विचार/लेख
बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक
भारत के पड़ौसी देश म्यांमार (बर्मा या ब्रह्मदेश) में आज सुबह-सुबह तख्ता-पलट हो गया। उसके राष्ट्रपति बिन मिन्त और सर्वोच्च नेता श्रीमती आंग सान सू की को नजरबंद कर दिया गया है और फौज ने देश पर कब्जा कर लिया है। यह फौजी तख्ता-पलट सुबह-सुबह हुआ है जबकि अन्य देशों में यह प्राय: रात को होता है। म्यांमार की फौज ने यह तख्ता इतनी आसानी से इसीलिए पलट दिया है कि वह पहले से ही सत्ता के तख्त के नीचे घुसी हुई थी।
2008 में उसने जो संविधान बनाया था, उसके अनुसार संसद के 25 प्रतिशत सदस्य फौजी होने अनिवार्य थे और कोई चुनी हुई लोकप्रिय सरकार भी बने तो भी उसके गृह, रक्षा और सीमा-इन तीनों मंत्रालयों का फौज के पास रखा जाना अनिवार्य था। 20 साल के फौजी राज्य के बावजूद जब 2011 में चुनाव हुए तो सू की की पार्टी ‘नेशनल लीग फॉर डेमोक्रेसी’ को स्पष्ट बहुमत मिला और उसने सरकार बना ली।
फौज की अड़ंगेबाजी के बावजूद सू की की पार्टी ने सरकार चला ली लेकिन फौज ने सू की पर ऐसे प्रतिबंध लगा दिए कि सरकार में वह कोई औपचारिक पद नहीं ले सकीं लेकिन उनकी पार्टी फौजी संविधान में आमूल-चूल परिवर्तन की मांग करती रही। नवंबर 2020 में जो संसद के चुनाव हुए तो उनकी पार्टी ने 440 में से 315 सीटें 80 प्रतिशत वोटों के आधार पर जीत लीं। फौज समर्थक पार्टी और नेतागण देखते रह गए। अब 1 फरवरी को जबकि नई संसद को समवेत होना था, सुबह-सुबह फौज ने तख्ता-पलट कर दिया। कई मुख्यमंत्रियों, मंत्रियों और मुखर नेताओं को भी उसने पकडक़र अंदर कर दिया है। यह आपातकाल उसने अभी अगले एक साल के लिए घोषित किया है। उसका आंरोप है कि नवंबर 2020 के संसदीय चुनाव में भयंकर धांधली हुई है। लगभग एक करोड़ फर्जी वोट डाले गए हैं। म्यांमार के चुनाव आयोग ने इस आरोप को एकदम रद्द किया है और कहा है कि चुनाव बिल्कुल साफ-सुथरा हुआ है। अभी तक फौज के विरुद्ध कोई बड़े प्रदर्शन आदि नहीं हुए हैं लेकिन दुनिया के सभी प्रमुख देशों ने इस फौजी तख्ता-पलट की कड़ी भत्र्सना की है और फौज से कहा है कि वह तुरंत लोकतांत्रिक व्यवस्था को बहाल करे, वरना उसे इसके नतीजे भुगतने होंगे। भारत ने भी दबी जुबान से लोकतंत्र की हिमायत की है लेकिन चीन साफ़-साफ़ बचकर निकल गया है। वह एकदम तटस्थ है। उसने बर्मी फौज के साथ लंबे समय से गहरी सांठ-गांठ कर रखी है। बर्मा 1937 तक भारत का ही एक प्रांत था। भारत सरकार का विशेष दायित्व है कि वह म्यांमार के लोकतंत्र के पक्ष में खड़ी हो।
(लेखक, भारतीय विदेश नीति परिषद के अध्यक्ष हैं) (नया इंडिया की अनुमति से)
-पुष्य मित्र
अभी जो नये कानून को लेकर विरोध है, वह एक क्षणिक मसला नहीं है। यह उस बड़ी लड़ाई का हिस्सा है, जो वर्ल्ड बैंक और आईएमएफ की वैश्विक नीतियों के खिलाफ है। वे नीतियां जो दुनिया की हर सरकार की लोक कल्याणकारी नीतियों को खत्म कर देना चाहती है। जो मानती है कि दुनिया में बेहतरी सिर्फ पूंजीवाद और कारपोरेट के विकास से ही हो सकती है।
वे नीतियां जो गरीबों की मदद के लिए खर्च होने पर एक-एक पैसे पर रोक लगाना चाहती है। जो चाहती है कि सरकारें सिर्फ ऐसी नीतियां बनायें, जिससे कारपोरेट को अपना व्यापार तेजी से बढ़ाने में मदद मिले। वे नीतियां जो हर सरकारी सेवा की पूरी कीमत उस देश के गरीब नागरिकों से वसूलना चाहती है। जो शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार के बुनियादी सवालों को सरकार से लेकर कारपोरेट को सौंपना चाहती हैं। और इसे रिफार्म का नाम देती है।
यह सिर्फ इन तीन कानूनों का सवाल नहीं है, जो खेतिहार किसानों के नाम पर बड़ी कंपनियों के हित में बने हैं। यह सवाल उन तमाम नीतियों, कानूनों और फैसलों के लिए है, जो सरकारी कंपनियों को कमजोर करके उसे कारपोरेट को औने-पौने दाम पर सुपुर्द कर रही हैं। जो कालेजों की फीस बढ़ा रही है, रेल को गरीबों की सवारी के बदले पैसे वालों की सवारी बनाने पर तुली है। जो बीएसएनएल की कमाई को जिओ को और ओएनजीसी के बदले रिलायंस को देश के संसाधनों को सौंप रही है। जो सरकारी अस्पतालों के बदले अपोलो और मैक्स जैसे कारपोरेट अस्पतालों के आगे बढऩे के पक्ष में नीतियां बना रही हैं।
हमारा विरोध उन नीतियों से भी है जो ऑटोमेशन को बढ़ावा देती है और सरकारी पदों पर भर्ती नहीं करना चाहती। जो कारपोरेट और उद्योगों के हित में मजदूरों को 8 के बदले 12 घंटे तक काम करने के लिए विवश करना चाहती है। जो आंगनबाड़ी और राशन की दुकानों को बंद कराना चाहती है, जबकि देश के करोड़ों बच्चे कुपोषण और एनीमिया से ग्रस्त हैं।
यह सिर्फ भारत में नहीं बल्कि पूरी दुनिया में हो रहा है और ऐसा नहीं कि भारत में यह सिर्फ इसी सरकार के समय में हो रहा है, पिछले दो दशकों से यह लगातार हो रहा है। हां, यह जरूर सच है कि अब तक चोरी-छिपे और शर्मिंदगी के साथ होता था। अब पूरी बेशर्मी के साथ देश के संसाधनों को बेचा जा रहा है। पहली दफा कोई सरकार कह रही है कि मेरे खून में व्यापार है। सरकार सभी भारतीय कंपनियों को बेचने की प्लानिंग कर रही है। कालेजों की फीस, रेल का किराया, अस्पतालों का खर्च सब बेशर्मी के साथ बढ़ाया जा रहा है।
मजदूरों की मुसीबतें बढ़ रही हैं। छोटे व्यापारियों को परेशान किया जा रहा है। सरकारी स्कूलों और अस्पतालों को बंद करने की योजनाएं बोर्ड पर हैं। पेट्रोल के दाम बढ़ाये जा रहे हैं। गरीबों को दी जाने वाली हर तरह की सब्सिडी खत्म की जा रही है।
किसानों पर जो हमला हुआ है, वह इसी की एक कड़ी है। लक्ष्य है कृषि क्षेत्र का जो थोड़ा बहुत मुनाफा है, उसे छीन कर कारपोरेट को सौंपना। बड़ी कंपनियों को अपने हिसाब से खेती करवाने की छूट देना। उन्हीं सस्ती कीमत पर किसानों की फसल खरीद लेने की रियायत देना और वे जितना चाहें उतना माल समेट कर स्टोर कर लेने की इजाजत देना। यह सब उसी कड़ी का हिस्सा है।
यह एक अमूर्त किस्म का हमला है, जिसे देश की बड़ी आबादी समझ नहीं पा रही। उसे अंदाजा नहीं है कि आखिरकार इन सबका नुकसान उन्हें ही झेलना है। उनके ही बच्चों को ऊंची फीस चुकानी है और 8 के बदले 12 घंटे की नौकरी करनी है। अस्पतालों का लाखों का बिल भरना है। महंगे खाने के सामान को खरीदने के लिए मजबूर होना है। कुपोषित और एनीमिक होकर जीना है। अब रेल यात्रा स्वप्न होने जा रही है। यह सब गरीबों और मध्यम वर्ग को झेलना है। मगर उन्हें हिंदुत्व का अफीम थमा दिया गया है और वे उसे ही चाट कर मग्न है।
इस सरकार की यही सफलता है कि वह आहिस्ता-आहिस्ता लोगों का गला भी रेत रही है और लोग मगन भी हैं। उसका जयकारा भी लगा रहे हैं। कारपोरेट को ऐसा एजेंट फिर कहां मिलेगा।
मगर जो यह सब होता हुआ देख रहे हैं, वह कैसे चुप हो सकते हैं। इसलिए लड़ रहे हैं।
कबीर दास कह गये हैं-
सुखिया सब संसार है, खाये और सोये।
दुखिया दास कबीर है, जागे और रोये।
-नम्रता जोशी
उत्तर प्रदेश की पृष्ठभूमि पर बनी फिल्म ‘मैडम चीफ मिनिस्टर’ को अगर कोई सामान्य परिस्थितियों में उत्तर प्रदेश के ही एक मल्टीप्लेक्स में देखे, जैसा कि मैं देख रही थी, तो शायद एक समानांतर नैरेटिव को बुन डाले।
वैश्विक कोरोना महामारी और उसके कारण लगने वाले लॉकडाउन ने हमें कई तरह से प्रभावित किया है जिनमें से एक है तारीखों को लेकर हमारे दिमाग में अत्याधिक सजगता का होना। मार्च, 2020 में मेरे लिए जो अत्यधिक महत्वपूर्ण तारीख थी, वह थी शुक्रवार 13 मार्च, 2020। सन 2020 में वह अंतिम दिन था जब मैं किसी मल्टीप्लेक्स में गई थी। मैं उस दिन होमी अदजानिया की फिल्म ‘अंग्रेजी मीडियम’ देखने गई थी। और मेरे जहन में कहीं कोई ख्याल भी नहीं था कि अति प्रतिभावान कलाकार इरफान खान की यह वह अंतिम फिल्म होगी जिसे मैं बड़े पर्दे पर देखूंगी और इसके बाद मेरे आगे एक सूखा बंजर महीना होगा जब मुझे थिएटर के इस अंधियारे में मद्धिम और तेज होती रोशनी में पर्दे पर चलते-फिरते चित्रों को समोसे और कॉफी के साथ आनंद लेते हुए दोबारा देखने का मौका नहीं मिलेगा।
मुझे याद भी नहीं पड़ रहा है कि अतीत में मैं कभी सिनेमाघर से एक लंबे समय तक दूर रहने के लिए इस तरह से बाध्य हुई थी। जब फिल्में मेरे लिए बतौर पत्रकार और एक समालोचक के, रोटी कमाने का जरिया बनी, उससे भी पहले से हर हफ्ते में एक फिल्म तो तय ही थी। फिल्मों से मेरे संबंधों के बीच में कभी बोर्ड परीक्षाओं जैसी महत्वपूर्ण और डरावनी चीज भी नहीं आ सकी। यहां तक कि स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म की बढ़ती पकड़ भी मुझे बड़े पर्दे के प्रति मेरी प्रतिबद्धता से डिगा नहीं सकी।
लेकिन जैसे-जैसे जुदाई के महीने बढ़ने लगे, वैसे-वैसे पर्दे की गैरमौजूदगी और खालीपन को भरने की कोशिशें बढ़ने लगीं। जिंदगी ने ओटीटी की पूर्वानुमानित दिशा की ओर रुख किया। अगर ‘गु लाबो-सिताबो’ और ‘शकुंतला देवी’ फिल्मों ने ओटीटी को अपना घर बनाने का निश्चय किया तो मुझे भी उनका दरवाजा खटखटाना ही था। सितंबर में कहीं जब टोरंटो अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोह ऑनलाइन चल रहा था तो शिफ्ट 72 नाम के एक नए जीव ने मुझे अपनी तरफ आकर्षित किया। ऑनलाइन वीडियो स्ट्रीमिंग फ्लेटफॉर्म ने मुझे अपनी गिरफ्त में धर्मशाला इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल (डीआईएफएफ) के प्रथम ऑनलाइन संस्करण के बादसे जकड़े रखा। अचानक से मुझे फिल्मों की यादों ने सताना बंदकर दिया।
मैंने हाल में ही वर्जुअल माध्यम से फिल्मों को देखने का और मार्केट में सबसे मिलने-जुलने का इतना असल जैसा अनुभव किया जैसा कि एनएफडीसी फिल्म बाजार में संभव होता। और जब इन गतिविधियों का समय समाप्त होने लगता है तो मैं सन डांस फिल्म समारोह में उपस्थित होने के लिए तैयार हो जाती हूं। यह फिल्म समारोह वादा करता है कि वह हमारे निजी स्क्रीन पर सामुदायिक रूप से देखने के अनुभव को दोबारा पैदा कर देगा, चाहे हम उन्हें दुनिया अलग-अलग कोनों से अलग- अलग समय पर देख रहे हों।
सुनने में चाहे यह बहुत खराब लगे लेकिन फिल्मों से हमारे प्रेम में वैश्विक महामारी आड़े नहीं आई। बेशक हम अपनी रोज की जगहों पर रोज के तरीकों से नहीं मिल सके लेकिन हमारी मुलाकात और बहुत सी जगहों पर होती रही, जैसे कि– विमियो, सिनानडो, फेस्टिवल स्कोप...। हां, यह इतना रोचक नहीं है जितना कि बाहर जाना, सफर करना, फिल्मों को ढूंढना होता है। लेकिन अगर सारी दुनिया की फिल्में स्वयं ही सारे जहान से चलकर आपके लिविंग रूम में आ जाएं तो कौन शिकायत करेगा।
इस दौरान हाल के व्यक्तिगत इतिहास में फिल्मों को लेकर कोई बड़ी घटना ऐसे सरकती रही जैसे कोई धागा हो। करीब- करीब नौ माह बाद मैंने 10 दिसंबर, 2020 को बड़े पर्दे पर एक फिल्म देखी- दीपा मेहता की ‘फनी बॉय’। यह मैंने ओपन एयर स्क्रीनिंग में सोशल डिस्टेन्सिंग के सारे नियमों का पालन करते हुए देखी। 20 दिसंबर, 2020 को मैंने डरते-डरते मल्टीप्लेक्स में कदम रखा लेकिन किसी फिल्म को देखने के लिए नहीं बल्कि सरमद की फिल्म ‘जिंदगी तमाशा’ पर हुए एक पैनल डिस्कशन में हिस्सा लेने के लिए। इस फिल्म को पाकिस्तान की ओर से ऑस्कर के लिए आधिकारिक तौर पर भेजा गया था। और फिर अचानक से शुक्रवार 22 जनवरी, 2021 को, यानी पूरे दस माह नौ दिन बाद, मैंने घर के पास के ही एक मल्टीप्लेक्स में सुभाष कपूर की फिल्म ‘मैडम चीफ मिनिस्टर’ देखने का मन बनाया। ऐसा नहीं था कि मैं इस फिल्म को देखने के लिए मरी जा रही थी लेकिन उस समय मैंने ऐसा महसूस किया कि कुछ सीमाओं को लांघने की जरूरत होती है और कुछ बाधाओं पर– चाहे शारीरिक हों या मानसिक– विजय पाना आवश्यक होता है। यह पूर्णरूप से मेरा व्यक्तिगत निर्णय था और यह कदम मैंने सामान्य जीवन की ओर बहुत सतर्कता के साथ मास्क और सेनिटाइजर से लैस होकर उठाया था। यह एक ऐसा निर्णय जो शायद कोई और लेना पसंदन करे। यहां तक कि मैं भी शायद थोड़े समय के लिए दोबारा ऐसा फैसला न लूं। इन दिनों हम सभी के लिए दिमाग एक ऐसी उलझन बन गया है जिसके लिए फिल्में महत्वपूर्ण हैं भी और नहीं भी।
एक बिल्कुल चकाचक चमकती लेकिन खाली लॉबी, सुनसान पड़े स्नैक्स काउंटर, जोश से खाली द्वारपाल और दर्शकों में अपने सिवाय दो और लोग। यह वैश्विक महामारी का एक और नजारा था जो भविष्य की सूचना दे रहा था। सेनिटाइजर के लगातार छिड़काव के बीच सुनीता तोमर जो स्क्रीन पर भारत की तरफ से तंबाकू विरोधी अभियान का चेहरा हैं, से स्क्रीन पर दोबारा मुलाकात एक अजीब तरह से आश्वस्त करती है जबकि हमें पता है कि वह 2015 में गुजर चुकी हैं।
उत्तर प्रदेश की पृष्ठभूमि पर बनी फिल्म ‘मैडम चीफ मिनिस्टर’ को अगर कोई सामान्य परिस्थितियों में उत्तर प्रदेश के ही एक मल्टीप्लेक्स में देखे, जैसा कि मैं देख रही थी, तो शायद एक समानांतर नैरेटिव को बुन डाले, विशेषकर तब जब इसका मुख्य किरदार उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती से प्रेरित हो। छोटे बालों वाली और चतुराई से खेल खेलने वाली ऋचा चड्ढा को क्या अपने होम ग्राउंड में स्वीकृति के स्वर सुनाई देते या विरोधके नारे? इस फिल्म में शायद वह एक अकेला महत्वपूर्ण क्षण है जब राज्य के दो पीड़ित समुदाय– दलित और मुस्लिम– स्टेज पर एक-दूसरे के साथ हाथ मिलाते हैं। इस क्षण को लेकर जनता से कैसी प्रतिध्वनियां सुनाई पड़तीं?
यह फिल्म जब जाहिर तौर पर जाति विभाजनों के मुद्दे पर बुरी तरह लड़खड़ा रही थी और धर्म तथा जेंडर की राजनीति पर बहुत ही खराब मिले-जुले से संदेश दे रही थी, तब मैं हालात को लेकर केवल अंदाजा लगा सकती थी कि किस तरह से जाति, धर्म और जेंडर का मुखौटा लगाकर राजनीतिक ताकत के भूखे लोग उसे पाने के लिए कैसे-कैसे खेल खेलते हैं। वैसे, इस फिल्म ने हमें इसकी मात्र सतही तस्वीर दिखाई है। क्या यह हमने बहुत बार पहले नहीं देखा है? (navjivanindia.com)
बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर आज दो बादल छाए हुए लगते हैं। एक तो सरकारों का बनाया हुआ और दूसरा अदालत का! उत्तरप्रदेश और मध्यप्रदेश की पुलिस ने उन छह पत्रकारों के खिलाफ रपट लिख ली है, जिन पर देशद्रोह, सांप्रदायिकता, आपसी वैमनस्य और अशांति भडक़ाने के आरोप हैं। इन आरोपों का कारण क्या है ? कारण है, 26 जनवरी के दिन उनकी टिप्पणियाँ, टीवी के पर्दों पर या ट्विटर पर! इन पत्रकारों पर आरोप है कि इन्होंने दिल्ली पुलिस पर दोष मढ़ दिया कि उसने एक किसान की गोली मारकर हत्या कर दी जबकि वह ट्रेक्टर लुढक़ने के कारण मरा था। लेकिन आरोप लगानेवाले यह क्यों भूल गए कि उन्हें जैसे ही मालूम पड़ा कि वह किसान ट्रैक्टर लुढक़ने की वजह से मरा है, पत्रकारों ने अपने बयान को सुधार लिया। इसी प्रकार उन पर यह आरोप लगाना उचित नहीं है कि उन्हीं के उक्त दुष्प्रचार के कारण भडक़े हुए किसान लाल किले पर चढ़ गए और उन्होंने अपना झंडा वहाँ फहरा दिया। पत्रकारों की टिप्पणियों के पहले ही किसान लाल किले पर पहुँच चुके थे। जऱा यह भी सोचिए कि इतना बड़ा दुस्साहसपूर्ण षडय़ंत्र क्या इतने आनन-फानन रचा जा सकता है?
जिन पत्रकारों के विरुद्ध पुलिस ने रपट लिखवाई है, उन्हें देशद्रोही या विघटनकारी आदि कहना तो एक फूहड़ मज़ाक है। उनमें से कई तो अत्यंत प्रतिष्ठित और प्रामाणिक हैं, हमारे नेताओं से भी कहीं ज्यादा। इसी प्रकार सर्वोच्च न्यायालय का उसके फैसलों से कुछ असहमत होनेवाले और कुछ व्यंग्यकारों से नाराज़ होना भी मुझे ठीक नहीं लगता। हमारे न्यायाधीशों की बुद्धिमत्ता और निष्पक्षता विलक्षण और अत्यंत आदरणीय है लेकिन उनके फैसले एकदम सही हों, यह जरुरी नहीं हैं। यदि ऐसा ही होता तो ऊँची अदालतें अपनी नीची अदालतों के कई फैसलों को रद्द क्यों करती हैं और सर्वोच्च न्यायालय अपने ही फैसलों पर पुनर्विचार क्यों करता है ? कई फैसलों को देखकर मुझे खुद लगता रहा है कि हमारे जज अंग्रेज का बनाया मूल कानून तो बहुत अच्छा जानते हैं लेकिन भारत में न्याय क्या होता है, यह गांव का एक बेपढ़ा-लिखा सरपंच ज्यादा अच्छा बता देता है। इसके अलावा हमारे न्यायाधीशों को यह भी नहीं भूलना चाहिए कि उनके हर फैसले को सरकार और जनता सदा सिर झुकाकर स्वीकार करती है। वह अमेरिकी राष्ट्रपति फ्रेंकलिन रूज़वेल्ट (1933-45) की तरह अपनी सुप्रीम कोर्ट को यह नहीं कहती कि यह आपका फैसला है, अब आप ही इसे लागू करें। इसका अर्थ यह कदापि नहीं कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर देश में अराजकता फैलाने और अदालत का अपमान करने की आजादी दे देनी चाहिए। हमारी अदालतों और नेताओं को कबीर के इस दोहे को हीरे के हार में जड़ाकर अपने गले में लटकाए रखना चाहिए:-
निंदक नियरे राखिए, आंगन कुटी छबाय।
बिन पानी साबुन बिना, निर्मल करे सुभाय।।
(नया इंडिया की अनुमति से)
-गिरीश मालवीय
कल एक महत्वपूर्ण खबर दब गई... दरअसल कल मध्यप्रदेश की बालाघाट पुलिस ने बूचडख़ाने में ले जाने के लिए गाय-बैलों की तस्करी कर रहे कुछ लोगों के खिलाफ केस दर्ज किया विवेचना में पता लगा कि इनमें बीजेपी की छात्र इकाई भारतीय जनता युवा मोर्चा (क्चछ्वङ्घरू) के स्थानीय नेता भी शामिल हैं।
मामले की जाँच कर रहे पुलिस अधिकारी ने कहा, कि ‘मुख्य आरोपी मनोज और अरविंद गायों और अन्य जानवरों की मौबाजार (बालाघाट में पशुबाजार) से खरीदी करते थे। बाद में ये चरवाहों की मदद से मवेशियों को महाराष्ट्र सीमा पर मौजूद बोदालकासा गांव में ले जाते थे। यहां से एक व्यापारी पशुओं को महाराष्ट्र के बूचडख़ानों में भेजता था।’
बालाघाट पुलिस के एसपी अभिषेक तिवारी ने कहा, ‘हम मामले की जांच कर रहे हैं। यह गायों की तस्करी का संगठित गिरोह है। पुलिस आरोपियों को पकडऩे की कोशिश में है।’ मनोज परधी भाजयुमो का एक महासचिव बताया जाता है।
शायद आपको याद हो कि मशहूर पत्रकार निरंजन टाकले ने लगभग दो साल पहले अनेक पत्रकारों के सामने अपने एक उद्बोधन में यह खुलासा किया था कि संघ से जुड़े बजरंग दल के लोगों द्वारा चलाया गया जबरन वसूली नेटवर्क पशु व्यापारियों से पैसे कैसे वसूलता है !
इस सच्चाई का पता लगाने के लिए, उन्होंने खुद को लगभग 3 महीने तक रफीक कुरैशी नाम के एक मुस्लिम पशु व्यापारी के रूप में पेश किया .....ओर स्वंय इस नेटवर्क का हिस्सा बनकर राजस्थान और गुजरात के जानवर मंडी से मवेशियों को लाने ले जाने में शामिल रहे।
इस तीन महीनों के दौरान उन्होंने यह देखा कि बजरंग दल ट्रकों को रोककर जबरन वसूली में लगा है। अगर गाय का ट्रक लेकर पार करना है, तो साढ़े चौदह हजार से पंद्रह हजार तक देना होता है। भैंस का ट्रक पार करने के लिए साढ़े छह हजार और पारों के लिए पांच हजार तक की रकम देनी पड़ती है।।
निरंजन टाकले ने यह भी खुलासा किया कि जैसे बजरंग दल के नेता और उनके लोग अपनी इस उगाही को कायम रखने के लिए बीच-बीच में किसी को भी मार देते हैं, ताकि इस व्यापार पर उनका कब्जा बना रहे लोगों में डर बना रहे और उनका कारोबार चलता रहे।
यह है इन तथाकथित गौसेवकों की सच्चाई.....
-रमेश अनुपम
पूरे रास्ते वृक्षों की अटूट श्रृंखला, जंगली बेल और लताएं, भांति-भांति के विहंगमों का अविरल कलरव, निर्जन पथ, बैलों की गले में बंधी हुई घंटियों की सुमधुर ध्वनि, बाहें पसारे विशाल पर्वत श्रेणियां, अनंत निरभ्र आकाश और हरीतिमा की चादर ओढ़े शस्य श्यामला धरती किसी भी मनुष्य के ह्रदय के तारों को झंकृत कर सकती थी। किशोर नरेन्द्र भी अपने ह्रदय में कुछ ऐसा ही अनुभव कर रहे थे। नरेन्द्र के ह्रदय के तार भी प्रकृति की सुषमा को देखकर झंकृत हो उठे थे।
रायपुर में नरेन्द्रनाथ दत्त ( स्वामी विवेकानंद) की रायपुर यात्रा की चर्चा से पहले रायपुर नगर की भी थोड़ी चर्चा कर लेना मुनासिब होगा। रायपुर एक प्राचीन नगर है। ‘ The Imperial Gazetteer of India vol-XXI ( New Ed, 1908 ) P.60 में उल्लेखित कथन पर विश्वास करें तो रायपुर नगर का अस्तित्व नवमीं शताब्दी से है। अर्थात् आज से ग्यारह सौ वर्ष पहले से रायपुर एक नगर के रूप में अपनी पहचान बना चुका था। लेकिन तब वह रायपुर के नाम से नहीं किसी और नाम से जाना जाता था। कहा जाता है कि पंद्रहवीं शताब्दी में इस शहर का नाम रायपुर रखा गया।
अंग्रेज विद्वान D.R Leckie द्वारा सन् 1790 में लिखित सुप्रसिध्द ग्रथ 'Journal of a route to Nagpur by way of Cuttac , Burrasamber and Southern Burjare Ghaut in the year 1790’ (1880 ) श्च.180 के पृष्ठ का अवलोकन करें तो उस समय रायपुर प्राचीन नगर होने के साथ-साथ संपन्न तथा व्यावसायिक केन्द्र के रूप में संपूर्ण मध्य भारत में प्रसिध्द हो चुका था। अनेक विदेशी विद्वानों ने भी अपने-अपने ग्रंथ में इस प्राचीन नगर के वैभव का अपने-अपने तरीके से वर्णन किया है। 'Madhya Pradesh District Gazetteer : Raipur’ ( Bhopal, 1978 ) P.397
छत्तीसगढ़ पूर्व में हैहयवंशी कल्चुरी राजाओं के अधीन रहा है। सन् 1758 में कल्चुरी राजाओं को पराजित कर मराठा शासकों द्वारा छत्तीसगढ़ पर अपना आधिपत्य स्थापित कर लिया गया। सन् 1817-19 में इतिहास ने पुन: एक बार करवट ली जिसके चलते मराठों को परास्त कर अंग्रेजों ने छत्तीसगढ़ को अपने आधिपत्य में ले लिया।
कैप्टन एडमंड सन् 1818 में छत्तीसगढ़ के प्रथम अधीक्षक नियुक्त किए गए। उनके निधन के उपरांत उनके स्थान पर कैप्टन एगेन्यु छत्तीसगढ़ के अधीक्षक बनाए गए। कैप्टन एगेन्यु ने सन् 1824-25 के मध्य रतनपुर के स्थान पर रायपुर को अपना हेडक्वार्टर बनाया। एगेन्यु ने जयपुर की तरह ही रायपुर को भी सुव्यवस्थित एवं सुंदर बनाने का कार्य किया।
उस समय रायपुर घने जंगलों से आच्छादित एक ऐसा दुर्गम नगर माना जाता था जहां जाने के लिए अंग्रेज अधिकारी एवं कर्मचारी के मन में भय का संचार होता था। सन् 1861 में Central का पुर्नगठन किया गया। सन् 1862 में Central Provinces के नए चीफ कमिश्नर U Sir Richard Temple का रायपुर आगमन हुआ। सन् 1870 तक रायपुर शहर की पहचान छत्तीसगढ़ सहित समग्र मध्य देश में एक प्रमुख शहर के रूप में होने लगी।
सन् 1877 तक रायपुर आने-जाने के लिए कोई सुविधाजनक मार्ग नहीं था, न हीं सडक़ मार्ग और न ही रेल मार्ग। उस समय कोलकाता से आने वाले यात्री इलाहाबाद, जबलपुर होते हुए नागपुर पहुंचते थे फिर नागपुर से बैलगाडिय़ों से उन्हें रायपुर तक की यात्रा करनी पड़ती थी।
इस यात्रा में कई दिन लग जाते थे। नागपुर से रायपुर तक की यात्रा उस समय 183 मील की होती थी। नागपुर से भंडारा तक 40 मील का रास्ता पक्का रास्ता था। भंडारा से रायपुर तक की यात्रा जो लगभग 143 मील का रास्ता था, कच्चे मार्ग से करना पड़ता था। भंडारा के पास बहने वाली नदी वेनगंगा पर उस समय तक अंग्रेजों द्वारा पुल का निर्माण किया जा चुका था।
हमारे इस प्रथम कड़ी के नायक, महानायक, उन्नीसवीं शताब्दी के भारत के तेजस्वी सूर्य स्वामी विवेकानंद अर्थात् किशोर नरेन्द्रनाथ दत्त का आगमन भी इन्हीं दिनों रायपुर में संभव हुआ। सन् 1877 में चौदह वर्षीय किशोर नरेन्द्र अपने पिता विश्वनाथ दत्त, मां श्रीमती भुवनेश्वरी देवी, दस वर्षीया छोटी बहन जोगेन बाला तथा आठ वर्षीय भाई महेन्द्रनाथ दत्त के साथ पहली बार ट्रेन से इलाहाबाद, जबलपुर होते हुए नागपुर आए। नागपुर से बैलगाडिय़ों में बैठकर नरेन्द्रनाथ दत्त अपने पूरे परिवार के साथ अनेक दिनों की यात्राएं कर रायपुर पहुंचे थे।
एक अन्य बैलगाड़ी पर रायपुर के सुप्रसिध्द वकील तथा विश्वनाथ दत्त के मित्र भूतनाथ डे, उनकी धर्मपत्नी श्रीमती एलोकेसी डे तथा उनका छ: माह का पुत्र हरिनाथ डे, जो कालांतर में विश्व के महानतम जीनियस के रूप में विख्यात हुए सवार थे। अन्य बैलगाडिय़ों पर खाने-पीने का सामान, नौकर-चाकर तथा रसोइया सवार थे। जंगली जानवरों से सुरक्षा और चोर लुटेरों के डर से एक बंदूकधारी सिपाही भी सुरक्षा के लिए उनके साथ था। इस तरह वे दस-पंद्रह बैलगाडिय़ों के कारवां के साथ नागपुर से रायपुर के लिए निकल पड़े।
बैलगाडिय़ों का यह कारवां शाम ढलते-ढलते किसी पूर्व निर्धारित गांव में थम जाता। वहां रसोइया भोजन बनाते, सब लोग भोजन कर उसी गांव में विश्राम करते, तत्पश्चात् सुबह स्नान आदि के पश्चात् पुन: यात्रा प्रारंभ हो जाती। दोपहर में फिर किसी गांव में रूककर भोजन और विश्राम के पश्चात् यह कारवां आगे की यात्रा में निकल पड़ता और सूर्यास्त होने के पश्चात् फिर किसी गांव में ठहर जाता।
कोलकाता के मेट्रोपोलिटन स्कूल के तीसरी कक्षा में पढऩे वाले छात्र नरेन्द्र के लिए जो उस समय उदर रोग से पीडि़त थे और जिसका ज्यादातर वक्त बिस्तर पर लेटे हुए बीत जाता था, यह यात्रा एक अलौकिक अनुभव से भरी हुई यात्रा सिद्ध हुई। 14 वर्षीय नरेन्द्र अपने पिता, मां, भाई-बहन के साथ पहली बार इतनी लम्बी यात्रा पर निकले थे।
पूरे रास्ते वृक्षों की अटूट श्रृंखला, जंगली बेल और लताएं, भांति-भांति के विहंगमों का अविरल कलरव, निर्जन पथ, बैलों की गले में बंधी हुई घंटियों की सुमधुर ध्वनि, बाहें पसारे विशाल पर्वत श्रेणियां, अनंत निरभ्र आकाश और हरीतिमा की चादर ओढ़े शस्य श्यामला धरती किसी भी मनुष्य के ह्रदय के तारों को झंकृत कर सकती थी। किशोर नरेन्द्र भी अपने ह्रदय में कुछ ऐसा ही अनुभव कर रहे थे। नरेन्द्र के ह्रदय के तार भी प्रकृति की सुषमा को देखकर झंकृत हो उठे थे।
(अगली किस्त कल)
-सुशोभित
गांधीजी के निजी सचिव प्यारेलाल ने लिखा है- 30 जनवरी को जब गांधीजी की हत्या हुई तो खबर सुनते ही नेहरू और पटेल दौड़े चले आए। नेहरूजी गांधीजी की चादर में मुंह छुपाकर बच्चों की तरह रोने लगे। सरदार पटेल, जो अभी चंद मिनटों पहले तक गांधीजी से बतिया रहे थे, पत्थर की मूरत की तरह अडोल बैठे रहे।
लॉर्ड माउंटबेटन पहुंचे। उन्होंने प्रधानमंत्री और गृहमंत्री से कहा, ‘गांधीजी ने अपनी अंतिम बातचीत में मुझसे कहा था, जवाहर और सरदार को समझाइयेगा कि उन दोनों की दोस्ती आज देश के लिए सबसे ज़रूरी है। वो तो अब मेरी सुनते नहीं, शायद आपका कहा मान लें।’ यह सुनते ही नेहरू और पटेल एक-दूसरे के गले से लिपटकर रो पड़े। कुछ समय बाद किसी ने कहा-‘प्रधानमंत्री जी, हमें अंतिम यात्रा की तैयारियां करना है। कार्यक्रम कैसे होगा, आप निर्देश दें।’
नेहरूजी ने जैसे कुछ सुना ही नहीं। फिर किंचित प्रकृतिस्थ हुए तो चंद पल सोचकर बोले-‘जरा रुको, बापू से पूछकर आता हूं!’ और फिर, भूल से यह क्या कह गए, सोचते ही अवाक हो गए।
प्यारेलाल ने अपनी पुस्तक ‘पूर्णाहुति’ के दूसरे खण्ड में इसका वृत्तांत देते हुए लिखा है-‘बीते तीस-पैंतीस सालों में हम सब अपनी तमाम दुविधाओं और समस्याओं और प्रश्नों को बापू के पास ले जाने के इतने आदी हो चुके थे कि हम भूल ही गए कि अब ऐसा कभी हो नहीं सकेगा।’
उस रात राष्ट्र के नाम अपने संदेश में नेहरूजी ने रूंधे गले से ठीक ही कहा था- ‘हमारे जीवन से रौशनी चली गई!’
बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक
जो किसान आंदोलन 25 जनवरी तक भारतीय लोकतंत्र की शान बढ़ रहा था, वही अब दुख और शर्म का कारण बन गया है। हमारे राजनीतिक नेताओं के बौद्धिक और नैतिक दिवालिएपन को इस आंदोलन ने उजागर कर दिया है। 26 जनवरी को जो हुआ, सो हुआ लेकिन उसके बाद सरकार को किसान नेताओं से दुबारा संवाद शुरू करना चाहिए था लेकिन उसने किसान नेताओं के विरुद्ध कानूनी कार्रवाई करनी शुरु कर दी। वह यह भूल गई कि कई प्रमुख किसान नेताओं ने सरकारी नेताओं से भी ज्यादा कड़ी भत्र्सना उन उपद्रवियों की की है, जिन्होंने लाल किले पर एक सांप्रदायिक झंडा फहराया और पुलिसवालों के साथ मारपीट की।
सरकार को अपनी बदइंतजामी बिल्कुल नजर नहीं आई। उसके गुप्तचर विभाग और पुलिस को उसने ठीक से मुस्तैद तक नहीं किया, वरना उपद्रवियों की क्या मजाल थी कि वे दिल्ली में घुस आते और लाल किले पर चढ़ जाते ! अब किसान नेताओं के पासपोर्ट जब्त करने में कौनसी तुक है ? पिटाई के डर से हमने पूंजीपतियों और नेताओं को विदेश भागते हुए तो देखा है लेकिन किसानों के बारे में तो ऐसी बात कभी सुनी भी नहीं है।
विरोधी दलों ने भी गजब की मसखरी की है। उन्होंने किसानों के समर्थन में संसद में राष्ट्रपति के अभिभाषण का बहिष्कार कर दिया है। वे सत्ता में होते तो वे तो शायद भिंडरावाला-कांड कर देते। हमारा दब्बू और मरियल विपक्ष इस वक्त चाहता तो सत्ता पक्ष से भी अच्छी भूमिका निभा सकता था। वह किसानों और सरकार के बीच निष्पक्ष मध्यस्थ बन सकता था। किसानों को धरना से हटाकर घर लौटने को कह सकता था और उन्हें विश्वास दिला सकता था कि वह उनकी लड़ाई अब संसद में लड़ेगा लेकिन वह किसानों के चूल्हे पर अपनी रोटियाँ सेंकने पर आमादा है। इसका नतीजा क्या होगा ? अब किसान आंदोलन हमारे हताश राजनीतिक नेताओं के लिए आशा की किरण बनकर उभरेगा। उन्हें बयान देने और फोटो छपाने के मौके मिलेंगे। वे चाहेंगे कि बड़े पैमाने पर हिंसा हो, लोग मरें और सरकार बदनाम हो जाए। अभी ताजा खबर यह है कि किसानों के धरना-स्थलों पर किसानों और स्थानीय ग्रामीणों के बीच जबर्दस्त झड़पें हुई हैं। स्थानीय ग्रामीण अपने रास्ते और काम-काज रुकने पर क्रुद्ध हैं। उन्हें किसानों के खिलाफ कौन उकसा रहा है ? सरकार की जिम्मेदारी है कि वह आगे होकर किसान नेताओं से दुबारा बातचीत शुरु करे। (नया इंडिया की अनुमति से)
-कृष्ण कांत
नोआखली में एक बूढ़ा महात्मा अकेला घूम रहा है. देश पागल हो चुकी भीड़ में तब्दील हो गया है. वह बूढ़ा पागल भीड़ को समझा रहा है. भीड़ में यह नहीं पता है कि कौन किसके खून का प्यासा है लेकिन धरती खून से लाल हो रही है. उस बूढ़े व्यक्ति का जर्जर शरीर अपने को उस खून से लथपथ महसूस कर रहा है. वह पूछ रहा है कि जिन इंसानों के लिए हमने आजादी चाही थी, जिनके लिए सब त्याग दिया था, जिनकी स्वतंत्रता हमारे जीवन का अंतिम लक्ष्य थी, वे पाशविकता के गुलाम कैसे हो गए?
कोई किसी की नहीं सुन रहा है. लोग वहशी हो गए हैं. बूढ़ा महात्मा लाठी लिए पहुंचता है. उन्हें समझाता है. भीड़ ईंट पत्थर और शीशे फेंक रही है. बूढ़ा अचानक भीड़ की तरफ बढ़ा और एकदम सामने आ गया. भीड़ इस साहस से स्तब्ध हो गई. बूढ़े ने कहा, मैं अपने जीवन के अंतिम पड़ाव पर हूं. अगर आप अपने होश-हवास खो बैठे हैं, तो यह देखने के लिए मैं जिंदा नहीं रहना चाहता हूं. भीड़ शांत हो गई.
दिल्ली में ताजपोशी हो रही थी. बूढ़ा अकेले नोआखली की पगडंडियों, गलियों, कूचों, सड़कों पर लोगों से मनुष्य बने रहने की मांग कर रहा था. यह सिलसिला यहीं नहीं रुका.
नोआखली से कलकत्ता, कलकत्ता से बिहार, बिहार से दिल्ली, दिल्ली से पंजाब, पंजाब से दिल्ली... वह महात्मा अकेला बदहवास भाग रहा था. नेहरू, पटेल, माउंटबेटन... सब हथियार डाल चुके थे. महात्मा के जीवन भर के सत्य और अहिंसा के आदर्श इस आग में जला दिए गए थे. जिन्ना दूर से इस धधकती आग में अपना हाथ सेंक रहे थे.
महात्मा अनवरत सफर में था. वह गाड़ी रोककर सड़क पर उतरता, गीता के कुछ श्लोक पढ़ता, ईश्वर से प्रार्थना करता कि प्रभु हमारे देश को बचा लीजिए और फिर आगे बढ़ जाता.
खून खराबे की निराशा के बीच एक उम्मीद की किरण फिर भी थी कि लोगों की आत्मा जाग सकती है. वह महात्मा दिल्ली में हिंसक जानवरों को रोकने के लिए अनशन पर बैठ गया. जो लोग इंसानों का खून बहाने में सबसे आगे थे, अब वे महात्मा के खून के ही प्यासे हो गए. छह हमलों के बाद अंतत: उन्हें सफलता भी मिल गई.
हिंसक और घृणास्पद लोग ऐसे ही कायर होते हैं. एक निहत्थे बूढ़े को मारने के लिए उन्हें भगीरथ प्रयास करना पड़ा. महात्मा का अशक्त और अकेला शरीर मर गया. भारत से लेकर पाकिस्तान तक स्तब्धता छा गई. लेकिन असली चमत्कार उसके बाद हुआ. महात्मा अमर हो गया.
जिस पाकिस्तान का बहाना लेकर महात्मा को मारा गया, वह पाकिस्तान भी रो पड़ा और हिंदुस्तान के पगलाए हिंदू भी. दंगे शांत हो गए. दुनिया एक सुर में बोल पड़ी, यह किसी शरीर की क्षति नहीं है. यह तो मानवता की क्षति है. हत्यारे सुन्न हो गए कि हमने जिसे मारा, वह अमर कैसे हो गया?
हिंसा और घृणा मनुष्य को मानवता की समझ से बहुत दूर कर देती है. इसीलिए महात्मा उनके लिए आज भी अनसुलझी पहेली है. वे अंदर से घृणा करते हैं, बाहर से महात्मा के सामने सिर झुकाए खड़े रहते हैं. महात्मा पहले की तरह बस मुस्कराता रहता है.
टैगोर का वह महात्मा जो अपने आखिरी दिनों में इस दुनिया की हिंसा से निराश, बदहवास, विक्षिप्त और अकेला था, मौत के बाद पूरी दुनिया का महात्मा हो गया. जब भारत के लोग सत्ता का स्वागत कर रहे थे, उस महात्मा ने अकेलापन चुना था और नोआखली से दिल्ली तक भागकर मनुष्यता को बचा लिया था.
अब वह हमारा, हमारे देश का महात्मा है, वह हमारा राष्ट्रपिता है, हम उससे हर दिन सीखते हैं और अपनी जिंदगी को छोटा महसूस करते हैं. वह हमारा प्यारा बापू है, हमारे भारत का विश्वपुरुष महात्मा गांधी.
गांधी की हत्या पर मिठाइयां बांटने वाले नरपिशाच आज दुनिया में कहीं भी चले जाएं, गांधी वहां पहले से मौजूद रहता है, हिंसा के नायकों की छाती पर मूंग दलते हुए भारत के प्रतिनिधि पुरुष के रूप में.
गांधी मानवता का नाम है. गांधी दुनिया के लिए दुख उठाने का नाम है. गांधी त्याग का नाम है, गांधी प्रेम का नाम है, गांधी एकता और अखंडता का नाम है. गांधी मानव जीवन के मूल्यों का नाम है.
आज जो इन मूल्यों पर हमला कर रहे हैं, वे एक दिन फिर से हार जाएंगे. गांधी इन मूल्यों का नाम है, मानवता जब तक जिंदा रहेगी, गांधी जिंदा रहेगा. हत्याओं के आकांक्षियों को यह दुनिया अब भी पशुओं की श्रेणी में रखती है, आगे भी रखेगी. गांधी मानवता का महानायक है, वह फिर जीत जाएगा.
-पंकज मुकाती
आज महात्मा की शहादत का दिन है। आज ही के दिन नाथूराम गोडसे ने अहिंसा के पुजारी की गोली मारकर हत्या कर दी। ये हमारी मानसिकता पर धब्बे जैसा है, और हमेशा रहेगा। ये भी एक दुर्योग है कि इंदौर भी आज के दिन ऐसे ही एक धब्बे के लिए चर्चा में है। इंदौर नगर निगम की मलबा लादने वाली गाडी में शहर के बेसहारा बुजुर्गों को जबरिया पटककर शहरी सीमा से बाहर छोड़ने का मामला उजागर हुआ है। देश के सबसे स्वच्छ शहर पर ये एक धब्बा हमेशा रहेगा। गोडसे जैसी सोच हमेशा समाज में ज़िंदा रही है, और रहेगी। बापू की अहिंसा की सोच को हिंसा से मिटाने की कोशिश की तरह ही है इंदौर की स्वच्छता की सोच को ऐसे लांछन से मिटाने की कोशिश।
इंदौर की स्वच्छता के पीछे इंदौर की जनता है। उसे इसका पूरा श्रेय है। आज सुबह से लोग पूछ रहे हैं-इंदौर में ये क्या हो रहा है। आखिर इन सवालों के जवाब कौन देगा ? क्या दो अदने से हुकुम बजाने वाले कर्मचारियों की बर्खास्तगी से ये जवाब मिल जाएगा? आखिर इन्हे भी किसी ने आदेश दिया होगा? या वे बिना किसी के आदेश के नगर निगम की कई टन वजनी बिना रजिस्ट्रेशन वाली गाडी निकालकर चल दिए। बुजुर्गों को उठाकर ठिकाने लगाने। यदि ऐसा है तो ये तो
और भी बड़ी नाकामी है इस सिस्टम की। ऐसा सिस्टम जिसका कोई रखवाला ही नहीं।
वीडियो वायरल होते ही हमेशा की तरह राजनीति सक्रिय हुई। मुख्यमंत्री ने गुस्सा जताया। निगम और जिला प्रशासन ने कर दी कार्रवाई। दो अदने कर्मचारी और उनके उपर के एक उप आयुक्त पर। इंदौर में ऐसी ही कार्रवाइयां हो रही है। पिछले एक साल में किसी बड़े जिम्मेदार पर कोई कार्रवाई नहीं हुई। चाहे कोरोना काल में गाड़ियों की अनुमति का मामला हो या महाराजा यशवंत राव चिकित्सालय में लापरवाही का।
गाड़ियों वाले मामले में तोमर नपे तो अस्पताल में डॉक्टर जड़िया को इतना लापरवाह बताया कि वे रो पड़े। ऐसी दर्जनों गर्दनें प्रशासन ने अपने दफ्तरों में सजा रखी। जब जैसी जरुरत पड़ी एक गर्दन आगे खिसका दी। आखिर अच्छे की शाबाशी लेने वाले, ऐसे मामलों में अपना गुनाह कबूलने में पीछे क्यों ? सरकार भी इन पर ही क्यों मेहरबान? क्या इंदौर को शर्मसार करने वाली इस घटना पर कोई बड़ी कार्रवाई होगी ? आखिर मुख्यमंत्री के सपनों के शहर में भावनाओं पर डाका पड़ा है। (POLITICSWALA.COM)
-पुष्य मित्र
मैं आज के दिन हुई गांधी की हत्या को उनकी शहादत के तौर पर देखता हूं। वे आजादी और बंटवारे के बाद पूरे देश में फैले सांप्रदायिक उन्माद को खत्म करने के लिए शहीद हुए थे। कई इतिहासकारों ने लिखा है कि गांधी की हत्या का समाचार जब पूरे देश में फैलने लगा तो दंगे अपने-आप बंद होने लग गये। उस शहादत ने भले ही वक्ती तौर पर मगर भारत के लोगों के मन में भरे सांप्रदायिक उन्माद को तो खत्म कर ही दिया। उसके बाद लंबे समय तक शांति छायी रही।
दिलचस्प है कि गांधी यह सब जानते थे। उन्हें भरोसा था कि अगर मेरी शहादत इस काम में हो गयी तो शायद लोगों के मन में जड़ जमा चुके नफरत को खत्म किया जा सकता है। 1946 के आखिर में जब वे नोआखली गये तभी से उन्होंने इस बात को कहना शुरू कर दिया था। वे कहते थे कि अगर मुझे मार देने से आपके मन का नफरत खत्म हो सकता है तो मुझे मार दीजिये। फिर आने वाले दिनों में उन्होंने खुद भी इस बात को कई दफा दुहराया। बिहार में भी जहां नोआखली का बदला लेने के लिए भीषण दंगे हुए थे और आखिरी दिनों में दिल्ली प्रवास के दौरान भी, वे बार-बार इस बात को दुहराते रहे।
वे सिर्फ अपने लिए यह बात नहीं कहते थे, बल्कि उनके साथ जो भी लोग थे। सभी से यही कहते। मेरे साथ हो तो तुम्हें बलिदान देने के लिए तैयार रहना पड़ेगा। जब मनुबेन नोआखली आयी तो उनसे भी यही कहा। यह मैं उनके आखिरी संघर्ष के बारे में कह रहा हूं। जो उन्होंने नोआखली से शुरू किया था, फिर बिहार गये, फिर कोलकाता गये और दिल्ली के बिरला हाउस में खत्म किया। उन्होंने शहादत दी और इस जंग को जीत लिया।
यह उस जंग की कहानी है, जो उन्होंने अपने ही देश के लोगों के खिलाफ लड़ी। अगर गांधी के शब्दों में कहें तो उस बुराई के खिलाफ लड़ी जो उनके अपने देश के लोगों को शैतान बना रही थी। वे लोगों के खिलाफ तो लड़ते नहीं थे, वे तो हमेशा बुराईयों के खिलाफ लड़ते थे। पापी से नहीं, पाप से नफरत करो। वे हमेशा कहते थे। इसलिए जहां उन्होंने चंपारण सत्याग्रह से लेकर भारत छोड़ो आंदोलन तक अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ चार-पांच बड़े आंदोलन किये, वहीं उन्होंने अपने देश के लोगों की बुराईयों के खिलाफ भी दो बड़े आंदोलन किये। पहला अस्पृश्यता निवारण अभियान और दूसरा सांप्रदायिकता के खिलाफ नोआखली से दिल्ली तक चला अभियान।
दोनों अभियानों में उनके देश के लोग ही उनके खिलाफ खड़े थे। उनका बार-बार अपमान करते, हमले करते और अंत में हत्या भी कर दी। मगर उन्होंने दोनों आंदोलनों को पूरी इमानदारी से निभाया। अपमान सहते, मार खाते हुए लोगों का हृदय परिवर्तन करने की कोशिश करते रहे।
ये दोनों आंदोलन खास तौर पर हम सब को इस बात के लिए प्रेरित करते हैं कि दुश्मन हमेशा बाहरी नहीं होता, दुश्मन हमारे अंदर भी बैठा होता है, उसके खिलाफ भी लडऩा पड़ता है। और बहुमत हमेशा सही नहीं होता, कई दफा बहुमत भी अराजक, हिंसक और पर-पीडक़ होता है। ऐसे में बहुमत के खिलाफ अकेले भी खड़ा होना पड़ता है। कई दफा गांधी रवींद्रनाथ टैगोर की उन पंक्तियों को गाते ‘एकला चलो रे’ खास तौर पर सांप्रदायिकता के खिलाफ अभियान में जब वे जुटे थे। कट्टर हिंदू भी उनके खिलाफ थे और कट्टर मुसलमान भी। देश सांप्रदायिकता की भीषण आग में जल रहा था, राजनेता आने वाली सत्ता के लिए राजनीति करने में व्यस्त थे और वह बूढ़ा व्यक्ति अकेले इस आग को बुझाने की कोशिश कर रहा था।
उसके इस अभियान का असर पड़ा। नोआखली में बलवा थमा। बिहार के इलाकों में लोगों ने वादा किया कि अब वे ऐसा नहीं करेंगे। और फिर जब आजादी के दिन वे कोलकाता गये तो वहां चमत्कार हुआ। उसे सभी लोग कलकत्ते का चमत्कार ही कहते हैं। गांधी ने मुस्लिम लीग के बड़े नेता सुहारावर्दी को साथ लिया और एक ही घर में रहने लगे। फिर वे लोगों को समझाते, उनसे बातें करते। अचानक दंगे बंद हो गये।
उस वक्त के वायसराय माउंटबेटेन ने लिखा है, बंटवारे की आग में भारत की दोनों सीमाएं जल रही थीं। पंजाब और बंगाल दोनों तरफ से हिंसक खबरें आ रही थीं। जहां पंजाब की तरफ हमने फौजें लगा दी थीं, वहीं बंगाल की तरफ अकेले गांधी थे। पंजाब के इलाके में फैले रक्तपात और हिंसा को हम रोक नहीं पाये। मगर जो काम लाखों लोगों की फौज नहीं कर पायी, उसे एक अकेले गांधी ने कर दिया। बंगाल में नफरत की आंधी थम गयी थी।
फिर गांधी को दिल्ली आना पड़ा। दिल्ली में उन दिनों जब गांधी आते थे तो दलितों की बस्ती में ठहरते थे। मगर सुरक्षा की वजहों से उन्हें बिरला हाउस में ठहराया गया। वहां भी उनपर हमले होते रहे, लोग बहस करते रहे। मगर गांधी ने शहादत का मन बना लिया था, इसलिए वे सुरक्षा बढ़ाने का विरोध करते थे। फिर गांधी की हत्या हो गयी।
दुखद तो यह है कि गांधी की हत्या न बंगाल के लोगों ने की, न बिहार के लोगों ने, न दिल्ली वालों ने। न पाकिस्तान से आय़े किसी शरणार्थी ने। एक शरणार्थी उस साजिश में शामिल जरूर था, मदन लाल पाहवा। मगर हत्यारा वह नहीं था।
गांधी की हत्या एक मराठी व्यक्ति ने की, जिस महाराष्ट्र में उस वक्त कोई सांप्रदायिक दंगा नहीं हो रहा था। नथुराम गोडसे, जो बापू का हत्यारा था, वह मराठा प्राइड का नुमाइंदा था। वह नफरत की उस स्कूल का छात्र था, जो पुणे में लंबे समय से चल रहा था, जिसके मुखिया सावरकर थे।
नफरत के उस स्कूल ने जरूर सोचा होगा कि वे गांधी को खत्म कर देंगे। मगर गांधी की शहादत के बाद सावरकर की वैचारिक मौत हो गयी। अगले 70 सालों तक उसके अनुयायियों को छुपकर छद्म तरीके से अपना अभियान चलाना पड़ा। मगर गांधी और उनके विचार अमर हो गये। आज सावरकर के अनुयायियों को भी गांधी के आगे शीश नबाना पड़ता है। आज हमारा देश एक धार्मिक देश नहीं है, सांप्रदायिकता यहां का विचार नहीं है। धर्मनिरपेक्षता ही यहां का असल सिद्धांत है। यही गांधी की शहादत का हासिल है। इसलिए इसे मैं अनोखी शहादत कहता हूं। और बार-बार सोचता हूं कि गांधी की इस आखिरी जंग से हम सबको सीखने की जरूरत है।
-डॉ राजू पाण्डेय
जीवन में अनेक ऐसे अवसर आए जब गांधी जी को अपना परिचय देने की आवश्यकता पड़ी और हर बार उन्होंने स्वयं की पहचान किसान ही बताई। 1922 में राजद्रोह के मुकद्दमे का सामना कर रहे गांधी अहमदाबाद में एक विशेष अदालत के सामने स्वयं का परिचय एक किसान और बुनकर के रूप में देते हैं। पुनः नवंबर 1929 में अहमदाबाद में नवजीवन ट्रस्ट के लिए दिए गए घोषणापत्र के अनुसार भी गांधी स्वयं को पेशे से किसान और बुनकर बताते हैं। बहुत बाद में सितंबर 1945 में गाँधी जी भंडारकर ओरिएंटल इंस्टीट्यूट ऑफ रिसर्च पूना की यात्रा करते हैं। उनके साथ सरदार वल्लभ भाई पटेल और राजकुमारी अमृत कौर भी हैं। पुनः संस्थान की विजिटर्स बुक में गांधी अपना परिचय एक किसान के रूप में देते हैं।
1904 में दक्षिण अफ्रीका में गांधी जी के एक शाकाहारी मित्र हेनरी पोलाक ने उन्हें रस्किन की अनटो दिस लॉस्ट भेंट की थी। गांधी जी ने रस्किन के विचार- एक श्रम प्रधान जीवन, भूमि में हल चलाने वाले किसान या किसी हस्तशिल्पकार का जीवन ही अनुकरणीय है- को अपना मूल मंत्र बना लिया। फीनिक्स आश्रम (1904) से खेती उनके आश्रमों की जीवन चर्या का एक अंग बन गई। भारत लौटने के बाद अहमदाबाद के सत्याग्रह आश्रम(1915) में फलों और सब्जियों की खेती होती रही। बाद में जब वर्धा से कुछ दूरी पर 1936 में सेवाग्राम आश्रम की स्थापना हुई तब भी गांव और किसान गाँधी जी की प्राथमिकताओं के केंद्र बिंदु रहे। अनेक विद्वानों ने सेवाग्राम आगमन के पश्चात पहली प्रार्थना सभा में ही गांधी जी को यह कहते उद्धृत किया है कि हमारी दृष्टि देहली नहीं देहात की ओर होनी चाहिए। देहात हमारा कल्प वृक्ष है।
गांधी जी की दृष्टि में किसान और हिंदुस्तान एक दूसरे के पर्याय हैं। अहिंसा और निर्भयता किसान का मूल स्वभाव हैं और शोषण तथा दमन के विरुद्ध सत्याग्रह उनका बुनियादी अधिकार। हिन्द स्वराज(1909) में वे लिखते हैं- आपके विचार में हिंदुस्तान से आशय कुछ राजाओं से है किंतु मेरी दृष्टि में हिंदुस्तान का मतलब वे लाखों लाख किसान हैं जिन पर इन राजाओं का और आपका अस्तित्व टिका हुआ है। ------मैं आपसे विश्वासपूर्वक कहता हूं कि खेतों में हमारे किसान आज भी निर्भय होकर सोते हैं। जबकि अंग्रेज और आप वहां सोने के लिए आनाकानी करेंगे।-----किसान किसी की तलवार के बस न तो कभी हुए हैं और न होंगे। वे तलवार चलाना नहीं जानते और न ही वे किसी की तलवार से भय खाते हैं। वे मौत को हमेशा अपना तकिया बनाकर सोने वाली महान प्रजा हैं। उन्होंने मृत्यु का भय छोड़ दिया है। तथ्य यह है कि किसानों ने, प्रजा मंडलों ने अपने और राज्य के कारोबार में सत्याग्रह को काम में लिया है। जब राजा जुल्म करता है तब प्रजा रूठती है। यह सत्याग्रह ही है।(हिन्द स्वराज, नवजीवन, अहमदाबाद,पृष्ठ 58-59)।
आज की हमारी सरकार भले ही किसानों की योग्यता और बुद्धिमत्ता पर संदेह करती हो और किसानों के साथ चर्चा करने वाले अनेक वार्ताकार उन्हें नासमझ के रूप में चित्रित करते हों किंतु गांधी जी उनमें एक आजाद, जाग्रत और प्रबुद्ध नागरिक के दर्शन करते हैं- इन भारतीय किसानों से ज्योंही तुम बातचीत करोगे और वे तुमसे बोलने लगेंगे त्योंही तुम देखोगे कि उनके होंठों से ज्ञान का निर्झर बहता है। तुम देखोगे कि उनके अनगढ़ बाहरी रूप के पीछे आध्यात्मिक अनुभव और ज्ञान का गहरा सरोवर भरा पड़ा है। भारतीय किसान में फूहड़पन के बाहरी आवरण के पीछे युगों पुरानी संस्कृति छिपी पड़ी है। इस बाहरी आवरण को अलग कर दें, उसकी दीर्घकालीन गरीबी और निरक्षरता को हटा दें तो हमें सुसंस्कृत, सभ्य और आजाद नागरिक का एक सुंदर से सुंदर नमूना मिल जाएगा। (हरिजन 28 जनवरी 1939)।
गांधी जी किसानों के शोषण को देश की सबसे गंभीर समस्या मानते थे और उन्होंने बारंबार अपने लेखों और भाषणों में इसे देश की स्वतंत्रता के मार्ग में बाधक बताया है। काशी हिंदू विश्वविद्यालय के उद्घाटन के अवसर पर 6 फरवरी 1916 को दिए गए ऐतिहासिक भाषण में गांधी जी कहते हैं, "जब कहीं मैं कोई आलीशान इमारत खड़ी हुई देखता हूं; तब ही मन में आता है; हाय यह सारा रुपया किसानों से ऐंठा गया है। जब तक हम अपने किसानों को लूटते रहेंगे या औरों को लूटने देंगे, तब तक स्वराज्य की हमारी तड़पन सच्ची नहीं कही जा सकती है. देश का उद्धार किसान ही कर सकता है।'
आज से लगभग 77 वर्ष पूर्व गांधी यह उद्घोष करते हैं कि जमीन उसी की होनी चाहिए जो उस पर खेती करता है न कि किसी जमींदार की। वे किसानों को जमींदारों और पूंजीपतियों के शोषण से बचने के लिए सहकारिता की ओर उन्मुख होने का परामर्श देते हैं। वे खेतिहर मजदूरों के हकों की चर्चा करते हैं। आज तो भूमिहीन किसान और कृषि मजदूर चर्चा से ही बाहर हैं और सहकारिता को खारिज करने की हड़बड़ी सभी को है। गांधी जी के अनुसार- किसानों का- फिर वे भूमिहीन मजदूर हों या मेहनत करने वाले जमीन मालिक हों - स्थान पहला है। उनके परिश्रम से ही पृथ्वी फलप्रसू और समृद्ध हुई है और इसलिए सच कहा जाए तो जमीन उनकी ही है या होनी चाहिए, जमीन से दूर रहने वाले जमींदारों की नहीं। लेकिन अहिंसक पद्धति में मजदूर किसान इन जमींदारों से उनकी जमीन बलपूर्वक नहीं छीन सकता। उसे इस तरह काम करना चाहिए जमींदार के लिए उसका शोषण करना असंभव हो जाए। किसानों में आपस में घनिष्ठ सहकार होना नितांत आवश्यक है। इस हेतु की पूर्ति के लिए जहां वैसी समितियां ना हों वहां वे बनाई जानी चाहिए और जहां हों वहां आवश्यक होने पर उनका पुनर्गठन होना चाहिए। किसान ज्यादातर अनपढ़ हैं। स्कूल जाने की उम्र वालों को और वयस्कों को शिक्षा दी जानी चाहिए। शिक्षा पुरुषों और स्त्रियों दोनों को दी जानी चाहिए। वहीं खेतिहर मजदूरों की मजदूरी इस हद तक बढ़ाई जानी चाहिए कि वे सभ्यजनोचित जीवन की सुविधाएं प्राप्त कर सकें यानी उन्हें संतुलित भोजन और आरोग्य की दृष्टि से जैसा चाहिए वैसे घर और कपड़े मिल सकें।(द बॉम्बे क्रॉनिकल,28-10-1944)
आज हम देख रहे हैं कि केंद्र सरकार द्वारा जबरन थोपे गए तीन कृषि कानूनों के विरुद्ध देश के किसान आंदोलित हैं। किसानों को मिलते जन समर्थन और आंदोलन के देशव्यापी स्वरूप के कारण केंद्र सरकार भयभीत है और वह साम-दाम-दंड-भेद किसी भी विधि से किसानों को परास्त करना चाहती है। गांधी जी ने बहुत पहले ही हमें चेताया था कि यदि किसानों की उपेक्षा और शोषण एवं दमन जारी रहा तो हालात विस्फोटक बन सकते हैं। उन्होंने लिखा- यदि भारतीय समाज को शांतिपूर्ण मार्ग पर सच्ची प्रगति करनी है तो धनिक वर्ग को निश्चित रूप से स्वीकार कर लेना होगा कि किसान के पास भी वैसी ही आत्मा है जैसी उनके पास है और अपनी दौलत के कारण वे गरीब से श्रेष्ठ नहीं हैं। यदि पूंजीपति वर्ग काल का संकेत समझकर संपत्ति के बारे में अपने इस विचार को बदल डाले कि उस पर उनका ईश्वर प्रदत्त अधिकार है तो जो सात लाख घूरे आज गांव कहलाते हैं उन्हें आनन-फानन में शांति, स्वास्थ्य और सुख के धाम बनाया जा सकता है। -------- केवल दो मार्ग हैं जिनमें से हमें अपना चुनाव कर लेना है, एक तो यह कि पूंजीपति अपना अतिरिक्त संग्रह स्वेच्छा से छोड़ दें और उसके परिणाम स्वरूप सब को वास्तविक सुख प्राप्त हो जाए। दूसरा यह कि अगर पूंजीपति समय रहते न चेते तो करोड़ों जाग्रत किंतु अज्ञानी और भूखे रहने वाले लोग देश में ऐसी गड़बड़ मचा दें जिसे एक बलशाली हुकूमत की फौजी ताकत भी नहीं रोक सकती। मैंने यह आशा रखी है कि भारत इस विपत्ति से बचने में सफल होगा।( यंग इंडिया 5 दिसंबर 1929)
गांव की उपेक्षा और किसानों को मालिक से मजदूर बनाकर जबरन शहरी कारखानों की ओर धकेलना आधुनिक विकास प्रक्रिया का एक अनिवार्य हिस्सा है। गांधी जी ने बहुत पहले ही इसे भांप लिया था - "मेरा विश्वास है और मैंने इस बात को असंख्य बार दुहराया है कि भारत अपने चंद शहरों में नहीं बल्कि सात लाख गांव में बसा हुआ है. लेकिन हम भारतवासियों को ख्याल है कि भारत शहरों में ही है और गांव का निर्माण शहरों की जरूरतें पूरी करने के लिए ही हुआ है। हमने कभी यह सोचने की तकलीफ ही नहीं उठाई कि उन गरीबों को पेट भरने जितना अन्न और शरीर ढकने जितना कपड़ा मिलता है या नहीं। (हरिजन 4 अप्रैल 1935)।
गांधी जी ने स्वयं किसान आंदोलनों का सफल नेतृत्व किया। उनकी प्रेरणा से अनेक किसान आंदोलन प्रारंभ हुए और उनके मार्गदर्शन में कामयाब भी हुए। अहिंसा और सत्याग्रह इन किसान आंदोलनों के मूलाधार थे। अप्रैल 1917 का चंपारण सत्याग्रह विशेष रूप से उल्लेखनीय है क्योंकि आज की परिस्थितियों से यह बहुत अधिक समानता दर्शाता है। चंपारण के गरीब किसानों, भूमिहीन कृषकों एवं कृषि मजदूरों को खाद्यान्न के बजाए नकदी फसल लेने के लिए बाध्य किया जाता था। चंपारण के किसानों का शोषण बहुस्तरीय था- बागान मालिक जमींदार और अंग्रेज। नील की खेती के लिए बाध्य करने के तीन क्रूर तरीके और छियालीस प्रकार के अवैध कर – उस समय लगभग 21900 एकड़ कृषि भूमि उससे प्रभावित थी। गाँधी जी के मार्गदर्शन में 2900 गाँवों के तेरह हजार किसानों की समस्याओं को लिपिबद्ध किया गया। गाँधी जी के वैज्ञानिक अहिंसक आंदोलन को विफल करने हेतु तुरकौलिया के ओल्हा कारखाने में अग्निकांड किया गया। किन्तु गाँधी जी संकल्प डिगा नहीं बल्कि दृढ़ ही हुआ। तब बिहार के अंग्रेज डिप्टी गवर्नर एडवर्ड गेट ने चंपारण एग्रेरियन कमिटी का गठन किया। गाँधी जी इसके सदस्य थे। इस समिति की सिफारिशों के आधार पर तीन कठिया प्रथा( प्रति बीघा यानी 20 कट्ठा में 3 कट्ठा में नील की खेती की अनिवार्यता) को समाप्त किया गया, लगान की दरें कम की गईं और कुछ मुआवजा भी किसानों को मिला। यह सत्याग्रह का देश में प्रथम सफल प्रयोग था। उस काल के अंग्रेज शासकों की भांति आज की नवउपनिवेशवादी शक्तियां किसानों की भूमि पर कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग द्वारा अपना नियंत्रण कर उनसे अपनी मनचाही फसलों की खेती कराना चाहती हैं। गांधी जी के अहिंसक आंदोलन को नाकामयाब करने के लिए हिंसा पर आधारित कुटिल प्रयास किए गए थे।26 जनवरी 2021 को भी कुछ वैसे ही षड्यंत्र रचे गए। किंतु गांधी जी ने धैर्य न खोया, आंदोलन का अहिंसक और पारदर्शी स्वरूप बरकरार रहा। सत्ता के सारे षड्यंत्र विफल हुए और किसानों की जीत हुई।
गांधी जी की प्रेरणा से भी अनेक सत्याग्रह आंदोलन हुए। यह आंदोलन किसानों की समस्याओं से संबंधित थे। सरदार पटेल ने इन आंदोलनों का सफल संचालन किया था। खेडा(1918), बोरसद(1922-23) और बारडोली(1928) जैसे आंदोलनों की सफलता का रहस्य गांधी जी के अनुसार किसानों का राजनीतिक उपयोग करने की घातक प्रवृत्ति से पूरी तरह दूरी बनाए रखना था। गांधी जी के अनुसार यह आंदोलन इसलिए सफल रहे क्योंकि ये किसानों की बुनियादी और अनुभूत दैनंदिन समस्याओं पर अपने को केंद्रित रख सके और इनमें राजनीति को प्रवेश का अवसर नहीं मिल पाया। पुनः गांधी जी इन आंदोलनों के अहिंसक स्वरूप पर बल देते हैं। उनके अनुसार जिस दिन किसान अपनी अहिंसक शक्ति को पहचान लेंगे, उस दिन दुनिया की कोई भी ताकत उन्हें रोक नहीं सकती।
(कंस्ट्रक्टिव प्रोग्राम: इट्स मीनिंग एंड प्लेस, नवजीवन, अहमदाबाद, पृष्ठ 22-23)। बारडोली सत्याग्रह के संबंध में गांधी जी ने कहा- 'किसान जो धरती की सेवा करता है वही तो सच्चा पृथ्वीपति है उसे जमींदार या सरकार से क्यों डरना है।'
वर्तमान किसान आंदोलन के नेतृत्व को गांधी जी की यह सीखें बार बार स्मरण करनी चाहिए। आंदोलन का स्वरूप सदैव अहिंसक रहे। आंदोलन पूर्णतः अराजनीतिक हो। आंदोलनकारियों का फोकस पूरी तरह किसानों की समस्याओं पर बना रहे। सबसे बढ़कर किसानों को अपनी अहिंसक शक्ति पर विश्वास हो तो सफलता अवश्य मिलेगी।
किसानों का मार्ग दुरूह है, संघर्ष लंबा चलेगा किंतु गांधी जी ने स्वतन्त्रता पूर्व जो मंत्र दिया था उसका अक्षर अक्षर आज प्रासंगिक है- 'अगर विधानसभाएं किसानों के हितों की रक्षा करने में असमर्थ सिद्ध होती हैं तो किसानों के पास सविनय अवज्ञा और असहयोग का अचूक इलाज तो हमेशा होगा ही। लेकिन ----अंत में अन्याय या दमन से जो चीज प्रजा की रक्षा करती है वह कागजों पर लिखे जाने वाले कानून, वीरता पूर्ण शब्द या जोशीले भाषण नहीं है बल्कि अहिंसक संघटन, अनुशासन और बलिदान से पैदा होने वाली ताकत है।' (द बॉम्बे क्रॉनिकल 12 जनवरी 1945)
एक प्रश्न किसानों की सत्ता में भागीदारी का भी है। इस संबंध में गांधी जी ने अपनी राय बड़ी बेबाकी और साफगोई से रखी थी। प्रसिद्ध किसान नेता एन जी रंगा को किसानों की समस्याओं पर दिए गए विस्तृत साक्षात्कार में गांधी जी ने कहा- मुझे इसमें कोई संदेह नहीं कि यदि हमें लोकतांत्रिक स्वराज्य हासिल हो - और यदि हमने अपनी स्वतंत्रता अहिंसा से पाई हो- तो जरूर ऐसा ही होगा तो उसमें किसानों के पास राजनीतिक सत्ता के साथ हर किस्म की सत्ता होनी चाहिए।(द बॉम्बे क्रॉनिकल 12 जनवरी 1945)। किसानों के हाथों में सत्ता के सूत्र सौंपने की गांधी जी की उत्कट अभिलाषा जीवन के अंत तक बनी रही। 29 जनवरी 1948 को उन्होंने प्रार्थना सभा के दौरान कहा- “मेरा बस चले तो हमारा गवर्नर-जनरल किसान होगा, हमारा बड़ा वजीर किसान होगा, सब कुछ किसान होगा, क्योंकि यहां का राजा किसान है। मुझे बाल्यकाल से एक कविता सिखाई गई - “हे किसान, तू बादशाह है।” किसान भूमि से पैदा न करे तो हम क्या खाएंगे? हिंदुस्तान का वास्तविक राजा तो वही है। लेकिन आज हम उसे ग़ुलाम बनाकर बैठे हैं। आज किसान क्या करे? एमए बने? बीए बने? ऐसा किया तो किसान मिट जाएगा। पीछे वह कुदाली नहीं चलाएगा। किसान प्रधान बने, तो हिंदुस्तान की शक्ल बदल जाएगी। आज जो सड़ा पड़ा है, वह नहीं रहेगा।“
किसानों को स्वतंत्रता के बाद सत्ता में वैसी केंद्रीय भूमिका नहीं मिल पाई जैसी गांधी जी की इच्छा थी। बल्कि सत्ता में किसानों की भागीदारी में उत्तरोत्तर कमी ही आई। जो किसान सत्ता पर काबिज भी हुए उनका व्यवहार किसानों जैसा खालिस और देसी नहीं रहा। सत्ता की चकाचौंध ने उन्हें दिग्भ्रमित किया। वे गांवों और खेती की उपेक्षा करते और शहरों और उद्योगों की वकालत करते नजर आए। सत्ता और अर्थव्यवस्था के विकेंद्रीकरण के महत्व को वे पहचान न पाए। यदि सत्ता में किसानों की भागीदारी नगण्य है और सत्ता का आचरण किसान विरोधी है तो इसके लिए मतदाता के रूप में किसानों का व्यवहार भी कम उत्तरदायी नहीं है। किसान मतदाता के रूप में जातीय, धार्मिक और दलीय प्रतिबद्धता के आधार पर अपना प्रतिनिधि चुनते रहे हैं।
आज गांधी जी का स्मरण और उनका पुनर्पाठ इसलिए भी आवश्यक है क्योंकि किसान आंदोलन को कमजोर करने के लिए जो रणनीति अपनाई जा रही है वह दरअसल गांधी के सपनों के भारत को खंडित करने वाली है। यह घृणा और विभाजन की रणनीति है। जाति-धर्म और संप्रदाय की संकीर्णता को इस किसान आंदोलन ने गौण बना दिया था। किंतु अब इसे धार्मिक पहचान वाले पृथकतावादी आंदोलन के रूप में रिड्यूस किया जा रहा है। विभाजन, संदेह और घृणा के नैरेटिव के अनंत शेड्स देखने में आ रहे हैं। पंजाब-हरियाणा के किसान विरुद्ध सारे देश के किसान का नैरेटिव इस आंदोलन के राष्ट्रीय स्वरूप को महत्वहीन करने के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है। सम्पन्न बड़े किसान विरुद्ध छोटे और मझोले गरीब किसान का विचार इसलिए विमर्श में डाला गया है जिससे इस आंदोलन से बड़ी आशा लगाए करोड़ों किसानों के मन में संदेह पैदा हो। ईमानदार और जिम्मेदार मध्यम वर्ग विरुद्ध अराजक और अनपढ़ किसान की चर्चा इसलिए की जा रही है कि उदारीकरण और निजीकरण के आघातों की पीड़ा भूलकर मध्यम वर्ग किसान विरोध में लग जाए। हिंदू-मुसलमान और हिंदू-सिख तथा राष्ट्रभक्त- देशद्रोही जैसे पुराने विभाजनकारी फॉर्मूले भी धीरे धीरे अपनी जगह बना रहे हैं। देशवासी एक दूसरे को शत्रु मानकर आपस में संघर्ष कर रहे हैं। यह गांधी का भारत तो नहीं है। गांधी अब नहीं हैं किंतु उनकी सीखें हमारे पास हैं। यदि हम अहिंसा, सत्याग्रह,त्याग, बलिदान, प्रेम, करुणा और सहिष्णुता पर अपनी आस्था बनाए रख सके तो देश को हर संकट से मुक्ति दिला सकते हैं।
(रायगढ़, छत्तीसगढ़)
बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक
26 जनवरी की घटनाओं ने सिद्ध किया कि सरकार और किसान दोनों अपनी-अपनी कसौटी पर खरे नहीं उतर पाए लेकिन अब असली सवाल यह है कि आगे क्या किया जाए? किसान लोग 1 फरवरी को संसद पर प्रदर्शन नहीं कर पाएंगे, यह मैंने लाल किले का काला दृश्य देखते ही लिख दिया था लेकिन अब उनके धरने का क्या होगा? किसान नेताओं ने वह प्रदर्शन तो रद्द कर दिया है लेकिन अब वे 30 जनवरी को एक दिन का अनशन रखेंगे। यह तो मैंने किसान नेताओं को पहले ही सुझाया था लेकिन यह एक दिवसीय अनशन इसलिए भी अच्छा है कि लाल किले की घटना पर यह पश्चात्ताप की तरह होगा। यह किसानों के अहिंसक और अपूर्व आंदोलन की छवि को सुधारने में भी मदद करेगा। किसान नेताओं में अब मतभेद उभरने लगे हैं। दो संगठनों ने तो अपने आप को इस आंदोलन से अलग भी कर लिया है।
उनके अलावा कई अन्य किसान नेता भी लाल किले की घटना और तोड़-फोड़ से काफी विचलित हैं। कुछ किसान नेताओं द्वारा उक्त खटकर्मों के लिए सरकार को ही जिम्मेदार ठहराया जा रहा है। कई किसानों ने धरनों से लौटना भी शुरु कर दिया है। इसमें शक नहीं कि इन सब घटनाओं ने सरकार की इज्जत में इज़ाफा कर दिया है, खास तौर से इसलिए कि इतना सब होते हुए भी सरकार ने असाधारण संयम का परिचय दिया। लेकिन इस संयम का दूसरा पहलू ज्यादा गंभीर है। उससे यह उजागर हुआ है कि सरकारी नेताओं को जन-आंदोलनों की पेचीदगियों का अनुभव नहीं है। उन्हें 1922 के चोरीचौरा, 1966 के गोरक्षा और 1992 के बाबरी मस्जिद कांड का ठीक से पता होता तो वे इस प्रदर्शन की अनुमति ही नहीं देते और यदि दी है तो उसके नियंत्रण का पुख्ता इंतजाम भी करते।
खैर, अब सवाल यह है कि किसान और सरकार क्या-क्या करे ? दोनों अपनी-अपनी अकड़ छोड़ें। वैसे सरकार ने तो जरुरत से ज्यादा नरमी दिखाई है। उसने किसानों को पराली जलाने और बिजली-बिल के कानूनों से छूट दे दी और उसके साथ-साथ डेढ़ साल तक तीनों कृषि कानूनों को ताक पर रखने की घोषणा भी कर दी। अब किसान चाहें तो उनमें इतने संशोधन सुझा दें कि उनकी सब चिंताएं दूर हो जाएं।
भारत की कोई सरकार, जो आज कल 30-32 करोड़ वोटों से बनती है, वह अपने 50-60 करोड़ किसानों को नाराज़ करने का खतरा कभी मोल नहीं लेगी। सरकार यह घोषणा भी तुरंत क्यों नहीं करती कि कृषि राज्यों का विषय है। अत: वे ही तय करें कि वे अपने यहाँ इन कानूनों को लागू करेंगे या नहीं करेंगे ? देखें, फिर यह मामला हल होता है या नहीं ?
(नया इंडिया की अनुमति से)
-महेन्द्र सिंह
कई बार सोचता हूँ कि मुझे क्या पागल कुत्ते ने काटा है कि इस देश की सबसे ऊंची और सम्मानजनक कही जानी वाली सरकारी सेवा के दूसरे सबसे ऊंचे पद पर होने के बाद भी किसी भी तरह से छुट्टी लेकर, मैं लगभग दो महीने घर से दूर एक बांस की झोंपड़ी में बिताता हूँ, वहाँ सर्दी, गर्मी, वर्षा में खेत में सारा दिन और काफी बार रात में भी काम करता हूँ जिससे मेरे हाथों में छाले पड़ जाते हैं और पैरों में बिवाइयाँ फटकर खून बहने लगता है। न केवल अपना वरन दस-बारह तक मजदूरों का भी खाना खुद बनाता हूँ ।
इतना सब करने के बावजूद मुझे हर साल लगभग एक लाख रुपए का घाटा हो जाता है जो कि स्वाभाविक है कि मेरे वेतन से जाता है। मुझसे कई गुना ज्यादा मजदूर खटते हैं। उनके भी हिस्से में भी मात्र या तो सिर्फ 250 रुपए प्रतिदिन की मजदूरी आती है या फिर छह महीने से ज्यादा सपरिवार मेहनत करने पर लगभग छह महीने का धान और पशुओं के लिए पुआल मिल पाता है। अगर वो इसे मजदूरी में मापें तो वह 250 रुपए प्रतिदिन की एक तिहाई भी नहीं बनेगी।
इस बार तो दफ्तर काफी समय बंद रहने के कारण यह समय लगभग दुगुना हो गया। इस बार खुद खेती की तो खेत में नाले से पानी लाते वक्त पत्थर की चोट से एक उंगली स्थाई रूप से क्षतिग्रस्त हो गई और साँप ने भी काटा , हालांकि वो जहरीला नहीं था लेकिन 25 इंजेक्सन और उनके साइड इफैक्ट तो झेलने पड़े। हाड़तोड़ मेहनत के बाद इस बार फसल बहुत अच्छी हुई थी और पहली बार कुछ लाभ की उम्मीद थी लेकिन जब पकने लगी तो एक सप्ताह तक हाथियों के एक दल ने रात-रात भर फसल को खाया कम और बर्बाद ज्यादा किया; हमारी रात की पहरेदारी से भला क्या भागते गजराज; फिर वो ही एक लाख रुपए का घाटा।
फसल बीमा की राशि काट लेने के बाद भी जब बाढ़ या किसी अन्य कारण से फसल को नुकसान होता है तो कोई मुआवजा नहीं मिलता। तर्क दिया जाता है कि जब तक पूरे जिले की आधी से ज्यादा फसल नष्ट नहीं होगी, कोई मुआवजा नहीं मिलेगा।
न्यूनतम समर्थन मूल्य पर धान बेचना किसी दुस्वपन से कम नहीं है। रजिस्ट्रेशन से लेकर धान को मंडी में ले जाने तक एक असीम कष्ट और अत्याचार है। मंडियों में खरीदने, ना खरीदने का फैसला सरकारी अधिकारी नहीं, मिल मालिक करते हैं और अधिकारी , मिल मालिक सब किसान को कीड़ा-मकौड़ा समझकर असभ्य भाषा में बात करते हैं। बहुत से किसानों का सैंपल में पास किया हुआ धान भी वापस भेज दिया जाता है, मेरा भी भेजा गय। जो धान लिया भी जाता है, उसमें से भी 5 से 10 किलो प्रति क्विंटल काट लिया जाता है और प्रति क्विंटल लगभग 50 रुपए के दो बोरे भी रख लिए जाते हैं जिन्हें मिल-मालिक फिर से इन किसानों को ही बेचते हैं।
ये सब मेरे जैसे शिक्षित, कानून के जानकार आदमी के साथ हो रहा है तो आम किसान के साथ क्या हो रहा होगा, सोचिए ।
जो लोग यह समझते हैं कि किसान कोई दान नहीं करता, अपने लाभ के लिए खेती करता है; उनकी सूचना के लिए बता दूँ कि असल में सरकार को अपनी दमन कारी नौकरशाही और फौजों के लिए सस्ता अनाज चाहिए होता है और इतिहास में ऐसे असंख्य उदाहरण है जबकि किसानों ने अतिरिक्त अनाज पैदा करना बंद कर दिया तो सरकारों ने उनको पकड़-पकड़ कर, बाध्य करके अतिरिक्त अनाज उगवाया। मेरी किशोर अवस्था में प्रत्येक किसान को एक निश्चित मात्रा में अनाज हर बीघा की खेती के हिसाब से बाजार मूल्य से कम पर सरकार को देना पड़ता था जिसे लेवी कहा जाता था। यह तब भी देना पड़ता था जब फसल खराब हो जाए।ना देने पर जमीन जब्ती तक के प्रावधान थे। इसलिए बहुत से किसानों को बाजार से ऊंचे दाम पर अनाज खरीद कर सरकार को कम दाम पर लेवी देनी पड़ती थी।
इसलिए अगर किसान यह फैसला कर ले कि वे पुराने जमाने के आत्मनिर्भर गांवों की ओर चला जाएगा और सिर्फ अपनी जरूरत की ही फसलें पैदा करेगा तो उसका सबसे ज्यादा असर भी शहरी लोगों और सरकारी तंत्र पर पड़ेगा और ये ही सारा लोकतंत्र और चयन की छूट का राग भूलकर इस कदम का विरोध करेंगे। हो सकता है कि पर्यावरण संकट के कारण ऐसा दौर भी शीघ्र ही आ जाए कि खाने के लिए अनाज सिर्फ उसी को मिले जिसके पास अनाज उगने लायक जमीन है ।
इस सबके बीच एक महत्वपूर्ण सवाल यह है कि क्या मैं एक किसान हूँ ? किसान-आंदोलन के विरोधियों के अनुसार तो बिल्कुल भी नहीं लेकिन जब मैं बैंक में किसान क्रेडिट कार्ड बनवाने गया था तो बैंक के कृषि अधिकारी ने भी मुझे किसान मानने से इंकार कर दिया था ।
क्या यह दुनिया इतनी संकीर्ण हो गई है कि एक आदमी की सिर्फ एक ही पहचान को स्वीकार कर सकती है ?(लेखक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी है)
दुनिया में कोविड वैक्सीन की भारी मांग मौजूदा सप्लाई पर भारी पड़ रही है. निराश लोगों ही नहीं बल्कि सरकारों को भी यह नहीं समझ आ रहा है कि तुरंत और ज्यादा से ज्यादा वैक्सीन आखिर कैसे मिले.
वैक्सीन विशेषज्ञ मारिया एलेना बोटाजी का कहना है, "यह सूप में पानी मिला कर उसे बढ़ाने जैसा काम नहीं है." कोविड-19 की वैक्सीन बनाने वालों को करोड़ो डोज तैयार करने के लिए हर काम सही तरीके से करना होगा और इसमें मामूली सी बाधा भी देरी का कारण बनेगी. वैक्सीन में इस्तेमाल होने वाली कुछ चीजें अब से पहले कभी भी इतनी बड़ी मात्रा में तैयार नहीं की गईं.
एक बहुत साधारण सी बात जो आसानी से समझी जा सकती है कि पहले से मौजूद फैक्ट्रियों में नई तरह की वैक्सीन तैयार करने के लिए रातोंरात बदलाव कर पाना संभव नहीं है. इसी हफ्ते फ्रेंच दवा कंपनी सनोफी ने घोषणा की है कि वह अपनी प्रतिद्वंद्वी कंपनी फाइजर और उसकी जर्मन सहयोगी बायोन्टेक को वैक्सीन के लिए बोतल और पैकेट बनाने में मदद करेगी. हालांकि वैक्सीन के ये डोज बहुत कोशिश करने पर भी गर्मियों से पहले लोगों तक नहीं पहुंच सकेंगे. दूसरी बात यह है कि सनोफी की जर्मनी में मौजूद फैक्ट्री में इसकी गुंजाइश इसलिए है क्योंकि उसकी अपनी वैक्सीन में देरी हो रही है. दुनिया में वैक्सीन की सप्लाई के लिए यह देरी अच्छी बात नहीं है.
फिलाडेल्फिया के चिल्ड्रेंस हॉस्पिटल के डॉ पॉल ऑफिट अमेरिकी सरकार के वैक्सीन सलाहकार हैं. उनका कहना है, "हम सोचते हैं कि यह आदमी के शर्ट की तरह है. हमें इसे बनाने के लिए किसी और जगह की जरूरत होगी. यह इतना आसान नहीं है."
हर वैक्सीन का अलग फॉर्मूला
कोविड-19 के लिए जो अलग अलग देशों में वैक्सीन इस्तेमाल हो रही हैं वो सभी शरीर को इस बात के लिए तैयार करती हैं कि वह कोरोना वायरस की पहचान करे यानी उस स्पाइक प्रोटीन की जो उसके ऊपर मौजूद रहता है. हालांकि इसके लिए इन वैक्सीनों को अलग तकनीक, कच्चे सामान, और उपकरणों की जरूरत के साथ ही विशेषज्ञता की जरूरत होती है.
अमेरिका में जिन दो वैक्सीनों को मंजूरी मिली है वो एक खास जेनेटिक कोड का इस्तेमाल कर बनाए गए हैं जिन्हें एमआरएन कहा जाता है. इसमें वसा की छोटी सी गेंद के भीतर स्पाइक प्रोटीन के लिए निर्देश रहते हैं. रिसर्च लैब के भीतर छोटी मात्रा में एमआरएन आसानी से बनाई जा सकती है लेकिन इससे पहले किसी ने भी एमआरएन की अरबों डोज तैयार नहीं की है. पेन्सिल्वेनिया यूनिवर्सिटी के डॉ ड्रियू वाइजमन का कहना है, "अब से पहले तो 10 लाख डोज भी नहीं बनाई गई है." ज्यादा डोज बनाने का मतलब ज्यादा मात्रा में कच्चे माल को मिलाना भर नहीं है. एमआरएनए बनाने के लिए जेनेटिक बिल्डिंग ब्लॉक और एन्जाइमों के बीच रासायनिक प्रतिक्रिया करानी होती है और वाइजमन का कहना है कि एंजाइम बड़ी मात्रा में उतनी कुशलता के साथ काम नहीं करते.
एस्ट्राजेनेका की वैक्सीन ब्रिटेन और कई दूसरे देशों में इस्तेमाल हो रही है. इसके अलावा जॉन्सन एंड जॉन्सन की भी जल्दी ही तैयार होने वाली है. ये दोनों वैक्सीन एक कोल्ड वायरस से बनाई गई हैं जो शरीर में स्पाइक प्रोटीन की जीन को हटा देता है.
इन्हें बनाने का तरीका बिल्कुल अलग है. पहले जीवित कोशिकाओं को एक बड़े बायोरिएक्टर में विकसित किया जाता है और फिर इनसे कोल्ड वायरस को अलग कर के शुद्ध किया जाता है. वाइजमन बताते हैं, "अगर कोशिकाएं पुरानी बूढ़ी हो जाएं, थक जाएं या फिर बदलना शुरू कर दें तो आपको कम वायरस मिलेंगे."
एक वैक्सीन बहुत पुराने तरीके से भी तैयार की गई है जो चीन ने बनाई है. इसमें एक कदम और ज्यादा चलना पड़ता है ज्यादा कठोर जैवसुरक्षा की जरूरत पड़ती है क्योंकि ये मरे हुए कोरोनावायरस से तैयार की जाती हैं.
एक बात तो सारी वैक्सीनों के लिए जरूरी है कि उन्हें कड़े नियमों के तहत, खास तरीकों से निगरानी की जाने वाली फैक्ट्रियों में और हर कदम पर लगातार टेस्ट की जा सकने वाली प्रक्रियाओं के जरिए बनाया जाना है. हर बैच की वैक्सीन के लिए यह सब सुनिश्चित करना एक समय लगने वाला काम है.
सप्लाई चेन की मुश्किलें
उत्पादन निर्भर करता है पर्याप्त मात्रा में कच्चे माल की सप्लाई पर. फाइजर और मोडेर्ना का दावा है कि उनके पास भरोसेमंद सप्लायर हैं. ऐसा होने पर भी अमेरिकी सरकार के प्रवक्ता का कहना है कि ढुलाई के विशेषज्ञ सीधे वैक्सीन बनाने वालों के साथ काम कर रहे हैं ताकि किसी भी बाधा के उत्पन्न होने पर उसे दूर किया जा सके.
मोडेर्ना के सीईओ स्टेफाने बान्सेल मानते है कि इसके बाद भी चुनौतियां कायम हैं. फिलहाल काम 24 घंटे और सातों दिन की शिफ्टों में चल रहा है. उन्होंने कहा, अगर किसी दिन "कोई एक भी कच्चा सामान नहीं हो तो हम उत्पादन शुरू नहीं कर सकते और फिर हमारी क्षमता हमेशा के लिए खत्म हो जाएगी क्योंकि हम उसकी भरपाई नहीं कर सकते." फाइजर ने तात्कालिक रूप से यूरोप में कई हफ्तों से डिलीवरी घटा दी है. इस बीच में वह बेल्जियम की अपनी फैक्ट्री को अपग्रेड करना चाहता है ताकि ज्यादा उत्पादन किया जा सके. कभी कभी किसी बैच में कमी हो जाती है. इसी बीच एस्ट्राजेनेका ने नाराज यूरोपीय संघ से कहा है कि वह भी डिलीवरी उतनी तेजी से नहीं कर सकेगा जितनी की उम्मीद थी. उसका कहना है कि यूरोप में कुछ जगहों पर उत्पादन उतना नहीं हो रहा है.
कितनी वैक्सीन बन रही है?
यह संख्या देशों पर निर्भर करती है. मोडेर्ना और फाइजर दोनों अमेरिका को मार्च के आखिर तक 10 करोड़ डोज देंगी. इसके बाद अगली तिमाही के आखिर तक 10 करोड़ डोज और. इससे आगे जा कर जो बाइडेन ने घोषणा की है कि उनकी योजना गर्मियों तक और ज्यादा वैक्सीन खरीदने की है. आखिरकार 30 करोड़ अमेरिकी लोगों के लिए पर्याप्त वैक्सीन मिल जाने तक यह सिलसिला जारी रहेगा.
फाइजर के सीईओ ने इस हफ्ते एक कांफ्रेंस में बताया कि उनकी कंपनी मार्च के आखिर तक 12 करोड़ डोज डिलिवर करने की तैयारी कर रही है. यह काम तेज उत्पादन की वजह से नहीं हुआ बल्कि स्वास्थ्यकर्मियों को हर वायरल से एक खास सिरिंज के जरिए अतिरिक्त डोज निकालने की अनुमति मिलने से हुआ.
फाइजर का यह भी कहना है कि बेल्जियम की फैक्ट्री में अपग्रेड से थोड़े समय के लिए उत्पादन पर असर हुआ है लेकिन लंबे समय में यह फायदा देगा. जो अपग्रेड हो रहा है उसके बाद फाइजर इस साल 2 अरब डोज तैयार कर सकेगी. पहले सिर्फ 1.3 अरब डोज तैयार करने की ही बात कही जा रही थी.
इसी तरह मोडेर्ना ने भी घोषणा की है कि वह 2021 में 60 करोड़ डोज की सप्लाई दे सकेगा जो पहले के 50 करोड़ डोज से करीब 20 फीसदी ज्यादा है. क्षमता बढ़ाने की जो तैयारी चल रही है उससे मोडेर्ना की उम्मीदें एक अरब डोज तक तैयार करने की थी.
इन सब के बावजूद वैक्सीन की ज्यादा डोज पाने का सबसे आसान तरीका तो यही है कि जो वैक्सीन अभी तैयार होने की राह में हैं वो काम की साबित हों जैसे कि जॉन्सन एंड जॉन्सन की वन डोज वाली वैक्सीन या फिर नोवावैक्स जो परीक्षण के आखिरी दौर में है.
दूसरे विकल्प
कई महीनों से अमेरिका और यूरोप की प्रमुख वैक्सीन कंपनियां कॉन्ट्रैक्ट मैन्यूफैक्चरर से संपर्क जोड़ रही हैं जो उन्हें डोज तैयार करने और उन्हें बोतलबंद करने में मदद कर सकें. उदाहरण के लिए मोडेर्ना स्विटजरलैंड की लोंजा के साथ काम कर रही है. अमीर देशों से अलग भारत के सीरम इंस्टीट्यूट ने भी एस्ट्रा जेनेका के लिए एक अरब डोज तैयार करने का करार किया है. सीरम इंस्टीट्यूट वैक्सीन बनाने वाली दुनिया की सबसे बड़ी कंपनियों में है और वह विकासशील देशों के लिए प्रमुख सप्लायर की भूमिका निभा सकता है.
हालांकि ऐसी कुछ कोशिशों को झटका भी लगा है. ब्राजील के दो रिसर्च इंस्टीट्यूट एस्ट्राजेनेका और सिनोवैक की करोड़ों डोज तैयार करने की योजना बना रहे थे. लेकिन उन्हें चीन से कच्चे माल की सप्लाई में देरी होने से झटका लगा है.
एनआर/एमजे(एपी)
अयोध्या में जहां राम मंदिर बनना है वहां से 25 किलोमीटर दूर एक गांव में नई मस्जिद की नींव रखी गई है, लेकिन इस मस्जिद से जुड़े फैसलों में आम मुसलमानों की भागीदारी बहुत कम है.
डॉयचे वैले पर चारु कार्तिकेय का लिखा-
मस्जिद की नींव धन्नीपुर गांव में पांच एकड़ के जमीन के एक टुकड़े पर रखी गई. मस्जिद के निर्माण के लिए बनाए गए ट्रस्ट इंडो-इस्लामिक कल्चरल फाउंडेशन (आईआईसीएफ) के सदस्यों ने आमंत्रित मेहमानों के साथ मिल कर नई मस्जिद की नींव रखी. समारोह में राष्ट्रीय ध्वज फहराया गया, राष्ट्र-गान गाया गया और साथ ही इस मौके पर वहां इमली, आम, नीम, अमरुद और कुछ दूसरे पौधे लगाए गए.
सुप्रीम कोर्ट ने 2019 में कई दशकों से चले आ रहे बाबरी मस्जिद-राम जन्मभूमि विवाद पर फैसला देते हुए कहा था कि विवादित स्थल पर राम मंदिर का निर्माण होना चाहिए और उसके ऐवज में उस से कुछ ही दूर एक मस्जिद बनाई जानी चाहिए. इसी आदेश का पालन करते हुए यह जमीन उत्तर प्रदेश सरकार ने उत्तर प्रदेश सुन्नी वक्फ बोर्ड को मस्जिद को बनाने के लिए दी. वक्फ बोर्ड ने करीब छह महीने पहले इस अभियान के लिए आईआईसीएफ की स्थापना की.
मस्जिद का निर्माण शुरू करने के लिए जरूरी सभी संबंधित सरकारी विभागों की अनुमति अभी तक नहीं मिली है, लेकिन ट्रस्ट अभी से मस्जिद के बारे में कई फैसले ले चुका है. इनमें मस्जिद का डिजाइन कैसा होगा, इसमें क्या क्या सुविधाएं होंगी जैसी चीजें शामिल हैं. मस्जिद का नाम 1857 की क्रांति के एक मुस्लिम क्रांतिकारी नेता मौलवी अहमदुल्लाह शाह के नाम पर रखने के प्रस्ताव पर भी ट्रस्ट विचार कर रहा है.
कौन ले रहा है फैसले
मस्जिद से जुड़े ये फैसले आखिर किस आधार पर लिए जा रहे हैं? ये सरकारी आदेश हैं या ट्रस्ट के लिए स्वतंत्र फैसले और अगर ये ट्रस्ट के फैसले हैं तो क्या इनके बारे में आम मुसलमानों से सलाह-मशविरा लिया जा रहा है? एक बात साफ है कि मुस्लिम संगठन बंटे हुए हैं. सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान सुन्नी वक्फ बोर्ड भी पक्षकार था. इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अपने हिस्से में जमीन का एक हिस्सा सुन्नी वक्फ बोर्ड को भी दिया था. बाद में सुप्रीम कोर्ट ने उसे दूसरी जगह पर मस्जिद के लिए जमीन देने का फैसला सुनाया.
वक्फ बोर्डों की निगरानी केंद्रीय वक्फ परिषद करती है जिसे केंद्र सरकार ने 1954 में वक्फ एक्ट के जरिए बनाया था. इस परिषद की अध्यक्षता केंद्र सरकार में वक्फ मामलों के मंत्री के हाथों होती है. भारत के अधिकांश राज्यों में वक्फ बोर्ड हैं जिनकी निगरानी 1995 में बने एक कानून के तहत होती है. इस हिसाब से वक्फ बोर्ड सरकारी संस्थाएं हैं. वक्फ बोर्ड किसी भी मामले में पक्षकार हो सकता है, लेकिन वह समुदाय का प्रतिनिधित्व नहीं करता और ना ही समुदाय उसके फैसलों को मानने के लिए बाध्य है.
बंटा है मुस्लिम समुदाय
बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी के संयोजक जफरयाब जिलानी ने डीडब्ल्यू को मस्जिद की नींव रखे जाने से पहले ही बताया था कि यह मस्जिद शरिया यानी इस्लामी कानून और भारत के वक्फ कानून के खिलाफ है. जिलानी अखिल भारतीय मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के सदस्य भी हैं. उनका कहना है कि बोर्ड ने नवंबर 2019 में ही साफ कर दिया था कि शरिया में किसी मस्जिद के बदले कोई जमीन लेने की इजाजत ही नहीं है और 90 प्रतिशत मुसलमान सुप्रीम कोर्ट के फैसले से खुश नहीं हैं. बोर्ड ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ पुनर्विचार याचिका भी दायर की थी लेकिन कोर्ट ने याचिका को खारिज कर दिया था.
बोर्ड के एक और सदस्य और बोर्ड की ही बाबरी मस्जिद समिति के संयोजक सईद कासिम रसूल इलियास ने डीडब्ल्यू से कहा कि यह मस्जिद परोक्ष रूप से सरकार ही बनवा रही है. उनका कहना है कि कोर्ट के आदेश को उत्तर प्रदेश सुन्नी वक्फ बोर्ड ने मान लिया था लेकिन अखिल भारतीय मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने कहा था कि ऐवज में दी जा रही यह मस्जिद उन्हें स्वीकार्य नहीं है.
इसके अलावा इलयासी ने कहा कि वक्फ के कानून के मुताबिक मस्जिद हमेशा मस्जिद ही रहती है और इसीलिए अदालत में लड़े गए पूरे मामले में मुस्लिम पक्ष की तरफ से कभी भी बाबरी मस्जिद के ऐवज में कोई वैकल्पिक स्थान मांगा ही नहीं गया. हालांकि इलयासी ने यह भी कहा कि मस्जिद चूंकि किसी कब्जा की हुई जमीन पर नहीं बन रही है, उसके बन जाने के बाद उसमें नमाज पढ़ने की मनाही नहीं होगी और अगर कोई उसमें नमाज पढ़ने जाएगा तो उसे रोका नहीं जा सकता है.
शिकायत है कुछ लोगों को
सुप्रीम कोर्ट में बाबरी मस्जिद-राम मंदिर मुकदमे में मुस्लिम पक्ष की ओर से सात याचिकाएं दायर की गई थीं, जिसमें एक याचिका सुन्नी वक्फ बोर्ड की भी थी. अब जब वह उसे मिली जमीन पर एक ट्रस्ट बनाकर मस्जिद बना रहा है तो कई मुस्लिम संगठन नाराज हैं. इनमें सिर्फ मुस्लिम लॉ बोर्ड के सदस्य ही नहीं हैं.
मुस्लिम लॉ बोर्ड से बाहर भी लोगों के बीच इससे मिलती-जुलती राय है. नई दिल्ली के इंस्टिट्यूट ऑफ ऑब्जेक्टिव स्टडीज के अध्यक्ष मंजूर आलम का कहना है कि इस मस्जिद से जुड़ी जो भी कार्रवाई हो रही है आम मुसलमानों को उसकी कोई खबर नहीं है. उन्होंने डीडब्ल्यू से कहा कि मस्जिद के विषय में किसी से ना राय ली जा रही है ना मशविरा किया जा रहा है और इसके बारे में कहीं भी मुसलमानों में कोई जोश या जज्बा नहीं है, कोई खुशी, कोई गर्मजोशी नहीं है.
-सुनीता नारायण
नए साल 2021 की शुरुआत हमने इस उम्मीद के साथ की थी कि यह हमें 2020 की विध्वंसकारी महामारी से राहत देगा। लेकिन इसके विपरीत हमारे किसान हजारों की संख्या में दिल्ली की सीमा पर धरने पर बैठे हैं। उनके इस आंदोलन की एक ही मांग है, सरकार हाल में पास किए गए कृषि बिलों को निरस्त कर दे। कौन सही है और कौन गलत, इस बारे में काफी बहस हो चुकी है। इससे जो एक बात सामने निकलकर आई है, वह यह है कि अब हमें किसानों द्वारा उगाए गए भोजन को उपभोक्ता के रूप में सोचने की जरूरत है, न कि किसी शोधकर्ता, शिक्षाविद या नीतिनिर्माता के तौर पर।
हमें यह सवाल पूछना चाहिए कि हम जिस भोजन का उपभोग करते हैं, उसे सब्सिडी देने की आवश्यकता आखिर क्यों है। आखिर किसान समर्थन मूल्य की मांग क्यों कर रहे हैं? यह मांग केवल उन किसानों की नहीं है जो इस भीषण सर्दी में राजधानी दिल्ली की सीमाओं पर बैठे हैं, उन्हें भारत की एक बड़ी अबादी का समर्थन भी प्राप्त है। तो क्या ये सारे लोग अनुत्पादक और आलसी हैं? यह एक तथ्य है कि दुनियाभर में (खासकर समृद्ध देशों में) कृषि क्षेत्र को सरकारों से भारी मदद मिलती है। पेरिस स्थित अंतरसरकारी थिंक-टैंक ओईसीडी इस क्षेत्र को सकल कृषि प्राप्तियों के प्रतिशत के रूप में प्रोड्यूसर सपोर्ट के जरिए समर्थन का अनुमान लगाता है। इसके आंकड़ों के अनुसार जापान, दक्षिण कोरिया, नॉर्वे और आइसलैंड जैसे अमीर देशों में, उत्पादक समर्थन 2019 में सकल कृषि प्राप्तियों के प्रतिशत के रूप में 40 से 60 प्रतिशत के बीच था। अमेरिका में यह लगभग 12 प्रतिशत है और यूरोपीय संघ में 20 प्रतिशत।
लेकिन भारत में उत्पादक समर्थन (वह भुगतान जो उत्पादन के प्रतिशत के रूप में सरकार द्वारा किया जाता है) वास्तव में नकारात्मक (-5 प्रतिशत) है। दूसरे शब्दों में, दुनिया के कुछ सबसे गरीब लोगों के स्वामित्व एवं प्रबंधन में चल रहा यह कृषि क्षेत्र हमारे भोजन को सब्सिडाइज कर रहा है। लेकिन पूरी कहानी कुछ और है। जलवायु परिवर्तन के बढ़ते जोखिम के समय में समृद्ध राष्ट्र अपने कृषि क्षेत्र का समर्थन करने के लिए तेजी से नए तरीके विकसित कर रहे हैं। उत्पादन के लिए भुगतान सीधे नहीं किया जाता है। यह भुगतान इसी शर्त पर होता है कि किसान नई, सस्टेनेबल तकनीकों को अपनाएंगे। यूरोपीय संघ की आम कृषि नीति अब किसानों को पारिस्थितिकी तंत्र सेवाओं के भुगतान के लिए निर्देशित की जाएगी। इसका मतलब हुआ और ज्यादा सब्सिडी लेकिन नए नाम से। इस तरह, लगभग सभी बड़े खाद्य उत्पादक देशों में सब्सिडी उनके सामाजिक और पर्यावरण कल्याण उपायों के हिस्से के रूप में शामिल है। सब्सिडी किसानों को सीधे भुगतान के माध्यम से या कुछ फसलों के समर्थन मूल्य के माध्यम से या पानी, उर्वरक और बीज जैसे प्रमुख कृषि इनपुट में निवेश के माध्यम से दी जा सकती है।
दुनिया के कम समृद्ध देशों के किसान, जिनमें भारत के अमीर राज्य पंजाब और हरियाणा के लोग भी शामिल हैं, को इस वैश्विक पटल पर प्रतिस्पर्धा करनी होती है। सबसे पहले वे वंचित हैं क्योंकि उन्हें खेती को आकर्षक बनाने के लिए आवश्यक वित्तीय सहायता नहीं मिलती है। दूसरी बात, जब खराब मौसम या अन्य कारणों से उनकी फसलें महंगी हो जाती हैं, तो सरकार सस्ता भोजन आयात कर लेती है। इस तरह हमारे किसान कहीं के नहीं रह जाते। यही कारण है कि किसान मूल्यों में उतार-चढ़ाव से स्वयं को सुरक्षित रखने के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) की मांग कर रहे हैं। इसमें कोई संदेह नहीं है कि वर्तमान समय में यह प्रणाली पूरी तरह से कमजोर हो चुकी है। हालांकि एमएसपी 23 फसलों के लिए तय की गई है लेकिन वास्तव में, यह केवल गेहूं एवं धान जैसी कुछ फसलों के लिए उपयोग में लाई जाती है, जिनकी सरकारी खरीद की व्यवस्था है। यही कारण है कि पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश के किसानों को डर है कि यह व्यवस्था खत्म कर दी जाएगी। वे मुख्यतः गेहूं और चावल उगाते हैं जो ज्यादातर सरकार द्वारा खरीदा जाता है।
लेकिन बाकी फसलों का एमएसपी एक खोखला वादा मात्र है। जैसा कि मेरे सहयोगी ने कृषि समर्थन पर अपने हालिया लेख में विश्लेषण किया है, बाजार किसानों को आवश्यक कीमत का भुगतान नहीं करता। सरकार के स्वयं के आंकड़ों के अनुसार, 600 थोक बाजारों में 10 चुनिंदा फसलों के लिए लगभग 70 प्रतिशत लेनदेन एमएसपी से कम कीमत पर हुआ था।
प्रमुख मुद्दा यह है कि भोजन की कीमत क्या होनी चाहिए? यह तथ्य है कि कृषि क्षेत्र में लागत बढ़ रही है, बीज और पानी से श्रम तक। फिर यह भी सच है कि जलवायु परिवर्तन के कारण खराब मौसम से होने वाले नुकसान का खतरा बढ़ रहा है। इस तरह, किसानों को उत्पादन की बढ़ती लागत और फसलों के नुकसान के बढ़ते जोखिम, दोनों के एवज में भुगतान किया जाना चाहिए।
भारतीय किसान किसी भी निजी कंपनी या उद्योग के विपरीत, अपने परिचालन के लिए बुनियादी ढांचे के निर्माण में भारी मात्रा में निजी पूंजी का निवेश करते हैं। वे अपने खेतों की सिंचाई के लिए भी पैसे खर्च करते हैं। कुल सिंचित भूमि का आधे से अधिक हिस्सा भूजल पर निर्भर है। हमारे देश में कुछ 1.9 लाख कुओं और नलकूपों का निर्माण निजी पूंजी से किया गया है। सरकार इस मामले में कोई मदद नहीं करती। वास्तव में एमएसपी की गणना में किसान के साथ धांधली होती है क्योंकि सरकार को यह सुनिश्चित करना होता है कि खाद्यान्नों की कीमत कम रहे ताकि सरकारी खरीद का बोझ भी कम रहे।
किसी भी सरकार को सबसे अधिक डर खाद्य मुद्रास्फीति से लगता है, क्योंकि उपभोक्ता तब सही मायनों में अपना आपा खो बैठते हैं। यह तब है जब सरकार कीमतों को कम करने के लिए खाद्यान्नों का आयात अमीर देशों से करती है, जहां उन्हें उगाने पर सब्सिडी दी जाती है और जिसके खिलाफ हमारे किसान प्रतिस्पर्धा नहीं कर पाते। समय आ गया है कि हम अपने खाने की वास्तविक कीमत के बारे में बात करें, जो हमारे लिए अनाज पैदा करने वाले किसानें के लिए लाभकारी बने, इस विषय पर मंथन करें। यह एक ऐसा व्यवसाय नहीं है जिसे हम बंद कर सकते हैं। हमारे दरवाजे पर बैठे किसान इसी मुद्दे पर बात करना चाहते हैं। हम उन्हें निराश नहीं कर सकते। (downtoearth.org.in)
बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक
इस बार का गणतंत्र-दिवस गनतंत्र-दिवस न बन जाए, इसकी आशंका मैंने पहले ही व्यक्त की थी। मुझे खुशी है कि किसानों के प्रदर्शनों में किसी ने भी बंदूके नहीं चलाईं। न तो किसानों ने और न ही पुलिसवालों ने ! लेकिन बंदूकें चलने से भी अधिक गंभीर घटना हो गई। उसे दुर्घटना कहें तो बेहतर होगा। ऐसी दुर्घटना किसी भी राष्ट्र के इतिहास में कभी घटी हो तो उसकी जानकारी मुझे नहीं है।
क्या कोई भी राष्ट्र अपने लालकिले या राष्ट्रपति भवन या संसद भवन या प्रधानमंत्री कार्यालय पर किसी संप्रदाय के ध्वज को फहरा सकता है ? हर संप्रदाय का ध्वज सम्मान के योग्य है लेकिन लाल किले पर उसका फहर जाना तो दुस्साहस की पराकाष्ठा है। जिस सरकार के साये में ऐसी शर्मनाक घटना घटे, वह सरकार, क्या सरकार कहलाने के योग्य है ? ऐसी घटनाएं तभी घटती हैं, जब दुनिया के देशों में सरकारों का खूनी तख्ता-पलट होता है।
यहाँ किसी का खून बहना तो दूर, बाल भी बांका नहीं हुआ। लाल किले का इतना मजबूत दरवाजा, जिसे पागल हाथी भी नहीं तोड़ सकते, उसे लांघकर उपद्रवी अंदर घुस जाएं, सैकड़ों की संख्या में मंच पर चढ़ जाएं और पुलिस असहाय निरुपाय खड़ी रहे, क्या ऐसी अनहोनी पहले कभी हुई है ? खंभों और गुंबजों पर चढ़ते वक्त उन उपद्रवियों को पुलिस ने रोका क्यों नहीं ? पुलिस अगर उनके विरुद्ध कठोरतम कार्रवाई करती तो भी पूरा देश उसका समर्थन करता लेकिन पुलिस की इस अकर्मण्यता के पीछे कई लोग अब सरकार का ही हाथ बता रहे हैं।
उनका अजीब-सा सोचना है कि यह नौटंकी सरकार ने ही आयोजित करवाई है ताकि किसान-आंदोलन को बदनाम किया जा सके। दिल्ली की सीमाओं पर आक्रामक किसानों के साथ पुलिस के लचर-पचर व्यवहार को भी इस सरकारी साजिश का अंग बताया जा रहा है। लगभग सौ पुलिसवाले बुरी तरह से घायल होकर अस्पताल में पड़े है। सरकार के 56 इंच के सीने को सिकोडक़र किसानों ने 6 इंच का कर दिया है। किसान नेता प्रदर्शनकारियों के कुकृत्य की कितनी ही भर्त्सना करें, लेकिन अब इस आंदोलन के माथे पर काला टीका लग गया है।
मैंने इस अहिंसक आंदोलन को दुनिया का अपूर्व आंदोलन कहा था लेकिन इसकी असली कमजोरियां अब उजागर हो रही हैं। यह नेताविहीन तो है ही, यह दिशाविहीन भी है। इसका अब बिखरना और टूटना अवश्यंभावी है। जऱा सोचें कि दिल्ली के अलावा अन्य 20 शहरों में हुए किसानों के प्रदर्शन इतने शांतिपूर्ण कैसे हुए ? क्योंकि इनके पीछे पार्टियां थीं और नेता थे। लेकिन लगता है कि अब सरकार और किसान, दोनों अराजक हो गए हैं।
जाहिर है कि अब एक फरवरी को संसद पर किसान-प्रदर्शन असंभव होगा। सरकार और किसान, दोनों अपना-अपना दुराग्रह छोड़ें। वापसी की रट न लगाएं। न किसानों की और न ही कानूनों की वापसी हो। दोनों मध्यम मार्ग पर सहमत हों। इन कानूनों को जो राज्य मानना चाहें, वे मानें, जो न मानना चाहें, वे न मानें।
(नया इंडिया की अनुमति से)
-ज़ुबैर अहमद
सोमवार को इस साल का केंद्रीय बजट ऐसे समय में पेश किया जाएगा जब आधिकारिक तौर पर भारत पहली बार आर्थिक मंदी के दौर से गुज़र रहा है.
आकलन है कि वित्त वर्ष 2020-21 का अंत अर्थव्यवस्था के 7.7 प्रतिशत तक सिकुड़ने के साथ पूरा होगा.
हालांकि दुनिया की छठी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था धीरे-धीरे पटरी पर लौट रही है और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के अनुसार साल 2021-22 में विकास दर 11 प्रतिशत से अधिक होने की आशा है लेकिन पर्यवेक्षकों ने चेतावनी दी है कि अगर इस बजट में सरकार ने भारी मात्रा में स्पेंडिंग नहीं की तो अर्थव्यवस्था को विकास के पथ पर वापस लाने में दिक़्क़त होगी.
लंबे समय से साल दर साल बजट का विश्लेषण करने वाले वरिष्ठ पत्रकार प्रिया रंजन दास, ज़ोर देकर कहते हैं कि ये "समय बड़े फ़ैसलों का है."
बजट की तैयारियाँ जारी हैं. नए आइडिया पर बात हो रही है. सरकारी सूत्रों ने पुष्टि की है कि कोरोना कर पर गंभीरता से विचार हो रहा है और ये "अधिकतम तीन साल" के लिए लगाया जा सकता है. सूत्र कहते हैं, "कॉर्पोरेट क्षेत्र के लिए यह कर टैक्स देने वाले आम लोगों से अधिक हो सकता है."
सरकार के सामने समस्याएँ अनेक
आज़ाद भारत में शायद ही किसी भी वित्त मंत्री को इतनी अधिक और इतनी जटिल समस्याओं का सामना करना पड़ा होगा जितना निर्मला सीतारमण को सामना करना पड़ रहा है.
उनकी दिक़्क़तों पर ज़रा ग़ौर करें - ताज़ा बजट कोरोना महामारी के कारण पैदा हुई परिस्थिति के बीच तैयार किया जा रहा है. देश की अर्थव्यवस्था की स्थिति डांवाडोल है. कोरोना के कारण 1.5 लाख से अधिक लोगों की मृत्यु हो चुकी है और एक करोड़ से अधिक लोग संक्रमित हो चुके हैं. सरकार के सामने कमज़ोर सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था का पुनर्निर्माण करना है. देश की राजधानी की सीमा पर दो महीनों से किसान कृषि बिल के विरोध में प्रदर्शन कर रहे हैं. चीन के साथ सीमा पर तनाव महीनों से जारी है. और सबसे अहम बात यह है कि सरकारी ख़ज़ाने में पैसे नहीं हैं.
निर्मला सीतारमण ने वादा किया है कि इस बार का बजट का सबसे अलग होगा, इस सदी का सबसे बेहतर. लेकिन ये तो 1 फ़रवरी को समझ में आएगा कि उनके दावों में कितना दम है.
लेकिन अर्थशास्त्रियों के बीच इस बात पर आम सहमति है कि बजट कोई जादू की छड़ी नहीं होती है.
मुंबई स्थित चूड़ीवाला सिक्योरिटीज़ के अध्यक्ष आलोक चूड़ीवाला का कहना है कि महामारी के प्रभाव से जूझने के लिए एक बजट पर्याप्त नहीं है.
वो कहते हैं, "किसी भी टूटी हुई अर्थव्यवस्था के पुनर्निर्माण में एक लंबा समय लगता है, लेकिन अगर हमारा इरादा सही है और हम सही फ़ैसले ले रहे हैं इसका पता एक बजट में चल जाता है."
प्रिया रंजन दास को इस बार के बजट से बहुत ज़्यादा उम्मीद नहीं है क्योंकि उनका मानना है कि बजट के बारे में उम्मीदें अधिक है.
वो कहते हैं, "मुझे बहुत उम्मीद नहीं है. मुझे हेडलाइन मैनेजमेंट ज़्यादा दिखाई दे रहा है. सदी के सबसे अच्छे बजट को पेश करने जैसे वित्त मंत्री के बयान हल्के शब्द हैं. मुझे इस सरकार से अर्थव्यवस्था के कुशल प्रबंधन और वर्तमान चुनौतियों में खरा उतरने की उम्मीद नहीं है."
वो कहते हैं कि आम तौर पर बजट जितना ही आर्थिक विकास के बारे में होता है उतना ही केंद्र सरकार की तरफ़ से दिया गया एक सियासी बयान भी होता है. ये भी आम बात है कि हर साल बजट के सारे वादे पूरे नहीं होते.
वो कहते हैं कि "बजट से पहले वित्त मंत्री ने सभी उचित बातें ही कही हैं. उन्होंने कहा है कि उनकी प्राथमिकताएं विकास को पुनर्जीवित करना, महामारी प्रभावित क्षेत्रों में सहायता प्रदान करना और रोज़गार के अवसर पैदा करना हैं."
लेकिन इन इरादों को अमल में लाना कितना मुश्किल होगा? दूसरे शब्दों में, उन्हें बजट के लिए किन प्रमुख चुनौतियों का सामना करना है?
कुछ आर्थिक विशेषज्ञों के अनुसार सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक रोज़गार के नए अवसर पैदा करना है. रिकॉर्ड के लिए, साल 2012 में देश में बेरोज़गारी दर दो प्रतिशत थी. आज यह 9.1 प्रतिशत है. बेशक यह समस्या दुनिया भर में है लेकिन कई देशों ने बेरोज़गारी से निपटने के लिए उचित कदम उठाए हैं.
प्रिया रंजन दास कहते हैं कि रिकॉर्ड बेरोज़गारी की समस्या का हल निकालना वित्त मंत्री का सबसे बड़ा सिरदर्द है. वह कहते हैं, "सबसे बड़ी चुनौती ये तथ्य है कि नीति निर्माता बेरोज़गारी को एक बड़ी चुनौती के रूप में मान्यता नहीं देते हैं. ये वर्तमान में रिकॉर्ड स्तर पर है. ये Covid-19 के पहले ही 45 साल के रिकॉर्ड स्तर पर था. और महामारी के बाद और भी बिगड़ गया है."
केंद्र सरकार का तर्क है कि बेरोज़गारी की समस्या वर्षों से जारी है और यह कोई नई बात नहीं है. प्रिया रंजन दास कहते हैं, "इसलिए सरकार इस समस्या का मुक़ाबला करने वाली नहीं है क्योंकि ये इसे गंभीरता से नहीं ले रही है. असली चुनौती तेज़ी से बढ़ती बेरोज़गारी है. हाँ, यह वर्षों से एक समस्या है लेकिन कोविड-19 के कारण ये हमारी सबसे बड़ी समस्या बन गई है."
आलोक चूड़ीवाला भी बेरोज़गारी को एक बहुत ही गंभीर चुनौती मानते हैं. उनके अनुसार लॉकडाउन के दौरान कई लाख मज़दूर अपने घरों को वापिस लौट गए जिनमें से अधिकांश अब भी काम पर वापस नहीं लौटे हैं.
उनका कहना है कि इन मज़दूरों को उनके गाँवों में रोज़गार देना या उनकी शहरों में नौकरियों में वापसी सरकार की एक बड़ी चुनौती होगी.
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प्रिया रंजन दास कहते हैं कि महामारी से हुए नुक़सान से उबरना और विकास दर को गति देना वित्त मंत्री की दूसरी सबसे बड़ी चुनौती है. रेटिंग एजेंसी क्रिसिल का अनुमान है कि लॉकडाउन और महामारी के कारण भारत ने अपने सकल घरेलू उत्पाद का चार प्रतिशत खो दिया है.
कई अर्थशास्त्रियों का मानना है कि महामारी से पहले अर्थव्यवस्था जहाँ थी, इसे वहां तक पहुँचने के लिए तीन साल तक निरंतर 8.5 प्रतिशत वृद्धि की ज़रूरत होगी.
आलोक चूड़ीवाला कहते हैं कि वित्त मंत्री के सामने मुख्य चुनौती ये है कि अर्थव्यवस्था को विकास के रास्ते पर फिर से कैसे लाया जाए.
वह कहते हैं, "ऐसा करने के लिए, सरकार को बजट में एक बड़े आर्थिक पैकेज के साथ आने की ज़रूरत है जिससे बड़े पैमाने पर मांग को बढ़ावा मिल सकेगा."
अब तक कोरोना महामारी के असर से लड़ने में सरकार आर्थिक रूप से अनुदार रही है और उसने बेहद सावधान से कदम बढ़ाए हैं. अधिकतर आर्थिक विशेषज्ञों का तर्क है कि मोदी सरकार के लिए राजकोषीय अनुशासन के बारे में बहुत अधिक परवाह किए बिना बड़े पैमाने पर ख़र्च करने की ज़रुरत है.
वित्तीय मामलों के विशेषज्ञ और पत्रकार आशीष चक्रवर्ती कहते हैं, "ये असाधारण समय हैं और केवल भारत में नहीं बल्कि दुनिया में हर जगह है. सरकार अंतरराष्ट्रीय रेटिंग एजेंसियों की चिंता न करे. बस ख़र्च करें. ग़रीबों और छोटे व्यवसाय वालों के पॉकेट में पैसे आने चाहिए. रेटिंग एजेंसियाँ हमारे वित्तीय अनुशासन पर सवाल उठाएंगी. लेकिन अगले तीन-चार साल तक हमें उन्हें अनदेखा करना चाहिए."
वह कहते हैं, "निर्मला सीतारमण को इस बजट को पहले के सालों से अलग कर के देखना चाहिए. हम 2020 में बहुत हाथ रोक कर ख़र्च कर रहे थे. लेकिन जैसा कि लोगों को डर था इससे मांग को बढ़ाने में मदद नहीं मिली और खपत (consumption) लगातार सुस्त रही है."
जैसा कि वो कहते हैं, "मैं बिना सोचे समझे खर्च की वकालत कतई नहीं कर रहा हूं. मैं स्मार्ट तरीके लेकिन तुरंत ख़र्च करने का बात पर ज़ोर दे रहा हूं ताकि हम मार्केट में मांग उत्पन्न कर सकें, सकारात्मकता फैला सकें और खपत पैदा कर सकें. फिलहाल के लिए ख़र्च करना आर्थिक विकास का प्रमुख चालक होगा."
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पिछले साल मई में 20 लाख करोड़ रुपये ख़र्च करने की घोषणा की थी और इसे स्टिमुलस पैकेज कहा था. जनधन और दूसरी योजनाओं के तहत सरकार ने हाशिये पर रह रहे ग़रीबों के खातों में कुछ पैसे डाले लेकिन इससे मांग बढ़ने वाली नहीं थी क्योंकि मदद की राशि बहुत कम थी और ये समाज के सभी ग़रीबों को नहीं मिली.
छोटे व्यापारियों को कोई मदद नहीं मिली. बाद में बैंकों में नकदी तो आई लेकिन छोटे व्यापारियों को इतना नुक़सान हुआ था कि वो बैंकों से क़र्ज़ लेने की स्थिति में भी नहीं थे.
इसके अलावा, छोटे और मध्यम व्यवसायों को जो मिला, वह कुछ प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं की तरह, एक बार की नकद सहायता भी नहीं थी, लेकिन सरकारी प्रयासों ने उनके लिए बाज़ार में पर्याप्त तरलता पैदा की.
चक्रवर्ती कहते हैं, "सरकार के पैकेज का फोकस सप्लाई साइड को मज़बूत करना था जो इसने किया भी. लेकिन डिमांड साइड पर ध्यान नहीं दिया गया. और जैसा कि आप देख सकते हैं कि इस तरह के धूमधाम के साथ लॉन्च किए गए आर्थिक पैकेज ने मांग को आगे नहीं बढ़ाया. वित्त मंत्री को मांग को बड़े पैमाने पर बढ़ाने की ज़रुरत है."
दास का तर्क है कि किसी भी नकद पैकेज को रोज़गार से जोड़ा जाना चाहिए. वो कहते हैं, "जैसे कि ग्रामीण इलाकों के ग़रीब मज़दूरों के लिए मनरेगा योजना है जिसके तहत तीन महीने की रोज़गार की गारंटी है."
मूल न्यूनतम सार्वभौमिक आय
प्रिया रंजन दास का कहना है कि सरकार को हिम्मत दिखानी चाहिए और ये मान कर बजट बनाना चाहिए कि विभिन्न-कुशल वाले श्रमिकों के लिए बुनियादी न्यूनतम सार्वभौमिक आय योजना को शुरू करने का ये सबसे अच्छा समय है.
वो कहते हैं, "ये एक साहसिक क़दम ज़रूर होगा लेकिन सही क़दम होगा. बैंक खातों में नकद मदद भेजने की ज़रुरत नहीं है. ये मनरेगा की तरह एक रोज़गार गारंटी योजना से जुड़ा होना चाहिए."
मनरेगा के तहत मज़दूरी के बदले मज़दूरों के खातों में सीधे पैसे जा रहे हैं. वो कहते हैं, "प्रस्तावित योजना कौशल के विभिन्न स्तरों के श्रमिकों और ग्रामीण और शहरी श्रमिकों के लिए होनी चाहिए. और वर्ष में 100 दिनों के लिए रोज़गार की गारंटी हो".
उनका मानना है कि अगर राजनीतिक इच्छाशक्ति है तो वित्त मंत्री ऐसा कर सकती हैं.
वो कहते हैं, "देखिये भारत के पास दुनिया के सबसे बड़े गारंटी देने वाले रोज़गार कार्यक्रम मनरेगा को लागू करने और इसे सालों से चलाने का अनुभव है और ये ऐसी योजना है जिसने ग़रीबी रेखा के नीचे से 17 करोड़ लोगों के जीवनस्तर को बेहतर करने योगदान दिया है. हमारे पास तजुर्बा है, हम इस तरह की दूसरी योजना भी शुरू कर सकते हैं."
प्रिया रंजन दास ऐसा नहीं मानते. वो कहते हैं, "सरकार संसाधन जुटा सकती है. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तेल की कम कीमतों के दौरान भारत सरकार ने चुपचाप अतिरिक्त उत्पाद शुल्क के माध्यम से 20 लाख करोड़ रुपये जुटाए हैं. हमें दिमाग़ लगा कर सोचने की ज़रुरत है. संसाधन जुटाना कई साल पहले एक बड़ी समस्या हुआ करती थी लेकिन अब ऐसा नहीं है."
वो अपने तर्क के पक्ष में कहते हैं, "यदि आप 20 लाख करोड़ रुपये के आत्मनिर्भारता पैकेज (12 मई 2020 को इसकी घोषणा प्रधानमंत्री ने की थी) को देखें तो आप समझ जाएंगे कि संसाधन समस्या नहीं हैं. यदि आपके पास इच्छाशक्ति है तो आप संसाधन जुटा सकते हैं."
भारत के मुख्य आर्थिक सलाहकार केवी सुब्रमण्यम ने पिछले साल जुलाई में कहा था कि जब कोरोना के टीके उपलब्ध होंगे तो एक भारी स्टिमुलस पैकेज के लिए सही समय होगा. फेडरेशन ऑफ इंडियन चैम्बर्स ऑफ़ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री (FICCI) द्वारा आयोजित एक वेबिनार में, उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा था कि ये 'अगर' का प्रश्न नहीं था, ये 'कब' का सवाल है.
अब भारत में कोरोना का टीका लोगों को दिया जा रहा है और चक्रवर्ती को उम्मीद है कि वित्त मंत्री "एक बड़े पैकेज का एलान कर सकती हैं."
हालांकि आलोक चुड़ीवाला मानते हैं कि नकदी के लिए सरकार के पास सीमित विकल्प हैं.
वो कहते हैं "सरकार के पास नकदी की समस्या है. सरकार को हर क़दम फूंक-फूंक कर आगे बढ़ाना पड़ेगा. आय कर नहीं बढ़ाना चाहिए. शायद कोरोना टैक्स सही होगा क्योंकि हमें अगले कुछ सालों में ढेर सारे पैसे चाहिए."
आम तौर से केंद्र सरकार के पास पैसे कमाने के पांच मुख्य ज़रिए होते हैं - (1) जीएसटी से 18.5 प्रतिशत, (2) कॉर्पोरेट टैक्स से 18.1 प्रतिशत, (3) व्यक्तिगत आयकर से 17 प्रतिशत, (4) एक्साइज़ ड्यूटी से 11 प्रतिशत और (5) सीमा शुल्क से 5.7 प्रतिशत.
पिछले कुछ महीनों में जीएसटी संग्रह में तेज़ी आई है. सरकार को व्यक्तिगत आयकर को बढ़ाने के बजाय और अधिक लोगों से टैक्स वसूली करने की ज़रुरत है.
केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड (CBDT) द्वारा जारी किए गए 2018-19 की टैक्स ब्रेकअप पर एक रिपोर्ट के अनुसार 5.78 करोड़ लोगों ने अपना आयकर रिटर्न दाख़िल किये थे जिनमें से लगभग 1.46 करोड़ लोगों ने टैक्स दिए.
लगभग 1 करोड़ लोगों ने 5-10 लाख रुपये के बीच टैक्स दिए और बाक़ी 46 लाख व्यक्तिगत करदाताओं ने 10 लाख रुपये से ऊपर की आय पर टैक्स दिया. लगभग 135 करोड़ लोगों के देश में वास्तव में करों का भुगतान करने वालों की संख्या इतनी नगण्य है.
यदि सरकार कोरोना-टैक्स लगाने का फ़ैसला करती है तो इसका बोझ करदाताओं के इस छोटे समूह पर पड़ेगा.
विनिवेश और निजीकरण लक्ष्य
सरकार के लिए पैसे कमाने के और भी तरीके हैं. अगर निर्मला सीतारमण चाहें तो पब्लिक सर्विस अंडरटेकिंग्स में स्टेक्स बेचकर, एयर इंडिया जैसी कुछ कंपनियों का निजीकरण करके और सरकारी प्राइम प्रॉपर्टीज को नीलाम करके अरबों रुपये हासिल कर सकती हैं. वित्तीय मंत्रालय के सूत्रों ने बताया कि इस बार के बजट में विनिवेश और निजीकरण पर काफ़ी ज़ोर होगा.
लेकिन सरकार इस क्षेत्र में अब तक बहुत कामयाब नहीं रही है. पिछले साल के बजट में सरकार ने विनिवेश और निजीकरण से कमाने का लक्ष्य 215 लाख करोड़ रुपये रखा था लेकिन केवल 30,000 करोड़ रुपये का ही विनिवेश हो सका. महामारी इसका बड़ा कारण था लेकिन इसके पहले वाले सालों में भी सरकार ने अपना लक्ष्य हासिल नहीं किया था. इस साल के बजट में विनिवेश, निजीकरण और सरकारी संपत्तियों की नीलामी के प्रावधान से सरकारी हलकों में उम्मीद पैदा हुई है कि इससे सरकारी ख़ज़ाने में पैसे आएंगे.
वित्त मंत्रालय के एक सूत्र ने हाल ही में बीबीसी को बताया, "विनिवेश पर अधिक ध्यान दिया जाएगा, जिसका पैमाना शायद पहले कभी नहीं देखा गया है".
आलोक चुड़ीवाला इस तथ्य पर अफ़सोस जताते हैं कि मोदी सरकार विनिवेश लक्ष्यों को हासिल करने में अक्सर नाकाम रही है लेकिन इस बार उन्हें यक़ीन है कि ये लक्ष्य पूरा होगा क्योंकि इसे नकदी की ज़रूरत है और इसलिए भी कि ये अधिक राजनीतिक इच्छाशक्ति दिखा रही है
प्रिया रंजन दास को सरकार में विनिवेश के लिए उच्च लक्ष्य से कोई शिकायत नहीं.
वह कहते हैं, "किसी भी सरकार के तहत विनिवेश लक्ष्य पूरा नहीं किया जाता है. लेकिन उच्च लक्ष्य करने में कोई बुराई नहीं है. यह संसाधन जुटाने का एक तरीका है, लेकिन सबसे महत्वपूर्ण नहीं है."
सरकारी की थिंक टैंक नीति आयोग ने विनिवेश के लिए 50 से अधिक सरकारी कंपनियों के निजीकरण और विनिवेश की सिफ़ारिश की है.
क्या कोरोना टैक्स लगाना एक चुनौती होगी?
आलोक चुड़ीवाला मानते हैं कि पैसे जुटाने के लिए अगर सरकार कोरोना-टैक्स लगाने के बारे में फ़ैसला करती है तो इससे कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए.
प्रिया रंजन दास भी कहते हैं कि वो कोरोना-टैक्स देने से पीछे नहीं हटेंगे. वो कहते हैं, "शिक्षा टैक्स कामयाब रहा है. कोरोना-टैक्स हमारे स्वास्थ्य सेवा प्रणाली को बेहतर बनाने और टीकाकरण अभियान को आगे बढ़ाने में मदद करेगा. जब आप स्वास्थ्य संकट के बीच होते हैं तो इसके लिए ख़र्च में वृद्धि को अधिक महत्व दिया जाना चाहिए. मैं कोरोना-टैक्स के पक्ष में हूं."
लेकिन वित्त मंत्रालय ने इस पर अभी निर्णय नहीं लिया है. फ़िलहाल इस पर विचार विमर्श जारी है.
-रजनीश कुमार
नेपाल की राजधानी काठमांडू के कमलपोखरी में सोमवार दोपहर सैकड़ों की संख्या में वृहद नागरिक आंदोलन के लोग जुटे. यहाँ लोगों ने कमलपोखरी तालाब की मिट्टी का तिलक लगाया और प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली के आवास बालुवाटार की तरफ़ मार्च करने लगे.
सभी प्रदर्शनकारी प्रधानमंत्री ओली के 20 दिसंबर को संसद भंग करने के फ़ैसले का विरोध कर रहे थे. पुलिस ने इन्हें बीच में ही रोकने की कोशिश की, लेकिन प्रदर्शनकारी नारे लगाते हुए आगे बढ़ रहे थे. पुलिस ने बल का प्रयोग किया और कई लोग ज़ख्मी हो गए.
इस आंदोलन का नेतृत्व कर रहे कांतीपुर अख़बार के पूर्व संपादक नारायण वाग्ले को भी पुलिस ने लाठी से मारा. लेकिन वाग्ले ने प्रदर्शनकारियों को वहीं संबोधित करते हुए कहा कि ओली ने संविधान की धज्जियाँ उड़ा दी हैं.

नारायण वाग्ले ने कहा, ''हमलोग शांतिपूर्ण आंदोलन चला रहे थे. पुलिस को इस आंदोलन को लेकर सूचित भी कर दिया था. हम निहत्थे हैं. लेकिन पुलिस ने दमन किया. अब तीसरे जनआंदोलन की शुरुआत हो चुकी है.'' इस आंदोलन में केपी ओली मुर्दाबाद के नारे भी लगे.
इस आंदोलन में शामिल युग पाठक ने कहा कि यहाँ सत्ता पक्ष और विपक्ष अप्रासंगिक हो चुके हैं. उन्होंने कहा कि अब नागरिक आंदोलन से ही उम्मीद बची है.

युग पाठक ने कहा कि जब सरकार मनमानी करती है तो संवैधानिक संस्थाओं से उम्मीद होती है, लेकिन वे भी ख़ामोश हैं. मामला सुप्रीम कोर्ट में है, लेकिन सुप्रीम कोर्ट में भी कछुए की गति से सुनवाई चल रही है. सुप्रीम कोर्ट को तय करना है कि संसद भंग करना संवैधानिक है या नहीं लेकिन अब तक कुछ भी नहीं हो पाया है.
नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी दो फाड़ हो गई है. पूर्व प्रधानमंत्री पुष्प कमल दाहाल दावा कर रहे हैं कि नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी की कमान उनके पास है और वर्तमान प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली कह रहे हैं कि पार्टी के अध्यक्ष वो हैं. अब निर्वाचन आयोग को तय करना है कि पार्टी किसकी है. ओली की या प्रचंड की. पार्टी निशान सूर्य किसे मिलेगा? लेकिन निर्वाचन आयोग भी अनिर्णय की स्थिति में है.

जनता की उम्मीदें
नेपाल के राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट और निर्वाचन आयोग से बहुत उम्मीद नहीं है. नेपाल के विदेश मंत्री और पीएम ओली गुट के प्रवक्ता प्रदीप ज्ञवाली से पूछा कि अभी सुप्रीम कोर्ट और निर्वाचन आयोग को निर्णायक भूमिका अदा करनी चाहिए थी लेकिन यहाँ भी चुप्पी है. नेपाल की जनता अब किससे उम्मीद करे?
इस पर प्रदीप ज्ञवाली कहते हैं, ''सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई चल रही है और उम्मीद है कि अप्रैल में चुनाव से पहले कुछ फ़ैसला आ जाएगा. निर्वाचन आयोग भी चुनाव से पहले कोई फ़ैसला दे देगा. मुझे लगता है कि चुनाव का मार्ग ही प्रशस्त होगा.''
अगर चुनाव होता है, तो नेपाल में दो साल के भीतर फिर से चुनाव होगा. ओली सरकार ने 20 दिसंबर को संसद भंग करने के बाद 30 अप्रैल और 10 मई को चुनाव की घोषणा की है.
नवंबर 2017 के आम चुनाव में प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली की पार्टी सीपीएन-यूएमएल यानी कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल-यूनाइटेड मार्क्सवादी लेनिनवादी और प्रचंड की पार्टी कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) मिलकर चुनाव लड़ी थी.
फ़रवरी 2018 में ओली पीएम बने और सत्ता में आने के कुछ महीने बाद प्रचंड और ओली की पार्टी ने आपस में विलय कर लिया. विलय के बाद नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी बनी. संसद में इनका दो तिहाई बहुमत था. लेकिन ओली और प्रचंड के बीच की यह एकता लंबे समय तक नहीं रही.
जब पार्टी का विलय हुआ था, तो यह बात हुई थी कि ओली ढाई साल प्रधानमंत्री रहेंगे और ढाई साल प्रचंड. लेकिन ढाई साल होने के बाद ओली ने कुर्सी छोड़ने से इनकार कर दिया. इसके बाद से प्रचंड बनाम ओली का खेल शुरू और संसद तक भंग कर दी गई. पिछले रविवार को प्रचंड गुट ने ओली को नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी से निकालने की घोषणा की.
क्या अब प्रतिक्रिया में ओली गुट भी प्रचंड को पार्टी से निकालेगा? इस सवाल के जवाब में प्रदीप ज्ञवाली कहते हैं, ''इसकी ज़रूरत ही नहीं है. पार्टी के पहले अध्यक्ष प्रधानमंत्री ओली हैं और वे जो फ़ैसला लेंगे वही आख़िरी होगा. निर्वाचन आयोग ने भी कह दिया है कि संसद भंग होने के बाद पार्टी के भीतर लिया गया कोई भी फ़ैसला मान्य नहीं होगा. हमें कॉमरेड प्रचंड को निकालने की ज़रूरत नहीं है. पार्टी हमलोग के पास है और इसमें कोई गुट नहीं है.''
जब ढाई-ढाई साल प्रधानमंत्री रहने की बात थी तो ओली ने कुर्सी क्यों नहीं छोड़ी? इस सवाल के जवाब में प्रदीप ज्ञवाली कहते हैं, ''ये सही बात है कि ढाई-ढाई साल प्रधानमंत्री रहने की बात हुई थी. लेकिन पार्टी के भीतर इस बात पर भी सहमति बनी थी कि कोई फ़ैसला करने से पहले संसदीय समिति के भीतर औपचारिक प्रस्ताव लाया जाएगा. लेकिन ऐसा नहीं किया गया. संसद में अविश्वास प्रस्ताव लाने की बात होने लगी, जबकि इस तरह का प्रस्ताव पहले संसदीय समिति में लाना होता है. ऐसे में अगर उनके पास ज़्यादा संख्या बल भी है तो कोई मायने नहीं रखता.''
प्रचंड और ओली के टकराव से क्या नेपाल के किशोरावस्था वाले लोकतंत्र को नुक़सान नहीं हो रहा? प्रदीप ज्ञवाली कहते हैं, ''मैं आपकी बातों से पूरी तरह सहमत हूँ. अभी नेपाल के प्रजातंत्र को सहेजने की ज़रूरत है. परिपक्व बनाने की ज़रूरत है, लेकिन सत्ताधारी पार्टी में इस तरह के मतभेद से ऐसा नहीं होगा. एकता बहुत ज़रूरी है. लोगों को यहाँ के प्रजातंत्र से बहुत उम्मीद है और हमें इस इस उम्मीद पर खरा उतरना है.''

ओली के संसद भंग करने के फ़ैसले का नेपाल में चौतरफ़ा विरोध हो रहा है. सारी विपक्षी पार्टियाँ खुलकर विरोध कर रही हैं. पूर्व प्रधानमंत्री और जनता समाज पार्टी के अध्यक्ष बाबूराम भट्टाराई का कहना है कि ओली ने पूरी तरह से असंवैधानिक और फासीवादी फ़ैसला किया है.
बाबूराम भट्टराई ने बीबीसी हिन्दी से कहा कि यह नेपाल के प्रजातंत्र को मिट्टी में मिलाने वाला फ़ैसला है. यहाँ के आम लोग भी ओली के फ़ैसले को तानाशाही फ़ैसला कह रहे हैं.
फिर से आंदोलन की राह पर नेपाल?
प्रदीप ज्ञवाली कहते हैं कि सारी पार्टियाँ इसलिए विरोध कर रही हैं क्योंकि उन्हें विरोध करना है. हालाँकि नेपाल के राजनीतिक विश्लेषक हरि शर्मा कहते हैं कि नेपाल फिर से करवट ले रहा है और एक बार फिर से आंदोलन के ज़रिए सब कुछ सेट करेगा.
वे कहते हैं, ''जिस दिन ओली ने लिपुलेख और कालापानी को लेकर नया नक्शा जारी किया उसी दिन लग गया था कि ये आदमी मोदी सरकार से कुछ सौदा करने वाला है और यही हुआ. अब ये मोदी सरकार के साथ खड़े हैं. जिस तरह से मोदी भारत में संवैधानिक लोकतंत्र को बदले लोकप्रिय लोकतंत्र चला रहे हैं उसी तरह से ओली भी संवैधानिक लोकतंत्र के बदले लोकप्रियतावाद की तरफ़ बढ़ रहे थे. प्रचंड ने रोका तो संवैधानिक लोकतत्र को ख़ारिज कर दिया.''
हरि शर्मा कहते हैं कि ओली अब नेपाल की राजनीति में अप्रासंगिक हो गए हैँ और आने वाले वक़्त में वो भी इस बात को समझ जाएंगे. हरि शर्मा कहते हैं, ''ओली ने भले संप्रभुता के नाम पर लिपुलेख और कालापानी को नक्शे में शामिल किया, लेकिन संप्रभुता केवल ज़मीन से नहीं बल्कि लोगों के मन से होती है. यह भारत से सौदे के लिए क़दम था और अब साफ़ दिखने लगा है.''
नेपाल प्रदर्शन
अखिल नेपाल राष्ट्रीय स्वतंत्र विद्यार्थी यूनियन के नेता रहे गणेश प्रसाद मैनाली कहते हैं कि ओली ने संसद भंग कर संविधान और लोकतंत्र के ख़िलाफ़ काम किया है. मैनाली कहते हैं, ''नेपाल में अभी ग़रीबी और महंगाई को लेकर काम करने की ज़रूरत है लेकिन ये लोग आपस में ही लड़ रहे हैं. इससे केवल कम्युनिस्ट मास बेस में ही निराशा नहीं है, बल्कि आम लोग भी आक्रोशित हैं. यह नेपाल के मज़बूत वामपंथी एकता और लोकतंत्र का बहुत दुखद चैप्टर है.''
त्रिभुवन यूनिवर्सिटी में राजनीतिक शास्त्र के प्रोफ़ेसर हरि रोका कहते हैं कि नेपाल का मौजूदा संविधान फेल हो गया है. हरि रोका के अनुसार, ''इस संविधान से लोकतंत्र नहीं चलेगा. ओली ने जिस तरह से फ़ैसला किया, उसे रोकने के लिए नए संविधान की ज़रूरत है. मौजूदा संसद समावेशी के लिहाज से लाजवाब थी. इसमें मुसलमान, दलित और महिलाओ की मज़बूत भागीदारी थी लेकिन ओली ने चलने नहीं दिया.''
भारत पर उठते सवाल
हरि रोका कहते हैं, "ओली पर भारत की सत्ताधारी पार्टी और वहाँ के अभिजात्य तबके का भी दबाव था. इसके अलावा अमेरिका का भी दबाव था. ओली इसके सामने झुक गए. हालाँकि ओली को झुकने से उन्हें कोई फ़ायदा नहीं मिलने जा रहा. उनकी राजनीति अब ख़त्म हो चुकी है."
"दरअसल, ओली को प्रचंड ठीक से समझ नहीं पाए. उनका आकलन बिल्कुल ग़लत साबित हुआ. अब नेपाल नए आंदोलन की तरफ़ बढ़ रहा है. अब नया नेतृत्व पैदा होगा. प्रचंड, बाबूराम भट्टाराई और माधव कुमार नेपाल के नेतृत्व का वक़्त अब ख़त्म हो चुका है. अब कोई नया नेतृत्व उभरेगा और वही नेपाल को मज़बूत लोकतंत्र की राह पर लाएगा. अब इस सविंधान से काम नहीं चलने वाला है."
ओली
नेपाल में संसद भंग होने से भारत को क्या फ़ायदा होगा? हरि रोका कहते हैं कि वो भारत की बात नहीं कर रहे बल्कि भारत की उस ताक़त की बात कर रहे हैं, जो हिंदू राष्ट्र की बात करता है. रोका कहते हैं, ''भारतीय जनता पार्टी अपने मुल्क को हिंदू राष्ट्र नहीं बना पा रही है, लेकिन नेपाल में ऐसा करना चाहती है और ओली उसी के शिकार हुए हैं.''
हालाँकि बाबूराम भट्टराई इस बात बात से सहमत नहीं हैं कि संविधान फेल हो गया है. उन्होंने बीबसी से कहा कि संविधान का ओली ने उल्लंघन किया है और सुप्रीम कोर्ट की ज़िम्मेदारी है कि जवाबदेही तय करे.
नेपाल में जब भी कोई राजनीतिक अस्थिरता होती है तो भारत का नाम ज़रूर आता है. इस बार भी नेपाल के कई राजनीतिक विश्लेषक भारत पर उंगली उठा रहे हैं. क्या वाक़ई भारत की कोई भूमिका है?
भारत में 1996-97 में नेपाल के राजदूत रहे लोकराज बराल कहते हैं, ''नेपाल में विदेशी हस्तक्षेप ख़ुद से नहीं आता. हम इसे इन्वाइटेड हस्तक्षेप कहते हैं. यानी आमंत्रित हस्तक्षेप. ये आज की बात नहीं है. ऐसा नेहरू के ज़माने से हो रहा है. हर बार यहाँ की राजनीतिक पार्टियाँ अपनी सत्ता बचाने के भारत या चीन का सहारा लेती हैं और कहती हैं कि बाहरी हस्तक्षेप हो रहा है.''
पीएम ओली ने जब लिपुलेख और कालापानी को शामिल करते हुए नेपाल का नया नक्शा जारी किया, तो उन्हें भारत विरोधी के तौर पर भारतीय मीडिया में रेखांकित किया गया. लेकिन संसद भंग किए जाने के बाद नेपाल में कहा जा रहा है कि ओली को भारत की शह मिली हुई है इसलिए अड़े हुए हैं. हालाँकि प्रदीप ज्ञवाली इन बातों को बकवास बताते हैं.
प्रदीप ज्ञवाली पिछले हफ़्ते भारत के तीन दिवसीय दौरे पर आए थे. उन्होंने विदेश मंत्री एस जयशंकर से मुलाक़ात की थी. प्रदीप ज्ञवाली से पूछा कि उनका भारत दौरा कैसा रहा है? ज्ञवाली ने कहा, ''बहुत ही अच्छा रहा. सारे मुद्दों पर बात हुई. सीमा विवाद पर भी बात हुई. पहले भारत इस पर बात करने को तैयार नहीं होता था, लेकिन अब बात कर रहा है. अब वो मान रहा है कि सीमा विवाद है. हालाँकि अब भी दोनों पक्षों के बीच मतभेद हैं.''
प्रदीप ज्ञवाली कहते है कि इस बार भारत का रुख़ सकाराकत्मक रहा है. नेपाल के राजनीतिक हलकों में भारत के वर्तमान विदेश मंत्री एस जयशंकर को लेकर लोग हमलावर रहते हैं. 2015 में जब नेपाल ने अपना नया संविधान बनाया, तो भारत ने मधेसियों को लेकर इस संविधान को नहीं लागू करने का दबाव डाला था.
तब एस जयशंकर विदेश सचिव थे और वही भारत का पक्ष लेकर आए थे. यहाँ के लोग बताते हैं कि जयशंकर ने बहुत ही आक्रोश के साथ इस संविधान को रोकने के लिए कहा था. लेकिन तब नेपाल की सारी पार्टियाँ एकजुट हो गई थीं और भारत की आपत्ति को किनारे रखते हुए वही संविधान लागू किया था. उसके बाद भारत की तरफ़ से अघोषित नाकाबंदी हुई और नेपाल के आम लोगों को भारी मुश्किलों का सामान करना पड़ा था. तब से नेपाल में एक तरह का भारत विरोधी भावना भी बढ़ी है.
लोकराज बराल कहते हैं कि तब एस जयशंकर का तरीक़ा सही नहीं था. उन्हें अपना पक्ष रखना चाहिए था, लेकिन नरम तेवर से. बराल कहते हैं कि नेपाल पहली बार संविधान बना रहा था और भारत को इसका स्वागत करना चाहिए था, क्योंकि संविधान में कमियाँ वक़्त के साथ दूर की जा सकती थीं.
पिछले एक साल में नेपाल के प्रधानमंत्री ओली ने भारत को लेकर कई तीखे बयान दिए और भारत में मुख्यधारा के मीडिया में यह छवि पेश की गई कि ओली चीन परस्त हैं. जब ओली ने संसद भंग किया तो कॉम्युनिस्ट पार्टी ऑफ चाइना का एक प्रतिनिधिमंडल भी नेपाल आया. इस प्रतिनिधिमंडल के बारे में कहा गया कि वो नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी में प्रचंड बनाम ओली के बिखराव को रोकना चाहता था. इस प्रतिनिधिमंडल ने दोनों धड़ों से मुलाक़ात भी की, लेकिन ओली के बारे में कहा गया कि वो नहीं माने.
इसके बाद अचानक से ओली ने एक भारतीय चैनल को इंटरव्यू दिया. यह चैनल उन भारतीय चैनलों में शामिल था, जिसे एक कुछ महीने पहले ही नेपाल बैन किया था. इन चैनलों पर नेपाल में चीन की राजदूत और ओली के हनी ट्रैप की मनगढ़ंत कहानियाँ चलाई जा रही थीं.
नेपाली मीडिया में इस इंटरव्यू को ओली और मोदी की दोस्ती से जोड़ा जाने लगा. चीन के मनाने पर भी ओली के नहीं मानने को भारत की जीत की रूप में देखा जाने लगा.
इसी हफ़्ते ओली पशुपतिनाथ मंदिर में दर्शन करने गए तो नेपाल के पत्रकार कहने लगे कि नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी में एक राइट विंग पैदा हो चुका है और ओली उसका नेतृत्व करेंगे.
लेखक और प्रकाशक मणि शर्मा ने ट्वीट कर कहा, ''पशुपतिनाथ मंदिर में ओली के जाकर पूजा करने से साफ़ हो गया है कि नेपाल में धर्मनिरपेक्षता को ख़ारिज करने की पूरी तैयारी हो चुकी है. आने वाले दिनों में ओली अभी और ऐसे क़दम उठाएँगे, जिसे नेपाल को भुगतना होगा.'' (bbc.com)
-Kundan Pandey
केंद्र सरकार ने करीब तीन सालों पहले ग्रामीण कृषि बाजार बनाने की घोषणा की थी। इसके तहत छोटे और मझोले किसानों को अपनी फसल सही दाम में बेचने की सहूलियत मिलने की बात की गई थी। तीन साल हो गए और यह विचार अभी भी कागज तक सीमित है।
पहले दो साल में सरकार को करीब 10,000 कृषि हाट बना लेना था लेकिन अब तक सिर्फ एक राज्य ने ग्राम नाम की इस योजना में दिलचस्पी दिखाई है। कृषि मंत्रालय का कहना है कि अन्य राज्यों को इसके लिए तैयार कराया जा रहा है।
तमाम अध्ययन बताते हैं कि बाजार के सुलभ न होने से किसानों को उनकी फसल का उचित दाम नहीं मिल पाता है। छोटे किसान अपनी फसल बेचने के लिए दूर मंडी तक नहीं जा सकते और स्थानीय स्तर पर उन्हें सस्ते दरों पर ही अपनी उपज बेचनी पड़ती है।
कृषि हाट के दिशानिर्देश भी हाल ही में आए तीन नए कृषि कानून की तरह ही है। इस दिशानिर्देश भी कृषि हाट को कम से कम नियंत्रित करने की बात करता है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर नियंत्रण नहीं रहा तो इससे किसानों को फायदा नहीं मिलेगा।
करीब दो महीने तक राजधानी की सीमा के बाहर हाड़ कंपा देने वाले सर्दी में संघर्ष करने के बाद लाखों किसानों गणतंत्र दिवस के दिन दिल्ली की सीमा में ट्रैक्टर जुलूस के साथ प्रवेश कर पाए। केंद्र सरकार द्वारा लाए गए तीन कृषि कानूनों का विरोध का विरोध कर रहे किसानों में से एक की मौत हो गयी और पुलिस के लाठी चार्ज में कई किसान घायल हुए। सौ के करीब किसान पहले ही ठंड की वजह से अपनी जान गंवा चुके हैं। ये किसान सरकार के इस दावे से संतुष्ट नहीं है कि इन कानूनों से उनका भला होगा। इनको सरकार की नियत पर संदेह है। किसानों की आय बढ़ाने के सरकार के पिछले आदेश को देखा जाए तो ये संदेह और पुख्ता होता है।
अपने 2018-19 के बजट भाषण के दौरान, पूर्व वित्त मंत्री अरुण जेटली ने घोषणा की कि सरकार करीब 22,000 मौजूद ग्रामीण हाटों को कृषि हाट के तौर पर विकसित करेगी। इससे छोटे और मझोले किसानों को उनकी फसल का बेहतर दाम मिल सकेगा। इसकी पहली समय-सीमा 31 मार्च 2020 निर्धारित की गई थी। इस समय-सीमा को बीते एक साल होने को जा रहा है और इस मामले में अब तक कुछ भी नहीं हुआ है।
मोंगाबे-हिन्दी द्वारा दायर एक आरटीआई के जवाब में कृषि और किसान कल्याण विभाग ने जनवरी 19 को बताया किया राज्य सरकारों को डीटेल प्रोजेक्ट रिपोर्ट (डीपीआर) भेजने के लिए तैयार कराया जा रहा है। अभी तक बस एक राज्य (गुजरात) से ही यह रिपोर्ट भेजी गयी है। इस रिपोर्ट को देखा-परखा जा रहा है।
इस योजना के समय-सीमा के बारे में दिशा-निर्देश में लिखा है कि 31 मार्च 2020 तक जो राज्य रिपोर्ट भेजेंगे और अगर उसपर सहमति बन गई तो उन राज्यों को इस योजना के तहत सहायता मिलेगी।
जब आरटीआई आवेदन में समय-सीमा के बारे में पूछा गया तो विभाग ने बताया कि पहले 31 मार्च 2020 थी जिसे कोविड की वजह से एक साल के लिए बढ़ा दिया गया है। सनद रहे कि 24 मार्च 2020 को केंद्र सरकार ने लॉकडाउन की घोषणा की थी। साल के आखिरी दिन यानी 31 मार्च से महज छः दिन पहले। अगर नई समय-सीमा को भी देखा जाए तो इसे पूरा होने में महज दो महीने बाकी हैं और धरातल पर नतीजा सिफर है।
कृषि विशेषज्ञ देविंदर शर्मा कहते हैं कि इससे सरकार की गंभीरता का पता चलता है। सरकार कृषि क्षेत्र के लिए आधारभूत संरचना को लेकर कितनी गंभीर है! देश में अभी 7,000 के करीब मंडियाँ हैं और कुल 42,000 की जरूरत बताई जाती है। भारत जैसे देश के लिए इतनी मंडी खड़ा कर देना कोई बड़ी बात नहीं थी पर सरकारों ने जानबूझकर इसपर ध्यान नहीं दिया। अब इसको ढंकने के लिए वर्तमान सरकार ने ग्राम हाट की घोषणा कर दी जिसे ईनाम से जोड़ा जाना था। ईनाम कृषि व्यवसाय का एक अनलाइन प्लेटफॉर्म है।
कृषि क्षेत्र में काम करने वाले पोर्टल असलीभरत.कॉम के संपादक अजीत सिंह कहते हैं कि इससे यही पता चलता है कि सरकार किसानों को सही दाम दिलाने को लेकर कितनी सक्रिय है! सरकार ने तीन साल पहले बड़े वादे किये लेकिन जमीन पर अभी तक कुछ भी नहीं बदला। अब सरकार नए कानून लाकर कॉर्पोरेट को कह रही है कि जाईए बाजार पर कब्जा कर लीजिए।
और पढ़ें: कृषि पर बदलते मौसम की मार भी है किसान आंदोलन की एक वजह
बाजार का सुलभ नहीं होना: किसानों की फसल का उचित दाम नहीं मिलने का बड़ा कारण
वर्ष 1995 से 2011 के बीच , करीब तीन लाख किसानों ने आत्महत्या कर ली। घटती आमदनी और क्लाइमेट चेंज से बढ़ती अनिश्चितता ने किसानों की मुश्किलें बढ़ाईं ही हैं। परिणामस्वरूप अभी भी हर साल, हजारों किसान आत्महत्या करने को मजबूर हैं। स्थिति सुधारने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2016 में वादा किया कि सरकार 2022 तक देश के किसानों की आमदनी दोगुनी कर देगी।
कई रपट जिसमें सरकार द्वारा बनाई गई कमिटी की रपट भी शामिल हैं ने इसका अध्ययन किया और बताया कि बाजार का सुलभ नहीं होना छोटे और मझोले किसानों के कम आय का मुख्य कारण है। कमेटी कहती है, “भारत में अधिकतर किसान छोटे और मझोले श्रेणी में आते हैं और औसतन 1.1 हेक्टेयर भूमि पर खेती करते हैं। ऐसे में अच्छी उपज और अच्छे दाम पाना एक चुनौती है।”

दिल्ली स्थिति आजादपुर मंडी में किसान और आढ़तिये रोजमर्रा की गतिविधि में शामिल। तस्वीर: श्रीकांत चौधरी
हाल ही में प्रकाशित एक रपट प्रकाशित हुई जिसमें बिहार, उड़ीसा और पंजाब के कृषि बाजार का अध्ययन किया गया था। इसमें कहा गया था कि खेत की भौगोलिक दूरी से तय होता है कि किसान को उसके फसल का कैसा दाम मिलेगा। जिनके खेत बाजार से बहुत दूर हैं उनके लिए उचित दाम मिलना लगभग नामुमकिन है। अव्वल तो किसान को उसकी फसल का कम दाम मिलता है क्योंकि दूर मंडी में ले जाने का उसका खर्च बढ़ जाता है। मंडी में अपनी फसल नहीं ले जा पाने की सूरत में उनके पास एक ही विकल्प बचता है कि वे किसी को भी अपनी फसल बेचने दें। क्योंकि सुदूर क्षेत्र में फसलों के कई खरीददार आते ही नहीं। इस अध्ययन को पेन्सिलवेनिया विश्वविद्यालय के सेंटर फॉर एडवांस्ड स्टडी ऑफ इंडिया ने बीते दिसंबर में प्रकाशित किया था।
नरेंद्र मोदी सरकार ने 2016 में किसानों की आय दोगुनी करने के उद्देश्य से एक कमेटी भी बनायी थी। इस कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि देश की मंडी व्यवस्था थोक कृषि उपज को ध्यान में रखकर बनाई गईं हैं। ये मंडियां औसतन 50 किलोमीटर की दूरी पर स्थित हैं। छोटे और मझोले किसान इन मंडियों तक नहीं पहुंच पाते। ऐसी स्थिति में छोटे किसानों के पास कोई विकल्प नहीं रह जाता सिवाय इसके कि स्थानीय एजेंट को बेच दें। यह एजेंट अपनी मनमानी दाम पर फसल खरीदता है।
इस मुश्किल से निपटने के लिए कमेटी ने सुझाव दिए कि देश में 30,000 के करीब छोटी-बड़ी मंडी का निर्माण किया जाए। इसमें खुदरा और थोक-दोनों तरह की मंडियां शामिल हों। इसी सुझाव में कमेटी ने कहा था कि देश में कुल 22,000 के करीब ग्रामीण हाट हैं और इन्हें कृषि हाट के तौर पर विकसित किया जाना चाहिए। कमेटी के अनुसार आस-पास के खेतों से इन हाटों की दूरी पांच से छः किलोमीटर की होती है और किसान यहां अपनी उपज आसानी से बेच सकता है।
यह सामाधान बस कागज पर सिमट कर रह गया
केंद्र सरकार ने कमिटी के इस सुझाव को गंभीरता से लिया और देश के पूर्व वित्त मंत्री अरुण जेटली ने 2018-19 के अपने बजट भाषण में घोषणा की, “ सरकार देश में मौजूदा 22,000 ग्रामीण हाट को ग्रामीण एग्रिकल्चर मार्केट (ग्राम) के तौर पर विकसित करेगी। मनरेगा और अन्य सरकारी योजनाओं की भी मदद ली जाएगी। ये ग्राम हाट ईनाम से भी जोड़े जाएंगे। इससे किसानों को थोक विक्रेताओं और अन्य लोगों को अपनी फसल बेचने में सहूलियत होगी।” इस बाबत पूर्व वित्त मंत्री ने 2,000 करोड़ रुपये के अग्री-मार्केट इन्फ्रस्ट्रक्चर फंड की भी घोषणा कर दी।
इसके बाद कृषि मंत्रालय ने 2018-19 और 2019-20 के लिए दस हजार हाट का लक्ष्य निर्धारित किया। दो साल में दस हजार हाट को कृषि हाट में तब्दील करने के लक्ष्य निर्धारित करने के पीछे यह तर्क दिया गया कि देश में 11,811 हाट पंचायतों के अधीन हैं। इन्हीं हाटों के पुनर्निर्माण में मनरेगा और सरकारी योजनाओं की मदद ली जा सकेगी। इसलिए पहले इन्हीं हाटों को विकसित किया जाएगा। इन 11,811 में से हजार के करीब हाट का कृषि हाट के तौर पर पहले ही विकास किया जा चुका था। पूर्व वित्तमंत्री के घोषणा से पहले।

बाजार में दाम गिरने की वजह से महाराष्ट्र के अहमदनगर जिले के धवलपुरी गांव में किसान ने पत्ते गोभी की फसल चरने के लिए छोड़ दी। तस्वीर: श्रीकांत चौधरी
कृषि मंत्रालय के द्वारा तय किया गया यह लक्ष्य भी कागज तक सीमित होकर रह गया। आरटीआई में मिले जवाब में कहा गया, “ऑपरेशनल दिशा-निर्देश राज्यों को भेजी जा चुकी है और राज्यों को अपना प्रस्ताव भेजने के लिए तैयार किया जा रहा है। ताकि उनको इस स्कीम के तहत मदद की जा सके।”
सावधानी: नियंत्रित बाजार से ही किसानों को मिलेगा फायदा
मोंगाबे-हिन्दी ने जितने विशेषज्ञों से बात की लगभग सभी ने विनियमित मंडी की जरूरत पर बल दिया। ऐसी मंडी जहां सामान्य किसानों की सुरक्षा के मद्देनजर कुछ नियम-कानून हों। खासकर तीन नए कृषि कानूनों और उससे जुड़े विवाद के बाद विशेषज्ञों का यह मानना है कि सरकारी मंडी हो या निजी मंडी पर इसको चलाने के लिए समुचित नियम-कानून होने चाहिए। तभी किसानों का भला होगा।
लेकिन गौर करने की बात यह है कि तीन साल पहले आए इस योजना के दिशा-निर्देश में कृषि हाटों को कम से कम नियंत्रित करने की बात की गई है। इसमें कहा गया है कि राज्य सरकार को सुनिश्चित करना चाहिए कि ए ग्राम हाट अनियंत्रित या नॉन-रेगुलटेड एनवायरनमेंट में काम करें।
मोंगाबे-हिन्दी से बात करते हुए प्रोफेसर और भारतीय प्रबंधन संस्थान (आईआईएम) में कृषि में प्रबंधन केंद्र के पूर्व अध्यक्ष सुखपाल सिंह कहते हैं, “मैं मानता हूं कि नियम-कानून होना बहुत जरूरी है। इससे किसानों के साथ कोई भी मनमानी नहीं कर सकता। एक आदिवासी समाज के बारे में सोचिए जहां साक्षरता का स्तर काफी कम है। अगर कोई वहां जाता है और उनकी फसल खरीदते वक्त कुछ गड़बड़ करता है तो वह किसान भला किसके पास जाएगा। अपनी सुरक्षा कैसे करेगा।”
इस बात को कई तरह से समझाया जा सकता है। छोटे और मझोले किसान मंडी को पूरी छूट होनी चाहिए कि वो कहीं भी अपनी उपज बेच सकें। निजी मंडी हो या कान्ट्रैक्ट फ़ार्मिंग हो। कहीं भी।
“लेकिन यह स्पष्ट होना चाहिए कि किसान को न केवल बाजार चाहिए बल्कि ऐसा बाजार चाहिए जहां उसकी फसल का उचित दाम मिल सके। ऐसे बाजार का क्या फायदा जहां फसल की बोली ही नहीं लगे। ऐसे में किसान को कैसे पता चलेगा कि उसके फसल का इससे अधिक दाम भी मिल सकता था! इससे कोई नहीं मना कर सकता कि इन सबके लिए किसानों को मंडी की आवश्यकता है पर इससे अधिक जरूरी है नियम-कानून की जो उनकी फसल का दाम दिला सके। बिहार का उदाहरण देख लीजिए। वहां मंडी है पर नियंत्रित नहीं है। इसलिए वहां किसानों को उचित मूल्य नहीं मिल पा रहा,” प्रोफेसर सुखपाल सिंह कहते हैं।
इसी बात को फूड सोवरनिटी अलायंस से जुड़ी जन्तु वैज्ञानिक सागरी आर रामदास जोर देते हुए कहतीं हैं कि बिना नियंत्रण के ये ग्राम हाट किसानों को उनकी फसल का उचित दाम नहीं दिला पाएंगे। ऐसा लग रहा है कि सरकार एक ऐसी जगह बना रही है जहां सारे किसान अपनी उपज लेकर जमा हों ताकि खरीदने वाले को सहूलियत हो सके। खरीददार को एक ही जगह पर सारे किसान मिल जाएंगे और उसे लोगों के पास घूम-घूमकर मोल-भाव नहीं करना पड़ेगा।
उन्होंने एक कानूनी मुश्किल का भी जिक्र किया। नए कृषि कानून हो या ग्राम हाट के दिशा-निर्देश। इनके अनुसार आदिवासी क्षेत्र खासकर अनुसूची पाँच के दायरे में आने वाले क्षेत्र में ग्राम सभा ही सबकुछ तय करती है। ऐसे क्षेत्रों में ये मंडियां कैसे काम करेंगी! ये मंडियां क्या सरकार के बनाये नए कानून से चलेंगी या ग्रामम सभा का इनमें हस्तक्षेप होगा! अगर ग्राम सभा को हस्तक्षेप करने की अनुमति नहीं होगी तो क्या यह पुराने कानून का उल्लंघन नहीं माना जाएगा! क्या इनपर ग्राम सभा अपने नियम थोप सकेगी या सरकार पुराने कानूनों को ताक पर रखना चाहती है! पंचायत (अनुसूचित क्षेत्रों में विस्तार) अधिनियम के तहत देश के कई इलाकों को खास प्रावधान के तहत ग्राम सभा को अत्यधिक ताकत दी गयी है। अभी बहुत कुछ स्पष्ट नहीं है, रामदास कहतीं हैं। (hindi.mongabay.com)
दिल्ली में किसान परेड के दौरान हुई अप्रिय घटनाओं ने किसानों को एक कदम पीछे हटने पर मजबूर कर दिया है. उन्होंने एक फरवरी को संसद तक पदयात्रा करने की योजना को स्थगित कर दिया है और 30 जनवरी को एक दिन के उपवास की घोषणा की है.
डॉयचे वैले पर चारु कार्तिकेय का लिखा-
संयुक्त किसान मोर्चा ने एक बयान जारी करते हुए एक बार फिर किसान परेड के दौरान तय मार्ग से अलग चले जाने वालों से खुद को अलग किया है, उन्हें कुछ असामाजिक तत्त्व बताया और उन सभी अप्रिय घटनाओं को "सात महीनों से चल रहे एक शांतिपूर्ण आंदोलन को बदनाम करने की साजिश बताया". मोर्चा ने स्पष्ट रूप से कहा कि आंदोलन को हिंसक बनाने के लिए सरकार जिम्मेदार है.
बयान में पंजाबी अभिनेता दीप सिद्धू और किसान मजदूर संघर्ष समिति के नेता सतनाम सिंह पन्नू जैसे लोगों और संगठनों को भी हिंसा का जिम्मेदार बताया गया और सरकार पर इनकी मदद से साजिश रचने का आरोप लगाया गया. हालांकि, इसके साथ ही मोर्चा ने लाल किले और आईटीओ पर हुई घटनाओं की नैतिक जिम्मेदारी भी ली और घोषणा की कि इसी वजह से एक फरवरी को संसद तक पदयात्रा निकालने की योजना को स्थगित किया जा रहा है.
मोर्चा ने यह भी स्पष्ट किया कि आंदोलन शांतिपूर्ण ढंग से जारी रहेगा. दूसरी तरफ दिल्ली पुलिस ने लाल किले और आईटीओ पर हुई हिंसा के संबंध में अपनी कार्रवाई शुरू कर दी है. पुलिस ने 25 एफआईआर दर्ज की हैं और इनमें जिन लोगों के नाम दर्ज किए हैं उनमें पिछले कुछ महीनों से सरकार के साथ बातचीत करने वाले 40 किसान नेताओं में से 37 नेता भी शामिल हैं.
इनमें भारतीय किसान यूनियन (बीकेयू) के राष्ट्रीय अध्यक्ष राकेश टिकैत, पंजाब में बीकेयू के अलग अलग धड़ों के नेता, क्रांतिकारी किसान यूनियन के अध्यक्ष दर्शन पाल, स्वराज पार्टी के अध्यक्ष योगेंद्र यादव और जानी मानी एक्टिविस्ट मेधा पाटकर भी शामिल हैं. दीप सिद्धू और गैंगस्टर से नेता बने लखबीर सिंह सिधाना के खिलाफ भी एक एफआईआर दर्ज की गई है.
एफआईआर में दंगा करने, आपराधिक साजिश, हत्या की कोशिश और चोरी से संबंधित धाराएं लगाई गई हैं. कई किसान नेताओं ने इन आरोपों से इनकार किया है और एफआईआर में उनका नाम दर्ज किए जाने का विरोध किया है, लेकिन दिल्ली पुलिस लोगों को गिरफ्तार करना शुरू कर चुकी है. अभी तक कम से कम 19 लोगों को गिरफ्तार कर लिया गया है और 50 और लोगों को हवालात में रखा गया है.
जानकारों का कहना है कि अगले कुछ दिन आंदोलन के भविष्य के लिए नाजुक होंगे. ग्रामीण विषयों की समाचार वेबसाइट रूरलवॉयस के संपादक हरवीर सिंह ने डॉयचे वेले से कहा कि 26 जनवरी की घटनाओं को किसान संगठनों की नाकामी के रूप में देखा जाएगा क्योंकि परेड का आयोजन उन्होंने ही किया था. हरवीर सिंह का यह भी मानना है कि इन घटनाओं से पिछले दो महीनों में बनी आंदोलन की साख पर प्रतिकूल असर पड़ेगा और इसके लिए किसान संगठन अपनी जवाबदेही से हट नहीं सकते.
पूर्वोत्तर राज्य अरुणाचल प्रदेश में छह दशक से ज्यादा समय से रहने वाले चकमा और हाजोंग जनजाति के संगठन राज्य की मतदाता सूची में नाम शामिल नहीं किए जाने के आरोप में आंदोलन की राह पर हैं.
डॉयचे वैले पर प्रभाकर मणि तिवारी का लिखा-
चकमा और हाजोंग जनजाति के संगठनों का कहना है कि तमाम जरूरी और वैध दस्तावेज जमा करने के बावजूद चुनाव आयोग ने बिना कोई कारण बताए बहुत से लोगों के आवेदनों को खारिज कर दिया है. इन जनजातियों के 18 साल से ज्यादा उम्र के हजारों मतदाता हैं. हाल में एक सरकारी सर्वेक्षण से यह बात सामने आई है कि राज्य में इन दोनों जनजातियों के महज 5,097 लोगों को ही मतदान का अधिकार है.
सुप्रीम कोर्ट ने वर्ष 2015 में इन लोगों को नागरिकता देने का निर्देश दिया था. लेकिन अब तक यह मामला कानूनी दाव-पेंच और लालफीताशाही में उलझा है. चकमा और हाजोंग तबके के लोगों को नागरिकता या जमीन खरीदने का अधिकार नहीं है. राज्य में पेमा खांडू के नेतृत्व वाली सरकार की दलील रही है कि इन शरणार्थियों को नागरिकता देने की स्थिति में स्थानीय जनजातियां अल्पसंख्यक हो जाएंगी.
पुराना है विवाद
अरुणाचल प्रदेश में चकमा और हाजोंग जनजाति के मुद्दे पर विवाद काफी पुराना है. करीब छह साल पहले सुप्रीम कोर्ट ने राज्य में इन दोनों जनजातियों के लोगों को भारतीय नागरिकता देने का निर्देश दिया था. लेकिन उसके बावजूद यह मुद्दा अब तक पूरी तरह सुलझ नहीं सका है. अरुणाचल प्रदेश के स्थानीय संगठन इन जनजातियों को राज्य से खदेड़ने की मांग करते रहे हैं. आखिर यह जनजातियां कहां से आई और इनके मुद्दे पर विवाद क्यों है? इसके लिए कोई छह दशक पीछे जाना होगा.
यह दोनों जनजातियां देश के विभाजन के पहले से चटगांव की पहाड़ियों (अब बांग्लादेश में) रहती थीं. लेकिन 1960 के दशक में इलाके में एक पनबिजली परियोजना के तहत काप्ताई बांध के निर्माण की वजह से जब उनकी जमीन पानी में डूब गई तो उन्होंने पलायन शुरू किया. चकमा जनजाति के लोग बौद्ध हैं जबकि हाजोंग जनजाति हिंदू है. देश के विभाजन के बाद तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान में भी उनको धार्मिक आधार पर काफी अत्याचर सहना पड़ा था.
साठ के दशक में चटगांव से भारत आने वालों में से महज दो हजार हाजोंग थे और बाकी चकमा. यह लोग तत्कालीन असम के लुसाई पर्वतीय जिले (जो अब मिजोरम का हिस्सा है) से होकर भारत पहुंचे थे. उनमें से कुछ लोग तो लुसाई हिल्स में पहले से रहने वाले चकमा जनजाति के लोगों के साथ रह गए. लेकिन भारत सरकार ने ज्यादातर शरणार्थियों को अरुणाचल प्रदेश में बसा दिया और इन लोगों को शरणार्थी का दर्जा दिया गया.
शरणार्थियों की तादाद बढ़ी
वर्ष 1972 में भारत और बांग्लादेश के तत्कालीन प्रधानमंत्रियों के साझा बयान के बाद केंद्र सरकार ने नागरिकता अधिनियम की धारा 5 (आई)(ए) के तहत इन सबको नागरिकता देने का फैसला किया. लेकिन तत्कालीन नार्थ ईस्ट फ्रंटियर एडमिनिस्ट्रेशन (नेफा) सरकार ने इसका विरोध किया. बाद में यहां बने अरुणाचल प्रदेश की सरकार ने भी यही रवैया जारी रखा. सुप्रीम कोर्ट में दायर एक याचिका के जवाब में राज्य सरकार ने अपने हलफनामे में कहा कि वह बाहरी लोगों को अपने इलाके में बसने की अनुमति नहीं दे सकती. अनुमति देने की स्थिति में राज्य में आबादी का अनुपात प्रभावित होगा और सीमित संसाधनों पर बोझ बढ़ेगा.
अरुणाचल प्रदेश के इलाके को वर्ष 1972 में केंद्रशासित प्रदेश का दर्जा दिया गया था. वर्ष 1987 में इसे पूर्ण राज्य का दर्जा मिलने के बाद अखिल अरुणाचल प्रदेश छात्र संघ (आप्सू) ने चकमा व हाजोंग समुदाय के लोगों को राज्य में बसाने की कवायद के खिलाफ बड़े पैमाने पर आंदोलन शुरू किया. आप्सू का यह विरोध अब तक जारी है.
इस दौरान शरणार्थियों की तादाद लगातार बढ़ती रही. वर्ष 1964 से 1969 के दौरान राज्य में जहां इन दोनों तबके के 2,748 परिवारों के 14,888 शरणार्थी थे वहीं 1995 में यह तादाद तीन सौ फीसदी से भी ज्यादा बढ़ कर साठ हजार तक पहुंच गई. फिलहाल राज्य में इनकी आबादी करीब एक लाख तक पहुंच गई है.
ताजा विवाद
चकमा और हाजोंग तबके के लोगों के नाम मतदाता सूची में शामिल नहीं किए जाने के विरोध में अरुणाचल प्रदेश चकमा स्टूडेंट्स यूनियन समेत कई अन्य संगठनों ने आंदोलन शुरू किया है. राजधानी इटानगर में जारी एक बयान में यूनियन ने कहा है कि हाल में नेशनल वोटर्स डे मनाया गया है. लेकिन अरुणाचल प्रदेश में दशकों से रहने वाले चकमा और हाजोंग तबके के लोगों के लिए यह बेमानी है. हजारों नए वोटरों के आवेदन बिना कोई कारण बताए खारिज कर दिए गए हैं.
चकमा यूथ फेडरेशन के एक नेता आरोप लगाते हैं, "तमाम जरूरी दस्तावेज संलग्न करने के बावजूद चुनाव अधिकारियों ने बिना कोई कारण बताए हजारों आवेदनों को खारिज कर दिया है. हमारे तबके के हजारों युवकों ने 18 साल की उम्र होने के बाद बीते साल नवंबर-दिसंबर के दौरान मतदाता सूची में संशोधन के लिए चलाए गए विशेष अभियान के दौरान आवेदन किया था. इनमें से महज कुछ लोगों के नाम ही शामिल किए गए.'
इन संगठनों ने इस मुद्दे पर चुनाव आयोग के अलावा, प्रधानमंत्री और राज्य सरकार को भी पत्र लिखने का फैसला किया है. इनका आरोप है कि भेदभाव की नीति अपनाते हुए जान-बूझ कर इन दोनों तबके के लोगों के नाम मतदाता सूची में शामिल नहीं किए जा रहे हैं. (dw.com)
-प्रकाश दुबे
गणतंत्र दिवस पर ब्रिटेन के प्रधानमंत्री ने आने से मना कर दिया। यह पहला अच्छा काम हुआ। जिस देश ने बरसों गुलाम रखा, उसी देश का मुखिया जनतंत्र पर उपदेशामृत पिलाकर जाता। महात्मा गांधी की जय और गोडसे जिंदाबाद का युगलगान जैसा अजीबोगरीब काकटेल बनता। दिल्ली में गणतंत्र दिवस पर गलवान और चुस्कू की मौजूदगी दूसरा अच्छा काम है। चीन की गलवान में घुसपैठ के बाद से चीन और घुसपैठ पर अपना मौन व्रत चल रहा है। भारत तिब्बत सीमा पुलिस ने गणतंत्र दिवस पर निगरानी करने श्वान पथक तैनात किया। आइटीबीपी ने दो सौ अधिकारियों और जवानों को चीन की भाषा मैंडरिन में प्रशिक्षित किया गया।काम अनूठा है। एक और बेमिसाल प्रयोग किया। दत्त भगवान के अनुयायी श्वानों का देशी नामकरण किया। इस पुलिस के पास गलवान है। श्योक है। गलवान का नाम याद रहेगा। गलवान पर कब्जे की सच्चाई का पता लगे न लगे, गणतंत्र पर श्वानतंत्र का योगदान इतिहास में दर्ज होगा। आइटीबीपी के मुखिया सुरजीत सिंह देसवाल के पुकारते ही गलवान यानी अर्ध सैनिक बल का जवान-श्वान भागता आएगा। तंत्र को जयहिंद करते समय मशीन के बेशकीमती पुरजों का कल्पनाशील योगदान मत भुला देना।
लोकतंत्र में मिलजुल कर
गणतंत्र-गौरव-गान में सच बयान करने की कमी दूर करना कलम-कंप्यूटर-कैमरा धारी करते हैं। हमने ये किया, तुमने ऐसा नहीं किया। तुमने गड़बड़ी की। हमने घोटाला रोका। आजके सत्ताधारी हर गलत बात के लिए कांग्रेस राज पर ठीकरा फोड़ते हैं। जबकि कांग्रेस नेता फटाक से जवाब देते हैं- काम हमारा। लेबल चिपक जाता है तुम्हारा। गणतंत्र में सत्ताधारी, सत्ता से धकियाये लोग और सत्ता-चाहक की बात बात पर नोंकझोंक की अपनी विशेषता प्रदर्शित होती है। अब कांग्रेस सचमुच भारतीय जनता पार्टी की नकल करने जा रही है। भाजपा ने सत्ता में आते ही गली-मोहल्ले तक में जमीन खरीद कर पार्टी और सहयोगी संगठनों के दफ्तर खड़े किए। दिल्ली में आलीशान महल बनाया। 24, अकबर रोड छिनने की नौबत के बावजूद कांग्रेस दिल्ली में अपना केन्द्रीय कार्यालय नहीं बना पाई। राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत राजधानी जयपुर में प्रदेश कांग्रेस के लिए जमीन तलाश करा रहे हैं। जिला और मंडल स्तर तक के दफ्तर बनेंगे। इसके लिए राज्य सरकार जमीन आवंटित करेगी। चार बरस पहले वसुंधरा राजे ने यह नुस्खा ईजाद किया। तब प्रतिपक्ष यानी कांग्रेस ने होहल्ला मचाया था।
बोझ बड़ा गणतंत्र का
दुखी नीति आयोग
केन्द्र सरकार बार बार बैठक करने के बावजूद कृषि कानूनों पर समाधान तलाश नहीं कर सकी। पुराना योजना और आज का नीति आयोग दलील देने में सरकार से बढक़र हैं। नीति आयोग ने कृषि बदलाव के लिए मुख्यमंत्रियों की समिति गठित की थी। सितम्बर 2019 में समिति की अंतिम बैठक हुई। आधारभूत ढांचा बदलने की सलाह देना नीति आयोग का काम है। दिलचस्प बात यह है कि नीति आयोग की रपट का अता पता नहीं है। आयोग की अधिशासी परिषद की बैठक में रपट आएगी तब पता लगेगा। बैठक कब होगी? पता नहीं। समिति ने किस किस मुख्यमंत्री से चर्चा की? यह भी पता नहीं। केन्द्र सरकार ने किसानों के समक्ष दावा किया कि समिति ने मुख्यमंत्रियों से चर्चा की थी। पंजाब के मुख्यमंत्री ने दावा किया कि समिति ने इस विषय पर बात ही नहीं की। इस गोरखधंधे में रपट अब तक पहुंच से बाहर है। आयोग के मुख्य कार्यकारी अमिताभ कांत पहले ही फरमा चुके हैं कि कुछ अधिक ही लोकतंत्र भुगत रहा है, भारतवर्ष।
प्यार बांटते चलो
वंदे मातरम की भूमि पर असदुद्दीन ओवैसी के चरण-कमल पड़े। फुरफुरा शरीफ मज़ार में दर्शन के बाद वारिस अब्बास सिद्दीक से मुलाकात की। विधानसभा चुनाव में अब्बास का समर्थन करने का ऐलान किया। परिवार के एक और प्रतिनिधि तोहा सिद्दीक ने ओवैसी को आड़े हाथों लिया। राजनीति कर पुरखों की मजार को अपवित्र करने का आरोप मढ़ा। फुरफुरा में हजरत अबू बकर की मज़ार है, जिन्होंने महिला शिक्षा आरंभ कराई। आवैसी की बदौलत पीर अबू सिद्दीक के वारिस दो खेमों में बंट गए। जहं जंह चरण पड़ें असद के। फुरफुरा श्रद्धालुओं के दो फाड़ होने और वोट बंटवारे की खाई की चौड़ाई पर ममता बनर्जी का भविष्य तय होगा। बिहार के बाद बंगभूमि में भी ओवैसी संकटमोचक बनना चाहते हैं। किसके? धन्य हो। यह भी हम बताएं?
अमर रहे गणतंत्र हमारा। जन गण मन अधिनायक सिर्फ जन, जनता
(लेखक दैनिक भास्कर नागपुर के समूह संपादक हैं)
बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक
अमेरिका का बाइडन प्रशासन डोनाल्ड ट्रंप की अफगान-नीति पर अब पुनर्विचार करने वाला है। वैसे तो ट्रंप प्रशासन ने पिछले साल फरवरी में तालिबान के साथ जो समझौता किया था, उसकी प्रशंसा सर्वत्र हो रही थी लेकिन उस वक्त भी मेरे जैसे लोगों ने संदेह प्रकट किया था कि इस समझौते का सफल होना कठिन है। लेकिन ट्रंप जैसे उथले आदमी ने यह रट लगा रखी थी कि राष्ट्रपति के चुनाव के पहले ही अमेरिकी फौजियों को अफगानिस्तान से वे वापस बुला लेंगे। उन्होंने इसे अपना चुनावी मुद्दा भी बना लिया था।
]अमेरिकी मतदाता के लिए यह खुशी की बात थी कि अमेरिकी फौजियों के ताबूत काबुल से न्यूयार्क आना बंद हो जाएं। यह भी सही है कि तालिबान ने पिछले एक साल में बहुत कम अमेरिकी ठिकानों को अपना निशाना बनाया और अमेरिकी फौजी नहीं के बराबर मारे गए लेकिन अफगानिस्तान का कौनसा हिस्सा है, जहां तालिबान ने पिछले एक साल में हिंसा नहीं फैलाई ? काबुल, कंधार, हेरात, जलालाबाद, हेलमंद, निमरुज– कौनसा इलाका उन्होंने छोड़ा है।
अब तक वे लगभग एक हजार लोगों को मौत के घाट उतार चुके हैं। उनमें अफगान फौजी और पुलिस तो हैं ही, छात्र, किसान, व्यापारी, नेतागण और सरकारी अफसर भी हैं। अफगानिस्तान के 80 प्रतिशत से ज्यादा इलाकों पर उनका कब्जा है। वे सरकार की तरह लोगों से टैक्स वसूलते हैं, राज करते हैं और काबुल की गनी-सरकार को वे अमेरिका की कठपुतली कहते हैं। गनी सरकार भी मजबूर है। उसे दोहा में हुए समझौते को स्वीकार करना पड़ा। उसे पता है कि अमेरिकी और नाटो फौजी की वापसी के बाद उनकी सरकार का जिंदा रहना मुश्किल है। अफगान फौज में पठानों का वर्चस्व है और तालिबान शुद्ध पठान संगठन है। तालिबान सत्तारुढ़ होने पर इस्लामी राज कायम करना चाहते हैं लेकिन आज उनके कई गुट सक्रिय हैं। इन गुटों में आपसी प्रतिस्पर्धा जोरों पर है। हर गुट दूसरे गुट को नकारता चलता है।
इसीलिए काबुल और वाशिंगटन के बीच कोई समझौता हो जाए, उसे लागू करना कठिन है। इस समय मुझे तो एक ही विकल्प दिखता है। वह यह कि सभी अफगान कबीलों की एक वृहद संसद (लोया जिरगा) बुलाई जाए और वह कोई कामचलाऊ सरकार बना दे और फिर लोकतांत्रिक चुनावों के जरिए काबुल में एक लोकतांत्रिक सरकार बने। इस बीच बाइडन-प्रशासन थोड़ा धैर्य रखे और काबुल से पिंड छुड़ाने की जल्दबाजी न करे। ट्रंप की तरह वह आनन-फानन घोषणाओं से बचे, यह उसके लिए भी हितकर है, अफगानिस्तान और पूरे दक्षिण एशिया के लिए भी। (नया इंडिया की अनुमति से)


