विचार/लेख
-दिनेश आकुला
आज हम अटल बिहारी वाजपेयी जी की पुण्यतिथि पर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं। उनके कार्यों और उनके नेतृत्व ने न केवल भारतीय राजनीति को आकार दिया, बल्कि भारतीय समाज में एक स्थायी छाप भी छोड़ी। इस दिन, वाजपेयी जी को याद करते हुए मुझे अपनी पत्रकारिता के शुरुआती दिनों का एक अजीब और अविस्मरणीय पल याद आ रहा है।
यह घटना उनके पहले प्रधानमंत्री कार्यकाल के दौरान हुई थी, जब वे भुवनेश्वर जाने के लिए विमान से यात्रा कर रहे थे। दुर्भाग्यवश, खराब मौसम के कारण उनका विमान रायपुर के माना एयरपोर्ट पर एक छोटे ब्रेक के लिए रुक गया था। उस समय मध्यप्रदेश था, और छत्तीसगढ़ राज्य अभी हाल ही में अस्तित्व में आया था।
मैं उस दिन प्रोटोकॉल अधिकारी के साथ बैठा था, तभी अचानक यह खबर आई कि प्रधानमंत्री का विमान रायपुर में रुकने वाला है। मैंने तुरंत प्रोटोकॉल अधिकारी के साथ कदमताल किया। मुझे कुछ मदद मिली, जिससे मैं एयरपोर्ट की सुरक्षा को पार कर पाते हुए कुछ सीनियर बीजेपी नेताओं और स्थानीय सुरक्षा अधिकारियों से कुछ निवेदन कर पाया। इसके बाद, आखिरकार मैं बारीकेज के किनारे तक पहुंचने में सफल हो पाया।
जब वाजपेयी जी विमान से उतरे, तो उनका स्वागत करने के बाद, वे वीआईपी लाउंज में कुछ समय के लिए बैठे। लेकिन जैसे ही वे वहां से चलने लगे, मैंने हिम्मत जुटाकर जोर से कहा, ‘वाजपेयी जी, हम यहां इंटरव्यू के लिए हैं!’
-दिनेश आकुला
आज दिलीप सिंह जूदेव जी की 12वीं पुण्यतिथि है। 14 अगस्त 2013 को उनका निधन हुआ था। अपने बड़े बेटे सतॄंजय सिंह जूदेव के दिल के दौरे से अचानक निधन के बाद, उन्होंने मानो जीवन में रुचि ही खो दी थी। यह ऐसा आघात था, जिससे वे पूरी तरह उबर नहीं पाए।
मेरा जूदेव जी से जुड़ाव सन 2000 में हुआ, जब मैं हिंदुस्तान टाइम्स में काम कर रहा था। शुरुआत से ही उन्होंने यह तय कर रखा था कि किसी भी विवाद या बड़ी खबर पर पहला बयान मुझे ही देंगे। 2003 में, जब उन पर कुख्यात रिश्वत कांड का आरोप लगा, तो सुबह 6 बजे उन्होंने मुझे फोन कर कहा कि मामला साफ होते ही वे सबसे पहले मुझे ही इंटरव्यू देंगे।
मुझे याद है, स्टार न्यूज़ में असाइनमेंट डेस्क पर मेरे पूर्व सहयोगी रजनीश का फोन आया था। उन्होंने बताया कि इंडियन एक्सप्रेस के पहले पन्ने पर जूदेव जी के रिश्वत मामले की खबर छपी है। यह सुनकर मैं स्तब्ध रह गया। जो कोई भी जूदेव जी को जानता था, वह विश्वास नहीं कर पा रहा था। लेकिन वे अडिग थे और उनकी प्रतिक्रिया भी उतनी ही बेबाक— ‘पैसा खुदा तो नहीं, पर खुदा की कसम, खुदा से कम भी नहीं।’
जूदेव जी अक्सर मजाक में कहते, ‘दिनेश बाबू, दारू पिया करो।’ जशपुर हो या राजकुमार कॉलेज का रेस्ट हाउस, उनसे मिलने पर यह जुमला ज़रूर सुनने को मिलता।
एक इंटरव्यू में, जब वे छत्तीसगढ़ में बीजेपी के मुख्यमंत्री पद के दावेदार थे, उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा कि वे पक्के शायर हैं और सडक़ किनारे दिख जाए तो शायरी की किताब ज़रूर खरीद लेते हैं। उनका पसंदीदा गीत था— मेरे देश की धरती सोना उगलेज्
जब मैंने पूछा कि क्या यह उनका पहला विवाद है, तो जशपुर के राजकुमार मुस्कुराए, मूंछों पर हाथ फेरते हुए बोले‘मेरी मूंछें भी मशहूर हैं और कॉलेज के दिनों में जो दो रिवॉल्वर लेकर चलता था, वे भी।’
कॉलेज के दिनों में उनके पास काली बुलेट मोटरसाइकिल थी, जिसे वे बेहद धीमी गति से चलाते थे, जैसे सफर का आनंद ले रहे हों। एक बार जिला प्रशासन ने उन्हें लोहरदगा में बीजेपी की बैठक में जाने से रोकने की कोशिश की। उस समय वे जीप चला रहे थे। उन्होंने कहा— ‘हम ज़रूर जाएंगे; अगर रोक सकते हैं तो रोक लो।’ और फिर वे इतनी तेज़ी से निकले कि पुलिस की गाडिय़ां पीछा नहीं कर पाईं।
-अपूर्व झा
एक तंग कमरे में राजेश विश्वकर्मा चुपचाप बैठे हैं। तेरह महीने तक वह जेल में रहे। वह जेल में इसलिए नहीं रहे कि उन्होंने कोई अपराध किया था, बल्कि इसलिए कि उन्होंने किसी की मदद करने की कोशिश की थी। वह एक दिहाड़ी मजदूर हैं। उनके पास न जमीन है, न माता-पिता और न ही कोई कानूनी जागरूकता। वह व्यवस्था का शिकार बन गए।
एनडीटीवी के रिपोर्ट के अनुसार, 16 जून 2024 को राजेश अपने पड़ोस की एक बीमार महिला को डीआईजी बंगले के पास एक अस्पताल ले गए। वह दर्द से कराह रही थी। राजेश ने वही किया जो कोई भी सभ्य इंसान करता। उसे अस्पताल में भर्ती कराया और काम पर निकल गए। शाम तक महिला की मौत हो चुकी थी। अगली सुबह राजेश को हत्या के आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया।
राजेश ने बताया कि वह उस महिला को इसलिए अस्पताल ले गए क्योंकि उसने उनसे कहा था। शाम को पुलिस उसे उठा ले गई, पूछताछ की और अगले दिन गिरफ्तार कर लिया गया। उन्होंने पुलिस को बताया कि वह उसे इलाज के लिए ले गए थे। पुलिस ने उन्हें परिवार से भी बात नहीं करने दी। उन्हें नौ दिनों तक थाने में रखा, फिर सीधे जेल भेज दिया गया। उनके पास वकील करने के पैसे नहीं थे।
राजेश ने कहा, ''पुलिस ने बिना किसी चेतावनी के उनके किराए के कमरे पर ताला लगा दिया। अब मुझे 13 महीने का किराया देना है। कोई मुझे काम नहीं दे रहा है। सब कहते हैं कि मैं जेल से आया हूं। मैं निर्दोष था, फिर भी सलाखों के पीछे रहा। मेरे पास न जमीन है, न माता-पिता, कुछ भी नहीं। मुझे बदनाम भी किया गया है।" एक साल से ज्यादा समय तक राजेश बिना किसी सुनवाई के जेल में सड़ता रहा। उसे न तो कोई वकील मिला और न ही परिवार।
उसकी बहन कमलेश को उसकी गिरफ्तारी के नौ दिन बाद इसकी सूचना दी गई। राजेश की बहन ने बताया, "उन्होंने मुझे शाम 4 बजे फोन किया और कोर्ट आने को कहा। मैं अकेली थी इसलिए नहीं जा सकी। एक हफ्ते बाद जब मैं उनसे मिली तो उन्होंने मुझे सब कुछ बताया। जब मैं उनका आधार कार्ड और फोन लेने थाने गई तो उन्होंने मुझे इधर-उधर दौड़ाया और 500 रुपए वापस मांगे। अगर पुलिस ने ठीक से जांच की होती तो ऐसा कभी नहीं होता। हमारे परिवार में कोई भी पढ़ा-लिखा नहीं है। जब भी मौका मिलता, मैं उनसे मिलने जाती थी।"
कोर्ट द्वारा नियुक्त कानूनी सहायक वकील रीना वर्मा ने राजेश की रिहाई का मार्ग प्रशस्त किया। कोर्ट ने आखिरकार राजेश को निर्दोष करार दिया। रीना वर्मा ने बताया कि उसके पास वकील रखने के लिए पैसे नहीं थे। कोर्ट ने मुझे नियुक्त किया। हम न्याय सुनिश्चित करने के लिए पूरी ईमानदारी से काम करते हैं। यह पूरी तरह से मुफ्त सुविधा है।
बाल्टिक सागर किनारे रेत का किला बनाना हो या रविवार को खरीदारी करना, जर्मनी के अजीबोगरीब कानून आपको मुसीबत में डाल सकते हैं.
डॉयचे वैले पर स्टुअर्ट ब्राउन का लिखा-
दूसरे देशों के मुकाबले जर्मनी वैसे तो काफी खुले विचारों का देश नजर आता है. खुले में सिगरेट पीना हो या सार्वजनिक जगहों में बिना कपड़ों के खुले में बैठना या फिर 16 साल की उम्र में बियर पीना सब दूसरे देशों में गैर-कानूनी हो सकता है लेकिन जर्मनी में इसकी पूरी छूट है. हालांकि कई नियम ऐसे हैं जो बाकी देशों के लोगों को अटपटा लग सकता है. जर्मनी में इनके लिए भारी जुर्माना देना पड़ सकता है.
गुड फ्राइडे पर डांस और फिल्मों पर रोक
जर्मनी के 16 राज्यों में से ज्यादातर में गुड फ्राइडे को "साइलेंट पब्लिक हॉलीडे” माना जाता है. मध्ययुग से ही इस दिन डांस करना मना है. हालांकि, राजधानी बर्लिन में इस "तांस फरबोट” (डांस पर रोक) को लेकर रवैया थोड़ा उदार है. यहां गुड फ्राइडे को सुबह 4 बजे से रात 9 बजे तक ही यह रोक लागू रहती है. दक्षिणी, कैथोलिक राज्य बवेरिया में यह पाबंदी गुरुवार से शनिवार तक यानी पूरे 70 घंटे चलती है. इस कानून को तोड़ने वालों पर €10,000 (लगभग ₹10 लाख) तक का जुर्माना लग सकता है.
इस धार्मिक दिन पर शांति बनाए रखने के लिए शोरगुल वाली दूसरी गतिविधियां भी मना है, जैसे कार धोना या घर बदलना.
इस दौरान, जर्मनी के अलग-अलग राज्यों में करीब 700 फिल्मों पर भी रोक लगाई गई है. "पब्लिक हॉलीडे इंडेक्स” में "घोस्टबस्टर्स”, 1975 की कार्टून क्लासिक "हाइडी” और मोंटी पाइथन की 1979 में आई धार्मिक व्यंग्य फिल्म "लाइफ ऑफ ब्रायन” शामिल हैं.
हालांकि, जर्मन लोग ईस्टर के दौरान डांस करने की मांग लगातार करते आ रहे हैं और इस बैन के खिलाफ कई प्रदर्शन भी होते रहते हैं. 2013 में ये प्रदर्शन इस हद तक पहुंच गए थे कि पश्चिमी जर्मनी नॉर्थ राइन-वेस्टफालिया राज्य के बोखुम शहर में इस नियम के विरोध में "लाइफ ऑफ ब्रायन” की पब्लिक स्क्रीनिंग आयोजित की गई थी.
रात में मशरूम और दिन में जंगली लहसुन तोड़ने पर रोक
जर्मनी में रात के समय जंगल से मशरूम तोड़ना गैरकानूनी है. यह नियम इसलिए ताकि रात में जंगली जानवरों को परेशानी ना हो. ऐसे ही पेस्टो सॉस या सूप बनाने के लिए इस्तेमाल होने वाले जंगली लहसुन को भी जड़ों सहित निकालना मना है. इसकी वजह यह है कि नम, छायादार जंगलों और बाढ़ग्रस्त इलाकों में जहरीले पौधों, लिली ऑफ द वैली को जंगली लहसुन समझ कर तोड़ा जासकता है.
निजी उपयोग के लिए इस्तेमाल होने वाले जंगली लहसुन की पत्तियों को तो जर्मनी में आराम से कितनी भी मात्रा में तोडा जा सकता है. लेकिन पौधों को उखाड़ना या संरक्षित इलाकों में पत्तियों को तोड़ना कानूनी तौर पर वर्जित है.
बाल्टिक सागर के किनारे रेत के किले बनाने की मनाही
जर्मनी के नॉर्थ-सी और बाल्टिक सागर के किनारे छुट्टी मनाने वाले कई द्वीपों पर बच्चों का रेत के किले बनाना मना है. छुट्टियों में समुद्र किनारे बच्चे तैर तो सकते हैं, लेकिन रेत के किले बनाने या गहरे गड्ढे खोदने पर लगभग €1,000 (यानी एक लाख) का जुर्माना लग सकता है.
इन द्वीपों पर रेत के किले बनाने पर पाबंदी की एक ठोस वजह यह है कि रेत खोदकर इधर-उधर करने से समुद्र तट का कटाव (बीच इरोशन) हो सकता है.
हालांकि, बाल्टिक सागर के रयूगेन द्वीप के बिन्ज और सेलिन रिसॉर्ट्स में रेत के किले बनाने की अनुमति है, लेकिन शर्त यह है कि उनकी ऊंचाई 30 सेंटीमीटर (11.8 इंच) और परिधि 3.5 मीटर (11.5 फीट) से अधिक नहीं होनी चाहिए.
संडे को नहीं कर सकते शॉपिंग या गार्डन की कटाई
जर्मनी में रविवार को घास काटने की मशीन या कोई भी पावर टूल चलाने पर हो सकता है कि पड़ोसी नाराज हो जाएं और पुलिस को शिकायत कर दे.
यहां, रविवार के रूहेसाइट (यानी शांत समय) का पालन काफी सख्ती से किया जाता है. ऐसे में रविवार या किसी भी पब्लिक हॉलीडे पर लॉन काटने की मशीन समेत किसी भी मोटर वाले औजार का इस्तेमाल करना मना है. इसका पालन नहीं करने वालों पर भारी जुर्माना लग सकता है.
रविवार की यह शांति सड़कों तक फैली होती है. लाडेनश्लुसगेजेत्स (दुकान बंदी कानून) नाम का एक जर्मन कानून 1956 से लागू है, जिसके तहत रविवार या पब्लिक हॉलीडे पर दुकान खोलना मना है. हालांकि, 2006 से राज्यों को अपना नियम बनाने की छूट मिली है, लेकिन अब भी ज्यादातर जगहों पर रविवार को खरीदारी नहीं की जा सकती. साल में केवल कुछ गिने-चुने खास रविवारों और कुछ चुनिंदा दुकानों पर यह संभव हो सकता है.
ऑटोबान पर नहीं खत्म होना चाहिए गाड़ी में तेल
जर्मन ऑटोबान यानी एक्सप्रेस हाईवे पर गाड़ी में तेल खत्म होना भी एक तरह का अपराध है.गाड़ियों के शौकीन जर्मनी में अगर कोई ड्राइवर ऑटोबान पर निकलने से पहले अपनी टंकी ठीक से नहीं भरता है, तो उसे लापरवाह माना जाता है. ऐसा करने पर वह ना केवल खुद को बल्कि दूसरों को भी खतरे में डालता है, इसलिए उस पर जुर्माना लग सकता है क्योंकि जर्मन ऑटोबान पर गाड़ियां बिना किसी स्पीड लिमिट के बहुत तेजी से दौड़ती हैं.
ऑटोबान पर सिर्फ किसी इमरजेंसी में ही गाड़ी रोकी जा सकती है वो भी निर्धारित जगह पर.
-श्रुति व्यास
सन्नाटा और आसमान भारी और हवा नमी से लदी हुई। इन दिनों सुबह भी ठहरी सी होती है। न अखबार के हॉकर का इंतजार होता है और न दूधवाले की या ब्रेड-अंडा बेचने वाले की घंटी या टनटनाहट! अब तो ब्लिंकिट के ईवी साईकिल की घर्राहट होती है। डिलीवरी बॉय उतरता है, हाथ में झूलता कागज का थैला-दूध, ब्रेड, अंडे जैसे सुबह के जरूरी सामान। वह दो कदम भी नहीं चला होता कि रुस्तम आ टपकता है! कहाँ से? जैसे परछाईं से निकला हो। अचानक झपट, तेज, गूँजती भौंक जो कॉलोनी की दीवारों से टकराकर लौटती हैं। ब्लिंकिट का डिलीवरी बॉय घबरा जाता है, थैले की पकड़ ढीली पडऩे लगती है। वह पीछे हटता है, हाथ हिलाकर रुस्तम को भगाने की कोशिश करता है, पर इससे कुत्ते की गुर्राहट और सख्त हो जाती है-अब और तेज भौंकने लगता है। लडक़ा जोखिम नहीं लेता-ग्राहक को फ़ोन करता है, सीढिय़ों पर सामान छोडऩे की बात कहता है, और अपनी ईवी पर जितनी जल्दी हो सके वापस लौट जाता है।
दिल्ली ही नहीं, देश रुस्तमों से भरा हुआ है। सालों पहले मैंने भी एक आवारा कुत्ते से दोस्ती की थी-उसे बिस्कुट खिलाए, कान के पीछे खुजलाया, पार्क में उसका इंतज़ार किया। उस साथ में एक सीधी-सादी ख़ुशी होती है। पर मैं डर भी जानती हूँ-जब पार्क में कुत्तों का कोई अनजाना झुंड रास्ता रोक ले, जब जॉगिंग याकि दौड़ में पीछे आए कुत्ते से पीछा छुड़ाने की जद्दोजहद होती है। तब रास्ता बदलना होता है, दूर से ही खतरा बूझकर, लंबा चक्कर लगा कर, कुछ गेट्स से बचकर रास्ता बनाना पड़ता है।
मेरी गली का रुस्तम हमेशा ऐसा नहीं था। कुछ महीने पहले वह हमारी कॉलोनी में आया—पतला, धूल-धूसरित, बड़ी बादामी आँखों वाला एक आवारा, हल्की-सी पूँछ हिलाता, इतना विनम्र कि किसी के साथ चुपचाप चल पडता था। फिर ‘डॉग लवर्स’ ने उसे नोटिस किया-कभी बिस्कुट, कभी बचे-खुचे खाने के टुकड़े, सिर पर हाथ फेरना, उसकी आज्ञाकारी प्रकृति पर दुलार। पर थाली खाली होते ही, प्यार के पल बीतते ही, उस कुत्ते को वहीं सडक पर लावारिश छोड़ दिया जाता।
कुछ समय बाद उसका एक घर का दरवाज़ा ठिकाना बन गया। वह वहीं सोने लगा, वहीं से दुनिया देखने लगा। और इसी ‘इलाके’ में, कहीं न कहीं, वह नरमदिल आवारा चौकन्ना चौकीदार बन गया—पहचाने चेहरों के प्रति वफ़ादार, अजनबियों के लिए आक्रामक। पड़ोसियों के लिए मुफ़्त सुरक्षा; दूसरों के लिए-एक साया, तेज़ दाँतों के साथ।
इस एक आवारा कुत्ते की कहानी को लाखों में गुणा कीजिए-आपको दिल्ली की हर गली, हर कोने में रूस्तम मिल जाएगे। गली के शेर। जब चाहे तब शौर मचाते हुए। दिल्ली अब वह महानगर है जहां यहां तो राजनीति का शौर है या आवारा कुत्तों की भौं-भौं है। और वैसे ही राजधानी की सडक़ें और अदालतें अब आवारा कुत्तों के भविष्य पर भी बँटी हुई हैं। शहर के कई हिस्सों में, कुत्ते ढांचे का हिस्सा बन गए हैं-चाय की दुकानों के नीचे लेटे, फलों की रेहडिय़ों के बीच से निकलते हुए। कुछ जगहों पर वे इलाकाई बैरिकेड हैं-जहाँ पैर रखना मतलब पीछा कराए बिना नहीं लौटना।
पिछले साल, एक कश्मीरी दोस्त पहली बार दिल्ली आया-साथ में ले गया एक अनचाही याद: ग़लत शॉर्टकट लेने के बाद घिरकर काटे जाने का सदमा। और यह सिफऱ् कुत्तों की बात नहीं—बंदर, गाय, लफ़ंगे, जेबकतरे, सभी से दिल्ली भरी पड़ी है। हमारी सडक़ें केवल अव्यवस्थित नहीं, असुरक्षित भी हो गई हैं। तभी मैं अक्सर सोचती हूँ—कितना बोझ एक शहर के नागरिक को सिफऱ् अपने ही रास्तों पर सुरक्षित चलने के लिए उठाना पडता है या उठाना चाहिए?
सो सोमवार को कुत्तों पर सुप्रीम कोर्ट का आदेश आया तो राहत थी तो सवाल भी? आदेश के मुताबिक क्या आठ हफ़्तों में सार्वजनिक जगहों से सभी आवारा कुत्तों को हटाना, नसबंदी और टीकाकरण करना, सीसीटीवी निगरानी वाले शेल्टर बनाना संभव है? स्वभाविक है जो शहर बँट गया। कुत्तों ने जिनको काटा, दौड़ाया या डराया उनके लिए तो यह देर से मिला न्याय है। जबकि पशु-अधिकार समूहों के एक्टिविस्ट लोगों के लिए-यह नागरिक व्यवस्था के खोल में लिपटी एक क्रूरता है।
पीटा इंडिया जैसी संस्थाएँ कहती हैं कि कुत्तों का इस तरह विस्थापन अमानवीय ही नहीं, बेअसर भी है—कुत्ते लौट आएँगे या उनकी जगह दूसरे ले लेंगे, जब तक मूल कारणों पर काम नहीं होता: अनियंत्रित प्रजनन, फेंका हुआ खाद्य अपशिष्ट, अवैध ब्रीडर और अनियमित पालतू दुकानों पर लगाम। और सबसे बड़ी बात हाल के सालों में कुत्तों को राहु, केतु का पर्याय मान उनकों भक्तों द्वारा बिस्कुट, दूध, खाना खिलाने का धर्म-कर्म है।
मैं सोचती हूँ कि कुत्तों को हटाने का विरोध करने में कार्यकर्ताओं की आवाज तेज़ है लेकिन ज़्यादा शेल्टर बनाने की माँग पर लोग क्यों नहीं ज्यादा बोल रहे है? कुत्तों को गोद लेने, उन्हे घर में पालने के कार्यक्रमों के लिए, सुरक्षित स्थानों के लिए, जहाँ आवारा सार्वजनिक सुरक्षा को खतरा बने बिना रह सकें-इसके लिए उतनी ही मुखर मुहिम क्यों नहीं है? क्या सडक़ पर कुत्तों का रहना सचमुच एक अच्छे शेल्टर से ज़्यादा मानवीय है? और सबसे अहम-जब बच्चों को आवारा कुत्तों ने मार डाला, तब नैतिक आक्रोश कहाँ था?
पश्चिम के कई देशों में आवारा कुत्ता दुर्लभ है-क्योंकि वहाँ व्यवस्था नाम की एक प्रणाली है। माइक्रोचिप से कुत्तों के मालिकों का पता लगाया जाता है। शेल्टर होते हैं। नसबंदी होती है। अनक्लेम्ड कुत्तों को नया घर मिलता है-कुछ को इच्छामृत्यु दी जाती है। मतलब सडक़ कोई विकल्प नहीं। मगर भारत में तो, सडक़ ही वह स्थान, वह व्यवस्था है-जिसे कार्यकर्ता, डॉग लवर्स, मेनका गांधी जैसे राजनीतिक संरक्षक और वे लोग इसलिए पसंद करते है क्योंकि सभी तो बिना जि़म्मेदारी के मुफ्त सुरक्षा चाहते हैं। यह वफ़ादारी भी पालती है और खतरा भी। आपके गेट के बाहर बैठा कुत्ता उसे चोरों से बचा सकता है, पर दूधवाले से या आपके ही मेहमानों, राहगीरों को डराने, काटने का आंतकी भी हो सकता है।
हाँ, कुत्तों को दोष देना गलत है-समस्या तंत्र में है। पर जब खतरा रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन जाए, तो कार्रवाई ज़रूरी हो जाती है। अदालत आगे भी जा सकती थी-क्यों सिर्फ कुत्ते? क्यों नहीं बंदरों और गायों पर भी, जिनकी सडक़ पर मौजूदगी उतनी ही ख़तरनाक है, पर जो धार्मिक-राजनीतिक रूप से अछूते हैं? गौमाता है, उनके लिए गौशालाओं का धर्मादा है बावजूद वे सडकों पर (बारिस में तो खासकर) घूमती या बैठी रहती है। ऐसे ही नील गाय हो या बंदर। बंदरों के कैले खिलाकर तीर्थस्थान से लेकर खेत-खलिहान तक इनकी आबादी इतनी बढ़वा दी गई है कि वह दिन दूर नही है जब भारत का किसान खेती से तौबा कर कह बैठे कि अमेरिका से ही अनाज मंगा कर खा लो।
-सनियारा खान
आजादी की लड़ाई में सब से कम उम्र में शहीद होने वाली लडक़ी के रूप में असम की कनक लता बरुआ का चेहरा ही सामने आ जाता है। उनका नाम भले ही असम के लोगों के लिए जाना पहचाना और स्मरणीय नाम हो, लेकिन बाकी देश के शायद मु_ी भर लोग ही उनके बारे में जानते होंगे। ये बड़े अफसोस की बात है कि आज़ादी की लड़ाई लडऩे वाले और लड़ कर जान देने वाले हमारे देश के अलग अलग प्रांतों के बहुत से नामों को हम जानते ही नहीं हैं या फिर जानने के बाद भी धीरे धीरे भूल जाते हैं।
कनक लता बरुआ, स्वतंत्रता आंदोलन में भाग ले कर देश के लिए जान देने वाली असम की पहली महिला थी। सन 1924 में 22 दिसम्बर के दिन जन्म लेने वाली कनक लता एक सम्भ्रांत परिवार से थी। उनके मामा देवेंद्र नाथ बरा एक जाने-माने कांग्रेसी नेता थे। छोटी उम्र से ही मामा और बाकी लोगों से वे ये सब बातें सुनती रहती थी कि कैसे सात समंदर पार से आ कर अंग्रेजों ने हमारे मुल्क पर कब्जा कर लिया था और कैसे अपने मुल्क को उनसे आज़ाद करने के लिए हमारे भारतीय भाई बहन सभी अपनी जानों की परवाह न करते हुए लड़ रहे थे! गांधीजी की बातों से वे कम उम्र में ही प्रभावित हो गई थी। लेकिन एक समय वे दिलों जान से आजाद हिन्द फौज में शामिल होना चाहती थी। शायद वे तय कर नहीं पा रही थी कि किसके साथ मिल कर देश बचाने की राह में आगे बढ़े! तभी असम के प्रख्यात गीतकार और नाट्यशिल्पी ज्योति प्रसाद आगरवाला जी द्वारा गठित ‘मृत्यु बाहिनी’ नामक लड़ो या मरो मानसिकता रखने वाली एक संगठन के बारे में कनक लता बरुआ को पता चला। ये संगठन देशप्रेमी और जांबाज युवक युवतियों से भरा हुआ था।
-उमंग पोद्दार
साल 2023 में भारत सरकार ने डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन एक्ट पारित किया। यह कानून नागरिकों के निजी डेटा की सुरक्षा सुनिश्चित करने के मकसद से लाया गया था।
कई मसौदों पर विचार के बाद अगस्त 2023 में यह विधेयक संसद के दोनों सदनों में पारित हुआ और इसके बाद इसे राष्ट्रपति की मंजूरी मिली।
हालांकि, कानून के बनने के बाद से ही इसकी आलोचना हो रही है। आलोचकों में पत्रकार भी शामिल हैं, जिनका मानना है कि इस कानून से पत्रकारिता की स्वतंत्रता प्रभावित हो सकती है।
बीते 28 जुलाई को कई पत्रकार संगठनों ने इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (एमईआईटीवाई) के सचिव एस कृष्णन से मुलाकात की। इस बैठक में उन्होंने सरकार से कानून के कुछ प्रावधानों में संशोधन की मांग की।
फिलहाल डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन एक्ट लागू नहीं हुआ है। इस कानून में कई ऐसे प्रावधान हैं, जिन पर केंद्र सरकार को नियम बनाने होंगे।
जनवरी 2025 में सरकार ने इस क़ानून से संबंधित ड्राफ्ट रूल्स जारी किए थे, जिन पर अभी विचार किया जा रहा है।
आइए समझते हैं कि यह क़ानून क्या है और इसके लागू होने से पत्रकारिता पर क्या और किस तरह का असर पड़ सकता है।
क्या है कानून?
साल 2017 में सुप्रीम कोर्ट ने निजता को एक मौलिक अधिकार का दर्जा दिया था, जिसके बाद यह क़ानून लाया गया। इस क़ानून के तहत अगर कोई भी व्यक्ति या संगठन किसी के व्यक्तिगत डेटा का इस्तेमाल करता है, तो उसे कुछ शर्तों का पालन करना होगा।
मिसाल के तौर पर किसी का भी निजी डेटा लेने से पहले उस व्यक्ति से सहमति लेनी होगी, डेटा का इस्तेमाल वैध मक़सद के लिए करना होगा और साथ ही डेटा की सुरक्षा का भी ध्यान रखना होगा। इसके मुताबिक, कोई व्यक्ति अपना निजी डेटा देने के बाद उसे हटवाने की भी माँग कर सकता है।
इस कानून का उल्लंघन करने पर 250 करोड़ रुपये तक का जुर्माना लग सकता है। सरकार इस जुर्माने को बढ़ाकर 500 करोड़ रुपये तक भी कर सकती है।
निजी डेटा में वह सारी जानकारी शामिल है जिससे किसी की पहचान सार्वजनिक हो सकती है। इसमें नाम, पता, फोन नंबर, तस्वीर, सेहत और वित्तीय मामलों से जुड़ी जानकारी और किसी व्यक्ति की इंटरनेट ब्राउजि़ंग हिस्ट्री जैसे विवरण शामिल हैं। साथ ही, इस क़ानून में डेटा को ‘प्रोसेस’ करने की भी परिभाषा दी गई है। इसमें डेटा इक_ा करना, उसे स्टोर करना और प्रकाशित करना शामिल है।
इस कानून को लागू करने की जि़म्मेदारी केंद्र सरकार की संस्था ‘डेटा प्रोटेक्शन बोर्ड ऑफ इंडिया’ की होगी। यह बोर्ड जुर्माना लगाने, शिकायतों पर सुनवाई करने जैसे कई मामलों में काम करेगा।
पत्रकार क्यों कर रहे हैं विरोध ?
पत्रकार संगठनों का कहना है कि निजी डेटा का इस्तेमाल लगभग हर तरह की पत्रकारिता में होता है।
उदाहरण के तौर पर, अगर कोई पत्रकार किसी अफसर के भ्रष्टाचार पर रिपोर्ट कर रहा है, तो उसमें उस अफसर के निजी डेटा का जि़क्र आ सकता है।
इसलिए पत्रकारों ने इस क़ानून के कई प्रावधानों पर आपत्ति जताई है। जैसे कि इस क़ानून के तहत सरकार कुछ परिस्थितियों में किसी व्यक्ति का डेटा साझा करने का आदेश दे सकती है।
पत्रकारों को आशंका है कि अगर सरकार इस तरह का आदेश जारी करती है, तो उनके गुप्त सूत्रों की पहचान उजागर हो सकती है। कई बार रिपोर्टिंग में ऐसे स्रोत शामिल होते हैं जिनकी गोपनीयता बनाए रखना ज़रूरी होता है।
फरवरी 2024 में एडिटर्स गिल्ड ऑफ़ इंडिया ने केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव को चि_ी लिखकर इस कानून के कई प्रावधानों पर चिंता जताई थी। गिल्ड ने लिखा था कि यह क़ानून ‘पत्रकारिता के अस्तित्व के लिए खतरा पैदा कर सकता है।’
अश्विनी वैष्णव केंद्रीय इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री हैं।
पत्रकारों का कहना था कि इस क़ानून से इंटरव्यू और दूसरी चीजें प्रभावित न भी हों लेकिन खोजी पत्रकारिता और संवेदनशील रिपोर्टिंग पर इसका असर पड़ सकता है।
25 जून को 22 प्रेस संगठनों और एक हज़ार से ज़्यादा पत्रकारों ने भी सरकार को ज्ञापन भेजा, जिसमें क़ानून में बदलाव की माँग की गई।
इन पत्रकारों में अख़बार, टीवी, यूट्यूब और फ्रीलांसर पत्रकार शामिल हैं।
पत्रकारों की क्या माँग है?
पत्रकारों की माँग है कि पत्रकारिता के कार्यों के लिए इस कानून से छूट दी जानी चाहिए। वर्तमान में कुछ उद्देश्यों, जैसे अपराध की जाँच के लिए डेटा प्रोटेक्शन कानून से छूट दी गई है।
जब इस कानून का पहला ड्राफ्ट साल 2018 में प्रकाशित हुआ था, तब उसमें पत्रकारिता से संबंधित कई प्रावधानों से छूट दी गई थी।
साल 2019 में जब यह विधेयक पहली बार संसद में पेश हुआ, तब भी ऐसी छूट दी गई थी। इसी तरह साल 2021 के ड्राफ्ट बिल में भी पत्रकारिता के लिए कुछ छूट थी।
हालांकि, साल 2023 में जब यह कानून पारित किया गया, तो पत्रकारिता से जुड़ी छूट हटा दी गई। यह स्पष्ट नहीं है कि ऐसा क्यों किया गया।
पत्रकारों ने सरकार से इस पर जवाब माँगा है। इसके साथ ही पत्रकार संगठनों का कहना है कि 'पत्रकार की परिभाषा' को केवल मीडिया संस्थानों में काम करने वाले लोगों तक सीमित नहीं रखा जाना चाहिए।
एडिटर्स गिल्ड ने अपनी चि_ी में यह भी उल्लेख किया है कि यूरोप और सिंगापुर जैसे देशों के डेटा प्रोटेक्शन कानूनों में पत्रकारिता को छूट दी गई है। इस विषय पर 2018 की जस्टिस बी। एन। श्रीकृष्ण कमेटी की रिपोर्ट में कहा गया था कि अगर पत्रकारों को डेटा प्रोटेक्शन क़ानून का पूरी तरह पालन करना पड़ा, तो इसका अर्थ होगा कि कोई व्यक्ति अपने ख़िलाफ़ रिपोर्ट के लिए सहमति नहीं देगा।
30 जुलाई को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में प्रेस क्लब ऑफ़ इंडिया की उपाध्यक्ष, पत्रकार संगीता बरुआ पिशारोती ने बताया कि उन्होंने 28 जुलाई को इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय के सचिव से मुलाकात की थी।
उनके अनुसार, ‘सरकार की ओर से कहा गया है कि इस क़ानून से पत्रकारों को कोई मुश्किल नहीं होगी। मंत्रालय के सचिव ने हमें एफएक्यूज (फ्रीक्वेंटली आस्क्ड क्वेश्चन्स) तैयार करके देने को कहा है।’
उन्होंने कहा कि पत्रकार संगठन क़ानून में संशोधन की माँग कर रहे हैं और तब तक पत्रकारों को इससे अस्थाई तौर पर छूट दी जानी चाहिए।
भारतीय तकनीकी संस्थान (आईआईटी) मद्रास के शोधकर्ताओं की एक टीम ने कृषि के कचरे से बढिय़ा गुणवत्ता वाली एक ऐसी बायोडिग्रेडेबल पैकेजिंग सामग्री विकसित की है जो प्लास्टिक के इस्तेमाल को खत्म कर सकती है।
डॉयचे वैले पर प्रभाकर मणि तिवारी का लिखा-
आईआईटी मद्रास के रिसर्चरों की टीम का दावा है कि यह शोध प्लास्टिक प्रदूषण और कृषि कचरे के निपटान जैसी दो प्रमुख समस्याओं का स्थायी समाधान कर समाज और पर्यावरण में सकारात्मक बदलाव लाने में सक्षम है। प्लास्टिक के विपरीत यह मिट्टी में घुल सकता है। आईआईटी मद्रास की शोधकर्ता सैंड्रा रोज बीबी, विवेक सुरेंद्रन और डॉ। लक्ष्मीनाथ कुंदानती की यह शोध रिपोर्ट 'बायोसोर्स टेक्नोलॉजी रिपोर्ट्स' के जून अंक में छपी है। इस अध्ययन के लिए आईआईटी के अलावा केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय ने जरूरी रकम मुहैया कराई थी।
कौन है इस खोज के पीछे
आईआईटी मद्रास में डिपार्टमेंट ऑफ एप्लाइड मेकैनिक्स एंड बायोमेडिकल इंजीनियरिंग में असिस्टेंट प्रोफेसर और प्रमुख शोधकर्ता डा। लक्ष्मीनाथ कुंडानती ने एक अन्य शोधकर्ता के साथ मिल कर नेचरवर्क्स टेक्नोलॉजीज नामक एक स्टार्ट-अप की स्थापना की है। इसका मकसद नए उत्पादों को विकसित कर उनके व्यावसायिक उत्पादन को बढ़ावा देना है।
डॉ. कुंदानती डीडब्ल्यू से बातचीत में बताते हैं, ‘अब हम इस तकनीक के प्रचार-प्रसार और बड़े पैमाने पर इसका लाभ उठाने के लिए भागीदारों की तलाश कर रहे हैं। ऐसे समझौतों के तहत भागीदारों को तकनीक का हस्तांतरण भी किया जाएगा।’ उनका कहना था कि कृषि और कागज के कचरे पर उगाए गए माइसीलियम-आधारित यह बायोकंपोजिट पैकेजिंग सामग्री बेहतर गुणवत्ता के साथ ही बायोडिग्रेडेबल भी होते हैं।
वो कहते हैं कि अब हमारा लक्ष्य इस तकनीक के प्रसार के लिए सरकारी वित्तीय सहायता वाली योजनाएं हासिल करना और इस शोध का ठोस सकारात्मक सामाजिक प्रभाव सुनिश्चित करना है। डा। कुंदानती बताते हैं, "भारत में हर साल करीब 350 मिलियन टन से ज्यादा कृषि कचरा पैदा होता है। इसमें से ज्यादातर को जला दिया जाता है या सडऩे के लिए छोड़ दिया जाता है। इससे बड़े पैमाने पर जिससे वायु प्रदूषण तो होता ही है, बेशकीमती संसाधन भी बर्बाद होते हैं।’
यहां इस बात का जिक्र प्रासंगिक है कि हर साल हरियाणा और आसपास के इलाकों में पराली जलाने के कारण दिल्ली समेत पूरे एनसीआर इलाके में बड़े पैमाने पर वायु प्रदूषण फैलता है। इस दौरान हवा की गुणवत्ता में भारी गिरावट दर्ज की जाती है।
ईको फेंडली होने के साथ-साथ किफायती भी
शोधकर्ताओं का कहना है कि इस शोध का मकसद किफायती और पर्यावरण-अनुकूल पैकेजिंग विकल्प तैयार करना है। यह पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वाले प्लास्टिक की जगह लेने के साथ ही पर्यावरण की सेहत सुधारने में अहम भूमिका निभा सकता है। इसके व्यावसायिक उत्पादन से रोजगार के अवसर भी पैदा होंगे।
डॉ. कुंदानती बताते हैं, ‘कृषि कचरे से तैयार इस कंपोजिट को संशोधित करने के बाद थर्मल और ध्वनि इन्सुलेशन सामग्री तैयार करने जैसे इंजीनियरिंग की विभिन्न शाखाओं में भी इसका इस्तेमाल किया जा सकता है।’
शोधकर्ताओं की टीम की सदस्य सांद्रा रोज बीबी डीडब्ल्यू को बताती हैं, ‘पहले जितने शोध कार्य हुए हैं उनमें एकल सब्सट्रेट या फंगस पर ध्यान केंद्रित किया जाता रहा था। लेकिन हमने फंगस की दो किस्मों का इस्तेमाल करते हुए पांच सब्सट्रेटों पर इसके असर का तुलनात्मक अध्ययन किया। इस शोध से यह बात सामने आई कि कार्डबोर्ड, लकड़ी का बुरादा, कागज, कोकोपीथ और घास जैसे अलग-अलग सब्सट्रेट माइसेलियल के विकास के घनत्व और दूसरी चीजों को कैसे प्रभावित करते हैं। उसके बाद उनमें से बेहतर या आदर्श सबस्ट्रेट-फंगस कंबीनेशन को चुना गया।’
आईआईटी मद्रास आईआईटी मद्रास
शोधकर्ता टीम के एक अन्य सदस्य विवेक सुरेंद्रन डीडब्ल्यू को बताते हैं, ‘हमारा नजरिया सर्कुलर इकोनॉमी के अनुरूप था। हमारा मकसद कम कीमत वाले कृषि और कागज के कचरे को उच्च कीमत वाले बायोडिग्रेडेबल पैकेजिंग सामग्री में बदलना था। इसके साथ ही इसके यांत्रिक गुणों को पेट्रोलियम से पैदा होने वाले फोम के बराबर या उससे बेहतर बनाए रखने की भी चुनौती थी।’
-मुकीमुल अहसन
बीते साल बड़े पैमाने पर एक विरोध प्रदर्शन के जरिए डेढ़ दशक पुरानी अवामी लीग सरकार के पतन के बाद से बांग्लादेश की कूटनीति में काफी बदलाव आया है।
शेख हसीना की सरकार के जाने के बाद लंबे समय से सहयोगी रहे भारत के साथ संबंधों में तनाव भी आया है। बीते एक साल में बांग्लादेश की विदेश नीति भारत से हटकर चीन के नज़दीक जाती दिखी है। इसके साथ ही, पाकिस्तान के साथ रिश्ते सुधारने की कोशिश भी देखी गई है।
इस बीच बांग्लादेश के साथ भारत के आर्थिक और व्यापारिक संबंध भी बिगड़े हैं और सीमा पर भी संघर्ष की स्थिति पैदा हुई है। शेख़ हसीना सरकार के गिरने के बाद से भारत की ओर से सीमा के अंदर लोगों को धकेलने के कई मामले सामने आए हैं।
राजनयिकों और विश्लेषकों का कहना है कि बीते एक साल में बांग्लादेश का सबसे बड़ा कूटनीतिक बदलाव किसी ‘एक देश पर केंद्रित विदेश नीति’ से पीछे हटना है।
अंतरराष्ट्रीय संबंधों के शिक्षक प्रोफेसर साहब इनाम खान ने बीबीसी बांग्ला से कहा, ‘बांग्लादेश की नई सरकार पहले से ज़्यादा व्यावहारिक हो गई है। किसी ख़ास देश-केंद्रित विदेश नीति से हटने के कारण बांग्लादेश का भू-राजनीतिक महत्व भी बढ़ गया है।’
विश्लेषकों का मानना है कि पिछले साल के विरोध प्रदर्शनों के दौरान हुई हत्याओं पर संयुक्त राष्ट्र के फैक्ट-फाइंडिंग मिशन की रिपोर्ट, प्रोफेसर यूनुस के लिए एक बड़ी कूटनीतिक सफलता है।
इस बीच, इस बात पर काफी चर्चा है कि डोनाल्ड ट्रंप के दोबारा सत्ता में आने के बाद सभी देशों पर लगाए गए टैरिफ़ से बांग्लादेश कैसे निपटेगा।
हालांकि म्यांमार में रोहिंग्या मुद्दे को लेकर प्रोफेसर मोहम्मद यूनुस की सरकार की आलोचना भी हुई है।
अंतरिम सरकार के पहले साल में कूटनीति के क्षेत्र में बांग्लादेश कितना सफल रहा, यह सवाल भी उठ रहा है।
भारत के साथ संबंधों में ‘ठंडापन’
पिछले डेढ़ दशक में अवामी लीग सरकार के दौरान भारत-बांग्लादेश संबंधों के जिस ऊंचाई पर पहुंचने की बात कही जा रही थी, वह भी 5 अगस्त 2024 को शेख़ हसीना की सरकार के गिरने के साथ लगभग ढह गई। रिश्ते सुधरने के बजाय और धीरे-धीरे बिगड़ते चले गए।
बांग्लादेश में तख़्तापलट के बाद से भारतीय मीडिया और सोशल मीडिया पर अल्पसंख्यकों और हिंदुओं के खिलाफ हमलों और अत्याचारों की खबरों और अफ़वाहों ने भी दोनों देशों के रिश्तों की गिरावट में भूमिका निभाई।
पूर्व राजनयिक एम हुमायूं कबीर ने बीबीसी बांग्ला को बताया, ‘बांग्लादेश से भागकर भारत गईं शेख़ हसीना के खिलाफ बांग्लादेशी अदालतों में मुक़दमा चल रहा है। पूर्व प्रधानमंत्री शेख़ हसीना दिल्ली में कई बार राजनीतिक बयान देती देखी गई हैं। इस वजह से भी दोनों देशों के रिश्ते और जटिल हो गए।’
इस साल अप्रैल में बैंकॉक में भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बांग्लादेश की अंतरिम सरकार के प्रमुख सलाहकार प्रोफेसर यूनुस के बीच हुई बैठक में भी इस मुद्दे पर चर्चा हुई थी।
इसके अलावा, पिछले एक साल में दोनों पड़ोसी देशों के बीच आर्थिक और वाणिज्यिक संबंधों में कई बदलाव आए हैं। पिछले एक साल में, भारत और बांग्लादेश ने एक-दूसरे पर कई व्यापारिक प्रतिबंध भी लगाए हैं।
भारत ने बांग्लादेशी नागरिकों के लिए वीजा नियम भी कड़े कर दिए हैं। खासतौर पर, शेख हसीना के सत्ता से हटने के बाद पर्यटक वीज़ा जारी करना निलंबित कर दिया गया है। बहुत कम बांग्लादेशियों को सिफऱ् इलाज के लिए भारत वीजा दे रहा है। पहले लगभग 20 लाख बांग्लादेशी हर साल इलाज, शिक्षा, व्यापार और पर्यटन जैसे कई उद्देश्यों के साथ भारत जाते थे।
पहले की तुलना में अब वीजा स्वीकार करने की दर में 80 फीसदी से अधिक की कमी आई है। पिछले साल दिसंबर में अगरतला में बांग्लादेश सहायक उच्चायोग कार्यालय पर हुए हमले के बाद भी काफी नाराजगी देखी गई थी।
बांग्लादेश में जिस घर को सत्यजीत रे के परिवार का बताया जा रहा है, आखिर वह किसका है?
बांग्लादेश-चीन संबंधों की स्थिति क्या है?
सत्ता से बेदख़ल होने से पहले तत्कालीन प्रधानमंत्री शेख हसीना ने जुलाई 2024 की शुरुआत में चीन का दौरा किया था। तख्तापलट के बाद अंतरिम सरकार के सत्ता में आने के बाद प्रमुख सलाहकार प्रोफेसर मोहम्मद यूनुस ने जिस देश की अपनी पहली राजकीय यात्रा मार्च में की, वह चीन की थी।
उस यात्रा के दौरान बांग्लादेश में चीनी निवेश, नदी प्रबंधन और रोहिंग्या संकट जैसे कई मुद्दों पर चर्चा हुई और दोनों देशों के बीच कई समझौतों और ज्ञापनों पर हस्ताक्षर किए गए।
बातचीत के दौरान चीन ने कहा कि वह मोंगला बंदरगाह के विकास पर काम करेगा। अतीत में चीन और भारत इस परियोजना को अमली जामा पहनाने कोशिश करते रहे हैं। विश्लेषकों का मानना है कि चीन अब अकेले पूरा काम कर सकता है।
इलाज के लिए चीन का रुख
भारत की यात्रा के लिए वीजा से जुड़ी मुश्किलें पैदा होने की वजह से चीन अब बांग्लादेशी मरीज़ों के लिए एक नया केंद्र बनने का प्रयास कर रहा है।
चीनी सरकार ने कुनमिंग में चार अस्पतालों को बांग्लादेशियों के इलाज के लिए तय कर किया है।
बांग्लादेश के साथ संबंध सुधारने के लिए चीन के कई कदमों में बांग्लादेशी राजनेताओं, पत्रकारों और विभिन्न व्यवसायों के लोगों को देश की यात्रा पर ले जाना भी शामिल है।
इसके तहत चीन ने पिछले साल बीएनपी, जमात-ए-इस्लामी, एनसीपी और वामपंथी संगठनों के नेताओं को अपने देश की यात्रा पर बुलाया है।
दूसरे शब्दों में कहें तो चीन ने बांग्लादेश और भारत के बीच राजनयिक संबंधों की कमी का फ़ायदा उठाया है। प्रोफेसर साहब इनाम ख़ान ने बीबीसी बांग्ला को बताया, ‘चीन के लिए बांग्लादेश का महत्व पहले भी उतना ही था जितना अब है। हालांकि, भारत पर निर्भरता कम होने के कारण चीन बांग्लादेश को विशेष महत्व दे रहा है। ऐसा लगता है कि चीन इस समय न केवल सरकार के साथ, बल्कि राजनीतिक दलों के साथ भी ख़ास रिश्ते बना रहा है।’
विश्लेषकों के अनुसार, चीन बांग्लादेश के साथ अपने संबंधों को उसी स्तर पर ले जाना चाहता है, जिस स्तर पर हसीना के दौर में भारत-बांग्लादेश के रिश्ते थे। साथ ही, बांग्लादेश भी चीन के साथ संबंधों को आगे बढ़ाने की कोशिश कर रहा है, जिसे कुछ लोग प्रोफ़ेसर यूनुस सरकार की कूटनीतिक सफलता मानते हैं।
पाकिस्तान के साथ संबंधों में सुधार
पाकिस्तान और बांग्लादेश के बीच संबंध हमेशा से एक संवेदनशील मुद्दा रहा है। हालांकि, अवामी लीग के दौर में और खासकर युद्ध अपराधों के मुक़दमों के दौरान, दोनों देशों के बीच संबंध तेज़ी से बिगड़ते चले गए। हालांकि, शेख हसीना सरकार के पतन के बाद से जिस तरह भारत के साथ रिश्ते ठंडे पड़ गए हैं, उसी तरह पाकिस्तान के साथ मुश्किल रिश्तों पर जमी बफऱ् पिघल गई है। दोनों देशों के बीच अप्रैल में विदेश सचिव स्तर की औपचारिक बैठक भी हुई थी। डेढ़ दशक बाद हुई इस बैठक को इस्लामाबाद के साथ संबंधों को मज़बूत करने की एक दिशा के रूप में देखा जा रहा है। बैठक में बांग्लादेश ने 1971 में पाकिस्तानी सशस्त्र बलों के बांग्लादेश के ख़िलाफ़ किए गए कथित नरसंहार के लिए पाकिस्तान से औपचारिक माफ़ी की मांग की, साथ ही तीन लंबित मुद्दों का समाधान करने की भी मांग की।
बीते साल जून में बीजिंग में हुई चीनी विदेश सचिव स्तरीय बैठक में बांग्लादेश और पाकिस्तान भी शामिल थे। इस दौरान एक त्रिपक्षीय गठबंधन बनाने पर चर्चा होने की ख़बरें थीं। हालांकि, बाद में विदेश मंत्रालय ने घोषणा की कि बांग्लादेश इस गठबंधन का हिस्सा नहीं होगा।
28 जुलाई को न्यूयॉर्क स्थित संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय में एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन के दौरान बांग्लादेश और पाकिस्तान के बीच हुई बैठक में द्विपक्षीय संबंधों को मजबूत करने का संकल्प लिया। देश में सत्ता बदलने के बाद पाकिस्तान ने बांग्लादेश के साथ संबंधों को मजबूत करने के प्रयास किए हैं, लेकिन अंतरराष्ट्रीय संबंध विश्लेषक इसे ‘सजावटी’ मानते हैं।
प्रोफेसर साहब इनाम खान ने बीबीसी बांग्ला को बताया, ‘बांग्लादेश के साथ पाकिस्तान के रिश्ते बहुत ही बयानबाज़ी भरे हैं। भविष्य में शायद बांग्लादेश-पाकिस्तान संबंधों को व्यावसायिक पहलुओं से फ़ायदा हो सकता है।’ हालांकि, उनका यह भी कहना है कि बांग्लादेश की विदेश नीति के मुताबिक़, दुनिया के किसी भी देश के साथ सामान्य राजनयिक संबंध बनाए रखना महत्वपूर्ण है।
80 साल पहले जापान पर हुए परमाणु बम हमले से जिंदा बचे लोग यानी ‘हिबाकुशा’ अब कम ही बचे हैं। इसलिए कहानीकारों की एक नई पीढ़ी उनकी जगह ले रही है जो दुनिया को उन हमलों का दर्द कभी भूलने नहीं देना चाहती।
डॉयचे वैले पर जूलियान रायल का लिखा-
जापान के हिरोशिमा में 6 अगस्त को और नागासाकी में 9 अगस्त को परमाणु बम हमलों की बरसी पर श्रद्धांजलि समारोह आयोजित किए जा रहे हैं। इन समारोहों में पूरी दुनिया से हजारों लोगों के शामिल होने की उम्मीद है। हालांकि, एक दुखद सच यह भी है कि पिछले साल के मुकाबले इस बार ‘हिबाकुशा’ यानी हमलों में बचे हुए लोगों की संख्या कम होगी।
मार्च में जारी एक सरकारी रिपोर्ट में पुष्टि की गई है कि अब सिर्फ 99,130 हिबाकुशा जीवित हैं, जो पिछले साल की तुलना में 7,695 कम हैं। इसकी वजह यह है कि बढ़ती उम्र अब उनकी संख्या को कम करती जा रही है। फिलहाल, जीवित बचे लोगों की औसत आयु 86।13 वर्ष है।
दुनिया में अब तक सिर्फ एक बार युद्ध में परमाणु हथियारों का इस्तेमाल हुआ है। समय के साथ यह चिंता बढ़ रही है कि इन हमलों की भयावहता और असर, उन्हें अपनी आंखों से देखने वाले लोगों की कहानियों के साथ कहीं गुम न हो जाए। इसी को ध्यान में रखते हुए, कई संग्रहालय, अलग-अलग संगठन और लोग इन कहानियों को हमेशा के लिए जिंदा रखने के लिए आगे आ रहे हैं। वे चाहते हैं कि आने वाली पीढिय़ां भी इन दर्दनाक घटनाओं के बारे में जाने और परमाणु हथियारों के खतरों को समझ सकें।
शुन सासाकी को लगा कि वह अपने गृहनगर पर हुए परमाणु हमले और उसके बाद की भयावहता को दुनिया तक पहुंचाने में मदद कर सकते हैं। हैरानी की बात है कि उन्होंने अगस्त 2021 से ही हिरोशिमा मेमोरियल पीस पार्क के मुख्य स्थलों के बारे में विदेशी पर्यटकों को बताना शुरू कर दिया था। उस समय उनकी उम्र महज आठ साल थी। आज भी, 12 साल की उम्र में वह यही काम कर रहे हैं।
शुन सासाकी अपने गृहनगर पर हुए परमाणु हमले और उसके बाद की भयावहता को दुनिया तक पहुंचाने में मदद कर रहे हैंशुन सासाकी अपने गृहनगर पर हुए परमाणु हमले और उसके बाद की भयावहता को दुनिया तक पहुंचाने में मदद कर रहे हैं।
सासाकी ने डॉयचे वेले से फर्राटेदार अंग्रेजी में बात करते हुए कहा, ‘जब मैं स्कूल में पहली कक्षा में था, तो मैंने परमाणु बम डोम को देखा। वह बहुत बुरी हालत में था, तो मैंने सोचा कि इसे क्यों नहीं हटाया गया? फिर मैंने इंटरनेट पर खोज की और पीस मेमोरियल म्यूजियम जाकर उस बम के बारे में जाना, जो यहां गिराया गया था।’
गृहनगर की त्रासदी ने झकझोर दिया
अपने गृहनगर के दुखद इतिहास को लेकर सासाकी की रुचि तब और बढ़ गई, जब उन्हें पता चला कि उनकी परदादी 6 अगस्त, 1945 के हमले में बच गई थीं, लेकिन बाद में कैंसर से उनकी मृत्यु हो गई। उन्होंने कहा, ‘जब बम गिराया गया था, तब वह 12 साल की थीं। अपने घर के अंदर थीं, जो हाइपोसेंटर से लगभग 1।5 किलोमीटर दूर था। वह जली नहीं थीं, लेकिन रेडिएशन के संपर्क में आ गई थीं। जब उन्हें बाहर निकाला जा रहा था, तब वह ‘काली बारिश' की चपेट में आ गई थीं।
दरअसल, ‘काली बारिश’ धूल, बम से लगी आग की कालिख और रेडियोएक्टिव कणों का खतरनाक मिश्रण थी। बम फटने के बाद कई घंटों तक यह शहर पर बारिश के रूप में गिरी थी। सासाकी की परदादी, युरिको, 38 साल की उम्र में स्तन कैंसर और 60 साल की उम्र में कोलन कैंसर से पीडि़त हो गई थीं। 69 साल की उम्र में उनका निधन हो गया।
शुन सासाकी को उनके पहले जन्मदिन के मौके पर अंग्रेजी सीखने के खिलौने दिए गए थे। वे चार साल की उम्र तक आते-आते अंग्रेजी में बात करना सीख गए थे। आज वे कहते हैं कि उन्हें जापानी के बजाय अंग्रेजी बोलना ज्यादा पसंद है। इससे उन्हें उन विदेशी लोगों से बात करने का भी मौका मिलता है, जो हिरोशिमा आते समय 1945 की घटना को लेकर पहले से ही कुछ धारणाएं बनाए होते हैं।
सासाकी उन्हें बताते हैं कि कैसे ‘लिटिल बॉय' नामक यूरेनियम बम, परमाणु बम डोम के करीब ठीक ऊपर फटा था। उस बम से लगभग 15 किलो टन टीएनटी के बराबर ऊर्जा निकली थी। विस्फोट के बाद 1।3 किलोमीटर के दायरे में आने वाली लगभग हर इमारत नष्ट हो गई थी और हर व्यक्ति मारा गया था। अनुमान है कि शुरुआती विस्फोट में या उसके बाद के महीनों में गंभीर रूप से जलने या रेडिएशन के संपर्क में आने से लगभग 1,40,000 लोग मारे गए।
सासाकी ने बताया, ‘बहुत से लोग मुझे बताते हैं कि वे हिरोशिमा यह सोचकर आए थे कि उन्हें पूरी कहानी पता है और सिर्फ शहर को बुरी तरह नुकसान पहुंचा था। लेकिन फिर वे कहते हैं कि उन्हें नहीं पता था कि असल में क्या हुआ था।’
-दिनेश उप्रेती
चीन की सीमा से लगे उत्तराखंड के उत्तरकाशी जि़ले में मंगलवार को भूस्खलन और अचानक आई बाढ़ में बड़ी जनहानि होने की आशंका जताई जा रही है।
सोशल मीडिया पर घटना के जो वीडियो वायरल हैं, उनमें स्थानीय लोग चिल्लाकर एक-दूसरे को आपदा की चेतावनी और जान बचाकर भागने की अपील करते हुए सुने जा सकते हैं।
वीडियो में देखा जा सकता है कि कैसे घर और कई मंजि़ला इमारतें पानी और इसके साथ आए मलबे के तेज बहाव में ताश के पत्तों की तरह ढह गई।
उत्तराखंड सरकार का दावा है कि राहत और बचाव कार्य ज़ोर-शोर से चलाए जा रहे हैं और इसमें आपदा प्रबंधन बलों के अलावा, सेना और अर्धसैनिक बलों की मदद भी ली जा रही है।
इन सबके बीच जो सबसे ज़्यादा चर्चा में है वो है खीर गंगा नदी जो भागीरथी में जाकर मिलती है।
धराली उत्तरकाशी जि़ले का एक कस्बा है और गंगोत्री की ओर बढ़ते हुए हर्षिल घाटी का हिस्सा है। ये घाटी चारधामों में से एक गंगोत्री धाम की यात्रा पर जाने वाले लोगों के लिए एक अहम पड़ाव भी है।
यहां से गंगोत्री तकरीबन 20 किलोमीटर दूर है। भौगोलिक स्थिति की बात करें तो यह समुद्र तल से लगभग 3100 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है, और अपनी प्राकृतिक सुंदरता के लिए मशहूर है।
धाराली कस्बे में हिमालय की ऊंची चोटियों में उतरकर आती है खीर गंगा। यूँ तो यह तकरीबन पूरे साल शांत और धीमे प्रवाह में बहती है, लेकिन बरसात में अपना उग्र रूप दिखा देती है।
मंगलवार को खीर गंगा ने जैसा रौद्र रूप दिखाया, इतिहास के जानकार और भूगर्भ विज्ञानी भी मानते हैं कि पहले भी खीर गंगा में भीषण बाढ़ आ चुकी है।
भूगर्भ विज्ञानी प्रोफेसर एसपी सती बताते हैं कि 1835 में खीर गंगा में सबसे भीषण बाढ़ आई थी। तब नदी ने सारे धराली कस्बे को पाट दिया था। बाढ़ से यहां भारी मात्रा में मलबा (गाद) जमा हो गया था। उनका दावा है कि अभी जो भी बसावट है वह उस समय नदी के साथ आई गाद पर स्थित है।
पिछले कुछ सालों में भी खीर गंगा में पानी का तेज बहाव आने की घटनाएं हुई हैं, कई घर इस बाढ़ में बहे भी हैं, लेकिन कोई जनहानि नहीं हुई थी।
खीर गंगा नाम की कहानी
हिमालयी इतिहास और पर्यावरण के विशेषज्ञ माने जाने वाले इतिहासकार डॉ शेखर पाठक भी मानते हैं कि ये इलाका बेहद संवेदनशील है और भूस्खलन और एवलांच जैसे हादसों की संभावना यहां बनी रहती है।
बीबीसी से बातचीत में उन्होंने कहा, ‘हिमालय की चौखंभा वेस्टर्न रेंज का ये इलाका है। साल 1700 में जब गढ़वाल में परमार राजवंश का शासन था। तब भी बड़ा भूस्खलन होने से झाला में 14 किलोमीटर लंबी झील बन गई थी और इसका प्रमाण आज भी देखा जा सकता है, क्योंकि यहां भागीरथी ठहरी हुई लगती है।’
डॉक्टर पाठक बताते हैं कि 1978 में धराली से नीचे उत्तरकाशी की तरफ आते हुए 35 किलोमीटर दूर डबराणी में एक डैम टूट गया था, इससे भागीरथी में बाढ़ आ गई थी और कई गांव बह गए थे।
इसके बाद धराली और आसपास के इलाकों में कई बार बादल फटने, भूस्खलन की घटनाएं हुई, लेकिन कोई बड़ी जनहानि नहीं हुई थी।
रही बात, खीर गंगा के नाम को लेकर सोशल मीडिया पर चल रही कई कहानियों की तो शेखर पाठक इन्हें बस ‘सुनी-सुनाई बातें’ ही मानते हैं।
उन्होंने कहा, ‘ये नदी पहले ग्लेशियर और फिर घने जंगलों से होकर बहती है इसलिए इसका पानी शुद्ध रहता है। मतलब कई दूसरी नदियों की तरह इसमें चूने का पानी मिला हुआ नहीं है। इसलिए इसे खीर नदी कहा जाता है।’
भारत में रिफाइनरियों ने सस्ते रूसी कच्चे तेल से मोटा मुनाफा बनाया है. हालांकि, यही सस्ता रूसी कच्चा तेल अब वैश्विक व्यापार में भारत के लिए चुनौती बन चुका है.
डॉयचे वैले पर अविनाश द्विवेदी का लिखा-
डॉनल्ड ट्रंप भारत पर रूस से कच्चे तेल की खरीद कम करने के लिए लगातार दबाव बढ़ाते जा रहे हैं। फिलहाल भारत, रूस के कच्चे तेल का सबसे बड़ा आयातक है। ऐसे में कई लोगों को डर था कि कभी-ना-कभी पश्चिम के देशों और रूस के बीच भारत के बैलेंसिंग एक्ट का ये हश्र जरूर होगा। अब ट्रंप ने आरोप लगाया है कि भारत के जरिए रूस को जो विदेशी मुद्रा मिलती है, वो रूस को यूक्रेन में युद्ध लडऩे में मदद करती है। ट्रंप ने यह भी कहा कि भारत को फर्क नहीं पड़ता कि यूक्रेन में रूस का युद्ध कितने लोगों को मार रहा है।
हालांकि, ट्रंप की ओर से लगातार किए जा रहे जबानी हमलों का जमीन पर अभी कोई खास असर नहीं दिखा है। रूस पर कार्रवाई के ट्रंप के बयान को लेकर मॉस्को ने कहा है कि व्लादिमीर पुतिन को संदेह है कि ट्रंप अपनी धमकी को सच्चाई में बदलेंगे। वहीं, ब्लूमबर्ग का डेटा दिखा रहा है कि ट्रंप की धमकी के बावजूद रूस से होने वाले कच्चे तेल के निर्यात पर बहुत ज्यादा असर नहीं पड़ा है। भारत ने ना सिर्फ रूसी तेल खरीदना जारी रखा है, बल्कि अमेरिका के साथ यूरोपीय संघ को भी अपने बयानों में निशाना बनाना शुरू किया है।
रूसी तेल के सबसे बड़े खरीदार
रूसी तेल के तीन सबसे बड़े खरीदार देश हैं: चीन, भारत और तुर्की। रूसी कच्चा तेल ना सिर्फ इन देशों की आंतरिक ऊर्जा जरूरतों को फायदा पहुंचा रहा है, बल्कि इनके रिफाइनर भी फायदा कमा रहे हैं। तमाम धमकियों के बाद भी ये सभी पीछे हटने की कोई मंशा नहीं दिखा रहे हैं।
जब जनवरी 2023 में यूरोपीय संघ ने रूस से समुद्र के जरिए आने वाले तेल का बायकॉट किया था, तब से इसकी ज्यादा बिक्री यूरोप के बजाए एशिया में होने लगी। तब से अब तक रूस से कुल ऊर्जा खरीद की बात करें, तो चीन इस मामले में नंबर एक पर है।
चीन ने रूस से करीब 220 अरब डॉलर का रूसी तेल, गैस और कोयला खरीदा है। इसके बाद नंबर है भारत का, जिसने रूस से अब तक करीब 135 अरब डॉलर के ऊर्जा उत्पाद खरीदे हैं। इसके बाद 90 अरब डॉलर के आंकड़े के साथ तुर्की है। हालांकि, यूक्रेन पर रूसी हमले से पहले भारत, रूस से लगभग ना के बराबर कच्चा तेल खरीदता था।
तेल कारोबार में भारत के हाथ जले
दुर्लभ खनिजों के मामले में अभी अमेरिका की निर्भरता चीन पर काफी ज्यादा है। कुछ हफ्तों पहले ही ट्रंप की शी जिनपिंग से फोन पर हुई बातचीत के बाद अमेरिका को ये दुर्लभ खनिज फिर से मिलने शुरू हुए हैं। विश्लेषकों के अनुसार, इसीलिए ट्रंप चीन पर बहुत आक्रामक नहीं हो रहे हैं, लेकिन भारत को आड़े हाथों लेने का कोई मौका नहीं छोड़ रहे हैं।
जाहिर है फिलहाल भारत के खिलाफ अमेरिका का रुख देखकर तुर्की की सांसें भी ऊपर-नीचे जरूर हो रही होंगी। फिर भारत ने रूसी तेल खरीदते हुए रूस और पश्चिमी ताकतों के बीच अपने बैलेंसिंग एक्ट का काफी शोर मचाया था। दूसरी ओर तुर्की, रूसी कच्चा तेल खरीदते हुए भी चुप साधकर बैठा हुआ था।
इन बड़े खरीदारों के अलावा कुछ छोटे खरीदार भी हैं। मसलन हंगरी, जो पाइपलाइन के जरिए थोड़ा रूसी कच्चा तेल खरीदता है। हंगरी तो यूरोपीय संघ का सदस्य भी है। हालांकि, इसके राष्ट्रपति विक्टर ओरबान रूस पर लगाए गए प्रतिबंधों के मुखर आलोचक रहे हैं।
-प्रमोद भार्गव
भगवान भोले नाथ का गुस्सा, प्रतीक रूप में मौत के तांडव नृत्य में फूटता है। देवभूमी उत्तराखंड में शिव के इस तांडव नृत्य का सिलसिला केदारनाथ में 2013 में आई प्राकृतिक आपदा के बाद अभी भी जारी है। उत्तराखंड के उत्तरकाशी जिले की खीर गंगा नदी और धराली में बादल फटने और हर्शिल के तेल गाड़ नाले में बाढ़ आने से बड़ी तबाही हुई है। इन प्राकृतिक आपदाओं को हमें इसी गुस्से के प्रतीक रूप में देखने की जरूरत है। धराली में तो 50 से ज्यादा घर, 30 होटल और 30 होमस्टे मलबे में बदल गए। जो खीर नदी 10 मी. चौड़ी थी, वह जल प्रवाह से 39 मी. चौड़ी हो गई। अतएव जो भी सामने पड़ा उसे लीलती चली गई। प्रशासन चार लोगों की मौत और 100 से अधिक लोगों के लापता होना बता रहा है। लेकिन हिमालय के बीचोंबीच बसा खूबसूरत धराली गांव में सैलाब नीचे उतरते हुए दिखा, उससे लगता है, मौतें कहीं अधिक हुई हैं। प्रलय इतनी तीव्रता से आया की उसकी कान के पर्दे फाड़ देने वाली गर्जना सुनने के बाद लोगों को बचने का समय ही नहीं मिल पाया। अब धराली मलबे में दफन हैं।
इस भूक्षेत्र के गर्भ में समाई प्राकृतिक संपदा के दोहन से उत्तराखंड विकास की अग्रिम पांत में आ खड़ा हुआ था, वह विकास भीतर से कितना खोखला था, यह इस क्षेत्र में निरंतर आ रही इस आपदाओं से पता चलता है। बरिश, बाढ़, भूस्खलन, बर्फ की चट्टानों का टूटना और बदलों का फटना, अनायास या संयोग नहीं है,बल्कि विकास के बहाने पर्यावरण विनास की जो पृश्ठभूमि रची गई, उसका परिणाम है। तबाही के इस कहर से यह भी साफ हो गया है कि आजादी के 78 साल बाद भी हमारा न तो प्राकृतिक आपदा प्रबंधन प्राधिकरण आपदा से निपटने में सक्षम है और न ही मौसम विभाग आपदा की सटीक भविश्यवाणी करने में समर्थ हो पाया है। यह विभाग केरल और बंगाल की खाड़ी के मौसम का अनुमान लगाने का दावा तो करता है, किंतु भारत के सबसे ज्यादा संवेदनशील क्षेत्र हिमालय में बादल फटने की भी सटीक जानकारी नहीं दे पाता है। जबकि धराली क्षेत्र में एक साथ दो जगह बादल फटे और कुछ मिनटों में हुई तेज बारिश ने श्रीखंड पर्वत से निकली खीरगंगा नदी को प्रलय में बदलकर 90 प्रतिशत गांव को हिमालय के गर्भ में समा दिया।
बादल फटना अनायास जरूर है, लेकिन ये करीब 10 किमी व्यास की परिधि में फटने के बाद अतिवृष्टि का कारण बनते हैं। 10 सेंटीमीटर या उससे अधिक बारिश को बादल फटने की घटना के रूप में पारिभाषित किया जाता है। बादल फटने की घटना के दौरान किसी एक स्थान पर एक घंटे के भीतर, उस क्षेत्र में होने वाली औसत, वार्षिक वर्षा की 10 प्रतिशत से अधिक बारिश हो जाती है। मौसम विभाग वर्षा का पूर्वानुमान कई दिन या माह पहले लगा लेते हैं। लेकिन मौसम विज्ञानी बादल फटने जैसी बारिश का अनुमान नहीं लगा पाते। इस कारण बादल फटने की घटनाओं की भविष्यवाणी भी नहीं करते हैं।
समृद्धि, उन्नति और वैज्ञानिक उपलब्धियों का चरम छू लेने के बावजूद प्रकृति का प्रकोप धरा के किस हिस्से के गर्भ से फूट पड़ेगा या आसमान से टूट पड़ेगा, यह जानने में हम बौने ही हैं। भूकंप की तो भनक भी नहीं लगती। जाहिर है, इसे रोकने का एक ही उपाय है कि विकास की जल्दबाजी में पर्यावरण की अनदेखी न करें। लेकिन विडंबना है कि घरेलू विकास दर को बढ़ावा देने के मद्देनजर अधोसंरचना विकास के बहाने देशी-विदेशी पूंजी निवेश को बढ़वा दिया जा रहा है। पर्यावरण संबधी स्वीकृतियों राज्य सरकारें अब अनदेखा करने लगी हैं। इससे साबित होता है कि अंतत: हमारी वर्तमान अर्थव्यस्था का मजबूत आधार अटूट प्राकृतिक संपदा और खेती ही हैं। लेकिन उत्तराखंड हो या प्राकृतिक संपदा से भरपूर अन्य प्रदेश उद्योगपतियों की लॉबी जीडीपी और विकास दर के नाम पर पर्यावरण सबंधी कठोर नीतियों को लचीला बनाकर अपने हित साधने में लगी हैं। विकास का लॉलीपॉप प्रकृति से खिलवाड़ का करण बना हुआ है। उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश में आई इन तबाहियों का आकलन इसी परिप्रेक्ष्य में करने की जरूरत है।
उत्तराखंड, उप्र से विभाजित होकर 9 नवंबर 2000 को अस्तिव में आया था। 13 जिलों में बंटे इस छोटे राज्य की जनसंख्या 2011 की जनगणना के अनुसार 1 करोड़ 11 लाख है। 80 फीसदी साक्षरता वाला यह प्रांत 53,566 वर्ग किलोमीटर में फैला है। उत्तराखंड में भागीरथी, अलकनंदा, गंगा और यमुना जैसी बड़ी और पवित्र मानी जाने वाली नादियों का उद्गम स्थल है। इन नादियों के उद्गम स्थलों और किनारों पर पुराणों में दर्ज अनेक धार्मिक व सास्ंकृतिक स्थल हैं। इसलिए इसे धर्म-ग्रंथों में देवभूमि कहा गया है। यहां के वनाच्छादित पहाड़ अनूठी जैव विविधता के पर्याय हैं। तय है,उत्तराखंड प्राकृतिक संपदाओं का खजाना है। इसी बेशकीमती भंडार को सत्ताधारियों और उद्योगपतियों की नजर लग गई है, जिसकी वजह से प्रलय जैसे प्रकोप बार-बार इस देवभूमि में बर्बादी की आपदा वर्शा रहे हैं।
उत्तराखंड की तबाही की इबारत टिहरी में गंगा नदी पर बने बड़े बांध के निर्माण के साथ ही लिख दी गई थी। नतीजतन बड़ी संख्या में लोगों का पुश्तैनी ग्राम-कस्बों से विस्थापन तो हुआ ही, लाखों हेक्टेयर जंगल भी तबाह हो गए। बांध के निर्माण में विस्फोटकों के इस्तेमाल ने धरती के अंदरूनी पारिस्थिकी तंत्र के ताने-बाने को खंडित कर दिया। विद्युत परियोजनाओं और सडक़ों का जाल बिछाने के लिए भी धमाकों का अनवरत सिलसिला जारी रहा। अब यही काम रेल पथ के लिए सुरंगे बनाने में सामने आ रहा है। विस्फोटों से फैले मलबे को भी नदियों और हिमालयी झीलों में ढहा दिया जाता है। नतीजतन नदियों का तल मलबे से भर गए हैं। दुश्परिणाम स्वरूप इनकी जलग्रहण क्षमता नश्ट हुई और जल प्रवाह बाधित हुआ। अतएव जब भी तेज बारिश आती है तो तुरंत बाढ़ में बदलकर विनाशलीला में तब्दील हो जाती है। बादल फटने के तो केदारनाथ और अब धराली जैसे परिणाम निकलते है। उत्तरकाशी, जोशीमठ में तो निरंतर बाढ़ और भू-स्खलन देखने में आ रहे हैं, इस क्षेत्र के सैंकड़ों मकानों में भूमि घसंकने से बड़ी-बड़ी दरारें आ गई हैं। भू-स्खलन के अलावा इन दरारों की वजह कालिंदी और असिगंगा नदियों पर निर्माणाधीन जलविद्युत और रेल परियोजनाएं भी रही हैं।
भारत के कुल कामगारों में से करीब आधे आज भी कृषि क्षेत्र में काम करते हैं। 140 करोड़ की आबादी का भरण-पोषण करने वाली खेती देश की राजनीति को प्रभावित करने में अहम रोल निभाती है।
डॉयचे वैले पर अविनाश द्विवेदी का लिखा-
पिछले हफ्ते अमेरिका के राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने भारत से होने वाले आयात पर 25 फीसदी टैरिफ लगा दिया। सामने आया कि भारत और अमेरिका के बीच तय समयसीमा में समझौता ना हो पाने की सबसे अहम वजह रहे, कृषि उत्पाद। अमेरिका के साथ लंबी चली व्यापार बातचीत के अंत में भारत अपने कृषि उत्पादों के बाजार में उसे उतना हिस्सा देने को तैयार नहीं हुआ, जितना अमेरिका चाहता था।
भारत की जीडीपी में कृषि क्षेत्र की हिस्सेदारी करीब 16 फीसदी है। फिर भी भारत के कुल कामगारों में से करीब आधे आज भी इसी क्षेत्र में काम करते हैं। ऐसे में बहुत कमाई वाला क्षेत्र ना होने के बाद भी कृषि भारत में सबसे ज्यादा लोगों को रोजगार देता है और इस वजह से ये राजनीतिक रूप से बहुत संवेदनशील भी होता है। केंद्र की मजबूत मोदी सरकार को चार साल पहले जिस तरह से विवादित कृषि कानूनों को वापस लेना पड़ा था, वह इस क्षेत्र की राजनीतिक ताकत को दिखाता है।
डॉनल्ड ट्रंप बहुत सारे कृषि उत्पादों के लिए भारतीय बाजार को खोलने का दबाव बना रहे थे, मसलन अमेरिकी डेयरी उत्पाद, पोल्ट्री, मक्का, सोयाबीन, चावल, गेहूं, इथेनॉल, फल और ड्राई फ्रूट्स। भारत अमेरिकी ड्राई फ्रूट्स और सेबों के लिए अपने बाजार को खोलने को तैयार था लेकिन मक्के, सोयाबीन, गेहूं और डेयरी उत्पादों पर बात अटकी हुई थी और इन पर आखिरी वक्त तक सहमति नहीं बन सकी।
जीएम फसलों पर मतभेद
इस बातचीत में सबसे अहम कड़ी ये थी कि अमेरिका से आने वाला ज्यादातर मक्का और सोयाबीन, जेनेटिकली मोडिफाइड यानी जीएम कैटेगरी का होता है। भारत जीएम फसलों को बेचे जाने की अनुमति नहीं देता है।
भारत में आमतौर पर जीएम फसलों को इंसानी सेहत और पर्यावरण के लिए खतरनाक माना जाता है। भारत के सत्ताधारी दल बीजेपी से जुड़े कई कृषि संगठन जीएम फसलों का विरोध करते रहे हैं। यहां तक कि खुद भारत में ही विकसित की गई, ज्यादा उपज देने वाली जीएम सरसों की एक किस्म की व्यापारिक खेती की अनुमति नहीं है क्योंकि इस पर अभी कानूनी लड़ाई चल रही है।
जीएम फसलों की तरह ही डेयरी उत्पाद भी भारत में एक बहुत संवेदनशील मसला हैं। दरअसल भारत के लाखों किसानों की आजीविका डेयरी से आती है। डेयरी बिजनेस से जुड़े बहुत से किसान ऐसे भी हैं, जिनके पास पर्याप्त खेती लायक जमीन नहीं है, या ऐसी बहुत कम जमीन है। भारत में कृषि आज भी बहुत हद तक मानसून पर निर्भर रहती है। ऐसे में खराब मानसून वाले वर्षों में, डेयरी उद्योग ही बहुत से किसानों का आखिरी सहारा होता है।
डेयरी में सांस्कृतिक असहमतियां
भारत, जहां आबादी का बड़ा हिस्सा मांस नहीं खाता। यहां कुछ सांस्कृतिक और सामाजिक स्थितियां भी अमेरिका के लिए डेयरी उद्योग को खोलने में रोड़ा बनीं। भारतीय उपभोक्ताओं की एक चिंता यह भी रही कि अमेरिका में अक्सर जानवरों को मांस आधारित खाना दिया जाता है। यह बात भारतीयों की खाने की आदतों से अलग है।
ज्यादातर खाद्य उत्पादों के मामले में भारत आत्मनिर्भर देश है। बड़े खाद्य उत्पादों में सिर्फ खाद्य तेल है, फिलहाल जिसका बड़ी मात्रा में भारत को आयात करना पड़ता है। तीन दशक पहले खाद्य तेल के आयात में उदारीकरण के बाद, अभी भारत में इस्तेमाल होने वाले कुल खाद्य तेल का दो-तिहाई हिस्सा विदेशों से आयात किया जाता है। भारत ऐसी गलती, अन्य सामान्य कृषि उत्पादों के लिए नहीं करना चाहता है। जबकि भारत के कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स में इन कृषि उत्पादों की हिस्सेदारी करीब आधी है।
अमेरिकी किसानों के सामने नहीं टिकेंगे भारतीय किसान
कुछ जानकारों को डर है कि अमेरिका की ओर से सस्ते कृषि उत्पादों का आयात, स्थानीय कृषि उत्पादों का दाम गिरा देगा और इसके साथ ही विपक्षी पार्टी को सत्ताधारी दल पर हमला करने का अवसर मिल जाएगा। भारत सरकार को यह डर भी है कि जिस तरह की छूट वो अमेरिका को देगी, शायद भारत के साथ व्यापार कर रहे, यूरोपीय संघ, ब्रिटेन और ऑस्ट्रेलिया जैसे ब्लॉक भी वैसी ही छूट अपने लिए भी मांगना शुरू कर देंगे।
भारत और अमेरिका में खेती के तरीकों में भी बहुत अंतर है। इसके चलते भी भारतीय किसान, अमेरिकी किसानों के सामने नहीं ठहर सकते। दरअसल भारत में डेयरी किसानों के लिए काम में आने वाली किसी आम जमीन का इलाका 1।08 हेक्टेयर का है। जबकि अमेरिकी किसान के लिए यह 187 हेक्टेयर का है। वहीं एक आम भारतीय डेयरी किसान के पास दो से तीन मवेशी होते हैं, वहीं एक आम अमेरिकी डेयरी किसान के पास सैकड़ों। इसके अलावा ज्यादातर भारतीय किसान बिना मशीनों वाली पारंपरिक तकनीकों के हिसाब से अपना काम धंधा चलाते हैं। जबकि अमेरिकी किसान टेक्नोलॉजी का बहुत ज्यादा उपयोग करते हैं और उनका डेयरी उद्योग बहुत ज्यादा कुशल है। जानकार मानते हैं कि भारतीय डेयरी किसान उनका मुकाबला नहीं कर पाएंगे।
-ध्रुव गुप्त
यह सर्वमान्य तथ्य है कि किसी व्यक्ति के जीवन में मानसिक शांति, स्थिरता और संतुलन बनाए रखने में उसके सहज और खुले हुए दोस्तों की बहुत बड़ी भूमिका होती है। माता-पिता के आगे हम बचपन में अपने भीतर के बच्चे को और जवानी में दायित्व बोध को ही अभिव्यक्ति देते हैं। भाई-बहनों के साथ हमारा स्नेह और फि़क्र का एकहरा रिश्ता होता है। एक दूसरे के आंतरिक या भावनात्मक मसलों से यहां कोई सरोकार नहीं होता। बच्चों के साथ हमारा संबंध वात्सल्य और जि़म्मेदारी का होता है।
प्रेमी-प्रेमिका के रिश्ते को आमतौर पर सबसे असहज रिश्ता कहा जाता है जहां दोनों पर एक दूसरे के आगे अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शित करने का दबाव होता है। इस नाटक में दोनों एक दूसरे को पूरी तरह से जान ही नहीं पाते। प्रेम विवाहों के ज्यादातर असफल होने की यह बड़ी वजह है। पति और पत्नी के रिश्ते में व्यावहारिकता, जि़म्मेदारी और समझौते ज्यादा, खुलापन बहुत कम होता है। दांपत्य के ऐसे मामले दुर्लभ ही हैं जहां पति और पत्नी एक दूसरे को स्पेस देने को तैयार हों। इसी वजह से इस रिश्ते में वक़्त के साथ एकरसता आ जाती है जिसका अंत दुनियादार लोगों के लिए बोझिल समझौतो में और भावुक लोगों के लिए विवाहेतर संबंधों में होता है।
एक दोस्ती का रिश्ता ही ऐसा है जिसमें दो लोगों के भीतर और बाहर, दुख और सुख, अच्छा और बुरा सब एक दूसरे के आगे पूरी तरह खुले होते हैं। कोई बनावट नहीं। कोई दुराव नहीं। औपचारिकता नही। प्यार करने का मन किया तो प्यार कर लिया। लडऩे का मन किया तो लड़ लिया। एक दूसरे का संपूर्ण स्वीकार। ऐसे दोस्त मुश्किल से मिलते हैं लेकिन यदि मिल गए तो जीवन में मानसिक अशांति और तनाव की कोई जगह भी नहीं। दोस्ती के रिश्ते को ऐसे ही संपूर्ण रिश्ता नहीं कहा जाता है। आप सबको मित्रता दिवस की शुभकामनाएं !
-ओंकारेश्वर पांडेय
दिशोम गुरु शिबू सोरेन चले गए। 10 बार सांसद, 3 बार मुख्यमंत्री, और उससे भी बढ़कर—वो शख्स जिसने तीर-कमान से नहीं, बल्कि संघर्ष और अपनी सियासी चालों से बिहार के आदिवासियों को उनका हक दिलाया। अलग झारखंड का सपना उठाने वाले कई थे, पर उसे सच करने वाला सिर्फ एक नाम था—दिशोम गुरु।
लोग कहते हैं, “गुरुजी सिर्फ नेता नहीं थे, आंदोलन की आत्मा थे।” उनके समर्थकों के लिए वे एक विचार थे, एक प्रतिरोध की पहचान।
नेमरा से उठी हुंकार, जिसने पूरा बिहार हिला दिया
भारतीय राजनीति में झारखंड आंदोलन दरअसल आदिवासी पहचान की वह कहानी है, जिसे दिशोम गुरु ने खून-पसीने से लिखा।
11 जनवरी 1944 को रामगढ़ के नेमरा गांव में जन्मे शिबू सोरेन ने बचपन में साहूकारों की लूट देखी, खनन कंपनियों का लालच देखा। 1969 का अकाल, जब सरकारी गोदामों में अनाज सड़ रहा था और आदिवासी भूख से मर रहे थे, ने उनके भीतर ज्वाला भर दी। उन्होंने कसम खाई—“जल, जंगल, जमीन की लड़ाई लड़ी जाएगी।”
नेमरा (रामगढ़) की गलियों से उठी उनकी आवाज़ ने 1960–70 के दशक में आवाम को झकझोरा। जब धनकटनी आंदोलन शुरू हुआ, तब आदिवासी महिलाएँ खेतों से धान काटकर ले जाती थीं, पुरुष तीर-कमान लिए पहरे पर खड़े रहते थे। पर सिस्टम भी था—सरेंडर, गिरफ्तारी, गिरफ्तारी वारंट तक जारी।
उनकी शुरुआत छोटी थी, पर असर बड़ा। धान जब्ती आंदोलन से शिबू सुर्खियों में आए। साहूकारों के गोदामों से अनाज निकालना, तीर-कमान लिए आदिवासी पहरेदारों का पहरा—यह केवल विरोध नहीं था, यह सिस्टम को सीधी चुनौती थी।
एक दिन शिबू सोरेन पारसनाथ के जंगलों में छिप गए, वहीं से आंदोलन चला—“बाहरी” लोगों को निकालो, “झारखंड को शोषण से मुक्त करो”—सपनों के इस आंदोलन ने उन्हें ‘दिशोम गुरु’ की पहचान दी।
1973 में उन्होंने ए.के. रॉय और बिनोद बिहारी महतो के साथ झारखंड मुक्ति मोर्चा बनाई। उस समय उनके नारे गूंजते थे—“हमारी जमीन हमारी है, कोई दीकु (बाहरी) नहीं छीन सकता।”
इसके साथ ही झारखंड आंदोलन तेज होने लगा।
उस समय JMM का बनना कोई आसान बात नहीं थी—राजनीतिक विरोध, विभाजन और मानसिक खींचतान के बीच उन्होंने पार्टी को जीवंत रखा। तब लालू यादव ने 1998 में कहा था, “झारखंड मेरी लाश पर ही बनेगा,”।
लेकिन शिबू सोरेन ने सभी विरोधों को पार करते हुए, कांग्रेस, RJD और BJP से गठबंधन बनाया और बातचीत से राज्य का मामला संसद तक पहुँचाया।
राजनीति के शतरंज में माहिर खिलाड़ी
शिबू सोरेन ने समझ लिया था कि झारखंड का सपना सिर्फ जंगलों में धरना देकर पूरा नहीं होगा, इसके लिए दिल्ली की सत्ता के दरवाजे खोलने होंगे। और यही उन्होंने किया।
1989 में वी.पी. सिंह की सरकार को समर्थन, 1993 में नरसिम्हा राव को अविश्वास मत से बचाना, फिर 1999 में वाजपेयी की NDA सरकार से डील—शिबू हर बार सही मोड़ पर सही दांव खेलते रहे। कहते हैं, “गुरुजी का भरोसा सिर्फ लिखित वादों पर था, शब्दों पर नहीं।”
और हुआ भी वही।
15 नवंबर 2000 को बिहार से अलग होकर झारखंड बना। जयपाल सिंह मुंडा ने आंदोलन की शुरुआत की थी, लेकिन उसे मंज़िल तक पहुंचाने वाला नाम था शिबू सोरेन।
कॉरपोरेट से जंग, जीती भी, हारी भी
शिबू सोरेन की राजनीति का मूल था—आदिवासी पहचान और जल-जंगल-जमीन की रक्षा। उन्होंने सरहुल जैसे त्योहारों को विरोध का मंच बनाया। खदान मजदूरों को संगठित किया और खनन कंपनियों की नाक में दम किया। उनकी पहल पर PESA कानून आया, जिसने ग्राम सभाओं को जमीन पर फैसला लेने का अधिकार दिया। 2006 का वन अधिकार कानून भी उनकी जिद का नतीजा था।
सरहुल जैसे त्योहारों को विरोध-अवसर में बदला, कंपनियों की चौकी को बाधित किया। लेकिन फिर भी व्यापार-शक्ति रास्ते में आई— कॉरपोरेट का कॉकस नहीं टूटा। खनिज संपदा पर कंपनियों की पकड़ कायम रही। झारखंड से अरबों का कोयला और लौह अयस्क दिल्ली तक गया, पर गांवों तक सिर्फ गरीबी पहुंची।
यही विडंबना है—राज्य तो बना, पहचान मिली, पर आर्थिक न्याय अब भी अधूरा है।
झारखंड देश के सबसे समृद्ध खनिज राज्यों में है। कोयले, लौह अयस्क और अन्य खनिजों से केंद्र को सालाना 40-45 हजार करोड़ से ज्यादा का हिस्सा मिलता है, जबकि राज्य को खुद के टैक्स से करीब 34 हजार करोड़ की आमदनी होती है। केंद्र से टैक्स शेयर और ग्रांट्स मिलाकर राज्य को कुल राजस्व का लगभग आधा हिस्सा ही मिलता है।
— स्थानीय कर-रकम 34 हजार करोड़
— टैक्स शेयर एवं ग्रांट 45–50 हजार करोड़
आसान शब्दों में—खनिज निकलता है झारखंड से, फायदा जाता है दिल्ली को। यही सबसे बड़ी लड़ाई रही है। और यह लड़ाई आज भी जारी है।
मुकदमे, सज़ा और जनता का अटूट विश्वास
दिशोम गुरु का सफर सियासत और मुकदमों की सफेद-स्याह परछाइयों और विवादों से भरा रहा।
1975 में ‘बाहरी-विरोधी अभियान’, जिसमें 11 मौतें हुईं, उन पर हत्या का आरोप लगा। 1993 के अविश्वास मत में रिश्वत का आरोप, 1994 में उनके निजी सचिव शशिनाथ झा की हत्या का मामला—2006 में सजा हुई, फिर 2007 में बरी हुए।
“आरोप जितने भी लगे, शिबू सोरेन बरी हो गए।”
फिर भी जनता ने उनका साथ नहीं छोड़ा। जेल से निकलकर भी चुनाव जीते। तीन बार मुख्यमंत्री बने। दस बार सांसद रहे। पार्टी के एक नेता कहते हैं—“एक आदिवासी जब खड़ा होता है, तो उसे राजनीति में फंसाया भी जाता है। हेमंत सोरेन को भी जेल में डाला गया। पर क्या साबित हुआ? जनता अब इन चालों को अच्छी तरह समझने लगी है।”
शिबू सोरेन के उपर मुकदमे, सज़ा और विवादों का बोझ था, पर जनता ने उनका साथ नहीं छोड़ा।
उनके योगदान को लोग याद करते हैं— उन्होंने झारखंड का सपना रखा, आदिवासी पहचान को राष्ट्रीय विमर्श में रखा, और सबसे बड़ी बात— कारपोरेट पावर को चुनौती दी।
आज के दौर में विकास की जो रफ़्तार है, वह आर्थिक अधिकारों के सवाल को और गहरा कर देती है—क्या राज्य की खनिज संपदा उसी जनता को लाभान्वित कर पाएगी जिसने इसे जन्म दिया?
गुरुजी चले गए, पर सवाल वहीं हैं।
-मयूरेश कोण्णूर
‘महाराष्ट्र विशेष जनसुरक्षा विधेयक 2024’ पर राज्य में विवाद गहराता जा रहा है। विपक्ष ने इस कानून को ‘अर्बन नक्सल’ के नाम पर विरोध की आवाज को दबाने की कोशिश बताया है।
10 जुलाई को महाराष्ट्र विधानसभा में एक ऐसा विधेयक पारित हुआ जिसे हालिया समय के सबसे विवादास्पद कानूनों में गिना जा रहा है।
यह विधेयक ‘वामपंथी उग्रवाद’ से निपटने के नाम पर लाया गया है। इसे ‘शहरी नक्सलवाद’ के खिलाफ कदम बताकर सरकार ने प्रचारित किया है, लेकिन विधानसभा से लेकर सडक़ों तक इसे लेकर विरोध हो रहा है।
मुख्यमंत्री और गृह मंत्री देवेंद्र फडणवीस का पेश किया गया ‘महाराष्ट्र विशेष जनसुरक्षा विधेयक 2024’ विधानसभा में बहुमत से पारित हुआ। अगले ही दिन यह विधान परिषद में भी पास हो गया।
महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने बिल का बचाव करते हुए कहा है कि विशेष जनसुरक्षा बिल का मकसद सरकार की आलोचना करने वालों पर कार्रवाई करना नहीं है। लेकिन उन्होंने चेतावनी दी कि जो लोग अर्बन नक्सल जैसी गतिविधियों में शामिल होंगे, उन्हें इस क़ानून के तहत गिरफ़्तार किया जाएगा।
विपक्ष ने सदन से वॉकआउट कर इसका विरोध किया। यह विधेयक अब क़ानून बनने के लिए राज्यपाल की मंज़ूरी का इंतज़ार कर रहा है।
राज्य सरकार का कहना है कि यह विधेयक ‘वामपंथी चरमपंथ’ या उनसे जुड़े समान संगठनों की ‘अवैध गतिविधियों’ पर लगाम लगाने के लिए लाया गया है।
महाराष्ट्र ऐसा कानून बनाने वाला पहला राज्य नहीं है। इससे पहले तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, छत्तीसगढ़ और ओडिशा इस तरह के विशेष सुरक्षा कानून लागू कर चुके हैं।
इस विधेयक पर इतना विवाद क्यों?
बीजेपी के नेतृत्व वाली राज्य सरकार ने इसे लागू करने को लेकर सख्त रुख अपना रखा है।
वहीं विपक्षी दलों, सामाजिक और राजनीतिक संगठनों, आंदोलनकारियों और कई क़ानूनी विशेषज्ञ इसके प्रावधानों, इसकी मंशा और ज़रूरत पर सवाल उठा रहे हैं।
सत्तापक्ष पहले से यह कहता रहा है कि ‘शहरी नक्सलियों’ के खिलाफ कार्रवाई के लिए अलग कानून की जरूरत है। ‘यह शब्दावली’ पुणे के भीमा कोरेगांव और एल्गार परिषद मामले के बाद ज्यादा उभरकर सामने आई, जिसमें कई वामपंथी विचारों से जुड़े लेखक, पत्रकार और कार्यकर्ता गिरफ्तार हुए।
हालांकि कानून की मुख्य धारा में ‘शहरी नक्सल’ या ‘नक्सलवाद’ जैसे शब्द नहीं हैं, लेकिन विधेयक के स्टेटमेंट ऑफ ऑब्जेक्टिव में इसका जिक्र है।
इसमें कहा गया है, ‘नक्सलवाद का ख़तरा केवल नक्सल प्रभावित दूरदराज़ के इलाकों तक सीमित नहीं है, बल्कि शहरी इलाक़ों में भी नक्सली फ्रंटल संगठनों के जरिए इसकी मौजूदगी बढ़ रही है।’
सीएम देवेंद्र फडणवीस ने विधानसभा में कहा कि मौजूदा कानून अपर्याप्त थे, इसलिए नया कानून लाना जरूरी था।
उन्होंने कहा, ‘छत्तीसगढ़, आंधप्रदेश, तेलंगाना और ओडिशा जैसे चार राज्यों ने ऐसे कानूनों के तहत 48 संगठनों पर बैन लगाया है। महाराष्ट्र में ऐसे 64 संगठन हैं, जो देश में सबसे ज़्यादा हैं। एक भी वामपंथी उग्रवादी संगठन पर अब तक प्रतिबंध नहीं लगा है। राज्य उनके लिए सुरक्षित शरणस्थल बन गया है।’ इन अपराधों के लिए दो से सात साल तक की सज़ा और दो से पांच लाख रुपये तक का जुर्माना हो सकता है। इसमें बिना वारंट गिरफ़्तारी संभव है जो गैऱ-जमानती है।
उद्धव ठाकरे ने भी इस क़ानून का विरोध किया है
इस विधेयक के तहत ‘अवैध गतिविधि’ की परिभाषा है-‘जो गतिविधि सार्वजनिक व्यवस्था, शांति और सौहार्द को खतरे में डाले; क़ानून व्यवस्था या प्रशासनिक ढांचे में बाधा डाले; या आपराधिक ताक़त से किसी सरकारी कर्मचारी को भयभीत करने के इरादे से हो, वो ‘अवैध’ की श्रेणी में मानी जाएगी, भले ही वह लिखे गए या बोले गए शब्दों के रूप में हो।’
फडणवीस ने कहा, ‘कोई व्यक्ति केवल तब गिरफ़्तार हो सकता है जब वह प्रतिबंधित संगठन से जुड़ा हो। अकेले व्यक्ति के खिलाफ यह क़ानून लागू नहीं होगा। इसके तहत सरकार मनमर्जी से कार्रवाई नहीं कर सकती।’
साथ ही इस क़ानून के तहत अगर किसी संगठन को ‘अवैध’ घोषित किया जाता है, तो उसे एक सलाहकार बोर्ड की मंज़ूरी लेनी होगी, जिसकी अध्यक्षता हाई कोर्ट के वर्तमान या पूर्व न्यायाधीश करेंगे।
इस विधेयक पर क्या हैं आपत्तियां?
कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि इस कानून में कई परिभाषाएँ अस्पष्ट हैं और उनके दायरे को लेकर कोई स्पष्टता नहीं है। ‘अवैध गतिविधि’ की व्याख्या इतनी व्यापक है कि इसका मनमाने ढंग से इस्तेमाल किया जा सकता है।
शिवसेना (उद्धव गुट) प्रमुख उद्धव ठाकरे ने कहा, ‘इस कानून में ‘नक्सलवाद’ या ‘आतंकवाद’ जैसे शब्दों का जिक्र किए बिना ‘अवैध गतिविधियों’ की एक बेहद अस्पष्ट श्रेणी बना दी गई है। किसी की भी गतिविधि को अवैध बताकर व्यक्ति को गिरफ़्तार किया जा सकता है।’
‘द इंडियन एक्सप्रेस’ में प्रकाशित लेख में राजनीतिक विश्लेषक सुहास पलशीकर लिखते हैं,’ नए क़ानून में ’अवैध’ गतिविधियों की परिभाषा है-‘किसी कार्य या शब्द या संकेत या दृश्य प्रस्तुति के माध्यम से किया गया कोई कृत्य’। यानी बोलने की आजादी को भी अपराध की श्रेणी में लाने की मंशा है।’
उनके साथ कई शिक्षाविदों और विशेषज्ञों ने भी इस कानून पर गंभीर सवाल उठाए हैं।
पलशीकर आगे लिखते हैं, ‘पहला खतरा यह है कि किसी भी विचारधारा या राजनीतिक विरोधी की ओर से की गई मामूली शिकायत पर भी पुलिस सक्रिय हो सकती है। दूसरा, किसी भी बौद्धिक गतिविधि को इस कानून की परिभाषा में लाया जा सकता है।’
जब यूएपीए पहले से है, तो नए कानून की जरूरत क्यों?
‘गैर-कानूनी गतिविधियाँ रोकथाम अधिनियम’ (यूएपीए) कानून पहले से मौजूद है और इसे कई संवेदनशील मामलों और कथित वामपंथी उग्रवाद की घटनाओं में लागू किया गया है।
कई कार्यकर्ताओं पर इस कठोर कानून के तहत मुकदमा चल रहा है, जिसके तहत अपराध गैर-जमानती होता है।
मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के मुताबिक़, ‘यूएपीए में किसी संगठन पर प्रतिबंध लगाने का अधिकार नहीं है, यह सिर्फ व्यक्ति पर लागू होता है।’
‘जब कुछ मामलों में यूएपीए लागू किया गया, तो सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इसे तब तक लागू नहीं किया जा सकता जब तक कोई आतंकी घटना न हुई हो। जब यह स्पष्ट हो गया कि यूएपीए पर्याप्त नहीं है, तब केंद्र ने राज्यों को ऐसा अलग क़ानून बनाने का सुझाव दिया।’
हालांकि, कई क़ानूनी विशेषज्ञ इस तर्क से सहमत नहीं हैं।
दूसरे राज्यों के अनुभव और उठे सवाल
बॉम्बे हाई कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश सत्यरंजन धर्माधिकारी ने ‘लोकसत्ता’ में एक लेख में कहा है कि इस नए क़ानून के प्रावधान पहले से ही ‘गैर-कानूनी गतिविधियाँ रोकथाम अधिनियम’ (यूएपीए), 1967 में मौजूद हैं, जिसे बाद में कई बार संशोधित किया गया और आतंकवाद से जुड़े मामलों को भी इसमें शामिल किया गया।
धर्माधिकारी सवाल उठाते हैं कि जब यूएपीए पहले से लागू है, तो ऐसे ही उद्देश्य वाला एक और नया क़ानून बनाना कितना तर्कसंगत है?
उनका कहना है, ‘अगर यूएपीए पहले से मौजूद था, तो फिर नक्सलवाद राज्यभर में कैसे फैल गया? अगर यूएपीए के तहत कार्रवाई की गई, तो फिर उन्हें मदद कैसे मिलती रही? कई गिरफ़्तार हुए, लेकिन मुकदमा नहीं चला, इसलिए जमानत पर छूट गए। फिर भी सरकार को लगता है कि नया कानून जरूरी है।’
धर्माधिकारी यह भी चेतावनी देते हैं कि ‘अवैध गतिविधि’ की व्याख्या को लेकर न्यायपालिका का रुख़ स्पष्ट है। वो कहते हैं, ‘सुप्रीम कोर्ट ने साल 1967 के कानून की कुछ धाराओं की व्याख्या करते हुए कहा है कि केवल किसी संगठन के प्रति सहानुभूति या सदस्यता को ‘भागीदारी’ नहीं माना जा सकता।’
उनके मुताबिक, ‘अगर किसी व्यक्ति और संगठन के बीच वैचारिक संबंध है, तो उससे उसकी गतिविधियां अवैध नहीं हो जातीं। ‘अवैध गतिविधि’ कुछ और ठोस रूप में सिद्ध होनी चाहिए। वरना कानून लागू नहीं हो सकता।’
आप किसी दिन सोकर उठें और पता चले कि घर के बगल में बड़ा गड्ढा बन गया है. अब वो जगह रहने लायक नहीं रही! दुनिया के कई इलाकों में ऐसी घटनाएं बढ़ रही हैं. इसकी बड़ी वजह है, आबोहवा और मौसम में हो रही तब्दीलियां.
डॉयचे वैले पर सारा श्टेफन का लिखा-
ब्राजील के अमेजन क्षेत्र के उत्तर-पूर्वी सिरे पर बसे एक इलाके में अचानक जमीन धंसने लगी है. इससे वहां विशाल गड्ढे, यानी सिंकहोल बन गए हैं. इन गड्ढों के किनारे मौजूद कई घरों पर खतरा मंडराने लगा है. 1,000 से ज्यादा लोगों को बेघर होने का डर सताने लगा है. सरकार को आपातकाल की घोषणा करनी पड़ी है.
ब्राजील पानी के संकट से क्यों जूझ रहा है?
यह इस तरह की पहली घटना नहीं है. अमेरिका से लेकर तुर्की और ईरान तक, पूरी दुनिया में ऐसे सिंकहोल देखने को मिल रहे हैं. ये अचानक बनते हैं और इनसे जान-माल का खतरा पैदा होता है.
सिंकहोल क्या होते हैं?
जमीन में बन आए गड्ढों को सिंकहोल कहा जाता है. ये तब बनते हैं, जब पानी मिट्टी को काट देता है. यह कुदरती तौर पर हो सकता है. मसलन, बारिश का पानी मिट्टी से रिसकर नीचे की चट्टानों को घोल दे.
ये इंसानी गतिविधियों की वजह से भी बन सकते हैं. जैसे, जमीन के नीचे की पाइपलाइन से पानी का रिसाव, तेल या गैस निकालने के लिए की जाने वाली ड्रिलिंग (फ्रैकिंग), और खनन जैसे कामों से भी.
होंग यांग, ब्रिटेन की रीडिंग यूनिवर्सिटी में पर्यावरण विज्ञान के प्रोफेसर हैं. यांग के मुताबिक, उन इलाकों में सिंकहोल बनने की संभावना ज्यादा होती है जहां 'कार्स्ट टेरेन' पाया जाता है. यानी, ऐसी जमीन जहां नीचे घुलनशील चट्टानें होती हैं. जैसे, चूना पत्थर, नमक की परतें या जिप्सम.
जब जमीन के नीचे का पानी इन चट्टानों को घोलने लगता है, तो जमीन धीरे-धीरे खोखली हो जाती है और अचानक धंस जाती है. यांग ने हाल ही में जलवायु परिवर्तन के कारण बढ़े सिंकहोल के खतरों को कम करने पर एक शोध प्रकाशित किया है.
उन्होंने डीडब्ल्यू को बताया, "अमेरिका में करीब 20 फीसदी जमीन संवेदनशील है. इसमें फ्लोरिडा, टेक्सास, अलबामा, मिसौरी, केंटकी, टेनेसी और पेंसिल्वेनिया में सबसे ज्यादा नुकसान हुआ है." अन्य संवेदनशील क्षेत्रों में ब्रिटेन, खासतौर पर उत्तरी इंग्लैंड में रिपन और यॉर्कशायर डेल्स जैसे क्षेत्र, इटली का लाजियो क्षेत्र, मेक्सिको का युकाटन प्रायद्वीप, चीन, ईरान और तुर्की के कुछ हिस्से शामिल हैं.
-जो क्लाइमैन
कुछ दिन पहले जब मैं घरेलू कामों में व्यस्त थी तो मैंने अपने सबसे छोटे बच्चे को उसका ध्यान बंटाने के लिए आईपैड दे दिया। लेकिन थोड़ी देर बाद मैं अचानक थोड़ी असहज हो गई और उससे कहा कि अब इसे बंद करने का समय हो गया है।
असल में मैं इस बात पर नजऱ नहीं रख पा रही थी कि वह कितनी देर से इसका इस्तेमाल कर रहा है या वह क्या देख रहा है।
फिर तो जैसे तूफान आ गया। वह चिल्लाया, पैर चलाए, आईपैड को पकड़ कर बैठ गया और मुझे दूर धकेलने की कोशिश करने लगा, पूरे गुस्से में और पांच साल के छोटे बच्चे की पूरी ताकत के साथ।
ईमानदारी से कहूं तो ये मेरे लिए बेहद परेशान करने वाला लम्हा था। मेरे बच्चे की तीखी प्रतिक्रिया मुझे परेशान कर गई।
मेरे बड़े बच्चे सोशल मीडिया, वर्चुअल रिएलिटी और ऑनलाइन गेमिंग की दुनिया में कदम रख चुके हैं और कई बार वह भी चिंता का कारण बनता है।
एपल के पूर्व सीईओ स्टीव जॉब्स, जिनके सीईओ रहते आईपैड लॉन्च हुआ था, उन्होंने कहा था कि वो अपने बच्चों को ये डिवाइस इस्तेमाल नहीं करने देते। बिल गेट्स ने भी कहा था कि उन्होंने अपने बच्चों के लिए गैजेट्स के इस्तेमाल की सीमा तय कर दी थी।
स्क्रीन टाइम अब बुरी ख़बर का पर्याय बन चुका है। इसे युवाओं में डिप्रेशन, व्यवहार संबंधी समस्याएं और नींद की कमी जैसी समस्याओं के लिए जिम्मेदार ठहराया जाता है।
मशहूर न्यूरोसाइंटिस्ट बैरोनेस सुसान ग्रीनफ़ील्ड ने तो यहां तक कहा है कि इंटरनेट का इस्तेमाल और कंप्यूटर गेम्स किशोर मस्तिष्क को नुकसान पहुंचा सकते हैं।
2013 में उन्होंने लंबे स्क्रीन टाइम के नकारात्मक प्रभावों की तुलना जलवायु परिवर्तन के शुरुआती दौर से की थी, यानी एक ऐसा बड़ा बदलाव जिसे लोग गंभीरता से नहीं ले रहे थे।
आज बहुत से लोग इस मुद्दे को पहले से ज़्यादा गंभीरता से ले रहे हैं। लेकिन स्क्रीन के नकारात्मक पक्ष को लेकर दी जाने वाली चेतावनियां शायद पूरी तस्वीर नहीं दिखातीं।
ब्रिटिश मेडिकल जर्नल में छपे एक संपादकीय में कहा गया कि बैरोनेस ग्रीनफील्ड के मस्तिष्क संबंधी दावे ‘वैज्ञानिक तथ्यों के निष्पक्ष विश्लेषण पर आधारित नहीं हैं और वे अभिभावकों व आम लोगों को ग़लत दिशा में ले जाते हैं।’
ब्रिटेन के कुछ अन्य वैज्ञानिकों ने दावा किया है कि स्क्रीन टाइम के दुष्प्रभावों को लेकर पुख़्ता वैज्ञानिक सबूतों की कमी है। तो क्या हम अपने बच्चों की स्क्रीन एक्सेस को लेकर जो चिंता कर रहे हैं वह सही दिशा में है या नहीं?
क्या जितना दिखता है, ये उससे भी बुरा है?
बैथ स्पा यूनिवर्सिटी में साइकोलॉजी के प्रोफेसर पीट एचेल्स उन वैज्ञानिकों में शामिल हैं जो मानते हैं कि स्क्रीन टाइम के नुकसान को लेकर पर्याप्त सबूत नहीं हैं। उन्होंने स्क्रीन टाइम और मानसिक स्वास्थ्य पर सैकड़ों रिसर्च स्टडीज का विश्लेषण किया है, साथ ही युवाओं की स्क्रीन से जुड़ी आदतों का बड़ा डेटा भी खंगाला है।
अपनी किताब ‘अनलॉक्ड : द रियल साइंस ऑफ़ स्क्रीन टाइम’ में उन्होंने तर्क दिया है कि जो अध्ययन मीडिया की सुर्खियां बनते हैं, उनके पीछे की वैज्ञानिक प्रक्रिया अक्सर अधूरी या गलत होती है।
वह लिखते हैं, ‘स्क्रीन टाइम के भयावह नतीजों को लेकर जो कहानियां गढ़ी गई हैं, उन्हें पुख्ता वैज्ञानिक तथ्यों से समर्थन नहीं मिलता।’
2021 में अमेरिकन साइकोलॉजी एसोसिएशन द्वारा प्रकाशित एक रिसर्च में भी इसी तरह की बात कही गई थी। दुनियाभर की अलग-अलग यूनिवर्सिटी से जुड़े 14 लेखकों ने 2015 से 2019 के बीच प्रकाशित 33 अध्ययनों का विश्लेषण किया। उन्होंने पाया कि स्मार्टफ़ोन, सोशल मीडिया और वीडियो गेम का इस्तेमाल मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याओं के लिए ‘बहुत ज़्यादा जिम्मेदार’ नहीं है।
कुछ शोध में यह जरूर कहा गया है कि स्क्रीन से निकलने वाली नीली रोशनी मेलाटोनिन हॉर्मोन को दबा देती है, जिससे नींद आने में दिक्कत होती है। लेकिन 2024 में दुनियाभर के 11 अध्ययनों की समीक्षा करने वाले एक शोध ने यह निष्कर्ष दिया कि सोने से एक घंटे पहले स्क्रीन देखने से नींद में कोई बड़ी परेशानी आती है इसके कोई ठोस प्रमाण नहीं हैं।
विज्ञान की समस्या
प्रोफेसर एचेल्स बताते हैं कि स्क्रीन टाइम से जुड़े अधिकांश आंकड़े एक बड़ी समस्या से जूझते हैं। ये डेटा ज़्यादातर ‘सेल्फ-रिपोर्टिंग’ पर आधारित होता है। यानी रिसर्चर सीधे युवाओं से पूछते हैं कि उन्होंने कितना समय स्क्रीन पर बिताया और उन्हें कैसा महसूस हुआ।
वह यह भी तर्क देते हैं कि इतने बड़े डेटा सेट की व्याख्या करने के लाखों तरीके हो सकते हैं। वह कहते हैं, ‘हमें सहसंबंध को देखकर सावधानी बरतनी चाहिए।’
वह इसका उदाहरण देते हैं कि गर्मी के मौसम में आइसक्रीम की बिक्री और स्किन कैंसर के लक्षणों में सांख्यिकीय रूप से एक साथ वृद्धि देखी जाती है। दोनों घटनाएं गर्म मौसम से जुड़ी हैं लेकिन आपस में नहीं। आइसक्रीम स्किन कैंसर का कारण नहीं बनती।
वह एक रिसर्च प्रोजेक्ट को भी याद करते हैं, जो एक जनरल फिजिशियन की टिप्पणी से प्रेरित था। डॉक्टर ने दो बातें नोट की थीं। पहली, कि वह अब पहले से ज़्यादा युवाओं से डिप्रेशन और एंग्जायटी को लेकर बातें कर रहे थे और दूसरी, कि बहुत से युवा क्लीनिक के वेटिंग रूम में मोबाइल फोन का इस्तेमाल कर रहे थे।
प्रोफेसर बताते हैं, ‘तो हमने डॉक्टर के साथ मिलकर काम किया और कहा, ठीक है इसे जांचते हैं। हम डेटा का इस्तेमाल करके इस रिश्ते को समझने की कोशिश कर सकते हैं।’
रिसर्च में पाया गया कि फोन के इस्तेमाल और मानसिक स्वास्थ्य की परेशानी में संबंध तो था लेकिन एक और अहम फैक्टर सामने आया। जो युवा डिप्रेशन या एंग्ज़ायटी से जूझ रहे थे, वे अक्सर अकेले ज़्यादा समय बिता रहे थे।
अंतत: स्टडी ने यह संकेत दिया कि मानसिक स्वास्थ्य की इन चुनौतियों के पीछे असली वजह अकेलापन था, न कि सिर्फ स्क्रीन टाइम।
‘डूमस्क्रॉलिंग’ क्या होती है?
इसके अलावा एक और अहम बात अक्सर छूट जाती है, स्क्रीन टाइम की प्रकृति। प्रोफेसर एचेल्स का तर्क है कि ‘स्क्रीन टाइम’ शब्द अपने आप में बहुत अस्पष्ट है। क्या वह अनुभव प्रेरणादायक था? क्या वह उपयोगी था? सूचनात्मक था? या फिर वह सिर्फ ‘डूमस्क्रॉलिंग’ (बेवजह परेशान करने वाला) था? क्या वह युवा अकेले थे या दोस्तों से ऑनलाइन बातचीत कर रहे थे?
हर स्थिति एक अलग अनुभव पैदा करती है।
अमेरिका और ब्रिटेन के शोधकर्ताओं द्वारा की गई एक स्टडी में 9 से 12 साल के बच्चों के 11हज़ार 500 ब्रेन स्कैन, उनके स्वास्थ्य मूल्यांकन और खुद रिपोर्ट किए गए स्क्रीन टाइम डेटा का विश्लेषण किया गया।
स्टडी में यह ज़रूर पाया गया कि स्क्रीन इस्तेमाल के तरीके ब्रेन के अलग-अलग हिस्सों की कनेक्टिविटी में बदलाव से जुड़े हो सकते हैं, लेकिन ऐला कोई सबूत नहीं मिला कि स्क्रीन टाइम का मानसिक स्वास्थ्य या संज्ञानात्मक क्षमता पर नकारात्मक असर पड़ता है। यहां तक कि उन बच्चों पर भी जो दिन में कई घंटे स्क्रीन का इस्तेमाल करते हैं।
यह स्टडी 2016 से 2018 के बीच चली और इसकी निगरानी ऑक्सफर्ड़ यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर एंड्रयू प्रिजबिल्स्की ने की, जिन्होंने वीडियो गेम और सोशल मीडिया के मानसिक स्वास्थ्य पर असर को लेकर व्यापक रिसर्च की है। उनके अध्ययन दिखाते हैं कि ये दोनों माध्यम मानसिक स्वास्थ्य को नुकसान नहीं बल्कि फायदा भी पहुंचा सकते हैं।
प्रोफेसर एचेल्स कहते हैं, ‘अगर यह सच होता कि स्क्रीन मस्तिष्क को नुकसान पहुंचाती है तो इतने बड़े डेटा सेट में यह साफ़ दिखाई देता। लेकिन ऐसा नहीं है। तो यह धारणा कि स्क्रीन का इस्तेमाल दिमाग को लगातार या स्थायी रूप से नुकसान पहुंचा रहा है, फिलहाल तो सही नहीं लगती।’
कार्डिफ यूनिवर्सिटी में ब्रेन स्टिमुलेशन विभाग के प्रमुख प्रोफेसर क्रिस चेम्बर्स भी इसी राय से सहमत हैं। प्रोफेसर एचेल्स की किताब में उनका हवाला दिया गया है, जिसमें वह कहते हैं, ‘अगर कोई गिरावट होती, तो वह साफ दिखती।’
‘पिछले 15 साल के शोधों को देखना आसान होताज् अगर हम पर्यावरण में बदलावों के प्रति इतने संवेदनशील होते तो हम आज अस्तित्व में नहीं होते।’
‘हमें बहुत पहले ही विलुप्त हो जाना चाहिए था।’
‘मेंटल हेल्थ के लिए जटिल फार्मूला’
प्रोफेसर प्रिजबिल्स्की और प्रोफ़ेसर एचेल्स में से कोई भी कुछ ऑनलाइन खतरों, जैसे कि ग्रूमिंग या अश्लील और नुकसानदेह कंटेंट से संपर्क की गंभीरता को नकारते नहीं हैं। लेकिन दोनों का मानना है कि स्क्रीन टाइम को लेकर चल रही मौजूदा बहस इसे और अधिक छिपे तौर पर होने वाली गतिविधियों में बदलने का ख़तरा पैदा कर सकती है।
प्रोफेसर प्रिजबिल्स्की को इस बात की चिंता है कि डिवाइसेज पर पाबंदी लगाने या उनके इस्तेमाल को सीमित करने की दलीलों से उल्टा असर हो सकता है। उनके मुताबिक, अगर स्क्रीन टाइम पर बहुत कड़ाई से नजऱ रखी गई तो यह बच्चों के लिए ‘मनाही’ जैसा बन सकता है।
हालांकि बहुत से लोग इससे असहमत हैं। ब्रिटेन के एक कैंपेन ग्रुप स्मार्टफोन फ्री चाइल्डहुड का कहना है कि अब तक डेढ़ लाख लोग उनके उस संकल्प पर हस्ताक्षर कर चुके हैं, जिसमें 14 साल से छोटे बच्चों को स्मार्टफोन न देने और सोशल मीडिया की पहुंच 16 साल की उम्र तक टालने की मांग की गई है।
सैन डिएगो स्टेट यूनिवर्सिटी में साइकोलॉजी की प्रोफेसर जीन ट्वेंग ने जब अमेरिका में किशोरों में बढ़ते डिप्रेशन पर रिसर्च शुरू की थी, तो उनका मक़सद यह साबित करना नहीं था कि सोशल मीडिया और स्मार्टफोन ‘बहुत बुरे’ हैं, जैसा कि वह बताती हैं।
अब वे मानती हैं कि बच्चों को स्क्रीन से दूर रखना एक बिल्कुल साफ-सुथरा फैसला है और वह अभिभावकों से अपील कर रही हैं कि बच्चों और स्मार्टफोन के बीच दूरी को जितना संभव हो उतना बनाए रखें।
वह कहती हैं, ‘बच्चों का दिमाग 16 साल की उम्र में ज़्यादा विकसित और परिपक्व होता है। साथ ही स्कूल और दोस्ती का सामाजिक माहौल भी 12 साल की उम्र के बजाय 16 की उम्र में ज़्यादा स्थिर होता है।’
हालांकि प्रोफेसर ट्वेंग इस बात से सहमत हैं कि युवाओं के स्क्रीन इस्तेमाल से जुड़े डेटा का बड़ा हिस्सा खुद बताया गया होता है, लेकिन उनका कहना है कि इससे सबूतों की विश्वसनीयता कम नहीं होती।
2024 में प्रकाशित एक डेनिश स्टडी में 89 परिवारों के 181 बच्चों को शामिल किया गया था। दो हफ्तों तक इनमें से आधे बच्चों को प्रति सप्ताह केवल तीन घंटे का स्क्रीन टाइम दिया गया और उनके टैबलेट व स्मार्टफोन जमा कर लिए गए।
स्टडी में निष्कर्ष निकाला गया कि स्क्रीन मीडिया को कम करने से ‘बच्चों और किशोरों के मनोवैज्ञानिक लक्षणों पर सकारात्मक असर’ पड़ा और ‘सामाजिक सहयोगी व्यवहार’ में सुधार देखा गया, हालांकि यह भी कहा गया कि इस दिशा में और शोध की जरूरत है।
वहीं, एक ब्रिटिश स्टडी में, जिसमें प्रतिभागियों से स्क्रीन टाइम की टाइम डायरी रखने को कहा गया था, यह पाया गया कि लड़कियों में सोशल मीडिया का अधिक इस्तेमाल अक्सर डिप्रेशन की भावनाओं से जुड़ा हुआ था।
प्रोफेसर ट्वेंग कहती हैं, ‘आप उस फॉर्मूले को देखिए। ज़्यादातर समय स्क्रीन के साथ, वह भी अकेले। नींद कम, दोस्तों के साथ आमने-सामने वक्त बिताने का समय कम। यह मानसिक स्वास्थ्य के लिए बेहद खराब फॉर्मूला है।’ ‘मुझे समझ नहीं आता कि इसमें विवाद की क्या बात है।’
-शेरिलान मोलान
जुलाई के आखऱि में वरिष्ठ वकील इंदिरा जयसिंह ने भारत में सहमति से सेक्स की कानूनी उम्र (जो इस समय 18 साल है) को लेकर सुप्रीम कोर्ट में तर्क रखे। इस बहस के साथ किशोरों के बीच यौन संबंध को अपराध मानने के मुद्दे पर चर्चा फिर तेज हो गई।
जयसिंह का कहना है कि 16 से 18 साल के किशोरों के बीच सहमति से बने यौन संबंध न शोषण हैं और न अत्याचार। उनका कहना है कि ऐसे मामलों को आपराधिक मुकदमों के दायरे से बाहर रखा जाए।
अपने लिखित तर्क में उन्होंने कहा, ‘उम्र पर आधारित कानूनों का उद्देश्य बच्चों को शोषण से बचाना होना चाहिए, न कि सहमति पर आधारित और उम्र के लिहाज से उचित संबंधों को अपराध मान लेना।’
लेकिन केंद्र सरकार इस मांग का विरोध कर रही है। उसका कहना है कि अगर ऐसे अपवाद को मंज़ूरी दी जाए तो 18 साल से कम उम्र के बच्चे, जिन्हें भारतीय क़ानून में नाबालिग माना जाता है, उनके शोषण और अत्याचार का ख़तरा और बढ़ जाएगा।
यह मामला सहमति की परिभाषा पर नई बहस छेड़ रहा है। सवाल उठ रहा है कि क्या भारतीय क़ानूनों, ख़ासकर 2012 के पॉक्सो क़ानून में बदलाव करके 16 से 18 साल वाले किशोरों के बीच सहमति से बने संबंधों को इस क़ानून के दायरे से बाहर रखा जाना चाहिए।
विशेषज्ञों की राय क्या है?
बाल अधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि अगर किशोरों को इस दायरे से बाहर किया जाए तो उनकी स्वतंत्रता बनी रहती है। वहीं विरोध करने वालों का मानना है कि ऐसा करने से मानव तस्करी और बाल विवाह जैसे अपराध बढ़ सकते हैं।
विशेषज्ञ यह सवाल भी उठाते हैं कि अगर किसी किशोर के साथ अत्याचार हो जाए तो क्या वह सबूत देने का बोझ उठा पाएगा। सबसे अहम सवाल यह बनता है कि सहमति की उम्र तय करने का अधिकार किसके पास होना चाहिए और इन कानूनों का वास्तविक लाभ किसे मिलता है।
दुनिया के कई देशों की तरह भारत को भी ‘सहमति से सेक्स’ की सही उम्र तय करने में कठिनाई रही है। अमेरिका में यह उम्र अलग-अलग राज्यों में अलग होती है, जबकि भारत में यह पूरे देश के लिए समान रखी गई है।
भारत में सहमति से यौन संबंध बनाने की कानूनी उम्र यूरोप के ज़्यादातर देशों और ब्रिटेन, कनाडा जैसे देशों की तुलना में काफी ज्यादा है। इन देशों में ये उम्र 16 साल है।
1860 में जब भारत का आपराधिक क़ानून लागू हुआ तब यह उम्र 10 साल थी। 1940 में संशोधन कर इसे 16 साल किया गया।
पॉक्सो कानून ने अगला बड़ा बदलाव किया और 2012 में सहमति की उम्र 18 साल कर दी गई। इसके बाद 2013 में आपराधिक कानूनों में बदलाव कर इसे शामिल किया गया और 2024 में लागू हुए नए आपराधिक कानून में भी यही उम्र जारी रखी गई।
पिछले लगभग एक दशक में कई बाल अधिकार कार्यकर्ताओं और अदालतों ने सहमति से यौन संबंध बनाने की कानूनी उम्र पर सवाल उठाए हैं और इसे 16 साल करने की मांग रखी है।
उनका तर्क है कि मौजूदा कानून सहमति पर आधारित किशोर संबंधों को अपराध मान लेता है। कई बार वयस्क इस क़ानून का इस्तेमाल ऐसे रिश्तों को रोकने या दबाने के लिए करते हैं, ख़ासकर लड़कियों के मामले में।
देश में यौन संबंध का विषय अब भी खुलकर बात करने योग्य नहीं माना जाता, जबकि कई अध्ययनों में सामने आया है कि लाखों भारतीय किशोर यौन रूप से सक्रिय हैं।
फॉउंडेशन फॉर चाइल्ड प्रोटेक्शन-मुस्कान की सह-संस्थापक शर्मिला राजे कहती हैं, ‘हम ऐसे समाज में रहते हैं जो जाति, वर्ग और धर्म के आधार पर बंटा हुआ है। यही कारण है कि सहमति की उम्र से जुड़े कानून के गलत इस्तेमाल का खतरा और बढ़ जाता है।’
2022 में कर्नाटक हाईकोर्ट का निर्देश
साल 2022 में कर्नाटक हाईकोर्ट ने, कानूनी सुधारों पर सुझाव देने वाले भारत के विधि आयोग को यह निर्देश दिया था कि पॉक्सो कानून के तहत सहमति की उम्र पर दोबारा विचार किया जाए ‘ताकि ज़मीनी हकीकत को ध्यान में रखा जा सके।’
अदालत ने ऐसे कई मामलों का जिक्र किया था, जहां 16 साल से अधिक उम्र की लड़कियां प्रेम संबंध में पड़ीं और यौन संबंध बनाए, लेकिन बाद में लडक़े पर पॉक्सो और आपराधिक कानून के तहत बलात्कार और अपहरण के आरोप लगा दिए गए।
अगले साल विधि आयोग ने अपनी रिपोर्ट में उम्र घटाने से इनकार कर दिया, लेकिन यह सिफ़ारिश की कि 16 से 18 साल के बच्चों के सहमति वाले रिश्तों में सजा तय करते समय अदालतें ‘न्यायिक विवेक’ का इस्तेमाल करें।
हालांकि इस सिफारिश को अभी तक कानूनी रूप नहीं दिया गया है, लेकिन देशभर की अदालतें इस सिद्धांत का इस्तेमाल करते हुए अपील सुनने, जमानत देने, बरी करने या कुछ मामलों को खारिज करने जैसे फैसले दे रही हैं। इसमें वे मामले के तथ्य और पीडि़त की गवाही को ध्यान में रखती हैं।
शर्मिला राजे समेत कई बाल अधिकार कार्यकर्ता मांग कर रहे हैं कि इस प्रावधान को कानून में शामिल किया जाए ताकि इसके इस्तेमाल में एकरूपता रहे। अगर इसे सिर्फ सुझाव के तौर पर छोड़ दिया गया तो अदालतें इसे नजरअंदाज कर सकती हैं।
अप्रैल में मद्रास हाईकोर्ट ने एक मामले में बरी करने के फैसले को पलट दिया। इस मामले में 17 साल की लडक़ी 23 साल के अभियुक्त के साथ रिश्ते में थी और जब उसके माता-पिता ने उसकी शादी किसी और से तय कर दी तो वह अभियुक्त के साथ अपने घर से चली गई। अदालत ने अभियुक्त को 10 साल की कैद की सजा सुनाई।
एनफोल्ड प्रैक्टिव हेल्थ ट्रस्ट (एक बाल अधिकार संस्था) की शोधकर्ता श्रुति रामकृष्णन ने इस फैसले पर इंडियन एक्सप्रेस अख़बार में लिखा है, ‘अदालत ने पॉक्सो क़ानून को ज्यों का त्यों शब्दों के आधार पर लागू किया,’ और इस फ़ैसले को उन्होंने ‘न्याय की गंभीर विफलता’ कहा।
चीन 'यारलुंग सांग्पो' नदी पर एक विशाल बांध बना रहा है. इससे भारत में चिंता पैदा हो गई है. क्या चीन, नदी के पानी को भारत के खिलाफ हथियार की तरह इस्तेमाल कर सकता है?
डॉयचे वैले पर मुरली कृष्णन का लिखा-
चीन, पूर्वोत्तर भारतीय राज्य अरुणाचल प्रदेश के साथ लगी विवादित सीमा के पास 'यारलुंग सांग्पो' नदी पर एक विशाल बांध बना रहा है. अरुणाचल प्रदेश पर बीजिंग भी दावा करता है. बांध का निर्माण जुलाई 2025 में शुरू हुआ.
इस बांध का निर्माण कार्य चीनी प्रधानमंत्री ली केचियांग की मौजूदगी में आयोजित एक समारोह में शुरू हुआ. 'यारलुंग सांग्पो' नदी जब चीन से अरुणाचल प्रदेश में प्रवेश करती है, तो उसे सियांग कहा जाता है. असम में यह ब्रह्मपुत्र कहलाती है.
इस बांध के निर्माण की वजह से भारत में चिंता पैदा हो गई है. कारण यह है कि इससे न सिर्फ पर्यावरण को खतरा है, बल्कि चीन को भारत के पूर्वोत्तर इलाके और बांग्लादेश की ओर पानी के बहाव को नियंत्रित करने का एक जरिया भी मिल सकता है.
170 अरब डॉलर की अनुमानित लागत वाली इस जलविद्युत परियोजना का लक्ष्य सालाना 300 अरब किलोवॉट घंटे बिजली पैदा करना है. इससे चीन के अन्य हिस्सों में बिजली पहुंचेगी और तिब्बत में भी बिजली की मांग पूरी की जाएगी. यह परियोजना चीन में स्थित दुनिया के अब तक के सबसे बड़े बांध 'थ्री गॉर्जेस डैम' से तीन गुना बड़ी है.
कुछ विशेषज्ञों और पूर्व राजनयिकों का मानना है कि यह बांध भारत और चीन के बीच तनाव को फिर से बढ़ा सकता है. जबकि हाल ही में दोनों देशों के बीच सीमा संबंधी चिंताओं में कुछ सुधार के संकेत मिले हैं.
भारत और चीन के बीच लंबे समय से सीमा विवाद
भारत और चीन, दोनों देशों ने एक-दूसरे पर वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) के पास के क्षेत्र पर कब्जा करने की कोशिश का आरोप लगाया है. भारत का कहना है कि यह सीमा 3,488 किलोमीटर लंबी है, जबकि चीन इसे इससे कम मानता है.
वर्षों के तनाव के बाद, दोनों देशों ने संबंधों को सामान्य बनाने के लिए नए सिरे से प्रयास शुरू किए हैं. जनवरी 2025 में, दोनों पक्ष लगभग पांच वर्षों के बाद उड़ानें फिर से शुरू करने पर सहमत हुए. इसके तीन महीने बाद, भारत और चीन के विशेष प्रतिनिधियों ने तीर्थयात्राओं और सीमा के जरिए व्यापार को फिर शुरू करके आगे बढ़ने का फैसला किया.
इस सबके बीच यह बांध परियोजना एक नई बड़ी चिंता का कारण बन रही है. इससे पर्यावरण में जो बदलाव होंगे, वे निचले हिमालयी क्षेत्रों में रहने वाले लोगों की जनसंख्या, रहन-सहन और जैव विविधता पर गहरा असर डाल सकते हैं. इसके चलते पर्यावरणीय और भू-राजनीतिक समस्याएं पैदा होने की आशंका है.
भारत और चीन के बीच पानी का डेटा साझा करने के लिए एक व्यवस्था बनाई गई है. इसे एक्सपर्ट लेवल मैकेनिज्म (ईएलएम) कहा जाता है. भारत इतनी बड़ी बांध परियोजना के लिए ईएलएम को पर्याप्त नहीं मानता है. इसकी वजह यह है कि ईएलएम के तहत मुख्य रूप से मॉनसून के मौसम में ही जानकारी दी जाती है, जब बाढ़ का खतरा सबसे अधिक होता है.
दिल्ली स्थित जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में पूर्वी एशियाई अध्ययन केंद्र के एसोसिएट प्रोफेसर अरविंद येलेरी ने डीडब्ल्यू को बताया, "भारत का तर्क है कि लंबे समय में यह बांध न केवल असम और बांग्लादेश के निचले इलाकों में मिट्टी की उर्वरता के लिए जरूरी पोषक तत्वों से भरपूर गाद को रोक लेगा, बल्कि इससे सिंचाई पर भी असर पड़ेगा. यह बांध फसल की पैदावार और कृषि उत्पादकता को भी प्रभावित करेगा. साथ ही, नदी के पारिस्थितिकी तंत्र पर भी इसका असर होगा."
येलेरी के अनुमान के मुताबिक, सीमा पार की नदियां और नदी के पारिस्थितिकी तंत्र को एकतरफा रूप से बदलने का चीन का तरीका पर्यावरणीय और कूटनीतिक दृष्टि से विनाशकारी है.
क्या पानी के दोहन का भी खतरा है?
येलेरी बताते हैं, "कानूनी नजरिए से देखा जाए, तो चीन अपनी भू-राजनीतिक महत्वाकांक्षा के चलते नदियों के प्रवाह को बनाए रखने की जिम्मेदारी को अनदेखा कर रहा है. यह एक तरह का अपराध है. इससे भारत की सीमा वार्ता में शामिल होने की रणनीतिक सोच पर पहले ही गहरा असर पड़ा है."
चीन ने मेकांग नदी पर भी ऐसा ही रुख अपनाया और कई बांध बनाते हुए नदी के ऊपरी हिस्से पर नियंत्रण स्थापित कर लिया. 1980 के दशक के मध्य से, चीन ने मेकांग नदी पर 11 बड़े बांध बनाए हैं और कई अन्य बांध बनाए जा रहे हैं.
चीनी मामलों के विशेषज्ञ और 'ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन' के फेलो अतुल कुमार ने डीडब्ल्यू को बताया, "चीन ने अभी तक अपने किसी भी पड़ोसी देश के साथ नदी जल-साझेदारी समझौता नहीं किया है. जबकि, एशिया की ज्यादातर बड़ी नदियों का उद्गम स्थल उसी के नियंत्रण में है."
अतुल कुमार बताते हैं, "यारलुंग सांग्पो के मामले में भी चीन ने ऐसा ही रुख अपनाया है. उसने भारत और बांग्लादेश को इन बांध परियोजनाओं के बारे में जानकारी नहीं दी है. यहां तक कि जल विज्ञान से जुड़ा डेटा साझा करना, जो केवल एक तकनीकी प्रक्रिया है, वह भी द्विपक्षीय संबंधों पर निर्भर करता है. तनावपूर्ण समय में अक्सर यह डेटा उपलब्ध नहीं कराया जाता है."
बीते दिनों एक मीडिया ब्रीफिंग के दौरान चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता गुओ जियाकुन ने कहा कि यह परियोजना 'निचले इलाकों पर कोई नकारात्मक असर नहीं डालेगी.' हालांकि, उनके इस बयान को संदेह की नजर से देखा जा रहा है.
अरुणाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री पेमा खांडू ने चीन की इस विशाल बांध परियोजना को एक 'वॉटर बम' करार दिया. उन्होंने इसे अस्तित्व के लिए भी खतरा बताया, जो सैन्य खतरे से भी कहीं बड़ा मुद्दा है.
'निचले इलाके में विनाश'
खांडू ने समाचार एजेंसी पीटीआई से कहा, "समस्या यह है कि चीन पर भरोसा नहीं किया जा सकता. कोई नहीं जानता कि वह क्या कर सकता है." उन्होंने जोर देकर कहा कि चीन ने अंतरराष्ट्रीय जल संधि पर हस्ताक्षर नहीं किया है. इस वजह से वह वैश्विक मानकों का पालन करने के लिए बाध्य नहीं है.
अतुल कुमार ने बांध टूटने के खतरे पर भी चिंता जताई, जो 'पूर्वोत्तर भारत और बांग्लादेश के निचले इलाकों के लिए हमेशा एक खतरा बना रहेगा.' उन्होंने कहा, "अस्थिर और भूकंप-संभावित हिमालय क्षेत्र में कोई भी प्राकृतिक आपदा, संघर्ष या यहां तक कि तोड़फोड़ भी निचले इलाकों में हर तरफ तबाही ला सकती है."
पूर्व राजनयिक अनिल वाधवा ने एक परामर्शी तंत्र बनाने की मांग की. उन्होंने कहा कि जब बांध बन जाए तो चीन को उसकी क्षमता, पानी के बहाव और बनावट के बारे में सारी जानकारी देनी चाहिए.
अनिल वाधवा ने डीडब्ल्यू को बताया, "यह जरूरी है कि भारत, अरुणाचल प्रदेश में जल्द-से-जल्द अपना बांध बनाकर सभी रक्षात्मक उपाय करे. बांध का विरोध कर रहे स्थानीय लोगों को मुआवजा मिलना चाहिए. साथ ही, जिन लोगों पर इसका असर हो रहा है उनसे खुलकर बात करनी चाहिए. अगर ऐसा नहीं हुआ, तो यह मामला हाथ से निकल सकता है. समस्या ज्यादा बिगड़ सकती है, जैसा कि हमने देश की कई अन्य बड़ी परियोजनाओं के साथ देखा है."
पूर्व राजनयिक अजय बिसारिया का भी ऐसा ही मानना है. उन्होंने डीडब्ल्यू से कहा, "चीन ने जिस तरह से हाल के दिनों में आर्थिक निर्भरता और व्यापार का इस्तेमाल भू-राजनीतिक हथियार के तौर पर किया है, उसे देखते हुए भारत को यह मान लेना चाहिए कि चीन पानी को भी हथियार के रूप में इस्तेमाल करेगा."
उन्होंने कहा, "ऐसा करने की चीन की इच्छा तो साफ दिखती है, लेकिन उसकी क्षमता और तकनीकी रूप से ऐसा करना कितना संभव है, यह अभी देखना बाकी है. इस खतरे से बचने के लिए भारत को सबसे बुरे हालात के बारे में सोचना चाहिए और उसकी तैयारी अभी से कर लेनी चाहिए."
बच्चों की आत्महत्या के आंकड़े बढ़ रहे हैं. विशेषज्ञ बताते हैं कि बच्चों में मानसिक परेशानी होने पर दिनचर्या और व्यवहार में साफतौर पर बदलाव होने लगता है. पहचानें मानसिक परेशानी के संकेत, ताकि बच्चों की मदद की जा सके.
डॉयचे वैले पर रामांशी मिश्रा का लिखा-
25 जुलाई 2025 को अहमदाबाद के नवरंगपुरा स्थित स्कूल में 16 वर्ष की कक्षा 10 की छात्रा हंसते हुए क्लास से बाहर निकली. हाथ में चाबी का गुच्छा घुमाते हुए आराम से स्कूल की चौथी मंजिल की गैलरी में जाकर खड़ी हुई और अचानक ही उसने नीचे छलांग लगा दी. इस पूरी घटना का सीसीटीवी फुटेज सोशल मीडिया पर वायरल हुआ.
26 जुलाई 2025 को लखनऊ के आशियाना स्थित एक स्कूल के आठवीं कक्षा में पढ़ने वाले 14 वर्षीय छात्र ने आत्महत्या का रास्ता चुन लिया. कारण, उसकी मां ने डांट लगाई थी कि मोबाइल चलाने के बजाय वह पढ़ाई पर ध्यान दे.
ये दो मामले उदाहरण भर हैं. भारत समेत दुनिया के कई हिस्सों में स्कूल जाने वाले बच्चों में आत्महत्या की प्रवृत्ति में बीते कई वर्षों से इजाफा देखा जा रहा है. यह गंभीर चिंता का विषय है.
क्या इंटरनेट बन रहा है बच्चों की आत्महत्या का सबसे बड़ा कारण?
बच्चों में आत्महत्या के मामलों को लेकर मनोवैज्ञानिक अलग-अलग कारण और प्रवृत्तियों पर ध्यान देने की बात करते हैं. हालांकि, अधिकांश मनोवैज्ञानिक सहमति जताते हैं कि सबसे मुख्य कारण बदलती और आधुनिक होती तकनीक है.
डॉ ईशान्या राज, प्रयागराज के मोतीलाल नेहरू डिविजनल हॉस्पिटल में नैदानिक मनोचिकित्सक हैं. वह बताती हैं कि कोरोना काल के बाद से इंटरनेट ने बच्चों की जिंदगी में अहम जगह बनाई है. इसके चलते जहां एक ओर उनकी जिंदगी में मोबाइल फोन और गैजेट्स की संख्या में इजाफा हुआ है, वहीं दूसरी ओर उनके मानसिक स्तर पर इसका प्रतिकूल प्रभाव भी दिख रहा है.
किंग जॉर्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय (केजीएमयू) के बाल मनोचिकित्सक प्रोफेसर डॉ पवन गुप्ता का कहना कि आज बच्चों के पास बहुत कम उम्र में ही इलेक्ट्रॉनिक गैजेट्स तक पहुंच है. घरों में अनलिमिटेड वाई-फाई है और अभिभावकों के पास उन पर निगरानी रखने का समय बेहद कम है. इसका नतीजा यह होता है कि बच्चों के पास मानसिक विकास के लिए न तो समय होता है और न ही शारीरिक अभ्यास में उनकी रुचि रह जाती है. उन्हें अपना हर जवाब बस एक बटन दबाकर मिल जाता है.
जेनेरेशन गैप में बदलाव के साथ बदल रहा परिवेश
डॉ. ईशान्या का कहना है कि माता-पिता, शिक्षकों और बच्चों के बीच जेनेरेशन गैप है, इस वजह से दोनों पीढ़ियां एक-दूसरे को समझने में अक्षम हो रही हैं. इसमें आधुनिक तकनीक की भी भूमिका है. तकनीक का अत्यधिक प्रयोग न केवल बच्चों के मानसिक विकास और स्वास्थ्य को प्रभावित कर रहा है, बल्कि माता-पिता को भी उनसे दूर करता जा रहा है.
डॉ ईशान्या बताती हैं, "पहले बच्चे नोट्स बनाते थे, उन्हें याद करते थे, बाहर खेलते थे, लोगों से मिलते-बात करते थे. वे अपने अनुभवों से काफी कुछ सीखते थे, लेकिन अब बच्चे मोबाइल और इंटरनेट पर काफी हद तक निर्भर हैं. इससे उनका सामाजिक कौशल कमजोर हो रहा है. साथ ही, इमोशनल इंटेलिजेंस पर भी असर पड़ रहा है."
उत्तर प्रदेश नेशनल एडोल्सेंट एजुकेशन प्रोग्राम की पेरेंटिंग कोच और काउंसलर लीना विग का कहना है कि देखरेख की कमी भी एक कारण है. लीना कहती हैं, "आजकल दौड़-भाग भरे जीवन में कई माता-पिता के पास बच्चों के लिए समय नहीं होता. बच्चे जो मांगते हैं, अभिभावक उन्हें आसानी से लाकर दे देते हैं. ऐसे में बच्चों में एक अधिकार की भावना आ जाती है. यही आगे चलकर उनके लिए परेशानी का सबब बन जाता है."
लीना यह भी रेखांकित करती हैं कि बच्चों का स्क्रीन टाइम बढ़ गया है. अधिक समय तक मोबाइल में ही लगे रहने से बच्चों का मानसिक विकास बाधित होता है. वह कहती हैं, "बच्चों का जल्दबाजी में हर निर्णय लेना, किसी भी बात पर तुरंत ही रिएक्शन देना और किसी बात के बुरा लगने पर उत्तेजित हो जाना आदि ऐसी बातें हैं, जो बच्चों के लिए 'फॉल्स आइडेंटिटी' के तौर पर सामने आता है."
बच्चों में बढ़ रही 'सबकुछ या कुछ भी नहीं' की आदत
विशेषज्ञ इस ओर भी ध्यान दिलाते हैं कि बच्चों में तत्काल संतुष्टि की आदत घर करती जा रही है. ये आदत बच्चों को मेहनत करने की जगह शॉर्टकट की ओर ले जा रही है. डॉ ईशान्या बताती हैं, "इसके कारण उनमें दूसरों से अपनी तुलना करने, तुरंत सबकुछ पा लेने, साथियों के बीच खुद को 'कूल' या सबसे बेहतर दिखाने जैसी होड़ रहती है. जब उनकी उम्मीदें पूरी नहीं होतीं या उनके अनुरूप नहीं होतीं, तो बच्चे खुद को दोष देने लगते हैं. उनमें कुंठा, तनाव और निराशा, बदला लेने की प्रवृत्ति घर करने लगती है. जब ये भावनाएं बेकाबू हो जाती हैं, तो आत्महत्या जैसी प्रवृत्तियां देखने को मिलती हैं."
आत्महत्या की कोशिश के डराने वाले आंकड़े
राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़ों में भी छात्रों की आत्महत्या की संख्या में इजाफा देखा गया है. एनसीआरबी के 2001 के आंकड़े में 5,425 बच्चों ने आत्महत्या की थी. 2022 तक ये मामले बढ़कर 13,044 तक हो गए. इन मामलों में 2,248 छात्रों ने सीधे तौर पर परीक्षा में फेल होने पर आत्महत्या कर ली थी. इनके अलावा अवसाद, चिंता, अकेलापन, तनाव और समाज, दोस्तों या घर-परिवार से किसी तरह का समर्थन न मिलने के कारण भी कई बच्चे आत्महत्या का रास्ता चुन रहे हैं.
डॉ ईशान्या अपनी क्लीनिकल साइकियाट्रिक ओपीडी में भी स्कूल जाने वाले छात्रों की संख्या में इजाफा देख रही हैं. वह बताती हैं, "हर महीने ओपीडी में आने वाले औसतन 35 ऐसे बच्चे होते हैं, जो किसी-न-किसी तरह की मानसिक समस्या से जूझ रहे होते हैं. इसके अलावा 15 से अधिक ऐसे बच्चे भी हर महीने हमारे पास आ रहे हैं, जो या तो आत्महत्या की कोशिश कर चुके होते हैं या फिर इस तरह की प्रवृत्ति उनमें देखी गई है."
बाल मनोचिकित्सक प्रोफेसर डॉ पवन गुप्ता का कहना है कि उनके ओपीडी में 18 वर्ष से कम आयु के बच्चों में प्रतिमाह औसतन 20 से 25 बच्चे ऐसे होते हैं, जो टेक्नोलॉजी और मोबाइल फोन के कारण मानसिक परेशानियों से जूझ रहे हैं.
टेक्नोलॉजी की लत से बचाने के लिए पुट क्लीनिक
केजीएमयू में बच्चों के लिए प्रॉब्लमैटिक यूज ऑफ टेक्नोलॉजी (पुट) क्लीनिक बनाया गया है. मार्च 2019 में शुरू हुए इस क्लिनिक का उद्देश्य बच्चों और किशोरों में ऑनलाइन गेमिंग, सोशल मीडिया और पोर्नोग्राफी जैसे ऑनलाइन प्लेटफॉर्म के अत्यधिक उपयोग से होने वाली समस्याओं और मानसिक विकारों का इलाज करना है.
क्लिनिक का संचालन डॉ पवन करते हैं. उनका सुझाव है कि माता-पिता बच्चों को स्क्रीन से दूर रखने के लिए रचनात्मक गतिविधियों पर ध्यान दें. जैसे कि खेलना, पढ़ना-पढ़ाना, कला और नए अनुभव को सिखाने के क्रियाकलाप. समय रहते यदि बच्चों की डिजिटल आदतों पर नियंत्रण न किया जाए, तो यह भविष्य में उनके व्यक्तित्व और सामाजिक विकास को गहराई से प्रभावित कर सकता है.
-डॉ. संजय शुक्ला
हिंदी में एक प्रचलित मुहावरा है ‘पानी-पानी होना’यानि शर्मसार या लज्जित होना यह मुहावरा भारतीय शहरों पर सटीक बैठती है। देश में मानसून ने रफ्तार पकड़ ली है और इसी बीच महानगरों से लेकर बड़े शहरों और कस्बों में जलभराव की खबरें लगातार आ रही है। बीते दिनों हुई लगातार बारिश के चलते छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर, न्यायधानी बिलासपुर सहित अमूमन सभी शहरों और कस्बों में जलभराव की खबरें एक बार फिर से सामने आई है। भारी बारिश के बीच जल निकासी की माकूल व्यवस्था नहीं होने के कारण बिलासपुर में एक रिटायर्ड प्रोफेसर की मौत फर्श पर पानी भरने से दीवार में फैले करंट से हो गई। रायपुर सहित तमाम शहरों की सडक़ें, गलियां और फ्लाईओवर तथा अंडरब्रिज में भारी जलभराव के चलते जहां यातायात व्यवस्था बुरी तरह से प्रभावित हुआ वहीं निचली बस्तियों के घरों में बारिश का पानी घुटनों तक भर गया फलस्वरूप वाशिंदों को जहां रतजगा करना पड़ा वहीं बुजुर्गों और बच्चों को भोजन के लिए दो- चार होना पड़ा है। इस बीच नगरीय प्रशासन के तमाम दावों के बीच प्रशासनिक अमला असहाय नजर आया तथा नागरिकों में अव्यवस्था के प्रति नाराजगी भी देखी गई। गौरतलब है कि किसी भी देश के मजबूत अर्थव्यवस्था का प्रतिबिंब उसका चमचमाता शहर ही होता है, शहर जहां तरक्की, रचनात्मकता और नवीनता का केंद्र होता है वहीं यह अर्थव्यवस्था में प्रगति और रोजगार का जनक भी होता है।? भारत के कुल जीडीपी में शहरों का योगदान वर्तमान में 63 फीसदी है जिसके 2050 तक 75 फीसदी पहुंचने की संभावना है। मानव सभ्यता के विकास के साथ ही लोगों के लिए शहर हमेशा से आकर्षण का केंद्र रहा है लेकिन अब हमारे शहर तमाम विसंगतियों से जूझ रहे हैं। हालिया इस बारिश ने एक बार फिर से भारतीय शहरों के सीवरेज व्यवस्था और आपदा प्रबंधन की पोल खोल कर रख दी है। एक शोध के मुताबिक हर बारिश में देश के 66 फीसदी शहरों में व्यापक जलभराव होता है फलस्वरूप हजारों करोड़ रुपए का नुकसान होता है।
बहरहाल यह तस्वीर उस देश की है जहां 100 शहरों को स्मार्ट सिटी बनाने का ढिंढोरा पीटा गया था। शहरों को स्मार्ट बनाने के लिए सरकार के मंत्रियों, नगरीय निकायों और नौकरशाहों के अब तक दर्जनों विदेशों और महानगरों के अध्ययन दौरे हो चुके हैं लेकिन शहरों के हालात दिनों-दिन बदतर होते जा रहे हैं। शहरों की हालात को देखते हुए कथित अध्ययन दौरे आम जनता के टैक्स के पैसे से नेताओं और अफसरों के महज सैर-सपाटे ही साबित हो रहे हैं क्योंकि इन यात्राओं का कोई परिणाम धरातल पर दृष्टिगोचर नहीं हो रहा है। हर मानसून में महज कुछ घंटों की बारिश में हमारे शहरों में ट्रैफिक जाम,जलभराव, जमीन धसकने और बिजली करंट फैलने जैसी घटनाएं अब आम हो चुकी है। बड़े से लेकर छोटे शहरों में बारिश के दौरान बदहाल व्यवस्था का खामियाजा आम नागरिकों को ही भुगतना पड़ता है। साल 2017 में मुंबई में भारी बारिश के दौरान खुले मेन होल में गिरने और डूबने से सुप्रसिद्ध गैस्ट्रोएंट्रोलॉजिस्ट डॉ. दीपक अमरापुरकर की मौत हो गई थी। बीते साल 2024 में दिल्ली के ओल्ड राजेन्द्र नगर के एक कोचिंग सेंटर के बेसमेंट में पानी भरने की वजह से दो छात्राओं सहित तीन छात्रों की मौत की घटना ने ने देश को झकझोर कर रख दिया था। अलबत्ता यह सिलसिला अभी भी नहीं थमा है और देश के अनेक हिस्सों से शहरों में जलभराव और बिजली करंट के चलते मौत होने की खबरें लगातार आ रही है।
बहरहाल बारिश के दौरान बरसाती पानी के पुख्ता निकासी व्यवस्था नहीं होने की वजह से जहां जान- माल का नुकसान हो रहा है वहीं इसका दुष्प्रभाव जनस्वास्थ्य, कृषि और आर्थिक गतिविधियों पर भी पड़ रहा है। बरसाती पानी के जमाव की वजह से जहां मच्छर जनित रोग जैसे मलेरिया, डेंगू और चिकनगुनिया जैसे रोग होते हैं वहीं दूषित पानी पेयजल आपूर्ति व्यवस्था को भी प्रभावित करती है फलस्वरूप आंत्रशोथ(उल्टी- दस्त), पीलिया, टायफाइड बुखार, पेचिश, जिआर्डियोसिस, पोलियो सहित आंख और त्वचा की बीमारी होती है। जलभराव की वजह से घरों में सांप और जहरीले कीड़े - मकोड़ों के प्रविष्ट होने और उनके दंश से मौत की संभावना भी होती है।बिलाशक बीमारी और मौत का सीधा दबाव स्वास्थ्य सेवाओं और परिवार के आय पर पड़ता है जिससे गरीबी बढ़ती है। दूसरी ओर भारतीय शहरों में जलभराव के चलते होने वाले नुकसान, यातायात बाधा, विद्युत आपूर्ति में व्यवधान, औद्योगिक उत्पादन में कमी, फसल और सब्जियों की बर्बादी, पर्यटन उद्योग से जुड़े काम- धंधों में नुकसान और रोजगार गंवाने से देश को भारी आर्थिक क्षति पहुंचती है। जलभराव का सबसे बुरा असर बस और रेल परिवहन के साथ ही हवाई सेवाओं पर भी पड़ता है जिसके चलते यात्रियों और माल परिवहन को भारी नुकसान उठाना पड़ता है। जलभराव की वजह से सडक़ और पुल - पुलिया क्षतिग्रस्त हो जाते हैं जिसके रिपेयरिंग के लिए सरकार को हर साल करोड़ों रुपए खर्च करने पड़ते हैं जो राजकोषीय भार को बढ़ाते हैं। विश्व बैंक के एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत में शहरी बाढ़ के चलते हर साल देश को 4 अरब डॉलर का नुकसान होता है।
दरअसल शहरों में बारिश के दौरान जलभराव समस्या के लिए सरकार, स्थानीय नगरीय प्रशासन और नागरिक ही जिम्मेदार हैं। बेतरतीब शहरीकरण, शहरों के वाटर बॉडी यानि तालाबों और झीलों के खत्म होने, बढ़ते कांक्रीटीकरण, अतिक्रमण, पेड़ों की कटाई और सीवेज लाइनों में तकनीकी खामियों के चलते अधिकांश शहर बरसात में बाढ़ की समस्या से जूझ रहे हैं। शहरों में तालाब और झील या तो अतिक्रमण की भेंट चढ़ रहे हैं अथवा इनका क्षेत्रफल कम हो रहा है जबकि एक दौर में पूरे शहर का बरसाती पानी इन्हीं तालाबों और झीलों में जाता था। सडक़ों, फूटपाथ और शहरी विस्तार के कारण अब शहर कांक्रीट के जंगल में तब्दील हो चुके हैं जिसके चलते जमीन के बरसाती पानी सोखने की नैसर्गिक क्षमता खत्म हो रही है। दूसरी ओर शहरों में जलभराव के लिए आम नागरिक भी काफी हद तक जवाबदेह हैं जो नालियों के उपर अवैध निर्माण अथवा अतिक्रमण कर इसके साफ-सफाई में रूकावट पैदा करते हैं। इसके अलावा लोगों द्वारा नालियों में पॉलिथीन बैग, प्लास्टिक सामाग्री और कचरे डाले जाते हैं फलस्वरूप नालियां जाम हो जाती है। लिहाजा नागरिकों की भी जवाबदेही के वे अपने कर्तव्य के प्रति अनुशासित हों ताकि शहर स्वच्छ और सेहतमंद बन सकें।
- निखिल इनामदार
भारत की सॉफ़्टवेयर इंडस्ट्री बड़े बदलाव के दौर से गुजर रही है।
देश में प्राइवेट सेक्टर की सबसे बड़ी आईटी कंपनी टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (टीसीएस) ने मिड और सीनियर मैनेजमेंट लेवल पर 12 हजार से ज्यादा नौकरियां खत्म करने का ऐलान किया है। इससे कंपनी के कर्मचारियों की संख्या में दो फीसदी की कमी आएगी।
यह कंपनी लगभग पांच लाख से ज्यादा आईटी प्रोफेशनल्स को रोजगार देती है और 283 अरब डॉलर की भारतीय सॉफ्टवेयर इंडस्ट्री का अहम हिस्सा मानी जाती है।
यह देश में व्हाइट-कॉलर नौकरियों की रीढ़ कही जाती है। व्हाइट कॉलर नौकरियां ऐसी नौकरियां होती हैं, जिनमें दफ्तर या पेशेवर माहौल में काम किया जाता है। इनमें शारीरिक मेहनत कम और दिमागी या मैनेजमेंट से जुड़ा काम ज्यादा होता है।
टीसीएस का कहना है कि यह कदम कंपनी को ‘भविष्य के लिए तैयार’ करने के लिए उठाया गया है, क्योंकि वह नए क्षेत्रों में निवेश कर रही है और बड़े पैमाने पर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस अपना रही है।
पिछले कई दशकों से टीसीएस जैसी कंपनियां कम लागत पर वैश्विक ग्राहकों के लिए सॉफ्टवेयर बनाती रही हैं, लेकिन अब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के चलते कई काम ऑटोमेटिक हो रहे हैं और ग्राहक नई तकनीक पर आधारित समाधानों की मांग कर रहे हैं।
कंपनी ने कहा, ‘कई री-स्किलिंग और नई भूमिकाओं में नियुक्ति की पहल चल रही है। जिन सहयोगियों की नियुक्ति संभव नहीं है, उन्हें कंपनी से रिलीज किया जा रहा है।’
छंटनी की बुनियादी वजह क्या है?
स्टाफिंग फर्म टीमलीज डिजिटल की सीईओ नीति शर्मा ने बीबीसी से कहा, ‘आईटी कंपनियों में मैनेजर लेवल के लोगों को हटाया जा रहा है और उन कर्मचारियों को रखा जा रहा है जो सीधे काम करते हैं, ताकि वर्कफोर्स को व्यवस्थित किया जा सके और क्षमता बढ़ाई जा सके।’
उन्होंने यह भी बताया कि एआई, क्लाउड और डेटा सिक्योरिटी जैसे नए क्षेत्रों में भर्तियां बढ़ी हैं, लेकिन जिस तेजी से नौकरियां जा रही हैं, उस अनुपात में नई भर्तियां नहीं हो रही हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि यह फ़ैसला देश की सॉफ्टवेयर इंडस्ट्री में ‘स्किल गैप’ को भी उजागर करता है।
बिजनेस सलाहकार कंपनी ‘ग्रांट थॉर्नटन भारत’ से जुड़े अर्थशास्त्री ऋषि शाह के मुताबिक, ‘जनरेटिव एआई के कारण प्रोडक्टिविटी में तेजी से बढ़ोतरी हो रही है। यह बदलाव कंपनियों को मजबूर कर रहा है कि वे अपने वर्कफोर्स स्ट्रक्चर पर फिर से विचार करें और देखें कि संसाधनों को एआई के साथ काम करने वाली भूमिकाओं में कैसे लगाया जाए।’
नेशनल एसोसिएशन ऑफ सॉफ्टवेयर एंड सर्विसेज कंपनीज (नैसकॉम) का अनुमान है कि 2026 तक भारत को 10 लाख एआई प्रोफेशनल्स की जरूरत होगी, लेकिन फिलहाल देश के 20 फीसदी से भी कम आईटी प्रोफेशनल्स के पास एआई की स्किल है।
तकनीकी कंपनियां नए एआई टैलेंट तैयार करने के लिए ट्रेनिंग पर ज़्यादा खर्च कर रही हैं, लेकिन जिनके पास जरूरी स्किल नहीं है, उन्हें नौकरी से हटाया जा रहा है।
ट्रंप के टैरिफ़ संबंधी फ़ैसले का असर
एआई के आने से पैदा हुए बदलावों के अलावा, वैश्विक निवेश बैंकिंग फ़र्म जेफऱीज़ का कहना है कि टीसीएस का ऐलान भारत के आईटी सेक्टर में ‘ग्रोथ संबंधी व्यापक चुनौतियों को भी दिखाता है।’
जेफऱीज़ ने एक नोट में लिखा, ‘वित्त वर्ष 2022 से इंडस्ट्री स्तर पर नेट हायरिंग कमजोर रही है, इसके पीछे की वजह मांग में लंबे समय से चल रही गिरावट है।’
अमेरिका में आईटी सेवाओं की मांग पर भी असर पड़ा है, जो भारतीय सॉफ्टवेयर कंपनियों की कुल कमाई का आधा स्रोत है। डोनाल्ड ट्रंप की टैरिफ नीतियों ने इस पर असर डाला है।
हालांकि, टैरिफ मुख्य रूप से सामानों को प्रभावित करते हैं। लेकिन विश्लेषकों का कहना है कि कंपनियां टैरिफ़ से जुड़ी अनिश्चितताओं और अपनी ग्लोबल सोर्सिंग रणनीतियों के आर्थिक प्रभाव का आंकलन करते हुए आईटी पर होने वाले अतिरिक्त खर्च को रोक रही हैं।
जेफरीज के मुताबिक़, ‘एआई तकनीक अपनाने की वजह से अमेरिकी कंपनियां लागत कम करने के लिए दबाव बना रही हैं, जिससे बड़ी आईटी कंपनियों को कम स्टाफ के साथ काम करना पड़ रहा है।’
इसका असर अब बेंगलुरु, हैदराबाद और पुणे जैसे शहरों में दिखने लगा है, जो कभी भारत के आईटी बूम के केंद्र थे।
एक अनुमान के मुताबिक, पिछले साल इस सेक्टर में करीब 50 हजार लोगों की नौकरियां गई थीं। भारत की शीर्ष छह आईटी कंपनियों में नए कर्मचारियों की संख्या में 72त्न की कमी आई।
पिछले एक साल में यूरोपीय संघ (ईयू) की विदेश नीति में एक बड़ा बदलाव आया है। ब्रेक्जिट के बाद ब्रिटेन के साथ संबंध सुधरे हैं। माक्रों और मैत्र्स दोनों ने लंदन का दौरा किया है।
डॉयचे वैले पर आयुष यादव का लिखा-
2016 में यूनाइटेड किंगडम के यूरोपीय संघ से बाहर निकलने तक, उसकी विदेश नीति यूरोपीय संघ के ढांचे, विशेष रूप से इसकी सामान्य विदेश और सुरक्षा नीति (सीएफएसपी) और सामान्य सुरक्षा व रक्षा नीति (सीएसडीपी) द्वारा ही तय होती थी।
ई3 यूनाइटेड किंगडम, जर्मनी और फ्रांस के बीच एक अनौपचारिक विदेश और सुरक्षा सहयोग व्यवस्था है। इसे अंग्रेजी में ‘मिनिलेटरलिज्म’ के रूप में जाना जाता है, जिसका मतलब है समान विचारधारा वाले देशों का एक छोटे समूह में आकर अनौपचारिक रूप से साथ मिलकर काम करना।
कब साथ आई तिकड़ी
ई3 समूह का गठन 2003 में इराक पर अमेरिकी हमले के बाद हुआ था। शुरुआत में, इसका मकसद इराक के लिए एक त्रिपक्षीय रणनीति तैयार करना और ईरान से जुड़े परमाणु जोखिमों के बारे में पता करना था।
आगे चलकर तीनों देशों ने मुख्य रूप से ईरान से जुड़ी परमाणु गतिविधियों से संबंधित बातचीत करने के लिए ही बैठकें की, खासकर तब जब अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (आईएईए ) ने ईरान की परमाणु गतिविधियों से जुड़ी रिपोर्ट का खुलासा किया।
ई3 ने अमेरिका, संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद और ईरान के बीच सामूहिक बातचीत में एक महत्वपूर्ण मध्यस्थ की भूमिका निभाई। इस समूह ने 2015 के ईरान परमाणु समझौते (जेसीपीओए) पर बातचीत करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
ब्रेक्जिट के बाद संबंध बिगड़े
2016 में यूके के यूरोपीय संघ छोडऩे के लिए मतदान करने के बाद यूके, फ्रांस और जर्मनी के बीच संबंध खराब हो गए। औपचारिक रूप से यूरोपीय संघ से बाहर होने के बाद ब्रिटेन को टेढ़ी नजरों से देखा गया।
ब्रिटेन और फ्रांस के बीच उत्तरी सागर में मछली पकडऩे के अधिकारों और प्रवासियों के आने जाने को लेकर तल्खी भी दिखाई दी। जर्मनी में भी ब्रेक्जिट के बाद इससे होने वाले आर्थिक नुकसान का अंदेशा था। 2016 में जर्मनी का तीसरा सबसे महत्वपूर्ण व्यापारिक भागीदार यूनाइटेड किंगडम 2024 में नौवें स्थान पर आ गया।
पिछले कुछ सालों में ई3 समूह के पतन का एक और कारण फ्रैंको-जर्मन रिश्तों में आई दूरी को भी माना जाता है। 2022 में रूस के यूक्रेन पर हमले के बाद, तत्कालीन जर्मन चांसलर ओलाफ शॉल्त्स और फ्रांसीसी राष्ट्रपति इमानुएल माक्रों के बीच यूक्रेन को समर्थन से लेकर ऊर्जा जैसे कई मुद्दों पर मतभेद भी उभरे।


