटा सा हिस्सा विशेषज्ञ डॉक्टर बनता है। इसलिए देश में जब तक एमबीबीएस की सीटें नहीं बढ़ेंगी, तब तक न तो विशेषज्ञ डॉक्टर बढ़ेंगे, और न ही मेडिकल कॉलेज बढ़ेंगे।
लोगों को याद होगा कि कुछ महीने पहले हमने राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग के एक फैसले की आलोचना की थी जिसने दक्षिण भारत के राज्यों में एमबीबीएस की सीटें बढ़ाने से यह कहते हुए इंकार कर दिया था कि वहां राष्ट्रीय औसत से अधिक मेडिकल सीटें हैं। आयोग पहले उत्तर भारत और हिन्दीभाषी राज्यों में मेडिकल सीटें बढ़ाना चाहता है, और इसलिए दक्षिण में चिकित्सा शिक्षा का विस्तार उसने हुक्म निकालकर रोक दिया है। अब यह एक राष्ट्रीय विसंगति है कि जिस दक्षिण भारत में चिकित्सा शिक्षा का (और बाकी उच्च शिक्षा का भी) एक बड़ा ढांचा तैयार किया है, उसे तो विस्तार से रोका जा रहा है, लेकिन उत्तर भारत के राज्य, और हिन्दी राज्य न तो ऐसा ढांचा बना पा रहे हैं, न बाहर के डॉक्टर जाकर इन राज्यों में काम करना चाहते हैं, और यहां आनन-फानन सीटों की बढ़ोत्तरी की गुंजाइश भी नहीं है। ऐसे में उत्तर भारत में भी पढ़ाने के लिए डॉक्टर तो दक्षिण भारत से ही आते दिखते हैं। दक्षिण के सरकारी और निजी मेडिकल कॉलेजों में उत्तर भारत और हिन्दी राज्यों से भी हर बरस हजारों चिकित्सा छात्र जाते हैं, जिनमें से बहुत से डॉक्टर बनकर अपने राज्यों में लौटते हैं। ऐसे में दक्षिण में विस्तार को रोकना खुद राष्ट्रीय जरूरत के खिलाफ है, और परले दर्जे की अदूरदर्शिता होने के साथ-साथ यह दक्षिण के साथ बेइंसाफी भी है। चूंकि कुछ राज्य नालायक और निकम्मे रह गए हैं, इसलिए देश के मेहनती और विकसित राज्यों को भी विस्तार और विकास से रोका जाए ताकि उत्तर-दक्षिण सब राष्ट्रीय औसत के पास रहें।
हमने सरकारी डॉक्टरों की निजी प्रैक्टिस से निकली बात दूर तक ले जाकर उत्तर और दक्षिण को लेकर केन्द्र सरकार की एक निहायत, नाजायज सोच तक पहुंचा दी है, लेकिन जो लोग राष्ट्रीय हित को देखेंगे, वे सरकारी नीति की खामी बड़ी आसानी से देख सकेंगे। आज सरकारी मेडिकल कॉलेजों के डॉक्टर अपनी शर्तों पर काम करने की हालत में हैं, उनकी इस ताकत को कम तभी किया जा सकता है जब देश में सरकारी कुर्सियों से अधिक डॉक्टर इन कुर्सियों के लिए कतार में लगे हों। आज छत्तीसगढ़ और इस किस्म के दूसरे राज्यों के बस में कुछ भी नहीं है। निर्वाचित नेताओं से मंत्री-मुख्यमंत्री बने हुए लोग जनता में खपत के लिए चाहे जो भी बयान दे दें, उन पर कोई अमल नहीं हो सकता, खासकर मेडिकल कॉलेज के डॉक्टरों के मामले में। भारत सरकार को देश के किसी भी हिस्से से डॉक्टर तैयार होने को बढ़ावा देना चाहिए। आज तो हालत यह है कि रूस, चीन, और बांग्लादेश तक से डॉक्टरी पढक़र हिन्दुस्तानी नौजवान लौट रहे हैं, और यहां पर काम कर रहे हैं। जब विदेशों में पढ़े डॉक्टरों को यहां जगह मिल रही है, तो फिर दक्षिण भारत से परहेज करना, और उत्तर भारत को बराबरी पर लाने के नाम पर परहेज करना एक बेदिमाग फैसला लगता है। चूंकि यूपी-बिहार में उद्योग नहीं लगे हैं इसलिए तमिलनाडु और गुजरात में भी उद्योग बढऩा रोक दिया जाए, क्या यह किसी समझदारी की बात होगी?
पिछले कुछ बरसों में लगातार हिन्दुस्तान में साइबर-फ्रॉड बढ़ते चल रहा है। मोबाइल फोन पर लोगों को ठगना, जालसाजी में उलझाना, बदनामी का डर दिखाकर ब्लैकमेल करना तो बढ़ते चल ही रहा है, इतने किस्म की धोखेबाजी चल रही है कि जांच करने वाली एजेंसियां शायद किसी नई तरकीब से हजारों जुर्म हो जाने के बाद ही उसकी कल्पना कर पाती होंगी। झारखंड का जामताड़ा ऐसा बदनाम हुआ कि वहां के मानो हर बेरोजगार को मोबाइल फोन से धोखाधड़ी करने, और लोगों को ठगने में महारथ हासिल हो गई थी। इस पर किसी बड़ी मनोरंजन कंपनी ने फिल्म या सीरियल भी बनाया है। लेकिन मामला यहां से बहुत आगे बढ़ गया है, और अब देश में ऐसे बहुत से कस्बे और शहर हो गए हैं जहां पर लोग साइबर और ऑनलाईन धोखाधड़ी के एक्सपर्ट हो गए हैं। वॉट्सऐप पर शेयर में पूंजीनिवेश का झांसा देकर लोगों से करोड़ों रूपए ठग लिए जा रहे हैं, तो कहीं क्रिप्टोकरेंसी से कमाई का बड़ा लुभावना धोखा दिया जा रहा है, और लोग पूरी जिंदगी की कमाई इसमें झोंक दे रहे हैं। एक और बहुत लोकप्रिय तकनीक लोगों को अश्लील और नग्न वीडियो कॉल में उलझाकर उनको ब्लैकमेल करने की है।
अब अगर देखें तो ऐसा लगता है कि हिन्दुस्तान किसी को गोली मारकर, या बंदूक की नोंक पर लूटने से आगे निकल गया है। अब लुटेरे मुंह पर कपड़ा बांधकर, चाकू-छुरा दिखाकर लूटने से बहुत आगे बढ़ चुके हैं। और अब मोबाइल फोन और ऑनलाईन पर बैंकों या भुगतान के किसी और तरीके का इस्तेमाल करते हुए लोगों को ठगा और लूटा जा रहा है। हमने कुछ अरसा पहले इस बारे में रक्तहीन-अपराध बढ़ते जाने की बात कही थी। अब कल छत्तीसगढ़ के एक गांव में ठगों ने एसबीआई की एक नकली ब्रांच ही खोल दी। भारतीय स्टेट बैंक का बोर्ड लग गया, लोग भीतर बैठकर काम भी करने लगे। धोखेबाजी के मुखिया, और इस नकली ब्रांच के मैनेजर बनकर बैठे पंकज पांडेय नाम के आदमी के खिलाफ जुर्म भी दर्ज कर लिया गया, जिसने बाकी कर्मचारियों को नौकरी देकर ‘बैंक-कर्मचारी’ बना दिया था। हफ्ते भर से यह ब्रांच खुल रही थी, लोग बैठ रहे थे, और खुशी-खुशी वहां पहुंचने वाले लोगों को कहा जा रहा था कि सर्वर चालू होते ही काम शुरू हो जाएगा। देश में कुछ और जगहों पर हाल के बरसों में स्टेट बैंक की नकली ब्रांच खुल चुकी हैं, लेकिन यह छत्तीसगढ़ में ऐसा पहला कारनामा था। बाद में इसकी चर्चा सुनाई पडऩे पर एसबीआई के अफसरों ने आकर जांच-पड़ताल की, और पुलिस में रिपोर्ट की। इस मामले से एक बहुत पुरानी हिन्दी फिल्म याद पड़ती है जिसमें डकैतों के हमले में पुलिस मारी जाती है, और एक फरार मुजरिम धर्मेन्द्र किसी गांव-कस्बे में पहुंचकर एक फर्जी थाना खोल देता है। अब एसबीआई की नकली ब्रांच खुलने लगी हैं। इसे लेकर एक मजाक की बात यह हो सकती है कि लोगों को एसबीआई की इस ब्रांच के नकली होने का शक तब हुआ, जब नए-नए नियुक्त किए गए फर्जी कर्मचारियों ने लंच के घंटों में भी काम जारी रखा। यह तो भला हुआ कि इस धोखाधड़ी में लोगों के लुटने के पहले ही इसे पकड़ लिया गया, वरना आम लोग तो किसी बेहिसाब कमाई के झांसे में जिंदगी भर की मेहनत की कमाई को झोंक देने में पल भर भी नहीं लगाते।
हिन्दुस्तान के लोग तरह-तरह की चिटफंड कंपनियों में झोंक दी गई अपनी बचत के जख्मों से तो उबर नहीं पाए हैं, और दूसरी तरफ वे नए झांसों में फंसने के लिए उतावले बैठे रहते हैं। ऐसी धोखाधड़ी, और ठगी की खबरें तो आती हैं, लेकिन मोटी कमाई का सुनहरा झांसा लोगों को इन्हें अनदेखा करके दांव लगा देने का एक अजीब सा उत्साह और हौसला दे देता है। हमारा ख्याल है कि सरकार को बड़े पैमाने पर जागरूकता अभियान चलाना चाहिए क्योंकि एक तो हर जुर्म की जांच सरकार के मत्थे आती है, दूसरी बात यह भी कि जालसाजों के हाथ बड़ी रकम पहुंच जाने पर वह जुर्म की दुनिया के हाथ मजबूत करती है। फिर इस सिलसिले से न तो सरकार को कोई टैक्स मिलता, और न ही जुर्म की रकम आसानी से देश की अर्थव्यवस्था में लौटती। देश के बेकसूर नागरिकों की बचत इस तरह लुट जाने से उनकी जिंदगी भी तबाह होती है। इसलिए सरकारों को बहुत बड़े पैमाने पर लोगों को जागरूक करने का अभियान छेडऩा चाहिए। अब तो वॉट्सऐप और सोशल मीडिया जैसे मुफ्त के माध्यम सरकार या हर किसी को हासिल हैं, और ऐसे हर जुर्म की खबरों का वहां प्रचार हो सकता है। अभी पुलिस अपने नजरिए से प्रेसनोट बनाकर जारी करती है, लेकिन आम लोगों को जिन तरीकों से खतरा समझ में आ सकता है, वह एक अलग पेशेवर तरीका होता है, और सरकारों को जागरूकता के वैसे वीडियो बनाकर फैलाने चाहिए।
दूसरी तरफ समाज के भीतर भी धर्म, जाति, इलाके, पेशे, या शौक से जुड़े हुए जितने किस्म के संगठन हैं, उन्हें भी अपने लोगों को बचाने के लिए जागरूकता के कार्यक्रम चलाने चाहिए। इसके बिना बचने का कोई जरिया नहीं है, क्योंकि जालसाज और ठग हर पल कोशिश में लगे रहते हैं, और अपनी हर कामयाबी के बाद उनका उत्साह भी बढ़ता है, और वे जुर्म को और अधिक बड़े पैमाने पर ले जाते हैं। भारत सरकार को भी इस बारे में सोचना चाहिए कि वह संचार साधनों पर अपने काबू का इस्तेमाल करके कैसे इन मुजरिमों पर रोक लगा सकती है, उसके स्तर पर रोकथाम और बचाव अधिक आसान है, और उसे ही इसके साथ-साथ जागरूकता की भी पहल करनी चाहिए।
दो दिन पहले की रिपोर्ट है कि भारत सरकार के दवा नियंत्रक ने 50 से अधिक दवाओं को घटिया मानते हुए एक रिपोर्ट दी है, और इस फेहरिस्त में बहुत आम प्रचलित दवाएं शामिल हैं जिनमें जीवन रक्षक डायबिटीज की दवा, हाई ब्लड प्रेशर की दवा भी है। अभी तक यह साफ नहीं हुआ है कि सरकार इस पर क्या करने जा रही है, और ये दवाएं देश की बड़ी दवा कंपनियों की बनाई हुई भी हैं। कुछ दवाओं के बारे में यह समाचार भी आया है कि उनके कैप्सूल के खोल में चेहरे पर लगाने वाला पावडर भरकर सरकारी अस्पतालों को सप्लाई कर दिया गया है। एक से बढक़र एक नामी-गिरामी कंपनियां घटिया दवाई बनाने की दोषी पाई गई हैं। और एक दिक्कत यह है कि आन्ध्र, अरूणाचल, असम, बिहार, छत्तीसगढ़, गोवा, गुजरात, हरियाणा, हिमाचल, मणिपुर, राजस्थान, मेघालय, मिजोरम, नगालैंड, ओडिशा, पंजाब, सिक्किम, तमिलनाडु, पांडिचेरी, तेलंगाना, दिल्ली, उत्तराखंड, पश्चिम बंगाल, अंडमान-निकोबार, दादर-नगर हवेली, दमन-दीव, लक्षदीप ने भारत सरकार के दवा नियंत्रक को उनके राज्य में दवा की क्वालिटी पर कोई रिपोर्ट नहीं दी है। अब इस लंबी लिस्ट के बाहर क्या देश में कोई राज्य बच भी गया है? जितनी लंबी लिस्ट रिपोर्ट न देने वाले राज्यों की है, उतनी ही लंबी लिस्ट देश की प्रमुख दवा कंपनियों की भी है।
कल की एक दूसरी खबर है कि किस तरह देश के एक सबसे प्रमुख हिन्दू मंदिर, तिरुपति में लड्डुओं में मछली के तेल, गाय और सुअर की चर्बी मिले होने की जांच के लिए आन्ध्र सरकार ने एक विशेष जांच दल बनाया है। लड्डुओं से परे जो जीवन रक्षक दवाएं हैं, उनके घटिया क्वालिटी के होने को लेकर किसी जांच दल की अभी खबर नहीं है। इस देश में धर्म से जुड़ा प्रसाद जांच का सामान है, लेकिन सभी धर्मों के लोगों की जिंदगियां बचाने वाली दवाएं अगर घटिया बन रही हैं, मिलावटी हैं, उनमें दवा की जगह चेहरे का पावडर भर दिया गया है, तो भी उसकी किसी जांच की न तो मांग उठ रही है, और न ही मानो जनता को इसकी कोई परवाह रह गई है। यह गजब की हैरान करने वाली नौबत है कि लोगों को अपने परिवार की जिंदगी के लिए जरूरी दवाओं से अधिक मंदिर के प्रसाद की परवाह है। इससे यह भी पता चलता है कि जनता किस हद तक अंधभक्ति का शिकार हो चुकी है, और उसे विज्ञान की कोई परवाह नहीं रह गई है जो कि इन दवाओं को बनाता भी है, और इनमें घटिया क्वालिटी को पकड़ता भी है।
दरअसल देश में भावनात्मक मुद्दों का सैलाब इतना बड़ा हो गया है कि जिंदगी के असल मुद्दे किनारे हो गए हैं। यह एक अलग बात है कि तमाम किस्म के पाखंडी और देवदूत होने का दावा करने वाले लोग भी जब खुद बीमार पड़ते हैं, तो वे आधुनिक विज्ञान से चलने वाले अस्पतालों में ही जाते हैं। और बात-बात में अंधभक्ति और अंधविश्वास फैलाने वाले बड़े-बड़े लोग तो दूसरे देशों के अस्पतालों तक भी जाकर इलाज करवाते हैं, और देश की आम जनता को अलग-अलग धर्मों के प्रवचन करने वाले लोगों, चमत्कारी बाबाओं, चंगा करने वाले पादरियों, तांत्रिकों, और बैगा-गुनिया के हवाले कर देते हैं। कल की ही खबर है कि किस तरह उत्तरप्रदेश में एक स्कूल के संचालक ने स्कूल को कामयाब करने के लिए एक बच्चे की बलि दे दी, और इस स्कूल संचालक का पिता ही बलि देने वाला तांत्रिक था।
देश के लोगों में वैज्ञानिक चेतना टुकड़ों में नहीं आती, ऐसा नहीं हो सकता कि कोई व्यक्ति किसी एक मामले में तो तर्क और समझ से काम ले, और बाकी मामलों में वे अंधविश्वासी हो जाएं। लोगों का मिजाज एक साथ ही बनता और बिगड़ता है। आज देश की आबादी के एक बड़े हिस्से को गाय के नाम पर, धर्म के नाम पर, प्रसाद में चर्बी के नाम पर, हिजाब और बुर्के के नाम पर, किसी धर्म के प्रचार के नाम पर इस हद तक भडक़ाया जा सकता है कि वे हिंसक हो जाएं, और इंसानों का कत्ल करने को जायज मानने लगें। आज देश में जगह-जगह गौ-गुंडे अपने आपको गौरक्षक कहते हुए जब कानून अपने हाथ में लेते हैं, पांवोंतले कुचलते हैं, और दूसरे धर्म या दूसरी जाति के लोगों को गौ-हत्यारे कहते हुए मार डालते हैं, और सरकारें उन्हें बचाने का काम करती हैं, तो फिर यह हिंसक धर्मान्धता, और अंधविश्वास जंगल की आग की तरह चारों तरफ तेजी से फैलते हैं। यही अंधविश्वास है जो प्रसाद को राष्ट्रीय बहस का सामान मानता है, और जिसे घटिया और नकली दवाईयां पाना बुरा नहीं लगता, उसका विरोध जरूरी नहीं लगता।
हमारे पास की ही एक दूसरी खबर है कि एक स्कूल में क्लास चलते हुए बीच में एक बच्चे ने जयश्रीराम का नारा लगा दिया, और शिक्षिका ने उसे सजा देने के लिए क्लास के बाहर खड़ा कर दिया। यह बात बच्चे के मां-बाप से होकर जब एक हिन्दूवादी छात्र संगठन तक पहुंची, तो उसके कार्यकर्ता स्कूल पहुंचकर प्रदर्शन करने लगे, और उस शिक्षिका के खिलाफ कार्रवाई मांगने लगे। अब एक क्लास के भीतर पढ़ाई के दौरान एक धार्मिक नारा लगाने को जायज हक मानते हुए, उस पर मामूली सजा देने पर शिक्षिका के खिलाफ अगर आंदोलन हो रहा है, तो इसका यही मतलब है कि स्कूलों में अब पढ़ाई की नहीं, कीर्तन भर की जरूरत रह गई है। ऐसी सोच किसी राजनीतिक दल को वैज्ञानिक चेतनाविहीन लोगों के वोट जरूर दिलवा सकती है, लेकिन किसी देश को आगे नहीं बढ़ा सकती। देश को दवा, और दुआ में से अगर किसी एक को प्राथमिकता देनी है, तो यह याद रखें कि जो लोग सोते-जागते बात दुआ की करते हैं, वे भी अपनी तबियत खराब होते ही दौड़े-भागे दवा की शरण में पहुंच जाते हैं, और भगवा लंगोटी वाले बाबा को ऑक्सीजन मास्क लगाए आईसीयू में लोगों ने देखा हुआ ही है।
छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित इलाकों में नक्सलियों का आत्मसमर्पण बरसों से सरकार का एक बड़ा अभियान रहा है। और अधिकारी इसे अपनी एक उपलब्धि बताते हैं कि उन्होंने कितने नक्सलियों का समर्पण करवाया। अब छत्तीसगढ़ सरकार नक्सल पुनर्वास की एक नीति बना रही है जिससे आकर्षित होकर और अधिक नक्सली हथियार छोड़ सकें। बरसों से पुलिस पर यह आरोप भी लगता है कि वह किसी को भी नक्सली बताकर उनका आत्मसमर्पण करवा देती है, उन्हें कुछ हजार रूपए मिल जाते हैं, और पुलिस मानकर चलती है कि गांव में भूतपूर्व नक्सली कहलाने पर भी कोई नुकसान नहीं होता है, इसलिए यह पुलिस-नीति खराब नहीं है। सरकारों में कभी लोग आदिवासियों के अधिकारों को लेकर संवेदनशील नहीं रहते हैं, इसलिए वे आदिवासियों के किसी अपमान की सोचे बिना, उनका ऐसा समर्पण करवाते चलते हैं। लेकिन आज इस मुद्दे पर चर्चा की एक वजह सामने आई कि नक्सलियों की आवाजाही वाले एक जिले बालोद में एसपी के पास पहुंचकर तीन लोगों ने अपने को एक माओवादी संगठन का सदस्य बताया, और आत्मसमर्पण की इच्छा जाहिर की। नक्सलियों के आत्मसमर्पण पर कोई सजा होती नहीं है, और कुछ रकम मिल जाती है, इसलिए वे फर्जी नक्सली बनकर सरेंडर कर रहे थे। पुलिस ने असलियत पता लगने पर इनके खिलाफ भी जुर्म दर्ज कर लिया है।
सरकार की किसी योजना का फायदा उठाने के लिए लोग किस हद तक चले जाते हैं, यह देखते ही बनता है। छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश दोनों जगहों पर सरकार की तरफ से लंबे समय से सामूहिक विवाह की योजना चल रही है जिसमें शादी करने वाले जोड़ों को सरकार की तरफ से बहुत सा घरेलू सामान भी तोहफे में मिलता है, और शायद कुछ रकम भी मिलती है। बहुत से ऐसे आयोजन रहते हैं जिनमें शामिल जोड़ों के बारे में पता लगता है कि वे पहले से शादीशुदा हैं, कुछ के तो बच्चे भी हैं, लेकिन सरकारी उपहार के चक्कर में वे एक बार फिर शादी के लिए खड़े हो जाते हैं। अभी कल-परसों ही किसी जगह की एक खबर थी कि एक जगह जमीन आबंटन में एक परिवार को एक भूखंड मिलना था। ऐसे में आठ शादीशुदा जोड़ों ने तुरंत तलाक की कार्रवाई पूरी की, और 16 भूखंड के हकदार बन गए। कुछ हफ्ते पहले राजस्थान का एक मामला सामने आया था कि वहां के एक इलाके में हजारों ऐसे नौजवान हैं जिन्होंने अपने आपको 70 या अधिक बरस का बताने वाले आधार कार्ड बनवा लिए हैं, और बरसों से वृद्धावस्था पेंशन ले रहे हैं। सरकार की किसी योजना का फायदा लेने के लिए हिन्दुस्तान के लोग किसी भी तरह का झूठा हलफनामा देने के लिए तैयार हो जाते हैं। ऐसे ही रंग-ढंग देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने अभी दो दिन पहले ही यह कहा है कि मेडिकल कॉलेजों में देश के बाहर बसे हिन्दुस्तानियों के बच्चों के नाम पर शुरू किया गया एनआरआई कोटा खत्म किया जाए, क्योंकि इसका सिर्फ बेजा इस्तेमाल हो रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने इस तर्क को खारिज कर दिया कि किसी एनआरआई के दूर के रिश्तेदार को भी एनआरआई कोटे में दाखिला दिया जाना चाहिए जैसा कि पंजाब, हिमाचल, और यूपी करते आ रहे हैं।
अभी कुछ दिन पहले ही छत्तीसगढ़ की एक खबर छपी थी कि किस तरह एक गांव के बहुत सारे खानाबदोश परिवारों के लोगों से अपना अंतरंग संबंध बताते हुए किसी दूसरे प्रदेश के संपन्न लोग उनकी किडनी लेकर अपने मरीजों को लगवाने की कानूनी औपचारिकता पूरी कर रहे हैं। और उनसे अपना घरोबा जताने के लिए वे उनकी झोपडिय़ों में बैठकर, उनके साथ खाना खाते हुए फोटो भी खींचा रहे हैं ताकि उनसे किडनी लेने को जायज ठहराया जा सके। भारत में अंग प्रत्यारोपण को लेकर कानून बहुत कड़ा है, लेकिन उसे धोखा देने के तरीके उससे अधिक बड़े हैं। जब तक सरकार कानून बना पाती है, तब तक जुर्म करने वाले लोग उसमें छेद ढूंढकर उसे चौड़ा करना शुरू कर देते हैं ताकि बिना सांस खींचे उसमें से निकल सकें। हर दिन कितने ही मामले छपते हैं जिनमें लोग धोखाधड़ी करके किसी जमीन को खरीद-बेच लेते हैं, और यह धोखा सिर्फ निजी जमीन को लेकर नहीं होता, अच्छे-खासे धर्मालु और आस्थावान लोग रात-दिन इस फेर में रहते हैं कि कैसे किसी मठ-मंदिर की जमीन, कैसे किसी गौशाला की जमीन को हड़पा जाए। इसमें बड़े-बड़े तथाकथित और स्वघोषित समाजसेवी और दानदाता भी रहते हैं, जो साल में एक बार गाय को चारा देते हुए फोटो खिंचवाते हैं, और उसके बाद 364 दिन गाय या अनाथ बच्चों के हक को लूटने की साजिश में जुटे रहते हैं।
कुल मिलाकर हिन्दुस्तान के लोगों का चरित्र ऐसा है कि ट्रेन टिकट में रियायत पाने के लिए लोग एक वक्त किसी स्वतंत्रता सेनानी को लेकर चलते थे ताकि उसके सहयोगी बनकर मुफ्त में या बहुत रियायत में सफर कर सकें। कई लोगों ने ऐसे स्वतंत्रता सेनानियों को सफर के सामान की तरह इस्तेमाल करना शुरू कर दिया था। रियायती या मुफ्त राशन पाने के लिए, अस्पताल में मुफ्त इलाज के लिए, अधिकतर लोग फर्जी आय प्रमाणपत्र बनवाने को बुरा नहीं मानते। कई संपन्न परिवार गरीबों वाला राशन कार्ड बनवाकर उसका अनाज अपने घरेलू कामगारों को दिलवाकर उन्हें कम मजदूरी देने की योजना भी बनाकर चलते हैं। यह देश अपने लोगों की ऐसी नीयत की वजह से दुनिया भर में बदनाम है कि यहां के लोग, कम से कम इस देश में रहते हुए, बुनियादी तौर पर बेईमान हैं। और बहुत से लोग इसलिए अभी तक बेईमान साबित नहीं हुए हैं कि वे इतने गरीब और कमजोर हैं कि उनको बेईमानी करने का मौका भी नहीं मिलता है। अब जो लोग करोड़पति हैं, वे लोग भी किसी जमीन की खरीदी-बिक्री में पैसे बचाने के लिए रिहायशी जमीन का भूउपयोग कृषि करवा लेते हैं, और फिर कम रेट की रजिस्ट्री करवाकर उसका फिर रिहायशी या कारोबारी इस्तेमाल करते हैं।
जिस भारत को अपनी संस्कृति, और अपने इतिहास पर इतना गर्व है, जिसमें राष्ट्रवाद को एकदम धारदार और हमलावर बनाकर रखा गया है, उस भारत में लोगों की रोजाना की सोच इस कदर भ्रष्ट और बेईमान कैसे है, इसके बारे में सोचना चाहिए। यहां लोग महंगी होटल में ठहरते ही सबसे पहले यह देखने लगते हैं कि वहां से क्या-क्या सामान चुराकर घर ले जाया जा सकता है, इस खतरनाक लत से छुटकारा इसलिए पाना चाहिए कि बहुत से हिन्दुस्तानी दूसरे देशों में सैलानी बनकर जाते हैं, और किसी होटल या सुपर बाजार में चोर की तरह पकड़ाते हैं। न पकड़ाने वाले लोग अपने दोस्तों के बीच फख्र से बताते हैं कि वे कहां-कहां से क्या-क्या चुरा लाए, कहां-कहां बच्चों की उम्र कम बताकर कौन सी बचत कर ली, और किस-किस तरह से कोई दूसरी बेईमानी कर ली।
हिन्दुस्तानी लोगों को अपनी सोच के बारे में आत्ममंथन करना चाहिए कि उन्हें ईमानदारी छू क्यों नहीं गई है? यह भी समझना चाहिए कि छोटी-छोटी बातों में परले दर्जे की बेईमानी इस देश में तो चल सकती है, दुनिया के सभ्य देशों में जाने पर ऐसे लोग कैसे-कैसे खतरे में पड़ते हैं।
महाराष्ट्र के बदलापुर की एक स्कूल में जब कुछ हफ्ते पहले दो छोटी बच्चियों से यौन शोषण का मामला सामने आया, और अक्षय शिंदे नाम का एक नौजवान उसमें पकड़ाया, तो बड़ा बवाल हुआ। ट्रेनें रोकी गईं, और जगह-जगह प्रदर्शन हुए। महाराष्ट्र की शिंदेसेना-भाजपा गठबंधन सरकार के लिए यह खास शर्मिंदगी का मौका इसलिए भी था कि इसी वक्त बंगाल के कोलकाता में सरकारी मेडिकल कॉलेज में महिला डॉक्टर से बलात्कार और उसकी हत्या का मामला देश भर को विचलित कर रहा था, और वह वहां की मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी के खिलाफ भाजपा के हाथ एक बड़ा मुद्दा लगा था। ऐसे में जब एक-एक करके कई भाजपा राज्यों में तरह-तरह से बलात्कार की घटनाएं आने लगीं तो भाजपा के हमलों की धार खत्म हो गई। अब महाराष्ट्र में बदलापुर की यह घटना एक नया नाटकीय मोड़ ले चुकी है क्योंकि बच्चियों के यौन शोषण के आरोपी अक्षय शिंदे की पुलिस हिरासत में हथकड़ी लगे-लगे पुलिस गोली से मौत हो गई, और इसे महाराष्ट्र के बाम्बे हाईकोर्ट ने बड़ी हैरानी और गंभीरता के साथ लिया है, और राज्य की पुलिस को कटघरे में खड़ा किया है। अदालत ने इस बात को मानने से इंकार कर दिया कि हथकड़ी लगे हुए मामूली कद-काठी के एक गिरफ्तार को चार-चार पुलिस अफसर नहीं संभाल सके, और उन्होंने आत्मरक्षा में इस आरोपी को गोली मारने की बात कही है जो कि पैरों पर मारने के बजाय सीधे सिर पर मारी गई है। अदालत ने पुलिस की कहानी को किसी भी तरह मानने से इंकार कर दिया है।
लेकिन हम पुलिस की फर्जी मुठभेड़ें बहुत से प्रदेशों में देखते रहते हैं, और आज की यह बात सिर्फ पुलिस मुठभेड़ तक सीमित नहीं है। दरअसल जैसे ही यह मुठभेड़ ‘मौत’ हुई, वैसे ही महाराष्ट्र में मुम्बई में कई जगहों पर गृहमंत्री देवेन्द्र फडऩवीस के होर्डिंग लग गए जो फडऩवीस को पिस्तौल और मशीनगन लिए हुए दिखा रहे हैं, और होर्डिंग पर बस दो शब्द लिखे हैं- बदला पूरा। अब सवाल यह उठता है कि संविधान की शपथ लेकर काम संभालने वाली सरकारें अगर संविधान के ठीक खिलाफ जाकर अंधाधुंध मुठभेड़-हत्याएं करती हैं, बुलडोजरी इंसाफ करती हैं, तो कम से कम संविधान की शपथ दिलवाना बंद कर देना चाहिए। अगर एक निहत्थे, और हथकड़ी से जकड़े हुए मामूली से नौजवान को चार-चार हथियारबंद पुलिसवाले काबू नहीं कर सकते, और सिर में गोली मारना ही उनके पास अकेला विकल्प है, तो यह जाहिर है कि यह उस आरोपी को काबू में रखने के लिए नहीं, गृहमंत्री को होर्डिंग पर अपनी कामयाबी दिखाने का मौका देने के लिए किया गया काम है।
यह सिलसिला बहुत ही भयानक है। यह वही मुम्बई है जहां पर पुलिस के कुछ अफसर रिवॉल्वर का ट्रिगर दबाने के ऐसे शौकीन हो गए थे कि एक-एक के नाम दर्जनों मुठभेड़-हत्याओं का रिकॉर्ड दर्ज है। यह एक अलग बात है कि ऐसे ही एक सबसे चर्चित अफसर प्रदीप शर्मा को अभी फर्जी मुठभेड़-हत्या में उम्रकैद भी हुई है। इसके बावजूद पुलिस में हमेशा ही कुछ ऐसे अफसर रहते हैं जो कि पहले तो एनकाउंटर स्पेशलिस्ट की शोहरत हासिल करते हैं, और उसके बाद वे अंडरवल्र्ड के किसी एक गिरोह के साथ मिलकर दूसरे गिरोह के लोगों को मार गिराने की सुपारी उठाते हैं, तो कभी जमीनों के धंधे में माफिया बन जाते हैं। पुलिस को जब कभी किसी गैरकानूनी काम के लिए बढ़ावा दिया जाता है, तो पुलिस सिर्फ उसी काम को करके नहीं थमती है। पुलिस उसके आगे बढ़ते हुए अपनी मर्जी के भी कई काम करती है, और बहुत से मामलों में वह धंधेबाज होकर भाड़े के हत्यारे का काम भी करने लगती है, रिवॉल्वर का डर दिखाकर वह वसूली-उगाही में भी लग जाती है।
हमारा ख्याल है कि बाम्बे हाईकोर्ट ने इस ताजा मुठभेड़-हत्या की कमजोर नब्ज पर हाथ धर दिया है, और जनता के बीच वाहवाही पाने के लिए करवाई गई राजनीतिक हत्याओं की ऐसी तेज जांच ही होनी चाहिए। लोगों को याद होगा कि 2019 में हैदराबाद में एक 26 बरस की डॉक्टर से बलात्कार, और उसके कत्ल के मामले में गिरफ्तार चार लोगों को पुलिस ने जुर्म की जगह ले जाते हुए नेशनल हाईवे के किनारे एक पुल के नीचे मुठभेड़ बताकर मार डाला था। बाद में एक न्यायिक जांच आयोग ने इसमें शामिल पुलिस अफसरों के खिलाफ कार्रवाई की सिफारिश की थी, लेकिन उसे तेलंगाना हाईकोर्ट ने मई 2024 में स्टे कर दिया था। और जनता के बीच इन चार मुठभेड़-हत्याओं को लेकर पुलिस की ऐसी वाहवाही हुई थी कि पुलिस पर फूल बरसाए गए थे।
पुलिस को इस हद तक हत्यारा बनाने का एक बड़ा नुकसान यह होता है कि उसका अनुशासन पूरी तरह खत्म हो जाता है, वह अराजक हो जाती है, और चूंकि वह खुद जुर्म करने लगती है इसलिए उसे बाकी मुजरिम उतने बुरे भी नहीं लगते। लेकिन मुजरिम बनने के बाद पुलिस दूसरे कई किस्म के जुर्म भी करने लगती हैं। पंजाब में आतंक के दिनों में केपीएस गिल की पुलिस ने मानवाधिकारों को जितना कुचला था, जितने बेकसूर लोगों का कत्ल किया था, उसमें आज बहुत सारे पुलिसवाले कैद भुगत रहे हैं। अब सीसीटीवी कैमरों, मोबाइल फोन लोकेशन जैसे बहुत से वैज्ञानिक सुबूतों का वक्त है, और ऐसे में पुलिस को भी जुर्म करने से बचना चाहिए, और नेताओं को पुलिस से कत्ल करवाने से परहेज करना चाहिए। कुछ ऐसी हिन्दी फिल्में बनी हैं जिनमें कोई पुलिस अफसर ही मंत्रियों और नेताओं का कत्ल करते दिखते हैं।
महाराष्ट्र में गृहमंत्री अगर बदलापुर के आरोपी की पुलिस हिरासत में इस तरह हुई हत्या के बाद बदला-पूरा के होर्डिंग लगवाते हैं, या उनकी ऐसी हथियारबंद तस्वीर के साथ ऐसे होर्डिंग लगते हैं, तो यह देश में कानून के राज की बहुत बड़ी हेठी है। अदालत को तो ऐसे होर्डिंग की जांच भी करवानी चाहिए कि वे कैसे लगे हैं, और कैसे यह माना जा रहा है कि गृहमंत्री ने यह बदलापुर का बदला पूरा किया है। लोकतंत्र में हिरासत के मुजरिम की हत्या अगर किसी नेता को अपने फख्र का सामान लगती है, तो यह शर्मनाक नौबत है। इसका मतलब है कि जनता के मन में भी कानून का सम्मान खत्म हो गया है, और वह बंदूक की नली से निकले इंसाफ पर तालियां बजाती है। फिर सरकार और नक्सलियों में फर्क क्या रह गया, वे भी तो अपने हत्यारे फैसलों को बंदूक की नली से निकली क्रांति बताते हैं। (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)
एक पेड़ या पौधे के फल के ऐसे रेशे रहते हैं जिन्हें किसी पर छिडक़ दिया जाए तो उन्हें लगातार खुजली आने लगती है। छत्तीसगढ़ के इलाके में उसे केंवाच कहा जाता है, और शरारत करने वाले लोग उसे होली के मौके पर गुलाल में मिलाकर, या वैसे ही किसी पर छिडक़ देते हैं, और वे घंटों तक इस खुजली से जूझते रहते हैं। कुछ लोगों के मुंह में कुदरत केंवाच डालकर भेजती है, और जब तक वे कोई नाजायज और निहायत गैरजरूरी बात बोल न लें, तब तक मुंह की खुजली जारी रहती है। पिछले एक महीने में पार्टी की जमकर झिडक़ी खाने के बाद भी ताजा-ताजा सांसद बनी हुई कंगना रनौत का हाल कुछ ऐसा ही है। जिन किसानों के बारे में कंगना के हिंसक बयानों पर पार्टी ने अपने आपको उनसे अलग कर लिया था, और सार्वजनिक रूप से कहा था कि कंगना पार्टी की तरफ से कोई भी बयान देने का हक नहीं रखती हैं, उसी कंगना ने अब फिर किसानों के बारे में एक नया बखेड़ा छेड़ा है। उन्होंने यह कहा है कि निरस्त किए गए किसान कानूनों को वापिस लाना चाहिए, और किसानों को खुद इसकी मांग करनी चाहिए। देश में महीनों तक चले किसान आंदोलन के बाद शायद सात सौ से अधिक आंदोलनकारियों की मौत के बाद मोदी सरकार को पहली बार पूरी शर्मिंदगी से अपने बाहुबल से संसद में पास करवाए गए किसान कानूनों को वापिस लेना पड़ा था। और तब से अब तक भाजपा और मोदी किसान कानूनों से जुड़ा यह अप्रिय सिलसिला याद भी करना नहीं चाहते हैं। लेकिन बिना किसी मौके के कंगना ने एक बार फिर अपनी औकात से बढक़र, बेवजह किसान कानूनों की याद दिला दी, और पार्टी के लिए एक बड़ी असुविधा पैदा कर दी। पार्टी के एक राष्ट्रीय प्रवक्ता को सार्वजनिक रूप से कंगना की सोच का खंडन करना पड़ा, और कहना पड़ा कि उनका यह बयान कहीं से भी पार्टी की नीति नहीं है, और पार्टी अपने को इससे अलग करती है। कंगना की समझ को लेकर लोगों के बीच कई तरह का शक हो सकता है, लेकिन उनका परिचय ही बताता है कि वे 38 बरस की हैं। राजनीतिक समझ शून्य व्यक्ति भी इस उम्र में आकर, और एक बड़ी राष्ट्रीय पार्टी के सैकड़ों सांसदों में से एक बनकर बार-बार पार्टी की सार्वजनिक झिडक़ी, और एयरपोर्ट पर एक महिला किसान आंदोलनकारी बेटी की थप्पड़ खाने से बचने लायक समझ वाली तो होना चाहिए, लेकिन कंगना को यह सहज समझ शायद छू भी नहीं गई है। इसके अलावा ऐसा भी लगता है कि वे भाजपा के भीतर स्मृति ईरानी के छोड़े गए एक विशाल शून्य को भरने की हड़बड़ी में हैं, और इसीलिए बिना सोचे-विचारे पार्टी की फजीहत करने का शगल पाल बैठी हैं।
इस तरह के बयान देने वाले कुछ और भी लोग रहते हैं जो मुंह पहले खोलते हैं, और दिमाग का इस्तेमाल बाद में करते हैं, अगर दिमाग रहता है तो। सार्वजनिक जीवन में बहुत से लोग अश्लील, हिंसक, भडक़ाऊ, और विवादास्पद बयान देने के शौकीन रहते हैं। इनकी वजह से कहीं चुनाव आयोग उन्हें नोटिस देता है, तो कहीं सुप्रीम कोर्ट उन पर हेट-स्पीच की एफआईआर करने को कहता है। यह सिलसिला हाल के दशकों में कुछ तेज हो गया है। पहले तो इतना बुरा हाल नहीं था, लोग अधिक सोच-समझकर बोलते थे, लेकिन इन दिनों ऐसा लगता है कि कैमरों के सामने बोल लेने के बाद, सोशल मीडिया पर पोस्ट कर देने के बाद लोग अपनी कही बातों पर अगर सोचते होंगे, तो सोचते होंगे। ऐसा लगता है कि आज की टेक्नॉलॉजी ने लोगों की सोच को बहुत बुरी तरह प्रभावित किया है। पिछले कुछ दशकों में मोबाइल फोन पर एसएमएस भेजने की ऐसी तकनीक लोगों को हासिल हुई कि वे कुछ पलों में मैसेज टाईप करके भेज देते हैं, जो कि पल भर में पहुंच जाता है, और कुछ मिनटों में शायद उसका जवाब भी आ जाता है। बात और आगे बढ़ गई, और अभी कुछ बरस से तो वॉट्सऐप जैसे कई मैसेंजरों पर लोग वीडियो कॉल पर बात करते हैं, अपनी आवाज में संदेश रिकॉर्ड करके भेज देते हैं, कोई वीडियो, फोटो, या लिखित संदेश पल भर में किसी एक को या सैकड़ों लोगों को भेज देते हैं। नतीजा यह है कि एक वक्त पोस्टकार्ड की रफ्तार से जाने वाले संदेश अब पोस्टकार्ड पर पता लिखने जितनी देर में दुनिया के किसी भी कोने से जवाब भी ला देते हैं। लोग अपनी बात सोशल मीडिया पर पल भर में पोस्ट कर देते हैं, और जब तक उसके बारे में कोई सफाई देने की बात उन्हें सूझे, तब तक तो सैकड़ों लोग उसे आगे बढ़ा चुके रहते हैं, धिक्कार चुके रहते हैं। जब दुनिया में अपनी बात को फैलाना बिजली की रफ्तार से हो रहा है, तो लोगों को अपनी जुबान और उंगलियों को कुछ काबू में रखना चाहिए। खासकर उन लोगों को जो एक बड़े संगठन या संस्थान का हिस्सा हैं।
यह बात सिर्फ राजनीति के लोगों की नहीं है, जिंदगी के हर दायरे के लोगों पर यह लागू होती है। जो विकसित और सभ्य लोकतंत्र हैं, वहां किसी कंपनी के कर्मचारी अगर नफरती, हिंसक, नस्लभेदी बात पोस्ट करते मिलते हैं, तो कंपनियां पल भर में उन्हें निकाल बाहर करती हैं। यह एक अलग बात है कि हिन्दुस्तान जैसे देश में ऐसे लोग काफी लंबे समय तक खप जाते हैं, बच जाते हैं। कंगना रनौत को भाजपा में आने के बाद कई मौकों पर दिए गए ऊटपटांग बयानों के पहले यह सहूलियत हासिल थी कि वे पार्टी के किसी बड़े नेता या प्रवक्ता से अपनी सोच पर पार्टी का रूख समझ लेतीं। लेकिन उन्होंने इतनी जहमत नहीं उठाई। नतीजा यह हुआ कि एक महीने में शायद दूसरी-तीसरी बार पार्टी को यह सफाई देनी पड़ रही है कि कंगना की कही बातें उनकी अपनी शौच है, वह पार्टी की सोच नहीं है। सार्वजनिक जीवन के किसी भी व्यक्ति के लिए यह बड़ी शर्मिंदगी की बात रहनी चाहिए थी, और पहली सार्वजनिक झिडक़ी के बाद कंगना को यह काम अपने कमसमझ वाले दिल-दिमाग के भीतर ही करना था। लेकिन ऐसा लगता है कि वे किसी भी कीमत पर सार्वजनिक जीवन में एक अधिक बड़ी मौजूदगी दर्ज करवाना चाहती हैं। जिंदगी में टेक्नॉलॉजी के इस्तेमाल ने लोगों के फैसले लेने, काम करने, बात करने, इन सबकी रफ्तार सैकड़ों गुना तेज कर दी है, लेकिन टेक्नॉलॉजी की रफ्तार से इंसानी समझ का विकास नहीं हुआ है, उसमें कई और पीढिय़ां लग जाएंगी। ऐसे में बेवकूफी की बात अब मानो लाउडस्पीकरों पर गूंजती है, और फोन के मैसेंजरों से पल भर में दुनिया भर में पहुंच जाती है। लोगों को अपनी बेवकूफी की नुमाइश नहीं करना चाहिए, और बाकी लोगों में एक गलतफहमी बने रहने देना चाहिए।
अब यहां पर एक छोटी सी बात हमें परेशान करती है कि हरियाणा चुनाव के ठीक पहले जिस तरह से बृजभूषण शरण सिंह पहलवान लड़कियों को बदनाम करने और धमकाने में सार्वजनिक रूप से जुट गए थे, और भाजपा को उन्हें समझाईश देकर चुप कराना पड़ा था, कुछ वैसा ही कंगना भी बार-बार कर रही हैं। ऐसा लगता है कि सबसे बड़ी बन गई इस पार्टी को लीडरशिप-विकास की एक ट्रेनिंग अपने लोगों को देनी चाहिए, जिसमें कम से कम पार्टी की नीतियों को, और नेता-कार्यकर्ता को उसके अधिकार क्षेत्र को ठीक से समझाना चाहिए। अगर कंगना अगले कुछ महीनों में फिर अपने मुंह की खुजली दूर करते हुए कोई नाजायज और गैरजरूरी बयान देती हैं, तो इसमें उनकी गलती नहीं रहेगी, पार्टी की ही गलती रहेगी। किसी नेता के सिलसिलेवार गलत काम गलती नहीं रहते, वे गलत काम ही रहते हैं। और यह बात नेता के अलावा पार्टी पर भी लागू होती है।
कल एक बार फिर छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट राज्य सरकार और नेशनल हाईवे अथॉरिटी पर खफा हुआ है क्योंकि राजमार्गों से जानवरों को हटाने में ये पूरी तरह नाकामयाब रहे हैं। एक जनहित याचिका पर सडक़ों पर जानवरों की वजह से होने वाले हादसों का मामला उठाया गया था, और मुख्य न्यायाधीश वाली एक दो जजों की बेंच इसकी सुनवाई कर रही है। वह साल भर से सरकार को बोलते आ रही है कि सडक़ों से जानवरों को हटाया जाए, और उनके मालिक उन्हें इस तरह सडक़ों पर छोड़ देते हैं, इसके लिए उन पर जुर्माना लगाया जाए। ऐसे जानवर न सिर्फ राष्ट्रीय और प्रादेशिक राजमार्गों पर डेरा डाले रहते हैं, बल्कि वे शहरों के भीतर की सडक़ों पर भी ट्रैफिक रोकते हुए पड़े या खड़े रहते हैं। इसके अलावा शहर की कॉलोनियों में भी लोगों से कुछ खाना मिलने की उम्मीद में गायों और सांडों का डेरा लगे ही रहता है। इस बीच कल सुबह ही बिलासपुर-कोरबा के बीच एक तेज रफ्तार मालवाहक की चपेट में 20 से अधिक जानवर आ गए, जिनमें 18 की मौके पर ही मौत हो गई। इसके ड्राइवर को गिरफ्तार किया गया है। जिस गौवंश को लेकर जनता तुरंत उत्तेजित हो जाती है, वह पूरे प्रदेश में सडक़ों पर डेरा डाले हुए है, लेकिन उसका कोई इंतजाम हो नहीं पा रहा है।
छत्तीसगढ़ के साथ एक दिक्कत यह है कि पिछले पूरे पांच बरस कांग्रेस की भूपेश बघेल सरकार गौशाला, गौठान, गौवंश, गोबर, गोमूत्र जैसे कई नारे लगाती रही, हजारों करोड़ रूपए सालाना इन पर खर्च भी किया गया, लेकिन जो असली जमीनी दिक्कत थी, वह ज्यों की त्यों बनी रही। न सडक़ों से जानवर हटे, और न ही किसानों के खेतों में अवारा जानवरों का फसलों का हमला ही थमा। अभी हालत यह है कि कुछ जगहों पर किसान अवारा मवेशियों के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे हैं कि वे फसल बर्बाद कर रहे हैं। जशपुर में सैकड़ों किसानों ने सडक़ जाम कर दी कि अवारा मवेशी उनकी साल भर की फसल को खा जा रहे हैं, और अगर यही सिलसिला चलते रहा तो किसानों के भूखे मरने की नौबत आ जाएगी। ऐसी नौबत उत्तरप्रदेश में भी हर जगह देखने मिल रही है जहां पर गौवंश को कसाईघर नहीं जाने दिया जाता, और उनकी आबादी बढ़ती जा रही है। लेकिन खेतों को बचाने के लिए जानवरों को कसाईघर भेजना जरूरी नहीं है, उनके लिए अलग से बाड़े बनाकर उन्हें वहां रखना एक समाधान हो सकता है, लेकिन न पिछली सरकार के कार्यकाल में यह हुआ, और न ही अभी होते दिख रहा है।
गाय को मां मानना बड़ी अच्छी बात है, लेकिन यह मां मोटेतौर पर घूरों पर गंदगी खाकर जिंदा है, और उसके पेट से 25-50 किलो पॉलीथीन सर्जरी में निकलता है। सरकारी अनुदान से चलने वाली गौशालाओं का भ्रष्टाचार इतना भयानक है कि भाजपा की रमन सिंह सरकार के वक्त ऐसी अनुदान प्राप्त गौशालाओं में दर्जनों गायों के भूख से मरने के मामले सामने आए थे। लोगों की सामान्य जानकारी भी यही है कि गौशाला चलाने के नाम पर ऐसी संस्थाओं के पदाधिकारी पैसों की अफरा-तफरी करके खुद तो हट्टे-कट्टे सांड सरीखे हो जाते हैं, और गाएं भूख से मरती रहती हैं। इसलिए सरकार गौशाला या गाय के लिए शरणस्थली तो बना सकती है, उसे चलाने का मतलब अंधाधुंध भ्रष्टाचार होगा। आज जब इंसानी मरीजों वाले सरकारी अस्पतालों में मनमाना भ्रष्टाचार चलता है, तो बेजुबान जानवरों के हिस्से की घास खाकर इंसान ही मोटे होते रहेंगे। लेकिन भ्रष्टाचार की वजह से किसी समाधान या इलाज पर काम न करने का मतलब तो देश-प्रदेश को बंद करना हो जाएगा क्योंकि यहां तो हर मामले में, हर काम में भ्रष्टाचार रहता ही है। इसलिए इस चर्चा से परे राज्य सरकार, पंचायत और म्युनिसिपल को जानवरों को रखने के बाड़े बनाने पड़ेंगे, ताकि सडक़ों से जानवर हटें।
आज जब सडक़ पर किसी जानवर को किसी गाड़ी से चोट लग जाने पर उस गाड़ी के मालक-चालक के खिलाफ जुर्म दर्ज होता है, तो उससे एक बुनियादी सवाल यह भी खड़ा होता है कि सडक़ पर किसका हक है, वह किस इस्तेमाल के लिए बनी है? सडक़ पर गाडिय़ों के सामने जानवरों के आने पर या तो उन जानवरों के मालिकों के खिलाफ जुर्म दर्ज होना चाहिए, या फिर सडक़ के रख-रखाव के जिम्मेदार विभाग या पंचायत-म्युनिसिपल पर कार्रवाई होनी चाहिए। छत्तीसगढ़ में किसी गाड़ी से किसी जानवर को बिना लापरवाही के भी ठोकर लग जाए तो पशुओं पर अत्याचार का मामला दर्ज होता है, और कई मामलों में मौके पर ही गौभक्त होने का दावा करने वाले लोग सडक़ पर इंसाफ कर देते हैं। यह नौबत कानून की बुनियादी समझ के खिलाफ है। सडक़ों पर चलने के लिए लोग टैक्स देते हैं, और इसके बाद सडक़ों को ठीक रखने, वहां से जानवरों की बाधा हटाने का जिम्मा सरकार का होता है। लेकिन सरकार अपना नियमित कामकाज नहीं करती है, जिम्मेदारी नहीं निभाती है, तब जाकर अदालत को दखल देनी पड़ती है।
छत्तीसगढ़ में बरसों के बाद यह गणेशोत्सव ऐसा निकला है जिसमें लाउडस्पीकरों का हमला कम हुआ है। हाईकोर्ट लगातार लाठी लेकर बैठा था, और अपने आदेशों पर अमल करवाने के लिए बार-बार चेतावनी जारी कर रहा था। जब अफसरों को अदालत की अवमानना में जेल जाने का खतरा नजर आया, तब जाकर लाउडस्पीकरों की गुंडागर्दी पर काबू किया गया। लेकिन सवाल यह है कि कानून पर अमल की अपनी बुनियादी जिम्मेदारी को सरकार कब तक अनदेखा करती रहेगी, और कब तक हाईकोर्ट उन्हीं मुद्दों को लेकर लगातार सरकार के पीछे पड़े रहेगा? राज्य सरकार और स्थानीय संस्थाओं को अपना जिम्मा पूरा करना चाहिए, सडक़ों पर जानवरों की मौजूदगी से बहुत से इंसानों की मौत भी होती है जिसके लिए इन सडक़ों के रख-रखाव के जिम्मेदार विभाग ही मुजरिम हैं। सरकार को अदालती कटघरे में एक ही मामले पर बार-बार इस तरह खड़े होने से बचना चाहिए। यह नौबत बड़ी शर्मिंदगी की है, और जानवरों के जिन मालिकों को अपनी कानूनी जिम्मेदारी का अहसास नहीं है, उनकी गिरफ्तारी भी शुरू होनी चाहिए क्योंकि वे जनसुरक्षा के लिए एक बड़ा खतरा खड़ा करते हैं। अब चूंकि जानवरों का कसाईघर जाना बंद कर दिया गया है, इसलिए सरकार को ही इस बढ़ती हुई आबादी का इंतजाम करना होगा।


