विचार/लेख
बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक
अभी-अभी हुए 13 राज्यों के जो चुनाव-परिणाम सामने आए हैं, उनसे क्या संदेश निकलता है? वैसे तो तीन लोकसभा सीटों और 29 विधानसभा सीटों के आधार पर अगले आम चुनाव के बारे में कुछ भी भविष्यवाणी करना वैसा ही है, जैसा कि नदी में बहती हुई मछलियों को गिनना। फिर भी यदि इन चुनाव-परिणामों का विश्लेषण करें तो सारे भारत में जनता के रवैए की कुछ झलक तो जरुर मिल सकती है। जैसे हिमाचल, राजस्थान और कर्नाटक में भाजपा के उम्मीदवारों का हारना और जीती हुई कुछ सीटों का खोया जाना किस बात का संकेत है?
इसका स्पष्ट संकेत यह तो है ही कि इन प्रांतों के प्रादेशिक भाजपा-नेतृत्व की योग्यता संदेहास्पद है। यदि इन राज्यों के मुख्यमंत्री और प्रदेशाध्यक्षों ने बढिय़ा काम किया होता तो भाजपा इतनी बुरी तरह से नहीं हारती। इन चुनावों ने यह भी सिद्ध कर दिया है कि इन पर भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व का भी कोई असर नहीं पड़ा है। भाजपा के केंद्रीय नेताओं के लिए यह भी विशेष चिंता का विषय हो सकता है, क्योंकि अगले कुछ माह में ही लगभग आधा दर्जन राज्यों की विधानसभा के चुनाव मुंह बाए सामने खड़े हैं।
यदि उनमें भी इसी तरह के परिणाम आ गए तो अगले लोकसभा चुनाव का हाथी किसी भी करवट बैठ सकता है। जहां तक कांग्रेस का प्रश्न है, आजकल वह जिस प्रकार नेता और नीतिविहीन हो चुकी है, उस स्थिति में उसकी छवि ज्यादा नहीं बिगड़ी है लेकिन हिमाचल और राजस्थान में उसकी शानदार विजय का श्रेय हिमाचल में भाजपा के मुख्यमंत्री और राजस्थान के कांग्रेसी मुख्यमंत्री अशोक गहलोत को दिया जा सकता है।
हिमाचल के भाजपा मुख्यमंत्री ने कांग्रेस की जीत के लिए महामारी, बेरोजगारी और मंहगाई को हिम्मेदार ठहराया है। लेकिन मध्यप्रदेश में भाजपा के मुख्यमंत्री शिवराज चौहान ने अपने धुआंधार चुनाव अभियान के जरिए खंडवा की लोकसभा सीट तो जीती ही, दो विधानसभा सीटें भी जीत लीं।
असम, बिहार, आंध्र, तेलंगाना आदि में प्राय: प्रांतीय पार्टियों का वर्चस्व रहा लेकिन प. बंगाल में ममता की तृणमूल कांग्रेस ने विधानसभा की चारों सीटों से भाजपा को तृणमूल याने घांस के तिनके की तरह उखाड़ फेंका। एक उम्मीदवार की तो जमानत ही जब्त करवा दी। भाजपा से टूट-टूटकर कई नेता आजकल तृणमूल कांग्रेस में शामिल हो रहे हैं। ममता बनर्जी धीरे-धीरे उत्तर भारत के प्रांतों में भी अपनी जड़ें जमाने की कोशिश कर रही हैं।
यह कांग्रेस के लिए भी चिंता का विषय है, क्योंकि ममता का मानना है कि कांग्रेस की कमजोरियों का फायदा उठा-उठाकर ही भाजपा बलवान बनी है। इन उप-चुनावों के परिणाम विपक्षी दलों को पहले से अधिक नजदीक आने के लिए प्रेरित कर सकते हैं। ग्लासगो सम्मेलन से लौटते ही नरेंद्र मोदी को अपनी सरकार के साथ-साथ अपनी पार्टी की सुधि लेनी पड़ेगी।
-रमेश अनुपम
‘बस्तर भूषण’ के दूसरे अध्याय में आदिवासियों के खेती के तरीके और बाहरी संसार से उनसे संपर्क पर प्रकाश डाला गया है। सन् 1900 के बाद बाहर के साहूकारों की बस्तर में दिलचस्पी बढऩे लगी थी। बस्तर व्यापार की दृष्टि से अच्छा था। व्यापारी अब तक बस्तर अंचल से बहुत दूर और बस्तर को लेकर सशंकित थे। आवागमन की दृष्टि से भी बस्तर उन दिनों दुरूह अंचल माना जाता था। पर अब इक्का-दुक्का साहूकार बस्तर आने लगे थे और अपने साथ कपड़े, शक्कर, मसाला आदि लाने लगे थे और इसके बदले यहां से धूप, मोम, तिखूर आदि वन उपज बाहर ले जाने भी लगे थे। इन साहूकारों के लिए बस्तर अब प्रचुर मुनाफा देने वाला अंचल साबित हो रहा था।
इसी अध्याय में बस्तर की तत्कालीन जमींदारियों की भी चर्चा केदार नाथ ठाकुर द्वारा विस्तारपूर्वक की गई है।
उस समय बस्तर में 8 जमींदारियां थीं। जिनमें
1.भोपालपटनम,
2.कुटरू , 3.सुकमा,
4. दंतेवाड़ा ,
5.चिंतलनार,
6.कोटापाल,
7.फोटकेल,
8.परलकोट प्रमुख थे।
‘बस्तर भूषण’ के तीसरे अध्याय में बस्तर स्टेट की चर्चा की गई है। इस अध्याय में यह भी बताया गया है कि महाराज दलपत के समय ही बस्तर स्थित राजधानी को जगदलपुर स्थांतरित किया गया था। इस तरह बस्तर की जगह जगदलपुर को महाराज दलपत ने अपनी राजधानी घोषित किया। यह जगदलपुर का भाग्योदय था। इससे बस्तर की जगह अब जगदलपुर व्यापार और प्रगति का केंद्र बनता चला गया।
केदार नाथ ठाकुर ने अपने इस ग्रंथ में बताया है कि सन 1896 में जे.एल. करनल फैगन पहले अंग्रेज थे, जो एडमिनिस्ट्रेटर होकर बस्तर आए थे। उनके पश्चात जी. डबल्यू गेयर पोलिस सुपरिंटेंडेंट बस्तर स्टेट के एडमिनिस्ट्रेटर बनाये गये।
‘बस्तर भूषण’ से ही यह जानकारी मिलती है कि सन 1897 में बस्तर में भूमि बंदोबस्त का काम पहली बार शासकीय स्तर पर प्रारंभ हुआ। मुंशी ज्वालाप्रसाद पहले सेटिलमेंट ऑफिसर के रूप में बस्तर में पदस्थ किए गए।

इसी अध्याय में केदार नाथ ठाकुर ने बस्तर दशहरा का भी विस्तारपूर्वक वर्णन किया है। दशहरा उस समय से ही बस्तर का एक लोकप्रिय उत्सव रहा है।
बस्तर दशहरा के बारे में लिखते हुए केदार नाथ ठाकुर ने कहा है कि-
‘दशहरा के समय में जगदलपुर मानो इंद्रपुरी बन जाता है। कलकत्ते में जिस प्रकार नवरात्रि की धूम-धाम घर-घर मच जाती है, उससे बढक़र बस्तर में होता है।’
अपने इस ग्रंथ की भूमिका में ही केदारनाथ ठाकुर ने इस ग्रंथ के विषय में अपना मंतव्य प्रकट करते हुए लिखा है कि-
‘जहां तक बना है, पुस्तक में राज्य के सभी हाल लिखने का प्रयत्न किया है जैसे- सीमा, नदी, पहाड़, जंगल, फल, फूल, जड़ी बूटी, जानवर, पक्षी, औषधि, आदिवासियों के गीत, पुरातन तथा नवीन इतिहास, मनुष्य गणना, राज्य प्रबंध इत्यादि।’
आगे अपने विषय में केदार नाथ ठाकुर ने यह लिखने से भी गुरेज नहीं किया है कि-
‘मैं कोई ग्रंथकार नहीं हूं, न मेरी चाह है कि कोई मेरी लेख प्रणाली को देख मेरी बड़ाई करे, जबकि हिंदी के महाधुरंधर लेखक भारतेंदु बाबू हरिश्चंद्र, राजा शिवप्रसाद सितारे हिंद, प्रताप नारायण मिश्र तथा महावीर प्रसाद द्विवेदी सरीखे विद्वानों के लेख पद्धति की भी बहुत लोग सराहना नहीं करते तो मैं किस खेत की मूली हूं।’
केदारनाथ ठाकुर जानते थे कि हर युग में अच्छे कामों के प्रशंसक और गुण गाहक कम ही होते हैं। हर युग में मीडियाकर और दोयम दर्जे के लोगों की पौ बारह रहती है पर यह भी उतना ही सच है कि ऐसे लोगों को समय बुहार कर फेंक देता है और प्रतिभाशाली सर्जक ही युगों-युगों तक अपनी कृतियों के माध्यम से जीवित रहते हैं।
‘बस्तर भूषण’ और उसके रचयिता केदारनाथ ठाकुर इसलिए आज भी याद किए जाते हैं।
‘बस्तर भूषण’ एक ऐसा आईना है जिसमें हम बीसवीं शताब्दी के प्रारंभिक दशक के बस्तर की तस्वीर को साफ-साफ देख सकते हैं।
जाहिर है आज का बस्तर इन सौ वर्षों में बहुत बदल चुका है। जंगल, पहाड़ और नदियों को हमने आदिवासियों से छीन ही नहीं लिया है बल्कि उसे बड़े कॉरपोरेट के हवाले भी कर दिया है।
बस्तर में खनिज संसाधन के दोहन की जैसे होड़ सी लगी हुई है कि जितनी जल्दी हो सके सारे खनिज संसाधन पर अधिकार कर लिए जाएं।
पहाड़ और धरती का सीना चीर-चीर कर सारा लौह अयस्क निकाल लेने की होड़ मची हुई है। जंगल और वन्यपशु तो पहले ही नष्ट किए जा चुके हैं। आने वाले भविष्य के लिए शायद हम कुछ भी बचाकर नहीं रखना चाहते हैं।
बस्तर और बस्तर के आदिवासी किसी भी सरकार की प्राथमिकता में कभी शामिल नहीं रहे।
हां मुक्तांगन से लेकर जगह-जगह उनकी भीम काय मूर्ति बनाकर या तरह-तरह के शासकीय आयोजनों में उन्हें नचवा कर हमें लगता है कि हम आदिवासियों के सच्चे हितैषी हैं।
पर आज भी सुदूर अबूझमाड़ में या गोलापल्ली, आवापल्ली में बस्तर की असली और बदरंग तस्वीर विकास और प्रगति का मुंह चिढ़ाते हुए दिखाई देती है। विकास केवल कागजों में ही दिखाई देता है, हकीकत कुछ और ही कहानी बयां करती है।
आज भी पुलिस और नक्सलियों की बंदूक के बीच बस्तर के आदिवासी तय नहीं कर पा रहे हैं कि उनके मित्र कौन है और शत्रु कौन ?
(अगले हफ्ते महाराजा प्रवीरचंद्र भंजदेव...)
-पुष्य मित्र
आज से ठीक नौ रोज पहले जब लालूजी ने इस शब्द का उपयोग बिहार कांग्रेस के प्रभारी भक्तचरण दास के लिए किया था, तब से इस शब्द की खूब व्याख्या हुई। लोगों ने बहुत रस लेकर इस शब्द का अर्थ समझाया और एक मित्र ने तो यहां तक कहा कि इस शब्द का अर्थ है, लालू इज बैक। मैंने अपने कई गंभीर मित्रों और जिम्मेदार लोगों को इस शब्द को अपने मुंह में लगभग चुभलाते हुए देखा और चुप रहा। क्योंकि मैं इस शब्द के मायने को समझता था और आज तक किसी भी इंसान के लिए इस शब्द का कभी इस्तेमाल नहीं किया। उस तरह तो बिल्कुल नहीं, जिस लहजे में लालू जी ने इस शब्द का इस्तेमाल किया था।
और सच यह है कि इस शब्द को उचारते हुए लालू जी के जिस अंदाज ने मेरे मित्रों को उत्साह से भर दिया था, उस लहजे को देखकर मैं अवाक रह गया था। मेरे मन में पहला रिएक्शन यही आया था, लालू अब भी नहीं बदले। वैसे के वैसे हैं। दुनिया बदल गयी, मगर वे उसी जमाने में जी रहे हैं।
पिछले दिनों लल्लनटॉप के कार्यक्रम नेतानगरी में मुझसे जब पूछा गया कि लालू जी की वापसी का बिहार की राजनीति पर क्या असर पड़ेगा। तब भी मैंने यही कहा था कि लालू जी का आना राजद के लिए दोधारी तलवार की तरह है। यह फायदा भी दे सकता है, तो नुकसान भी कर सकता है। बैकफायर भी कर सकता है। क्योंकि मैंने कम से कम पिछले दस साल से नीतीश जी को अपने वोटरों को लालूजी के नाम पर डराकर चुनाव जीतते हुए देखा है। सुशील मोदी जी का तो पूरा राजनीतिक कैरियर है लालू विरोध पर टिका है। जब तक लालू हैं, नीतीश भी हैं और सुशील मोदी का राजनीतिक करियर भी है। बहरहाल यह अलग बात है।
सच यह है कि जब सभी लोग भकचोन्हर शब्द की व्याख्या कर रहे थे तो मैं चुप था। यह सोचकर कि अभी इस शब्द की व्याख्या करने का उचित समय नहीं है। मैं चुनाव में इस शब्द के असर को देखकर इसके असली अर्थ को समझना चाहता था। और आज जब उपचुनाव की दोनों सीटों के नतीजे आ गए हैं, तो मैं पूरे दावे के साथ कह सकता हूं कि राजद के लिए यह भकचोन्हर शब्द बैकफायर कर गया है। उसे उस पार्टी जदयू ने करारी शिकस्त दी, जिसके बारे में सब जानते हैं कि उसका कोई अपना कैडर वोटर नहीं है। न कोई जात, न जमात। वह चुनावी तौर पर पुछल्ली पार्टी है, जो जिस कैडर बेस पार्टी के पीछे लग जाती है, उसी का वोट हासिल करती है।
और यह भी तय है कि इस बार भाजपा ने जदयू की मदद के लिए अपनी कोई ताकत नहीं लगायी थी। इसके बावजूद अगर जदयू ने इस विपरीत हालत में दोनों सीटें जीत लीं तो वह इस भकचोन्हर शब्द का ही कमाल था। एक बार फिर लालू जी की पुरानी छवि और उनका पुराना दबंग अंदाज नीतीश के काम आया। अगर लालू जी ने बस उस एक शब्द का इस्तेमाल नहीं किया होता तो शायद उनकी पार्टी दोनों सीटों पर जीत रही होती। देश भर में जो नतीजे सामने आये हैं, उसके हिसाब से तो यही लगता है।
कई लोगों को यह बात अतिश्योक्तिपूर्ण लग सकती है। मगर उन्होंने इस बात को कभी महसूस नहीं किया कि राजद का एग्रेसन ही उसकी सबसे बड़ी कमजोरी है। इसी एग्रेसन ने उसे पिछले साल के विधानसभा चुनाव में मंजिल तक पहुंचते-पहुंचते सत्ता से दूर कर दिया था। आखिरी चरणों में अपनी जीत को लेकर आश्वस्त राजद कार्यकर्ताओं ने जिस तरह का एग्रेसन दिखाया था, उसने न सिर्फ बिहार की सवर्ण बल्कि दलित और अति पिछड़ी जाति को भी सचेत कर दिया था। लालू राज वापस आ रहा है। क्योंकि लालू राज के आखिरी दिनों में राजद सिर्फ यादव और मुसलमानों की पार्टी रह गई थी और अतिपिछड़े और दलित उसके कार्यकर्ताओं से भय खाने लगे थे। ये वही लोग थे, जिन्हें लालूजी ने अपने पहले टर्म में बोलना और मुखर होना सिखाया था। जिसकी बात आज तक की जाती है। मगर अंत आते आते राजद कार्यकर्ता इन्हीं दबे-कुचले लोगों पर सामंती मिजाज के हमले करने लगे थे। इनके विधायकों ने अपने आवास में गरीब मेहनतकश लोगों के नाखून तक उखारे हैं। सीवान का तेजाब कांड भला कौन भूल सकता है।
राजद को पता है कि उसकी यही पहचान उसकी असल कमजोरी है। लंबे समय से पार्टी इस टैग से उबरने की कोशिश कर रही है। 2017 में राजद ने जब राजगीर में कार्यकर्ता प्रशिक्षण शिविर का आयोजन किया था तो दो बातें विशेष रूप से कही गयी थी, पहली हमें गठबंधन के साथियों के साथ सम्मानजनक व्यवहार करना है, दूसरा हमें सभी दलित और पिछड़ी-अतिपिछड़ी जातियों के लिए उसी तरह बड़े भाई की भूमिका निभानी है, जैसी भूमिका हमने 1990-95 के बीच निभायी थी।
पिछले साल के विधानसभा चुनाव में पोस्टरों से लालू जी की तस्वीर को हटाना, सामाजिक न्याय के बदले आर्थिक न्याय की बातें करना। मकसद एक ही था। राजद अपनी पिछली छवि से उबरना चाहती थी। ऐसा लगा था कि कम से कम लालू परिवार के स्तर पर अब लोग इस बात को लेकर सतर्क हैं कि हमें अपनी दबंग, भ्रष्ट और विवादित छवि से पीछा छुड़ाना है। ताकि यह कहा जा सके कि लालू जी ने जब दबंगई दिखायी तो वह उस वक्त के सामाजिक न्याय की जरूरत है। हम लोग स्वभाव से वैसे नहीं हैं।
मगर लालूजी कभी नहीं बदले। और यह उनके पहले ही बयान से जाहिर हो गया। भकचोन्हर शब्द के कई अर्थ लोगों ने बताये। मगर पहली बार सुनकर ही मुझे लग गया था कि यह शब्द अपमानित करने वाला शब्द है। यह सहज मजाक नहीं है, वैसा मजाक भी नहीं जैसा कपिल शर्मा अपने शो में करते हैं। यह विशुद्ध अवमानना है। इस शब्द को बोलने का उनका अंदाज विशुद्ध रूप से सामंती था।
यह सब मैंने अपने बचपन में देखा सुना है। गांव के बड़े किसान और भू-स्वामी अपने दरवाजे पर आने वाले मजदूर तबके के लोगों के साथ ऐसे शब्दों का इस्तेमाल करते हैं। यह शब्द विशुद्ध रूप से किसी को नीचा दिखाने या उसका आत्मविश्वास कम करने के लिए बोला जाता है। लालू जी ने भक्त चरण दास के लिए इस शब्द का इसलिए सहजता से इस्तेमाल कर लिया, क्योंकि वे न सिर्फ एक दलित नेता थे, बल्कि उनकी निगाह में भक्तचरण दास की कोई औकात नहीं थी, क्योंकि उनकी बातचीत तो सीधे सोनिया गांधी से हुआ करती थी।
मगर दौर बदल गया है। अब गांवों में लोग खेतिहर मजदूरों को भी नुनू-बाबू कहकर बात करते हैं। शहर के दफ्तरों में भी बॉस अपना लहजा नियंत्रित रखते हैं और सबोर्डिनेट कर्मियों के साथ सम्मानजनक व्यवहार करते हैं। यह सच है कि बिहार के ग्रामीण इलाकों में सवर्णों के इस तरह के सामंती मिजाज को बदलने में लालू जी की बड़ी भूमिका रही है। मगर बड़े नेता बनने के बाद उन्होंने इस सामंती मिजाज को अपना लिया है, और वह उनसे छूटती नहीं है।
अगर लोगों से ठीक से बात की जाए, खासकर इन दोनों इलाकों की अति पिछड़ी आबादी से तो वे अब कहेंगे कि लालू जी की इस तरह की एंट्री ने उन्हें कितना डराया है। लालू जी और राजद नेताओं के ऐसे ही मिजाज के कारण कई मौके पर बिहार की अति पिछड़ी आबादी नीतीश के पीछे मजबूती से खड़ी हो जाती है। लालू जी के पास अपनी जाति के वोट हैं और धर्मनिरपेक्षता के नाम पर मुसलमानों की मजबूरी है, उनके पीछे खड़ा होना। मगर पिछले कई चुनावों से जाहिर है कि इन दोनों जात और जमात के भरोसे जीत हासिल करना उनके लिए नामुमकिन है। इसलिए उन्हें अपना दायरा बड़ा करना पड़ता है। गठबंधन बनाना पड़ता है।
उन्हें और राजद को इसकी कोई जरूरत नहीं पड़ती। उन्हें बस इतना करना था कि वे दलितों-अति पिछड़ों को यह भरोसा दिला पाते कि वे आज भी उसी तरह उनके लिए मजबूती से खड़े हैं, जैसे वे पिछली सदी के आखिरी दशक में थे। मगर कहते हैं न आदतें छूटती नहीं। और जिस सामंती मिजाज से लालू जी ने बिहार के सवर्णों को छुटकारा दिला दिया, वह मिजाज अब उनकी जिह्वा पर सवार है। वरना वे भकचोन्हर के बदले कुछ और भी कह सकते थे।
-गिरीश मालवीय
कल एसबीआई के पूर्व चेयरमैन प्रतीप चौधरी को गिरफ्तार कर लिया गया। उन पर जो आरोप है वो बहुत दिलचस्प है, जो भी आर्थिक विषयों में रुचि रखते हैं उन्हें इस विषय में जरूर जानना चाहिए।
तो हुआ यूं कि राजस्थान के गोडावन ग्रुप जो एक होटल चेन चलाता है उसने साल 2008 में एसबीआई से 24 करोड़ रुपए का लोन ये कहकर लिया था कि वह यहां होटल बनाएगा। उस वक्त ग्रुप के बाकी के होटल अच्छी तरह से रन कर रहे थे तो उसे लोन दे दिया गया। बाद में ग्रुप की आर्थिक स्थिति बिगड़ गई और ग्रुप लोन का भुगतान नहीं कर पाया, और लोन एनपीए में बदल गया। एसबीआई बैंक ने दोनों होटलों को सीज करने की ओर कदम बढ़ाया। इस दौरान प्रतीप चौधरी एसबीआई के चेयरमैन थे।
प्रतीप चौधरीजी ने ‘आपदा में अवसर’ देखते हुए नीलामी की प्रक्रिया को नहीं अपनाया बल्कि एक कदम आगे बढक़र ग्रुप के होटलों को एक कंपनी अल्केमिस्ट एआरसी कंपनी को बहुत सस्ते में 24 करोड़ रुपए में बिकवा दिया।
अल्केमिस्ट एआरसी कंपनी को 2016 में इन होटल को हैण्डओवर किया गया। 2017 में जब इसका मूल्यांकन हुआ तो पता लगा कि प्रॉपर्टी का मार्केट प्राइज 160 करोड़ रुपए था और आज इसकी कीमत 200 करोड़ रुपए है।
अब सबसे दिलचस्प बात यह है कि 2011 से 2013 तक चेयरमैन पद पर बने रहने के बाद चौधरी साहब जब रिटायर हुए तो वह अल्कमिस्ट आर्क कंपनी में बतौर डायरेक्टर जाकर कुर्सी पर बैठ गए।
इस सौदे में हुई धोखाधड़ी के खिलाफ ग्रुप ने जोधपुर की सीजेएम अदालत में केस दायर किया और अदालत ने एसबीआई चेयरमैन को दोषी माना और आईपीएस धारा 420 (धोखाधड़ी), 409 (लोक सेवक, या बैंकर द्वारा आपराधिक विश्वासघात), और 120 बी (आपराधिक साजिश की सजा) के तहत गिरफ्तारी वारंट जारी किया। कल इसी केस में उन्हें गिरफ्तार किया गया है।
अब प्रतीप चौधरीजी का जो होगा सो होगा? लेकिन इस गिरफ्तारी के बाद जो बड़ा सवाल खड़ा होता है कि क्या अकेले सिर्फ प्रतीप चौधरी ही एसबीआई के चेयरमैन रहने के बाद रिटायर होकर किसी निजी ग्रुप में जाकर डायरेक्टर बने है?
उनके बाद एसबीआई की चेयरमैन बनी अरुंधति भट्टाचार्य को आप क्यों भूल रहे हैं! अरुंधति भट्टाचार्य ने साल 2017 में एसबीआई के चेयरपर्सन के पद को छोड़ा था। इसके बाद भट्टाचार्य ने सात भारतीय कंपनियों में डायरेक्टर के तौर पर काम किया है। अजय पीरामल के नेतृत्व वाली पीरामल इंटरप्राइजेज लिमिटेड और मुकेश अंबानी की रिलायंस इंडस्ट्रीज का भी नाम शामिल है। रेटिंग एजेंसी क्रिसिल लिमिटेड में एडिशनल इंडेपेंडेट डायरेक्टर के तौर पर भी काम किया है।
भारत सरकार के पूर्व सचिव ईएएस शर्मा ने अरुधंति भट्टाचार्य के लोकपाल सर्च कमेटी का सदस्य बनने पर 10 अक्टूबर 2018 को भारत सरकार को पत्र लिखा था इस पत्र में शर्मा जी कहते हैं।
एसबीआई की पूर्व चेयरमैन अरुंधति भट्टाचार्य का जुड़ाव फाइनेंसियल सर्विस प्रदान करने वाली कम्पनी क्रिस कैपिटल को सलाह देने वाले पद से है। इस फाइनेंसियल कम्पनी का नाम भी कर चोरी से जुड़े पनामा पेपर्स में शामिल है
वह आगे लिखते हैं लोकपाल सर्च कमेटी का सदस्य बना दिए जाने के बाद अरुंधती का रिलायंस इंडस्ट्रीज का स्वतंत्र निदेशक बनाया जाना परेशान करने वाली बात हो जाती है। साल 2011-12 की एसबीआई रिपोर्ट की तहत यह बात ध्यान देने वाली हो जाती है कि बैंक ने आरबीआई द्वारा कम्पनियों को दिए जाने वाले कर्ज की सीमा से अधिक रिलायंस इंडस्ट्री को कर्ज दिया।
अनिल अम्बानी को कर्ज देने में एसबीआई ग्रुप का नाम टॉप पर आता है। 26 अगस्त 2018 के अखबारों के बिजनेस पेज की खबर है कि एसबीआई ने अनिल अम्बानी के कर्ज को राहत देने के लिए दूरसंचार विभाग को पत्र लिखा है, यानी कि एसबीआई द्वारा शुरू से अनिल अम्बानी के रिलायंस ग्रुप को जमकर कर्ज बांटा गया और बाद में भाई की कम्पनी में इंडिपेंडेंट डायरेक्टर बनवाकर हजारों करोड़ रफा-दफा कर दिए गए। आज अनिल अम्बानी दीवालिया हो गए हैं।
इतना ही नहीं विजय माल्या के सिलसिले में भी एसबीआई के चेयरमैन की भूमिका संदिग्ध रही है। सुप्रीम कोर्ट के वकील दुष्यंत दवे ने बयान दिया था कि उन्होंने एसबीआई प्रबंधन के शीर्ष अधिकारी से मिलकर उन्हें यह बताया था कि विजय माल्या भारत से भाग सकता है। उन्होंने बताया कि एसबीआई के शीर्ष अधिकारी से उनकी मुलाकात रविवार 28 फरवरी, 2016 को हुई थी। दरअसल, दवे ने एसबीआई को माल्या का पासपोर्ट रद्द करने की सलाह दी थी। इस सलाह पर कोई कार्रवाई नहीं की गई। इसके 4 दिन बाद माल्या ने देश छोड़ दिया।
साफ दिख रहा है कि 25 करोड़ जैसी छोटी रकम में हुई धोखाधड़ी में केस दर्ज कर गिरफ्तारी तक हो जाती है लेकिन जब मामला हजार करोड़ से ऊपर का हो तो जरा सी भी चू तक नहीं होती, घोटाले दोनो करते हैं जो पकड़ा जाता है उसे लोग चोर कह देते हैं जो नहीं पकड़ा जाता वह ईमानदार बना रहता है।
-प्रकाश दुबे
रावण का वध करने के बाद राम ने विभीषण का राजतिलक कर लंका का अधिपति बनाया। नए नृपति विभीषण ने श्री राम को पुष्पक विमान से सहयोगियों सहित अयोध्या भेजा। अयोध्या में दीप पर्व मनाया गया। त्रेता युग की कहानी का कलयुगी रूप उपचुनावों में देखा जा सकता है।
कांग्रेस छोडक़र भारतीय जनता पार्टी में शामिल होकर छह बरस के अंदर असम के मुख्यमंत्री बने हिमांत विश्व शर्मा ने उपचुनाव में सारी विधानसभा सीटें राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की झोली में डाल दीं। उन विधानसभा क्षेत्रो में भी सत्ता पक्ष की जीत हुई जहां कांग्रेस से जीते विधायक दलबदल कर भाजपा में शामिल हुए। विभीषण-दांव का मध्य प्रदेश में लाभ हुआ। कांग्रेस विधायक सचिन बिरला ने भाजपा में शामिल होकर खंडवा लोकसभा उपचुनाव का पांसा पलटने में मदद की। पिछड़े समुदाय के वोटों के कारण सचिन सचमुच बिड़ला साबित हुए। कांग्रेस का मनोबल तोडऩे में उनके योगदान का जल्दी ही पुरस्कार मिल सकता है। उत्तर प्रदेश से सटे पृथ्वीपुर में भाजपा ने शिशुपाल सिंह को उम्मीदवार बनाया। समाजवादी पार्टी के शिशुपाल को आस्था बदलने का ईनाम मिला।
उत्तरप्रदेश के विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा ने दूसरी बार झपट रणनीति खेली। सपा से चुने गए नितिन अग्रवाल कुछ दिन पहले ही उप्र विधानसभा के उपसभापति चुने गए। अखिलेश यादव के कान खड़े हुए होंगे। तेलंगाना की हुजूराबाद सीट से एटाला राजेन्दर उपचुनाव जीते। जमीन घोटाले में लिप्त राजेंदर को मंत्रिमंडल से हटाया गया था। उन्हें विशेष विमान से दिल्ली ले जाकर गाजे-बाजे के साथ भाजपा में शामिल कराया गया था।
बंगाल में विभीषण-दांव नहीं चला
केन्द्रीय गृहराज्यमंत्री निशीथ प्रमाणिक के पास युवा मामले और खेल मंत्रालय का जिम्मा भी है। उनके लोकसभा क्षेत्र में दिनहाटा में तृणमूल कांग्रेस के उदयन गुहा ने भाजपा प्रत्याशी को एक लाख 60 हजार मतों के अंतर से पराजित किया। विधानसभा के उपचुनाव में यह संभवत: विश्व कीर्तिमान है।
दबंग छवि वाले 35 वर्षीय प्रमाणिक के विरुद्ध 11 फौजदारी मामले दर्ज हैं। उनकी शैक्षणिक योग्यता के दावे पर विवाद के कारण परिचय से स्नातक शब्द गायब किया गया। वर्ष 2018 में तृणमूल कांग्रेस से निष्कासित निशीथ को मार्च 2019 में भाजपा में शामिल किया गया। अजय मिश्र के बाद दूसरे गृह राज्यमंत्री प्रमाणिक ने केन्द्रीय गृह मंत्री की नाक नीची कर दी।
80 वर्षीय सोवनदेव चट्टोपाध्याय ने ममता बनर्जी के लिए भवानीपुर की विधायकी से त्यागपत्र दिया था। खरदा में जीता तृणमूल विधायक कोरोना की बलि चढ़ा। इसलिए उपचुनाव हुआ। खरदा उपचुनाव में 93 हजार से अधिक वोट से जीते। वफादारी को भारी जीत मिली? आर्थिक मामलों के वरिष्ठ पत्रकार प्रज्ञानंद चौधुरी ने याद दिलाया-पेट्रोल एक सौ बारह रुपए लिटर बिक रहा है। डीजल सौ पार कर चुका। हर क्षेत्र में महंगाई से उपजे असंतोष को न भूलें।
(लेखक दैनिक भास्कर नागपुर के समूह संपादक हैं)
-दिनेश श्रीनेत
अकेलेपन, बिछोह और बीमारियों से लड़ते-जूझते रहने के डेढ़-पौने दो वर्ष बाद रौनक फिर से दिख रही है। उत्सव मनाकर जैसे हम साबित करना चाहते हैं कि महामारी से हम टूटे नहीं हैं बल्कि फिर उठ खड़े हुए हैं। दो लहरों के बीत जाने के बाद अभी तीसरी या चौथी लहर का अंदेशा बाकी है। हर तूफान अपने पीछे तबाही के बहुत सारे निशान छोड़ जाता है, ये महामारी भी छोड़ गई है।
हर आपदा जीवन के लिए कुछ सबक भी दे जाती है। अज्ञेय के शब्दों में ‘दु:ख सबको माँजता है।’ यह हमें भीतर से खाली और हल्का कर देता है। किसी नए सुख महसूस करने और नई आपदाओं को स्वीकार करने लायक एक बेहतर इनसान बनाता है। गुजरी आपदा ने मेरे लिए भी कुछ सबक छोड़े हैं। कोई बड़ी बात नहीं है, बहुत छोटी-छोटी बातें हैं पर मुझे लगता है कि अहम हैं सो साझा कर रहा हूँ।
अजनबियों को देखकर मुस्कुरायें। क्योंकि जब तक यह जीवन है तभी तक इस दुनिया में इतने सारे लोग हैं, जो अलग कपड़े पहनते हैं, अलग तरीके से हँसते और दुखी होते हैं, अलग तरीके से आपकी जिंदगी में दाखिल होते हैं। हर नया इनसान आपके लिए एक नई दुनिया का दरवाजा खोलता है। आपके सबसे बेहतरीन दोस्त भी कभी अजनबी थे, बस वह एक पल था जब आप अपरिचय की वह सीमा रेखा लांघकर आगे बढ़े। बेहतर हो जब तक जिएँ नए दोस्त बनाएं, भले वह जीवन भर के लिए हों, कुछ सालों के लिए या कुछ घंटों के लिए। वह ऑफिस में मिलें, पड़ोस में या ट्रेन का इंतजार करते वक्त।
जिन्होंने आपके साथ कुछ बुरा किया है, उनसे नाराज़ होने की बजाय उन पर तरस खाएं। सोचें कि जीवन इतना छोटा है कि उनमें से बहुत अपने गलतियों पर बिना किसी बोध के इस दुनिया से चले जाएंगे। यानी कि उनके जीवन में आत्मसाक्षात्कार का एक पल भी नहीं आएगा कभी। बिना किसी चेतना, बोध या पश्चाताप के इस जीवन का क्या मोल है?
गलती करें। हम सब गलती करने से डरते हैं। जीवन एक बंधी लीक पर चलता रहता है। हर भूल या गलती जीवन में एक नया द्वार खोल देती है। अक्सर गलती के पीछे मकसद अच्छा ही होता है सिर्फ हम उस मकसद तक पहुँच नहीं पाते, हां उसके थोड़ा करीब जरूर चले जाते हैं। गलती न करने का गुरूर हमें घमंडी बनाता है और जीवन के प्रति अवास्तविक और गैर-ईमानदार नजरिया विकसित हो जाता है। बेहतर हो खुद को परफेक्ट न मानें और सबके सामने यह स्वीकार करें कि आप परफेक्ट नहीं हैं।
भूल जाएं। बहुत सारी बातों को, लोगों को, स्मृतियों को। बहुत कुछ आप याद नहीं रखना चाहते हैं। उनका बोझ लेकर जीने से कोई फायदा नहीं है। जीवन की हर तकलीफ आपके भीतर बहुत कुछ जो जर्जर हो चुका है अपने साथ बहाकर ले जाती है। उसे बह जाने देना चाहिए। जो बाकी रह गया दरअसल वही आप हैं।
एकांत का सम्मान करें। खुद के और दूसरों के एकांत का भी। अपने आप को समय दें। अपने सेल्फ को रेस्पेक्ट दें। आम तौर पर हम अपने वज़ूद को न वक्त देते हैं और न ही उसे सम्मान देते हैं। मृत्यु समेत जीवन में ऐसे बहुत से पल आते हैं जब हमारा यह ‘सेल्फ’ ही हमारे साथ रह जाता है। तब हम उससे भयभीत होते हैं। गलती भी हमारी ही है, हमने कब उसका हालचाल पूछा? कब एकांत में खुद से बातें कीं? कब हमने अपने-आप को, अपनी पूरी मानवीय गरिमा को उसका वह सम्मान दिया, जिसका कि वह हकदार है?
अंत में, जीवन एक स्तरीय नहीं बहुस्तरीय है। एक जीवन में हम चाहें तो बहुत सारे जीवन जी सकते हैं। यह हमारे ऊपर है कि हम अपने सरल रैखिक जीवन को कितनी गहराई और बहुस्तरीयता से जी सकते हैं। हर नया अनुभव, हर नई यात्रा, हर नया इनसान हमारे जीवन में एक और आयाम जोड़ देता है।
मुझे लगता है कि हमें इस जीवन को एक यात्रा की तरह जीना चाहिए, बिना किसी मोह के क्योंकि हमारी तरह इस धरती पर करोड़ों-खरबों दिल धडक़ रहे हैं, अंधेरे के इस महासागर में खरबों रोशनियां टिमटिमा रही हैं, प्रज्ज्वलित हो रही हैं और बुझ रही हैं। इस पूरे जीवन, इस विशाल धरती, ब्रह्मांड को देख-समझ पाने के लिए भी हमारी उम्र बहुत छोटी है। बस, ये आती-जाती सांस ही सच है, यही एक काम पूरी शिद्दत से कर लें। (फेसबुक से)
बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक
भारत में अल्पसंख्यकों के साथ कोई भी गड़बड़ होती है तो वह विपक्षी नेताओं की बंदूक में बारुद का गोला बनकर बरसने लगती है। उसे बढ़ा-चढ़ाकर प्रचारित किया जाता है और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी भारत को नहीं बख्शा जाता। इसका यह अर्थ कतई नहीं कि भारत के अल्पसंख्यकों के साथ कोई अन्याय नहीं होता। अन्याय कई शक्लों में होता है और वह जब उतरता है तो वह जाति, मजहब, भाषा और प्रांत वगैरह की सीमाएं लांघ जाता है।
यदि आप अल्पसंख्यक हैं तो जाहिर है कि अन्यायकर्त्ता को जुल्म करते हुए ज्यादा डर नहीं लगता लेकिन जरा हम यह भी देखें कि अपने पड़ौसी देशों में अल्पसंख्यकों की दशा कैसी है? मैं जिन पड़ौसी देशों की बात कर रहा हूं, वे किसी समय भारत के ही हिस्से थे। भारत थे लेकिन आजकल वहां के अल्पसंख्यक कौन हैं ? पाकिस्तान, अफगानिस्तान, बांग्लादेश और मालदीव इस्लामी राष्ट्र हैं। वहां हिंदू, सिख और ईसाई अल्पसंख्यक हैं। भूटान बर्मा और श्रीलंका बौद्ध राष्ट्र हैं। वहां हिंदू, मुसलमान और ईसाई अल्पसंख्यक हैं।
भारत और नेपाल हिंदू राष्ट्र नहीं, हिंदू-बहुल राष्ट्र हैं। इनमें मुसलमान, ईसाई और यहूदी अल्पसंख्यक हैं। अब जऱा हम तुलना करें कि इन सब राष्ट्रों में उनके अल्पसंख्यकों के साथ उनकी सरकारें और उनकी जनता कैसा व्यवहार करती है? पाकिस्तान और बांग्लादेश की सरकारें काफी सतर्क हैं। उनके अल्पसंख्यकों के मंदिरों और गिरजों पर हमले होते हैं तो वे उनकी रक्षा करने की भरपूर कोशिश करते हैं लेकिन उनसे कोई पूछे कि उनके देशों में उनके अल्पसंख्यकों की संख्या दिनोंदिन घटती क्यों जा रही है? उनके हिंदू और ईसाई लोग अपना देश छोड़कर विदेश क्यों भाग रहे हैं? उनके यहां जबरन धर्म-परिवर्तन की खबरें हमेशा गर्म क्यों रहती हैं?
वे अपने देशों में ही नहीं, दक्षिण एशिया के सभी देशों में धर्म-परिवर्तन के लिए लालच, ठगी, धोखा, झूठ, फर्जी सेवा आदि का बहाना बनाए रखते हैं। जो लोग मुसलमान या ईसाई बनते हैं, वे कुरान और बाइबिल का क ख ग भी नहीं जानते। वे ईसा या मुहम्मद के जीवन से भी कुछ नहीं सीखते। वे अपनी जातीय पहचान और चरित्र से भी चिपके रहते हैं। बौद्ध देशों का भी यही हाल है। गौतम बुद्ध की अहिंसा को अपने आचरण में उतारने की जगह वे हिंसा का सहारा खुले-आम लेते हैं। म्यांमार और श्रीलंका में हमने देखा कि अपने आप को भिक्खु या संत या मुनि समझनेवाले लोग अल्पसंख्यकों का नर-संहार करने में जऱा भी संकोच नहीं करते।
इन सब पड़ौसी देशों में उनके अल्पसंख्यकों की संख्या इतनी कम है कि उनके क्रोध या असंतोष की कोई चिंता ही नहीं करता लेकिन भारत में जब भी अल्पसंख्यकों के साथ कोई ज्यादती होती है तो वे स्वयं तो अपनी आवाज खुलकर बुलंद करते ही हैं, उनका समर्थन करने के लिए अनेक नेता, बुद्धिजीवी और निष्पक्ष लोग सामने आने से डरते नहीं हैं। यही भारत की खूबी है।
(नया इंडिया की अनुमति से)
-तारण प्रकाश सिन्हा
कवियों की एक पंक्ति खुसरों, कबीर, तुलसी की भी है, जिनकी कविताएं समय की सीमाओं को लांघकर कविताएं नहीं रहीं, जन-उद्गार बन गयीं। कोई कवि यूं ही जन-कवि नहीं बना जाता। कोई कविता यूं ही जन-उद्गार नहीं बन जाती। लोक के मनो-मस्तिष्क को छू लेना यूं ही नहीं हो जाता। लोक से उठकर, लोक में ही उतर जाने के लिए लोक की आत्मा का होना जरूरी है, कवि में भी, और कवि की कविता में भी। लक्ष्मण मस्तुरिया ऐसे ही कवि थे। वे इसी पंक्ति के कवि थे। वे लोक की आत्मा के साथ जिये, और रच-रच कर लोक को समर्पित करते रहे। वे उन बिरले कवियों में हैं जिनके गीत खेतों-खलिहानों में इतने गुनगुनाए गए कि लोक-गीत ही बन गए। चंदैनी गोंदा के लिए उन्होंने अनेक गीत लिखे। आकाशवाणी से प्रसारित होने वाले उनके लिखे गीतों ने मई-जून की तपती हुई न जाने कितने गांवों की कितनी दोपहरियों में ठंडक घोली, कितनी ही सुबहों में रंगे भरे, कितनी ही शामों में किसानों और मजदूरों की थकावटें पोंछी। वे माटी के कवि थे, माटी की ताकत पर भरोसा करने वाले कवि थे। उनके पास सुमति की सरग निसैनी थी, जिस पर हर छत्तीसगढ़िया को चढ़ता हुआ देखना चाहते थे। मोर संग चलव कह कर, उन्होंने एक ही गीत में छत्तीसगढ़ महतारी की महिमा का बखान करते हुए स्वाभिमान के जागरण का मंत्र फूंक दिया। वे घर में, खेत में, मंचों पर, फिल्मों में केवल और केवल लक्ष्मण मस्तुरिया ही थे। वे माटी से टूटते हुए लोगों को बार-बार माटी की ओर लौटा लाते। आवाज देकर कहते - छइहां, भुइंहा ला छोड़ जवैया तै थिराबे कहां रे...। लक्ष्मण मस्तुरिहा मां सरस्वती के लाडले बेटे थे। सरस्वती ने उन्हें शब्दों से भी मालामाल किया और सुरों से भी। उन्होंने बेहतरीन आवाज पाई थी। संगीत की समझ पाई थी। उनके विशाल व्यक्तित्व और कृतित्व के आगे यह चर्चा गौण हो जाती है कि वे कहां जन्मे थे, कब जन्मे थे। उनका जिक्र होते ही बिलासपुर जिले का मस्तुरी गांव फैलकर पूरा छत्तीसगढ़ हो जाता है। 07 जून 1949 का दिन एक ऐसी तारीख हो जाता है, जिसे छत्तीसगढ़ के लोक-गीतों से मोहब्बत करने वाली हर पीढ़ी एक ऐतिहासिक तारीख के रूप में हमेशा याद रखेगी, जिस तारीख में एक कालजयी कवि, लेखक, गायक ने जन्म लिया था। हम 03 नवंबर 2018 की वह तारीख भी कभी नहीं भूलेंगे, जब अपने शब्दों और गीतों को छत्तीसगढ़ महतारी पर न्यौछावर करते हुए अमरत्व को प्राप्त हो गए। आज उनकी पुण्य तिथि पर मेरी उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि।
-डॉ. नितिन म. नागरकर
सरकार के अथक प्रयास और जनभागीदारी की बदौलत कुछ ही दिनों में देश में कोरोना टीकाकरण में सौ करोड़ का आंकड़ा पार कर लिया जाएगा। भारत जैसे विशाल जनसंख्या घनत्व वाले देश के लिए यह एक अहम उपलब्धि है। देश के कोने कोने में हमारे कोरोना वॉरियर ने टीका पहुंचाया। लेकिन सरकार की रणनीति और इन योद्धाओं की मेहनत तब ही कारगर होगी जब हम आने वाले कुछ महीने में और अधिक समझदारी का परिचय देगें। कोरोना अभी खत्म नहीं हुआ है, कुछ राज्यों में अभी भी एक्टिव केस का प्रतिशत ज्यादा है। वैक्सीन को लोगों ने कोरोना से सुरक्षा के हथियार को अपना लिया है उन्हें भी त्योहार में विशेष एहतियात बरतनी होगी।
अधिक दिन नहीं हुए जब देश ने कोरोना की दूसरी लहर का एक भयानक मंजर देखा। मुझे याद है हमारे रायपुर एम्स में मरीजों की लाइन लगी हुई थी और हम उपलब्ध संसाधनों में सभी को इलाज और ऑक्सीजन उपलब्ध कराने की भरकस कोशिश कर रहे थे। एक एक जान बचाने के लिए दिन रात ड्यूटी पर तैनात नर्स और डॉक्टर्स, वहीं मेडिकल संसाधनों की जरूरत के अनुसार आपूर्ति करने में सरकार की कोशिशें, वह सब कुछ ऐसे नहीं भुलाया जा सकता। कोरोना की दूसरी लहर में जिन लोगों ने अपने प्रियजनों को खोया वह अभी तक उस गम से उबर नहीं पाए है। आने वाले कुछ महीने इस संदर्भ में अति महत्वपूर्ण होने वाले हैं, कोरोना संक्रमण अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। हमारे देश में त्योहारों को हर्षोल्लाष के साथ मनाने की परंपरा रही है, हम एक दूसरे के घर जाते हैं, समूह में अपनी खुशियों को सबके साथ साझा करते हैं, लेकिन हमें इस बात को अच्छी तरह याद रखना है कि कोरोना महामारी अभी खत्म नहीं हुई है। जिन लोगों ने कोविड की पहली या दूसरी डोज ले ली है, उन्हें भी त्योहारों में कोविड अनुरूप व्यवहार का पालन करना है। निर्धारित दूरी, मास्क का प्रयोग और नियमित रूप से हाथ धोते रहने की आदत को व्यवहार में शामिल करें, ऐसा करने से हम अपने आसपास के वातावरण को कोरोना संक्रमण से सुरक्षित रख सकते हैं। इस संदर्भ में केन्द्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के स्वास्थ्य सचिव द्वारा सितंबर महीने में ही राज्यों को दिशा निर्देश जारी कर त्योहार के समय कोविड अनुरूप व्यवहार का पालन करने के लिए अनुचित बंदोबस्त करने के निर्देश दिए गए। सामूहिक रूप से मनाए जाने वाले त्योहार व्यक्तिगत तरीके से घर पर मनाएं जा सकते हैं, हम फोन या वीडियो कॉल के माध्यम से अपने प्रियजनों को त्योहारों की बधाइयां दे सकते हैं। रायपुर में इस बारे में लंबे समय से लोगों को जागरूक किया जा रहा है, छत्तीसगढ़ में आयोजित होने वाले पारंपरिक त्योहार पर स्वास्थ्य विभाग और सरकार की पूरी नजर है। कोरोना के बारे में लोगों को जागरूक करने के लिए स्वास्थ्य विभाग की मोबाइल वैन जिला स्तर पर भेजी गई जिससे गांव व हाट बाजार में भी लोग संक्रमण के प्रति जागरूक हो सकें। त्योहार पर लोगों की खुशियां बाधित न हो, इसके लिए पहले से ही सभी को कोविड अनुरूप व्यवहार का पालन करने के लिए प्रोत्साहित किया गया।
(निदेशक, अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान, रायपुर, छत्तीसगढ़)
-डॉ. दिनेश मिश्र
ग्रीन पटाखे या ईको फ्रेंडली पटाखे वे पटाखे है जिनसे सामान्य पटाखों की तुलना में प्रदूषण कम होता है और पर्यावरण के लिए बेहतर होते हैं। इसलिए ऐसे पटाखों को ग्रीन पटाखा या इको फ़्रेंडली पटाखे कहा जाता है।
ग्रीन पटाखों को विशेष तरह से तैयार किया जाता है और इनके जरिए 30 से 40 फीसद तक प्रदूषण कम होता है। ग्रीन पटाखों में वायु प्रदूषण को बढ़ावा देने वाले हानिकारक रसायन नहीं होते हैं।
ग्रीन पटाखे राष्ट्रीय पर्यावरण अभियांत्रिकी अनुसंधान संस्थान (नीरी) की खोज हैं. जो आवाज से लेकर दिखने तक पारंपरिक पटाखों जैसे ही होते हैं पर इनके जलने से कम प्रदूषण होता है. नीरी ने ग्रीन पटाखों पर कुछ वर्ष पहले इस सम्बंध में शोध आरम्भ किया था कि सामान्य पटाखे से निकलनेवाली गैस सल्फर डाई ऑक्साइड, नाइट्रस ऑक्साइड कार्बन मोनो ऑक्साइड और हेवी मेटल्स सल्फर, लेड, क्रोमियम, कोबाल्ट, मरकरी मैग्निशियम का कितना दुष्प्रभाव होता है .
वैसे भी सामान्य पटाखों के जलाने से भारी मात्रा में नाइट्रोजन और सल्फ़र गैस निकलती है, तथा नीरी के शोध का लक्ष्य इनकी मात्रा को कम करना था. ग्रीन पटाखों में इस्तेमाल होने वाले रसायन बहुत हद तक सामान्य पटाखों से अलग होते हैं सी. एस आई आर और नीरी ने कुछ ऐसे फ़ॉर्मूले बनाए हैं जो हानिकारक गैस कम पैदा करते हैं.
ग्रीन पटाखे ना सिर्फ आकार में कुछ छोटे होते हैं, बल्कि इन्हें बनाने में रॉ मैटीरियल (कच्चा माल) का भी कम इस्तेमाल होता है. इन पटाखों में पार्टिक्यूलेट मैटर (PM) का विशेष ख्याल रखा जाता है ताकि पटाखे छोड़ने के बाद कम से कम प्रदूषण फैले. वातावरण में ऊष्मा उत्सर्जन और शोर कम हो एवं इस तरह के पटाखों से निकलने वाला पीएम 2.5 भी कम हो।
एक और बात सामान्य पटाखों में से कुछ में लेड, बेरियम, ओर पारा अधिक मात्रा में होता है जिनके कारण जो धुआ निकलता है उसमे पीएम 2.5 का स्तर बढ़ जाता है .और कुछ सामान्य पटाखों में परक्लोरेट, नाइट्राइट और क्लोराइड काफी मात्रा में होता हैं। इसके अलावा बेरियम भी कई पटाखों में मिलता हैं।
ग्रीन पटाखों में बेरियम नाइट्रेट का इस्तेमाल नहीं होता और इसमें एल्युमिनियम की मात्रा भी काफी कम होती है. इनमें राख का इस्तेमाल नहीं किया जाता. दावा किया जा रहा है कि इन पटाखों को छोड़ने से पीएम 2.5 और पीए 10 की मात्रा में 30 से 35 पर्सेंट की गिरावट आती है.
सीएसआईआर वाले ग्रीन पटाखों में नाइट्रोजन बेस्ड नाइट्रो सेलुलोस हैं, जो कम प्रदूषण करेगा
ईको-फ्रेंडलीपटाखों से 35-40 डिसेबल आवाज के होते हैं, और। उसमें से धुआं अधिक नहीं निकलता है. वैसे जानकारी के लिए बता दें, प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड का भी कहना है कि शहरी आबादी में 34 से 45 डेसिबल आवाज के पटाखे फोड़ने चाहिए. ये कानों को नुकसान नहीं पहुंचाते. जबकि इंडस्ट्रियल इलाके में ये साउंड का लेवल 50 से 60 डेसिबल से अधिक नहीं होना चाहिए.
ग्रीन पटाखे
चार तरह के बनाए गए हैं, पहला, सेफ़ वाटर रिलीज़र: ये पटाखे जलने के बाद पानी के कण पैदा करेंगे, जिसमें सल्फ़र और नाइट्रोजन के कण घुल जाएंगे. सेफ़ वाटर रिलीज़र नाम नीरी ने दिया है. पानी प्रदूषण को कम करने का बेहतर तरीका माना जाता है.
दूसरे हैं स्टार क्रैकर: स्टार क्रैकर का फुल फॉर्म है सेफ़ थर्माइट क्रैकर. इनमें ऑक्सीडाइज़िंग एजेंट का उपयोग होता है, जिससे जलने के बाद सल्फ़र और नाइट्रोजन कम मात्रा में पैदा होते हैं. इसके लिए ख़ास तरह के कैमिकल का उपयोग होता है
सफल (SAFAL) पटाखे: इन पटाखों में सामान्य पटाखों की तुलना में 50 से 60 फ़ीसदी तक कम एल्यूमीनियम का इस्तेमाल होता है. इसे संस्थान ने सेफ़ मिनिमल एल्यूमीनियम यानी सफल ( SAFAL) का नाम दिया है.
चौथे हैं अरोमा क्रैकर्सः इन पटाखों को जलाने से न सिर्फ़ हानिकारक गैस कम पैदा होगी बल्कि ये अच्छी खुशबू भी देते हैं.
ग्रीन पटाखे फ़िलहाल भारत के बाज़ारों में उपलब्ध हैं. पर अभी ये जानकारी न होने से लोकप्रिय नहीं हो पाए पर यकीन मानिए आने वाला कल ग्रीन पटाखों या इको फ़्रेंडली पटाखों का ही है
(लेखक वरिष्ठ नेत्र विशेषज्ञ हैं.)
-श्याम मीरा सिंह
गौरी शाहरुख़ को छोड़कर मुंबई चली आईं थीं, तब शाहरुख़ आज के शाहरुख़ नहीं थे, एक कॉलेज में पढ़ने वाले एक नार्मल से लड़के थे जो एक लड़की से प्यार करने लगा था जिसे अपने कॉलेज की एक पार्टी में एक लड़के के साथ डांस करते हुए देखा था. तब का दिल ऐसा लगा कि फिर कहीं लगा ही नहीं. ये लड़का इतना पजेसिव था कि सामने खड़ा 'कबीर सिंह' भी संत आदमी लगे, इसको पसंद नहीं था कि गौरी खुले बाल रखें, ये नहीं चाहता था कि गौरी स्विमिंगसूट पहनें. प्यार बहुत था लेकिन इंसिक्योरिटी उससे भी ज्यादा थी, हो भी क्यों न, खुले बाल में गौरी कमाल जो दिखतीं थीं। वैसे भी स्त्री का खुलापन ही वह एकमात्र चीज है जिससे पुरुष को सबसे ज्यादा भय लगता है. शाहरुख़ नहीं चाहते थे कि कोई और लडका गौरी की तरफ देखे, शाहरुख़ कहते 'मेरे पास मत बैठो, चलेगा, पर किसी और लड़के के पास मत बैठा करो, मुझसे प्यार नहीं करती, चलेगा, लेकिन किसी और से प्यार करोगी तो मुश्किल होगी'.
क्या कोई कह सकता है रोमांस का बादशाह कभी इतना इनसिक्योर और इतना पजेसिव रहा होगा? शाहरुख़ की पजेसिवनेस ने गौरी को असहज कर दिया. इतना असहज कर दिया कि शाहरुख़ को बिना बताए गौरी मुंबई आ गईं और शाहरुख़ दिल्ली में ही रह गए. गौरी का दिल्ली से मुम्बई आ जाना इस कहानी का वो टर्निंग पॉइंट था जिसके लिए ये कहानी लिखी गई है. जिसकी भूमिका में पचासों शब्द बिता दिए गए.
शाहरुख ने खूब दम लगा दी ये जानने में कि गौरी मुंबई में कहाँ गईं हैं. तब फेसबुक नहीं था, न इन्स्टाग्राम था कि जो एक बार ब्लॉक हो गए तो दूसरी आईडी से पूछ लें कि कहाँ हो? क्या प्लीज हम दो मिनट बात कर सकते हैं. गौरी के बिना बताए जाने ने ऐसा अवकाश पैदा कर दिया कि शाहरुख़ तय नहीं कर पा रहे थे कि गौरी के चले जाने को मन में कहाँ रखें. ऐसी हालत हो गई कि मां को पूछना पड़ गया कि क्या बात है? इतना बुझे-बुझे क्यों रहते हो?
बेटे कि नाजुक हालत देख माँ ने हाथ में दस हजार रुपए थमा दिए, और कहा जा जिससे प्यार करता है ढूंढ ले. शाहरुख़ को सिर्फ इतना पता था कि उनकी प्रेमिका, उनकी गौरी मुंबई शहर में रहती है जिसके किनारों पर समुंदर आता है. लेकिन ये मालुम नहीं था कि इतने बड़े शहर में गौरी कहाँ होगी. हाँ एक बात और पता थी कि गौरी को समुद्र के 'बीच' पसंद हैं. पानी किनारे बैठना पसंद है. सोचा जरूर ही गौरी मुम्बई के बीच पर आती होगी. सोचा बीच ही तो हैं, ढूंढ लेंगे. पर मुंबई आकर पता चला यहां अनगिनत बीच हैं, हर बीच पर गौरी को ढूंढा, गौरी नहीं मिलीं. 2 दिन बीत गए. साथ में एक दोस्त था. जिस दोस्त के घर पर दो दिन ठहरे थे उसके माँ-बाप वापस लौट आए, सो दोस्त का घर छोड़ना पड़ा. रात एक स्टेशन के बाहर रखी बैंच पर सोकर काटी. अगले दिन फिर इस बीच से उस बीच गौरी को ढूंढा. पर गौरी कहाँ ही मिलनी थी? ऐसा थोड़े ही होता है, कोई फिल्म थोड़े ही है. प्रेम में दूसरी बार मिलना नहीं होता, प्रेम में दूसरी बार मिलना दूसरे जन्म लेने जितना होता है.
दो-एक दिन ऐसे ही कटे, धूप-छाँव क्या! माँ के लाए पैसे बीत गए, अपना सबसे पसंदीदा कैमरा बेच दिया. वह भी मामूली से पैसों में. दोस्त कहते यार चल, चलते हैं न, गौरी नहीं मिलनी. बीच पर खड़े शाहरुख ने खाली जेब में हाथ डालकर अपने दोस्त से कहा "One day I will rule this City" मतलब कि एक दिन इस शहर पर राज करूँगा (ऐसा शाहरुख की जीवनी लिखते हुए उनके दोस्त ने लिखा है)
जैसे जैसे दिन बीते, जेब खाली हो गईं, आखिरी दिन तय हुआ कि आज आखिरी बार और ढूंढ लेते हैं. एक बीच से दूसरे बीच घुमते रहे, पर गौरी नहीं मिली. तभी एक प्राइवेट बीच दिखा. ऑटो वाले से कहा रुको!, थोड़ा उधर चलते हैं. उम्मीद थी क्या पता जाते-जाते गौरी मिल ही जाए. ऊपर वाले को भी एक सुंदर सी प्रेम कहानी रचनी थी इतने मोड़ रख दिए कहानी में कि हर मोड़ पर दम निकले. आज ही दिल्ली लौटना था और आज ही गौरी दिख गईं. गौरी शाहरुख़ को देख रही थीं शाहरुख़ गौरी को. क्या गजब इत्तेफाक था..... गौरी की आंखों से टप टप आंसू टपकते रहे. शाहरुख़ को गौरी मिल चुकी थी, गौरी को उसका शाहरुख़. लेकिन किसको मालूम था कि ये लड़का अगले कुछ सालों में शाहरुख़ हो जाएगा.
जन्मदिन मुबारक शाहरुख़!
-ध्रुव गुप्त
आज धन्वंतरि त्रयोदशी या धन्वन्तरि जयंती की बधाई
लेते-देते या धनवर्षा की प्रत्याशा में किसी कर्मकांड में शामिल होने के पहले यह जान लेना जरूरी है कि आज के दिन का धन-संपत्ति से कहीं कोई संबंध नहीं है। यह धन का नहीं, आरोग्य का दिन है। पुराणों के अनुसार यह दिन उस घटना की स्मृति है जब समुद्र मंथन के अभियान में देवों और असुरों ने समुद्र पार के किसी देश में अमृत-घट के साथ महान चिकित्सक धन्वंतरि की खोज की थी। प्राकृतिक चिकित्सा-विज्ञान में पारंगत धन्वंतरि को आयुर्वेद चिकित्सा पद्धति का आदिपुरुष कहा जाता है। देवों ने उन्हें अपना चिकित्सक बनाया और उन्हें भगवान विष्णु का अवतार तक घोषित किया। हजारों वर्षों से लोगों का यह विश्वास रहा है कि इस दिन संध्या समय धन्वंतरि को याद कर यम को दीपदान करने से रोगों से होने वाली अकाल मृत्यु से सुरक्षा मिलती है। पता नहीं कैसे कालांतर में विकृतियों का शिकार होकर आयुर्वेद को समर्पित यह दिन धन की वर्षा का दिन बन गया। हमारी धनलिप्सा ने एक महान चिकित्सक को भी धन का देवता बना दिया।धनतेरस का यह वर्तमान स्वरुप बाजार और उपभोक्तावाद की देन है जिसने हमें बताया कि धनतेरस के दिन सोने-चांदी में निवेश करने, विलासिता के महंगे सामान खरीदने या जुआ-सट्टा खेलने से धन तेरह गुना तक बढ़ जाता है।
आज के दिन कहीं निवेश करना है तो आयुर्वेद के आदिपुरुष धन्वंतरि को याद कर अपने आरोग्य में निवेश कीजिए। अच्छे स्वास्थ्य से बड़ा इस दुनिया में कोई धन नहीं।
बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक
तालिबान सरकार के मंत्री जबीउल्लाह मुजाहिद ने काबुल में एक पत्रकार परिषद में बोलते हुए दुनिया के देशों को धमकी दी है कि यदि विभिन्न राष्ट्रों ने तालिबान सरकार को शीघ्र ही मान्यता नहीं दी तो उसका दुष्परिणाम सारी दुनिया को भुगतना होगा। उन्होंने यह भी कहा कि मान्यता उनका हक है और उससे उन्हें वंचित करना किसी के हित में नहीं है। तालिबान की पहली बात व्यावहारिक है और सत्य है लेकिन दूसरी बात अर्धसत्य है। तालिबान को मान्यता देना यदि राष्ट्रों के हित में होता तो वे अभी तक चुप क्यों बैठे रहते?
पाकिस्तान-जैसे देश भी उसकी मान्यता को अटकाए हुए हैं। सउदी अरब और यूएई जैसे देशों ने भी तालिबान सरकार को मान्यता अभी तक नहीं दी है जबकि पिछली तालिबान सरकार को उन्होंने सत्तारुढ़ होते ही मान्यता दे दी थी। तालिबान को सबसे पहले एक सवाल खुद से पूछना चाहिए। वह यह कि पाकिस्तान को अभी तक उनसे क्या परहेज है? पाकिस्तान की मदद के बिना तालिबान जिंदा ही नहीं रह सकते थे। काबुल पर उनका कब्जा होते ही पाकिस्तान ने अपने गुप्तचर प्रमुख और विदेश मंत्री को काबुल भेजा था। उसने तालिबान को यह अनुमति भी दे दी है कि वह इस्लामाबाद में अपना राजदूतावास चला ले लेकिन वहां कोई राजदूत नहीं होगा।
तालिबान के प्रतिनिधि अमेरिका, चीन, रूस, तुर्की, ईरान और यूरोपीय संघ से बराबर मिल रहे हैं। ये देश अफगान जनता को भुखमरी से बचाने के लिए दिल खोलकर मदद भी भिजवा रहे हैं लेकिन तालिबान सरकार को मान्यता देने की हिम्मत कोई भी देश क्यों नहीं जुटा पा रहा है? इसके कई कारण हैं। एक तो तालिबान ने अपनी सरकार को खुद ही 'कामचलाऊÓ घोषित कर रखा है याने उसे अधर में लटका रहा है तो दुनिया के देश उसे जमीन पर उतारने की जिम्मेदारी क्यों लें? दूसरा, तालिबान सरकार कई गिरोहों से मिलकर बनी हुई है।
कब कौनसा गिरोह किसे कत्ल कर देगा, कुछ पता नहीं। 40 साल पहले का खल्की-परचमी जमाना लोग भूले नहीं हैं। तीसरा, ढाई माह गुजर गए लेकिन अभी तक तालिबान ऐसी सर्वसमावेशी सरकार नहीं बना पाए, जिसे संपूर्ण अफगान जनता का प्रतिनिधि कहा जा सके। चौथा, अब भी अफगानिस्तान से ऐसी खबरें बराबर आ रही हैं, जो तालिबान की छवि पर धब्बा लगाती हैं। वहां की औरतों, सिखों, छात्रों, पत्रकारों को मारने और सताने की खबरें रुक ही नहीं रही हैं।
चाहे खुद तालिबान नेता इस तरह के क्रूर कारनामों को प्रोत्साहित न करते हों लेकिन वे अपने समर्थकों को रोकने में भी असमर्थ हैं। यदि यही स्थिति चलती रही तो तालिबान को मान्यता मिलना कठिन होगा और अफगानिस्तान की जो 10 अरब डॉलर की राशि अमेरिकी बैंकों में पड़ी हुई है, वह भी उसे नहीं मिल पाएगी। इस समय जरुरी यह है कि अफगान जनता को भुखमरी और अराजकता से बचाया जाए और इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए तालिबान को यदि अपने अनुयायिओं के विरुद्ध कठोर कदम उठाना पड़ें तो वे भी बेहिचक उठाए जाएं।
(नया इंडिया की अनुमति से)
-प्रकाश दुबे
उत्तर प्रदेश में किसान आंदोलन के साथ ही योगी आदित्यनाथ को नए गंठजोड़ का सामना करना होगा। प्रधानमंत्री, केन्द्रीय गृहमंत्री और योगी बाबा की तिकड़ी ने पश्चिम बंगाल में लोकसभा और विधानसभा चुनाव के दौरान ममता बनर्जी की नाक में दम कर दिया था। ममता बनर्जी ने इस उपकार का बदला चुकाने की तैयारी कर ली है। तृणमूल कांग्रेस पार्टी उप्र में चुनाव लड़ेगी। साथी होंगे-समाजवादी पार्टी और आम आदमी पार्टी। सपा ने बंगालवासी हिंदीभाषियों को तृणमूल का साथ देने के लिए कहा था। तृणमूल का लक्ष्य राष्ट्रीय दल बनने के साथ ही मोदी विरोधी चेहरे को चमकाना है। बरसों पहले सपा ने बांग्लाभाषी को पर्यटन निगम का अध्यक्ष बनाया था। खबर यह भी है कि कोलकाता के हिंदी अखबार के स्वामी और तृणमूल सांसद विवेक गुप्ता के संपर्कों का भी लाभ लिया जाएगा। गोवा में खिलाड़ी काम आए। उत्तर प्रदेश के अखाड़े में पत्रकार, साहित्यकार और कलाकार उतारने की तैयारी है।
नरकासुर युद्ध
परेशानियों को अवसर में बदलने वाली सूक्ति सबने सुनी है। कोरोना महामारी को प्रचार का हथियार बनाया जा सकता है तो प्रदूषण को क्यों नहीं? देश की राजधानी दिल्ली में केजरीवाल सरकार है। सरकार को हटाने में तो केन्द्र सरकार नाकाम रही। सरकार से कई अधिकार जरूर छीन चुकी है। प्रचार के तरीके नहीं छीन सकी। हवाई अड्डे, रेल्वे स्टेशनों, बस अड्डों, चौराहों और बगीचों में दिल्ली सरकार ने नौजवानों को नियुक्त कर रखा है। उनकी टी शर्ट पर लिखा है-युद्ध। आसपास मोटे-मोटे अक्षरों में लिखी इबारत के फलक लगे रहते हैं। दोनों मिलकर होते हैं- प्रदूषण से युद्ध। आम के आम और गुठलियों के दाम। हरियाणा-पंजाब से आने वाली जलती पराली और जाड़ों में कुहासे से परेशान दिल्ली को जगाने और नाम कमाने का अवसर तो है ही। इस बहाने युवा-युवतियों को कुछ दिन के लिए रोजगार मिला। चौराहों और बगीचों के दिन बहुरे। विचार किसी की खोपड़ी से निकला हो, केजरीवाल सरकार की वाहवाही से केन्द्र सरकार का दिल तो दुखेगा ही।
लक्ष्मी पूजा
राजस्थान के किलों और हवेलियों को होटल में तब्दील करने से कई काम सधे। राजा-रानी रंक होने से बचे। हाथ पर हाथ धरे बैठने की बजाय उन्हें विदेशी सैलानियों को सदियों पुराने निर्माण दिखाने और तफरीह कराने का अवसर मिला। कारोबार से केन्द्र सरकार हाथ खींच रही है। दिल्ली के कनाट प्लेस के मुहाने पर बने अधिकांश होटल निजी हाथों में जा चुके हैं। सरकार संचालित प्रतिष्ठानों में ऊंचा स्थान रखने वाले होटल जनपथ में इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कलाकेन्द्र का बसेरा है। हरियाली से घिरी कला केन्द्र की इमारतें, नाट्य गृह आदि के साथ विशाल भूभाग सेंट्रल विस्ता के जबड़ों में चला गया। जनपथ होटल का हाल वही था, जो जनता का है। कला केन्द्र का कार्यालय बनने से रौनक आई। अध्यक्ष राम बहादुर राय के कार्यालय का गलियारा मधुबनी पेंटिंग से सजा। पहले तल पर सचिव सच्चिदानंद जोशी का गलियारा पश्चिम और दक्षिण भारत की कलाकृतियों से संवरा। सेंट्रल विस्ता बनने के बाद कलाकेन्द्र का डेरा जनपथ से हटकर मुंबई की चाल की तरह के नए पते पर जाएगा। जनपथ पहुंचने में टूट-फूट नहीं हुई। आगे (राम बहादुर) जानें।
अन्नकूट
चुनाव में इज्जत की नौका डूबने का खतरा हमेशा रहता है। बोली बिगड़ती है। ऐन दीपावली से पहले होली वाली गालियों से अधिक घटिया बातें सुनकर फजीहत करानी पड़ती है। हैदराबाद नगरनिगम के चुनाव से भाजपा का हौसला बढ़ा। हम भी हैं, तुम हो, दोनों हैं आमने-सामने वाली अदा में ताल ठोंकी। तेलंगाना सरकार से निष्कासित मंत्री के दलबदल से जोश बुलंदी पर है। चंद्रशेखर राव पर परिवारवाद का आरोप लगाया। जवाबी हमले का मोर्चा बेटे और मंत्री तारक रामाराव ने संभाला। आम सभाओं में जनता से पूछते-हम इसी भाषा में कहने लगें कि भारत को गुजराती चला रहे हैं? मोदी-शाह की दुकड़ी तेल के दाम बढ़ाती जाए और राज्यों से उसकी भरपाई करने कहे? शालीन बनकर कहा-वे लोग अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को गाली गलौज में बदल रहे हैं। चतुर मुख्यमंत्री और सयाने बाप ने बेटे को कलयुगी अभिमन्यु बनाया। 30 अक्टूबर को उपचुनाव के लिए मतदान हो चुका है। गोवर्धन पूजा की प्रतीक्षा है।
(लेखक दैनिक भास्कर नागपुर के समूह संपादक हैं)
बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक
हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जिस भावभीने ढंग से वेटिकन में पोप फ्रांसिस से मिले, उसके फोटो अखबारों और टीवी पर देखकर कोई भी चकित हो सकता है। वैसे मोदी सभी विदेशी महाप्रभुओं से इसी गर्मजोशी के साथ मिलते हैं, चाहे वह डोनाल्ड ट्रंप हो या जो बाइडन हो। लेकिन यह एकतरफा अति उत्साह नहीं है। सामने वाले की गर्मजोशी भी उतनी ही दर्शनीय हो जाती है। लेकिन मोदी की पोप से हुई भेंट को न तो केरल के कुछ ईसाई और न ही कुछ कम्युनिस्ट नेता आसानी से पचा सकते हैं लेकिन वे यह न भूलें कि पोप से मिलने वाले ये पहले भारतीय प्रधानमंत्री नहीं है।
इनके पहले चार अन्य भारतीय प्रधानमंत्री पोप से वेटिकन में मिल चुके हैं। वे हैं— जवाहरलाल नेहरु, इंदिरा गांधी, इंदर गुजराल और अटलबिहारी वाजपेयी। अप्रैल 2005 में जब पिछले पोप का निधन हुआ तो भारत के उप-राष्ट्रपति भैरोसिंह शेखावत स्वयं वेटिकन गए थे। उस समय यह प्रश्न भारत और फ्रांस दोनों जगह उठा था कि यदि आपका राष्ट्र धर्म-निरपेक्ष है तो केथोलिक धर्म गुरु की अंत्येष्टि में आपका प्रतिनिधि शामिल क्यों हो? इसका जवाब यह है कि पोप की धार्मिक हैसियत तो है ही लेकिन वेटिकन एक राज्य भी है और पोप उसके सर्वोच्च शासक हैं।
यों भी किसी भी देश के राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री रोम जाते हैं तो वे पोप से प्राय: मिलते हैं लेकिन मोदी और पोप की इस भेंट से जो लोग नाराज हुए हैं, उनकी शिकायत है कि मोदी-राज में ईसाइयों और मुसलमानों पर काफी जुल्म हो रहे हैं लेकिन भाजपा इस भेंट का इस्तेमाल उन जुल्मों पर पर्दा डालने के लिए करेगी। इतना ही नहीं, गोवा और मणिपुर के आसन्न चुनावों में ईसाई वोटों को भी इस भेंट के बहाने पटाने की कोशिश करेगी। इस भेंट का इस्तेमाल नगालैंड, मिजोरम तथा देश के अन्य हिस्सों में रहने वाले ईसाइयों को लुभाने के लिए भी किया जाएगा।
यह संदेह निराधार नहीं है लेकिन सरकार के प्रवक्ता ने दो-टूक शब्दों में कहा है कि इस भेंट के दौरान धर्मांतरण का सवाल उठा ही नहीं। धर्मांतरण के सवाल पर भाजपा-शासित राज्य कड़े कानून बना रहे हैं और संघ के महासचिव दत्तात्रय होसबोले ने भय और लालच दिखाकर किए जा रहे धर्मांतरण को अनैतिक और अवैधानिक बताया है। सिर्फ संख्या बढ़ाने के लिए धर्म-परिवर्तन कराने के गलत तरीकों पर पोप भी कोई रोक नहीं लगाते। अब तो पोपों की व्यक्तिगत पवित्रता पर कभी सवाल नहीं उठता लेकिन यूरोप में उसके पोप-शासित हजार साल के समय को अंधकार-युग माना जाता है।
इस काल में पोपों को अनेक कुत्सित कुकर्म करते हुए और लोगों को ठगते हुए पाया गया है। इसीलिए ईसाई परिवारों में पैदा हुए वाल्तेयर, विक्टर ह्यूगो, कर्नल इंगरसोल और बुकनर जैसे विख्यात बुद्धिजीवियों ने पोप-लीला के परखचे उड़ा दिए थे। केथोलिक चर्च के इसी पाखंड पर प्रहार करने के लिए कार्ल मार्क्स ने धर्म को अफीम की संज्ञा दी थी। आशा है, पोप फ्रांसिस जब भारत आएंगे तो वे अपने पादरियों से कहेंगे कि ईसा के उत्तम सिद्धांतों का प्रचार वे जरुर करें लेकिन सेवा के बदले भारतीयों का धर्म नहीं छीनें।
(नया इंडिया की अनुमति से)
बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक
उप-राष्ट्रपति वैंकय्या नायडू ने अपने पिछले कई भाषणों में इस बात पर बड़ा जोर दिया है कि प्राचीन काल में भारत विश्व गुरु था और अब उसे वही भूमिका निभाना चाहिए। इसी बात पर उन्होंने पिछले सप्ताह गोवा के एक कालेज-भवन का उद्घाटन करते हुए अपना तर्कपूर्ण भाषण दिया। आश्चर्य है कि हमारे कोई भी शिक्षा मंत्री इस तरह के विचार तक प्रकट नहीं करते। उन्हें अमली जामा पहनाना तो बहुत दूर की बात है। इस मोदी सरकार ने शिक्षा मंत्री की जगह राजीव गांधी सरकार द्वारा गढ़ा गया फूहड़ शब्द 'मानव संसाधन मंत्रीÓ बदल दिया, यह तो अच्छा किया लेकिन क्या हमारे शिक्षा मंत्रियों और अफसरों को पता है कि विश्व-गुरु होने का अर्थ क्या है? यदि उन्हें पता होता तो आजादी के 74 साल बाद भी हम विश्व गुरु नहीं, विश्व चेले क्यों बने रहते ? अंग्रेजी राज ने हमारी नस-नस में गुलामी और नकल का खून दौड़ा रखा है।
हमारे बड़े से बड़े नेता हीनता ग्रंथि से ग्रस्त रहते हैं। हमारे वैज्ञानिक और तकनीकी विशेषज्ञ पश्चिम की नकल में व्यस्त रहते हैं। हमारी लगभग सारी शिक्षा संस्थाएं अमेरिकी और ब्रिटिश स्कूलों और विश्वविद्यालयों की नकल करती रहती हैं। अपने आप को बहुत योग्य और महत्वाकांक्षी समझनेवाले लोग विदेशों में पढऩे और पढ़ाने के लिए बेताब रहते हैं। इन देशों के छात्र और अध्यापक क्या कभी भारत आने की बात भी उसी तरह सोचते हैं, जैसे सदियों पहले चीन से फाहयान और ह्वेनसांग आए थे? भारत के गुरुकुलों की ख्याति चीन और जापान जैसे देशों तक तो थी ही, मिस्र, इटली और यूनान तक भी थी। प्लेटो और अरस्तू के विचारों पर भारत की गहरी छाप थी। प्लेटो के 'रिपब्लिकÓ में हमारी कर्मणा वर्ण-व्यवस्था का प्रतिपादन पढ़कर मैं आश्चर्यचकित हो जाया करता था। मेकियावेली का 'प्रिंसÓ तो ऐसा लगता था, जैसे वह कौटिल्य के अर्थशास्त्र का हिस्सा है।
इमेनुअल कांट और हीगल के विचार बहुत गहरे थे लेकिन मैं उन्हें दार्शनिक नहीं, विचारक मानता हूं। कपिल, कणाद और गौतम आदि द्वारा रचित हमारे छह दर्शनग्रंथों के मुकाबले पश्चिमी विद्वानों के ये ग्रंथ दार्शनिक नहीं, वैचारिक ग्रंथ प्रतीत होते हैं। जहां तक विज्ञान और तकनीक का सवाल है, पश्चिमी डॉक्टर अभी 100 वर्ष पहले तक मरीज़ों को बेहोश करना नहीं जानते थे, जबकि हमारे आयुर्वेदिक ग्रंथों में ढाई हजार साल पहले यह विधि वर्णित थी। अब से 400 साल पहले तक भारत विश्व का सबसे बड़ा व्यापारी देश था। समुद्री मार्गों और वाहनों का जो ज्ञान भारत को था, किसी भी देश को नहीं था। लेकिन विदेशियों की लूटपाट और अल्पदृष्टि ने भारत का कद एकदम बौना कर दिया। अब आजाद होने के बावजूद हम उसी गुलाम मानसिकता के शिकार हैं। वैंकेय्या नायडू ने पश्चिम की इसी चेलागीरी को चुनौती दी है और भारतीय शिक्षा और भारतीय भाषाओं के पुनरुत्थान का आह्वान किया है।
(नया इंडिया की अनुमति से)
-दिव्या आर्य
लिव-इन रिलेशनशिप, यानी शादी किए बगैर लंबे समय तक एक घर में साथ रहने पर बार-बार सवाल उठते रहे हैं। किसी की नजर में ये मूलभूत अधिकारों और निजी जिंदगी का मामला है, तो कुछ इसे सामाजिक और नैतिक मूल्यों के पैमाने पर तौलते हैं।
एक ताजा मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने लिव-इन रिलेशनशिप में रह रहे दो व्यस्क जोड़ों की पुलिस सुरक्षा की मांग को जायज ठहराते हुए कहा है कि ये ‘संविधान के आर्टिकल 21 के तहत दिए राइट टू लाइफ’ की श्रेणी में आता है।
याचिकाकर्ताओं ने अदालत से कहा था कि दो साल से अपने पार्टनर के साथ अपनी मजऱ्ी से रहने के बावजूद, उनके परिवार उनकी जिंदगी में दखलअंदाजी कर रहे हैं और पुलिस उनकी मदद की अपील को सुन नहीं रही है।
कोर्ट ने अपने फैसले में साफ किया कि, ‘लिव-इन रिलेशनशिप को पर्सनल ऑटोनोमी (व्यक्तिगत स्वायत्तता) के चश्मे से देखने की जरूरत है, ना कि सामाजिक नैतिकता की धारणाओं से।’
भारत की संसद ने लिव-इन रिलेशनशिप पर कोई क़ानून तो नहीं बनाया, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने अपने फ़ैसलों के ज़रिए ऐसे रिश्तों के क़ानूनी दर्जे को साफ़ किया है।
इसके बावजूद इस तरह के मामलों में अलग-अलग अदालतों ने अलग-अलग रुख़ अपनाया है और कई फैसलों में लिव-इन रिलेशनशिप को ‘अनैतिक’ और ‘गैर-कानूनी’ करार देकर पुलिस सुरक्षा जैसी मदद की याचिका को बर्खास्त किया है।
कानून की नजर में सही कब?
पंद्रह साल पहले सुप्रीम कोर्ट ने साल 2006 के एक केस में फैसला देते हुए कहा था कि, ‘वयस्क होने के बाद व्यक्ति किसी के साथ रहने या शादी करने के लिए आजाद है।’
इस फैसले के साथ लिव-इन रिलेशनशिप को कानूनी मान्यता मिल गई। अदालत ने कहा था कि कुछ लोगों की नजर में ‘अनैतिक’ माने जाने के बावजूद ऐसे रिश्ते में रहना कोई ‘अपराध नहीं है।’
सुप्रीम कोर्ट ने अपने इसी फैसले का हवाला साल 2010 में अभिनेत्री खुशबू के ‘प्री-मैरिटल सेक्स’ और ‘लिव-इन रिलेशनशिप’ के संदर्भ और समर्थन में दिए बयान के मामले में दिया था।
खुशबू के बयान के बाद उनके खिलाफ दायर हुईं 23 आपराधिक शिकायतों को बर्खास्त करते हुए कोर्ट ने अपने फ़ैसले में कहा था, ‘इसमें कोई शक नहीं कि भारत के सामाजिक ढांचे में शादी अहम है, लेकिन कुछ लोग इससे इत्तेफाक नहीं रखते और प्री-मैरिटल सेक्स को सही मानते हैं। आपराधिक कानून का मकसद ये नहीं है कि लोगों को उनके अलोकप्रिय विचार व्यक्त करने पर सजा दे।’
लिव-इन रिलेशनशिप कब अपराध की श्रेणी में आ जाता है?
साल 2006 में भारतीय दंड संहिता की धारा 497 के तहत ‘अडल्ट्री’ यानी व्याभिचार गैर-कानूनी था। इसलिए सुप्रीम कोर्ट के फैसले के तहत मिली आज़ादी उन मामलों पर लागू नहीं थी जो शादी के बाहर संबंध यानी अडल्ट्री की श्रेणी में आते थे।
शादीशुदा व्यक्ति और अविवाहित व्यक्ति के बीच, या फिर दो शादीशुदा लोगों के बीच लिव-इन रिलेशनशिप कानून की नजऱ में मान्य नहीं था।
फिर साल 2018 में एक जनहित याचिका पर फ़ैसला सुनाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने ‘अडल्ट्री’ कानून को ही रद्द कर दिया।
याचिका दर्ज करनेवाले वकील कालेश्वरम राज ने बीबीसी से बातचीत में इस फैसले के लिव-इन रिलेशनशिप पर असर के बारे में बताया।
उन्होंने कहा, ‘अब कोई लिव-इन रिलेशनशिप इस वजह से गैर-कानूनी नहीं करार दिया जा सकता कि वो ‘अडल्ट्री’ की परिभाषा में आता है। सुप्रीम कोर्ट के साल 2006 और 2018 के फैसले एकदम साफ है और संविधान के आर्टिकल 141 के तहत उतने ही मजबूत कानून हैं जैसे संसद या विधानसभा द्वारा पारित कानून।’
लेकिन देश की अदालतों में शादीशुदा व्यक्ति के बिना तलाक़ लिए लिव-इन रिलेशनशिप में होने की सूरत में कई बार उनके रिश्ते को अब भी गैर-कानूनी बताया जा रहा है।
हाई कोर्ट के अलग-अलग फैसले
इसी साल अगस्त में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने पुलिस सुरक्षा की एक याचिका बर्खास्त कर दी और 5,000 रुपए जुर्माना लगाते हुए कहा कि, ‘ऐसे गैर-कानूनी रिश्तों के लिए पुलिस सुरक्षा देकर हम इन्हें इनडायरेक्ट्ली (अप्रत्यक्ष रूप में) मान्यता नहीं देना चाहेंगे।’
इसके फौरन बाद आए राजस्थान हाई कोर्ट के एक फैसले में भी ऐसे रिश्ते को ‘देश के सामाजिक ताने-बाने के खिलाफ’ बताया गया।
कालेश्वरम राज कहते हैं, ‘कानून की जानकारी और समझ का अभाव एक बड़ा मुद्दा है जो आम जनता, पुलिस सबके बीच व्याप्त है। 2018 के ‘अडल्ट्री’ के फैसले के एक साल बाद भी जब मैंने उत्सुकतावश भारतीय दंड संहिता पर बाज़ार में उपलब्ध कुछ किताबों पर नजर डाली तो पाया कि सेक्शन 497 को उनमें से हटाया नहीं गया था।’
कई निचली अदालतें सुप्रीम कोर्ट के फैसलों के ध्यान में रखते हुए सुनवाई कर भी रही हैं।
इसी साल सितंबर में पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट के सामने एक अविवाहित महिला और एक शादीशुदा मर्द ने उनकी पत्नी और परिवार से पुलिस सुरक्षा की याचिका दाखिल की।
हाईकोर्ट सुप्रीम कोर्ट के ‘अडल्ट्री’ को रद्द करनेवाले फैसले का हवाला देते हुए याचिकाकर्ताओं के हक में फैसला दिया और पुलिस को सुरक्षा मुहैया करने की हिदायत दी।
कोर्ट ने अपने फ़ैसले में कहा, ‘शादीशुदा होने के बावजूद लिव-इन रिलेशनशिप में रहना कोई गुनाह नहीं है और इससे भी कोई फर्क नहीं पड़ता कि शादीशुदा व्यक्ति ने तलाक की कार्रवाई शुरू की है या नहीं।’ (bbc.com/hindi)
-गिरीश मालवीय
न्यू वल्र्ड आर्डर की पहली बड़ी कम्पनी कल रात को लांॅच कर दी गई है, फेसबुक इंक को अब मेटावर्स के नाम से जाना जाएगा, कुछ लोग यह सोच रहे होंगे कि आखिर इस नाम फेसबुक में क्या बुरा है जो उसे एक बिल्कुल नया नाम दिया जा रहा है, दरअसल मेटावर्स एक पेरेंट कंपनी है जिसके अंदर फेसबुक, वॉट्सऐप, इंस्टाग्राम और कंपनी के दूसरे प्लेटफॉर्म आएंगे। ठीक वैसे ही जैसे गूगल की मालिक अल्फाबेट है।
फेसबुक के मालिक मार्क जुकरबर्ग की निगाह भविष्य पर गड़ी हुई है इंटरनेट का भविष्य वह मेटावर्स में देख रहे हैं यह बिल्कुल एक नई दुनिया होगी जो कहने को तो आभासी होगी लेकिन जितना समय गुजरता जाएगा आभासी दुनिया ही वास्तविक बनती जाएगी, जिसमें आप न सिर्फ जिंदा लोगो से बात कर पाएंगे बल्कि अपने मृत परिजनों से भी बात कर पाएंगे।
आपको मेरी बात शायद मजाक लग रही होगी लेकिन यह सच है बिल गेट्स की कम्पनी माइक्रोसॉफ्ट ने पिछले साल एक नई चैटबोट का पेटेंट कराया है। कंपनी का दावा है कि इस चैटबोट के जरिए आप मरे हुए लोगों से बातचीत कर सकते हैं। सीएनएन की एक खबर के मुताबिक माइक्रोसॉफ्ट को एक ऐसे चैटबोट के लिए पेटेंट दिया गया है जो मरे हुए दोस्त, रिश्तेदार, अजनबी और सेलिब्रिटी से बातचीत करने में सक्षम है, इस चैटबोट में मरे हुए लोगों के सोशल प्रोफाइल से डेटा लिया जाएगा। उनके इस मौजूदा डेटा के आधार पर चैटबोट का प्रोग्राम तैयार होगा। मरे हुए लोगों से बातचीत इसी पर आधारित होगी।
इस तरह के चैटबोट प्रोग्राम मेटावर्स की ही तैयारी है, आप सोच भी नहीं सकते है कि इन टेक जायन्ट्स कम्पनियों ने आपके भविष्य को अपने कंट्रोल में करने के लिए किस कदर तैयारियां कर ली है क्या-क्या पेटेंट करा लिए है!...फिलहाल आप मेटावर्स को ही ठीक से समझ लीजिये।
भास्कर में आए एक लेख के अनुसार फेसबुक का मानना है कि अभी मेटावर्स बनने के शुरुआती चरण में है। मेटावर्स को पूरी तरह से विकसित होने में 10 से 15 साल लग सकते हैं। साथ ही ये समझना भी जरूरी है कि मेटावर्स को केवल कोई एक कंपनी मिलकर नहीं बना सकती। ये अलग-अलग टेक्नोलॉजी का बड़ा सा जाल है जिस पर कई कंपनियां मिलकर काम कर रही हैं।
मेटावर्स एक तरह की आभासी दुनिया है इस टेक्निक से आप वर्चुअल आइडेंटिटी के जरिए डिजिटल वल्र्ड में एंटर कर सकेंगे। यानी एक पैरेलल वल्र्ड जहां आपकी अलग पहचान होगी। उस पैरेलल वल्र्ड में आप घूमने, सामान खरीदने से लेकर, इस दुनिया में ही अपने दोस्तों-रिश्तेदारों से मिल सकेंगे।
मेटावर्स ऑगमेंटेड रियलिटी, वर्चुअल रियलिटी, मशीन लर्निंग, ब्लॉकचेन टेक्नोलॉजी और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसी कई टेक्नोलॉजी के कॉम्बिनेशन पर काम करता है।’
अगर आप आने वाले न्यू वल्र्ड ऑर्डर ओर मेटावर्स की परिकल्पना को और भी बेहतर तरीके से समझना चाहते हैं तो ब्लैक मिरर नाम की वेब सीरीज देख लीजिए इसके पाँच सीजन है इसकी सबसे अच्छी बात यह है कि हर एपिसोड की कहानी बिल्कुल अलग है यह नेटफ्लिक्स पर हिंदी सबटाइटल के साथ भी उपलब्ध है।
-रमेश अनुपम
‘बस्तर भूषण’ तत्कालीन बस्तर का एक जीवंत दस्तावेज है। एक सरकारी मुलाजिम जो जंगल विभाग में मामूली फॉरेस्ट रेंजर था उससे ऐसी उम्मीद नहीं की जा सकती थी कि वे बस्तर का इतना सुंदर वर्णन करें और बस्तर जैसे बीहड़ आदिवासी अंचल को बस्तर भूषण की संज्ञा से विभूषित करे।
ऐसी उम्मीद तो अंग्रेज अधिकारियों से ही की जाती रही है, जो भारत की विपुल संस्कृति तथा परंपरा को जानने के लिए हमेशा तत्पर रहा करते थे।
बीसवीं शताब्दी के प्रारंभिक काल में नींद में डूबे हुए और इंद्रावती की धूसर जलराशि में खुद को निहारते हुए बस्तर के विपुल सौंदर्य को केदार नाथ ठाकुर जैसे कविहृदय लेखक ही अपनी कृति में उकेर सकते थे।
बैलाडीला की पहाडिय़ों से सुदूर अंतरिक्ष की ओर नजर लगाए, सागौन और शीशम के संग झूमते-गाते उस बस्तर को भी जो लांदा के नशे में मदमस्त था उसे कोई केदार नाथ ठाकुर ही बूझ सकता था।
‘बस्तर भूषण’ का प्रकाशन सन 1908 में हुआ। सन 1908 के बस्तर को केदार नाथ ठाकुर की निगाह से देखना और तत्कालीन बस्तर के आदिवासी जनजीवन और उनके संगी साथी प्रकृति के बारे में विस्तारपूर्वक लिखना कोई साधारण कार्य नहीं है। यह बस्तर पर पहली प्रामाणिक कृति है।
‘बस्तर भूषण’ तीन भागों में विभक्त ग्रंथ है। पहले भाग में केदार नाथ ठाकुर ने बस्तर के भौगोलिक वर्णन के साथ-साथ वहां की जनसंख्या, वहां रहने वाले आदिवासी जनजाति के प्रकार पर विशद विश्लेषण प्रस्तुत किया है।
जानकर आश्चर्य हो सकता है कि उस समय बस्तर की आबादी मात्र तीन लाख दस हजार थी। जगदलपुर जैसे शहर की कुल आबादी ही पंद्रह हजार थी, दंतेवाड़ा की दस हजार, कोंडागांव की बाईस हजार।
इसी भाग में बस्तर के बारे में लिखते हुए केदार नाथ ठाकुर यह बताने का प्रयत्न करते हैं कि उस समय तक बस्तर देश के लोगों के लिए एक गुमनाम अंचल हुआ करता था-
‘पहले पहल रायपुर में जब-जब हमारे पूज्यवर पिताजी बस्तर से आते थे लोग बस्तर का नाम सुन-सुन कर चकित होते थे और ताज्जुब की निगाह से समझते थे कि बस्तर अगम्य स्थान मानों हिंदुस्थान से अलग किसी अन्य महाद्वीप में है। बस्तर में आना काला पानी जाना समझा जाता था।’

केदार नाथ ठाकुर ने इसी भाग में बस्तर के मूल निवासी के रूप में केवल 24 जातियों को ही आदि निवासी माना है जो इस प्रकार है-
1. माडिय़ा 2. मुरिया 3. भतरा
4. परजा 5. गड़वा 6. हल्बा
7. गांडा 8. महरा 9.चंडार
10.धुरुवा 11 डोम 12 लोहार
13 मातृगोंड 14 राजगोंड
15 दोरा 16 नाहर 17 नाईकपोड़ 18 कुडकु
19 अंदकुरी 20 कुम्हार 21 कोस्टा 22 चर्मकार
23 केवट 24 धाकड़
उन्होंने यह भी लिखा है कि बस्तर के आदिवासी जनजातियों में माडिय़ा, परजा, गदवा, मूरिया और घुरवा प्रमुख जनजाति हैं। उस समय माडिय़ा जनजाति के लोग बैलाडीला पहाडिय़ों के आस-पास रहा करते थे। माडिय़ा जनजाति के आदिवासियों की जनसंख्या लगभग 40 हजार के आसपास थी। इस जनजाति के विषय में केदार नाथ ठाकुर ने जो लिखा है उसे हमें अवश्य जानना चाहिए।
‘चाहे फांसी हो, चाहे किसी प्रकार का दुख हो, झूठ नहीं बोलेंगे। कई खूनी मुकदमा मेरे देखने में आए हैं जहां कोई गवाह ठीक-ठीक खून होने की गवाही नहीं दे सके, परंतु अपराधी ने सभी बातें कबूल कर ली।’
यह आज भी उतना ही सच है। बस्तर में रहने वाले आदिवासी न झूठ बोलते है, न उन्हें किसी प्रकार की चालाकी आती है और न चोरी करते हैं। किसी प्रकार का अपराध याने आपसी रंजिश में अगर वे किसी की हत्या कर दें तो थाना पहुंचकर स्वयं हत्या करना स्वीकार कर लेते हैं।
घोटूल के बारे में केदार नाथ ठाकुर ने अपने इस ग्रंथ में लिखा है-
‘कुल माडिय़ा और आदि निवासियों के गांव-गांव में घोटूल गुड़ी बनी रहती है। घोटूल गुड़ी में कुंवारे लडक़े-लड़कियां रात में मिलते हैं और वहीं रात्रि विश्राम करते हैं। घोटूल गुड़ी में एक दूसरे से प्रेम हो जाने के पश्चात आपस में इनकी शादी हो जाती है।’
आदिवासियों की संपत्ति की चर्चा करते हुए केदार नाथ ठाकुर ने लिखा है कि संपत्ति के नाम पर आदिवासियों के पास दो चार लंगोटी, दो चार सादा कपड़ा, गौर सींग। खाने के बर्तन उनके घरों में नहीं होते थे। खाने के लिए वे पत्तलों का प्रयोग करते थे। एक बुरका झिरिया से पानी निकालने के लिए बना कर रखते हैं। जडक़ाले ( ठंड ) के दिनों में भी खुले मैदानों में बिना कपड़ों के ये लोग पड़े रहते हैं।
आज ऐसा कोई केदार नाथ ठाकुर हमारे पास नहीं है जो बस्तर के सुदूर दुर्गम अंचलों में जाकर आज के आदिवासियों के बारे में, उनके सुख-दुख के बारे में और आजादी के इन 75 वर्षों में हम उनकी जिंदगी को कितना बेहतर बना पाए इसकी सच्ची जानकारी हमें दे सके।
इस वर्ष आजादी के 75 वें वर्ष को अमृत महोत्सव के रूप में मनाया जा रहा है। बस्तर के जंगलों में रहने वाले हमारे आदिवासी भाई बहनों के जीवन में हम कितना अमृत घोल सके या विष पान के लिए उन्हें कितना विवश कर सके यह लिखने वाला भी केदार नाथ ठाकुर जैसा अब कोई नहीं रह गया है।
बस्तर का भूषण आज निस्तेज हो चुका है। आज का बस्तर गोलियों की गूंज से थर्रा रहा है। पहाड़ी मैना का कंठ सूख चुका है। इंद्रावती के धूसर जल में अब रक्त की बूंदों को भी साफ-साफ देखा जा सकता है।
केदार नाथ ठाकुर का बस्तर अब वह बस्तर नहीं रह गया है।
(बाकी अगले हफ्ते)
म्यांमार में सैन्य तानाशाह जनरल मिन आंग लाई को आसियान शिखर सम्मेलन में न बुलाने के साहसी और अभूतपूर्व कदम से म्यांमार के कमजोर होने की उम्मीद थी. इस कदम से वहां की सैन्य सरकार पर क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय दबाव भी बनता.
डॉयचे वैले पर राहुल मिश्र की रिपोर्ट
लेकिन म्यांमार की सैन्य सरकार तो इन तमाम अटकलों को धता बताते हुए कूटनीतिक शतरंज की कई लम्बी चालें चल गयी. आसियान के जनरल लाई को न बुलाने के जवाब में म्यांमार ने पहले तो आसियान पर भेदभाव और आसियान चार्टर के उल्लंघन का आरोप लगाया और उसके बाद आसियान शिखर वार्ता में भाग लेने से ही मना कर दिया. इस अप्रत्याशित कदम से आसियान सकते में आ गया है क्योंकि दक्षिणपूर्व एशिया के देशों के इस क्षेत्रीय संगठन ने पहले से ही म्यांमार में लोकतंत्र बहाली के मुद्दे पर रुक-रुक कर और गिने चुने ही कदम ही उठाए हैं. फरवरी 2021 में जब आंग सान सू ची की लोकतांत्रिक सरकार को सैन्य तख्तापलट के जरिये गिरा दिया गया था तब भी इस मामले से सीधे तरीके से निपटने में आसियान को दो महीने लगे थे.
वार्ताओं के तमाम दौर चले और म्यांमार के जनरलों से बातचीत और चिंतन-मंथन के बाद आसियान और म्यांमार की सरकार के बीच पांच बिंदुओं पर समझौता हुआ और इसे फाइव पॉइंट कंसेंसस की संज्ञा दी गई. लेकिन म्यांमार की सैन्य सरकार अपने वादे से मुकर गई. उसने एक भी मुद्दे पर ईमानदारी से आसियान प्रतिनिधियों का साथ नहीं दिया. अंतरराष्ट्रीय समुदाय और लोकतंत्र समर्थक गैर सरकारी संगठनों के तमाम विरोधों के बावजूद आसियान ने म्यांमार से बहुत सख्ती नहीं अपनाई. अप्रैल में फाइव पॉइंट कंसेंसस पर सहमति के बावजूद अक्टूबर तक म्यांमार की सैन्य सरकार के सहयोग की उम्मीद की गई.
आसियान की हिचक
अक्टूबर की आसियान शिखर वार्ता के पहले भी जब आसियान ने जनरल लाई के शिरकत करने पर पाबंदी लगाईं थी, तब भी बात न बिगाड़ने और वार्ता की गुंजाइश बनाये रखने के लिए म्यांमार को कोई गैरराजनीतिक प्रतिनिधि या वरिष्ठ सरकारी अफसर भेजने अनुमति दी गई थी. यही नहीं, आंग सान सू ची की समर्थक और सैन्य सरकार विरोधी निर्वासित सरकार, नेशनल यूनिटी गवर्नमेंट को भी आसियान ने आधिकारिक तौर पर न मान्यता दी और न ही आसियान शिखर वार्ता में शिरकत का मौका दिया. लेकिन इसके बावजूद म्यांमार की सैन्य सरकार ने सहयोग की कोई पहल नहीं दिखाई.
अगर म्यांमार के नजरिये से देखा जाय तो सम्मेलन में शिरकत न करके वो एक ओर आसियान और उसके डायलॉग पार्टनरों के हाथों होने वाली फजीहत से बच गया और दूसरी ओर आसियान को एक संदेश भी दे दिया कि अगर म्यांमार से दोस्ती और संबंध कायम रखने हैं तो सैन्य सरकार को मान्यता और सम्मान दोनों ही देना पड़ेगा. म्यांमार की सेना जिसे तातमदाव के नाम से जाना जाता है, के लिए कोई भी बाहरी हस्तक्षेप खतरनाक है. उनके लिए सत्ता बचाकर रखने से महत्वपूर्ण और कुछ नहीं है. रहा सवाल आसियान की दबी छुपी धमकियों का, तो उनका असर कुछ नहीं होगा यह तो सभी को पता है.
म्यांमार को बखूबी मालूम है कि उसे चीन और रूस का समर्थन प्राप्त है. पड़ोसी थाईलैंड और भारत भी स्थिरता के नाम पर म्यांमार में सैन्य शासन को स्वीकार कर ही रहे हैं. दिक्कत सिर्फ पश्चिमी देशों की है. पर अमेरिका और यूरोप का साथ तो म्यांमार को वैसे भी नहीं मिला. इससे साफ जाहिर है कि शिखर सम्मलेन में न आने और आसियान की दबाव की नीति का जवाब देने में म्यांमार ने एक सोचा समझा जोखिम लिया है और फिलहाल यह म्यांमार की सैन्य सरकार के फायदे में ही दिख रहा है.
जहां तक आसियान का सवाल है तो म्यांमार की अनुपस्थिति से आसियान की अहस्तक्षेप की नीति पर व्यापक बहस तो जारी रहेगी लेकिन इस घटना से थाईलैंड की अगुआई वाले रूढिवादी धड़े ने मलेशिया और इंडोनेशिया के रिफॉर्मिस्ट धड़े पर बढ़त तो बना ही ली है. आसियान और उसके समर्थकों को यही डर है कि व्यापक सुधारों की कवायद में आसियान के दो फाड़ न हो जाएं क्योंकि अगर इस समय ऐसा होता है तो फायदा महाशक्तियों को होगा, आसियान या उसके सदस्यों को नहीं.
म्यांमार में लोकतंत्र बहाली डंडे के जोर पर या एक सख्त और त्वरित टाइमफ्रेम के तहत लाना संभव नहीं है, यह आसियान को मालूम है. फिलहाल आसियान यही कोशिश करेगा कि बातचीत के जरिये म्यांमार को रास्ते पर लाया जाय. अपनी आदत के अनुरूप आसियान को बीच का और शांतिपूर्ण रास्ता निकालना होगा जिससे म्यांमार एक बार फिर दुनिया से अलग-थलग न पड़े और साथ ही वहां लोकतंत्र की लौ भी जलती रहे. (dw.com)
पाकिस्तान में क्रिकेट, राजनीति और धर्म का सबब बन गया है. भारतीय टीम को हराने का मतलब मुसलमानों से “बदसलूकी” का बदला या मैच न खेलकर न्यूजीलैंड को “सबक सिखाने” जैसे नैरेटिव, खेल में जगह बना रहे हैं.
डॉयचे वैले पर शामिल शम्स की रिपोर्ट
टी20 क्रिकेट विश्व कप के एक मैच में पाकिस्तान ने भारत को क्या हराया कि देश के गृहमंत्री शेख राशिद अहमद ने कह डाला कि ये जीत "इस्लाम की जीत” है. ट्विटर पर जारी एक वीडियो संदेश में मंत्री ने कहा "दुनिया भर में मुसलमान उल्लास मना रहे हैं.” पहली बार है कि किसी वर्ल्ड कप मैच में पाकिस्तान ने भारत को शिकस्त दी है. जश्न स्वाभाविक ही था, देश भर में देशभक्ति के नारे गूंजने लगे. झूमते नाचते और पाकिस्तानी झंडा लहराते हुए लोग सड़कों पर उतर आए.
ब्रिटिश हुकूमत से 1947 में आजादी मिलने के बाद से भारत और पाकिस्तान के बीच रिश्तों में कड़वाहट रही है. बाकायदा तीन लड़ाइयां दोनों देशों के बीच हो चुकी हैं और दोनों देश विवादास्पद कश्मीर क्षेत्र में दखल को लेकर एक दूसरे पर आरोप लगाते आ रहे हैं. इस समूचे इलाके पर दोनों अपने प्रभुत्व का दावा करते हैं लेकिन उसके अलग अलग हिस्सों पर ही उनका शासन है.
ये भूराजनीतिक तनाव खेलों तक भी खिंचा चला आया है, खासकर क्रिकेट में जो भारत और पाकिस्तान में सबसे ज्यादा लोकप्रिय खेल है. रविवार को भारत की हार के बाद पाकिस्तानी सोशल मीडिया, भारत विरोधी पोस्ट, मीम और टिप्पणियों से भर उठा.
राष्ट्रवाद में इस्लामवाद का पुट
अतीत में, भारत पाकिस्तान की क्रिकेट प्रतिद्वंद्विता राष्ट्रवादी भावना से निर्धारित होती थी और हाल के वर्षों में मजहब ने भी इसमें एक बड़ा रोल निभाना शुरू कर दिया है. कई पाकिस्तानी मानते हैं कि भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार भारतीय मुसलमानों के अधिकारों को कुचल रही है. पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान ने मोदी सरकार को बार बार एक "फासिस्ट हुकूमत” करार दिया है. उनका आरोप है कि वो न सिर्फ भारत प्रशासित कश्मीर में बल्कि देश के दूसरे हिस्सों में भी मुस्लिमों पर हिंसा कर रही है.
जानकारों का कहना है कि पाकिस्तानी गृहमंत्री अहमद का "इस्लाम की जीत” वाला बयान इसी रोशनी में देखा जाना चाहिए. क्योंकि उसका आशय यही है कि पाकिस्तान ने मुस्लिमों के खिलाफ "भारत के अत्याचारों” का "बदला” लिया है. पाकिस्तान के जानेमाने पत्रकार और सामाजिक मामलों के टिप्पणीकार नदीम फारूक पराचा ने डीडब्ल्यू को बताया कि "ये एक गैर-जिम्मेदाराना टिप्पणी थी.” वो कहते हैं, "पाकिस्तान के कई नेता हर चीज में इस्लाम को ले आते हैं. वे सत्ताधारी नेता वो काम नहीं कर पाते जिनके लिए वे चुने गए थे तो वही ये सब ज्यादा करते हैं. इस्लाम उनका आखिरी ठिकाना है.”
क्रिकेट का इस्लामीकरण
1990 के दशक तक कई पाकिस्तानी क्रिकेटर, मजहब को अपने पेशे से अलग रखा करते थे. उनमें से कई दाढ़ी नहीं रखते थे. 1992 का क्रिकेट विश्व कप पाकिस्तान की झोली में डालने वाले आज के प्रधानमंत्री इमरान खान जैसे कुछ पूर्व खिलाड़ियों की शिक्षा-दीक्षा ब्रिटेन में हुई थी. पिछले दो दशकों में कई पाकिस्तानी खिलाड़ी तबलीगी जमात में शामिल हुए थे. ये एक इस्लामी मिशनरी समूह है जिसके देश में लाखों अनुयायी हैं.
एक जमाने में अपनी "प्लेब्वॉय” छवि के लिए ब्रिटेन में चर्चित इमरान खान आज एक रूढ़िवादी नेता हैं जो मानते हैं कि पश्चिमी तहजीब का असर युवा पाकिस्तानियों को भ्रष्ट कर रहा है. कई क्रिकेटर अपने प्रेस सम्मेलनों में धार्मिक शब्दावली का इस्तेमाल करते हैं और कुछ तो जीतने के बाद मैदान पर घुटनों के बल झुककर सिर टिका देते हैं. भारत पाकिस्तान मैच के दौरान बल्लेबाज मोहम्मद रिजवान ने मैदान में नमाज अता की तो पाकिस्तानी सोशल मीडिया यूजरों ने उनकी जमकर तारीफ की.
पाकिस्तानी क्रिकेट टीम के पूर्व तेज गेंदबाज वकार यूनिस भी रिजवान के इस कदम से प्रभावित हुए बिना न रह सके. उन्होंने एक पाकिस्तानी न्यूज चैनल को बताया कि हिंदुओं के सामने रिजवान को "नमाज” अता करते हुए देखना उनके लिए बहुत खास था. बाद में वकार को अपने बयान पर माफी मांगनी पड़ी, "भावावेश में मैंने वो कह दिया जो मैं नहीं कहना चाहता था.”
पाकिस्तान में मोनोकल्चर इस्लाम
लेकिन इमरान खान के कराची स्थित 39 वर्षीय एक समर्थक कैसर इकबाल कहते हैं, "खेल के दौरान नमाज अता करने से खिलाड़ियों को एक मनोवैज्ञानिक ताकत मिलती है.” उन्होंने डीडब्ल्यू से कहा, "वे इस बात से संतुष्ट होते हैं कि उन्होंने अपना बेस्ट दिया और अब अल्लाह ही मदद करेगा.” लाहौर स्थित एक बैंकर जाहिदा नजर का कहना है कि मुसलमान मानते हैं कि मुश्किल हालात में अल्लाह ही मानने वालों की मदद करता है. वो कहती हैं, "लेकिन मैं सोचती हूं कि खेल में जीत के लिए कड़ी मेहनत भी जरूरी है.”
लेकिन खेल के मैदान के भीतर और बाहर पाकिस्तानी क्रिकेटर इस कदर मजहबी क्यों हो जाते हैं? शोधकर्ता और पत्रकार फारूक सुलेहरिया ने डीडब्ल्यू को बताया, "इस बारे में तो ज्यादा रिसर्च नहीं हुई है लेकिन कुछ अकादमिक विद्वानों और पत्रकारों ने इस तरह की घटना को समझने की कोशिश की है.” वो कहते हैं, "हमें ये समझना होगा कि क्रिकेट खिलाड़ी भी समाज का हिस्सा हैं और पाकिस्तान में इस्लाम एक ‘मोनोकल्चर' यानी ‘एकल-संस्कृति' बन चुका है. क्रिकेटर, फिल्मी सितारे और दूसरी शख्सियतें भी इसी का फायदा उठाती हैं.”
पराचा के मुताबिक पाकिस्तान में क्रिकेट का इस्लामीकरण 2000 के शुरुआती दशकों में शुरू हुआ था जब तबलीगी जमात आंदोलन कुछ प्रमुख क्रिकेट खिलाड़ियों को अपने सदस्यों के रूप में भर्ती करने में सफल रहा. पराचा बताते हैं, "2003 के विश्व कप में टीम का प्रदर्शन बहुत खराब था, और मैच फिक्सिंग के आरोप भी लग रहे थे. ये पछतावे और पाप से छुटकारे के एक संकेत की तरह था. 2003 और 2007 के दरमियान धार्मिकता का प्रदर्शन अपने उच्चतम स्तर पर था.”
ध्यान भटकाने के लिए क्रिकेट
समाजशास्त्रियों का कहना है कि दुनिया भर में हुकूमत करने वाले वर्ग, वास्तविक राजनीतिक मुद्दों से ध्यान भटकाने के लिए खेलों का इस्तेमाल करते रहे हैं. पाकिस्तान में क्रिकेट भी इसी मकसद के हवाले है. क्रिकेट मुकाबलों के दौरान लोग सरकार की कमजोरियों, प्रशासनिक गड़बडियों और बेतहाशा बढ़ती मुद्रास्फीति के बारे में भूल जाते हैं और राष्ट्रवाद में पनाह लेते हैं. पराचा रेखांकित करते हैं कि "भारत और पाकिस्तान में क्रिकेट लगातार राजनीति में मुब्तिला होता जा रहा है.”
सुलेहरिया का नजरिया है कि खेल भी सकारात्मक भूमिका निभा सकते हैं. "अगर आप अफगानिस्तान के हालात देखें. क्रिकेट वहां तालिबान के खिलाफ प्रतिरोध का प्रतीक बन चुका है. लेकिन भारत और पाकिस्तान में सत्ताधारी वर्ग अपने दमनकारी रवैये से लोगों को ध्यान हटाने के लिए क्रिकेट का इस्तेमाल कर रहे हैं.” पाकिस्तान इस समय अपने इतिहास का सबसे बुरा आर्थिक संकट झेल रहा है. बढ़ती मुद्रास्फीति और मुद्रा अवमूल्यन को लेकर इमरान खान की कड़ी आलोचना की जा रही है. लेकिन उनकी सरकार को क्रिकेट के जरिए देश को "एकजुट” करने का मौका मिल जाता है.
सुलेहरिया के मुताबिक, "क्रिकेट में राष्ट्रवाद का तड़का लगाने से इमरान खान को निश्चित रूप से फायदा हुआ है लेकिन उनकी लोकप्रियता घट रही है. ये चीज़ें लंबे समय तक उन्हें बचा नहीं पाएंगीं.” इमरान ने 1992 में पेशेवर क्रिकेट से विदाई के बाद राजनीति का रास्ता लिया था. जानकारों के मुताबिक पाकिस्तान में व्यापक पैमाने पर हुए राजनीतिकरण के सबसे बड़े लाभार्थियों में इमरान भी एक हैं. देश में एक अहम राजनीतिक खिलाड़ी के रूप मे उभरने से पहले इमरान को "मसीहा” का दर्जा हासिल था जिसने देश को उसका पहला क्रिकेट विश्व कप हासिल कराया था.
उनके समर्थक मानते हैं कि अगर इमरान "चमत्कारिक ढंग से” खेल की दुनिया की बेशकीमती ट्रॉफी पाकिस्तान को हासिल करा सकते थे तो वो बेशक देश की बेशुमार समस्याओं को भी "हल” कर सकते थे. लाहौर स्थित बैंकर नजर कहती हैं, "मैं मानती हूं कि इमरान देश को भ्रष्टाचार से निजात दिला सकते हैं. वो पाकिस्तान को मजबूत बना सकते हैं जैसा उन्होंने अपनी विश्व-कप विजेता टीम के जरिए किया था. लेकिन उन्हें सरकार में एक बेहतर टीम की दरकार है.” विश्लेषकों का कहना है कि जटिल समस्याओं के साधारण समाधानों पर यकीन रखने वाले पाकिस्तानियों के राजनीतिकरण के लिए क्रिकेट जिम्मेदार है. विश्लेषक पराचा इससे सहमत हैं, "भारत और पाकिस्तान में क्रिकेट एक राजनीतिक औजार बन चुका है. वो अब महज एक खेल नहीं रह गया है.” (dw.com)
बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक
इस बार ग्लासगो में होनेवाले जलवायु-परिवर्तन सम्मेलन शायद क्योतो और पेरिस सम्मेलनों से ज्यादा सार्थक होगा। उन सम्मेलनों में उन राष्ट्रों ने सबसे ज्यादा डींगें हांकी थीं, जो दुनिया में सबसे ज्यादा गर्मी और प्रदूषण फैलाते हैं। उन्होंने न तो अपना प्रदूषण दूर करने में कोई मिसाल स्थापित की और न ही उन्होंने विकासमान राष्ट्रों के लिए अपनी जेबें ढीली कीं ताकि वे गर्मी और प्रदूषित गैस और जल से मुक्ति पा सकें। संपन्न राष्ट्रों ने विकासमान राष्ट्रों को हर साल 100 बिलियन डॉलर देने के लिए कहा था ताकि वे अपनी बिजली, कल-कारखानों और वाहन आदि से निकलनेवाली गर्मी और प्रदूषित गैस को घटा सकें। वे सौर-ऊर्जा, बेटरी और वायु-वेग का इस्तेमाल कर सकें ताकि वातावरण गर्म और प्रदूषित होने से बच सकें। लेकिन डोनाल्ड ट्रंप के अमेरिका ने तो पेरिस समझौते का ही बहिष्कार कर दिया। ये सब संपन्न देश चाहते थे कि अगले तीस साल में जलवायु प्रदूषण याने कार्बन-डाइआक्साड की मात्रा घटे और सारे विश्व का उष्मीकरण ज्यादा से ज्यादा 2 डिग्री सेल्सियस तक हो जाए।
इस विश्व-तापमान को 1.5 डिग्री तक घटाने का लक्ष्य रखा गया। अमेरिका और यूरोपीय देश, जो सबसे ज्यादा गर्मी फैलाते हैं, उनका दावा है कि वे 2050 तक अपने तापमान को शून्य तक ले जाएंगे। वे ऐसा कर सकें तो यह बहुत अच्छा होगा। वे यह कर भी सकते हैं, क्योंकि उनके पास वैसी तकनीक है, साधन हैं, पैसे हैं लेकिन यही काम वे इस अवधि में वैश्विक स्तर पर हुआ देखना चाहते हैं तो उन्हें कई वर्षों तक 100 बिलियन नहीं, 500 बिलियन डॉलर हर साल विकासमान राष्ट्रों पर खर्च करने पड़ेंगे। ये राष्ट्र अफगानिस्तान जैसे मामलों में बिलियनों नहीं, ट्रिलियनों डॉलर नाली में बहा सकते हैं लेकिन विकासमान राष्ट्रों की मदद में उदारता दिखाने को तैयार नहीं हैं। क्या वे नहीं जानते कि सारी दुनिया में तापमान-वृद्धि का दोष उन्हीं के माथे है? पिछले दो-ढाई सौ साल में एशिया, अफ्रीका और लातीनी अमेरिका का खून चूस-चूसकर उन्होंने जो अपना अंधाधुंध औद्योगीकरण किया और उपभोक्तावाद की ज्वाला भड़काई, उसने ही विश्व-तापमान उचकाया और उसी की नकल दुनिया के सारे देश कर रहे हैं।
लगभग 50-55 साल पहले जब मैं पहली बार अमेरिका और यूरोप में रहा तो मैं वहां यह देखकर दंग रह जाता था कि लोग किस लापरवाही से बिजली, पेट्रोल और एयरकंडीशनिंग का दुरुपयोग करते हैं। अब इस मामले में चीन इन देशों को मात दे रहा है लेकिन भारत में प्रति व्यक्ति ऊर्जा का उपयोग सारी दुनिया के कुल औसत से सिर्फ एक-तिहाई है। भारत यदि कोयला और पेट्रोल आधारित अपनी ऊर्जा पर उतना ही नियंत्रण कर ले, जितना विकसित राष्ट्र दावा कर रहे हैं तो उसकी औद्योगिक उन्नति ठप्प हो सकती है, कल-कारखाने बंद हो सकते हैं और लोगों का जीवन दूभर हो सकता है। इसीलिए भारत को इस मामले में बड़ा व्यावहारिक होना है। किसी के दबाव में नहीं आना है और यदि संपन्न राष्ट्र दबाव डालें तो उनसे ऊर्जा के वैकल्पिक स्त्रोतों को विकसित करने के लिए अरबों डॉलरों का हर्जाना मांगना चाहिए। भारत ने पिछले 10-12 वर्षों में जलवायु परिवर्तन के लिए जितने लक्ष्य घोषित किए थे, उन्हें उसने प्राप्त करके दिखाया है।
(नया इंडिया की अनुमति से)
FB Founder Explains the Future...
We are at the beginning of the next chapter for the internet, and it's the next chapter for our company too.
In recent decades, technology has given people the power to connect and express ourselves more naturally. When I started Facebook, we mostly typed text on websites. When we got phones with cameras, the internet became more visual and mobile. As connections got faster, video became a richer way to share experiences. We've gone from desktop to web to mobile; from text to photos to video. But this isn't the end of the line.
The next platform will be even more immersive -- an embodied internet where you're in the experience, not just looking at it. We call this the metaverse, and it will touch every product we build.
The defining quality of the metaverse will be a feeling of presence -- like you are right there with another person or in another place. Feeling truly present with another person is the ultimate dream of social technology. That is why we are focused on building this.
In the metaverse, you'll be able to do almost anything you can imagine -- get together with friends and family, work, learn, play, shop, create -- as well as completely new experiences that don't really fit how we think about computers or phones today. We made a film that explores how you might use the metaverse one day.
In this future, you will be able to teleport instantly as a hologram to be at the office without a commute, at a concert with friends, or in your parents' living room to catch up. This will open up more opportunity no matter where you live. You'll be able to spend more time on what matters to you, cut down time in traffic, and reduce your carbon footprint.
Think about how many physical things you have today that could just be holograms in the future. Your TV, your perfect work setup with multiple monitors, your board games and more -- instead of physical things assembled in factories, they'll be holograms designed by creators around the world.
You'll move across these experiences on different devices -- augmented reality glasses to stay present in the physical world, virtual reality to be fully immersed, and phones and computers to jump in from existing platforms. This isn't about spending more time on screens; it's about making the time we already spend better.
OUR ROLE AND RESPONSIBILITY
The metaverse will not be created by one company. It will be built by creators and developers making new experiences and digital items that are interoperable and unlock a massively larger creative economy than the one constrained by today's platforms and their policies.
Our role in this journey is to accelerate the development of the fundamental technologies, social platforms and creative tools to bring the metaverse to life, and to weave these technologies through our social media apps. We believe the metaverse can enable better social experiences than anything that exists today, and we will dedicate our energy to helping achieve its potential.
As I wrote in our original founder's letter: "we don't build services to make money; we make money to build better services."
This approach has served us well. We've built our business to support very large and long term investments to build better services, and that's what we plan to do here.
The last five years have been humbling for me and our company in many ways. One of the main lessons I've learned is that building products people love isn't enough.
I've gained more appreciation that the internet's story isn't straightforward. Every chapter brings new voices and new ideas, but also new challenges, risks, and disruption of established interests. We'll need to work together, from the beginning, to bring the best possible version of this future to life.
Privacy and safety need to be built into the metaverse from day one. So do open standards and interoperability. This will require not just novel technical work -- like supporting crypto and NFT projects in the community -- but also new forms of governance. Most of all, we need to help build ecosystems so that more people have a stake in the future and can benefit not just as consumers but as creators.
This period has also been humbling because as big of a company as we are, we've also learned what it's like to build on other platforms. Living under their rules has profoundly shaped my views on the tech industry. I've come to believe that the lack of choice for consumers and high fees for developers are stifling innovation and holding back the internet economy.
We've tried to take a different approach. We want our services to be accessible to as many people as possible, which means working to make them cost less, not more. Our mobile apps are free. Our ads model is designed to provide businesses the lowest prices. Our commerce tools are available at cost or with modest fees. As a result, billions of people love our services and hundreds of millions of businesses rely on our tools.
That's the approach we want to bring to helping to build the metaverse. We plan to sell our devices at cost or subsidized to make them available to more people. We'll continue supporting side-loading and streaming from PCs so people have choice, rather than forcing them to use the Quest Store to find apps or reach customers. And we'll aim to offer developer and creator services with low fees in as many cases as possible so we can maximize the overall creative economy. We'll need to make sure we don't lose too much money along the way though.
Our hope is that within the next decade, the metaverse will reach a billion people, host hundreds of billions of dollars of digital commerce, and support jobs for millions of creators and developers.
WHO WE ARE
As we embark on this next chapter, I've thought a lot about what this means for our company and our identity.
We're a company that focuses on connecting people. While most tech companies focus on how people interact with technology, we've always focused on building technology so people can interact with each other.
Today we're seen as a social media company. Facebook is one of the most used technology products in the history of the world. It's an iconic social media brand.
Building social apps will always be important for us, and there's a lot more to build. But increasingly, it's not all we do. In our DNA, we build technology to bring people together. The metaverse is the next frontier in connecting people, just like social networking was when we got started.
Right now our brand is so tightly linked to one product that it can't possibly represent everything we're doing today, let alone in the future. Over time, I hope we are seen as a metaverse company, and I want to anchor our work and our identity on what we're building towards.
We just announced that we're making a fundamental change to our company. We're now looking at and reporting on our business as two different segments: one for our family of apps and one for our work on future platforms. Our work on the metaverse is not just one of these segments. The metaverse encompasses both the social experiences and future technology. As we broaden our vision, it's time for us to adopt a new brand.
To reflect who we are and the future we hope to build, I'm proud to share that our company is now Meta.
Our mission remains the same -- it's still about bringing people together. Our apps and their brands aren't changing either. We're still the company that designs technology around people.
But all of our products, including our apps, now share a new vision: to help bring the metaverse to life. And now we have a name that reflects the breadth of what we do.
From now on, we will be metaverse-first, not Facebook-first. That means that over time you won't need a Facebook account to use our other services. As our new brand starts showing up in our products, I hope people around the world come to know the Meta brand and the future we stand for.
I used to study Classics, and the word "meta" comes from the Greek word meaning "beyond". For me, it symbolizes that there is always more to build, and there is always a next chapter to the story. Ours is a story that started in a dorm room and grew beyond anything we imagined; into a family of apps that people use to connect with one another, to find their voice, and to start businesses, communities, and movements that have changed the world.
I'm proud of what we've built so far, and I'm excited about what comes next -- as we move beyond what's possible today, beyond the constraints of screens, beyond the limits of distance and physics, and towards a future where everyone can be present with each other, create new opportunities and experience new things. It is a future that is beyond any one company and that will be made by all of us.
We have built things that have brought people together in new ways. We've learned from struggling with difficult social issues and living under closed platforms. Now it is time to take everything we've learned and help build the next chapter.
I'm dedicating our energy to this -- more than any other company in the world. If this is the future you want to see, I hope you'll join us. The future is going to be beyond anything we can imagine.
डोनल्ड ट्रंप ने निकी हेली को संयुक्त राष्ट्र में अमेरिका की राजदूत बनाया था। इसके अलावा निकी हेली अमेरिकी राज्य दक्षिणी कैरोलाइना की 116वीं गवर्नर थीं। निकी हेली रिपब्लिकन पार्टी से हैं और उनका संबंध भारत से भी है। निकी हेली के माता-पिता अमृतसर के थे।
निकी हेली ने अमेरिकी पत्रिका ‘फॉरन पॉलिसी’ में रिपब्लिकन सांसद माइक वॉल्ट्ज़ के साथ एक लेख लिखा है। इस लेख में निकी हेली ने कहा है कि चीन मध्य और दक्षिण एशिया में और पाँव पसारे, उससे पहले भारत-अमेरिका को साथ मिलकर उसे रोक देना चाहिए।
निकी हेली और माइक वॉल्ट्ज ने अपने लेख की शुरुआत में ही बाइडन प्रशासन पर हमला बोलते हुए लिखा है, ‘फऱवरी महीने में अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन ने घोषणा की थी कि विदेशी नीति के केंद्र में डिप्लोमैसी की वापसी हो गई है और अमेरिका के सहयोगी देशों के साथ रिश्तों को फिर से पटरी पर लाया जाएगा। बाइडन के राष्ट्रपति बने नौ महीने हो गए हैं लेकिन हुआ बिल्कुल उलट है और कई चीज़ें हमारे खिलाफ जा रही हैं।’
इस लेख में निकी हेली ने कहा है, ‘अफगानिस्तान से विनाशकारी वापसी के बाद हमने देखा कि ब्रिटिश संसद में वहाँ के मंत्रियों ने बाइडन की खुलकर आलोचना की। फ्रांस ने असाधारण कदम उठाते हुए अपने राजदूतों को बुला लिया। हमने रूस के नॉर्ड स्ट्रीम 2 पाइपलाइन निर्माण के मामले में जर्मनी के सामने घुटने टेक अपने पूर्वी यूरोपीय सहयोगियों को अलग कर दिया।’
‘अफगानिस्तान से सेना की वापसी के बाद हमारे खिलाफ कई चीजें गई हैं। हमास, ईरान से लेकर तालिबान तक आतंकवाद की धुरी बन रहे हैं। पाकिस्तान ने ईरान के साथ संबंधों को बढ़ाना शुरू कर दिया है। चीन ने ताइवान में अपने लड़ाकू विमानों के जरिए वहाँ के हवाई क्षेत्र का हाल के दिनों में खूब अतिक्रमण किया है। रूस का बेलारूस में प्रभाव बढ़ा है और यूक्रेन के लिए ख़तरा बना हुआ है।’
निकी हेली ने पूछा है कि क्या यही बाइडन प्रशासन की अच्छी डिप्लोमैसी है? हेली कहती हैं, ‘जाहिर है कि नहीं है। अपने दोस्तों को अपमानित करने और दुश्मनों को नजरअंदाज करने के बजाय अमेरिका को उन रिश्तों को प्राथमिकता देनी चाहिए, जिनसे दुनिया भर में हमारी स्थिति मजबूत हो।’
निकी हेली कहती हैं, ‘इसकी शुरुआत भारत से होनी चाहिए। अब समय आ गया है कि हम एक गठबंधन बनाया जाए। 10 लाख सैनिक, परमाणु शक्ति संपन्न, नौ सेना की बढ़ती ताकत, अंतरिक्ष कार्यक्रम में अव्वल और अमेरिका के साथ आर्थिक और सैन्य संबंधों के आजमाए हुए अतीत के साथ भारत एक मजबूत सहयोगी बन सकता है। भारत के साथ सहयोग से दोनों देशों को वैश्विक ताकत बढ़ाने में मदद मिलेगी। इसके अलावा जापान और ऑस्ट्रेलिया को साथ लाकर अमेरिका अफगानिस्तान में आतंकी खतरा और चीन का काउंटर कर सकता है।’
निकी हेली ने लिखा है, ‘बाइडन प्रशासन ने अफगानिस्तान से बिना शर्त के हमारी सेना को वापस बुलाकर मध्य एशिया में हमारे विरोधियों को बड़ी शक्ति सौंप दी है। बड़ी संख्या में अमेरिकी नागरिकों को इस बात से राहत मिली होगी कि अमेरिका ने एक लंबी लड़ाई को खत्म कर दिया है लेकिन आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई अभी खत्म नहीं हुई है। जिन आतंवादियों ने 20 साल पहले हम पर हमला किया था, वे आज भी हम पर हमले का इरादा रखते हैं।’
निकी हेली ने लिखा है, ‘अफगानिस्तान में सेना की वापसी से पहले बाइडन प्रशासन ने अफगानिस्तान के उत्तरी हिस्सों के देशों से कोई भी समझौता करने में नाकाम रहा। यहाँ हमारे सैन्य ठिकाने होने चाहिए थे ताकि आतंकवाद के खिलाफ अभियान को जारी रखा जा सके। यहाँ तक कि बाइडन प्रशासन ने बगराम एयरफील्ड को भी छोड़ दिया जो एक मात्र एयरफील्ड था, जहाँ से चीन की सीमा लगती है।’
निकी हेली ने लिखा है, ‘इस इलाके में अब कोई अमेरिकी सैन्य ठिकाना नहीं होने से चीन, ईरान, रूस और यहाँ तक कि पाकिस्तान इन आतंकवादी समूहों के भविष्य को प्रभावित करेंगे। अब हमारे पास केवल एक पार्टनर है जो अफगानिस्तान पर प्रभावी तरीके से नजर रख सकता है। यही पार्टनर चीन के दक्षिणी हिस्से पर भी नजर रख सकता है। और वो है- भारत। ताजिकिस्तान में भारत फारखोर एयरबेस चलाता है। यह एकमात्र कऱीब का एयरबेस है, जहाँ से अफगानिस्तान में आतंकवादी विरोधी अभियान चलाया जा सकता है। भारत के साथ गठबंधन करने से हमें इस एयरबेस तक पहुँच मिलेगी और हम अफगानिस्तान में अपने हितों की रक्षा कर सकते हैं।’
निकी हेली ने लिखा है, ‘अमेरिका-भारत के साथ आने से हमें चीन के मामले में भी बढ़त मिलेगी। अमेरिका की तरह भारत भी मानता है कि चीनी खतरा तेजी से बढ़ रहा है। न केवल अफगानिस्तान से हमारी वापसी का फायदा उठाने में चीन लगा है बल्कि भारत से लगी सीमा पर भी दबाव बढ़ा रहा है। यह भारत और अमेरिका दोनों के हित में नहीं है। पिछले साल लद्दाख में भारत और चीन के सैनिकों के बीच हिंसक झड़प भी हुई थी, जिसमें 20 भारतीय सैनिक और चीन के सरकार के मुताबिक उसके चार सैनिकों की मौत हुई थी। चीन से लगी सीमा पर भारत ने सैनिकों की संख्या बढ़ा दी है और कुल दो लाख सैनिकों का जमावड़ा है। हाल के दिनों में चीन ने भारत से लगी सीमा पर सैनिकों की मौजूदगी 100 लॉन्ग रेंज के रॉकेट लॉन्चर के साथ बढ़ा दी है।’
निकी हेली ने कहा, ‘अमेरिका और भारत साथ मिलकर चीन को मध्य और दक्षिण एशिया में और पैर पसारने से पहले रोक सकते हैं। हम एक ठोस स्थिति बना सकते हैं। इसी महीने अमेरिकी सेना ने सैकड़ों भारतीय सैनिकों के साथ अलास्का में सैन्य अभ्यास किया। यहाँ का मौसम चीन-भारत सीमा पर की तरह ही है।’ (bbc.com/hindi)
बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक
चीन की संसद ने 23 अक्तूबर को जो नया कानून पास किया है, उसे लेकर हमारा विदेश मंत्रालय काफी परेशान दिखाई पड़ता है। उसने एक बयान जारी करके कहा है कि चीनी सरकार ने यह कानून बनाकर पड़ौसी देशों और खासकर भारत को यह संदेश दिया है कि उसने हमारी जमीन पर जो कब्जा किया है, वह कानूनी है और पक्का है। वह उस पर टस से मस नहीं होनेवाला है। हमारे प्रवक्ता ने यह भी कहा है कि यह नया भू-सीमा कानून उस अवैध चीन-पाकिस्तान समझौतों को भी सही ठहराता है, जिसके तहत 1963 में कश्मीर के काफी बड़े हिस्से को चीन के हवाले कर दिया गया था। प्रवक्ता ने यह भी कहा कि यह कानून 3488 किमी लंबी भारत-चीन सीमा के विवाद को न सिर्फ अधिक उलझा देगा बल्कि 17 माह से चले आ रहे गलवान-घाटी संवाद को भी खटाई में डलवा देगा। हमारा विदेश मंत्रालय इस मुद्दे पर चुप्पी साधे रहता, यह असंभव था। उसे अपनी शंकाएं जाहिर करना चाहिए थीं, जो उसने कर दीं लेकिन मेरा ख्याल है कि इस नए चीनी कानून के होने या न होने से हमारे सीमा-विवाद पर कोई खास फर्क नहीं पड़ रहा है। यों भी चीन अब तक क्या करता रहा है?
वह भारत सरकार के आलसीपन का लाभ उठाता रहा है। तिब्बत पर कब्जा करने के बाद 1957 से 1962 तक वह हमारी सीमाओं में घुसकर हमारी ज़मीन पर कब्जा करता रहा और हमारी नेहरु सरकार विश्वयारी की पतंगें उड़ाती रही। यह ठीक है कि अंग्रेज के जमाने में भी भारत-चीन सीमा का जमीन पर वैसा सीमांकन नहीं हुआ, जैसा कि पड़ौसी देशों के साथ प्राय: होता है। और यह तथ्य है कि पिछले कुछ वर्षों में दोनों देशों के सैनिक एक-दूसरे की तथाकथित सीमाओं का साल में सैकड़ों बार जाने-अनजाने उल्लंघन करते रहते हैं। जरुरी यह है कि चीन के साथ बैठकर संपूर्ण सीमांकन किया जाए ताकि यह सीमा-विवाद सदा के लिए समाप्त हो जाए।
चीनी संसद ने ये जो नया कानून बनाया है, उसमें साफ-साफ कहा गया है पड़ौसी देशों के साथ लंबे समय से चल रहे सीमा-विवादों को समानता, आपसी विश्वास और मैत्रीपूर्ण संवाद के द्वारा ठीक से हल किया जाए। हमारी सरकार की यह नीति समझ के परे है कि उसने सीमा-विवाद फौज के भरोसे छोड़ दिया है। फौजियों का काम लडऩा है या बात करना है? हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चीनी राष्ट्रपति शी चिन फिंग के साथ दर्जनों बार भेंट की और याराना रिश्ते बनाए। क्या वे सब फिजूल थे, कागजी थे, बनावटी थे? यदि मोदी और शी के बीच सीधा संवाद होता तो क्या सीमा का यह मामला इतने लंबे समय तक अधर में लटका रहता? अब भी समय है, जबकि दोनों सीधे बात करें। उससे हमारा सीमा-विवाद तो सुझलेगा ही, कश्मीर और काबुल में खड़ी समस्याओं का भी हल निकलेगा।
(नया इंडिया की अनुमति से)


