विचार / लेख
-रमेश अनुपम
‘बस्तर भूषण’ तत्कालीन बस्तर का एक जीवंत दस्तावेज है। एक सरकारी मुलाजिम जो जंगल विभाग में मामूली फॉरेस्ट रेंजर था उससे ऐसी उम्मीद नहीं की जा सकती थी कि वे बस्तर का इतना सुंदर वर्णन करें और बस्तर जैसे बीहड़ आदिवासी अंचल को बस्तर भूषण की संज्ञा से विभूषित करे।
ऐसी उम्मीद तो अंग्रेज अधिकारियों से ही की जाती रही है, जो भारत की विपुल संस्कृति तथा परंपरा को जानने के लिए हमेशा तत्पर रहा करते थे।
बीसवीं शताब्दी के प्रारंभिक काल में नींद में डूबे हुए और इंद्रावती की धूसर जलराशि में खुद को निहारते हुए बस्तर के विपुल सौंदर्य को केदार नाथ ठाकुर जैसे कविहृदय लेखक ही अपनी कृति में उकेर सकते थे।
बैलाडीला की पहाडिय़ों से सुदूर अंतरिक्ष की ओर नजर लगाए, सागौन और शीशम के संग झूमते-गाते उस बस्तर को भी जो लांदा के नशे में मदमस्त था उसे कोई केदार नाथ ठाकुर ही बूझ सकता था।
‘बस्तर भूषण’ का प्रकाशन सन 1908 में हुआ। सन 1908 के बस्तर को केदार नाथ ठाकुर की निगाह से देखना और तत्कालीन बस्तर के आदिवासी जनजीवन और उनके संगी साथी प्रकृति के बारे में विस्तारपूर्वक लिखना कोई साधारण कार्य नहीं है। यह बस्तर पर पहली प्रामाणिक कृति है।
‘बस्तर भूषण’ तीन भागों में विभक्त ग्रंथ है। पहले भाग में केदार नाथ ठाकुर ने बस्तर के भौगोलिक वर्णन के साथ-साथ वहां की जनसंख्या, वहां रहने वाले आदिवासी जनजाति के प्रकार पर विशद विश्लेषण प्रस्तुत किया है।
जानकर आश्चर्य हो सकता है कि उस समय बस्तर की आबादी मात्र तीन लाख दस हजार थी। जगदलपुर जैसे शहर की कुल आबादी ही पंद्रह हजार थी, दंतेवाड़ा की दस हजार, कोंडागांव की बाईस हजार।
इसी भाग में बस्तर के बारे में लिखते हुए केदार नाथ ठाकुर यह बताने का प्रयत्न करते हैं कि उस समय तक बस्तर देश के लोगों के लिए एक गुमनाम अंचल हुआ करता था-
‘पहले पहल रायपुर में जब-जब हमारे पूज्यवर पिताजी बस्तर से आते थे लोग बस्तर का नाम सुन-सुन कर चकित होते थे और ताज्जुब की निगाह से समझते थे कि बस्तर अगम्य स्थान मानों हिंदुस्थान से अलग किसी अन्य महाद्वीप में है। बस्तर में आना काला पानी जाना समझा जाता था।’

केदार नाथ ठाकुर ने इसी भाग में बस्तर के मूल निवासी के रूप में केवल 24 जातियों को ही आदि निवासी माना है जो इस प्रकार है-
1. माडिय़ा 2. मुरिया 3. भतरा
4. परजा 5. गड़वा 6. हल्बा
7. गांडा 8. महरा 9.चंडार
10.धुरुवा 11 डोम 12 लोहार
13 मातृगोंड 14 राजगोंड
15 दोरा 16 नाहर 17 नाईकपोड़ 18 कुडकु
19 अंदकुरी 20 कुम्हार 21 कोस्टा 22 चर्मकार
23 केवट 24 धाकड़
उन्होंने यह भी लिखा है कि बस्तर के आदिवासी जनजातियों में माडिय़ा, परजा, गदवा, मूरिया और घुरवा प्रमुख जनजाति हैं। उस समय माडिय़ा जनजाति के लोग बैलाडीला पहाडिय़ों के आस-पास रहा करते थे। माडिय़ा जनजाति के आदिवासियों की जनसंख्या लगभग 40 हजार के आसपास थी। इस जनजाति के विषय में केदार नाथ ठाकुर ने जो लिखा है उसे हमें अवश्य जानना चाहिए।
‘चाहे फांसी हो, चाहे किसी प्रकार का दुख हो, झूठ नहीं बोलेंगे। कई खूनी मुकदमा मेरे देखने में आए हैं जहां कोई गवाह ठीक-ठीक खून होने की गवाही नहीं दे सके, परंतु अपराधी ने सभी बातें कबूल कर ली।’
यह आज भी उतना ही सच है। बस्तर में रहने वाले आदिवासी न झूठ बोलते है, न उन्हें किसी प्रकार की चालाकी आती है और न चोरी करते हैं। किसी प्रकार का अपराध याने आपसी रंजिश में अगर वे किसी की हत्या कर दें तो थाना पहुंचकर स्वयं हत्या करना स्वीकार कर लेते हैं।
घोटूल के बारे में केदार नाथ ठाकुर ने अपने इस ग्रंथ में लिखा है-
‘कुल माडिय़ा और आदि निवासियों के गांव-गांव में घोटूल गुड़ी बनी रहती है। घोटूल गुड़ी में कुंवारे लडक़े-लड़कियां रात में मिलते हैं और वहीं रात्रि विश्राम करते हैं। घोटूल गुड़ी में एक दूसरे से प्रेम हो जाने के पश्चात आपस में इनकी शादी हो जाती है।’
आदिवासियों की संपत्ति की चर्चा करते हुए केदार नाथ ठाकुर ने लिखा है कि संपत्ति के नाम पर आदिवासियों के पास दो चार लंगोटी, दो चार सादा कपड़ा, गौर सींग। खाने के बर्तन उनके घरों में नहीं होते थे। खाने के लिए वे पत्तलों का प्रयोग करते थे। एक बुरका झिरिया से पानी निकालने के लिए बना कर रखते हैं। जडक़ाले ( ठंड ) के दिनों में भी खुले मैदानों में बिना कपड़ों के ये लोग पड़े रहते हैं।
आज ऐसा कोई केदार नाथ ठाकुर हमारे पास नहीं है जो बस्तर के सुदूर दुर्गम अंचलों में जाकर आज के आदिवासियों के बारे में, उनके सुख-दुख के बारे में और आजादी के इन 75 वर्षों में हम उनकी जिंदगी को कितना बेहतर बना पाए इसकी सच्ची जानकारी हमें दे सके।
इस वर्ष आजादी के 75 वें वर्ष को अमृत महोत्सव के रूप में मनाया जा रहा है। बस्तर के जंगलों में रहने वाले हमारे आदिवासी भाई बहनों के जीवन में हम कितना अमृत घोल सके या विष पान के लिए उन्हें कितना विवश कर सके यह लिखने वाला भी केदार नाथ ठाकुर जैसा अब कोई नहीं रह गया है।
बस्तर का भूषण आज निस्तेज हो चुका है। आज का बस्तर गोलियों की गूंज से थर्रा रहा है। पहाड़ी मैना का कंठ सूख चुका है। इंद्रावती के धूसर जल में अब रक्त की बूंदों को भी साफ-साफ देखा जा सकता है।
केदार नाथ ठाकुर का बस्तर अब वह बस्तर नहीं रह गया है।
(बाकी अगले हफ्ते)


