संपादकीय
कोरोना के आंकड़ों के साथ-साथ जो दूसरी जानकारी आती है वह पॉजिटिव लोगों के पतों और नाम की वजह से यह साफ कर देती है कि वे एक ही परिवार के लोग हैं। हम रोजाना ऐसे सैकड़ों लोगों के नाम देख रहे हैं जिनमें से एक-एक घर के पांच-दस लोग भी हैं। छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में एक परिवार के एक चूल्हे पर पका खाना खाने वाले करीब दो दर्जन लोग अब तक पॉजिटिव हो चुके हैं। इनमें से हर किसी को अलग-अलग बाहर से संक्रमण नहीं हुआ होगा, बाहर से तो कोई एक-दो लोग ही कोरोना लाए होंगे, लेकिन इसके बाद घर के भीतर ही बाकी लोगों को इनसे संक्रमण पहुंचा होगा। इस खतरे पर हम चर्चा इसलिए कर रहे हैं कि जो लोग घर के भीतर हैं, जिनका काम बाहर निकले बिना चल जा रहा है, वे लोग अपने आपको महफूज मान लेते हैं, जबकि ऐसा है नहीं।
जो लोग घर के बाहर जाते हैं वे लोग तो एक बार थोड़ी-बहुत सावधानी बरत भी लेते हैं, मास्क लगा लेते हैं, चीजों को बिना जरूरत छूने से परहेज कर लेते हैं, और हाथों को सेनेटाइज भी कर लेते हैं। लेकिन जब लोग परिवार के बीच घर में रहते हैं, तो बच्चे-बड़े, तमाम लोग एक-दूसरे के साथ संपर्क में आते ही हैं। जब कोरोना फैलना शुरू हुआ तभी डॉक्टरों ने इस बारे में सचेत कर दिया था कि छोटे बच्चे खतरनाक साबित हो सकते हैं क्योंकि एक कोरोना पॉजिटिव हो जाएंगे, तो भी उनमें प्रतिरोधक क्षमता अच्छी रहने की वजह से उनमें कोई लक्षण नहीं दिखेंगे, और वे ऐसे बुजुर्ग दादा-दादी, नाना-नानी, को संक्रमित करने का खतरा बन सकते हैं जो कि अपनी उम्र, कम प्रतिरोधक क्षमता, और कई किस्म की बीमारियों की वजह से अधिक नाजुक रहेंगे। अब यह बात परिवारों के बीच कहने-सुनने में अच्छी नहीं लगती है क्योंकि दादा-दादी, नाना-नानी को तो अपनी जिंदगी ही परिवार के छोटे बच्चों के लिए बची हुई लगती है। उन्हें वे गोद में रखते हैं, साथ खिलाते हैं, साथ सुलाते हैं, और सिर चढ़ाए रखते हैं।
आज जिस तरह थोक में अनगिनत परिवार कोरोना पॉजिटिव हो रहे हैं, उनमें परिवार के ही कुछ लोग बाहर से खतरा लाकर बाकी लोगों के लिए खतरा बने होंगे। तमाम लोगों को इस नजरिये से भी परिवार के भीतर बहुत बड़ी सावधानी बरतने की जरूरत है। यह कॉलम आमतौर पर विचारोत्तेजक-विचारों का है, लेकिन हम बहुत किस्म के खतरों के बारे में इसी जगह पर सावधानी सुझाने का काम भी करते रहते हैं। यह लिखा हुआ पढऩा उतना विचारोत्तेजक नहीं होगा, लेकिन यह जिंदगी के लिए इतना महत्वपूर्ण है कि हम समय-समय पर ऐसे कुछ मुद्दों को इसी जगह उठाते हैं। कोरोना के बारे में घर के बाहर बरती जाने वाली सावधानियों पर तो दर्जन भर से अधिक बार हम लिख चुके हैं, लेकिन परिवार के भीतर आपस में भी लोगों को बहुत सावधान रहने की जरूरत है। यह बात लिखते हुए हमें अच्छी तरह मालूम है कि देश की तीन चौथाई आबादी के पास तो ऐसी सावधानी बरतने की अधिक गुंजाइश नहीं है क्योंकि वे बहुत छोटे-छोटे घरों में रहते हैं, और वहां एक-दूसरे से परहेज की गुंजाइश बड़ी सीमित रहती है। लेकिन वहां पर भी यह सावधानी बरती जा सकती है कि एक से अधिक लोग एक वक्त में आसपास बैठकर न खाएं, क्योंकि खाते हुए मास्क तो उतरना ही है, और आपस में बातचीत करते हुए मुंह से खाने और थूक के छींटे तो उड़ते ही हैं। रसोई में एक घड़े में या एक फ्रिज में, खाने-पीने के दूसरे सामानों में हाथ लगते ही हैं। एक टॉवेल या एक नेपकिन, एक सिंक या एक नल को कई लोग छूते हैं। छोटे घरों में यह खतरा और अधिक रहता है।
आज ही एक खबर आई है कि 80 बरस से अधिक उम्र के 17 लोग एक जगह अपने एक साथी का जन्मदिन मनाने इक_ा हुए, वे लोग वैसे तो मास्क लगाए हुए थे, लेकिन उन्होंने खाते-पीते वक्त मास्क हटा दिए थे। अब ये सारे के सारे 17 बुजुर्ग कोरोना पॉजिटिव निकले हैं। अब आज ऐसे वक्त में क्यों तो इतने लोगों को किसी दावत में शामिल होना चाहिए, और क्यों एक साथ खाना-पीना चाहिए? लेकिन कोरोना को लेकर जो दहशत थी, वह अब धीरे-धीरे डर में बदली, और उसके बाद अब वह लापरवाही में बदल रही है। लोगों को लग रहा है कि डर-डरकर क्या जीना। लोग अब धीरे-धीरे साफ-सफाई, और सावधानी से थकते चले जा रहे हैं, और उसे फिजूल का मान रहे हैं। हर किसी के आसपास कुछ ऐसी मिसालें हैं कि बिना किसी बाहरी संपर्क वालों को भी कोरोना हो गया, ऐसे में सावधानी रखकर क्या फायदा? यह तर्क कुछ इसी तरह का है कि सिगरेट-तम्बाकू से परे रहने वाले लोगों को भी कैंसर हो गया है, तो फिर सिगरेट से परहेज से क्या फायदा?
ऐसे लापरवाह दौर में लोगों को बहुत अधिक सावधानी बरतने की जरूरत इसलिए भी है कि दुनिया भर के बहुत से विशेषज्ञों का यह भी मानना है कि हिन्दुस्तान में कोरोना अभी और आगे बढ़ेगा। मतलब यह कि अभी तक जो खतरे नहीं आए हैं, वे खतरे और भी आ सकते हैं। अस्पतालों में बिस्तर नहीं बचे हैं, और सच तो यह है कि अगर निजी अस्पतालों में जाने की नौबत आई, तो इस देश के 99 फीसदी लोगों की क्षमता भी पूरे परिवार के निजी इलाज की नहीं है। ऐसे में बचाव ही अकेला इलाज है, और बचाव से परे सिर्फ खतरा ही खतरा है। अपने लिए न सही तो घरबार के दूसरे लोगों के लिए, अपने दफ्तर और कारोबार के दूसरे लोगों के लिए सावधानी बरती जाए। अब जब सावधानी से थकान बढ़ती जा रही है, तो खतरे भी बढ़ते जा रहे हैं, और यही वजह है कि हिन्दुस्तान में कल एक दिन में 80 हजार से अधिक कोरोना पॉजिटिव निकले, जो कि दुनिया में एक रिकॉर्ड रहा।
हम यहां कोई भी ऐसी बात नहीं लिख रहे हैं जो लोगों को खुद होकर न मालूम हो, हम बस लोगों को अधिक सावधान भर कर रहे हैं, और उन्हें अपने दायरे के बारे में सोचने कह रहे हैं कि वे संक्रमण से बचने के कौन से तरीके इस्तेमाल कर सकते हैं। (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)
एक अमरीकी प्राध्यापक और विज्ञान कथा लेखक इसाक एसिमोव के लिखे या कहे हुए वाक्य अक्सर इधर-उधर उनके नाम के साथ दिखते हैं, और चोरी के शौकीन लोग उनकी कही बातों को अपने नाम के साथ भी खपाते रहते हैं। उन्होंने करीब पांच सौ किताबें लिखी हैं, या संपादित की हैं, और उनकी लिखी हुई करीब 90 हजार चिट्ठियां प्रकाशित हैं। अमरीका में पढ़ाने वाले इस रूसी मूल के विज्ञान-शिक्षक का लिखा हुआ एक वाक्य आज फिर हमारी नजरों के सामने आया है। उन्होंने लिखा था- जिंदगी का सबसे दुखद पहलू यह है कि विज्ञान इतनी रफ्तार से ज्ञान जुटा लेता है, जिस रफ्तार से समाज समझ नहीं जुटा पाता।
हम इस अखबार में और इसके अलग-अलग कॉलम में पहले भी कई बार ज्ञान और समझ को लेकर लिख चुके हैं। बहुत से लोग बहुत पढ़े-लिखे लोगों को ज्ञानी मान लेते हैं, और फिर ज्ञानियों को समझदार मान लेते हैं। इन दोनों का जाहिर तौर पर कोई रिश्ता नहीं होता है। दुनिया के अलग-अलग लाखों आदिवासी इलाकों में बसे हुए लोगों में बहुत सी जातियां ऐसी हैं जिन्होंने पढ़ा कुछ भी नहीं क्योंकि वे अशिक्षित हैं, और शहरी जुबान में कहें तो वे ज्ञान से दूर हैं। लेकिन उनकी समझ किसी भी शहरी की समझ के मुकाबले अधिक तगड़ी या अधिक इंसाफपसंद हो सकती है, आमतौर पर होती है। वे कुदरत और दूसरे प्राणियों के लिए रहमदिल होते हैं, और प्राकृतिक न्याय पर अपार भरोसा भी करते हैं, अमल भी करते हैं। अपनी जरूरत से अधिक इकट्ठा नहीं करते हैं, और दूसरा को देखकर किसी हीनभावना या भड़ास में भी नहीं जीते हैं। अपनी महिलाओं को शहरियों के मुकाबले अधिक बराबरी का दर्जा देते हैं। वे शहरी ज्ञान से दूर हैं, लेकिन गहरी समझ से लैस हैं।
इस बुनियादी समझ के साथ इस मुद्दे से थोड़ा हटकर सोचें तो आज की शहरी और आधुनिक दुनिया में ऐसी बहुत सी चीजें हो रही हैं जो कि अपनी जरूरत से खासी अधिक रफ्तार से घट रही हैं। एक वक्त लोगों के पास, खासकर संपन्न लोगों के पास एक रिकॉर्ड प्लेयर होता था, और गिने-चुने रिकॉर्ड होते थे। घर के लोग इक_े होकर, या मेहमान के आने तक कोई रिकॉर्ड बजाते थे, और तीन मिनट तक सारे लोग ध्यान से उस संगीत को सुनते थे। जाहिर है कि जब सब एक साथ सुनते थे, तो उसके बाद उस पर चर्चा भी करते थे। अब एक माइक्रोचिप में कई घंटों का संगीत आ जाता है, या कई दिनों तक लगातार अलग-अलग बजने वाला संगीत आ जाता है, लेकिन लोगों का सुनना कम हो गया है। पहले लोगों के पास गिनी-चुनी किताबें रहती थीं, और एक-दूसरे से लेन-देन करके भी पढ़ते थे, आज इंटरनेट पर लाखों-करोड़ों किताबें मुफ्त में हासिल हैं, लोग छोटे से किंडल पर हजारों किताबें लेकर उसे जेब में डालकर चलते हैं, लेकिन पढऩा कम हो गया है। ठीक उसी तरह ज्ञान बढ़ते चल रहा है, विज्ञान बढ़ते चल रहा है, लेकिन उसके साथ उस अनुपात में समझ नहीं बढ़ रही है। आज लोग बिना समझे हजारों तस्वीरें, सैकड़ों वीडियो, और लाखों पन्ने कम्प्यूटर पर सेव कर लेते हैं, लेकिन उनका इस्तेमाल घट गया है।
आज ही एक बहुत पुरानी तस्वीर सैकड़ों बार नजरों के सामने से आने के बाद एक बार फिर सामने आई। एक जापानी बच्चा खड़ा हुआ है, और उसकी पीठ पर उसके छोटे भाई की लाश टंगी हुई है। वह जापान के नागासाकी का बच्चा है, और अमरीका द्वारा वहां पर गिराए गए हाइड्रोजन बम से मारे गए लोगों में से एक यह छोटा बच्चा भी था। अपने छोटे भाई की लाश को लिए हुए वह अंतिम संस्कार के लिए एक लंबा सफर कर रहा है। इस उम्र में अगर यह जापानी बच्चा पढ़ा भी होगा, तो भी बहुत अधिक नहीं पढ़ा होगा। और अमरीका के बड़े-बड़े वैज्ञानिक जिन्होंने हाइड्रोजन बम बनाया, जिन्होंने हवाई जहाज से लेकर उस बम को जापान पर गिराया, और अमरीकी सरकार में बैठे हुए लोग जिन्होंने इस हमले का फैसला लिया, वे तमाम लोग तो इस जापानी बच्चे के मुकाबले हजार-लाख गुना अधिक पढ़े हुए होंगे, लेकिन उन अमरीकियों की समझ महज इतनी थी कि उन्होंने बम बनाया, गिराने का फैसला लिया, जाकर गिराया, और लाखों को मार डाला। दूसरी तरफ यह बच्चा अपने बचपन में ही अपने छोटे भाई के अंतिम संस्कार के लिए उसकी लाश पीठ पर बांधे हुए एक लंबे पैदल सफर पर निकला हुआ है। इस बच्चे की हालत को देखें, उसकी दिमागी हालत को देखें तो दिल हिल जाता है। उसकी समझ इतनी गजब की है कि वह छोटे भाई के एक उचित अंतिम संस्कार का जिम्मा भी इतनी जिम्मेदारी के साथ उठा रहा है। तो पश्चिम का वह ज्ञान कहां काम आया, और जापान के इस बच्चे की बिना ज्ञान की समझ किस हद तक काम आ रही है, कितनी बड़ी मिसाल का इतिहास दर्ज कर रही है, यह सोचने लायक है।
ज्ञान एक अहंकारी शब्द हो गया है, अहंकार हो गया है, बददिमाग हो गया है, और हमलावर हो गया है, वह बेइंसाफ भी हो गया है, बेरहम तो है ही। दूसरी तरफ इस ज्ञान की किसी भी जरूरत के बिना समझ एक ऐसा छोटा सा आसान शब्द है जो कि ऊपर लिखे गए ज्ञान के तमाम विशेषणों से दूर है। लोग आम बोलचाल की जुबान में कहते हैं- पढ़े-लिखे समझदार हो, फिर भी ऐसी बात कहते हो। जबकि ये दो बातें एक-दूसरे से बिल्कुल अलग हैं, पढ़ा-लिखा होना और समझदार होना इनका कोई रिश्ता नहीं है। आज जब लोग अपने बच्चों को यह दुआ देते दिखते हैं कि खूब पढ़ो-लिखो, खूब कामयाब बनो, तो थोड़ी सी हैरानी भी होती है कि क्या समझदारी की बात यह नहीं हुई होती कि खूब समझदार बनो, खूब अच्छे इंसान बनो?
ज्ञान को नापना-तौलना कुछ आसान है। लोग किसी के बारे में उसका ज्ञान बताते हुए आसानी से गिना सकते हैं कि उसने कौन-कौन सी डिग्रियां हासिल की हैं। हिन्दुस्तान के एक नेता श्रीकांत जिचकर के बारे में कहा जाता है कि वे देश में सबसे अधिक डिग्रियां पाने वाले व्यक्ति थे। उन्होंने विश्वविद्यालयों की 42 परीक्षाओं में शामिल होकर 20 डिग्रियां हासिल की थी, और देश में सबसे कमउम्र, 26 बरस में विधायक बनने वाले व्यक्ति थे। उनकी डिग्रियों की लंबी लिस्ट देखने लायक है। ज्ञान का ऐसा मूर्त रूप होता है कि उसे गिना, नापा, तौला जा सकता है। दूसरी तरफ समझ एक अमूर्त चीज होती है। लोगों को यह आसानी से पता ही नहीं चलता कि दूसरे कौन लोग कितने समझदार हैं, या खुद कितने नासमझ हैं। इसलिए यूनिवर्सिटी की डिग्री का महत्व अधिक मान लिया जाता है क्योंकि वह आंखों से दिखती है, लेकिन लोगों की समझदारी का महत्व नहीं माना जाता क्योंकि वह आंखों से परे की बात रहती है।
आज ज्ञान-विज्ञान छलांग लगा-लगाकर आगे बढ़ रहे हैं, लेकिन लोगों की समझ, लोगों के सरोकार, अंग्रेजी में कहें तो लोगों की विज्डम की रफ्तार बड़ी धीमी है, इससे होता यह है कि जिस तरह किसी नौसिखिए मोटरसाइकिल-चालक के हाथ अंधाधुंध रफ्तार की मोटरसाइकिल लग जाए और उसे अंधाधुंध ट्रैफिक के बीच चलाना पड़े, उसी तरह ज्ञान-विज्ञान के औजार-हथियार इतनी तेजी से आ रहे हैं कि उन्हें इस्तेमाल करना सीखने का भी मौका लोगों के पास नहीं है। नतीजा यह है कि समझ ज्ञान से 20 स्टेशन पीछे चल रही है। एक और अजीब सी दिक्कत यह भी है कि अंग्रेजी की कई डिक्शनरियों में विज्डम की परिभाषा में ज्ञान को भी जोड़ लिया गया है, और कई लोग इन दोनों को एक-दूसरे का विकल्प इसलिए भी मान बैठते हैं। (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)
यूं तो सुशांत राजपूत की मौत के मामले में लोगों का पढऩे का बर्दाश्त खत्म हो चुका होगा, और हम इस मौत के बारे में लिख भी नहीं रहे, लेकिन इस मौत से जुड़े हुए जो इंसानी मिजाज सामने आ रहे हैं, हम उनके बारे में लिखना चाहते हैं जो कि किसी और केस में भी सामने आ सकते हैं। एक कामयाब सितारे की भूतपूर्व दोस्त या प्रेमिका, उसकी ताजा प्रेमिका, आसपास के लोग, और नाहक ही बदनाम किए जाने वाले गिद्धों की तरह मंडराने वाला मीडिया। इन सबको देखें तो लगता है कि लोगों को किसी प्रेमसंबंध में पडऩे के पहले, या किसी से दोस्ती करने के पहले बहुत सी बातों के बारे में सोचना चाहिए। वक्त निकल जाता है लेकिन बीते वक्त में दर्ज बातें टेलीफोन और कम्प्यूटर के तरह-तरह के रिकॉर्ड से कहीं नहीं निकल पातीं, और आगे चलकर वे सुबूत भी बन जाती हैं, और बदनामी की जड़ भी।
सुशांत राजपूत के मामले को देखें, या इस किस्म के और बहुत से दूसरे चर्चित मामलों को देखें, तो यह समझ पड़ता है कि लोग अच्छे वक्त अपने करीबी लोगों पर भरोसा करके उनके साथ जिन बातों को बांटते हैं, वे बातें उन लोगों के चाहे-अनचाहे किसी भी दिन जांच एजेंसियों के हाथ लग सकती हैं, मीडिया के हाथ लग सकती हैं, और वे खुद भी दूसरे लोगों को इन्हें बांट सकते हैं। इसलिए अंतरंगता के दौर में अपनी नाजुक और कमजोर बातों को दूसरों के साथ बांटने के पहले सुशांत की मौत के मामले में जांच एजेंसी से निकलकर फैलने वाली बातों को भी देख लेना चाहिए, और टीवी पर इंटरव्यू देने के लिए बेताब करीबी लोगों को भी सुन लेना चाहिए।
यह मौत बताती है कि किस तरह महीनों और सालों पहले के गड़े मुर्दों को उखाड़ा जा रहा है, और उखाड़ा जा सकता है। मीडिया आज उत्तरप्रदेश में इस कहानी की किरदार एक युवती के स्कूल तक पहुंच रहा है, और सुशांत की स्कूल तक भी जा रहा है। पिछले साल-छह महीने की घटनाओं से उपजी यह मौत आज जिंदगी की उतनी पुरानी कब्रों को भी खोद रही है। लोगों के फोन को जांच एजेंसियां परख रही हैं, और देश के कड़े कानून के मुताबिक महज सुबूत जुटाने के लिए, सुराग पाने के लिए कॉल रिकॉर्ड और मैसेज देखे जा सकते हैं, लेकिन आज तो जांच किसी किनारे पहुंची नहीं है, और इस मौत से जुड़े तमाम लोगों के एक-एक संदेश मीडिया में छप रहे हैं। एक बार कोई चर्चित हो जाए तो उसकी जिंदगी की निजता तो खत्म कर ही दी जाती है, उसके आसपास के लोगों के साथ भी यह सुलूक होता है। इसलिए चर्चित, या गैरचर्चित, आप जैसे भी हों, आपके आसपास के लोग जैसे भी हों, उनसे कुछ भी बांटते हुए यह कल्पना कर देखें कि वे बातें अगर पोस्टर बनकर सडक़ किनारे की दीवारों पर चिपक जाएंगी, तो आपका सुकून कितना बचेगा, कितना बर्बाद होगा।
आज अगर कोई सभ्य या विकसित देश होता जहां देश के कानून की इज्जत होती, तो वहां यह सवाल भी उठता कि सुशांत के करीबी लोगों के दूसरे परिचित लोगों की जिंदगी की निजता को खत्म करने का हक जांच एजेंसियों को किसने दिया है, और मीडिया को किसने दिया है। आज ही एक दूसरी खबर यह कहती है कि देश की सबसे बड़ी जांच एजेंसी एनआईए के एक भूतपूर्व अफसर के खिलाफ जुर्म दर्ज हुआ है क्योंकि उसने अपने कामकाज के दौरान किसी भी केस से संबंध न रखने वाले किसी फोन नंबर के कॉल डिटेल्स निकलवाए थे जो कि कानून के तहत जुर्म है। आज जब यह खबर छप रही है उसी वक्त सुशांत राजपूत की मौत की जांच करती सीबीआई के अफसरों के नाम से मीडिया में ऐसे सवालों की लिस्ट छप रही है कि सीबीआई ने सुशांत की करीबी रही एक अभिनेत्री से क्या-क्या सवाल किए। एक बहुत बड़े मीडिया संस्थान के टीवी की आज की ही सुर्खी उसकी वेबसाईट पर टंगी है कि सीबीआई के किस सवाल से इस अभिनेत्री के माथे पर पसीना छलक आया! अब क्या सीबीआई चौराहे या फुटपाथ पर टीवी कैमरों के सामने पूछताछ कर रही है जिसमें सवाल से माथे पर आने वाले पसीने के दर्शन हो रहे हैं? यह पूरा सिलसिला बहुत ही घातक है। सार्वजनिक जीवन के चर्चित लोग कुछ सीमा तक तो अपनी निजता खो बैठते हैं, लेकिन उनके आसपास के लोग, और इन लोगों के पास-दूर के लोग, जितने लोगों की निजता खत्म हो रही है, वह पूरी तरह से गैरकानूनी काम है, जुर्म है, और हमारी समझ से अदालत उस पर सजा भी दे सकती है।
इस मामले से जुड़े हुए जो कई पहलू आज फिर इस पर लिखने को बेबस कर रहे हैं, उनमें सबसे बड़ा तो निजी संबंधों में राज बांटने का है। लोगों को इस मामले का हाल देखकर यह समझ लेना चाहिए कि उनका क्या हाल हो सकता है, उनके आसपास के लोगों का क्या हाल सकता है, अगर वे किसी जांच के घेरे के आसपास कुछ मील की दूरी तक भी दिखेंगे। यह सिलसिला खुद जांच एजेंसियों के सोचने का है कि उनके हवाले से किस तरह के राज छप रहे हैं, अगर वे सच हैं तो भी फिक्र की बात है क्योंकि किसी की निजी जिंदगी का भांडाफोड़ करने का हक कानून भी सीबीआई को नहीं देता। आज एनआईए के रिटायर्ड अफसर के खिलाफ जिस तरह का जुर्म दर्ज हुआ है, उसे भी जांच अफसरों को याद रखना चाहिए। मीडिया को भी यह सोचने की जरूरत है कि देश की प्रेस कौंसिल ने कल एक लंबा बयान जारी करके मौत के इस चर्चित मामले के कवरेज को लेकर मीडिया को उसकी जिम्मेदारी, और उसकी सीमाएं याद दिलाई हैं।
हम इस मौत पर कुछ भी लिखना नहीं चाहते, लेकिन इस मौत से जो सवाल उठ रहे हैं, उन सवालों की चर्चा इसलिए जरूरी है कि इनमें से एक या कई सवाल बहुत से दूसरे मामलों को लेकर भी उठने की नौबत आ सकती है, और वह न आए तो बेहतर होगा। (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)
उत्तरप्रदेश की एक ताजा घटना अभी एक टीवी चैनल के वेबसाईट पर पढऩे मिली जिसमें वॉट्सऐप पर हुई गोष्ठी के चलते एक मुस्लिम युवती अपने वॉट्सऐप-प्रेमी से शादी करने के लिए तीन सौ किलोमीटर अकेले सफर करके उसके घर पहुंच गई, और वहां जाकर उसे पता लगा कि वह लडक़ा तो उससे पांच बरस छोटा है, और नाबालिग है। उसकी बहुत सी तस्वीरें भी इस वेबसाईट पर आई हैं जिनमें वह एकदम गरीब इस परिवार के घर के बाहर खाट पर डेरा डालकर बैठ गई है, और वह अपने इस फेसबुक-प्रेमी के बड़े भाई से भी शादी करने को तैयार है, इस्लाम छोडक़र हिन्दू बनने को तैयार है लेकिन वह अपने घर जाना नहीं चाहती क्योंकि वहां सौतेली मां है जो उसे प्रताडि़त करती है।
एलएलबी कर रही एक युवती की यह कहानी हैरान करती है, और दिल भी दहलाती है कि लोग बिना कुछ देखे-समझे, बिना किसी जानकारी के किस तरह पूरी जिंदगी किसी के साथ गुजारने के लिए न सिर्फ तैयार हो जाते हैं बल्कि आमादा भी हो जाते हैं। सोशल मीडिया पर होने वाले रिश्तों की कहानी आसानी से मैसेंजर सर्विसों तक पहुंच जाती है, और फिर फोटो-वीडियो का लेन-देन हो जाता है, अंतरंग पलों की रिकॉर्डिंग हो जाती है, और अनगिनत मामलों में ब्लैकमेल की नौबत आ जाती है, हत्या या आत्महत्या हो जाती है। इस नौबत को देखकर यह समझना जरूरी है कि ऐसा लापरवाह मिजाज आखिर होता कैसे है?
हिन्दुस्तान में तो एक बहुत बड़ी वजह यह है कि देश के बहुत बड़े हिस्से में अभी भी जवान लडक़े-लड़कियों का मिलना-जुलना बहुत आसान नहीं है। महानगरों, और दूसरे शहरों तक तो लडक़े-लड़कियां मिल लेते हैं, लेकिन जहां बात छोटे शहरों या कस्बों की आती है, तो बेचैन और बेकरार दिल इसी तरह टेलीफोन और इंटरनेट के सहारे जीते हैं, और जब ऐसा जीना मुमकिन नहीं रह जाता तो साथ मर जाते हैं। इंटरनेट की दोस्ती कब मोहब्बत में तब्दील हो जाती है, और कब जिंदगी के राज, जिंदगी के नाजुक पल दूसरे के साथ बंटना शुरू हो जाते हैं, वह भी पता नहीं चलता। जिस तरह एक पहाड़ी नदी ऊंचाई से नीचे पहुंचते हुए चट्टानों से टकराते बेतहाशा रफ्तार पकड़ लेती है, कुछ वैसी ही बात ताजा-ताजा मोहब्बत के साथ होती है, आंखें और अक्ल दोनों बंद हो जाते हैं, किसी बुरे वक्त के बारे में सोचना बंद हो जाता है, और लोग मोबाइल-कैमरों के सामने तन-मन खोलकर बैठ जाते हैं, और हत्या-आत्महत्या की नौबत का सामान बन जाते हैं। यह पूरा सिलसिला टेक्नालॉजी का मामला तो कम है, समाज में लोगों के मिलने-जुलने पर जो रोक-टोक है, उससे उपजा हुआ अधिक है।
दुनिया के जिन देशों में हमउम्र लोगों के साथ उठने-बैठने पर, साथ रहने पर, साथ जीने और घूमने पर रोक नहीं रहती है, वहां इस किस्म की नौबत कम आती है, या हो सकता है कि न भी आती हो। जहां लोगों को अपनी पसंद के जीवन-साथी के साथ रहने मिलता है, वहां शायद इस किस्म की अपरिपक्व हरकत भी कम होती होगी। लेकिन हिन्दुस्तान ऐसा देश है जहां ऑनरकिलिंग के नाम पर अपने ही बच्चों को उनके प्रेमी-प्रेमिका के साथ सार्वजनिक रूप से मार डालकर लोग फख्र महसूस करते हैं कि उन्होंने खानदान की इज्जत बरकरार रखी। हिन्दी फिल्में भी ऐसे तानाशाह, अकबर-मिजाजी जल्लाद बाप की कहानियों से भरी रहती हैं जिनमें बच्चों को मर्जी से जीने नहीं दिया जाता। फिल्में समाज से प्रेरित होकर बनती है, और समाज फिल्मों से प्रेरित होता है, और मां-बाप ऐसे ही फिल्मी किरदार बनने के लिए एक पैर पर खड़े रहते हैं जो नापसंद बहू को घर से निकाल दें, या नापसंद दामाद को बेटी सहित मार ही डालें।
हिन्दुस्तान में नौजवान पीढ़ी इस कदर भड़ास में जीती है कि जिसकी कोई हद नहीं। लडक़े-लड़कियों का साथ पढऩा मुश्किल, साथ घूमना-फिरना मुश्किल, मां-बाप टेलीफोन तक की जासूसी पर उतारू, वेलेंटाइन डे या फ्रेंडशिप डे पर धर्मान्ध साम्प्रदायिक संगठन बाग-बगीचों में पीटने को तैयार, और वहां मौजूद पुलिस वहां से भगाने को तैयार। कुल मिलाकर देश का माहौल जवान हसरतों को जिंदा रहने देने के बहुत ही खिलाफ है। लोग अपने बच्चों के लिए कॉलेज पहुंच जाने पर भी आगे की पढ़ाई तय करते हैं, उनके टी-शर्ट का रंग पसंद करते हैं, लड़कियों के घर आने-जाने का वक्त एक कडक़ चौकीदार की तरह तय करते हैं। ये ही तमाम वजहें हैं कि अपने घर से थके हुए लडक़े-लड़कियां आपा खोकर फैसला लेते हैं, कहीं किसी के साथ जीने के लिए चले जाते हैं, तो कहीं किसी के साथ मरने के लिए।
हम इस मुद्दे पर लिख तो रहे हैं, लेकिन इसका कोई आसान इलाज हमारे पास नहीं है। फिर यह भी समझने की जरूरत है कि यह बात महज नौजवान पीढ़ी तक सीमित नहीं है, हर दिन ऐसी कई खबरें रहती हैं जिनमें शादीशुदा लोग भी जीवन-साथी से परे किसी और के साथ रिश्ता शुरू कर लेते हैं, बातचीत फेसबुक से शुरू होती है, और बाद में उन्हें किसी बंद कमरे से पीट-पीटकर निकालते हुए वीडियो चारों तरफ फैलते हैं। हिन्दुस्तानी अधेड़ लोगों ने भी फेसबुक जैसे सोशल मीडिया के रास्ते घर बैठे ऐसे संबंध बनने की बात कभी सोची नहीं थी, समाज में ऐसा कुछ आसान नहीं था, और आजकल अपने जीवन-साथी से थके हुए या निराश लोग बड़ी संख्या में ऐसे ऑनलाईन रिश्तों में पड़ जाते हैं क्योंकि ऑनलाईन एक-दूसरे की खूबियां ही खूबियां दिखती हैं, खामियां तो लोग मामूली समझदारी से ही छुपाए रख जाते हैं।
अब एलएलबी की एक छात्रा अपना परिवार और अपना धर्म छोडक़र महज वॉट्सऐप-दोस्ती के रास्ते एक अनजान परिवार में शादी के लिए पहुंच जाती है, और प्रेमी के नाबालिग निकलने पर उसके भाई से भी शादी करके वहीं रहना चाहती है। यह सिलसिला भयानक है, नौजवान पीढ़ी को अधिक परिपक्व होने की जरूरत है, और उनके मां-बाप को, उनके भाई-बहनों को यह समझ आना जरूरी है कि लोग अपनी मर्जी से भी जीना चाहते हैं। प्रेम-संबंधों में नाकामयाब होने पर अनगिनत हत्या-आत्महत्या होती हैं, और प्रेम कामयाब रहने पर भी अगर उसके शादी में बदलने में कामयाबी नहीं मिलती, तो भी ऐसी ही किस्म की हिंसा होती है। इस देश के समाज को सार्वजनिक परामर्श की जरूरत है, पूरी की पूरी आबादी को अगली पीढ़ी के हक की इज्जत करना सिखाने की जरूरत है। जब तक ऐसा नहीं होगा, नई पीढ़ी घुट-घुटकर जिएगी, और घुट-घुटकर ही मर जाएगी। समाज की ऐसी सोच के खिलाफ लोगों को खुलकर सार्वजनिक बातचीत करनी चाहिए।
हिन्दुस्तान का मीडिया और सोशल मीडिया दोनों अलग-अलग, और मिलकर भी विजय तेंदुलकर का एक नाटक खेल रहे हैं, शांतता कोर्ट चालू आहे। कई दशक पहले यह नाटक खूब खेला जाता था, और उसकी जितनी सीमित याद अभी है, उसके मुताबिक किसी जगह एक रात फंस जाने, और वक्त गुजारने को मजबूर लोगों की एक टोली एक खेल खेलती है। एक अदालत का सीन गढ़ा जाता है जिसमें कोई जज, कोई वकील, और कोई आरोपी बन जाते हैं। एक महिला को आरोपी बनाया जाता है, और उसके बाद उसके खिलाफ केस साबित करने के नाटक में वकील बना व्यक्ति, और शायद गवाह भी अपने मन की सारी भड़ास, अपनी सारी कुंठाएं उसके खिलाफ निकालते हैं, और उसे बदचलन साबित करने की कोशिश करते हैं। खेल-खेल में खेला गया यह नाटक उस महिला को कटघरे में तोड़ देता है। विजय तेंदुलकर के लिखे इस नाटक का बस इतना ही जिक्र यहां काफी है।
हिन्दुस्तान इन दिनों जिस अकेले नाटक को खेल रहा है, सुशांत राजपूत की मौत नाम का यह नाटक अंतहीन चल रहा है। देश के मीडिया को इसमें एक रोजगार मिल गया है, जिंदा रहने का एक रास्ता मिल गया है, देश की तमाम कुंठाग्रस्त आबादी, सेक्सवंचित लोगों को यह मुद्दा मिल गया है जिसमें यह एक खूबसूरत और मादक अभिनेत्री को प्यार, सेक्स, और बेवफाई के साथ-साथ मौत से रिश्ते के जुर्म में भी घेर पा रहे हैं। मीडिया के हमलावर तेवर इस हद तक चले गए हैं कि इस अभिनेत्री की इमारत में कहीं खाना पहुंचाने आए कूरियर एजेंसी के लडक़े को 15 टीवी कैमरे घेरे हुए हैं, और उससे उसका नाम जानना चाहते हैं, यह जानना चाहते हैं कि उस अभिनेत्री ने खाने क्या बुलाया है, और वह लडक़ा कहे जा रहा है कि वह जानता भी नहीं है कि वे किसके बारे में पूछ रहे हैं। टीवी-मीडिया का यह हमलावर दस्ता उस अभिनेत्री को खलनायिका साबित करने को एक राष्ट्रवादी कर्तव्य मानकर, बिहार के आने वाले चुनाव में मृतक अभिनेता को शहीद का दर्जा दिलाने के तेवरों के साथ इमारतों के बाहर टूटा पड़ा है, और स्टूडियो तो कहीं इस अभिनेत्री को काला जादू करने वाली साबित कर रहे हैं, तो कहीं बदचलन, कहीं बेवफा, कहीं हत्यारी, कहीं नशे की सौदागर, और कहीं अंडरवल्र्ड की हसीना, डॉन की साथी वगैरह-वगैरह।
और लोग विजय तेंदुलकर का नाटक असल जिंदगी में कैसे न खेलें? मुम्बई में एक फिल्म अभिनेता की मौत, जो कि पहली नजर में खुदकुशी लगती है, उसका किस्सा बढ़ते-बढ़ते हत्या की कहानी तक पहुंच गया, और फिर मृतक अभिनेता के गृहराज्य बिहार के पुलिस प्रमुख जिस अंदाज में महाराष्ट्र की पुलिस पर तोहमत लगा रहे हैं, वैसा तो शायद इस देश में इसके पहले कभी न हुआ हो, और इन दोनों प्रदेशों के बीच में दो बड़े-बड़े प्रदेश और न हुए होते, तो हो सकता है कि दोनों के बीच जंग छिड़ गई होती, हिन्दुस्तान-पाकिस्तान की तरह। जिस अंदाज में बिहार के डीजीपी एक अभिनेत्री के बारे में सार्वजनिक रूप से यह कहते कैमरे पर दिखे कि उसकी औकात क्या है कि वह बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पर कोई टिप्पणी करे, वह रूख भी लोकतांत्रिक भारत के किसी राज्य के पुलिस प्रमुख का न होकर विजय तेंदुलकर के नाटक के एक किरदार का था।
बॉलीवुड की किसी फिल्मी कहानी को भी फीका साबित करने वाली यह कहानी अनायास ही गढ़ गई हो, ऐसा तो नहीं लगता है। इस आजाद हिन्दुस्तान का इतना विशाल मीडिया जब इतने धार्मिक समर्पण के साथ एक मौत के पीछे की वजहें ढूंढने के बजाय, एक सेक्सी अभिनेत्री को कातिल, ड्रग डीलर, और भी जानें क्या-क्या साबित करने पर उतारू हो गया है, तो आज देश के नाजुक हालात के साथ मिलाकर इस मीडिया-रूख को समझने की जरूरत है। आज बिहार बाढ़ में डूबा हुआ है, दसियों लाख लोग बेघर हैं, देश कोरोना की मार से कराहता हुआ सरकारी अनाज की मदद पर बस जिंदा ही है, उससे अधिक कुछ नहीं, तो ऐसे में देश की बदहाली को ढांकने के लिए एक गोरी-सेक्सी अभिनेत्री की खाल उतारकर उससे देश की दिक्कतों को ढांक दिया गया है। क्या इतना सब कुछ अनायास और मासूम हो सकता है? हमारे पास इसके मासूम न होने के कोई सुबूत तो नहीं है, लेकिन ऐसा समझने की एक मामूली समझ जरूर है।
सेक्स से वंचित, उस भूख की वजह से कुंठित, और एक मादक महिला पर हमले के लिए मत चूको चौहान के ऐतिहासिक अंदाज में टूट पडऩे को आमादा हिन्दुस्तानियों से अधिक उपजाऊ जमीन ऐसी किसी कहानी के लिए और भला क्या हो सकती थी? नतीजा यह है कि जिस तरह झारखंड और छत्तीसगढ़ में किसी अकेली, बेसहारा, कमजोर महिला को घेरकर, उसे बदनीयत से टोनही या जादूगरनी करार देकर उसका कत्ल कर दिया जाता है, आज कुछ वैसी ही भीड़त्या का माहौल इस एक अभिनेत्री के खिलाफ बना दिया गया है। लोगों का, और सोशल मीडिया पर अच्छे-खासे समझदार दिखते चले आ रहे लोगों का रूख यह है कि कल जब एक समाचार चैनल ने इस अभिनेत्री को इंटरव्यू किया, उसका पक्ष जाना, उसकी बातें दिखाईं जिनमें वह यह भी कह रही है कि उसे लग रहा है कि वह आत्महत्या कर ले, तो इस टीवी चैनल के खिलाफ सोशल मीडिया पर लोगों का एक बहुत बड़ा हिस्सा टूट पड़ा है। उस चैनल से पूछा जा रहा है कि वह कितने में बिका, जिस टीवी-जर्नलिस्ट ने इस अभिनेत्री से बात की, उसे गालियां दी जा रही हैं, उसे भड़वा कहा जा रहा है। अब सवाल यह उठता है कि जिसके खिलाफ हफ्तों या महीनों से हर गंदी तोहमत लगाई जा रही है, क्या उसकी बात को सामने रखना गुनाह हो गया? उसकी बात तमाम तोहमतों पर सवाल खड़ा करती है, क्या इसीलिए वे बातें लोगों को अब सुनना भी बर्दाश्त नहीं है? क्या लोग अब शांतता कोर्ट चालू आहे की उस रात की तरह बस एक महिला के चरित्र पर अंतहीन हमले ही जारी रखना चाहते हैं? यह पूरा सिलसिला जो कल तक मीडिया के खिलाफ लिखने की वजह लग रहा था, आज उसके साथ-साथ एक और बड़ी वजह लिखने की यह बनी है कि तोहमतों से जख्मी किसी युवती की कराह सुनना भी क्या अब इस देश के लोगों को मंजूर नहीं है? यह अभिनेत्री अगर इस सिलसिले में तीसरी खुदकुशी बनती है, तो उसकी जिम्मेदारी मीडिया पर रहेगी, सोशल मीडिया पर रहेगी, या उसकी औकात गिनाने वाले एक सरकारी वर्दीधारी आईपीएस पर रहेगी, किस पर रहेगी?
हिन्दुस्तान का लोकतंत्र भेडिय़ों के एक झुंड सरीखा हो गया है, इसे गोश्त से भरा कोई बदन दिखा, तो यह उस पर टूट पड़ा। ऐसा लगता है कि सेक्स से भूखे इस देश में चूंकि 99.99 फीसदी मर्दों को ऐसी खूबसूरत युवती नसीब नहीं हो सकती, इसलिए उनके बागी तेवरों और तोहमतों के लिए मानो यह भी एक काफी वजह है। हिन्दुस्तानी लोकतंत्र से और परे जाकर देखें तो हिन्दुस्तानी समाज के भीतर की वह आदिम और हिंसक सोच आज पूरे हमलावर तेवरों के साथ ओवरटाईम कर रही है जो कि लोकतंत्र के हजारों बरस पहले थी, और आज लोकतंत्र को किनारे धकेलकर भीड़ की शक्ल में इस युवती को घेरना चाहती है, उसकी देह का एक हिस्सा चाहती है।
हाल के बरसों में किसी एक मामले में हिन्दुस्तान के लोगों के हिंसक मिजाज को इस हद तक उजागर किया हो, ऐसा याद नहीं पड़ता। अगर मीडिया, और सोशल मीडिया पर भाड़े के सैनिक देश को सोते-जागते इसी एक सेक्स-क्राईम थ्रिलर में बांधे रखना चाहते हैं, तो देश के असल मुद्दों से ध्यान हटाने की यह एक बड़ी कामयाब तरकीब रही है। बेरोजगार, बाढ़ से बेघर, भूखी देह इसके मुकाबले भला किसका ध्यान खींच सकती है? और एक बार सेक्स और क्राईम का यह नॉनस्टॉप सीरियल शुरू हो गया है तो देश में किसी इस बात की परवाह है कि वह डूबे बिहार के सुशासन बाबू को उनका जिम्मा याद दिला सके, उनकी देहरी पर तो एक वर्दीधारी, सबसे अधिक सितारों वाली वर्दी में उनका अफसर बाकी हिन्दुस्तान को औकात गिनाते खड़ा ही है। उधर ऊपर आसमान के और ऊपर विजय तेंदुलकर की आत्मा यह देखकर हैरान होगी कि किस तरह हिन्दुस्तान, पूरे का पूरा हिन्दुस्तान उनके शांतता कोर्ट चालू आहे का मंच बन गया है! (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)
भारत सरकार जिस तरह से बड़े कॉलेजों में दाखिले के इम्तिहान लेने पर अड़ी हुई है, और उसे उसकी जिद पर सुप्रीम कोर्ट का साथ भी मिल गया है, वह देश के लिए एक बड़ा खतरा हो सकता है। कोरोना-महामारी का पूरा असर पहले कभी किसी का देखा हुआ नहीं है इसलिए खतरे का अंदाज लगा पाना किसी के लिए भी मुमकिन नहीं है, सुप्रीम कोर्ट के लिए भी नहीं। इस खतरे का अहसास कराने के लिए कुछ छात्रों का यह कहना काफी होना चाहिए कि मां-बाप बड़ी बीमारियों के मरीज हैं, संक्रमण का खतरा उठाते हुए वे कैसे इम्तिहान देने जाएं?
कोरोना के खतरे ने इस देश और इसके प्रदेशों को दाखिला-इम्तिहान जैसे तरीके के बारे में एक बार और सोचने का मौका भी दिया है। छत्तीसगढ़ सरकार इस बरस बी.एड. जैसे कड़े दाखिला-इम्तिहान की जगह ग्रेजुएट या पोस्ट ग्रेजुएट इम्तिहानों में मिले नंबरों के आधार पर दाखिला देने की सोच रही है। देश को यह भी सोचना चाहिए कि आज बड़े कॉलेजों की हर दाखिला-परीक्षा की तैयारी के लिए देश में ऐसे कारखाने चल रहे हैं जहां आबादी के सबसे ऊंचे एक चौथाई लोग ही अपने बच्चों को भेज पाते हैं। बाकी तीन चौथाई की तो ऐसे मुकाबलों में संभावना ही नहीं रहती क्योंकि वे बराबरी की तैयारी की सरहद तक भी नहीं पहुंच पाते।
लोगों को याद होगा कि जब कोरोना का हमला हुआ तो राजस्थान के कोटा शहर में दाखिलों की तैयारी के कारखानों में किस तरह लाखों बच्चे थे और उन्हें राज्य सरकारों ने घर वापिस लाने के इंतजाम किए थे। हर बरस के दाखिला-इम्तिहान देश में सामाजिक असमानता की खाई को और गहरा, और चौड़ा कर देते हैं। और यह खाई महज एक पीढ़ी तक नहीं रह जाती, वह आने वाली तमाम पीढिय़ों के लिए हो जाती है। कोरोना ने एक मौका दिया है कि बड़े कॉलेजों, या बाकी कॉलेजों में भी दाखिले के तरीकों के बारे में फिर सोचा जाए। अभूतपूर्व हालात अभूतपूर्व तरीकों को भी पैदा करते हैं।
जानकार लोगों को एक ऐसा तरीका निकालना चाहिए कि स्कूली इम्तिहानों से लेकर कॉलेज के इम्तिहानों तक के चुनिंदा नंबरों को भी आगे के दाखिलों और नौकरियों में वजन मिले। यह महत्व मिले बिना पढ़ाई का महत्व खत्म हो चुका है और बस दाखिला-इम्तिहानों की ही अहमियत रह गई है। यह बात हिंदुस्तान को दुनिया के समझदार देशों के मुकाबिले हमेशा ही बहुत पीछे रखेगी। अगर स्कूलों के कुछ चुनिंदा बोर्ड इम्तिहानों और कॉलेज इम्तिहानों के औसत नंबरों को आगे दाखिले-नौकरी की पूर्व शर्त रखा जाए तो बच्चों की पढ़ाई की तरफ वापिसी हो सकती है।
फिलहाल आज की बात करें तो देश का माहौल बिल्कुल भी इन परीक्षाओं के लायक नहीं है। यह सामान्य जिंदगी नहीं है कि इतना बड़ा इंतजाम किया जा सके, और उससे संक्रमण न फैले। कल कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने अपने और साथी मुख्यमंत्रियों के साथ यह सही पहल की है। बाकी राजनीतिक दलों को भी इस बारे में सोचना चाहिए। यह सबकी राजनीतिक जिम्मेदारी का वक्त है। आज जो पार्टी जलते-सुलगते मुद्दों पर चुप रह जाएंगी वो इतिहास में गैरजिम्मेदार दर्ज होगी। आज की महामारी ने देश को जिस हद तक बर्बाद किया है, उसे और अधिक बढऩे देने के खतरे वाला कोई भी गैरजिम्मेदाराना काम नहीं करना चाहिए। कोरोना का टीका आने, सबको लगने में हो सकता है कि एक-दो और पन्द्रह अगस्त निकल जाए। टीके के लोकार्पण की जो हड़बड़ी आईसीएमआर दिखा रहा था, वह हड़बड़ी पढ़ाई के लिए दिखाना ठीक नहीं है। भारत की सबसे बड़ी चिकित्सा विज्ञान संस्था अपने फर्जी दावे के साथ जिस तरह औंधे मुंह गिरी है, वह नौबत भारत सरकार के शिक्षा मंत्रालय की नहीं होनी चाहिए। नाजुक मौके के बीच ऐसी दाखिल परीक्षा से दसियों लाख छात्र-छात्राएं और उनके परिवारों के करोड़ों लोग एक गैरजरूरी और भयानक खतरे में पड़ेंगे। (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)
रोज सुबह से कचरा ले जाने के लिए गाड़ी आती है, और छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर की तरह देश के और भी बहुत से शहरों में कचरा बाहर लाने के लिए गाना बजाती होगी। सामाजिक सरोकार रखने वाले कुछ जिम्मेदार लोगों ने ऐसे कार्टून बनाए और अपने बच्चों को समझाते भी हैं कि वे कचरे वाले नहीं हैं, वे सफाई वाले हैं, कचरे वाले तो लोग हैं जिनके घरों में इतना कचरा पैदा होता है कि जिसे ले जाने के लिए गाडिय़ों को दिन में कई फेरे लगाने पड़ते हैं।
अभी जब पिछले कुछ महीनों में लोगों के घरों में काम करने वाले कम रहे या नहीं रहे, तो उन्हें कचरे की बाल्टियां ले जाकर बाहर रखनी पड़ीं, और खाली बाल्टियां वापिस लानी पड़ीं। इतने में ही लोगों के होश उड़ गए कि इन बाल्टियों से कैसी बदबू आती है, और इनमें कहीं चीटियां भर जाती हैं, तो कहीं दूसरे कीड़े। अब उन लोगों की कल्पना करें जो दिन में कम से कम आठ घंटे ऐसी ही बाल्टियों को उठा-उठाकर कचरे की गाडिय़ों में पलटते हैं, अपने सिर से ऊपर तक उठाते हैं, और बाल्टियां वापिस गेट पर छोडक़र जाते हैं। बारिश के दिनों में इन बाल्टियों में पानी भर जाता है, और जब कचरा-गाड़ीवाले इन्हें पलटते हैं तो उनके ऊपर यह पानी गिरते भी रहता है।
यह तो फिर भी ठीक है, लेकिन शहरों में गटर सफाई करने वाले लोगों को जिस तरह गटर में उतरना पड़ता है, और कीचड़ के पानी में डुबकी लगाकर फंसे हुए कचरे को निकालना पड़ता है, उस जिंदगी की कल्पना करना भी उस तबके के बाहर के लोगों के लिए नामुमकिन है। और यह तबका हिन्दुस्तान में हिन्दू धर्म के भीतर सबसे ही हिकारत और नफरत के लायक माना गया दलित तबका है, दलितों में भी और नीचे के दलित जिन्हें कि सफाई के अलावा और किसी काम के लायक माना नहीं गया है।
अब पल भर के लिए कल्पना करें कि हिकारत के लायक समझी जाने वाली, अछूत मानी जाने वाली यह जाति खत्म हो जाए। लोगों के घरों का कचरा तो खत्म नहीं होगा, लोगों के मुहल्लों और शहरों की नालियां, उनके गटर तो खत्म नहीं होंगे, फिर क्या होगा? अगर तमाम दलित यह तय कर लें कि सफाई के जिस काम की वजह से उन्हें अछूत माना जाता है वह काम करना ही नहीं है, तो सफाईकर्मियों की ऐसी जातियां तो मेहनत का कोई दूसरा काम एक बार कर भी लेंगी, शर्तियां ही कर लेंगी, लेकिन लोग अपने कचरे और अपनी फंसी हुई नालियों का क्या करेंगे? उनका काम तो कचरा पैदा करने वाले लोगों, उनसे ऊंची जातियों के लोगों के बिना एक बार चल जाएगा, वे तो मनरेगा जैसी किसी सरकारी योजना में मिट्टी भी खोद लेंगे जो कि कचरा और गटर के मुकाबले बेहतर काम होगा, लेकिन बाकी हिन्दुस्तानी क्या करेंगे? वे अपना कचरा लेकर कहां जाएंगे? और घरों में, इमारतों में पखाने की टंकियां भर जाएंगी, तो क्या होगा? अलग-अलग इलाकों में गटर का पानी सडक़ों पर फैल जाएगा तो क्या होगा?
ऐसी नौबत के बारे में कुछ देर सोचना चाहिए, फिर गटर में काम करने वाले लोगों के हाल पर भी सोचना चाहिए, और फिर यह सोचना चाहिए कि उन्हें खुद यह काम करना पड़ा तो वे क्या कर पाएंगे? यह पूरा सिलसिला अब उन दिनों का नहीं रह गया है जब गंदगी साफ करने वाले लोगों के बिना भी ऊंची मानी जाने वाली जातियों के लोग पखाने के लिए गांव के बाहर खेत चले जाते थे, और नालियां खुली रहती थीं, गटर रहते नहीं थे, न पखाने होते थे न उनकी टंकियां। उन दिनों वैसे में तो सफाईकर्मियों के बिना काम चल जाता था, लेकिन अब क्या होगा? क्या सफाईकर्मियों के ऐसे मजबूत संगठन बन सकते हैं जो कि अपनी खतरनाक नौबत के मुताबिक अधिक मेहनताना और अधिक मुआवजा मांग सकें? और फिर इस बात का मुआवजा भी मांग सकें कि समाज की गंदगी को ढोने की वजह से उन्हें जिस सामाजिक बहिष्कार का सामना करना पड़ता है, उसके लिए भी तो गंदगी पैदा करने वाला समाज कुछ दे।
लेकिन जाति व्यवस्था और समाज व्यवस्था से परे भी एक बात समझने की जरूरत है। आज शहरों में, और खासकर संपन्न लोगों में जिस बड़े पैमाने पर कचरा पैदा किया जा रहा है, क्या उससे निपटना हमेशा के लिए मुमकिन हो पाएगा? आज छोटे-छोटे से सामान भी ऑनलाईन ऑर्डर करके बुलाए जा रहे हैं, और वे भारी-भरकम पैकिंग के भीतर आ रहे हैं। क्या इतनी पैकिंग के निपटारे के लिए कोई शहरी ढांचा बना हुआ है, या इतनी पैकिंग बनाने के लिए भी धरती पर काफी पेड़ हैं? ये तमाम बातें सोचना इसलिए जरूरी है कि कुछ लोगों को यह भी लग रहा है कि ऑनलाईन खरीदी से लोगों का बाजार जाना कम हो रहा है, और ईंधन बच रहा है, उसका प्रदूषण बच रहा है। हमारे पास अभी कोई वैज्ञानिक आंकड़े इस बात के नहीं हैं कि ईंधन कितना बच रहा है, और पैकिंग कितनी अधिक लग रही है, और इनमें से कौन सी बात धरती के लिए अधिक नुकसानदेह है। लेकिन यह बात तय है कि आज दुनिया की सरकारों को कारोबार पर नकेल कसकर यह देखना होगा कि पैकिंग कितनी गैरजरूरी हो रही है, और उसे कैसे कम किया जाना चाहिए। यह राज्यों को भी अपने स्तर पर देखना चाहिए कि उनकी जमीन पर चाहे स्थानीय बाजार में पहुंचने वाले सामान, या फिर ऑनलाईन ऑर्डर से कूरियर के मार्फत आने वाले सामान की पैकिंग कितनी है? हमने कई बरस पहले भी इसी जगह यह बात सुझाई थी कि स्थानीय सरकारों को अपने प्रदेश में एक गार्बेज टैक्स लगाना चाहिए जिसमें आई हुई पैकिंग का पूरा वजन हो, और उसके भीतर इस्तेमाल होने वाले सामान का भी वजन हो। जितना भी प्लास्टिक, पु_ा, या किसी और किस्म का पैकिंग मटेरियल आ रहा है, उस पर एक टैक्स लगाना चाहिए। हर बक्से या पैकेट पर यह लिखने का नियम रहे कि उसके भीतर इस्तेमाल के सामान का वजन कितना है। बाकी तो पूरा का पूरा कचरा बनकर उस प्रदेश पर बोझ रहेगा, और उस पर एक टैक्स लगाना चाहिए। हो सकता है कि केन्द्र सरकार के स्तर पर ऑनलाईन कंपनियों से लेकर बाजार में जाने वाले थोक सामान तक पर ऐसा एक टैक्स लग सके जिससे लोगों को यह भी समझ में आए कि गैरजरूरी पैकिंग एक गलत बात है, और उसके लिए टैक्स या जुर्माना लग रहा है। आज छोटे-छोटे से सामानों को सजावटी और आकर्षक दिखाने के लिए उनकी ढेर-ढेर पैकिंग की जाती है।
इस बात को लिखने का सीधा रिश्ता इस बात से है जिससे कि आज हमने यहां लिखना शुरू किया है। यह सारी गैरजरूरी पैकिंग कचरा भी बढ़ा रही है, और नालियों को चोक भी कर रही है, इन दोनों के चलते इस देश से कभी भी सफाई कर्मचारी कम नहीं होने वाले हैं, और जब तक उनका यह काम जारी रहेगा, तब तक यह जाति व्यवस्था भी कायम रहेगी। इसलिए कचरे को कम करने की जितनी जरूरत है, उतनी ही जरूरत कचरे के व्यवस्थित निपटारे की भी है ताकि वह धरती पर कम बोझ बने, और उसे उसका निपटारा करने वाले लोगों को वह इंसानों की तरह माने भी। धरती को बचाने, इंसानों को बचाने, और शहरी जिंदगी को बचाने के लिए इन तमाम बातों पर सोचने की जरूरत है। घर या दफ्तर, दुकान से ही, बाजार से ही कचरे को अलग-अलग करना शुरू हो, स्थानीय म्युनिसिपल अलग-अलग कचरे को अलग-अलग उठाए, उसका अलग-अलग निपटारा हो, और ऐसे में ही यह निपटारा करने वाले इंसान इंसान की तरह जी सकेंगे। आज पिछले पांच-छह महीनों में लॉकडाऊन से और कोरोना-सावधानी से लोगों को जैसी जिंदगी जीनी पड़ी है, वे यह सोचकर देखें कि छह हफ्ते भी अगर सफाई कर्मचारियों के बिना जीना पड़ा तो क्या होगा?
आज अपनी सेहत के लिए खतरा उठाकर, अमानवीय परिस्थितियों में गंदगी का काम करते हुए, सामाजिक बहिष्कार और छुआछूत झेलते हुए जो लोग इंसानी जिंदगी से गंदगी को कम कर रहे हैं, उनको इतना संगठित करने की जरूरत है कि वे अपने इस काम के लिए अतिरिक्त भुगतान पा सकें। वे तो दूसरी जातियों के लोगों का काम कर लेंगे, लेकिन उनके काम के लिए तो आरक्षण को कोसने वाली जातियों के पास भी कोई ऐसे लोग नहीं हैं जो सफाई में आरक्षण मांगें।
फिलहाल हर कोई अपने-अपने स्तर पर यह सोचे कि सुबह से उनके घर कचरा लेने आने वाले लोग भी इंसान हैं, और कैसे उन पर बोझ कम किया जा सकता है। हिन्दुस्तान में दक्षिण भारत में कई म्युनिसिपल ऐसी हैं जिन्होंने पिछले बरसों में बिना किसी खर्च के वैसी सफाई हासिल की है जैसी सफाई के लिए इंदौर जैसा शहर सैकड़ों करोड़ रूपए सालाना खर्च कर रहा है। देश के बाकी शहरों को भी ऐसी म्युनिसिपलों से कुछ सीखना चाहिए।
कांग्रेस के चाय के कप में आया तूफान थम गया दिखता है। हाल के बरसों में, या पिछले कुछ दशकों में पहली बार इस पार्टी के करीब दो दर्जन लोगों ने गैरचापलूसी का एक रूख दिखाया था, और वह रूख पार्टी पर कोई असर नहीं डाल पाया। कल कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक सुबह से शाम तक चली, और वह इस नतीजे पर खत्म हुई कि फिलहाल सोनिया गांधी पार्टी की अंतरिम अध्यक्ष बनी रहेंगी। इस पार्टी की सबसे ताकतवर कमेटी की बैठक भी अगले अध्यक्ष के बारे में न कुछ सोच पाई, न कोई तरीका सोच पाई, और चिट्ठी लिखने वालों के तरीकों के खिलाफ सोनिया से लेकर नीचे तक बहुत से नेताओं ने नाराजगी और असहमति जताई।
बहस के लिए हम यह मान भी लेते हैं कि जब चिट्ठी लिखने वाले 23 लोगों में से आधा दर्जन से अधिक लोग कांग्रेस कार्यसमिति के मेम्बर भी थे, जहां उनके पास इस बात को उठाने का मौका था, तो फिर शायद यह चिट्ठी इस मीटिंग के पहले मीडिया में पहुंचना एक अच्छी बात नहीं थी। लेकिन एक दूसरे नजरिए से देखें तो अजगरी अंदाज में चलती इस पार्टी का ध्यान खींचने के लिए सार्वजनिक रूप से कुछ ढोल बजाने में बुराई क्या थी? इस चिट्ठी में कोई आरोप नहीं लगाए गए थे, किसी को नाकामयाबी का जिम्मेदार नहीं बताया गया था, महज एक सकारात्मक बदलाव की बात की गई थी। तो क्या आज कांग्रेस पार्टी ऐसे मोड़ पर खड़ी है कि वह किसी सकारात्मक बदलाव की मांग करने वाले अपने ही दो दर्जन बड़े नेताओं की बात को बगावत मान रही है? अगर यह बगावत है, तो यह कांग्रेस पार्टी के हित में है। वह युग खत्म हो गया जब नेहरू-गांधी परिवार से परे की संभावनाओं को सोचने पर उसे हिन्दू धर्म का सबसे बड़ा पाप मान लिया जाता था। अब पार्टी को यह तय करना है कि उसे जिंदा रहना है, या मौजूदा लीडरशिप को पार्टी की अगुवाई में जिंदा रखना है? बहुत से संगठनों में एक वक्त ऐसी नौबत आ जाती है कि उसके नेता पार्टी को आगे ले जाने की अपनी क्षमता के सर्वोच्च स्तर तक पहुंच चुके रहते हैं, और वहां से आगे मशाल किसी और को ही ले जानी होती है। अब अगर पार्टी यह मानकर चले कि वे सोनिया या राहुल की अगुवाई में जहां तक पहुंचे हैं, उससे आगे जाने की पार्टी की कोई महत्वाकांक्षा नहीं है तो एक अलग बात है। आज सोनिया-परिवार के हिमायती दिग्विजय सिंह का बयान लीडरशिप की एक थोड़ी सी और संभावना वाला है। उन्होंने सोनिया और राहुल का नाम लेने के बजाय यह कहा कि कांग्रेस अध्यक्ष का पद गांधी परिवार में ही रहना चाहिए। इसका मतलब यह है कि वे प्रियंका गांधी की संभावनाओं को अनदेखा नहीं कर रहे हैं, फिर चाहे वे अभी शब्दों में उसे नहीं कह रहे हैं।
हमने कल भी इस बारे में लिखा था, इसलिए बहुत से तर्कों को आज एक दिन के भीतर यहां दुहराने का कोई मतलब नहीं है, लेकिन यह बात साफ है कि दो दर्जन बड़े नेता अगर इस चिट्ठी पर दस्तखत करने वाले हैं, तो कई दर्जन और बड़े नेता भी इस चिट्ठी के साथ होंगे, और अभी हवा का रूख देख रहे हैं, या पानी में एक पैर डालकर गहराई देख रहे होंगे। यह बात समझने की जरूरत है कि ये दो दर्जन नेता अगर कांग्रेस के विभाजन पर उतारू होते हैं, तो पार्टी का बड़ा नुकसान भी होगा। वे अगर पार्टी संविधान के मुताबिक अध्यक्ष के चुनाव पर अड़ते हैं, तो भी पार्टी के भीतर एक ढांचे के भीतर भी विभाजन हो जाएगा। यह सोनिया-परिवार के सोचने की बात है कि पार्टी का अब क्या करना चाहिए? अगर दूसरे लोग यह सोचने वाले रहेंगे, तो हो सकता है कि आगे चलकर इस परिवार की मर्जी का अध्यक्ष भी न बने।
एक अखबार के रूप में हमें इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि कांग्रेस का अध्यक्ष कौन रहे। लेकिन इस बात हमें फर्क पड़ता है कि देश का एक बड़ा विपक्षी दल अगर और कमजोर होते चला गया तो भारत के लोकतंत्र में भाजपा और एनडीए की ताकत अनुपातहीन ढंग से अधिक हो जाएगी, और वह कोई बहुत अच्छी नौबत जनता के हित में नहीं होगी। कांग्रेस को आज न केवल अपना घर सम्हालने की जरूरत है, बल्कि अपने घर की मरम्मत की भी जरूरत है, और अपने भविष्य के बारे में भी उसे सोचना चाहिए। यह भी सोचना चाहिए कि क्या नौबत ऐसी आ गई है कि सोनिया-परिवार का भविष्य और कांग्रेस पार्टी का भविष्य दो अलग-अलग बातें हो चुकी हैं?
हमारा ख्याल है कि कांग्रेस के भीतर कुछ लोग जिसे असंतोष और बगावत कह रहे हैं, वह किसी भी पार्टी के जिंदा रहने का पहला सुबूत है। यह कांग्रेस के लिए एक अनहोनी हो सकती है कि उसके भीतर के कुछ लोग उसे जिंदा करने की कोशिश कर रहे हैं, क्योंकि आमतौर पर चापलूसी को इस पार्टी के लिए काफी माना जाता है, और उससे अधिक कुछ क्यों किया जाए, यह सवाल हमेशा ही पार्टी की नीति बने रहता है।
लेकिन अब हिन्दुस्तान की राजनीति के तौर-तरीके मोदी युग के हैं, अब कांग्रेस या कोई भी दूसरी पार्टी यह मानकर नहीं चल सकतीं कि मोदी की गलतियों से वे सत्ता में आ जाएंगे। और जब सत्ता से परे रहना एक लंबा भविष्य दिख रहा है, तो बहुत से नेताओं को अपनी पार्टी से अधिक असरदार, अधिक लड़ाकू, और आखिर में अधिक कामयाब बनाने की जरूरत लग सकती है। अभी तक जो बातें सामने आई हैं उनके मुताबिक तो पार्टी के पास एक पखवाड़े से पड़ी हुई इस चिट्ठी को लेकर कल की कार्यसमिति की बैठक में कोई अधिक बात नहीं हुई, या कम से कम उस पर कोई कार्रवाई होते नहीं दिखी। कल की बैठक के पहले पार्टी जहां पर थी, गांधी परिवार की उसी देहरी पर, उसी जगह, उसी तरह आज भी खड़ी हुई है, बस इतना ही फर्क पड़ा होगा कि ये 23 लोग पार्टी में घोषित रूप से अवांछित बन गए हैं, और जैसा कि दुनिया में कहीं भी होता है इतनी बड़ी संख्या में अवांछित लोग अपने वांछित नतीजों को पाने के लिए आगे भी कुछ न कुछ करते हैं। कांग्रेस पार्टी में आने वाले दिनों में अगर यह संघर्ष बढ़ता है तो भी वह पार्टी के लिए अच्छा ही होगा। पार्टी को तर्कहीन तरीके से अंतहीन चापलूस बने रहना उसे किसी किनारे नहीं पहुंचा सकता। जिन लोगों ने यह चिट्ठी लिखी, उनकी नीयत क्या थी, और आगे उनकी तैयारी क्या है, इसका खुलासा तो आगे धीरे-धीरे होगा लेकिन कांग्रेस पार्टी कम से कम एक जिंदा पार्टी बनी दिख रही है, और वह भी कोई छोटी कामयाबी नहीं है। इस चिट्ठी में उठाए गए मुद्दों पर इस पार्टी को सोचना चाहिए, क्योंकि उसके अलावा उसके पास सोचने को कुछ और तो अधिक बचा भी नहीं है। (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)
जिस तरह पानी की सतह पर जब जलकुंभी फैल जाती है, और उसके नीचे यह भी नहीं दिखता कि पानी है कि कोई और कचरा है। यह तो दूर की बात है कि उस पानी के नीचे तलहटी में कोई मोती हैं और वे दिख जाएं। ठीक उसी तरह आज हिन्दुस्तान में खबरों का हाल है। कल से देश का मीडिया टूट पड़ा है कि मोदी जिस मोर को दाना खिला रहे हैं, उस वक्त मोदी के बाल इतने कम क्यों दिख रहे हैं? प्रधानमंत्री निवास से बनकर जो वीडियो बाहर आया है, वह वीडियो कैसे बना, उसने मोदी ने कितनी पोशाकें बदलीं, प्रधानमंत्री निवास के भीतर मोरों का दिखना कोई नियम तोड़ रहा है या नहीं, ऐसी कई बातें कल से चारों तरफ छाई हुई हैं। कार्टूनिस्ट भी जमकर पिल पड़े हैं, और सोशल मीडिया पर लोग इसी पर बहस कर रहे हैं। इससे परे देश के वित्तमंत्री बनने की हसरत लिए हुए दुनिया के हर मुद्दे पर अपनी जानकार राय वाले हमलों के योद्धा सुब्रमण्यम स्वामी अब सुशांत राजपूत की मौत पर टूट पड़े हैं, और जांच करती सीबीआई को शर्मिंदा करने लायक जांच कर रहे हैं, जानकारियां ट्विटर पर पोस्ट कर रहे हैं। फिर मानो यह भी काफी न हो तो बलात्कार का एक आरोपी नित्यानंद जिसने कि देश से फरार होकर कहीं एक टापू खरीदकर कैलाश नाम का एक देश बनाने की घोषणा की थी, वह अब वहां अपनी करेंसी के बाद अपनी हिन्दू संसद बनाने की घोषणा कर चुका है। पूरा देश हर किस्म की गैरजरूरी खबरों में डूब गया है, जितने गहरे पानी में बिहार की गरीब जनता डूबी हुई है, उससे बहुत अधिक गहरे इस देश की जनता गैरजरूरी अफवाहों और गॉसिप में डूबी हुई हैं।
दरअसल एक वक्त अखबारों का जो मीडिया लोगों तक समाचार, और समाचार से जुड़े विचार पहुंचाने का जरिया था, उसकी जगह को इलेक्ट्रॉनिक मीडिया, और डिजिटल मीडिया ने ऐसा अवैध कब्जाया है कि अब चतुर और धूर्त नेताओं और पार्टियों के परसेप्शन मैनेजमेंट के लिए प्रिंट की जरूरत नहीं पड़ती, टीवी चैनलों के गलाकाट मुकाबले में जितनी भी अधिक बेबुनियाद बात उछाली जाए, वह उतनी ही तेजी से लपकी जाती है, और फिर डिजिटल मीडिया, सोशल मीडिया भी चैनलों के किए शिकार में से हड्डियों में चिपके मांस को नोचने के लिए तैयार रहते हैं। कभी-कभी उल्टा भी होता है कि सोशल मीडिया या डिजिटल मीडिया शिकार करते हैं, और टीवी चैनल उसके कंकाल में चिपके कुछ टुकड़ों को नोंचते रह जाते हैं। अखबारों को समझ ही नहीं पड़ता कि ऐसे मुकाबले में वे कहां खड़े रहें, क्या करें, और ऐसे में कई बार वे प्रिंट की परंपरागत जिम्मेदार सोच को छोडक़र शिकार की लाश में मुंह मारने में लग जाते हैं। अब यह मुकाबला इस दर्जे का हो गया है कि इसमें पानी में डूबे हुए लोग, बिना इलाज मरते हुए लोग, बिना पीपीई किट के अस्पतालों में ड्यूटी करते डॉक्टर-नर्स, नौकरी खो चुके लोग, बिना मजदूरी भूखों मरने के करीब लोग किनारे बैठे या लेटे हुए यह देख रहे हैं कि इस देश का तथाकथित मीडिया, और सोशल मीडिया किस किस्म की मुद्दों पर गलाकाट मुकाबले में लगे हुए हैं। इसके बीच कुछ-कुछ देर के लिए खबरें ऐसी आती हैं कि दस कदम पीछे उनका खंडन भी दौड़ते हुए आते ही रहता है। दाऊद पाकिस्तान में है, और नहीं है, इन दोनों को मिलाकर आधा-एक घंटा गुजर जाता है। राहुल गांधी ने चि_ी लिखने वालों को भाजपा के साथ मिला हुआ कहा, और नहीं कहा, इन दोनों के बीच कपिल सिब्बल जैसे लोग राहुल पर टूट पड़े, अपना राजनीतिक-धर्मनिरपेक्ष जनेऊ निकालकर दिखाने लगे, और बिहार की बाढ़ में इतनी देर में और कुछ हजार लोग बेघर हो गए।
किसी देश में वहां के लोगों की जिंदगी से जुड़े हुए असल मुद्दे किस तरह धकेलकर हाशिए पर कर दिए जाते हैं, उसकी आज के हिन्दुस्तान से बेहतर मिसाल मिलना मुश्किल है। जाने महीना हुआ है, या दो महीने, सुशांत राजपूत की मौत के बाद यह देश उसे राष्ट्रीय मौत साबित करने में जुट गया, केन्द्र और राज्य के संबंध कसौटी पर चढ़ा दिए गए, राज्यों के आपसी संबंध सरहद पर जंग करते खड़े हो गए, और ऐसा लगा कि मीडिया बॉलीवुड के तमाम गंदे कपड़े धोने का धोबीघाट बन गया है। मीडिया में उन सवालों की फेहरिस्त सिलसिलेवार छपने लगी कि सुशांत राजपूत से जुड़े और जुड़ी किन-किन लोगों से पुलिस या सीबीआई, ईडी या मुम्बई पुलिस ने क्या-क्या पूछताछ की है। इस मौत से जुड़े हुए लोगों के बीच आपस में निजी मैसेंजरों पर क्या-क्या बात हुई वह हैरानी की हद तक खुलासे के साथ जांच एजेंसियों से निकलकर मीडिया में छा गई, और देश सुशांत राजपूत की मौत के समारोह में डूब गया। मीडिया के तकरीबन तमाम लोगों ने इस बात की परवाह नहीं की कि निजी बातचीत को क्यों नहीं छापना चाहिए, क्योंकि न छापें तो गंदगी के गलाकाट मुकाबले में बहुत पीछे रह जाएंगे। इसलिए देश कीचड़ फेंकने के इस मुकाबले की रनिंग कमेंटरी करने वाले मीडिया को देखते रह गया, पढ़ते रह गया।
कहने वाले लोग इसे बहुत पहले से जानते हैं, और कहते हैं कि जब कभी देश के सामने जलते-सुलगते मुद्दे रहते हैं, किस तरह एक पड़ोसी दुश्मन देश से आए कुछ आतंकी पकड़ाते हैं, किस तरह वे बयान देते हैं कि वे हिन्दुस्तान के किन बड़े लोगों को मारने आए थे, किन बड़े शहरों की कौन सी धार्मिक जगहों पर हमले करने वाले थे, और दो-चार दिन मीडिया उसी में डूब जाता है। यह जनधारणा प्रबंधन गजब का है, और मीडिया की इस अघोषित साजिश में भागीदारी करने की बेसब्र और बेचैन हसरत भी गजब की है। देश के जलते-सुलगते असल मुद्दे फुटपाथों पर इंतजार करते हुए बुझे हुए चूल्हों सरीखे हो जाते हैं, और झूठ, अफवाहें, और इन सबसे बढक़र अर्धसत्य, गैरजरूरी सत्य, ये सब उसी तरह धूम-धड़ाके के साथ सडक़ पर से परेड करते निकलते रहते हैं जैसे कि ब्राजील में चकाचौंध मादकता वाली सांबा नर्तकियां सालाना जलसे में निकलती हैं। अब मीडिया और सोशल मीडिया, और मैसेंजर सर्विसों के बीच की विभाजन रेखा झाड़ू लेकर मिटा दी गई है, और इन सारे औजारों का इस्तेमाल परसेप्शन मैनेजमेंट में गजब की पेशेवर खूबी से हो रहा है। इसलिए जिस बिहार में लोग, दसियों लाख लोग बाढ़ से बेघर हैं, उस बिहार को खुश करने के लिए आज यह काफी साबित किया जा रहा है कि सुशांत राजपूत की मौत की जांच मुम्बई पुलिस से छीनकर सीबीआई को दी जा रही है। ऐसे ही तमाम और मुद्दे हैं जो लोगों को असल जलती हुई हकीकत की जमीन पर पांव भी नहीं रखने देंगे क्योंकि उतने सुलगते पैरों के साथ लोग अगर संसद और अदालत की ओर बढ़ चले, तो फिर बगावत सी हो जाएगी। उसके मुकाबले एक मौत का राष्ट्रीयकरण अधिक आसान और अधिक सहूलियत का है।
आखिर कांग्रेस पार्टी में बम फूटा। पार्टी में मायने रखने वाले दो दर्जन लोगों ने सोनिया गांधी को लगभग खुली चिट्ठी लिखकर संगठन में ऊपर से नीचे तक बदलाव की मांग की है, और कहा है कि कांग्रेस को एक पूर्णकालिक और प्रभावी लीडरशिप चाहिए। जाहिर है कि न तो सोनिया गांधी, और न ही राहुल पूर्णकालिक हैं, और किसी दूसरी वजह से न सही, इसी एक वजह से तो कम से कम प्रभावहीन हैं हीं। पार्टी के जिन लोगों ने बहुत कड़वा लगने वाला यह खत लिखा तो सोनिया गांधी के नाम पर है, लेकिन मीडिया में इसके पूरे के पूरे छप जाने की वजह से यह जाहिर है कि इसे भेजने के पहले ही इसे जनता के सामने भी रख देना तय किया गया था। वैसे भी जब किसी चिट्ठी पर देश भर में बिखरे हुए 23 बड़े कांग्रेस नेताओं के दस्तखत हो रहे हैं, तो वह चिट्ठी कम, पोस्टर अधिक है।
खैर, इसमें कोई बुराई नहीं है क्योंकि पिछले दिनों ही हमने कम से कम दो-तीन बार इस मुद्दे पर लिखा, और अभी चार-छह दिन पहले ही यह भी लिखा कि किसी कारोबार के मालिक को खुद मैनेजरी करके उसे नाकामयाब नहीं बनाना चाहिए, बल्कि एक काबिल मैनेजर रखकर कारोबार को कामयाब करना चाहिए। यह बात गांधी परिवार पर भी लागू होती है कि जब वह एक संगठन को चलाने के लिए पूरा वक्त नहीं दे पा रहा है, तो उसे मेहनत करने वाले लोगों को रखना चाहिए, काबिल ढूंढने चाहिए, और ऐसे लोगों को डूबे हुए टाइटैनिक को तलहटी से सतह तक लाने का जिम्मा देना चाहिए। लेकिन यह लिखते हुए भी हमें यह उम्मीद नहीं थी कि कांग्रेस के इतने नेता खुलकर सोनिया गांधी को लिखेंगे, बल्कि जिस वक्त हमने लिखा, उस वक्त वे इस चिट्ठी को सोनिया को भेज भी चुके थे। इसमें लोकसभा और राज्यसभा के पार्टी के बड़े-बड़े नेता, आधा दर्जन भूतपूर्व मुख्यमंत्री, कई प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष रहे हुए लोग शामिल हैं, जिनके नाम खबर में जा रहे हैं, इसलिए यहां पर उस फेहरिस्त को देने का कोई मतलब नहीं है।
इस चिट्ठी में कांग्रेस कार्यसमिति के चुनाव मांगे गए हैं, और पार्टी के पुनरूद्धार के लिए सामूहिक रूप से, संस्थागत नेतृत्व-तंत्र की बात कही गई है। इस चिट्ठी के बाद कल, सोमवार सुबह कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक है, और इस बैठक में इस पर चर्चा हो सकती है। हमारा मानना है कि हाल के बरसों में कांग्रेस पार्टी के भीतर यह सबसे बड़ा समुद्रमंथन है, जिससे कुछ लोगों को अमृत की उम्मीद होगी, और कुछ लोगों को जहर का खतरा दिखेगा। लेकिन हम भारतीय लोकतंत्र के हित में कांग्रेस का मजबूत बने रहना जरूरी मानते हैं, और उसके लिए इस पार्टी के भीतर ऐसी हलचल भी जरूरी है। अभी कई बरस से कांग्रेस संगठन के फैसले अजगर के करवट बदलने के फैसले से भी धीमी रफ्तार से होते थे। यह बात देश में मजाक हो चली कि हर चुनाव के बाद राहुल गांधी बिना किसी जनसूचना के निजी प्रवास पर विदेश चले जाते हैं, सोनिया गांधी उपलब्ध नहीं रहती हैं, प्रियंका गांधी अपने को मोटेतौर पर उत्तरप्रदेश तक सीमित रखती हैं, और पार्टी के बाकी बहुत से नेता जनता की राजनीति के पैमाने पर फॉसिल (जीवाश्म) हो चुके हैं। यह बात हम किसी नेता की उम्र को लेकर नहीं कह रहे, उनके जनाधार, और उनके जनसंघर्ष को लेकर कह रहे हैं।
कांग्रेस के इन नेताओं ने मोदी की कामयाबी की हकीकत को माना है, और अच्छा ही काम किया है क्योंकि हकीकत को माने बिना किसी बात का हल तो निकल नहीं सकता। और मोदी इस देश के राजनीतिक इतिहास की एक अनोखी कामयाबी बन चुके हैं, जो कि आने वाले वक्त में भी आसानी से हराने लायक नहीं दिखते। आज ही एक पुराने अखबारनवीस ने लिखा है कि मोदी को सिर्फ एक व्यक्ति हरा सकता है, खुद नरेन्द्र मोदी। ऐसी हकीकत के दौर में अगर कांग्रेस पार्टी छींके के नीचे बैठी बिल्ली की तरह लेटी रहेगी, तो उससे उसे कुछ हासिल नहीं होना है। दुनिया में लोकतंत्र, चुनाव, सोशल मीडिया, और जनधारणा-प्रबंधन के सारे के सारे पैमाने बदल चुके हैं, नए हथियार चलन में आ गए हैं, रोजाना के औजार भी तमाम ऑटोमेटिक हो गए हैं। ऐसे में एक पार्टी अपने को सवा सौ से अधिक साल पुरानी मानते हुए सवा सौ से अधिक साल पुराने तौर-तरीकों और हथियार-औजारों संग जीने की कोशिश अगर कर रही है, तो वह न तो भविष्य गढ़ रही, न ही वर्तमान में जी रही, वह महज इतिहास लिख रही है।
कांग्रेस अगर अपनी कल की कार्यसमिति में इस चिट्ठी के मुद्दों पर खुलकर चर्चा नहीं करती, तो यह जाहिर है कि राहुल की यह बात जुबानी जमाखर्च थी कि गांधी परिवार के बाहर का अध्यक्ष होना चाहिए। अभी जब प्रियंका गांधी का एक इंटरव्यू आया जिसमें उन्होंने भाई की इस बात से सहमति जताई थी, तो अगले ही दिन कांग्रेस के राष्ट्रीय प्रवक्ता ने प्रियंका के बयान को साफ-साफ खारिज करने के बजाय यह कहकर खारिज सा कर दिया कि यह इंटरव्यू तो साल भर पहले दिया गया था, मानो इस एक साल में कांग्रेस इसरो पर सवार होकर अंतरिक्ष पहुंच चुकी हो, और हालात बदल गए हों। इस एक साल में कांग्रेस के हालात अगर किसी किस्म से बदले हैं, तो वे बद से बदतर ही हुए हैं। ऐसे में राहुल और प्रियंका का कुछ कहना, और फिर कांग्रेस प्रवक्ता का उससे एक किस्म से मुकरना एक लतीफे सरीखा है।
भारतीय लोकतंत्र और देश के हित में, और खुद कांग्रेस पार्टी के हित में यही है कि वह संगठन में लोकतंत्र लेकर आए, अधिक से अधिक यही तो होगा कि कई लोगों के बागी तेवर उसके ढांचे को हिलाकर रख देंगे। लेकिन आरामकुर्सी पर चढ़ती हुई चर्बी के मुकाबले बहता हुआ पसीना हमेशा ही बेहतर होता है। कांग्रेस को आज जितने बड़े बदलाव की जरूरत है, वह पूरे का पूरा नेताओं की इस चिट्ठी में सामने आया है। इस पार्टी का भला चाहने वाले लोगों को इस पर खुलकर चर्चा करनी चाहिए, यह गांधी परिवार के भी हित में होगा कि उसे पार्टी कुछ वक्त के लिए आजादी दे। इसी परिवार की पीठ पर इस तरह से सवारी करते रहने ने इस पार्टी को आरामतलब कर दिया है। इसे संघर्ष करने के लिए दूसरों के हवाले करना चाहिए, और चिट्ठी में यह बात सही लिखी हुई है कि देश की सबसे बड़ी और सबसे कामयाब पार्टी की सरकार के मुखिया रहते हुए एक तरफ तो नरेन्द्र मोदी शायद 16 घंटे रोज काम कर रहे हैं, दूसरी तरफ कांग्रेस के पास कोई भी पूर्णकालिक अध्यक्ष नहीं है, जबकि उसे संघर्ष की जरूरत अधिक है।
कांग्रेस के नेताओं की यह चिट्ठी बहुत सही मौके पर आई है और कल कांग्रेस कार्यसमिति में समझदारी भी सामने आ सकती है, और पारंपरिक चापलूसी भी। इस पार्टी का भविष्य एक किस्म से कल तय भी हो सकता है। (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)
वकील प्रशांत भूषण के मामले में सुप्रीम कोर्ट का रूख उसे भारतीय लोकतंत्र के अधिकतर समझदार लोगों से अलग कर रहा है। और ये समझदार क्रिकेट या रॉकेट साईंस के समझदार नहीं हैं, बल्कि ये संविधान, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और न्यायपालिका की स्वतंत्रता जैसे जटिल मुद्दों को समझने वाले लोग हैं। इनमें सबसे ताजा नाम एक भूतपूर्व केन्द्रीय मंत्री रहे, आपातकाल के खिलाफ लड़े, और इंडियन एक्सप्रेस जैसे धाकड़ अखबार के दमदार संपादक रहे अरूण शौरी का है। उन्होंने अभी खुलकर कहा कि देश का जो सुप्रीम कोर्ट दो ट्वीट से अपने को खतरे में समझ रहा है वह देश की जनता को खतरे से क्या बचाएगा। उन्होंने बहुत से शब्दों में इस बात को कहा है- मुझे हैरानी हो रही है कि 280 अक्षर-मात्राओं के ट्वीट लोकतंत्र के झंडे को हिला रहे हैं। उन्होंने कहा मुझे नहीं लगता है कि सुप्रीम कोर्ट की छवि इतनी नाजुक है। 280 अक्षर-मात्राओं से सुप्रीम कोर्ट अस्थिर नहीं हो जाता। उनका कहना है कि इस फैसले से पता चलता है कि लोकतंत्र का यह स्तंभ इतना खोखला हो चुका है कि महज दो ट्वीट से इसकी नींव हिल सकती है। उन्होंने प्रशांत भूषण के माफी मांगने से इंकार पर कहा कि यह उनका निजी फैसला हो सकता है, लेकिन अगर वे माफी मांगते तो मुझे हैरानी होती।
अरूण शौरी ने इस बारे में कहा- पिछले कुछ दिनों में प्रशांत भूषण ने इस पर विचार किया होगा। कोर्ट ने 108 पेज का फैसला सुनाया है, कोर्ट का स्तर बहुत ऊंचा है। अगर आप कुल्हाड़ी से मच्छर मारेंगे तो आप अपने आपको चोट पहुंचाएंगे। आपको पता है जो शख्स ऊंचे ओहदे पर बैठता है, चाहे वह राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, या जज कोई भी हो, वो कुर्सी बैठने के लिए होती है, न कि खड़े होने के लिए। उन्होंने कहा- कोर्ट का मान ट्वीट से नहीं, जजों के काम से और उनके फैसलों से घटता है। यदि सुप्रीम कोर्ट खुद को सुरक्षित नहीं रख सकता, तो वह हमारी रक्षा कैसे करेगा। शौरी ने कहा- अगर कोई विज्ञापन कंपनी ट्विटर के लिए विज्ञापन बनाना चाहती है तो इससे अच्छा कोई विज्ञापन नहीं होगा कि ‘आओ ट्विटर से जुड़ो, हमारा प्लेटफॉर्म इतना शक्तिशाली है कि इस पर किया गया ट्वीट दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के केंद्रीय स्तंभ को हिलाने की क्षमता रखता है।’
अरूण शौरी ने कहा- प्रशांत भूषण के ट्वीट नहीं, बल्कि सुप्रीम कोर्ट के तीन जजों द्वारा की गई इन टिप्पणियों के चलते लोगों का विश्वास सुप्रीम कोर्ट से घटेगा। लोग कहेंगे ‘अरे यार तुम सुप्रीम कोर्ट के पास भाग रहे हो कि वो तुम्हें बचाएंगे, जबकि वो खुद कह रहे हैं कि वे इतने कमजोर हो गए हैं कि दो छोटे से ट्वीट सारे ढांचे को गिरा देंगे।’ उन्होंने कहा, ‘यह वही बात हुई जैसा कि शायर कलीम आजि•ा ने कहा है, ‘हम कुछ नहीं कहते, कोई कुछ नहीं कहता, तुम्ही क्या हो तुम्ही सबसे, कहलवाए चले हो।’’ शौरी ने कहा कि कोर्ट के फैसलों की आलोचना और विश्लेषण करना अवमानना नहीं होता है। उन्होंने कुछ मामलों की मिसाल देते हुए कहा कि कोर्ट के कई ऐसे फैसले हैं जहां अदालत ने तर्कों को नजरअंदाज करते हुए फैसला दिया, या अभी भी लंबित है। उन्होंने कहा कि जैसा कोर्ट ने जजलोया और रफाल मामले में फैसला दिया, दोनों मामलों में महत्वपूर्ण सुबूतों की ओर से मुंह फेर लिया गया।
अरूण शौरी ने कहा कि अदालत हमारे संविधान के केन्द्र में स्थित बेहद महत्वपूर्ण विषयों, कश्मीर, मुठभेड़-हत्या, नागरिकता-संशोधन एक्ट को लगातार नजरअंदाज कर रही है। उन्होंने कहा, ‘क्या सत्य को उस देश में रक्षा के रूप में स्वीकार नहीं किया जाएगा, जिसका आदर्श राष्ट्रीय वाक्य सत्यमेव जयते है? जिस देश के राष्ट्रपिता ने बार-बार कहा है कि सत्य ही भगवान है।’ उन्होंने कहा, ‘न्यायिक व्यवस्था का मान किसी ट्वीट से कम नहीं होता है, बल्कि अन्य कई कारणों, जैसे तथ्यों को नजरअंदाज करने, महाभियोग जैसे मामलों को डील करने की प्रक्रिया अपर्याप्त और निष्पक्ष न होने, और पूर्व मुख्य न्यायाधीशों के खिलाफ दुराचार के आरोपों के संबंध में पूरी तरह गोपनीयता बरतने, से कोर्ट का मान घटता है। किसी के ट्वीट पर अपना गुस्सा निकालने से अच्छा है कि इन कमियों को दूर किया जाए। याद रखें कि भ्रष्टाचार का अर्थ केवल धन स्वीकार करना नहीं है। हो सकता है कि एक अकादमिक या पत्रकार पैसे स्वीकार न करे, और फिर भी वह बौद्धिक रूप से भ्रष्ट हो कि वह आदतन दूसरों के काम को अपना बताकर छापता हो, या उससे नकल करता हो।
शौरी ने कहा कि इस तरह यदि कोई भ्रष्टाचार के आरोप लगाते हैं तो इसका मतलब हमेशा ये नहीं होता कि वे पैसे के भ्रष्टाचार की बात कर रहे हों। एक व्यक्ति, एक जज, या एक राजनेता पैसे के मामले में पूरी तरह से ईमानदार हो सकता है, लेकिन नैतिक रूप से भ्रष्ट हो सकता है। वह किताबों में उच्च सिद्धांतों की खूब पैरवी करता होगा, मौलिक अधिकारों के बारे में खूब बोलता होगा, लेकिन जब इसे लागू करने की बात होती हो, तो वह पीछे हट जाता होगा। इस तरह के भ्रष्टाचार के ढेरों उदाहरण हैं।’
अरूण शौरी ने अलग-अलग कई अखबारों और समाचार माध्यमों से बातें की हैं, और उनकी बातों को हल्के में खारिज करना नाजायज होगा। वे खुद देश की कई सरकारों के खिलाफ लड़ चुके हैं, और वे लोकतंत्र के तमाम पहलुओं से बहुत अच्छी तरह वाकिफ इंसान हैं। आज अपने अखबार के विचारों की इस जगह पर उनकी बातों को जस का तस धर देने के पीछे इस जगह को भर देने की नीयत नहीं है, बल्कि इस अखबार की अपनी सोच से मेल खाने वाली उनकी जो सोच कल सामने आई है उसे हम पिछले कुछ दिनों में अपनी लिखी बातों के एक विस्तार के रूप में यहां रख रहे हैं, और इसीलिए उनकी बातों को पूरे खुलासे से देना ठीक लगा है।
सुप्रीम कोर्ट अगले एक-दो दिनों में इस मामले पर अपना तय किया जा चुका रूख सामने रखेगा, और अदालत की जुबान में इसे सजा का निर्धारण कहा जाएगा। प्रशांत भूषण के मुद्दे पर हमारे तर्क फिलहाल खत्म हो चुके हैं, और अभी दो दिन पहले ही हमने इस बारे में लिखा था कि सुप्रीम कोर्ट इस मामले में फैसला भी दे सकता है, और इंसाफ भी कर सकता है। यह पूरा सिलसिला सुप्रीम कोर्ट की एक अनुपातहीन अधिक ताकत के खतरे भी बता रहा है कि दर्जनों जजों वाली सुप्रीम कोर्ट की तीन जजों की बेंच पूरी न्यायपालिका के सम्मान पर एक फैसला ले रही है, और इस बेंच से दस गुना अधिक दूसरे जज इस बुनियादी और लोकतांत्रिक मुद्दे पर राय देने से बाहर हैं। सुप्रीम कोर्ट से अभी रिटायर हुए जज जस्टिस कुरियन जोसेफ ने किसी विवाद को लेकर दो दिन पहले एक बयान जारी करके कहा है कि मामले की सुनवाई पांच या सात जजों की संवैधानिक बेंच को करनी चाहिए। इस तरह के महत्वपूर्ण मामलों को कोर्ट के भीतर विस्तृत रूप से सुना जाना चाहिए जहां व्यापक चर्चा, और व्यापक भागीदारी की गुंजाइश हो। उन्होंने लिखा- भारत के सर्वोच्च न्यायालय की तीन जजों की पीठ ने न्यायालय की अवमानना के दायरे और सीमा पर कुछ गंभीर प्रश्नों को सुनने का फैसला लिया है। सर्वोच्च न्यायालय द्वारा एक स्वत: संज्ञान मामले में दोषी ठहराए व्यक्ति को अंतर-अदालत की अपील का मौका मिलना चाहिए क्योंकि आपराधिक मामलों में सजा की अन्य सभी स्थितियों में दोषी व्यक्ति के पास अपील के माध्यम से दूसरे अवसर का अधिकार है। अदालत की अवमानना अधिनियम के तहत एक अंतर-अदालत अपील दी जाती है जहां उच्च न्यायालय के एकल जज द्वारा आदेश पारित किया जाता है तो मामले में डिवीजन बेंच सुनवाई करती है, जिसकी अपील भारत के सर्वोच्च न्यायालय में निहित है। उन्होंने लिखा यह सुरक्षा शायद न्याय के अंत की आशंका से बचने के लिए भी प्रदान की गई है। क्या अन्य संवैधानिक न्यायालय, भारत के सर्वोच्च न्यायालय में भी इस तरह की सुरक्षा नहीं होनी चाहिए, जब एक स्वत: संज्ञान आपराधिक अवमानना मामले में सजा हो?
जस्टिस कुरियन ने अपने बयान में लिखा है- न्याय किया जाना चाहिए, भले ही आसमान टूट पड़े, ये बात न्यायालयों द्वारा न्याय के प्रशासन की बुनियादी नींव है। लेकिन अगर न्याय नहीं किया जाता है, या न्याय विफल होता है, तो आसमान निश्चित रूप से टूट पड़ेगा। भारत के सर्वोच्च न्यायालय को ऐसा नहीं होने देना चाहिए। वर्तमान अवमानना मामले केवल एक या दो व्यक्तियों से जुड़े हुए नहीं हैं, बल्कि न्याय से संबंधित देश की अवधारणा और न्यायशास्त्र से संबंधित बड़े मुद्दे हैं। इन जैसे महत्वपूर्ण मामलों को विस्तृत रूप से सुना जाना चाहिए जहां व्यापक चर्चा और व्यापक भागीदारी की गुंजाइश है। लोग आ सकते हैं, और लोग जा सकते हैं, लेकिन भारत के सर्वोच्च न्यायालय को सर्वोच्च न्याय के न्यायालय के रूप में हमेशा के लिए रहना चाहिए। (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)
फिल्म उद्योग के कलाकार सोनू सूद की समाजसेवा पर हम पहले भी एक-दो बार इसी जगह पर लिख चुके हैं, और कई खबरें भी छापी हैं। जिस तरह देश भर से इस नौजवान कलाकार को मदद की अपील मिल रही हैं, और वह जिस तरह लोगों का इलाज करवा रहा है, संगठित रूप से लोगों को नौकरियां दिलवा रहा है, किसी का मकान बनवा रहा है, तो किसी को बह गई भैंस दिलवा रहा है, सोशल मीडिया पर कोई तस्वीर आई कि एक किसान अपनी बेटियों को हल में जोतकर खेत में काम कर रहा है, तो सोनू सूद की तरफ से ट्रैक्टर उनके घर पहुंच जाता है। यह पूरा सिलसिला अनोखा है, और अटपटा है। क्या इतना बड़ा देश लोगों की अंतहीन जरूरतों के लिए किसी एक जिंदा इंसान के कंधों पर इस हद तक सवार होकर चल सकता है? इस देश में केन्द्र सरकार है, राज्य सरकारें हैं, स्थानीय म्युनिसिपल और पंचायतें हैं, बड़ी-बड़ी कंपनियों के सीएसआर फंड हैं, बड़े-बड़े राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय समाजसेवी संगठन हैं, क्या इन सबके ढांचे ढह चुके हैं? क्या पूरे हिन्दुस्तान की जरूरतें इस रफ्तार से एक मददगार पर टूट पड़ेंगी कि किसी एक दिन उसे 41 हजार अपीलें मिलें? कोई एक इंसान, इंसान की ताकत से बहुत ऊपर उठकर अगर जरूरतमंदों का ऐसा मददगार हो रहा है, तो यह क्षमता अविश्वसनीय है। सोनू सूद की विनम्रता भी अविश्वसनीय है, उसकी रफ्तार भी अविश्वसनीय है, और मदद का उसका आकार भी अविश्वसनीय है। इस सिलसिले को नाकामयाबी के पहले दूसरे लोगों को खुद मदद की जरूरत है। अगर एक इंसान ही अंतहीन इस हद तक करते चलेगा, तो फिर लोगों को किसी ईश्वर की जरूरत क्यों होगी? इसलिए हिन्दुस्तानी लोकतंत्र के बाकी तबकों को सोनू सूद नाम के एक आईने में अपना चेहरा देखना चाहिए, और अपने-अपने हिस्से की जिम्मेदारी निभानी चाहिए।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी तो अब अपने पीएम केयर्स फंड को लेकर सुप्रीम कोर्ट तक से क्लीन चिट पा चुके हैं कि उसमें कुछ गलत नहीं है। इस फंड में यह भी इंतजाम है कि इसके दानदाताओं को टैक्स में छूट मिलेगी, कंपनियों के सीएसआर का पैसा इस फंड में दिया जा सकेगा, और इसे सीएजी से ऑडिट भी नहीं करवाना पड़ेगा। अब तक पब्लिक सेक्टर कंपनियों से ही इसे हजार-दो हजार करोड़ मिल चुके हैं, और देश की बाकी बड़ी कंपनियों से भी। आज सोनू सूद किसी राजनीतिक दल का झंडा उठाए बिना जिस अंदाज में लोगों की मदद के लिए जादूगर मैन्ड्रेक और महाबली बेताल का मिलाजुला रूप बनकर सुपरमैन की तरह आसमान पर उड़ते हुए पूरे देश के गांव-गांव तक पहुंच जा रहा है, दरअसल वह अंदाज हिन्दुस्तान के प्रधानमंत्री को बेहतर सुहाता। नरेन्द्र मोदी अगर ट्विटर पर देख-देखकर देश भर के लोगों की दिक्कतों को इसी तरह दूर करते, तो वह लोकतंत्र में ऐसी सेवा का एक फायदेमंद काम भी होता कि उन्हें चुनाव में इसका असर देखने मिलता। लेकिन सोनू सूद फिलहाल तो किसी राजनीतिक दल में गए नहीं हैं, किसी पार्टी का प्रचार कर नहीं रहे हैं, किसी पार्टी से चुनाव लडऩे की नीयत नहीं दिख रही है, और फिर वे अकेले बिहार की मदद भी नहीं कर रहे हैं। इसलिए उनके अविश्वसनीय नेक काम पर हम शक करके उसकी बेइज्जती करना नहीं चाहते। अगर वे चुनाव लड़ते भी हैं, तो भी आज उनके किए हुए कामों से जिन लाखों जिंदगियों को राहत मिली है, या मिलने जा रही है, वह काम तो खत्म नहीं हो जाता। अब सवाल यह है कि 130 करोड़ आबादी के इस देश में सुबह से रात तक जरूरतमंद लोगों की ऐसी मदद से भी क्या तकलीफें खत्म हो जाएंगी? या तो समाज के संपन्न लोग सोनू सूद के साथ आएं, और एक ट्रस्ट बनाकर उन्हें ऐसी ताकत दें कि वे इस काम को जारी रख सकें। दूसरा रास्ता यह हो सकता है कि सरकारें अपनी जिम्मेदारी पूरी करें, मकान देने के लिए सरकारों के पास बजट है, और उनके इलाकों में गरीबों की शिनाख्त भी है, तो किसी को मकान बनवाकर देने की जिम्मेदारी सोनू सूद तक पहुंचनी क्यों चाहिए? छत्तीसगढ़ में बारिश से किसी आदिवासी छात्रा की सारी किताबें भीगकर खत्म हो गईं, टूटी छत बिना दीवारों वाला घर, उसे देखकर सोनू सूद ने किताबों और मकानों दोनों का भरोसा दिलाया है। अब यह काम छत्तीसगढ़ के जिस हिस्से में भी होना है, वहां पर स्थानीय शासन है, राज्य शासन के आला अफसर हैं, और समाज के भी ताकतवर लोग हैं, क्या ये तमाम लोग भी सोनू सूद की ट्वीट जमीन पर उतरते देखने की राह तकेंगे? या इनकी खुद की भी अपने इलाकों के लिए कोई जिम्मेदारी बनती है?
यह पूरा सिलसिला मुंबई से मजदूरों को उनके गांव वापिस भेजने से शुरू हुआ था। सोनू सूद ने हजारों बसों में लोगों को भेजा, कई रेलगाडिय़ां चलवाईं, और दर्जनों विमानों से भी मजदूरों को भेजा। यही काम कई राज्य सरकारें भी कर रही थीं। लेकिन क्या किसी सरकार ने अपने राज्य में लौटे हुए मजदूरों के लिए सोनू सूद को भुगतान की पेशकश की? कम से कम एक-दो राज्यों के मंत्रियों की तो हमें याद भी है कि किस तरह उन्होंने सोशल मीडिया पर ही सोनू सूद को इस बात के लिए धन्यवाद लिखा था कि उन्होंने उनके राज्य के मजदूरों को भिजवाया। सोनू सूद ने तो अपनी सामाजिक जिम्मेदारी से लाख गुना अधिक करते हुए ऐसे काम किए हैं, लेकिन क्या सरकारों का जिम्मा बस इतना ही बनता है कि थैंक्यू सोनू सूद टाईप करके पोस्ट कर दें?
लोकतंत्र अगर अपनी व्यापक जिम्मेदारियों को, अपनी बुनियादी जिम्मेदारियों को किसी एक करिश्माई व्यक्ति के भरोसे छोड़क़र खुद चादर तानकर सो जाए, तो यह करिश्माई की कामयाबी कम है, लोकतंत्र की नाकामयाबी और गैरजिम्मेदारी अधिक है। आज इस देश के तमाम सत्तारूढ़ लोगों को यह सोचना चाहिए कि सोनू सूद के किए हुए कौन-कौन से काम दरअसल उनकी (सत्तारूढ़ लोगों की) जिम्मेदारी थे, और उन्होंने जब जरूरतमंदों की मदद नहीं की, तो लोगों को यह एक आदमी देश का सबसे बड़ा मददगार, सबसे बड़ा भरोसेमंद, सुपरमैन, और ईश्वर सरीखा दिखने लगा।
हमको पक्का भरोसा है कि कम से कम ईश्वर को तो ऐसी तुलना नहीं सुहाएगी, क्योंकि वह अपने आपको तमाम इंसानों से ऊपर रखना चाहेगा, लेकिन क्या अदालतों, सरकारों, और सामाजिक संगठनों पर काबिज लोगों को ऐसी तुलना सुहा रही है कि कल का एक छोकरा, फिल्मों में खलनायक बनने वाला, मार खाने वाला, आज देश का सबसे बड़ा नायक बनकर उभर रहा है? जिन लोगों के हिस्से के काम सोनू सूद कर रहे हैं, उन लोगों को अपने बारे में सोचना चाहिए कि इतिहास उनके जिम्मे की नाकामयाबी को भी दर्ज करते चल रहा है। जब एक आम एक्टर देश का सबसे बड़ा नायक बन रहा है, देश का रहनुमा माना जा रहा है, तो फिर जनता के पैसों पर कुर्सियों पर बैठे हुए नायक तो खलनायक ही साबित हुए न? और इतिहास इस बात को भी दर्ज करते चल रहा है कि मजदूरों को लेकर जब लोग सुप्रीम कोर्ट तक दौड़े थे, तब सुप्रीम कोर्ट का क्या रूख था। (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)
देश के एक प्रमुख वकील और सार्वजनिक मुद्दों पर कई सरकारों, कई जजों के कटु आलोचक रहते आए प्रशांत भूषण के दो ट्वीट पर सुप्रीम कोर्ट उन्हें अदालत की अवमानना की सजा सुना रही है। दो दिन पहले इसी जगह हमने इस मुद्दे पर अपनी सोच खुलासे से सामने रखी थी, और आज उसे दुहराने का हमारा कोई इरादा नहीं है। इसलिए हम आज प्रशांत भूषण के समर्थन में कुछ लोगों के बयानों के कुछ हिस्से यहां दे रहे हैं, और खुद प्रशांत भूषण का आज सुप्रीम कोर्ट में दिया गया एक बयान भी दे रहे हैं क्योंकि इनसे अधिक हमारे पास दो दिन के भीतर लिखने के लिए और कुछ नहीं है।
प्रशांत भूषण की जिन दो ट्वीट को अदालत ने अवमानना माना है, और उन्हें सजा का हकदार माना है उनमें उन्होंने लिखा था- जब इतिहासकार भारत के बीते 6 सालों को देखते हैं, तो पाते हैं कि कैसे बिना आपातकाल के देश में लोकतंत्र खत्म किया गया। इसमें वे (इतिहासकार) उच्चतम न्यायालय, खासकर चार पूर्व न्यायाधीशों की भूमिका पर सवाल उठाएंगे।
दो दिन बाद अगली ट्वीट में प्रशांत भूषण ने मुख्य न्यायाधीश एस.ए.बोबड़े की विदेशी मोटरसाइकिल पर बैठी फोटो पोस्ट की थी, और लिखा था- मुख्य न्यायाधीश ने कोरोना काल में अदालतों को बंद रखने का आदेश दिया था।
सुप्रीम कोर्ट में आज प्रशांत भूषण को सजा देने पर चल रही बहस के दौरान प्रशांत भूषण ने एक लिखित बयान में महात्मा गांधी का जिक्र किया और कहा- बोलने में विफलता कर्तव्य का अपमान होगा। मुझे तकलीफ है कि मुझे अदालत की अवमानना का दोषी ठहराया गया है, जिसकी महिमा मैंने एक दरबारी या जय-जयकार के रूप में नहीं, बल्कि 30 बरस से एक चौकीदार के रूप में बनाए रखने की कोशिश की है। मैं सदमे में हूं और इस बात से निराश हूं कि अदालत इस मामले में मेरे इरादों का कोई सुबूत दिए बिना इस निष्कर्ष पर पहुंची है। कोर्ट ने मुझे शिकायत की कापी नहीं दी, मुझे यह विश्वास करना मुश्किल है कि कोर्ट ने पाया कि मेरे ट्वीट ने इस संस्था की नींव को अस्थिर करने का प्रयास किया। लोकतंत्र में खुली आलोचना जरूरी है। हम ऐसे समय में रह रहे हैं जब संवैधानिक सिद्धांतों को सहेजना व्यक्तिगत निश्ंिचतता से अधिक महत्वपूर्ण होना चाहिए। बोलने में असफल होना कर्तव्य का अपमान होगा। यह मेरे लिए बहुत ही बुरा होगा कि मैं अपनी प्रमाणित टिप्पणी के लिए माफी मांगता रहूं।
प्रशांत भूषण ने महात्मा गांधी के बयान का जिक्र करते हुए कहा- ‘‘मैं दया की अपील नहीं करता हूं। मेरे प्रमाणित बयान के लिए कोर्ट की ओर से जो भी सजा मिलेगी, वह मुझे मंजूर है।’’
प्रशांत भूषण ने कहा- मेरे द्वारा किए गए ट्वीट देश के एक नागरिक के रूप में सच को सामने रखने की कोशिश है। अगर मैं इस मौके पर नहीं बोलूंगा तो मैं अपनी जिम्मेदारी को निभा पाने में नाकामयाब रहूंगा। मैं यहां पर राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की एक बात को रखना चाहूंगा। उन्होंने कहा था- मैं दया करने के लिए नहीं कहूंगा, मैं उदारता दिखाने के लिए नहीं कहूंगा, मैं अदालत द्वारा दी गई किसी भी सजा को स्वीकार करूंगा, और यही एक नागरिक का पहला कर्तव्य भी है।
अदालत ने जब प्रशांत भूषण को अवमानना पर अदालत से माफी मांगने पर विचार करने के लिए दो दिन और देने की बात कही तो प्रशांत भूषण ने कहा- मैंने जो कुछ भी कहा है, वह बेहद सोच-समझकर और विचार करने के बाद ही कहा है। अगर अदालत मुझे समय देना चाहती है तो मैं इसका स्वागत करता हूं, लेकिन मुझे नहीं लगता कि इसका कोई फायदा, इससे अदालत का समय ही बर्बाद होगा। इसकी बहुत संभावना नहीं है कि मैं अपना बयान बदलूंगा।
इस मामले में देश के अलग-अलग राजनीतिक दलों के 21 नेताओं ने बयान जारी करके प्रशांत भूषण के प्रति समर्थन जताया है, और लिखा है- न्याय देने में आ रही दिक्कतों, और लोकतांत्रिक संस्थाओं में गिरावट को लेकर उनके दो ट्वीट पर अवमानना की कार्रवाई की गई। यह दुखद है कि माननीय न्यायालय ने यह जरूरी नहीं समझा कि रचनात्मक आलोचना और दुर्भावनापूर्ण बयान में अंतर करे। हम ऐसी एप्रोच के लिए वैध आधार नहीं समझ पा रहे हैं क्योंकि यह एक आम व्यक्ति के लिए अपनी नागरिकता के उस दायित्व को निभाने में बाधा खड़ी करेगा जो दायित्व हमारे लोकतांत्रिक गणतंत्र के बारे में तथ्यपरक अभिव्यक्ति देने के रूप में है। हमारा विश्वास है कि बोलने की आजादी की रक्षा की जाए, और इसको बढ़ावा दिया जाए क्योंकि हमारे युवा लोकतंत्र में अलग-अलग नजरिए की विविधता और सभी संस्थाओं के सार्थक होने के लिए मुस्तैदी जरूरी है।
इसके पहले बार एसोसिएशन ऑफ इंडिया ने भी इस मामले में गहरी चिंता जताई थी, और मंगलवार को एक बयान जारी करके कहा था- जैसे यह अवमानना-कार्रवाई की गई है उससे अदालत की प्रतिष्ठा बने रहने से ज्यादा नुकसान पहुंचने की आशंका है। कुछ ट्वीट से सुप्रीम कोर्ट की प्रतिष्ठा को नुकसान नहीं पहुंचाया जा सकता। जब कोर्ट ने इस मामले का संज्ञान लिया था तब हमने अपना पक्ष सुप्रीम कोर्ट में दाखिल किया था, लेकिन गलती से सुप्रीम कोर्ट रजिस्ट्री में इसे शामिल नहीं किया। हमारे बयान में बार के बोलने की ड्यूटी से जुड़ी धारा का भी उल्लेख था जिसमें कहा गया है- न्यायपालिका, न्यायिक अधिकारियों, व न्यायिक आचरण से संबंधित संस्थागत और संरचनात्मक मामलों पर टिप्पणी करना सामान्य रूप से न्याय प्रशासन और एक जिम्मेदार नागरिक के तौर पर भी वकीलों की ड्यूटी है।
देश के पन्द्रह सौ से ज्यादा वकीलों ने प्रशांत भूषण के पक्ष में बयान जारी करके कहा है- सुप्रीम कोर्ट अपने फैसले पर पुनर्विचार करे ताकि न्याय की हत्या न हो। अवमानना के डर से खामोश बार से सुप्रीम कोर्ट की स्वतंत्रता, और आखिरकार ताकत कम होगी।
सुप्रीम कोर्ट की एक प्रमुख वकील इंदिरा जयसिंह ने सुप्रीम कोर्ट से अपील की है कि जस्टिस अरूण मिश्रा की अध्यक्षता वाली तीन जजों की बेंच ने प्रशांत भूषण के खिलाफ जो फैसला दिया है उस पर पुनर्विचार किया जाए। उन्होंने सुनवाई के लिए 32 जजों की एक पूरी अदालत की मांग की है। उन्होंने एक सार्वजनिक कार्यक्रम में अपने भाषण में कहा- अगर मैं अपने मन की बात कहती हूं, इसलिए मेरा अस्तित्व है, लेकिन अगर यह अधिकार खतरे में पड़ता है तो मेरा अस्तित्व भी नहीं बच पाएगा। एक अदालत जिसके पास जनहित याचिका की सुनवाई की शक्ति है, वह असंतोष के स्वरों को सुनने से खुद को नहीं रोक सकती। हमारा कर्तव्य है कि यदि हम न्यायालय को उसके रास्ते से भटकते हुए देखें, तो बोलें। नागरिक के रूप में हमारा कर्तव्य है कि हम जीवंत आलोचना करें। हमें स्वतंत्र रूप से बोलने की अनुमति क्यों नहीं दी जा रही। सुप्रीम कोर्ट जनता का सहयोगी है, और एक भारतीय नागरिक का सार्वजनिक क्षेत्राधिकार सार्वजनिक है, इसलिए नागरिकों को असहमति का अधिकार है। अदालत यह दिखाने में विफल रही कि ट्वीट न्याय में हस्तक्षेप कैसे हो सकता है? फैसले में कहा गया है कि न्यायालय पर से जनता का विश्वास हिल जाएगा। क्या जनता से सलाह ली गई थी? क्या तीन जज ही जनता हैं? कई संपादकीय और बयान फैसले के खिलाफ आए हैं, और उनसे स्पष्ट है कि लोग बोलने की आजादी के हिमायती हैं। मैं सुप्रीम कोर्ट के 32 जजों की एक पूर्ण अदालत द्वारा फैसले पर पुनर्विचार पर अपील करती हूं, हम यह जानना चाहते हैं कि क्या यह (फैसला) पूरे न्यायालय का नजरिया है?
अलग-अलग लोगों के बयानों के हिस्से ऊपर देने के साथ-साथ हम अपनी तरफ से आज यहां बस इतना लिखना चाहते हैं कि आज सुप्रीम कोर्ट के सामने दो विकल्प हैं, वह सजा पर फैसला भी दे सकता है, और वह इंसाफ भी कर सकता है। यह एक ऐतिहासिक मौका है, और आज इस बेंच में मौजूद तीन जजों के जाने के बाद भी लोकतंत्र और न्यायपालिका, हिन्दुस्तान का संविधान, और जनता की जिम्मेदारी, इन सब मुद्दों पर जमकर इतिहास लिखा जाएगा।
अभी हफ्ते भर पहले प्रकाशित हुई एक किताब जिसमें अगली पीढ़ी के युवा नेताओं के इंटरव्यू हैं, उसमें ऐसा छपा है कि प्रियंका गांधी ने किताब के लेखकों को कहा है कि वे अपने भाई राहुल गांधी से पूरी तरह सहमत हैं कि किसी गैरकांग्रेसी को कांग्रेस अध्यक्ष बनाया जाना चाहिए। किताब के मुताबिक प्रियंका ने कहा है कि हममें (परिवार) से किसी को पार्टी अध्यक्ष नहीं होना चाहिए, पार्टी के अपना रास्ता खुद तलाशना चाहिए।
अभी पिछले दो घंटों में देश के तमाम मीडिया में इस किताब से प्रियंका की बातचीत के हिस्से छा गए हैं, और यह किसी किताब की बिक्री के लिए एक शानदार तरीका भी रहता है। लेकिन इन कुछ घंटों में दिल्ली में प्रियंका, या कांग्रेस पार्टी की तरफ से इन खबरों के खिलाफ कुछ नहीं कहा गया है, तो हम भी पहली नजर में किताब के लेखकों से उनकी बातचीत से सही मान रहे हैं। प्रियंका का इंटरव्यू पढऩे लायक है, क्योंकि उसमें परिवार और पार्टी की बहुत सी बातों पर पहली बार उनका बयान आया है, लेकिन आज यहां उस पर लिखने का मकसद कांग्रेस अध्यक्ष के बारे में लिखना है।
अगर ये बातें सही हैं, तो कांग्रेस पार्टी के पास एक बार गांधी नाम की लाठी के बिना अपने पैरों पर खड़े होने का एक मौका आया हुआ दिख रहा है। और खुद गांधी परिवार के इन तीन लोगों को भी कुछ बरस चैन से गुजारना चाहिए, अगर वे सचमुच ही पार्टी की लीडरशिप से कुछ या अधिक वक्त के लिए अलग होना चाहते हैं, तो शायद यह सबसे सही मौका है, और अगर इस मौके को यह परिवार चूकता है, तो यही माना जाएगा कि वह मन-मन भावे, मूड़ हिलावे का काम कर रहा है।
आज जब हम इस परिवार के बाहर कांग्रेस अध्यक्ष की संभावना पर चर्चा कर रहे हैं, तो हो सकता है कि पहले हमारी लिखी हुई कुछ बातों से परे जाकर, या उसके खिलाफ भी जाकर हम यहां लिख रहे हों। शीशे पर लुढक़ते पारे की तरह अस्थिर राजनीति में जब हालात बदलते हैं, तो व्यक्तियों और पार्टियों के कुछ पहलुओं के बारे में हमारे जैसे लोगों के खयालात भी बदलते हैं। आज कांग्रेस पार्टी में गांधी परिवार सर्वमान्य और स्वाभाविक नेता है, तो यह यथास्थिति कांग्रेस के लिए पार्टी के भीतर विवादहीन और सुविधाजनक लगती है। लेकिन दूसरी तरफ कांग्रेस की संभावनाएं, और खुद इस परिवार की संभावनाएं यह स्थिति जारी रहने पर कमजोर लगती हैं। हो सकता है कि परिवार से परे की पार्टी लीडरशिप पार्टी का भी भला कर सके, और इस परिवार को भी सांस लेने का एक मौका दे सके। आज जब तक कांग्रेस में लीडरशिप के स्तर पर कोई शून्य नहीं है, तब तक यह सोचना कुछ मुश्किल है कि उसे कौन भर सकते हैं। लेकिन यह संभावना असंभव नहीं है। 18 बरस प्रधानमंत्री रहने के बाद जब नेहरू गुजरे थे, तो उनके रहते-रहते ही यह सवाल उठने लगा था कि नेहरू के बाद कौन? लेकिन नेहरू के बाद भी हिन्दुस्तान खत्म नहीं हुआ, जब भारतीय जनता पार्टी संसद में दो सीटों पर आ गई थी, तब भी उसकी संभावनाएं खत्म नहीं हुई थीं, और आज वह संसद में फर्श, दीवार, और छत तक पर काबिज हुई है। जब इमरजेंसी लगी थी, तो उसके बाद के चुनाव में इंदिरा का जो हाल हुआ था, उससे लगता था कि अब वे खत्म हो गई हैं, लेकिन वे तो ढाई बरस के भीतर ही खुद-गिरी जनता पार्टी सरकार के बाद सत्ता पर आ गई थीं। नरसिंहराव के प्रधानमंत्री रहते हुए सोनिया परिवार से कोई भी न पार्टी अध्यक्ष थे, और न ही किसी मंत्री पद पर भी थे, लेकिन फिर भी यह परिवार पार्टी की सत्ता पर फिर से आ गया, और लगातार दो कार्यकाल के लिए मनमोहन सिंह की सरकार बनाने में कामयाब हुआ। इसलिए इस परिवार को ऐसी किसी दहशत में रहने की कोई जरूरत भी नहीं है कि एक बार पार्टी की कमान किसी बाहरी के हाथ चली गई, तो वह घर में लौटेगी ही नहीं। लोगों को यह याद रखना चाहिए कि काबिल मालिक वे नहीं होते हैं, जो कि अपने कारोबार को बर्बाद करने की हद तक खुद चलाते हैं, काबिल मालिक वे होते हैं जो काबिल मैनेजर रखकर उसके हाथों कारोबार को कामयाब बनाते हैं।
किसी पार्टी में इतनी जिंदगी बाकी भी रहना चाहिए कि वह सबसे आसानी से हासिल एक विकल्प से परे सोचने की मशक्कत भी कर सके। बिना ऐसी मशक्कत के, पार्टी के बाकी लोगों के सामने बिना किसी संभावना के पार्टी मुर्दा होने लगती है। आज देश में बहुत से ऐसे कांग्रेस नेता हो सकते हैं जो कि पार्टी को राहुल या सोनिया के मुकाबले बेहतर तरीके से चला सकें। पार्टी के नेताओं की क्षमता को कम नहीं आंकना चाहिए। कांग्रेस में प्रदेश स्तर पर भी कई ऐसे नेता हाल के बरसों में उभरकर सामने आए हैं जिन्होंने बड़ी उम्मीदें जगाई हैं। छत्तीसगढ़ में भूपेश बघेल ने विपक्षी पार्टी के अध्यक्ष रहते हुए जिस दम-खम के साथ भाजपा की रमन सरकार का विरोध किया था, और जिस अभूतपूर्व-ऐतिहासिक बहुमत के साथ उन्होंने कांग्रेस की सरकार बनाई, कुछ वैसी ही मेहनत और लड़ाई की जरूरत कांग्रेस को देश भर में है।
राहुल, सोनिया, और प्रियंका से परे की कांग्रेस लीडरशिप, कांग्रेस विरोधी पार्टियों, खासकर भाजपा, के हाथों से एक बड़ा मुद्दा भी छीनकर ले जाएंगे। कुनबापरस्ती या व्यक्तिवादी पार्टी का भाजपा का आरोप हमेशा ही कांग्रेस के खिलाफ एक आसान और सदासुलभ हथियार रहा, फिर चाहे उसके अपने साथियों में से अधिकांश ठीक इसी तरह के व्यक्तिवादी और कुनबापरस्त क्यों न रहे हों। भाजपा ने समय-समय पर, और सबसे लंबे समय तक शिवसेना और अकाली दल इन दो पार्टियों पर सवारी की है, और दोनों ही परले दर्जे की व्यक्तिवादी और कुनबापरस्त पार्टियां रही हैं। ठीक ऐसी ही पार्टी बसपा के साथ भी भाजपा की भागीदारी रही है, और एनडीए की दूसरी पार्टियों में दर्जन भर पार्टियां ऐसी ही खूबी या खामी वाली रही हैं। फिर भी भाजपा का अकेला हमला कांग्रेस पर ही होते आया है, और वह भी किसी गैरगांधी पार्टी अध्यक्ष रहने से बेअसर हो जाएगा।
जो भी कारोबार, या राजनीतिक-सामाजिक काम अधिक चुनौतियों भरे होते हैं, उनमें नया खून हमेशा ही कुछ न कुछ बेहतर संभावनाएं ला सकता है। कांग्रेस को अपने इस राज परिवार की आम सहमति के बाद इनकी हसरत और इनकी जरूरत की इज्जत करनी चाहिए, और अपने आपको एक दीवालिया पार्टी न मानकर दूसरा नेता चुनना चाहिए। हो सकता है कि देश और प्रदेशों में कांग्रेस पार्टी नए लोगों के बारे में सोचे, तो इसके भीतर एक लोकतांत्रिक उत्साह भी आए। अगले आम चुनाव में अभी खासा वक्त है, और यही सही समय है कि पार्टी किसी और को अगर मुखिया चुनने जा रही है तो वह अभी चुना जाना चाहिए, छांटा जाना चाहिए।
खाने-पीने के शौक के लिए विख्यात शहर इंदौर की एक तस्वीर किसी ने ट्विटर पर पोस्ट की हैं कि वहां बाजारों में लोग खाने-पीने किस तरह टूट पड़े हैं। उस शहर में खाने-पीने की संस्कृति ऐसी है कि लोग रात खाने के बाद भी घर से निकलकर बाजार जाते हैं, और वहां कुछ-कुछ और भी खाते हैं। इसलिए अब तो वैसी भीड़ वहां दिखनी ही थी। लेकिन छत्तीसगढ़ के अलग-अलग कई शहरों से खबर यह है कि कोरोना पॉजिटिव के आंकड़े चाहे कितने ही बढ़ते जाएं, लोग लॉकडाऊन खत्म होने के तुरंत बाद खाने-पीने के लिए निकल पड़े हैं। आबादी का एक बहुत छोटा सा हिस्सा ऐसा होगा जो कि कोरोना से डरा हुआ होगा, बाकी लोगों की धडक़ लॉकडाऊन खुलने के साथ ही खुल गई है।
राजधानी में सुबह की सैर पर निकले लोग बिना मास्क निकलते हैं, और अगल-बगल सटे हुए चलते हुए गप्प मारते जाते हैं। जितना उन्हें अच्छा लगता है, उतना ही अच्छा कोरोना को भी लगता होगा। लोगों को याद होगा कि जिस वक्त लॉकडाऊन दुबारा लगाने की नौबत आ रही थी उस वक्त उसे दो-तीन दिन लेट किया गया क्योंकि सामने हरेली का त्यौहार था। आज फिर पोला के मौके पर उसी तरह का माहौल दिख रहा है, सरकारी जलसा भी चल रहा है, और लोगों के बीच भी त्यौहारों का माहौल सिर चढक़र बोल रहा है। कोरोना को और चाहिए क्या? वह नास्तिकों के बीच तो भूखों मर जाता है, लेकिन आस्तिकों के बीच उसके शिकार चलकर पहुंचते हैं।
लापरवाह लोगों को याद रखना चाहिए कि उनके परिवार के बच्चे और बूढ़े बेबस हैं कि वे उन्हें रोक नहीं सकते, लेकिन उनसे कोरोना पाने का खतरा जरूर रहते हैं। इसी तरह दफ्तरों के बड़े लोग, कारोबार के मालिक अगर लापरवाह होते हैं, तो उनके मातहत भी खतरा झेलते हैं। ऐसे लापरवाह लोगों को देश का झंडा उठाकर राष्ट्रप्रेम साबित करने में तो बड़ा मजा आता है, लेकिन उन्हें यह फिक्र नहीं रहती कि इस देश के लोगों को बचाने के लिए पुलिस, स्वास्थ्य कर्मचारी, और एम्बुलेंसकर्मियों जैसे लोग अपनी जान दे रहे हैं ताकि कोरोनाग्रस्त लोग बच सकें। जो अब तक कोरोना से बचे हुए हैं, वे न अपनी सोच रहे, न परिवार की, न ऐसे कोरोना-योद्धाओं की।
आज देश की हालत यह है कि कोरोना के तनाव के चलते आत्महत्याएं लगातार बढ़ रही हैं, और एक-एक आत्महत्या के पीछे दसियों हजार लोग मानसिक अवसाद को शिकार होकर हताश बैठे हैं, दहशत में हैं। इनमें से किसी भी बात की फिक्र किए बिना जब संपन्न और विपन्न सभी किस्म के लोग लापरवाही में ऐसे लगे हैं कि उसका उन्हें कोई भुगतान होना है। ऐसे लोग ही जिंदगियां बचाने वाले लोगों की जिंदगियां लेने के जिम्मेदार भी हैं।
दरअसल हिन्दुस्तानी लोगों की सामूहिक जिम्मेदारी की भावना शून्य है। सडक़ पर कोई एक फिसलकर गिर पड़े, तो आसपास के तमाम लोगों को पहले हॅंसी आती है, उसके बाद उन्हें उठाने के लिए उनके हाथ बढ़ते हैं। किसी सामान की ट्रक पलटती है तो उसे लूटने में लोग सबसे आगे रहते हैं। पुलिस मुफ्त में हेलमेट या मास्क बांटती है, तो संपन्न तबके लोगों की लार भी टपकने लगती है कि मुफ्त का जो-जो मिल जाए अच्छा है। जिस देश को अपने ऊपर दुनिया का सबसे अच्छा देश होने का घमंड हो, जो अपने आपको सारे जहां से अच्छा हिन्दोस्तां बताता हो, उस देश का हाल यह है। लोग दूसरों की जान ले लेने की हद तक लापरवाह हैं, गैरजिम्मेदार हैं, और सरकारें इस कदर कायर हैं कि वे ऐसे लापरवाह लोगों पर कोई कार्रवाई करने के बजाय उन्हें मुफ्त में मास्क बांटती हैं। मुफ्त के मास्क के मुकाबले हजार-हजार रूपए जुर्माना होने लगे, तो हिन्दुस्तानी जनता में जिम्मेदारी थोड़ी सी आ भी सकती है।
इस देश में सरकारें इस कदर गैरजिम्मेदार हैं कि जून के आखिरी हफ्ते में केन्द्र सरकार के संगठन आईसीएमआर ने कोरोना-वैक्सीन पर मानव परीक्षण के लिए इतनी तैयारियां कर लेने को कहा था कि 15 अगस्त को उसकी घोषणा हो सके। उस वक्त तक मानव परीक्षण बस शुरू होने की तारीख भर आई थी कि 7-8 जुलाई से परीक्षण शुरू होगा, और भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद ने वैक्सीन उतारने की तारीख भी छांट ली थी कि आजादी की सालगिरह पर यह काम किया जाएगा। ऐसे गैरजिम्मेदार देश में आम जनता की गैरजिम्मेदारी किसी हैरानी की बात नहीं है। सरकार और केन्द्र सरकार के संगठनों के रूख लोगों का रूख भी तय करते हैं। आज देश में सामूहिक जिम्मेदारी और सामूहिक जवाबदेही शून्य है। यह बात किसी भी राष्ट्रीय खतरे की घड़ी में खतरे को कई गुना बढ़ा सकती है, बढ़ाती है। अमरीका कोरोना के खतरे के बीच एक अलग किस्म का खतरा झेल रहा है, वहां पर लोग मास्क न पहनने को अपना बुनियादी संवैधानिक अधिकार मानकर चल रहे हैं, और मास्क की तमाम बंदिशों के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे हैं, सार्वजनिक और सामूहिक रूप से मास्क जला रहे हैं। अपने बुनियादी अधिकारों को लेकर लोगों को सेहत के खतरे भी दिखना बंद हो गए हैं, और सरकार के निर्देश मानना भी उन्हें गैरजरूरी लग रहा है। हिन्दुस्तान में सरकार कागजी निर्देश तो इतने दे रही है कि कोई फोन करने पर पहले 20 सेकेंड सिर्फ कोरोना से सावधानी सुननी पड़ रही है, ऐसे में कभी यह भी हो सकता है कि किसी इमरजेंसी में, पुलिस, फायरब्रिगेड, या एम्बुलेंस को बुलाने के लिए फोन लगाया जाए, और कोरोना सुनते हुए ही कोई दम तोड़ दे। दूसरी तरफ लोगों के बीच यह टेलीफोन-चेतावनी मजाक बन गई है, कोरोना का खतरा मजाक बन गया है। एक से अधिक मामलों में केन्द्र सरकार के संगठन यूजीसी या दूसरे कोई संगठन ऐसे माहौल में भी इम्तिहान लेना तय कर रहे हैं, और अपने महफूज टापुओं पर बैठे सुप्रीम कोर्ट के जज उन इम्तिहानों पर रोक भी नहीं लगा रहे हैं। खुद जज तो मामलों की सुनवाई वीडियो के मार्फत कर रहे हैं, क्या इम्तिहान देने वाले बच्चों को ऐसी हिफाजत हासिल हो सकेगी?
देश का यह सिलसिला जानलेवा साबित होगा। यह लापरवाही जितनी लंबी खिंचेगी, उतनी ही लंबी लोगों की बेरोजगारी, बेकारी, गरीबी भी रहेगी। लोगों को अगले कुछ महीने जिंदा रहने की मदद करके, नियम-कानून कड़ाई से लागू करके, किसी वैक्सीन के आने तक कोरोना के खतरे को अगर टाला जाए, तो ही बेहतर है। आज लापरवाह लोगों को उनकी जुर्माना-भुगतान की ताकत के मुताबिक तगड़ा जुर्माना लगाना चाहिए ताकि लोग बिना मास्क मटरगश्ती करना भूल जाएं, और डॉक्टर-पुलिस जैसे तबकों के लिए खतरा न बनें। सरकारों को इस मौके पर अपनी लोकप्रियता, और वोटरों को खुश रखने की फिक्र नहीं करना चाहिए, देश और दुनिया को इतिहास के इस सबसे बड़े खतरे से बचाने की जिम्मेदारी पूरी करनी चाहिए। (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)
भारत के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस शरद अरविंद बोबड़े की एक परदेसी मोटरसाइकिल सवारी पर सुप्रीम कोर्ट के एक प्रमुख वकील और एक प्रमुख सामाजिक कार्यकर्ता प्रशांत भूषण की ट्वीट को सुप्रीम कोर्ट ने अदालत की अवमानना माना है, और अभी दो दिन बाद अदालत उनकी सजा तय करेगी। प्रशांत भूषण ऐसी सजा से डरने वाले वकील नहीं हैं, उन्होंने अपने पिता, देश के एक वरिष्ठ वकील और भूतपूर्व कानून मंत्री के साथ मिलकर सुप्रीम कोर्ट के बहुत से जजों के भ्रष्ट होने की बात कई बार औपचारिक रूप से कही थी, और शायद 10 बरस पहले से वह अवमानना केस भी चल रहा था, और अब शायद उसे भी खोला जा रहा है।
हम कुछ दिन पहले इस मुद्दे पर लिख चुके हैं कि हम प्रशांत भूषण के तर्क से सहमत हैं कि कोई जज सुप्रीम कोर्ट नहीं होता, और किसी जज के तौर-तरीकों की आलोचना अदालत की आलोचना नहीं हो सकती। हमारा खुद का यह मानना है कि सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश अपने गृहनगर नागपुर में सुबह की सैर पर थे, और वहां खड़ी एक बहुत महंगी विदेशी मोटरसाइकिल को देखकर उनका पुराना शौक जाग गया, और वे मोटरसाइकिल पर बैठकर उसे महसूस करने लगे। इसे लेकर देश में सैकड़ों कार्टून बने, और लाखों ट्वीट की गईं। जाहिर है कि देश के मुख्य न्यायाधीश को इस तरह सार्वजनिक रूप से देखना देश को बहुत बार तो नसीब होता भी नहीं है। सीजेआई की आलोचना करने वाले भी हजारों लोग थे कि एक भाजपा नेता के बेटे की मोटरसाइकिल पर इस तरह बैठना उन्हें शोभा नहीं देता। हम तो शोभा के ऐसे पैमानों पर भरोसा नहीं करते लेकिन फिर भी चूंकि देश का सुप्रीम कोर्ट, हाईकोर्ट, और यहां तक कि छोटी अदालतें भी अपने मान-सम्मान को लेकर छुईमुई के पौधे की पत्तियों की तरह संवेदनशील रहती हैं, इसलिए उन्हें कम से कम यह सोचना चाहिए कि अपने सार्वजनिक बर्ताव से वे हॅंसी-मजाक या हिकारत का सामान न बनें।
अब जब यह मुद्दा बन ही गया, और प्रशांत भूषण जैसे दसियों हजार लोगों ने सोशल मीडिया पर अदालत की जमकर चर्चा की, जज की बाईक सवारी की आलोचना की, और अदालत ने सुनवाई करके इसे अपनी अवमानना मान ही लिया, तो देश को आज इस पर चर्चा करनी चाहिए। यह देश अंग्रेजों के उन रीति-रिवाजों से आजाद नहीं हुआ जिन पर इस देश का सुप्रीम कोर्ट और बाकी की न्यायपालिका अभी चलते हैं। अंग्रेजों को अपने ठंडे देश में माकूल बैठने वाली जो काली पोशाक हिन्दुस्तान की सत्ता पर ठीक लगती थी, वही काला बोझ हिन्दुस्तानी न्यायपालिका आज तक ढो रही है। जब धरती खौलती रहती है, तब भी अदालतें वकीलों से काले लबादे में वहां पहुंचने की उम्मीद करती हैं। लेकिन हिन्दुस्तान का लोकतंत्र अंग्रेजों के छोड़े हुए ऐसे लबादों को नहीं ढोता। यह लोकतंत्र एक जिंदा लोकतंत्र है, इसने इमरजेंसी भी देखी है, उससे भी उबरा है, कई और किस्म की तानाशाही भी देखी हैं, उनसे भी उबरा है। इस देश का इतिहास गांधी के आंदोलन का है जो कि उस वक्त की सत्ता से असहमति रखने पर सविनय अवज्ञा आंदोलन चलाते थे। इस देश को अपने ऐसे गौरवशाली लोकतांत्रिक इतिहास को याद रखना चाहिए, और देश के जो लोग सुप्रीम कोर्ट के रूख से सहमत नहीं हैं, उन्हें अदालत के रूख के खिलाफ एक सविनय अवज्ञा आंदोलन छेडऩा चाहिए।
आज प्रशांत भूषण की जिस ट्वीट को लेकर सुप्रीम कोर्ट इस कदर संवेदनशील हो गया है, वह आज भी सोशल मीडिया पर मौजूद है। जिन लोगों को लगता है कि प्रशांत भूषण सही हैं, उनके पास आज भी यह हक हासिल है कि वे उस ट्वीट को री-ट्वीट करके कहें कि वे प्रशांत भूषण की बात से सहमत हैं, और वे अपने आपको अदालत के सामने पेश कर रहे हैं कि जो सजा प्रशांत भूषण की, वही सजा उन्हें भी दी जाए।
सविनय अवज्ञा का आजाद हिन्दुस्तान में यह कोई पहला मौका नहीं रहेगा, और न ही सुप्रीम कोर्ट के फैसलों से, उसके रूख से, उसके जजों के सार्वजनिक बर्ताव से असहमति का यह पहला मौका रहेगा। लेकिन लोकतंत्र अदालत से ऊपर है, अदालत लोकतंत्र का एक हिस्सा है, पूरा का पूरा लोकतंत्र नहीं। इसलिए अदालत के इस रूख और प्रशांत भूषण को गुनहगार ठहराने से असहमत लोगों के सामने आज भी यह मौका है कि वे अगले दो दिनों में अपनी असहमति को इतिहास में दर्ज कराएं, और सुप्रीम कोर्ट को यह अहसास कराएं कि उसे महज प्रशांत भूषण को सजा नहीं देनी होगी, हजारों, दसियों हजार, या शायद लाखों लोगों को सजा देनी होगी।
यह तो हिन्दुस्तान में अदालतों को लेकर एक निहायत ही गैरजरूरी लिहाज बरता जाता है। अमरीका में देखें तो वहां किसी को जज बनाने के पहले लंबी-चौड़ी खुली संसदीय सुनवाई चलती है, और संभावित जज से उसकी निजी जिंदगी, उसकी निजी सोच पर कई-कई दिन तक सवाल पूछे जाते हैं। वहां पर अदालतों में जब कोई नाजुक मामला फैसले तक पहुंचता है, तो सुनवाई के वक्त भी, और फैसले के दिन भी मामले के पहलुओं से जुड़े हुए लोग अदालत के बाहर सडक़ों पर प्रदर्शन करते हैं, बैनर-पोस्टर लेकर नारे लगाते हैं, और खुलकर अपनी बात रखते हैं। आज हिन्दुस्तान में अगर ऐसा हो तो उसे जजों को प्रभावित करने वाला काम मान लिया जाएगा, और उसे अदालत की अवमानना भी मान लिया जाएगा।
इस देश में संसद और उसकी तर्ज पर विधानसभाओं ने अपने आपको जनता की प्रतिक्रियाओं से महफूज रखने के लिए अलग कानून बना रखे हैं। कुछ बातों को अदालत अपनी अवमानना मानती है, और इस देश की संसदीय व्यवस्था कुछ बातों को अपने विशेषाधिकार का हनन मानती है। संसद और विधानसभाओं को अपार अधिकार दिए गए हैं कि उनका विशेषाधिकार भंग करने वाले लोगों को वे कितनी भी सजा दे सकती हैं। अदालतों की सुनाई गई सजा की तो सीमा है, लेकिन सदन किसी को कितनी भी सजा दे सकता है। यह पूरा सिलसिला अलोकतांत्रिक है। यह पूरा सिलसिला खत्म होना चाहिए। किसी एक जज के अधिकार, किसी एक सांसद या विधायक के अधिकार देश के आम नागरिकों के अधिकार से अधिक कैसे हो सकते हैं? अगर अस्पताल में लोग जाकर किसी डॉक्टर को पीटते हैं, तो उस डॉक्टर का क्या कोई विशेषाधिकार हनन होता है? क्या यह उस डॉक्टर की अवमानना गिनी जाती है? उस डॉक्टर के पास पुलिस में रिपोर्ट दर्ज कराने, अदालत में केस करने की आजादी रहती है, और उतना ही हक भी रहता है। अदालत या संसद को इससे अधिक कोई हक क्यों होना चाहिए? किसी मामले की सुनवाई के दौरान अगर कोई वकील या गवाह जजों के साथ बदसलूकी करते हैं, तो भी उसके लिए आपराधिक मामला चलाने का एक प्रावधान रहना चाहिए, न कि जनता के पैसों पर तनख्वाह पाने वाले लोग उसे अपनी अवमानना मानें। ऐसा मानना यही जाहिर करता है कि जजों और सांसद-विधायकों में लोकतंत्र के लिए संविधान में लिखे गए शब्दों भर की समझ है, और लोकतंत्र की भावना उन्हें छू नहीं गई है। जनता के बीच से आंदोलन खड़ा होना चाहिए ताकि यह सिलसिला खत्म हो सके। देश के किसी भी आम नागरिक, सरकार के किसी भी आम कर्मचारी के अधिकार, उनका सम्मान जजों और सांसद-विधायकों से कम कैसे हो सकता है? इसलिए चुनिंदा तबके अपने सम्मान के पुतले खड़े करें, और फिर उनकी हिफाजत के लिए बंदूकों का घेरा डलवा दें, यह लोकतंत्र नहीं है। संविधान की भावना के खिलाफ जाकर इस देश के ताकतवर तबके ऐसे नियम बनाते आए हैं जो अलोकतांत्रिक हैं। इस काम में संसद और विधानसभाओं के भी मुकाबले न्यायपालिका बहुत आगे है, और उसने अपने आपको लोकतंत्र में अपनी भूमिका के मुकाबले बहुत अधिक और अतिरिक्त सम्मान का केन्द्र बनाकर रखा हुआ है। हम ऐसे भेदभाव के खिलाफ हैं। अदालतों को या किसी भी और संवैधानिक संस्था को ऐसे विशेषाधिकार देना आम जनता के नागरिकता के बुनियादी अधिकारों के खिलाफ है।
आज इस देश में जो लोकतांत्रिक आंदोलनकारी हैं, उनके सामने यह एक मौका है कि वे अपने आपको प्रशांत भूषण के साथ खड़ा दिखाएं, और इसकी राह तो गांधी ने सविनय अवज्ञा आंदोलन से दिखाई ही थी। अंग्रेजों के कानूनों की परवाह करके अगर गांधी उस यथास्थिति को बने रहने देते, तो देश तो कभी आजाद होता ही नहीं।(क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)
दो दिन पहले आजादी की सालगिरह के जलसे की तैयारी के बीच हमने देश के ऐसे कुछ तबकों को याद किया था जिनके लिए आजादी आज भी नहीं है। जिस 14 अगस्त की दोपहर हम यह लिख रहे थे, और इसके साथ गुजरात के उना में दलितों के साथ हुई हिंसा की तस्वीरों से तिरंगा बना रहे थे, ठीक उसी समय उत्तरप्रदेश के लखीमपुर खीरी में दिल दहलाने वाली एक और हिंसा दलितों के साथ हो रही थी। तेरह बरस की एक बच्ची दोपहर शौच के लिए गन्ने की खेतों की तरफ गईं, और उसके साथ दो युवकों ने बलात्कार किया, उसकी जीभ काट ली, उसकी आंखें निकाल लीं, और उसके गले में फंदा डालकर खेत में घसीटा, और फिर उसे मार डाला। गांव के ही संतोष यादव और संजय गौतम पर रेप का आरोप लगा है, और पुलिस ने पोस्टमार्टम में गैंगरेप पाए जाने के बाद इन दोनों को रेप-हत्या में गिरफ्तार कर लिया है।
हिन्दुस्तान में परिवार और जान-पहचान से परे जितने बलात्कार होते हैं, उनके पीछे एक बात खुलकर दिखती है कि वे समाज में ऊंची समझी जाने वाली जातियों के लोगों द्वारा उनसे नीची समझी जाने वाली जातियों के लोगों पर किए जाते हैं। ऐसा ही कुछ हत्या या हिंसा के दूसरे मामलों में भी होता है कि अपने से कमजोर जाति पर हिंसा के मामलों में दिखता है, हालांकि प्रदेशों की सरकारें और भारत सरकार के आंकड़े ऐसी व्यक्तिगत हिंसा के पीछे जाति के आधार पर विश्लेषण करके सामने रखते नहीं हैं, लेकिन आए दिन आने वाली ऐसी खबरों को देखें तो यह बात साफ दिखती है कि सबसे अधिक निजी हिंसा इस देश में दलितों के खिलाफ होती है, उसके बाद आदिवासियों के खिलाफ, और उसके बाद दूसरी कमजोर जातियों के खिलाफ। जो लोग जातिवादी व्यवस्था के अस्तित्व को मानना नहीं चाहते, वे इसके खिलाफ कुछ तर्क आसानी से ढूंढकर निकाल सकते हैं कि ऐसी हिंसा किसी जाति के आधार पर नहीं होती, बल्कि संपन्नता के आधार पर होती है, और संपन्न लोग विपन्न लोगों के साथ ऐसी ज्यादती इसलिए अधिक करते हैं क्योंकि वे प्रतिरोध करने की हालत में नहीं रहते। हो सकता है कि ऐसा हो, लेकिन यह भी समझने की जरूरत है कि दलित आबादी का अधिकांश हिस्सा सबसे गरीब है, उसके बाद आदिवासियों का अधिकांश हिस्सा गरीब है। लेकिन आदिवासियों के साथ एक बात रहती है कि उन्हें हिन्दू समाज का सवर्ण हिस्सा अछूत नहीं मानता, और उनके साथ उतने जुल्म उन्हें जरूरी नहीं लगते जितने कि दलितों के साथ लगते हैं। मध्यप्रदेश में आज भी बहुत से इलाकों के किसी भी गांव में कोई दलित दूल्हा घोड़ी पर चढक़र नहीं निकल सकता, और हर बरस ऐसे में हिंसा की कई वारदातें सामने आती हैं, पुलिस की सुरक्षा में ऐसी बारात निकाली जाती है, और अभी कुछ समय पहले की तस्वीरें याद पड़ती हैं जिनमें घोड़ी पर चढ़ा दलित दूल्हा, और हिफाजत करते चल रही पुलिस सवर्ण पत्थरों से बचने के लिए हेलमेट लगाए हुए थे।
लेकिन उत्तरप्रदेश में अभी जिस दलित बच्ची के साथ यह बलात्कार और हिंसा हुई है, उसे देखकर कुछ और बातों पर भी सोचने को दिल करता है। पहली बात तो यह कि क्या ऐसे जुर्म देखते हुए भी हमें मौत की सजा के खिलाफ अपनी सोच को बदल नहीं देना चाहिए? हमारी सोच महज सोच है, देश का कानून तो ऐसे बलात्कारी-हत्यारों को मौत की सजा दे ही सकता है क्योंकि आज उसका प्रावधान है। बच्ची से सामूहिक बलात्कार, उसके बाद उसकी जीभ काटना, उसकी आंखें निकालना, उसे खेत में घसीटना, और उसे मार डालना, ये सारे काम मौत की सजा से कम किसी लायक नहीं हैं, और जब कभी इस पर फैसला आएगा, हमारा अंदाज है कि मौत की सजा ही होगी। लेकिन उससे कमजोर तबकों पर, कमजोर जातियों पर, बच्चियों पर खतरा कम नहीं हो जाता। उत्तर भारत और मध्यप्रदेश ऐसी दलित ज्यादतियों की अधिक वारदातों वाले राज्य हैं। उत्तरप्रदेश के बारे में यह कहा जाता है कि वहां पुलिस का साम्प्रदायीकरण भी हुआ है, और जातिकरण भी हुआ है। समाजवादी पार्टी के मुलायम-अखिलेश की सरकारों के चलते वहां की पुलिस का यादवीकरण लिखा जाता था। अभी पुलिस की धर्मान्ध और जातिवादी सोच के चलते अल्पसंख्यक तबके, और दलित लगातार समाज और पुलिस दोनों के निशानों पर बने हुए हैं। यह सिलसिला खत्म करने की नीयत उत्तरप्रदेश की किसी पार्टी में नहीं दिखती है, और कमोबेश यही हाल मध्यप्रदेश में भी है।
दलितों और आदिवासियों की हिफाजत के लिए अलग से कानून बने हुए हैं, और अभी कुछ समय पहले उसके कुछ प्रावधानों की धार भोथरी करने की कोशिश की गई थी, लेकिन पूरे देश में उसका जमकर विरोध हुआ, और वह सिलसिला वापिस लेना पड़ा। दिक्कत यह है कि सरकार, संसद, और न्यायपालिका, मीडिया और दूसरी संवैधानिक संस्थाओं में अगर इन कमजोर तबकों के लोग भी बैठे हुए हैं, तो भी वे खुद ताकत पाकर सत्ता की एक सोच से लैस हो जाते हैं, और जिन तबकों से वे आते हैं, उनके वर्गहित के खिलाफ काम करने लगते हैं।
पिछले दो दिनों से देश में आजादी के बहुत गीत गाए जा रहे हैं, प्रधानमंत्री ने भी कल आजाद हिन्दुस्तान के इतिहास का सबसे लंबा भाषण दिया है। लेकिन देश में दलितों की जो हालत है, उन पर हिंसा की वारदातों के चलते हुए भी प्रधानमंत्री सहित बहुत से नेताओं के मुंह नहीं खुलते हैं। गुजरात के उना में दलितों पर जुल्म के जो नजारे सामने आए, उन्होंने पूरी दुनिया में हिन्दुस्तान के लिए शर्मिंदगी पैदा की थी। लेकिन इस देश में फैसले लेने की ताकत रखने वाले तबकों को कोई शर्म नहीं आती, उन्हें आजादी के जलसे मनाने में फख्र जरूर होता है।(क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)
आज जब बाकी दुनिया के साथ-साथ खतरे में जुटा हुआ, आशंका से घिरा हुआ, और सहमा हुआ हिन्दुस्तान अपनी आजादी की सालगिरह मनाने जा रहा है, तो इसके ठीक पहले आज की एक खबर मानो यह साबित करने के लिए आई कि आजादी किनके लिए नहीं है। दिल्ली की खबर है कि वहां महिला आयोग ने पुलिस के साथ मिलकर ढाई महीना की एक बच्ची को बरामद किया है जो पिछले कुछ महीनों में चार बार बिक चुकी है। अमनप्रीत नाम के एक आदमी ने तीसरी बेटी होने पर इसे 40 हजार रूपए में बेच दिया था, और उसके बाद बच्ची एक ग्राहक से दूसरे ग्राहक के पास चार बार बिक गई।
कल इसी वक्त जिस दिल्ली के लालकिले से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अपना पांचवां या छठवां भाषण देंगे, उस दिल्ली का यह मामला दिल दहला देता है। आज जब लोग अपने बच्चों को कलेजे से लगाए घर बैठे हैं वे कहीं कोरोना की पकड़ में न आ जाएं, तब ढाई महीने की यह बच्ची एक सामान की तरह आगे, और आगे बिकती चली गई!
अब आजादी की पौन सदी के करीब यह लगता है कि देश में कौन-कौन आजाद नहीं हैं? लड़कियां तो बिल्कुल आजाद नहीं हैं कि वे लडक़ों के इंतजार में पैदा की जाती हैं, या पैदा होने के पहले मार डाली जाती हैं, या पैदा होने के बाद बेच दी जाती है, या घर पर भूखी रह जाती हैं, बिना पढ़ाई रह जाती हैं। महिलाएं भी बिल्कुल आजाद नहीं है जिनकी कोख से जन्मी बच्ची को बाप इस तरह बेच दे रहा है, और वह शायद अपनी बची दो बच्चियों को किसी तरह बचाकर घर पर चुप बैठी होगी।
इस देश की आजादी ने इतने दशकों में बच्चियों और महिलाओं को कोई हिफाजत नहीं दी। इसने धार्मिक अल्पसंख्यकों के सिर पर से खतरे उठाने में कामयाबी हासिल की भी थी, तो वह कामयाबी हाल के बरसों में मिट्टी में मिल गई। आम लोगों को काफी हद तक मन की बात कहने का हक हिन्दुस्तान में मिला हुआ था, लेकिन अब इस हक के लिए उनका प्रधानमंत्री होना जरूरी कर दिया गया है। बाकी लोगों के खिलाफ मन की कोई लोकतांत्रिक बात भी सामने आने पर उन्हें जेल भेजने का इंतजाम सरकारें अपनी-अपनी मर्जी से कर रही हैं।
लोगों को जो आजादी मिली है, वह भी सामने है। हाल के महीनों में यह आजादी खुलकर सामने आई जब महानगरों और कारखाना-शहरों से अपने गांव लौटते मजदूरों को पैदल-सफर करने की पूरी आजादी मिली। उन्हें रात-दिन पैदल चलने से किसी ने नहीं रोका, बल्कि कई लोगों को तो आजादी की इतनी छूट मिली कि वे अपने बीमार मां-बाप या बीमार बीवी-बच्चों को भी लादकर हजारों किलोमीटर चलते हुए आए, लेकिन राह में उन्हें किसी ने नहीं रोका। इतनी आजादी भला किसे मिलती है, कोई और विकसित देश होता तो ऐसे इंसानों को ओवरलोड गाड़ी के दर्जे में गिनकर उनका चालान कर दिया जाता, लेकिन हिन्दुस्तान की सरकार ने, यहां के सूबों की सरकारों ने देश-प्रदेश की जनता को पूरी आजादी दी। हालांकि यूपी-बिहार जैसे कुछ प्रदेश ऐसे भी रहे जिन्होंने लौट रहे मजदूरों को सूबे की सरहद पर पीटा कि अभी तो स्वतंत्रता दिवस खासा दूर है, और अभी से इतनी आजादी क्यों ले रहे हैं?
आजादी की सालगिरह पल-पल याद दिलाती है कि आजादी कहां-कहां खत्म हो रही है। अब कल की ही बात है, एक टीवी चैनल पर एक हिन्दू आदमी तिलक लगाकर चले गया, तो उस पर एक विरोधी हिन्दू पार्टी के विशाल-तिलकधारी प्रवक्ता ने इतने हमले किए, इतने हमले किए कि वह मर गया। अब 70 बरस के बाद भी अगर तिलक की आजादी नहीं मिल पाई है, एक हिन्दू को भी तिलक लगाने पर गालियां मिल रही हैं, तो फिर धार्मिक आजादी किसे और कैसे मिलेगी?
भारतमाता की रक्षा करने के लिए जो फौजी बड़ी-बड़ी कसमें खाते हैं, मूंछों पर ताव देते हैं, ऐसे एक रिटायर्ड फौजी जनरल वाईडस्क्रीन टीवी की स्क्रीन से भी चौड़ी मूंछों के साथ टीवी स्टूडियो में बैठे थूक के साथ जंग के फतवे छिडक़ते हुए नफरत की आग लगाने के लिए जाने जाते हैं। और जब किसी दूसरे की बात से असहमत हुए, तो लाईव टेलीकास्ट पर ही उसे मां की गाली देने लगे। अब सवाल यह है कि उस दूसरे की मां भारतमाता से किस तरह अलग हुई? और अगर यह फौजी जनरल रिटायर होने के बाद भी देश की महिलाओं की इज्जत नहीं सीख पाया, तो वह भारतमाता की हिफाजत क्या खाकर करेगा? तो इस देश को आजादी के सात दशक पूरे करने के बाद भी मां की गाली से आजादी नहीं मिली जो कि इस देश की सबसे अधिक लोकप्रिय गाली है। इसके बाद परिवार की दूसरी लड़कियों के लिए भी गालियां बनाई गई हैं, और वही वजह है कि तीसरी बेटी होते ही उसे बेच देने का हौसला हो जाता है। अब जाहिर है कि एक परिवार अपने कितने सदस्यों के लिए दुनिया से रिटायर्ड फौजियों से, मां-बहन की गालियां झेल सकता है? यहां एक बच्ची की हिफाजत करना मुश्किल है, जहां बलात्कारियों को बचाने के लिए डंडों पर तिरंगे झंडे सजाकर लोग निकल पड़ते हैं, वहां लडक़ी को पालना कुछ खतरे की बात तो है ही। फिर गरीब बाप अपने मन की बात किसे सुनाए, तो उसने बेटी को आगे बेचकर हाथ धो लिए, और शायद वह चौथी संतान बेटा होने की कोशिश में जुट भी चुका होगा।
अदम गोंडवी ने लिखा था- सौ में सत्तर आदमी फिलहाल जब नाशाद हैं, दिल पे रखकर हाथ कहिए देश क्या आजाद है? आजादी की सालगिरह यह याद दिलाती है कि उसे हासिल करने वाले लोगों की लाश गिराने के बाद अब उनकी इज्जत को भी गोलियों से भूनकर गिराया जा रहा है। और जिसने उनकी देह को गोलियां मारकर गिराया था, उसके मंदिर बनाए जा रहे हैं। तो यह किस तरह की आजादी है? अगर आजादी का जलसा नहीं होने वाला रहता, तो शायद ये बातें नहीं खटकतीं, लेकिन चूंकि आजादी-आजादी चारों तरफ हवा में है, तो जाहिर है कि ऐसे में ही तो वे तबके सबसे पहले दिखेंगे जिन्हें आजादी नहीं है। कश्मीर में आजादी को सस्पेंड किए एक पूरा बरस हो गया है, लेकिन बाकी हिन्दुस्तान में धरती की जन्नत कहे जाने वाले इस कश्मीर के इन हालातों पर चर्चा करने वाले कितने हैं? जितने लोग सैलानी होकर कश्मीर हो आए हैं, और कश्मीरी पोशाक पहनकर तस्वीरें खिंचवा लाए हैं, उनके एक फीसदी लोग भी कश्मीर को लेकर एक भी सवाल नहीं करते। कश्मीर से बेदखल कश्मीरी पंडित उनके मुद्दे को सबसे तल्खी से उठाने वाली भाजपा की अटल सरकार के छह बरस पहले देख चुके, और अब मोदी सरकार के छह बरस देख रहे हैं, और अब भी वे कश्मीर को दूर से देख रहे हैं, वे शायद जाकर अपने घर, अपनी जमीन को भी देखने की हालत में इन दो सरकारों के इन बारह बरसों में नहीं आए हैं। ये दो अलग-अलग तबके हैं, दशकों पहले कश्मीर से बेदखल पंडित, और आज कश्मीर में बाकी बचे तकरीबन तमाम मुस्लिम, इन दोनों की आजादी का सवाल भी इस मौके पर याद पड़ता है।
हिन्दुस्तान की जिन दलितों ने हिन्दू धर्म से आधी सदी पहले आजादी हासिल की, और बौद्ध हो गए, उन्हें आज भी हिन्दुस्तानी समाज के भीतर दबंग हिन्दुओं की गुंडागर्दी से कोई आजादी नहीं मिल पाई है। आए दिन दलितों की लड़कियों से बलात्कार होते हैं, उन्हें जूतों से पीटा जाता है, उनके मुंह में पेशाब की जाती है, उनका कत्ल किया जाता है, और इस मुल्क का सुप्रीम कोर्ट इन दलितों की ऐसी गुलामी को देखने के बजाय एक-एक जायज ट्वीट में अपनी बेइज्जती ढूंढते बैठा है। अगर जज की बेइज्जती एक काबिल वकील के एक ट्वीट से हो रही है, तो जिस जाति की लड़कियों से रेप हो रहे हैं, जिन लोगों को सडक़ों पर मार-मारकर मार डाला जा रहा है, वह क्या हो रहा है? मरे जानवरों की खाल उतारने वाले एक दलित को पीट-पीटकर मार डालने से उसकी जो बेइज्जती होती है, क्या उससे भी अधिक बेइज्जती सुप्रीम कोर्ट की हो रही है जो कि बड़ा चौकन्ना होकर एक-एक ट्वीट पढ़ रहा है। यह समझने की जरूरत है इस देश में किसको क्या आजादी है, और कौन किसके गुलाम हैं? कानून की देवी जिस सुप्रीम कोर्ट के गुलाम की तरह जी रही है, उस सुप्रीम कोर्ट को पूरे हिन्दुस्तान से अपने आपको काटकर, महज अपनी इज्जत की आजादी सुहा रही है? क्या यही मुल्क की आजादी है? (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)
कांग्रेस पार्टी के एक राष्ट्रीय प्रवक्ता राजीव त्यागी की कल मौत हो गई। वे एक समाचार चैनल की बहस पर थे, और वहां भाजपा के एक प्रवक्ता अपनी आदत के मुताबिक कांग्रेस प्रवक्ता पर जहरीले आरोप लगा रहे थे। जिससे कि हो सकता है वे विचलित भी हुए हों, लेकिन इसी वजह से उन्हें दिल का दौरा पड़ा और वे चल बसे, और इसे लेकर भाजपा प्रवक्ता संबित पात्रा पर जुर्म कायम करने की मांग कुछ कांग्रेस समर्थक, और कुछ भाजपा-पात्रा विरोधी कर रहे हैं। कांग्रेस के भूतपूर्व, और शायद भावी, अध्यक्ष राहुल गांधी ने अपने इस प्रवक्ता के जाने पर ट्वीट किया है कि कांग्रेस ने आज अपना एक बब्बर शेर खो दिया। हालांकि उन्होंने भाजपा प्रवक्ता या चैनल के बारे में कोई टिप्पणी नहीं की है। देश के बहुत से समझदार लोगों ने सोशल मीडिया पर तुरंत ही यह मांग की है कि समाचार चैनलों पर ऐसी जहरीली बहसें बंद की जाएं जो कि दर्शक संख्या बढ़ाने के मकसद से स्टूडियो में इस किस्म की नफरती जंग छिड़वाती हैं। अभी कुछ ही वक्त हुआ है जब हिन्दुस्तानी फौज के एक रिटायर्ड जनरल ने ऐसी ही एक बहस के बीच एक दूसरे पैनलिस्ट को मां की गाली दी, और वह टेलीकास्ट भी हुई। उस वक्त हमने इस अखबार में यह लिखा भी था कि बाकी समाचार चैनलों के सामने यह गाली एक बहुत बड़ी चुनौती बन गई है कि इससे आगे वो और कौन सी गाली किससे किसे दिलवा सकते हैं। पाकिस्तान इस मामले में हिन्दुस्तान से जरा सा आगे है, जरा अधिक कामयाब है, वहां टीवी स्टूडियो में पैनलिस्ट एक-दूसरे से मारपीट करने पर उतर आते हैं, और वह नजारा टेलीकास्ट से परे भी चारों तरफ समाचार चैनल के शोहरत दिलवाता है। यह धंधा ही ऐसा है कि जिसमें बदनाम हुए तो क्या नाम न हुआ, का फॉर्मूला चलता है। हिन्दुस्तानी समाचार चैनलों में से अब काफी कुछ ऐसे हो गए हैं जो कि अर्नब गोस्वामी को आदर्श मानकर लाईफ टेलीकास्ट में अधिक से अधिक हिंसा की, अधिक से अधिक फूहड़, और अधिक से अधिक गंदी, साम्प्रदायिक बातें करते हैं, कि शायद इन्हीं तौर-तरीकों से वे राज्यसभा में जा सकेंगे, या पद्मश्री पा सकेंगे। कुछ चैनलों के लोग तो हर घंटे इतना साम्प्रदायिक जहर आसमान में तरंगों के रास्ते फैलाते हैं जितना कि कानपुर के सारे कारखाने महीने भर में भी गंगा में नहीं डाल सकते।
अब इस सिलसिले में कुछ लोगों ने सोशल मीडिया पर कई तरह की सलाह भी दी है। एक सलाह यह है कि कांग्रेस ऐसे चैनलों पर अपने प्रवक्ता भेजती ही क्यों है जहां पर लोगों को घोर साम्प्रदायिक, घोर हिंसक, और घोर धर्मान्ध बातें कहने के लिए छूट मिलती है, या बढ़ावा मिलता है। कुछ चैनलों पर मुर्गा लड़ाई की तरह लोगों को भिड़ाया जाता है, और पुराने जमाने के एक आदिम खेल की तरह मजा लिया जाता है, खून के प्यासे दर्शकों की प्यास बुझाई जाती है, या उन्हें इस खून की लत लगाई जाती है। दूसरी तरफ जिस तरह स्पेन में बुलफाईट होती है, और एक लड़ाका सांड को तलवार से कोंच-कोंचकर मारता है, और इस खूनी खेल को देखने के लिए पूरा स्टेडियम खून के आदी लोगों से भरा रहता है। जिस तरह लोगों ने इतिहास में पढ़ा है कि इटली के रोम में कोलोसियम में स्टेडियम की तरह दर्शक भरे रहते थे, और बीच में एक गुलाम और शेर के बीच लड़ाई करवाई जाती थी, जिसका अंत, जाहिर है कि गुलाम की मौत ही होता था। और लोग इसका मजा उठाते थे। वैसा ही कुछ हिन्दुस्तानी टीवी चैनलों में से अधिकतर की बहस के साथ होता है, और हिन्दू धर्म की रक्षा के लिए तलवार उठाए हुए कुछ ऐसे धर्मान्ध और साम्प्रदायिक टीवी चैनल भी हैं जिन्हें राष्ट्रीय सुरक्षा कानून में हमेशा के लिए उसके संपादक के साथ बंद कर देना चाहिए, लेकिन उसका हाल के बरसों में बड़ा बोलबाला है।
ऐसे खूनी माहौल में लोगों के पास बड़े आसान विकल्प भी हैं। राजनीतिक दलों के पास भी, और टीवी के दर्शकों के पास भी। लोगों को याद होगा कि एक वक्त हिन्दुस्तान में मनोहर कहानियां नाम की एक अपराध कथा पत्रिका निकलती थी। जिसे लोग आमतौर पर सफर के लिए खरीदते थे, या अकेले पढऩे के लिए। इसे कभी इज्जतदार पत्रिका नहीं माना गया, और सेलून-पानठेला छोड़ दें, तो और किसी भी जगह इस पत्रिका को खुले में नहीं रखा जाता था। एक वक्त ऐसा था जब इस पत्रिका का प्रसार इंडिया टुडे जैसी प्रतिष्ठित और अच्छी समाचार पत्रिका से भी अधिक था। लेकिन धीरे-धीरे लोगों को समझ आया कि गंदगी से अधिक यारी उन्हें, उनकी सोच को गंदा बनाकर छोड़ेगी, तो उन्होंने यह पत्रिका पढऩा बंद कर दिया, और अब तो 10-20 बरस से इसका कोई नामलेवा भी कहीं नहीं दिखा है। जो दर्शक टीवी की ऐसी हिंसा-साम्प्रदायिकता, और फूहड़-अश्लीलता से थके हुए हैं, उनके सामने ऐसे चैनल देखने की कोई मजबूरी तो है नहीं। वे अपना वक्त कुछ दूसरे बेहतर चैनलों, या टीवी से परे इंटरनेट पर बेहतर समाचार-विचार पाने में लगा सकते हैं। हिन्दुस्तान में आज भी आम अखबार आम टीवी चैनलों के मुकाबले अधिक जिम्मेदार हैं, और इंटरनेट पर बहुत सारे समाचार-माध्यम बहुत अच्छे विचार भी रखते हैं, और लोग अपनी जरूरत की जानकारी, और सोच वहां से पा सकते हैं। लोगों को यह बात अच्छी तरह समझ लेना चाहिए कि जिंदगी के रोज के चौबीस घंटों में से आठ घंटे तो सोते निकल जाते हैं, आठ घंटे औसतन काम रहता ही है, बचे आठ घंटों में भी रोज के कुछ जरूरी काम आधा वक्त ले ही लेते हैं। इस तरह इंसान के पास अपनी पसंद के अधिक से अधिक चार घंटे ही पढऩे, लिखने, देखने के लिए बचते हैं। इन चार घंटों में वे कैसा साहित्य पढ़ें, कौन से अखबार देखें, वॉट्सऐप पर आने वाली गंदगी के लिए कितना वक्त रखें, अपने सोशल मीडिया के लिए कितना वक्त रखें, और टीवी चैनल या इंटरनेट पर कितना वक्त लगाएं, उन पर किस पर वक्त लगाएं, यह एक बहुत बड़ा सवाल है। लोग टीवी चैनल पर औसतन अधिक से अधिक एक घंटा लगा पाते हैं, और इसी एक घंटे में अगर वे गंदगी और बहते हुए लहू को देखना चाहते हैं, एक नफरतजीवी रिटायर्ड फौजी जनरल के मुंह से अपने बच्चों सहित बैठकर मां की गालियां सुनना चाहते हैं, तो वे हमारी हमदर्दी के हकदार हैं। उन्हें दिमागी इलाज की जरूरत है, क्योंकि एक वक्त हिन्दुस्तान में अपराध की पत्रिकाओं को खरीदकर लोग हत्या और बलात्कार का ब्यौरा बड़ी दिलचस्पी से पढ़ते थे, फिर वही तबका टीवी समाचार चैनलों के आखिर में अपराध पर आने वाले बुलेटिन के लिए आंखों को धोकर तैयार बैठता था। ऐसे लोगों के लिए हमारे पास हमदर्दी है कि उनकी मानसिक स्थिति के इलाज के लिए हिन्दुस्तान में पर्याप्त मनोचिकित्सक नहीं है। यही बात हम कुछ गंदे और घटिया समाचार चैनलों की बहसों पर टकटकी लगाने वाले लोगों के बारे में कहना चाहेंगे कि अगर उनके पास फीस देने की ताकत है, तो दिमाग के किसी डॉक्टर से उनको इलाज जरूर कराना चाहिए।
दूसरी तरफ कांग्रेस या दूसरे राजनीतिक दल, जिनको भी यह लगता है कि टीवी चैनलों में से अधिकतर उनके खिलाफ एक अभियान चलाने का कारोबार कर रहे हैं, उन्हें भी अपने हिसाब से आजादी है कि वे ऐसे चैनलों पर न जाएं। गंदगी में शामिल होना किसी की मजबूरी नहीं है, और लोकतंत्र हर पार्टी को यह आजादी तो देता ही है कि वे ऐसे चैनलों का, ऐसी बहसों का बहिष्कार करें जो कि असहमति पर लोगों को आनन-फानन गद्दार, देशद्रोही करार देते हैं, और हिंसक फतवों से अपना टीआरपी बढ़ाते हैं।
बात महज कुछ, या अधिक चैनलों के खिलाफ नहीं है, अगर अखबारों और पत्रिकाओं में भी कुछ लोगों का धंधा महज ब्लैकमेल करना है, तो उनसे भी लोगों को बात क्यों करनी चाहिए? उन्हें क्यों खरीदना चाहिए? लोकतंत्र में गंदगी के ऊपर एक सीमा से अधिक रोक नहीं लग सकती। इस देश में प्रेस कौंसिल बरसों से एक मुर्दे से भी कम हलचल वाली संस्था है, अदालतें ऐसी हैं कि जहां आधी सदी पुराने केस चल रहे हैं, ऐसे में मीडिया के खिलाफ और कोई तरीका नहीं हो सकता सिवाय इसके कि लोग बुरे मीडिया का बहिष्कार करें, और सरोकार वाले, जिम्मेदार, ईमानदार मीडिया का साथ दें। अगर मुंबई में लोग दाऊद के मालिकाना हक वाले रेस्त्रां जाना बंद नहीं करेंगे, तो शरीफों के रेस्त्रां तो बंद होंगे ही होंगे। यही हाल मीडिया का भी है, मीडिया के गंदे हिस्से का सामाजिक बहिष्कार होना चाहिए, तभी बेहतर मीडिया जिंदा भी रह पाएगा। फिलहाल आज का यह लिखना जिस घटना की वजह से हो रहा है, उस बारे में भी समझ लेना चाहिए कि हम पार्टियों के पेशेवर राष्ट्रीय प्रवक्ताओं को इतने कच्चे दिल का नहीं मानते कि उन्हें कोई गद्दार कह दे, देशद्रोही कह दे, और वे इस सदमे में चल बसें। आज बहुत से हिन्दुस्तानी टीवी चैनलों का हाल यह है कि वहां जाने वाले पैनलिस्ट को मां-बहन की गालियां भी सुनने के लिए तैयार रहना चाहिए। भाजपा से असहमत, या कांग्रेस पार्टी के प्रवक्ता को गद्दार सुनने से कोई सदमा नहीं लग सकता, यह तो आज देश की तमाम असहमत आबादी के लिए एक आम विशेषण बन चुका है, हाल के कुछ बरसों से। यह मौत ऐसी बहस के तुरंत बाद जरूर हुई है, लेकिन संबित पात्रा जैसों की मौजूदगी में ऐसी गालियां उम्मीद से परे तो नहीं ही रही होंगी। (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)
जो लोग सुशांत राजपूत की खबरों को, अफवाहों को पढ़-पढक़र थके हुए हैं, वे न घबराएं इसलिए यह खुलासा कर देना जरूरी है कि आज यहां लिखा जा रहा कि यह सुशांत राजपूत के बारे में नहीं है, यह निजता के बारे में है, प्रायवेसी के बारे में है। मुम्बई में सुशांत राजपूत की खुदकुशी की जो जांच चल रही है, उसमें उनकी दोस्त रही रिया चक्रवर्ती के टेलीफोन की जांच तो होना ही था। आज के वक्त मामूली छेडख़ानी के किसी मामले में भी पुलिस सबसे पहले जुड़े हुए तमाम लोगों के मोबाइल फोन के कॉल डिटेल्स निकालने में जुट जाती है, और पहला मौका मिलते ही सबके फोन जब्त कर लेती है। ऐसे में जांच करने वाली किसी एजेंसी की तरफ से ही यह खबर बाहर निकली है कि रिया के कॉल रिकॉर्ड्स में एक बड़े फिल्मी सितारे का नाम आया है जिन्हें रिया ने एक बार फोन किया था, और इसके बाद उसने उन्हें तीन एसएमएस किए थे। एक और एक्टर का नाम आया है कि रिया ने उसे 30 कॉल की थी, और उसकी तरफ से 14 कॉल आई। इन दोनों के बीच दो एसएमएस भी आए-गए। ऐसे दर्जन भर लोगों के नाम टेलीफोन कॉल्स की कम्प्यूटर से निकाली गई जानकारी के साथ छपे हैं कि किससे कितने बार बात हुई, किसने कितनी कॉल लगाई, कितने मैसेज किए।
अब सवाल यह उठता है कि अगर इनमें से किसी फिल्मी सितारे या दूसरे किसी व्यक्ति के परिवार में उसकी रिया से दोस्ती को लेकर पहले से तनातनी चल रही हो, तो ऐसी ठोस खबर से उस घर में आग ही लग जाए। जो भी एजेंसी जांच कर रही हो, और जिस किसी से ऐसे कॉल रिकॉर्ड्स बाहर आए हैं, उनसे यह बुनियादी सवाल उठता है कि इन लोगों का क्या गुनाह है जो इनकी जिंदगी की प्रायवेसी इस तरह खत्म की जा रही है? और तो और जांच के घेरे में जो रिया चक्रवर्ती है, वह अगर जांच और मुकदमे के बाद कुसूरवार साबित भी होती है, तो भी यह बुनियादी सवाल तो खड़ा ही रहेगा कि उसने लोगों से फोन पर बात करके या मैसेज भेजकर कोई गुनाह तो किया नहीं है कि उसे इसे लेकर बदनाम किया जा रहा है? और यह खबर फिल्मी दुनिया की किसी पत्रिका के किसी गॉसिप कॉलम की न होकर देश की एक सबसे बड़ी, पेशेवर, और गंभीर समाचार एजेंसी की है। इस एजेंसी ने सीडीआर, कॉल डिटेल्स रिकॉर्ड, के हवाले से यह खबर बनाई है।
हमारा ख्याल है कि जो जांच एजेंसियां ऐसे कॉल डिटेल्स निकालती हैं, उनकी यह कानूनी जिम्मेदारी रहती है कि वे डिटेल उसके कब्जे से बाहर न जाएं। अदालत का कोई फैसला हो जाने तक भी, और फैसले के बाद भी किसी जांच एजेंसी का यह हक नहीं है कि वह किसी संदिग्ध व्यक्ति, आरोपी, या किसी मुजरिम के कॉल डिटेल्स भी अदालत से परे, मुकदमे की जरूरत से परे उजागर करे। आज हिन्दुस्तान में दस एजेंसियों को लोगों के फोन टैप करने, उनके कॉल डिटेल्स निकलवाने का कानूनी अधिकार मिला हुआ है। लोगों को याद होगा कि जिस वक्त हाल ही में गुजरे हुए सांसद अमर सिंह की कई कॉल रिकॉर्डिंग्स सामने आई थीं जो कि गैरकानूनी रूप से हासिल की गई थीं, तो अमर सिंह को सुप्रीम कोर्ट से स्थगन मिला था कि मीडिया उन रिकॉर्डिंग्स का कोई इस्तेमाल नहीं कर सकता। गैरकानूनी रूप से चारों तरफ फैल चुकीं इन रिकॉर्डिंग्स में कुछ फिल्म अभिनेत्रियों से अमर सिंह की कुछ विवादास्पद बातचीत थी, और कुछ इन अभिनेत्रियों के बारे में किन्हीं और से बातचीत थी। अब आज जब मुम्बई की यह अभिनेत्री सीबीआई और ईडी जैसी एजेंसियों, मुम्बई पुलिस की जांच के घेरे में है, तो आज वह अपनी निजता का दावा करते हुए इन एजेंसियों से भला क्या टक्कर ले लेगी कि उसके कॉल डिटेल्स इस तरह सार्वजनिक कैसे हो रहे हैं?
आज हिन्दुस्तान में हालत यह है कि केन्द्र सरकार की दस बड़ी एजेंसियां तो दूर की बात हैं, राज्यों की पुलिस अपने स्तर पर तरह-तरह तरकीबें निकालकर किसी के भी फोन के कॉल डिटेल्स निकाल लेती हैं, और उनमें कोई नाजुक बात होती है, तो उसे लेकर लोगों को तुरंत दबाव में ले आती हैं। अब अगर कोई दो लोग रोज देर रात घंटों बात करते हैं, तो उसके महज कॉल डिटेल्स उन्हें ब्लैकमेल करने के लिए काफी हो सकते हैं, लोग अगर अपने जीवनसाथी की जानकारी के बिना किसी और से लगातार और नियमित रूप से लंबी बात करते हैं, तो हो सकता है कि उनमें कई बातें उनकी जिंदगी तबाह करने को काफी हो।
हिन्दुस्तान में टेक्नालॉजी में पुलिस और बाकी जांच एजेंसियों की आसान दखल, और यहां के कानून में लोगों की निजता, उनकी प्रायवेसी के लिए जरा भी सम्मान न होने ने मिलकर एक ऐसी नौबत ला दी है कि लोगों को मानो चौराहे पर नंगा कर दिया गया हो। फिर जांच एजेंसियां अपने से परे मीडिया में भी ऐसी बातें आमतौर पर सोच-समझकर लीक करती हैं कि जिसकी जांच की जा रही है, वे दबाव में आ जाएं, और जल्दी टूट जाएं।
यह सिलसिला खत्म होना चाहिए। लोगों की निजी जिंदगी को बिना कानूनी अधिकार, और बिना कानूनी जरूरत, गैरकानूनी तरीके से उजागर करना छोटा जुर्म नहीं है, और इस पर जब तक जांच एजेंसियों के लोगों को सजा नहीं होगी, तब तक यह सिलसिला बढ़ते ही चलेगा।
असम में कल दो केस दर्ज हुए हैं। वहां के भाजपा विधायक शिलादित्य देव पर आरोप है कि अयोध्या में शिलान्यास के दिन उन्होंने असम में हुए साम्प्रदायिक तनाव पर बोलते हुए वहां के एक कवि और उपन्यासकार सैय्यद अब्दुल मलिक को बुद्धिजीवी जेहादी कहा था। इस टिप्पणी के खिलाफ बहुत से संगठनों ने शिकायत दर्ज कराई थी। पद्मश्री स्व. सैय्यद अब्दुल मलिक का बड़ा सम्मान है, और उनके खिलाफ ऐसी ओछी बातें कहने पर राज्य की भाजपा सरकार मेें भी यह शिकायत दर्ज कराई गई है। भाजपा के कुछ नेताओं ने भी अपने इस विधायक के ऐसे बयान के खिलाफ बयान दिए हैं, और कांग्रेस ने कहा है कि यह भाजपा विधायक पागल है जिसे पागलखाने भेजना चाहिए। यह भाजपा विधायक इस तरह के मुस्लिम-विरोधी बयान देने के लिए ही पहचाना जाता है। पार्टी में पहले भी उसे ऐसे बयानों के खिलाफ चेतावनी दी हुई है। अब दूसरा मामला असम का ही है, और वहां पर एक प्राध्यापक अनिंद्य सेन के खिलाफ अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के एक कार्यकर्ता ने शिकायत दर्ज कराई है कि अनिंद्य सेन की एक फेसबुक पोस्ट धार्मिक भावनाओं को आहत करने वाली है। इस फेसबुक पोस्ट में लिखा था कि यह सारा नाटक उस व्यक्ति के लिए हो रहा है जिसने अपनी पत्नी को निकाल फेंका था। इस डर से कि लोग क्या कहेंगे। इस पोस्ट में सवाल-जवाब की तर्ज पर आगे यह भी लिखा हुआ था कि अच्छा, यह श्रीरामचन्द्र के बारे में हैं? इस मामले में पुलिस ने कई धाराओं के तहत जुर्म दर्ज कर लिया है। शिकायतकर्ता ने यह भी लिखाया था कि अनिंद्य सेन देश के प्रधानमंत्री और गृहमंत्री जैसे संवैधानिक पदों का भी अपमान करते हैं।
हम असम में वहां के गुजर चुके विद्वान लेखक-कवि के बारे में अधिक नहीं जानते, लेकिन लगता है कि उनसे सभी पार्टियों के लोगों की भावनाएं जुड़ी हुई थीं, और इसलिए जब उन्हें बुद्धिजीवी जेहादी कहा गया, तो उसके खिलाफ भाजपा तक में प्रतिक्रिया हुई। दूसरी तरफ दूसरी फेसबुक पोस्ट राम के बारे में हिन्दू धार्मिक ग्रंथों में ही स्थापित एक सत्य या तथ्य को ही लिख रही है कि राम ने अपनी पत्नी को घर से निकाल दिया था। क्या यह तथ्य विवादास्पद है? क्या इस पर धार्मिक भावनाएं आहत होने का जुर्म थाने के स्तर पर तय होगा? अगर ऐसा है तो रामायण और रामचरित मानस की हर प्रति भावनाओं को आहत करने वाली है, और उन पर ठीक वैसी ही कार्रवाई होनी चाहिए जैसी कि किसी के घर पर नक्सल-साहित्य मिलने पर होती है। सच को इतना नकार देना भी कोई बात है कि खुद हिन्दू धार्मिक गं्रथों में, रामकथा वाले हर ग्रंथ में यह बात लिखी हुई है कि अपनी प्रजा के एक आदमी की कही हुई ओछी बात को सुनकर राम ने सीता को घर से निकाल दिया था। और यह निकालना भी उस वक्त था जब सीता गर्भवती थी, और बाद में लव-कुश का जन्म हुआ था। इस बात का जिक्र भारत में महिलाओं की स्थिति को बताने के लिए दर्जनों बार हमने इस अखबार में भी किया है। धार्मिक भावनाओं की इतनी तंग व्याख्या अगर की जाएगी, तो सबसे पहले तो सारे धार्मिक ग्रंथ ही प्रतिबंधित करने पड़ेंगे क्योंकि किसी में इस तरह की बेइंसाफी है, किसी और में किसी और देवता द्वारा किसी दूसरी महिला के साथ ज्यादती का जिक्र है, और बेइंसाफी तो कई किस्म की चारों तरफ धर्मग्रंथों में दर्ज है ही। तो क्या उसकी चर्चा ही न की जाए? यह पूरा सिलसिला इतना खतरनाक है कि लोग धीरे-धीरे धर्मग्रंथों से परहेज करने लगेंगे, उनकी चर्चा बंद करने लगेंगे।
जिस दूसरी खबर का जिक्र किया गया है उसमें बयान के जिस हिस्से को लेकर बवाल खड़ा है, वह एक गुजरे हुए लेखक को बुद्धिजीवी-जेहादी कहने पर है। इन दोनों शब्दों के अलग-अलग अर्थ देखे जाएं, तो शाब्दिक अर्थ में तो यह बात साम्प्रदायिक नहीं है, लेकिन विवादास्पद भाजपा विधायक ने अपने लंबे इतिहास के मुताबिक जिस साम्प्रदायिक तनाव के बीच ऐसा बयान दिया है, उसे उसी की पार्टी, भाजपा ने वहां पर गलत माना है, और उसका विरोध करने की खुली चेतावनी दी है। ये दो शब्द जो कि किसी दूसरे संदर्भ में लोकतांत्रिक सीमा में माने जा सकते थे, वे भी एक साम्प्रदायिक तनाव के संदर्भ में हिंसा को बढ़ाने वाले दिखते हैं, एक गुजरे हुए लेखक-कवि के अपमान के तो माने ही गए हैं।
राम हों या कृष्ण, या किसी और धर्म के दूसरे ईश्वर माने जाने वाले लोग, जिन धर्मों को लेकर खुली चर्चा की परंपरा रही है, उन धर्मों के लोगों की यह नई तंगदिली अधिक खतरनाक है। हिन्दुस्तान में जाने कितने ही विश्वविद्यालयों में रामचरित मानस के महिला चरित्रों पर पीएचडी हुई है। राम के चरित्र पर पीएचडी हुई है, जिसमें अब तक सैकड़ों, हजारों जगह यह तथ्य लिखा गया है कि राम ने अपनी पत्नी को घर से निकाल दिया था, क्योंकि प्रजा के एक व्यक्ति ने एक संदेह जाहिर किया था, और राम का मानना था कि राजा को संदेह से परे होना चाहिए। जिस बात के लिए राम को महिलाविरोधी करार दिया जाता है, उसी बात के लिए राम को मर्यादा पुरूषोत्तम भी कहा जाता है। ऐसे में रामकथा की शुरुआत से ही जो निर्विवाद तथ्य उसमें चले आ रहा है, उसे लिखने पर धार्मिक भावनाएं आहत होने की बात किसी राजनीतिक दल को तो ठीक लग सकती है, लेकिन एक प्राध्यापक के खिलाफ इस बिना पर जुर्म दर्ज कर लेना कानून का बहुत ही बेजा इस्तेमाल है, और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर परले दर्जे का हमला है।
धार्मिक भावनाओं के आहत होने का तर्क बड़ा ही अजीब है। हिन्दुस्तान में हिन्दू धर्म के भीतर नास्तिकों की एक शाखा है जिसमें ईश्वर को न मानने वाले लोग हैं। जिस हिन्दू धर्म में अपने भीतर नास्तिकों को मान्यता देने का इतिहास है, उसी हिन्दू धर्म का बेजा इस्तेमाल करके लोग आज अपनी राजनीति की गोटी बिठा रहे हैं, लोगों पर हमले कर रहे हैं। दूसरे कई धर्म हिन्दू धर्म के मुकाबले अधिक कट्टर हैं, और उनमें कट्टरता का एक इतिहास पूरी दुनिया में है। लेकिन हिन्दू धर्म में पहले जो उदारता थी, वह पिछले कुछ दशकों में धीरे-धीरे खत्म की गई है, और चुनावी राजनीति का एक हथियार उसे बना लिया गया है।
राम के चरित्र की व्याख्या अपनी पत्नी सीता को घर से निकाले बिना भला कैसे पूरी हो सकती है? (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)
राजस्थान से कल ही एक दिल दहलाने वाली खबर आई थी कि पाकिस्तान से आए हुए विस्थापित परिवार के 11 लोगों की लाशें एक साथ मिली थीं। और कुछ न भी हो तो इतनी बड़ी संख्या और कहीं सुनाई पड़ी हो ऐसा याद नहीं पड़ता। हादसे के वक्त बाहर गए हुए परिवार के एक जिंदा रह गए सदस्य से आज पता लगा कि पूरा परिवार भारी तनाव से गुजर रहा था, परिवार की एक बहू के साथ पूरे घर की मुकदमेबाजी चल रही थी, और दोनों तरफ से बहुत सारी रिपोर्ट की गई थीं, बहुत से मुकदमे चल रहे थे, और यह परिवार उससे त्रस्त था। ऐसे में इस परिवार की एक लडक़ी, जो कि पाकिस्तान में प्रशिक्षित नर्स थी, उसने बारी-बारी से 10 लोगों को जहर का इंजेक्शन लगाया, और आखिर में खुद भी अपने को इंजेक्शन लगाकर मर गई। यह बयान पोस्टमार्टम रिपोर्ट से मेल खाता है जिसमें सभी 11 लोगों की मौत जहरीले इंजेक्शन से होना बताई गई है। यह परिवार खेत में एक मकान में रहता था, और शायद वहीं मजदूरी का काम करता था। ये दोनों परिवार कई तरह के जादू-टोने में भी फंसे हुए बताए गए हैं, और गरीबी के शिकार भी थे।
लोगों का अगर ध्यान न गया हो, तो यह सोचने और समझने का मौका है कि लॉकडाऊन और कोरोना के चलते आत्महत्याएं बढ़ रही हैं। सीधे-सीधे इसका कोरोना से रिश्ता चाहे न हो, लेकिन बेकारी, बेरोजगारी, और बीमारी की दहशत जैसी कई बातें लोगों के पहले से चले आ रहे किसी और किस्म के तनाव से जुडक़र इतना बड़ा असर बन रही हैं कि लोग आत्महत्या कर रहे हैं।
हिन्दुस्तान वैसे भी निजी और सामाजिक वजहों से ऐसी आत्महत्याओं का शिकार है जो कि दुनिया के बहुत से सभ्य और विकसित देशों में बिल्कुल नहीं हैं। लडक़ा-लडक़ी एक-दूसरे से प्रेम करते हैं, और समाज, परिवार उन्हें शादी की इजाजत नहीं देता, और वे जाकर खुदकुशी कर लेते हैं कि साथ जी न सके तो क्या हुआ, साथ मर तो सकते हैं। छत्तीसगढ़ में कल ही एक ऐसा दर्दनाक हादसा हुआ है जिसमें एक प्रेमीजोड़ा ट्रेन के सामने कूद गया, लडक़ी मर गई, और लडक़ा अस्पताल में है। आए दिन कहीं न कहीं प्रेमीजोड़े एक साथ किसी पेड़ से टंग जाते हैं, किसी और तरीके से एक साथ जान दे देते हैं। हिन्दुस्तान में किसानों की आत्महत्या कुछ समय पहले तक बहुत बड़ा मुद्दा थी, और फिर राजनीतिक असुविधा से बचने के लिए राज्यों की सत्तारूढ़ पार्टियों ने किसानों की आत्महत्या को किसानी से जोडक़र लिखना ही बंद कर दिया, और कई राज्यों में तो किसानों की आत्महत्या को अवैध संबंधों, या प्रेमसंबंधों की वजह से लिखा जाने लगा। तोहमत सरकार से हटकर किसान पर ही आ गई, और उसका चाल-चलन मरने के बाद भी खराब कर दिया गया।
हिन्दुस्तान की मनोचिकित्सा की, और परामर्श की क्षमता इतनी सीमित है कि शहरी और संपन्न तबके से परे आमतौर पर यह बाकी लोगों को नसीब नहीं होती। जब मानसिक परेशानियां हिंसक होने लगती हैं, तभी गांव के लोग और गरीब लोग किसी तरह किसी मनोचिकित्सक के पास पहुंचते हैं, और यह हमारा खुद का देखा हुआ है कि कामयाब और व्यस्त मनोचिकित्सक एक-एक दिन में सौ-पचास मरीजों को देखते हैं, उन्हें अंधाधुंध दवाईयों पर रखते हैं, और परामर्श से जो चिकित्सा होनी चाहिए उसे भी समय की कमी की वजह से दवाईयोंं की तरफ धकेल दिया जाता है। कुल मिलाकर हालत यह है कि आत्महत्या की कगार पर पहुंचने के पहले तक लोगों को परिवार, समाज, आसपास के बराबरी के लोग, इनसे किसी से परामर्श नहीं मिल पाते, और न ही निजी संबंधों को लेकर किसी परामर्श का कोई रिवाज है, इसलिए जब लोगों पर पारिवारिक और सामाजिक दबाव बढ़ता है, तनाव बढ़ता है तो वे बहुत रफ्तार से आत्महत्या की तरफ बढ़ जाते हैं।
भारतीय समाज के साथ एक दिक्कत यह है कि लोगों को अपनी मर्जी से शादी करने की छूट तो परिवार से मिलती नहीं है, जवान हो चले बच्चे किस रंग का फोन खरीदें, किस रंग का दुपहिया लें, इस पर भी उनकी नहीं चलती है। मां-बाप और बाकी परिवार मानो पूरी जिंदगी अपने जवान बच्चों को बच्चे ही बनाकर रखना चाहते हैं, और देश में शायद आत्महत्या की सबसे बड़ी वजहों में से एक यह भी है। नौजवान पीढ़ी को किसी तरह की आजादी न मिलना जानलेवा साबित हो रहा है।
लेकिन निजी दिक्कतों से परे यह समझने की जरूरत है कि देश में आज बहुत से ऐसे धर्म और जाति के लोग हैं जो लगातार तनाव और दहशत में जी रहे हैं। जिन पर उनके धर्म की वजह से लगातार हमले होते हैं, जिनको उनकी जाति की वजह से लगातार मारा जाता है, और इस देश का मुर्दा हो चला संविधान, और पहले से नेत्रहीन चली आ रही न्यायपालिका मिलकर भी इनके लिए कुछ नहीं कर पा रहे। ऐसे तनाव इन समाजों के लोग अगर अधिक संख्या में आत्महत्या कर रहे हैं तो हम उसे कोई निजी वजह नहीं मानते, यह साफ-साफ देश के खराब माहौल की वजह से पैदा तनाव है, और सरकार-समाज इसके लिए पूरी तरह जिम्मेदार हैं। फिर आज देश की अर्थव्यवस्था जिस तरह चौपट हुई है, करोड़ों लोग रोजगार खो रहे हैं, करोड़ों लोग पहले से रोजगार की तलाश में थे, लोगों के पास खाने-पीने की भी दिक्कत हो रही है, बाकी जरूरतें तो मानो सपने की बात हैं। ऐसे परिवारों के लोग भी आत्महत्या कर रहे हैं।
फिर हमारे सरीखे अखबारनवीस, और बाकी मीडिया के लोग हैं जो आत्महत्याओं की खबरों को इतने खुलासे से, टंगी हुई लाशों की तस्वीरों के साथ छापते हैं, कि जिन्हें पढक़र, देखकर, या सुनकर तनावग्रस्त लोगों को वह एक रास्ता दिखता है कि और लोग भी आत्महत्या कर रहे हैं। पिछले कुछ महीनों में हमने लगातार जानकार विशेषज्ञ लोगों से राय लेकर इस अखबार में ऐसी खबरों को अधिक सावधानी के साथ बनाने, और छापने, या पोस्ट करने का काम किया है, जो कि इस जागरूकता के पहले तक नहीं किया था। देश में स्वास्थ्य के क्षेत्र में काम करने वाले कुछ गैरसरकारी संगठन लगातार मीडिया के प्रशिक्षण का काम कर रहे हैं, ताकि उन्हें इस बारे में अधिक संवेदनशील बनाया जा सके। लेकिन इस मोर्चे पर और भी बहुत कुछ करने की जरूरत है क्योंकि मीडिया में जो लोग ऐसी खबरों को बनाते हैं, उन्हें एक सनसनीखेज सुर्खी की गुंजाइश इसमें दिखती है, और संवेदनशीलता की कोई सीख-समझ उन्हें मिली नहीं रहती।
कुल मिलाकर हिन्दुस्तान में आज आत्महत्याओं की जो हालत है उसे देखते हुए हमें अपनी एक पुरानी नसीहत दुहराना जरूरी लग रहा है कि मनोचिकित्सकों के पहले परामर्शदाताओं की बहुत बड़ी संख्या की जरूरत है जिससे कि मनोचिकित्सा की नौबत कम आए। और ऐसे परामर्शदाताओं को तैयार करने के लिए विश्वविद्यालयों में मनोविज्ञान के तहत ऐसे कोर्स शुरू करने पड़ेंगे, उसमें बड़ी संख्या में लोगों को तैयार करना पड़ेगा, और ऐसे शिक्षित-प्रशिक्षित लोगों के लिए सरकार और समाज को रोजगार या स्वरोजगार के बारे में भी सोचना पड़ेगा। ऐसा जब तक नहीं होगा, तब तक समाज के लोगों को भी खुद होकर अपनी संवेदनशून्यता नहीं दिखेगी।
छत्तीसगढ़ में आज कमरछठ का त्यौहार मनाया जा रहा है। यह पर्व संतान प्राप्ति, और अपने बच्चों की लंबी जिंदगी की कामना के लिए किया जाता है, और जाहिर है कि नियमों के पालन और उपवास वाला पर्व है, तो इसे तो महिला को ही मानना पड़ता है, आदमी तो पैदा होने से लेकर मरने तक एक भी दिन भूखा रहे बिना जिंदगी गुजार सकता है, उस पर तो कोई बंदिश होती नहीं है। अपने बच्चों की मंगलकामना के लिए मनाए जाने वाले कमरछठ या हलषष्ठी के दिन एक बात याद आ रही है कि इसी छत्तीसगढ़ में बहुत से बूढ़े मां-बाप बेसहारा छोड़ दिए जाते हैं, ठीक बाकी हिन्दुस्तान की तरह, और ठीक बाकी दुनिया की भी तरह। लेकिन वृद्धाश्रम में रहते हुए भी बूढ़ी मां को अगर कमरछठ का यह त्यौहार याद होगा तो वह बिना चूके अपने बच्चों की लंबी और अच्छी जिंदगी के लिए पूजा भी कर रही होगी, और उपवास भी कर रही होगी।
आज महिलाओं के पूजा के दिन इस मुद्दे पर लिखना थोड़ा सा अटपटा लग सकता है, लेकिन इस अटपटेपन के बीच यही सही मौका है जब लोगों को याद दिलाया जाए कि औलाद पर भरोसा, और उस पर निर्भर रहने की एक सीमा रहनी चाहिए। एक दूसरी सीमा रहनी चाहिए कि अपने बेटों और बेटियों के बीच फर्क न करने की। हिन्दुस्तान के अधिकतर हिस्से में कामना होती है तो पुत्र प्राप्ति की, कन्यारत्न की प्राप्ति के लिए कोई कामना नहीं होती, और हिन्दुस्तान के कम से कम, हिन्दुओं के बीच, कन्या को नवरात्रि के बाद के कन्यापूजन, देवी प्रतिमाओं के रूप में तो माना जाता है, लेकिन बाकी मामलों में कन्या की कोई जगह नहीं रहती। जब जमीन-जायदाद की वसीयत की बात आती है तो लोग लडक़ी को पराये घर की मानकर सब कुछ बेटों के नाम कर जाते हैं। इसलिए इस बात को कभी नहीं भूलना चाहिए कि वृद्धाश्रम में जितने मां-बाप हैं, अगर उनके पास कुछ छोडऩे लायक रहा होगा, तो यह साफ है कि वह बेटों के लिए ही छोड़ा गया होगा। और अगर वृद्धाश्रम जाने से लोग बचे हैं, तो उनमें से बहुत से ऐसे होंगे जो बेटियों की वजह से बचे हैं, और बेटियों के साथ हैं।
लोगों की अपने बेटों के लिए सब कुछ छोड़ जाने की हसरत कभी खत्म भी नहीं होती। कारोबारी हिन्दू परिवारों में आमतौर पर यह मान लिया जाता है कि लडक़ी का जो हक बनता है, वह उसकी शादी के वक्त उसे दे दिया जाता है, और बाकी तो फिर लडक़ों के ही बीच बंटना रहता है। आज कमरछठ के दिन अपनी संतानों की मंगल कामना के लिए पूजा करने वाली तमाम महिलाओं को, और इस त्यौहार को न मानने वाले मां-बाप के लिए भी यह समझना जरूरी है कि सबसे पहले अपनी दौलत को अपने जीते-जी पूरी तरह से संतानों को नहीं दे देना चाहिए। सबसे पहले उन्हें अपने पैरों पर खड़ा होने का मौका देना चाहिए, जिंदगी के संघर्ष की आंच में तपने देना चाहिए, इसके बाद ही अपनी वसीयत में ऐसा इंतजाम करना चाहिए कि अपनी पूरी जिंदगी अपने दम पर पार करने के लायक पैसे अपने पास रखें, और बाकी को सारी संतानों में बराबर बांटना चाहिए, न कि सिर्फ बेटों में।
भारत में उत्तराधिकार के कई कानून इस सोच के करीब हैं। हिन्दू उत्तराधिकार कानून शायद लड़कियों के हक को कुछ कम मान्यता देता है, लेकिन मान्यता देता तो है। और यह बात भी सच है कि हिन्दू लडक़ी को अपना हक पाने के लिए अक्सर ही अदालती लड़ाई तक जाना पड़ता है, उसे उसका हक न तो मां-बाप के रहते मिलता, और बाद में भाईयों से कुछ हासिल करना तो नामुमकिन सा रहता है।
लोगों के पास धन-दौलत कम हो, या अधिक हो, जिंदगी सबके पास बड़ी लंबी रहती है, उसकी कोई सीमा नहीं रहती। अभी-अभी छत्तीसगढ़ के बिलासपुर में कोरोना से वहां की जेल की एक महिला कैदी एक बड़े निजी अस्पताल में गुजर गई। वह 90 बरस की थी। अब यह सोचें कि 90 बरस तक उसे जेल में रखकर देश और कानून को आखिर क्या हासिल हो रहा है? और मान लें कि ऐसा कोई कानून भी बने जो इस उम्र में कैदी को अनिवार्य रूप से रिहा कर दे, तो सोचें कि वह इस उम्र में बाहर निकलकर कहां जाएगी? बहुत से ऐसे परिवार हैं जिनमें इस बुढिय़ा को मंजूर नहीं किया जाएगा, और शायद वह जेल के मुकाबले भी अधिक बुरी हालत में आ जाएगी क्योंकि जेल में दो वक्त खाना तो मिल ही जाता है। अब यह बात हमारी कल्पना से परे की है कि इस उम्र की महिला ने अपने लिए कुछ बचाकर रखा होगा। यह भी मुमकिन नहीं है कि जेल के भीतर उसने रोज मजदूरी करके थोड़ी सी रकम जुटाकर रखी हो और छूटने पर वह उसके काम आती। अब तो खैर वह कोरोना की मेहरबानी से जेल, बदन, और दुनिया सबसे छूट गई है, लेकिन क्या ऐसे बुजुर्ग लोग कभी अपनी मौत तक का इंतजाम करके रखते हैं?
लोगों को एक सामाजिक परामर्श की जरूरत है क्योंकि जिन संतानों के लिए कमरछठ की जाती है, वे संतानें ही मां-बाप का भावनात्मक दोहन करके उन्हें जीते-जी इतना निचोड़ लेते हैं कि वे मरने तक महज एक गुठली की जिंदगी जीते रह जाते हैं, एक कप चाय या दो बिस्किट के लिए आल औलाद के मोहताज होने वाले मां-बाप हमने देखे हुए हैं। आज कमरछठ के मौके पर लोगों को न सिर्फ संतानों की लंबी और अच्छी जिंदगी की कामना करनी चाहिए, बल्कि यह कामना भी करनी चाहिए कि उनकी औलादें उनके प्रति भी जवाबदेह बनी रहें, जिम्मेदार बनी रहें, और समाज के प्रति भी। समाज के भीतर लोगों को एक-दूसरे को ऐसी जिम्मेदारी और सावधानी सुझानी चाहिए, जिम्मेदारी आल-औलाद को, और सावधानी बुजुर्ग मां-बाप को। (क्लिक करें : सुनील कुमार के ब्लॉग का हॉट लिंक)
कल का दिन केरल के लिए बहुत ही खराब दिन था। इस राज्य का पर्यटन का एक नारा है- गॉड्स ओन कंट्री, यानी ईश्वर का अपना प्रदेश। वहां जाएं तो उसकी खूबसूरती देखकर सचमुच यही लगता है। लेकिन कल के दिन को देखें तो लगता है कि अगर यह ईश्वर का अपना प्रदेश है तो ईश्वर कल कुछ खुदकुशी करने बैठा था। दिन में वहां पहाड़ी से जमीनें और चट्टानें बहकर नीचे आईं, और दर्जन भर से अधिक लोग मारे गए। रात वहां एक विमान उतरते-उतरते हवाई पट्टी पर फिसलकर खाई में जा गिरा, और उसमें भी डेढ़ दर्जन या अधिक लोग मारे गए। एक ही दिन में केरल में ये दो बड़ी विपदाएं हुईं, और एक किस्म से दोनों ही मौसम की वजह से हुईं, खूब बारिश से भूस्खलन हुआ, और खूब बारिश के बीच विमान उतारते हुए एक बहुत ही अनुभवी पायलट विमान को बचा नहीं पाया। इन दोनों को देखें तो लगता है कि कुदरत की ताकत कितनी है!
ये दोनों हादसे उत्तराखंड में कुछ बरस पहले की बाढ़ और भूस्खलन के मुकाबले बहुत छोटे से हैं, हमने उस वक्त हजारों मौतों को देखा था, और हजारों को लापता होते भी देखा था जिनकी अब कोई चर्चा भी नहीं होती कि वे मिले हैं, या नहीं मिले हैं। दूसरी तरफ हिन्दुओं के चार तीर्थों को जोड़ते हुए चारोंधाम के बीच जैसी चौड़ी सडक़ें बनाई जा रही हैं, वे इन पहाड़ी इलाकों में बहुत बड़ा जमीनी फेरबदल कर रही हैं, जिसकी वजह से पर्यावरण और भौगोलिक तकनीकी जानकारी रखने वाले लोग बहुत फिक्रमंद हैं। दुनिया में बहुत सी जगहों पर भूकंप का बड़े बांधों से रिश्ता जोड़ा जाता है, नदियों में बाढ़ का रिश्ता नदियों के किनारे शहरी विकास, पेड़ों की कटाई, और नदियों में गाद भर जाने से जोड़ा जाता है। इंसान अपनी हरकतों से या अपनी लापरवाही से कुदरत को एक ऐसी कगार पर ले जाकर खड़ा कर देते हैं कि वहां से आगे का रास्ता केवल तबाही की तरफ बढ़ता है।
एक तो धरती की अपनी बनावट कुछ ऐसी है कि उसमें कुछ किस्म की तबाही रोकी नहीं जा सकती। हर तबाही के पीछे इंसान जिम्मेदार हों ऐसा भी नहीं है, बहुत किस्म के भूकंप बिना किसी इंसानी योगदान के सिर्फ धरती के भीतर के ढांचे की वजह से होते हैं, और इंसान शायद चाहें तो भी उसे रोक नहीं सकते। सारा विज्ञान और सारी तकनीक मिलाकर भी इंसान इतना ही कर पा रहे हैं कि भूकंप के खतरे वाले इलाकों की शिनाख्त हो जाती है, और उन इलाकों में ऐसी तकनीक से मकान और इमारतों को बनाया जाता है कि भूकंप को वे कुछ हद तक झेल सकें, और इंसानों की जिंदगी पर खतरा घटे। लेकिन इंसानों ने कुदरत को कई जगह अपना गुलाम सा मानकर काम किया है। अब कल केरल में जिस पहाड़ी एयरपोर्ट पर यह प्लेन ठीक से लैंड नहीं कर पाया, उस किस्म के एयरपोर्ट टेबलटॉप कहे जाते हैं, यानी पहाड़ी के बीच बनाई गई एक हवाई पट्टी ऐसी रहती है जिसकी जगह बहुत सीमित रहती है। अब ऐसी जगह पर हवाई पट्टी बनाना और उस पर विमान उतारना हमेशा ही थोड़े से खतरे की बात रहती है, लेकिन कल तो भारी बारिश थी, दूर तक दिख नहीं रहा था, और यह काबिल, एक पुराना एयरफोर्स पायलट, दो बार कोशिश करके भी विमान वहां उतार नहीं पाया था, और तीसरी बार में यह हादसा हुआ जिसमें विमान के दो टुकड़े हो गए, और दोनों पायलटों सहित 18-20 मौतें हो गईं, दर्जनों लोग बुरी तरह जख्मी हो गए।
अब यह सोचने की जरूरत है कि इंसानों का शहरी विकास किस कीमत पर हो और उसके लिए कितने खतरे उठाए जाएं? एक तरफ समंदर के किनारे इतने करीब तक शहरी बसाहट हो रही है कि समंदर की लहरों और तूफान से बचने की जो प्राकृतिक सुरक्षा थी, वह भी खत्म हो जा रही है, और सुनामी जैसी अभूतपूर्व तबाही सामने आ रही है जिससे बचाव का कोई जरिया विज्ञान और इंसानों के पास नहीं है। आज भी दुनिया के अनगिनत शहरों के सामने यह खतरा कायम है कि अगले सौ-पचास बरस में वे समंदर के बढ़ते हुए जलस्तर के मुकाबले नीचे आ जाएंगे, और वे शहर डूब जाएंगे। अब कोई शहर अगर सौ-दो सौ बरस की जिंदगी भी नहीं रखता है, तो उस शहर का रहना ही अपने आपमें खतरनाक है क्योंकि शहर रहेगा, तो आगे और बसेगा, आगे और बढ़ेगा, जबकि उसकी जिंदगी सीमित है, और अगर वैज्ञानिकों का हिसाब-किताब थोड़ा सा गड़बड़ साबित हुआ, समंदर के पानी के ऊपर जाने की रफ्तार बढ़ी तो हो सकता है कि ये शहर कुछ और पहले डूब जाएं।
इंसान ने अपनी सोच के साथ विज्ञान से मिले औजारों को हथियारों की तरह इस्तेमाल करना शुरू कर दिया है, और धरती को, कुदरत को अपना गुलाम मान लिया। अब केरल की जिस पहाड़ी पर यह एयरपोर्ट बनाया गया था, क्या सचमुच वहां ऐसे मौसम में विमान को ले भी जाना चाहिए था? क्या उत्तराखंड और अगल-बगल के प्रदेशों के पहाड़ों पर चारधाम के लिए ऐसी चौड़ी फोरलेन सडक़ों को पहाड़ काटकर बनाना चाहिए? क्या नदियों के किनारे बाढ़ की जद में आने वाले इलाकों पर बसाहट करनी चाहिए? क्या समंदर के करीब तक जाकर बसाहट जरूरी है? इंसान कुदरत की बांह मरोडक़र उससे कई किस्म की रियायतें हासिल करने के इतने आदी हो गए हैं, उन्हें इतनी लत पड़ गई है कि कुदरत की विशाल विकराल ताकत के सामने उन्हें अपनी तकनीक के ज्ञान का घमंड होने लगा है। एक वक्त था जब कहा जाता था कि दुनिया की सभ्यता नदियों के किनारे विकसित हुई है। आज कम से कम हिन्दुस्तान जैसे देश को देखें तो लगता है कि नदियों के किनारे असभ्यता विकसित हो चुकी है, कानपुर जैसे औद्योगिक शहरों का अंतहीन जहर सीधे गंगा में छोड़ा जा रहा है, गंगा या बाकी किसी भी नदी के किनारे बसे हुए शहरों की रोजाना की गंदगी सीधे नदियों में छोड़ी जा रही है, और तमाम धरती का प्लास्टिक-प्रदूषण इन नदियों के पानी के साथ होकर समंदर को प्रदूषित कर रहा है। अभी-अभी एक वैज्ञानिक हिसाब सामने आया था कि कितने बरस बाद समंदर में वहां के प्राणियों से अधिक प्लास्टिक हो जाएगा।
केरल की तो एक छोटी सी बात थी जहां से हमने लिखना शुरू किया था, लेकिन सच यह है कि कुदरत से लड़ते हुए बारिश के बीच किसी पहाड़ी एयरपोर्ट के छोटे से रनवे पर विमान उतारने का ऐसा दुस्साहस कानूनी रूप से बंद कर देना चाहिए। अधिक से अधिक क्या होता, कुछ सौ किलोमीटर के किसी सुरक्षित एयरपोर्ट पर प्लेन उतारा जाता, और वहां से लोग कुछ घंटों में अपने घर पहुंच जाते। कुदरत की ताकत, उसकी विकरालता, और उसके बेकाबू मिजाज को लेकर इंसानों को बहुत आजादी नहीं लेनी चाहिए।
हिन्दुस्तान का सारा मौसम विज्ञान, और सारी अंतरिक्ष मौसम प्रणाली, भूकंप नापने की मशीनें, और हिन्दुस्तान के विश्व विख्यात संस्थानों के जानकार लोग मिलकर भी उत्तराखंड की तबाही का अंदाज नहीं लगा पाए थे। अब धरती को छेडऩे, कोंचने का जो काम चल रहा है, वह भी आगे-पीछे किसी दिन आत्मघाती साबित होगा। हाल के बरसों में हिन्दुस्तान में पर्यावरण तो किसी भी किस्म की प्राथमिकता से हटाकर कचरे की टोकरी में फेंक दिया गया है क्योंकि कारखानेदारों को पर्यावरण नाम की सावधानी से परहेज है। अभी-अभी पिछले कुछ महीनों में पर्यावरण के मुद्दे उठाने वाले लोगों के खिलाफ कई किस्म की कार्रवाई भी की गई है। हिन्दुस्तान को इतनी समझदारी की जरूरत है कि यह मौसम की जैसी बुरी मार से हर बरस गुजर रहा है, उसे और लापरवाह होने की इजाजत नहीं लेनी चाहिए, और अधिक चौकन्ना होना चाहिए। असम से लेकर बिहार तक जिस किस्म की बाढ़ से हर बरस देश की एक बड़ी आबादी घिर जाती है, बेदखल हो जाती है, उसे देखते हुए ही पर्यावरण को तबाह करने वाले फैसले थमना चाहिए, उन्हें पलटना चाहिए। इन बातों का केरल के कल के हादसे से अधिक लेना-देना नहीं है, सिवाय इसके कि इतनी प्रतिकूल परिस्थितियों में एयरपोर्ट बनाना, इतने प्रतिकूल मौसम में उड़ानों को जारी रखना, इतनी विकराल बाढ़ के बावजूद उसके आसपास इंसानी बसाहट करना किसी भी किस्म से समझदारी नहीं है, और यह सिलसिला खत्म करना चाहिए। लोग कुदरत और धरती दोनों को अपने अंदाज जितना ही मानकर चलते हैं, और इन दोनों ने बार-बार यह साबित किया है कि इनकी नाराजगी जब होती है, तो उसकी कोई सीमा नहीं रहती है। यह वक्त आज चारों तरफ विकास के नाम पर कुदरत और धरती के विनाश के चल रहे सिलसिले को थामने का है, वरना धरती को इससे कुछ फर्क नहीं पड़ेगा कि उस पर से कुछ करोड़ लोग घट जाएं। आज कोरोना के चलते हुए ही हो सकता है कि कुछ करोड़ लोग पॉजिटिव होकर मरें, और कई करोड़ लोग इसकी वजह से आगे चलकर दूसरी बीमारियों से मरें। हिन्दुस्तान जैसे देश को पर्यावरण को अनदेखा करके अपनी आने वाली पीढिय़ों के नाम जानलेवा खतरे की एक विरासत नहीं छोडऩी चाहिए। समझदारी की बात तो यह है कि यह धरती इंसानों को बस जीने के लिए मिली है, और इसे तबाह किए बिना अपनी अगली पीढ़ी को देने के लिए मिली है, यह धरती इंसानों की किसी पीढ़ी को तबाह करने के लिए नहीं मिली है। हिन्दुस्तान में आज ठीक यही हो रहा है, और फैसले लेने वाले नेता और अफसर बेफिक्र हैं कि जिस दिन तोहमत की नौबत आएगी, वे तो धरती पर रहेंगे नहीं।
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छत्तीसगढ़ के रायगढ़ जिले की पुलिस ने राखी के दिन लोगों को मास्क बांटने का एक रिकॉर्ड कायम किया है। और आए दिन आसानी से रिकॉर्ड का सर्टिफिकेट बांट देने वाली एक संस्था, गोल्डन बुक ऑफ वल्र्ड रिकॉर्ड्स ने सीमित 6 घंटों में सबसे अधिक 12 लाख से अधिक मास्क बांटने का रिकॉर्ड रायगढ़ पुलिस के नाम दर्ज किया है। जाहिर है कि ये मास्क ढूंढ-ढूंढकर गरीब और जरूरतमंद को तो दिए नहीं गए होंगे, 6 घंटे में 12 लाख मास्क बांटने का मकसद व्यस्त जगहों पर हर किसी को मास्क दिया गया होगा। वर्ष 2011 की जनगणना में रायगढ़ जिले की आबादी 15 लाख से कम थी। इन 10 बरसों में आबादी बढ़ी भी होगी, तो भी 12 लाख मास्क बांटने के लिए जिले के आधे से अधिक लोगों को इन्हें दिया गया होगा, और 6 घंटों में जिले की आधे से अधिक आबादी कैसे कवर हुई होगी, यह एक अलग हैरानी की बात है। लेकिन इस दावे और दर्ज रिकॉर्ड को चुनौती देना हमारा मकसद नहीं है। हम तो पुलिस के ऐसे मास्क बांटने के बारे में बात करना चाहते हैं।
राह चलते लोगों को मास्क देकर पुलिस ने उन पर एक उपकार तो किया है, यह एक अलग बात है कि पुलिस ने यह इंतजाम अपने या दूसरों के पैसों से कैसे किया होगा, और क्यों किया होगा? इन दिनों जब पुलिस की साख को चौपट करने के लिए हिंसा के एक-दो वीडियो ही देश भर में काफी होते हैं, तो छत्तीसगढ़ में पुलिस कई तरह के अच्छे काम करके अपनी छवि को बेहतर भी बनाने की कोशिश करती है, और हो सकता है कि सचमुच ही जनसेवा की उसकी नीयत हो। लोगों को याद होगा कि कई महीने पहले राजधानी रायपुर की पुलिस ने इसी तरह 15 हजार लोगों को हेलमेट बांटे थे, और उसमें खासे संपन्न लोग भी वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक के हाथों हेलमेट लेकर मुस्कुराते हुए तस्वीर खिंचवा रहे थे। वे हेलमेट भी जनता के बीच कारोबारी संगठनों से जुटाए गए थे जिन्होंने पुलिस के कहे एक समाजसेवा करने की नीयत से, या मजबूरी से वे हेलमेट दिए थे।
हमारे पाठकों को याद होगा कि उस वक्त भी हमने इस बात को लेकर लिखा था कि जो लोग लाख-पचास हजार रूपए की मोटरसाइकिल पर चलते हैं लेकिन हजार रूपए से कम में मिलने वाले हेलमेट खरीदकर अपनी जान बचाने, और जुर्माने का खर्च बचाने की जिन्हें न परवाह है, न जिम्मेदारी की नीयत है, उन पर पुलिस समाज का पैसा क्यों खर्च करे? अगर पुलिस के पास इतनी ही अतिरिक्त क्षमता है, तो सोच-समझकर गैरजिम्मेदारी दिखाने वाले, और नियम तोडऩे वाले लोगों का चालान करना चाहिए, और सरकारी खजाने में जमा होने वाले उस पैसे का ट्रैफिक सुधार में या दूसरे नियमों के पालन में कोई इस्तेमाल करना चाहिए। जब सक्षम और संपन्न लोग अपनी गैरजिम्मेदारी और लापरवाही के एवज में पुलिस से तोहफा पाने लगें, तो यह तारीफ की नहीं फिक्र की बात है, कि सरकार की कोई एजेंसी ऐसा क्यों कर रही है? रायगढ़ की पुलिस ने हर आते-जाते को मास्क बांटे होंगे तभी 12 लाख से अधिक मास्क 6 घंटों में बांटे जा सके। क्या सचमुच ही इन तमाम लोगों को मास्क खरीदने की ताकत नहीं थी? और मास्क तो कोई खरीदकर भी बांधना जरूरी नहीं रहता, कोई गमछा भी बांधा जा सकता है, या गरीब लोग घर के किसी पुराने कपड़े के टुकड़े को भी बांधकर काम चला रहे हैं।
पुलिस में ऐसे कामों के लिए, लौटते हुए मजदूरों में खाना बांटने के लिए उत्साह बहुत अधिक रहता है। पुलिस के अफसरों के कहे हुए लोग ऐसी मदद देने के लिए तैयार हो जाते हैं, और पुलिस के इलाके में लोगों को धंधा करना है, तो वे उसकी किसी बात पर आमतौर पर मना भी नहीं करते। लेकिन अपने इस दबदबे का ऐसा अंधाधुंध बेजा इस्तेमाल ठीक नहीं है। समाज में मुफ्तखोरी की आदत इतनी नहीं बढ़ जानी चाहिए कि कार-स्कूटर वाले लोग भी, काफी कमाने वाले लोग भी मुफ्त बंटते हुए सामान को लेने के लिए खड़े हो जाएं।
हिन्दुस्तान के बहुत से शहरों में मंदिरों और दूसरे धर्मस्थलों के आसपास कई दानदाता रोज मुफ्त में खाना बांटने के लिए खड़े हो जाते हैं, और राह चलते गैरगरीब भी कतार में लग जाते हैं कि मुफ्त में मिल रहा है। इस सिलसिले के खिलाफ भी हम कई बार लिख चुके हैं कि दान के नाम पर, ईश्वर के नाम पर, प्रसाद या मदद के नाम पर हर किसी को मुफ्त खिलाना गलत सिलसिला है। यह इसलिए भी है कि दानदाताओं के पास असली जरूरतमंदों की शिनाख्त करने, वहां तक पहुंचने का कोई आसान जरिया नहीं है। इसलिए कई बार सचमुच ही लोगों की सेवा करने की हसरत वाले, और कई बार अपने किसी अपराध या पाप के बोझ से मुक्ति पाने के लिए लोग ऐसे भंडारे खोल लेते हैं, खाना बांटने लगते हैं। गैरजरूरतमंदों की ऐसी मदद उन्हें और नालायक, और निकम्मा बनाने के अलावा कुछ नहीं करती, और ऐसा खर्च करने वाले लोगों को मन में यह झूठी राहत मिलती है कि उन्होंने पुण्य का कोई काम किया है। ऐसे दानदाताओं की नजरों से दूर सचमुच के भूखे लोग भूखे रह जाते हैं, और शहर के आते-जाते लोग मोटरसाइकिलें रोक-रोककर खाने की कतार में लग जाते हैं।
लॉकडाऊन और कोरोना जैसे खतरों के चलते हुए समाज में कई किस्म की मदद की जरूरत भी है। लेकिन यह मदद मुफ्तखोरी को बढ़ाने वाली नहीं होनी चाहिए। आधी आबादी को मास्क बांटने का मतलब यही है कि बहुत से लोग खरीदने की ताकत रखने के बावजूद या तो मास्क लगा नहीं रहे थे, या मुफ्त में मिल रहा है तो लेकर चले गए थे। न पुलिस न किसी दूसरे विभाग को ऐसे काम में पडऩा चाहिए। जो सबसे ही गरीब लोग हैं उन्होंने भी अब तक मास्क या चेहरा बांधने का कपड़़ा न होने की कोई शिकायत नहीं की है। पुलिस अगर दानदाता जुटाकर उनसे कोई काम करवा सकती है, तो वह सार्वजनिक हित के होने चाहिए, निजी गैरजरूरी मदद वाले नहीं।


