विचार/लेख
- डॉ. राजू पाण्डेय
ग्लोबल हंगर इंडेक्स में भारत के खराब प्रदर्शन और भारत सरकार द्वारा इंडेक्स की विश्वसनीयता पर उठाए गए प्रश्नों पर चर्चा करने से पूर्व यह जानना अधिक आवश्यक लगता है कि सरकार कुपोषण और भूख की समस्या को लेकर कितनी गंभीर रही है।
वर्ष 2021-22 का केंद्र सरकार का बजट शिशु और माता के पोषण से संबंधित योजनाओं के लिए आबंटन में कटौती के कारण चर्चा में रहा था। बजट में महिलाओं और बच्चों से जुड़ी अनेक योजनाओं का समेकन कर दिया गया था और जो एकमुश्त राशि आबंटित की गई थी वह पिछले वर्षों की तुलना में कम थी। कोविड-19 और लॉक डाउन के कारण जब लोग चिकित्सा सुविधाओं की कमी और खाद्यान्न के संकट से जूझ रहे थे तब सरकार द्वारा यह कटौती चौंकाने वाली भी थी और दुःखद भी।
आंगनबाड़ी केंद्रों के संचालन हेतु उत्तरदायी एकीकृत बाल विकास कार्यक्रम(आईसीडीएस) का बजट वर्ष 2020-21 में 20532 करोड़ था। वर्ष 2021-22 में आईसीडीएस को केंद्र की सक्षम योजना, पोषण अभियान और नेशनल क्रेच स्कीम के साथ समेकित कर इसके लिए केवल 20105 करोड़ रुपए के बजट का प्रावधान किया गया। उल्लेखनीय है कि विगत वर्ष सक्षम योजना के लिए ही बजट 24557 करोड़ रुपए था।
इसी बजट में मातृत्व विषयक सुविधाओं को प्रदान करने हेतु निर्मित प्रधानमंत्री मातृ वंदन योजना को सामर्थ्य योजना(जिसके अंतर्गत बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ योजना आती है), महिला शक्ति केंद्र तथा सामान्य लैंगिक बजटीय प्रावधानों के साथ संयुक्त कर दिया गया। इसके लिए बजटीय प्रावधान 2522 करोड़ रुपए किया गया जो पिछले वर्ष केवल प्रधानमंत्री मातृ वंदन योजना के लिए किए गए प्रावधान से जरा अधिक और केवल सामर्थ्य योजना हेतु किए गए प्रावधान 2828 करोड़ रुपए से 306 करोड़ रुपए कम था।
वर्ष 2021-22 के बजट में मिड डे मील के लिए 11500 करोड़ रुपए का प्रावधान किया गया जबकि 2020-21 के संशोधित बजट आकलन के अनुसार इसके लिए 12900 करोड़ की राशि का आबंटन था।
ग्लोबल हंगर इंडेक्स की रैंकिंग्स तो बहुत बाद में आई हैं। द फ़ूड एंड न्यूट्रिशन सिक्योरिटी एनालिसिस, इंडिया 2019 के अनुसार वर्ष 2022 तक पांच वर्ष से कम आयु के हर तीन बच्चों में से एक स्टन्टेड होगा। अनुसूचित जन जाति के शिशुओं में स्टन्टिंग की दर सर्वाधिक 43.6 प्रतिशत है जबकि अनुसूचित जाति के शिशुओं के लिए यह 42.5 प्रतिशत है। इस विश्लेषण के अनुसार पिछले दो दशकों में खाद्यान्न उत्पादन में 33 प्रतिशत की वृद्धि हुई है लेकिन तब भी यह 2030 के खाद्यान्न उत्पादन लक्ष्य की आधी ही है। खाद्यान्न उत्पादन में बढ़ोत्तरी के बावजूद यह अनाज आम आदमी की पहुंच से दूर है। आर्थिक असमानता की खाई बढ़ी है। बाजार में हर तरह का अनाज मौजूद है लेकिन इसे खरीदने के लिए आवश्यक क्रय शक्ति लोगों के पास नहीं है।
नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे- 5 के आंकड़े तो स्वयं सरकार ने दिसंबर 2020 में जारी किए थे जिनके अनुसार कोविड-19 के प्रारंभ के पूर्व से ही बच्चों में कुपोषण का स्तर बढ़ने लगा था। सर्वेक्षण के 2019-20 के आंकड़े बताते हैं कि चाइल्ड स्टन्टिंग की स्थिति 13 राज्यों में बिगड़ी है, जबकि चाइल्ड वेस्टिंग की समस्या 16 राज्यों में अधिक गंभीर हुई है।
इसके बाद का लगभग एक-डेढ़ साल का वक्फा कोविड-19 और उसके कारण लगाए गए लॉक डाउन के कारण कुपोषण की बिगड़ती स्थिति को और गंभीर बनाने वाला रहा है। शिक्षाविदों और चिकित्सकों के एक बड़े वर्ग द्वारा सरकार से स्कूलों और आंगनबाड़ी केंद्रों को खोलने के अनुरोध के बावजूद इन्हें पिछले डेढ़ साल से बंद रखा गया था। छह वर्ष से कम आयु के बच्चों के लिए सरकार का पोषण कार्यक्रम आंगनबाड़ी केंद्रों के माध्यम से ही संचालित होता है। यह बुरी तरह बाधित हुआ। कोविड-19 के कारण स्वास्थ्य तंत्र पर इतना अधिक दबाव पड़ा कि प्रसव और माताओं तथा शिशुओं के स्वास्थ्य से संबंधित सुविधाएं भी ठीक से उपलब्ध न हो सकीं।
जून 2021 में महिला एवं बाल विकास मंत्रालय ने आरटीआई के तहत पूछे गए एक सवाल के उत्तर में यह बताया कि पिछले साल नवंबर तक देश में छह महीने से छह साल तक के करीब 9,27,606 गंभीर रूप से कुपोषित बच्चों की पहचान की गई। यह आंकड़े वास्तविक संख्या से कम भी हो सकते हैं।किंतु सरकार इस भयावह होती स्थिति को अधिक गंभीरता से लेती नहीं दिखती।
हर तरफ "न्यू इंडिया" का शोर है लेकिन ऐसा लगता है कि सरकार नए भारत को कुपोषित भारत बनाना चाहती है। हम सभी जानते हैं कि कुपोषण के दुष्प्रभाव एक पीढ़ी तक सीमित नहीं रहते। कुपोषित माताएं कुपोषित बच्चों को जन्म देती हैं और यह दुष्चक्र गहराता जाता है। हमें यह चिकित्सकीय सत्य भी ज्ञात है कि प्रथम 1000 दिनों में मिलने वाला पोषण बच्चे के भावी जीवन को निर्धारित करता है।
प्यू रिसर्च सेंटर के आकलन दर्शाते हैं कि भारत में कोविड-19 के कारण गरीबों की संख्या में साढ़े सात करोड़ की वृद्धि हुई है। यह आंकड़ा गरीबी की वैश्विक वृद्धि में 60 प्रतिशत का योगदान करता है। नौकरियां छिन जाने और आय के स्रोत समाप्त हो जाने के बाद लाखों परिवारों के सम्मुख जीवन यापन हेतु मूलभूत सुविधाएं जुटाने का संकट पैदा हो गया है। इन परिस्थितियों में यह आशा नहीं की जा सकती कि वे पोषक आहार लेने के लिए धन जुटा पाएंगे।
वर्ल्ड इकॉनॉमिक फोरम ने जून 2021 में कहा है कि भारत में कोविड-19 के कारण भूख और गरीबी का संकट भयावह रूप ले रहा है। वर्ल्ड इकॉनॉमिक फोरम का सुझाव है कि तात्कालिक खाद्य आवश्यकता की पूर्ति और जीवन यापन के अवसर उपलब्ध कराना दोनों ही समान रूप से महत्वपूर्ण हैं।
कुपोषण और भुखमरी के यह हालात तब हैं जब राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून(2013) का कवच हमारे पास है जिसके जरिए हम 75 प्रतिशत ग्रामीण आबादी और 50 प्रतिशत शहरी आबादी को खाद्य और पोषण की सुरक्षा दे रहे हैं।इसके अतिरिक्त फरवरी 2006 से अस्तित्व में आई मनरेगा जिसका प्रारंभिक उद्देश्य कृषि क्षेत्र की बेरोजगारी से मुकाबला करना था, आज कोविड-19 के कारण शहरों से वापस लौटे प्रवासी मजदूरों को भी रोजगार मुहैया करा रही है। 15 वर्ष पुरानी इस योजना के लाभार्थी शायद आज सर्वाधिक हैं और इसके महत्व को पहले से ज्यादा महसूस किया जा रहा है। यह वही मनरेगा है जिसे प्रधानमंत्री जी ने कभी पिछली सरकारों की विफलता का स्मारक कहा था।
क्या हमारी सरकार ने राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून को और अधिक प्रभावी बनाकर इसका दायरा विस्तृत करने की दिशा में कोई कार्य किया है? दुर्भाग्य से ऐसा नहीं है।
28 फरवरी 2021 को समाचार पत्रों में जो खबरें सामने आई थीं उनके अनुसार नीति आयोग ने सरकार को खाद्य सुरक्षा कानून के तहत ग्रामीण इलाकों की 75 प्रतिशत और शहरी इलाकों की 50 प्रतिशत कवरेज को घटाकर क्रमशः 60 प्रतिशत और 40 प्रतिशत करने का सुझाव दिया है। नीति आयोग के अनुसार गरीबों का निवाला छीनकर सरकार 47229 करोड़ रुपए की वार्षिक बचत कर सकती है।
सरकार के कृषि कानून खाद्य सुरक्षा को खतरे में डालने वाले हैं। देश में कृषि भूमि सीमित है, फसलों की उत्पादन वृद्धि में सहायक सिंचाई आदि सुविधाओं तथा कृषि तकनीकों में सुधार की भी एक सीमा है। इस अल्प और सीमित भूमि में ग्लोबल नार्थ के उपभोक्ताओं को आकर्षित करने के लिए खाद्यान्नों के स्थान पर उन फसलों का उत्पादन किया जाएगा जो इन देशों में पैदा नहीं होतीं। जब तक पीडीएस सिस्टम जारी है तब तक सरकार के लिए आवश्यक खाद्यान्न का स्टॉक बनाए रखने के लिए अनाजों की खरीद जरूरी होगी। किंतु परिवर्तन यह होगा कि वर्तमान में जो भी अनाज बिकने के लिए आता है उसे खरीदने की अब जो बाध्यता है, वह तब नहीं रहेगी। सरकार पीडीएस को जारी रखने के लिए आवश्यक अनाज के अलावा अधिक अनाज खरीदने के लिए बाध्य नहीं होगी। इसका परिणाम यह होगा कि कृषि भूमि का प्रयोग अब विकसित देशों की जरूरतों के अनुसार फसलें पैदा करने हेतु होने लगेगा। विश्व व्यापार संगठन की दोहा में हुई बैठक से ही भारत पर यह दबाव बना हुआ है कि सरकार खाद्यान्न की सरकारी खरीद में कमी लाए किंतु किसानों और उपभोक्ताओं पर इसके विनाशक प्रभावों का अनुमान लगाकर हमारी सरकारें इसे अस्वीकार करती रही हैं। 1960 के दशक के मध्य में बिहार के दुर्भिक्ष के समय हमने अमेरिका के दबाव का अनुभव किया है और खाद्य उपनिवेशवाद के खतरों से हम वाकिफ हैं।
यह तर्क कि नया भारत अब किसी देश से नहीं डरता, केवल सुनने में अच्छा लगता है। वास्तविकता यह है कि अनाज के बदले में जो फसलें लगाई जाएंगी उनकी कीमतें अंतरराष्ट्रीय बाजार में बहुत ज्यादा उतार-चढ़ाव दर्शाती हैं, इसी प्रकार के बदलाव विदेशी मुद्रा में भी देखे जाते हैं और इस बात की आशंका बनी रहेगी कि किसी आपात परिस्थिति में हमारे पास विदेशों से अनाज खरीदने के लिए पर्याप्त विदेशी मुद्रा नहीं रहेगी। आज हमारे पास विदेशी मुद्रा के पर्याप्त भंडार हैं किंतु आवश्यक नहीं कि यह स्थिति हमेशा बनी रहेगी। विदेशों से अनाज खरीदने की रणनीति विदेशी मुद्रा भंडार के अभाव में कारगर नहीं होगी और विषम परिस्थितियों में करोड़ों देशवासियों पर भुखमरी का संकट आ सकता है।
भारत जैसा विशाल देश जब अंतरराष्ट्रीय बाजार से बड़े पैमाने पर अनाज खरीदने लगेगा तो स्वाभाविक रूप से कीमतों में उछाल आएगा। जब कमजोर मानसून जैसे कारकों के प्रभाव से देश में खाद्यान्न उत्पादन कम होगा तब हमें ज्यादा कीमत चुका कर विदेशों से अनाज लेना होगा। इसी प्रकार जब भारत में अनाज के बदले लगाई गई वैकल्पिक फसलों की कीमत विश्व बाजार में गिर जाएगी तब लोगों की आमदनी इतनी कम हो सकती है कि उनके पास अनाज खरीदने के लिए धन न हो।
यह एक सर्वज्ञात तथ्य है कि खाद्यान्न के बदले में लगाई जाने वाली निर्यात की फसलें कम लोगों को रोजगार देती हैं। जब लोगों का रोजगार छिनेगा तो उनकी आमदनी कम होगी और क्रय शक्ति के अभाव में वे भुखमरी की ओर अग्रसर होंगे। भारत जैसे देश में भूमि के उपयोग पर सामाजिक नियंत्रण होना ही चाहिए। भूमि को बाजार की जरूरतों के हवाले करना विनाशकारी सिद्ध होगा।
सरकार और सरकार समर्थक मीडिया किसान आंदोलन को जनविरोधी सिद्ध करने में लगे हैं जबकि सच्चाई यह है कि किसान देश को भूख, कुपोषण,गरीबी और बेरोजगारी से बचाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं।
कोविड-19 के समय देश की जनता को भुखमरी से बचाने में हमारे विपुल खाद्यान्न भंडार ही सहायक रहे। प्रधानमंत्री जी ने अपने स्वतंत्रता दिवस उद्बोधन में गर्वोक्ति की- "महामारी के समय भारत जिस तरह से 80 करोड़ देशवासियों को महीनों तक लगातार मुफ्त अनाज देकर के उनके गरीब के घर के चूल्हे को जलते रखा है और यह भी दुनिया के लिए अचरज भी है।" प्रधानमंत्री जी से यह कहा जाना चाहिए था कि सौभाग्य से आपके पूर्ववर्तियों की नीति आप जैसी नहीं थी और उन्होंने कृषि को निजी हाथों में नहीं सौंपा। अन्यथा कोविड काल में भुखमरी की स्थिति और भयंकर होती। यदि सरकार दो जून की रोटी को तरसते 80 करोड़ लोगों को (जिनकी आय का कोई जरिया नहीं है न ही जिनके पास कोई रोजगार है) अनाज उपलब्ध कराती है तो यह उन पर कोई उपकार नहीं है बल्कि अपनी असफलताओं का प्रायश्चित है।
ओलंपिक खिलाड़ियों से अपनी मुलाकात के दौरान आदरणीय प्रधानमंत्री जी आश्चर्यजनक रूप से खिलाड़ियों को यह बताते पाए गए कि देश में पौष्टिक खाने की कोई कमी नहीं है। बस लोगों को इस बात का पता नहीं है कि क्या खाया जाए? यदि प्रधानमंत्री जी कुपोषण को महज गलत खाद्य आदतों का परिणाम मानते हैं और इसका समाधान सिर्फ जनशिक्षण में देखते हैं तो इसका अर्थ सिर्फ यही है कि आत्ममुग्ध होने के कारण वे देश में भुखमरी और कुपोषण की स्याह हकीकत को देख नहीं पा रहे हैं।
ग्लोबल हंगर इंडेक्स की मेथडॉलोजी को लेकर सरकार ने सवाल उठाए हैं। महिला एवं बाल विकास मंत्रालय ने इसे ओपिनियन पोल पर आधारित बताया है। यह सही है कि सूचना एकत्र करने के लिए गैलप वर्ल्ड पोल की टेलीफोनिक सर्वे पद्धति का उपयोग किया गया है। किंतु जो प्रश्न पूछे गए हैं, वह ओपिनियन जानने के लिए तैयार नहीं किए गए थे। यह वस्तुनिष्ठ प्रश्न थे और इनके वैसे ही उत्तर मिले। विशेषज्ञ अपर्याप्त पोषित जनसंख्या के आकलन की इंडेक्स निर्माताओं की पद्धति पर सवाल उठाते रहे हैं और शायद भविष्य में हम इसमें परिवर्तन होता देखें।
कोई भी इंडेक्स शत प्रतिशत सही नहीं होता। कितनी ही वैज्ञानिक पद्धति क्यों न अपनाई जाए त्रुटि की गुंजाइश हमेशा रहती है। लेकिन इससे समूचे परिदृश्य की इतनी स्पष्ट तस्वीर मिल जाती है कि हम अपनी भावी नीतियों एवं कार्यक्रमों में सुधार कर सकें। महत्वपूर्ण है देश की परिस्थितियों और सरकार के कामकाज के किसी भी निष्पक्ष आकलन पर सरकार की प्रतिक्रिया। पिछले कुछ दिनों से सरकार ऐसे हर आकलन को खारिज करती रही है जो उसकी असफलताओं को उजागर करता है। इससे एक अंतरराष्ट्रीय षड्यंत्र की भांति चित्रित किया जाता है जो देश की छवि बिगाड़ने हेतु रचा गया है। असहमति के प्रति असहिष्णुता का रोग इतना बढ़ चुका है कि सरकार को निष्पक्ष अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं और एजेंसियों पर भी शंका होने लगी है। अगस्त 2021 में अपुष्ट सूत्रों के हवाले से कुछ समाचार पत्रों में यह खबर छपी थी कि सरकार इस तरह की रैंकिंग जारी करने वाली एजेंसियों से संपर्क करने की योजना बना रही है ताकि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उसकी छवि अच्छी बनी रहे। यदि ऐसा है तो यह बहुत दुःखद है। सरकार को अपने कामकाज में सुधार करना चाहिए न कि रैंकिंग्स को प्रभावित करने की कोशिश करनी चाहिए।
(रायगढ़, छत्तीसगढ़)
बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक
एक अमेरिकी रिपोर्ट में कहा गया है कि चीन की साइबर हमले करने और 'दुष्प्रचार अभियान चलानेÓ की क्षमता में भारी बढ़ोतरी होने वाली है। अब चीन से फौरी खतरा किसे है, इसे कहने की जरूरत नहीं है। लेकिन भारत में विमर्श ही कुछ और है। उससे देश का दीर्घकालिक भविष्य खतरे में पड़ रहा है।
ये नई बात नहीं है, लेकिन इससे यह जरूर पता चलता है कि दुनिया की बड़ी ताकतों का ध्यान अभी कहां केंद्रित है। ये देश इस निष्कर्ष पर हैं कि आने वाले दशकों में दुनिया पर किसका वर्चस्व होगा, वह कुछ तकनीकों में हासिल की गई दक्षता से ही तय होगा। अमेरिकी खुफिया अधिकारियों ने इस बारे में एक दस्तावेज तैयार किया है। इसमें तकनीक के पांच खास क्षेत्रों पर खास ध्यान केंद्रित किया गया है। ये वो अधिकारी हैं, जिन्हें यह जिम्मेदारी दी गई है कि वे उन्नत तकनीकों में अमेरिका की बढ़त को सुनिश्चित करेँ। तो उन्होंने इन पांच तकनीकों का जिक्र किया है: आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, क्वांटम कंप्यूटिंग, बायो-टेक्नोलॉजी, सेमी कंडक्टर्स, और ऑटोनोमस सिस्टम्स। उन्होंने कहा है कि चीन और रूस ने इनमें महारत हासिल करने में अपनी पूरी ताकत झोंक दी है। इन तकनीकों में आगे निकलने के लिए चीन और रूस 'कानूनी और गैर-कानूनी तरीकोंÓ का इस्तेमाल कर रहे हैँ। अधिकारियों ने जो दस्तावेज तैयार किया है, उसमें कहा गया है कि इन तकनीक क्षेत्रों में सफलता से ही यह निश्चित होगा कि क्या अमेरिका दुनिया की महाशक्ति बना रहेगा या उसके रणनीतिक प्रतिस्पर्धी उसे पीछे छोड़ देंगे।
इसके साथ ही ये खबर आई है कि अमेरिका के खुफिया अधिकारियों ने अमेरिकी कंपनियों और अनुसंधानकर्ताओं को आगाह करने की एक मुहिम शुरू की है। उसमें उन्हें बताया जा रहा है कि रूस और चीन की सरकारें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नए संबंध बना रही हैं, प्रतिभाओं की भर्ती कर रही हैं, और साथ ही जासूसी भी कर रही हैँ। उससे इन क्षेत्रों में अमेरिका के लिए खतरा पैदा हो रहा है। तो अमेरिका के सामने चुनौती है कि वह इन तकनीकों में खुद को आगे ले जाए। भारत के लिए गौरतलब बात है कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के बारे में इस दस्तावेज में कहा गया है कि चीन के पास अगले एक दशक में अमेरिका को पीछे छोड़ देने की ताकत और महत्त्वाकांक्षा है। उससे चीन की साइबर हमले करने और 'दुष्प्रचार अभियान चलानेÓ की क्षमता में भारी बढ़ोतरी हो जाएगी। अब चीन से फौरी खतरा किसे है, इसे कहने की जरूरत नहीं है। जिस समय भारत का इलाकाई विवाद उससे गहरा गया है, ये बात भारत के लिए गहरी चिंता का विषय होना चाहिए। लेकिन भारत में विमर्श ही कुछ और है। जाहिर है, इससे देश का दीर्घकालिक भविष्य खतरे में पड़ रहा है।
(नया इंडिया की अनुमति से)
बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक
हम आजादी के 75 वें साल का उत्सव मना रहे हैं और भारत में आज भी करोड़ों लोगों को भूखे पेट सोना पड़ता है। कुछ लोगों के भूख से मरने की खबर भी कुछ दिन पहले आई थी। कोरोना महामारी के दौरान हमारी सरकार ने करोड़ों लोगों को मुफ्त अनाज बांटकर भूखे मरने से तो जरुर बचाया लेकिन क्या देश के 140 करोड़ लोगों को ऐसा भोजन रोजाना मिल पाता है, जो स्वस्थ रहने के लिए जरुरी माना जाता है? क्या अच्छा भोजन हम उसे ही कहेंगे, जिसे करने के बाद हमें नींद आ जाए? या उसे ही कहेंगे, जिसे खाने के बाद पेट में और कोई जगह नहीं रहे? ये दोनों काम जो कर सके, वह भोजन जरुर है लेकिन क्या वह काफी है?
क्या वैसा पेट भरकर कोई आदमी स्वस्थ रह सकता है? क्या उसका शरीर लंबे समय तक श्रम करने के योग्य बन सकता है? क्या ऐसा व्यक्ति अपने शरीर में आवश्यक पुष्टता, क्षमता, वजन और चुस्ती रख पाता है? इन प्रश्नों का जवाब नहीं में ही मिलता है। आज भारत की यही स्थिति है।
विश्व भूख सूची में इस साल भारत का स्थान 101 वां है। भारत से बेहतर कौन हैं? हमारे पड़ौसी। पाकिस्तान, बांग्लादेश और नेपाल ! ये भारत से बहुत छोटे हैं। इनकी राष्ट्रीय आय भी भारत से बहुत कम है लेकिन आम लोगों के भोजन, स्वास्थ्य, शारीरिक रचना आदि के हिसाब से ये भारत से आगे हैं। कुल 116 देशों की सूची में भारत का स्थान 101 वां है। याने दुनिया के 100 देश हमसे आगे हैं।
इन सौ देशों में सभी देश मालदार या यूरोपीय देश नहीं हैं। अफ्रीका, एशिया और लातीनी अमेरिका के गरीब देश भी हैं। विश्व भूख सूची तैयार करने वाली संस्था चार पैमानों पर भूख की जांच करती है। एक, कुल जनसंख्या में कुपोषित लोग कितने हैं? दूसरा, पांच साल के बच्चों में कम वजन के कितने हैं? तीसरा, उनमें ठिगने कितने हैं? चौथा, पांच साल के होने के पहले कितने बच्चे मर जाते हैं? इन चारों पैमानों को लागू करने पर ही पाया गया कि भारत एकदम निचले पायदान पर खड़ा है।
भारत सरकार ने उस भूख सूची प्रकाशित करने वाली संस्था के आंकड़ों को गलत बताया है। हो सकता है कि उनकी जांच-परख में कुछ गड़बड़ी हो लेकिन जान-बूझकर भारत को भूखा दिखाने में उनकी क्या रूचि हो सकती है? भारत के पास खाद्यान्न तो उसकी जरुरत से ज्यादा है। वह 50 हजार टन काबुल भेज रहा है। पहले भी भेज चुका है। असली सवाल भूखे मरने या पेट भरने का नहीं है बल्कि यह है कि भारत के नागरिकों की खुराक यथायोग्य है या नहीं? याने उन्हें ऐसा भोजन मिलता है या नहीं कि जिससे वे सबल, सचेत और सक्रिय रह सकें?
(नया इंडिया की अनुमति से)
राकेश अचल
भोपाल में फिल्म निर्माता और अभिनेता प्रकाश झा के मुंह पर स्याही फेंकने और उनकी पूरी टीम पर प्राणघातक हमला किए जाने की वारदात ने भोपाल की साझा संस्कृति पर भी स्याही पोत दी है। इस वारदात के बाद सबसे बड़ा सवाल ये पैदा हो रहा है कि हिन्दू धर्म को कब और किसने बजरंग दल को ठेके पर दे दिया है? क्योंकि किसी को पता नहीं है कि हिन्दू धर्म के ठेके की विज्ञप्तियां कब जारी हुईं और कितने संगठनों ने इस प्रक्रिया में हिस्सा लिया ।
भोपाल की वारदात के बाद मध्यप्रदेश के गृहमंत्री डॉ. नरोत्तम मिश्र के बयान से इस बात की पुष्टि हो गई है कि प्रदेश में धर्म की रक्षा पुलिस और कानून नहीं बल्कि हुड़दंग दल करेगा। डॉ. मिश्रा ने कहा है कि अब प्रदेश में किसी भी फिल्म की शूटिंग की इजाजत तभी दी जाएगी जब उसकी कहानी पढ़ ली जाएगी। गृहमंत्री तो गृहमंत्री मप्र पुलिस के अदने से इंस्पेक्टर तक स्क्रिप्ट पढऩे की बात कर रहे हैं। आया कि देश में सेंसर बोर्ड की कोई अहमियत नहीं है। किसी प्रदेश के गृहमंत्री और वहां की पुलिस सेंसर बोर्ड के ऊपर हैं।
मध्यप्रदेश की सभी सरकारें अरसे से फिल्म उद्योग को आकर्षित करने के लिए पापड़ बेल रहीं हैं। भाजपा की मामा सरकार ने इस दिशा में उल्लेखनीय काम किया था। कांग्रेस की कमलनाथ सरकार भी इंदौर में आईफा का आयोजन कर इस दिशा में आगे बढऩा चाहती थी किन्तु शायद ऐसा कर पाना कमलनाथ सरकार के नसीब में नहीं था। फिल्म सिटी बनाने के सरकारी संकल्पों को लेकर ढोल-मजीरे पीटने वाली सरकार अब प्रदेश में शूटिंग की इजाजत देने के लिए तालिबानी रवैया अपनाने पर मजबूर है। सरकार को मजबूर कर रहे हैं। हुड़दंग दल जैसे अतिवादी संगठन, जिनकी उम्र जुम्मा-जुम्मा अभी 37 साल की है ।
हिन्दू संस्कृति की सेवा और सुरक्षा के लिए डॉ. परवीन तोगडिय़ा द्वारा रोपे गए इस पौधे में से अब कुछ और ही प्रस्फुटित हो रहा है। ये संगठन सेवा और सुरक्षा के बजाय धर्म का अघोषित ठेकेदार बन गया है। भाजपा की सरकारों ने भी चुपचाप हुड़दंग दल की इस भूमिका को स्वीकार कर लिया है। हिन्दू धर्म किसी एक संगठन या समूह की सम्पदा नहीं है, इसलिए इसकी सुरक्षा के नाम पर हुड़दंग मचाने वालों को समूचा हिन्दू समाज कैसे अंगीकार कर सकता है। हिन्दू धर्म के चारों शंकराचार्य आजकल शायद मख्खियां मार रहे हैं। उन्हें हिन्दू धर्म की जैसे कोई फिक्र नहीं रही है। लगता है कि तमाम शंकराचार्यों और आचार्यों ने भी बजरंगदल के सामने घुटने तक दिए हैं ।
हुड़दंग दल भाजपा और भाजपा की सरकार की मजबूरी हो सकती है लेकिन भाजपा सरकार को सोचना होगा कि देश और प्रदेश में जनादेश से चुनी गई सरकारें केवल हिन्दुओं की नहीं है। केंद्र और राज्य की सरकार सभी धर्मों के लोगों ने मिलकर बनाई है। कोई सरकार किसी एक दल को किसी एक धर्म को ठेके पर फिर कैसे उठा सकता है?हुड़दंग दल को प्रकाश झा की फिल्म पर कोई आपत्ति है तो वो थाने जाएं, पुलिस में रपट लिखाएं, वहां भी बात न बने तो अदालत जाएं, वहां भी सुनवाई न हो तो धरना-प्रदर्शन करें लेकिन हमले करने की छूट और अधिकार न उसे किसी ने दिया है और न उसके पास ऐसा कोई संवैधानिक अधिकार है। विरोध के नाम पर हमला केवल और केवल अपराध है। और इसके खिलाफ यदि हमले से आतंकित पक्ष थाने में रपट लिखाने न भी जाएं तो पुलिस को अपनी ओर से संज्ञान लेना चाहिए।'
मध्यप्रदेश की सरकार और पुलिस अपने संवैधानिक दायित्वों को या तो भूल गई है या जानबूझकर भूलने का अभिनय कर रही है। कला, संस्कृति, सिनेमा का ठेका सरकार के पास नहीं समाज के पास है। और समाज केवल हुड़दंग दल नहीं है। उसके अलावा भी बहुत कुछ है समाज में। देश कि आजादी के 75 साल में ये सब ठेकेदारी पहली बार देखने को मिल रही है। यही हुड़दंड दल 'वेलेंटाइन डे' पर अपनी आचार संहिता लागू करने के लिए गुंडागर्दी करता है और पुलिस हाथ बांधे खड़ी रहती है। प्रेम कौन, कैसे और कहाँ करे? ये अतिवादी संगठन तय करते हैं। इन्हें आखिर ये अधिकार किसने दिया है?एक खास रंग का दुपट्टा न हिन्दुओं के लिए हुड़दंग का लायसेंस हो सकता है और न मुसलमानों के लिए।
कुछ वर्ष पहले इसी तरह एक जातिवादी संगठन ने एक सिनेमा को लेकर पूरे देश में तलवारें तान लेने की मुहिम चलाई थी। आज उस संगठन का कहीं आता-पता नहीं है। उक्त संगठन के साथ सेना शब्द जुड़ा था। इस देश में एक सरकारी सेना के होते हुए इस तरह की बरसाती मेंढकों जैसे सेनाएं अतीत में भी बनती, बिगड़ती रहीं हैं। बिहार तो इस तरह की सेनाओं का गढ़ था। चंबल वाले सेना के बजाय गिरोह बनाते थे लेकिन किसी ने भी धर्म का ठेकेदार बनने की कोशिश कभी नहीं की थी।
सबका साथ, सबका विकास की दुहाई देने वाली केंद्र सरकार को इस मामले में दखल देना चाहिए, हालांकि हम जानते हैं कि ऐसा होगा नहीं। यदि निर्वाचित और संविधान की शपथ लेकर बनी सरकारें वारदातों का परोक्ष समर्थन करेंगी तो काबुल और भोपाल की सरकार में कोई ज्यादा भेद रह नहीं जाएगा। चुनी हुई सरकारें यदि इरादतन देश-प्रदेश को फांसीवाद की आग में झोंकना चाहती हैं तो फिर कुछ कहने की जरूरत नहीं है। सरकारें इस बात के लिए समर्थ है कि धर्म को किसी को भी ठेके पर उठा दें और धर्म की कथित रूप से रक्षा करने वालों के आपराधिक क्रियाकलापों को उचित मानकर उन्हें संरक्षण प्रदान करें।
बीते सात साल में मीडिया सत्ता का अनुचर बनाया जा चुका है, अब संस्कृति, साहित्य, सिनेमा और कलाएं ही बची हैं, इन्हें भी निशाने पर ले लिए गया है। अब ये आपके ऊपर है कि आप अपने धर्म को मुठ्ठीभर लोगों के हाथ में कैद देखना चाहते हैं या उसे खुली हवा में सांस लेते देखना चाहते हैं। खतरा आपकी संस्कृति को कम धर्म को ज्यादा है। कल को धर्म के ठेकेदार सड़क पर आपस में सिरों को गेंद बनाकर चौगान खेलते नजर आने लगें तो हैरान मत होइए। ऐसा तालिबानी रवैया तो आपातकाल में भी नहीं अपनाया गया। उन दिनों भी 'किस्सा कुर्सी काÓ बनी थी। उसे प्रतिबंधित किया गया लेकिन फिल्म बनाने वालों के न तो चेहरों पर स्याही मली गई थी और न उन्हें सड़क पर पीटा गया था। लेकिन अब तो इंतिहा हो चली है अभी तो केवल आगाज हुआ है, अंजाम आने में अभी समय है।
अरविंद दास
वर्षों पहले गुलजार ने कहा था कि 'सिनेमा वाले मुझे साहित्य का आदमी समझते हैं और साहित्य वाले सिनेमा का'। साहिर लुधियानवी (1921-1980) के साथ ऐसा नहीं है। वे सिनेमा और साहित्य दोनों दुनिया में एक साथ समादृत रहे हैं। वे जितने अच्छे शायर थे उतने ही चर्चित गीतकार। पिछले दिनों अर्जुमंद आरा और रविकांत के संपादन में जनवादी लेखक संघ की पत्रिका 'नया पथ ने साहिर लुधियानवी जन्मशती विशेषांक प्रकाशित किया है जो यह इस बात की ताकीद करता है।
खुद साहिर इस बात से वाकिफ थे कि साहित्य क्षेत्र में फिल्मी साहित्य को लेकर अच्छी राय नहीं है। इसलिए उन्होंने फिल्मी गीतों के संकलन 'गाता जाये बंजारा' की भूमिका में लिखा है- 'मेरा सदैव प्रयास रहा है कि यथासंभव फिल्मी गीतों को सृजनात्मक काव्य के निकट ला सकूॅं और इस प्रकार नये सामाजिक और राजनीतिक दृष्टिकोण को जन-साधारण तक पहुँचा सकूं।' साहिर माक्र्सवादी विचारधारा से प्रभावित थे और प्रगतिशील आंदोलन से जुड़े थे। उनके कृतित्व और व्यक्तित्व पर नजर डालने पर यह स्पष्ट हो जाता है कि वे मजलूमों, मखलूकों के साथ थे अपने काव्य और जीवन में।
खुद वे अपने ऊपर फैज, मजाज, इकबाल आदि की शायरी के असर की बात स्वीकार करते थे। इस विशेषांक में अतहर फारुकी ने नोट किया है कि 'उर्दू शायरी के अवामी प्रसार में, यानी अवाम के साहित्यिक आस्वादन को बेहतरीन शायरी से परिचित कराने में साहिर लुधियानवी फैज से भी आगे निकल जाते हैं।' हो सकता है कि इसमें अतिशयोक्ति लगे पर यह स्वीकार करने में किसी को कोई गुरेज नहीं होना चाहिए कि उनकी रोमांटिक शायरी फिल्मी गीतों का अंग बन कर, रेडियो, कैसेट और अब यू-टयूब जैसे माध्यमों से होकर देश और दुनिया के बड़े हिस्से तक पहुँची।
आजाद हिंदुस्तान के दस साल बाद प्यासा (1957) फिल्म के लिए लिखा उनका गाना समाज में व्याप्त विघटन और मूल्यहीनता को दर्शाता है, जो आज भी मौजूं है।
ये महलों, ये तख्तों, ये ताजों की दुनिया
ये इंसान के दुश्मन समाजों की दुनिया
ये दौलत के भूखे रिवाजों की दुनिया
ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है
इसी फिल्म वे पूछते हैं, 'जिन्हें नाज है हिंद पर वो कहां हैं'। साहिर ने 1948 में पहला फिल्मी गीत (बदल रही है जिंदगी, फिल्म-आजादी की राह पर) लिखा और सौ से ज्यादा फिल्मों में करीब 800 गाने लिखे। उनके इस सफर पर एक नजर डालने पर स्पष्ट है कि सामाजिक-राजनीतिक परिस्थितियाँ उनके गानों में बखूबी व्यक्त हुई।
हिंदी सिनेमा में गीत-संगीत की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। गानों के माध्यम से कहानियाँ आगे बढ़ती है जिसमें किरदारों के मनोभाव व्यक्त होते हैं पर साहिर, शैलेन्द्र जैसे शायर रूपकों, बिंबों के माध्यम से आजाद भारत के आस-पड़ोस की घटनाओं, देश-विदेश की हलचलों को भी बयान करते हैं। सच तो यह है कि फिल्मी गानों को आधार बना कर आधुनिक भारत की राजनीति और इतिहास का अध्ययन किया जा सकता है।
पिछले सदी के साठ का दशक देश के लिए काफी उथल-पुथल भरा रहा था। इसी दशक में चीन और पाकिस्तान के साथ भारत ने युद्ध लड़ा था। देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की मौत हुई थी। हरित क्रांति के बीज इसी दशक में बोये गए थे। निराशा और उम्मीद के बीच साहिर ने आदमी और इंसान (1969) फिल्म में लिखा:
फूटेगा मोती बनके अपना पसीना
दुनिया की कौमें हमसे सीखेंगी जीना
चमकेगा देश हमारा मेरे साथी रे
आंखों में कल का नजारा मेरे साथी रे
कल का हिंदुस्तान जमाना देखेगा
जागेगा इंसान जमाना देखेगा
समाजवादी व्यवस्था का स्वप्न और सामाजिक न्याय साहिर के मूल सरोकार रहे हैं जिसे संपादक अर्जुमंद आरा ने 'साहिर के सरोकार' लेख में रेखांकित किया है। अब्दुल हई साहिर लुधियानवी की प्रसिद्धि फिल्मी गानों से पहले उनके काव्य संग्रह तल्खियाँ (1944) से फैल चुकी थी। साहिर की मौत से पहले रिलीज हुई फिल्म कभी-कभी (1976) फिल्म के गानों ने उनकी शोहरत में और भी तारे टांके। पैंतालीस साल के बाद भी उनका लिखा युवाओं के लब पर है -
कभी कभी मेरे दिल में ख्याल आता है
कि जैसे तू मुझे चाहेगी उम्र भर यूँ ही
उठेगी मेरी तरफ प्यार की नजर यूँ ही
मैं जानता हूँ कि तू गैर है मगर यूँ ही...
यहाँ पर यह नोट करना जरूरी है कि असल में यह गाना उनके पहले काव्य संग्रह 'तल्खियाँ' में संकलित है जिसका सरल रूप गाने में इस्तेमाल किया गया। इस गीत के लिए उन्हें दूसरा फिल्म फेयर पुरस्कार मिला (पहला फिल्म फेयर पुरस्कार 'ताजमहल' फिल्म के गाने 'जो वादा किया' के लिए)। इस गाने में नॉस्टेलजिया है और बीते जमाने की तस्वीर है। इसे देश में लगे आपातकाल (1975) की पृष्ठभूमि में भी सुना समझा जा सकता है।
पत्रिका के संपादकों ने बिलकुल ठीक नोट किया है कि : साहिर साहब सिर्फ किताबी अदब के नहीं थे, सिनेमा, ग्रामोफोन, कैसेट और रेडियो के भी उतने ही थे, जितने मुशायरों और महफिलों के, जितने हिंदी के उतने ही उर्दू के, जितने हिंदुस्तान के उतने ही पाकिस्तान के, और जितने कल के उतने ही आज के।] (न्यूज 18)
बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक
आजकल अखबारों और टीवी चैनलों पर लगातार आर्यन खान का मामला जमकर प्रचारित हो रहा है। आर्यन और उसके कई साथियों को नशीले पदार्थों को सेवन करने के अपराध में पकड़ा गया है। ऐसे कई दोषी हमेशा पकड़े जाते हैं लेकिन उनका इतने धूम-धड़ाके से प्रचार प्राय: नहीं होता लेकिन आर्यन का हो रहा है, क्योंकि वह प्रसिद्ध फिल्म अभिनेता शाहरुख खान का बेटा है। सरकार को इस बात का श्रेय तो देना पड़ेगा कि उसने शाहरूख के बेटे के लिए कोई लिहाजदारी नहीं दिखाई लेकिन मैं पहले दिन से सोच में पड़ा हुआ था कि जो लोग नशेड़ी होते हैं, उन्हें तभी पकड़ा जाना चाहिए, जब वे कोई अपराध करें।
अगर वे सिर्फ नशा करते हैं तो किसी दूसरे का क्या नुकसान करते हैं ? वे तो अपना ही नुकसान करते हैं, जैसे कि आत्महत्या करने वाले करते हैं। नशे और आत्महत्या, दोनों ही अनुचित हैं और अकरणीय हैं लेकिन इन्हें अपराध किस तर्क के आधार पर कहा जा सकता हैं? उन्हें आप सजा देकर कैसे रोक सकते हैं? सख्त सजाओं के बावजूद नशे और आत्महत्याओं के आंकड़े बढ़ते जा रहे हैं। इन्हें रोका जा सकता है— शिक्षा और संस्कार से! यदि बच्चों में यह संस्कार डाल दिया जाए कि यदि तुम नशा करोगे तो आदमी से जानवर बन जाओगे याने जब तक तुम नशे में रहोगे, तुम्हारी स्वतंत्र चेतना लुप्त हो जाएगी तो वे अपने आप सभी नशों से दूर रहेंगे।
हमारी सरकार का यह रवैया अजीब-सा है कि शराब की दुकानें तो वह खुले-आम चलने दे रही है लेकिन लगभग 300 नशीली दवाओं के सेवन पर उसने कानूनी प्रतिबंध लगा रखा है। ये नशीली दवाएं शराब की तरह स्वास्थ्यनाशक तो हैं ही, ये मानव-चेतना को भी स्थगित कर देती हैं। इनके उत्पादन, भंडारण, व्यापार और आयात पर प्रतिबंध आवश्यक है लेकिन इनके सेवन करनेवालों को अपराधी नहीं, पीडि़त माना जाना चाहिए। उन्हें जेल में सड़ाने की बजाय सुधार-गृहों में भेजा जाना चाहिए। जेल में भी मादक-द्रव्यों का सेवन जमकर चलता है याने कानून पूरी तरह से नाकारा हो सकता है जबकि नशा-विरोधी संस्कार हमेशा मनुष्य को सुद्दढ़ बनाए रखता है।
मुझे खुशी है कि केंद्रीय सामाजिक न्याय मंत्रालय ने अपनी राय जाहिर करते हुए कहा है कि नशाखोरी के ऐसे मामलों को 'अपराधÓ की श्रेणी से निकालकर 'सुधारÓ की श्रेणी में डालिए। इस संबंध में संसद के अगले सत्र में ही नया कानून लाया जाना चाहिए और अंग्रेज के जमाने के पोगापंथी कानून को बदला जाना चाहिए। पुराने कानून से नशाबंदी तो नहीं हो पा रही है बल्कि रिश्वतखोरी और अवैध व्यापार में बढ़ोतरी हो रही है।
आर्यन को छुड़ाने के लिए 25 करोड़ रु. रिश्वत की एक खबर अभी सामने आई है और पिछले दिनों गुजरात के मूंद्रा बंदरगाह से 3 हजार किलो नीशीली चीजें पकड़ी गई हैं। यदि इस कानून में संशोधन होता है और समस्त नशीले पदार्थों के उत्पादन, भंडारण और व्यापार पर प्रतिबंध लगता है तो भारत को दुनिया का शायद अप्रतिम देश होने का सम्मान मिल सकता है। नशाखोरी के मामले आए दिन सुनाई पड़ते हैं लेकिन आर्यन के बहाने इस मामले ने इतना तूल पकड़ लिया है कि उसका जड़ से समाधान सामने दिखाई पडऩे लगा है।
(नया इंडिया की अनुमति से)
बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक
गृहमंत्री अमित शाह कश्मीर के दौर पर गए, यह अपने आप में बड़ी बात है। आजकल कश्मीर से जैसी खबरें आ रही हैं, वैसे माहौल में किसी केंद्रीय नेता का वहां तीन दिन का दौरा लगना काफी साहसपूर्ण कदम है। जो जितना बड़ा नेता होता है, उसे अपनी जान का खतरा भी उतना ही बड़ा होता है। अमित शाह ने ही गृहमंत्री के तौर पर दो साल पहले धारा 370 को खत्म किया था और कश्मीर को सीधे दिल्ली के नियंत्रण में ले आए थे। उप-राज्यपाल मनोज सिन्हा ने बदले हुए कश्मीर के नक्शे में कई नए रंग भरे और शासन को जनता से सीधे जोडऩे के लिए रचनात्मक कदम उठाए लेकिन पिछले दो-तीन सप्ताहों में आतंक की ऐसी घटनाएं घट गईं, जिन्होंने कश्मीर को फिर से चर्चा का विषय बना दिया।
आतंकवादियों ने ऐसे निर्दोष लोगों पर हमले किए, जिनका राजनीति या फौज से कुछ लेना-देना नहीं है। इन लोगों में ठेठ कश्मीरी भी हैं और ज्यादातर वे लोग हैं, जो देश के दूसरे हिस्सों से आकर कश्मीर में रोजगार करते हैं। ये घटनाएं बड़े पैमाने पर नहीं हुई हैं लेकिन इनका असर बहुत गंभीर हो रहा है। न केवल हिंदू पंडित, जो कश्मीर लौटने के इच्छुक थे, निराश हो रहे हैं बल्कि सैकड़ों गैर-कश्मीरी नागरिक भागकर बाहर आ रहे हैं। ऐसे डर के माहौल में अमित शाह श्रीनगर पहुंचे और उन्होंने जो सबसे पहला काम किया, वह यह कि वे परवेज अहमद दर के परिवार से मिले। वे सीधे हवाई अड्डे से उनके घर गए। परवेज अहमद सीआईडी के इंस्पेक्टर थे। वे ज्यों ही नमाज़ पढ़कर मस्जिद से निकले आतंकियों ने उनकी हत्या कर दी थी। शाह ने उनकी पत्नी फातिमा को सरकारी नौकरी का नियुक्ति-पत्र दिया।
परवेज अहमद के परिवारवालों से अमित शाह की मुलाकात के जो फोटो अखबारों में छपे हैं, वे बहुत ही मर्मस्पर्शी हैं। शाह ने राजभवन में पांच घंटे की बैठक करके कश्मीर की सुरक्षा पर विचार-विमर्श किया। उन्होंने आतंकवाद को काबू करने के लिए कई नए कड़े कदम उठाने के निर्देश दिए। यह ठीक है कि उन्होंने कश्मीर को राज्य का दर्जा लौटाने का कोई संकेत नहीं दिया लेकिन त्रिस्तरीय पंचायत के चुनावों को बड़ी उपलब्धि बताया। क्या ही अच्छा होता कि वे कश्मीर को राज्य का दर्जा लौटाने की बात कहते और यह शर्त भी लगा देते कि वे ऐसा तभी करेंगे, जबकि वहां आतंकवाद की एक भी घटना न हो। कश्मीर की तीनों प्रमुख पार्टियों पर हमला बोलने की बजाय यदि वे उनके नेताओं से सीधी बात करते तो अभी जो कर्फ्यू लगा है, वह भी शायद जल्दी ही हटाने की स्थिति बन जाती। अभी जबकि पाकिस्तान में अफगानिस्तान को लेकर खलबली मची हुई है, यदि भारत के नेताओं में दूरंदेशी हो और वे नौकरशाहों के शिकंजों से मुक्त हो सकें तो वे काबुल और कश्मीर, दोनों मुद्दों पर नई पहल कर सकते हैं। वे अटलजी के सपने— कश्मीरियत, इंसानियत और जम्हूरियत— को जमीन पर उतार सकते हैं।
(नया इंडिया की अनुमति से)
-ध्रुव गुप्त
यह त्यौहारों का मौसम है। इन त्योहारों के धार्मिक, सामाजिक महत्व के अलावा उनका एक आर्थिक पक्ष भी है। हमारे पूर्वजों ने किसी धार्मिक या लोकपर्व की परिकल्पना करते समय हमारे कारीगरों, शिल्पियों और कृषकों की रोजी-रोटी और सम्मान का पूरा-पूरा ख्याल रखा था। उनके उत्पादों के बिना कोई भी पूजा सफल नहीं मानी जाती थी।
अपने बनाए दीयों, मूर्तियों, सजावट के सामानों और कलाकृतियों के साथ बरस भर इन त्यौहारों की बाट जोहने वाले हमारे लाखों लाख शिल्पकार आज हाशिए पर खड़े हैं। उनकी रोजी-रोटी पिछले कई सालों से साम्राज्यववादी चीन और बड़े औधोगिक घरानों की आक्रामक बाजारवादी नीतियों ने लगभग छीन रखी है। अपने शहर के बाजार की सैर पर निकलें तो ऐसा लगेगा कि हम अपने देश में नहीं, चीन के किसी आर्थिक उपनिवेश की सैर पर हैं। अपनी जरा सी संवेददानशीलता से हम कुटीर उद्योगों की बिगड़ती सूरत के कारण लगभग बर्बादी के कगार पर खड़े अपने शिल्पकारों के उदास घरों में रोशनी और बेनूर चेहरों पर मुस्कान लौटा सकते हैं। आईए त्योहारों के इस मौसम में घरों में मिट्टी के दीये जलाएं! पूजा-कक्ष में अपने कारीगरों द्वारा निर्मित मूर्तियों को जगह दें।
बच्चों के लिए मिट्टी और लकड़ी के कुछ खिलौने खरीद दें ! घर की सजावट की ख़ातिर अपने कलाकारों द्वारा निर्मित हस्तकलाओं, पेंटिंग्स और कलाकृतियों का प्रयोग करें। विदेशी उत्पादों की तुलना में वे शायद थोड़े महंगे पड़ेंगे, लेकिन अपने ही देश के लाखों परिवारों की खुशियों के आगे यह थोड़ी-सी ज्यादा कीमत कुछ भी नहीं।
बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक
राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने कल पटना में कहा कि लोग यदि विपस्सना करें तो उनकी कार्यक्षमता और प्रेम में वृद्धि होगी। राजनेताओं के मुख से ऐसे मुद्दों पर शायद ही कभी कुछ बोल निकलते हैं। उनकी जिंदगी वोट और नोट का झांझ कूटते-कूटते ही निकल जाती है। रामनाथ कोविंद मेरे पुराने मित्र हैं। उनकी सादगी, विनम्रता और सज्जनता मुझे हमेशा प्रभावित करती रही थी। उसका रहस्य अब उन्होंने सबके सामने उजागर कर दिया है। वह है— विपस्सना, जिसका मूल संस्कृत नाम है- विपश्यना याने विशेष तरीके से देखना।
किसको देखना? खुद को देखना ! दूसरों को तो हम देखते ही रहते हैं लेकिन खुद को कभी नहीं देखते। हाँ, कांच के आईने में अपनी सूरत जरुर रोज़ देख लेते हैं। सूरत तो हम देखते हैं लेकिन सूरत से कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण है— सीरत याने स्वभाव! अपने स्वभाव को देखने की कला है- विपश्यना ! यह कला गौतम बुद्ध ने दुनिया को सिखाई है। बुद्ध के पहले भी ध्यान की कई विधियां भारत में प्रचलित थीं। उनमें से कई विधियों का अभ्यास बचपन में मैं किया करता था लेकिन आचार्य सत्यनाराणजी गोयनका ने यह चमत्कारी विधि मुझे सिखाई लगभग 21 साल पहले।
गोयनकाजी मुझे अपने साथ नेपाल ले गए और बोले, 'आपको अब दस दिन मेरी कैद में रहना पड़ेगाÓ। उनके कांठमांडो आश्रम में दर्जनों देशों के सैकड़ों लोग विपस्सना सीखने आए हुए थे। मैंने उन दस दिनों में मौन रख, एक समय भोजन किया और लगभग दस-दस घंटे रोज विपस्सना की। जब मैं दिल्ली लौटा तो मेरी पत्नी डा. वेदवती ने कहा कि आप बिल्कुल बदले हुए इंसान लग रहे हैं। यही बात उस आश्रम में मुझे लेने आए मेरे मित्र और नेपाल के विदेश मंत्री चक्र बास्तोला ने कही। तीसरे दिन जब प्रधानमंत्री गिरिजाप्रसाद कोइराला से भेंट हुई तो उन्होंने बताया कि खुद नेपाल नरेश वीरेंद्र विक्रम शाह उस आश्रम में गए थे और वे स्वयं भी वहां रहना चाहते थे तो उन्होंने वही कमरा खुलवाकर देखा, जिसमें मैं दस दिन रहा था।
राजा और रंक, कोई भी हो, विपश्यना मनुष्य को उच्चतर मनुष्य बना देती है। ऐसा क्या है, उसमें ? वह सबसे सरल साधना है। आपको कुछ नहीं करना है। बस, आँख बंद करके अपने नथुनों को देखते रहिए। अपनी आने और जानेवाली सांस को महसूस करते रहिए। आपके चेतन और अचेतन और अवचेतन मन की सारी गांठें अपने आप खुलती चली जाएंगी। आप भारहीन हो जाएंगे। आपका मन आजाद हो जाएगा। आपको लगेगा कि आप सदेह मोक्ष को प्राप्त हो गए हैं।
आचार्य गोयनका मुझे विस्तार से बताते रहते थे कि उन्हें बर्मा में रहते हुए विपस्सना की उपलब्धि अचानक कैसे हुई है। अब उनकी कृपा से ध्यान की यह पद्धति लगभग 100 देशों में फैल गई है। लाखों लोग इसका लाभ ले रहे हैं। उन्होंने मुंबई में एक अत्यंत भव्य पेगोडा 2009 में बनवाया था, जिसके उद्घाटन समारोह में मुझे भी निमंत्रित किया था। उनके परिनिर्वाण के कुछ दिन पहले मुंबई में उनके दर्शन का दुर्लभ सौभाग्य भी मुझे मिला था। मैं तो अपने मित्र भाई रामनाथजी से कहूंगा कि राष्ट्रपति पद की जिम्मेदारियों से मुक्त होने के बाद यदि वे अपना शेष जीवन विपश्यना के प्रसार में ही खपा दें तो उनका योगदान मानवता की सेवा के लिए अतुलनीय बन जाएगा।
(नया इंडिया की अनुमति से)
-अपूर्व गर्ग
अब फिज़ा बदल गई। कभी अक्टूबर के आगमन के साथ ठंडी सुबह पर गर्म दोपहर और शामें सुहानी होती थीं। दशहरे में रावणभाटा में पतंगों की रंग-बिरंगी बिदाई के साथ गिल्लियां मैदानों में तैनात हो जातीं। मच्छरदानी के डण्डों, पटियों से शुरूआत हो जाती और उस दौर में बढ़ईपारा की गिल्लियाँ बड़ी ‘लक्सेरियस’ वस्तु मानी जाती थी ।
बढ़ईपारा की गिल्लियों की कद्र वही कर सकता था, जो ‘रेटकुल गिल्ली’ से खेला हो, जिसने ‘खप्पट आरी’ भौरें से दूसरों के भौरों की धज्जियाँ उड़ाई हो, जो ‘लग्घड़ पतंगों’ का शौकीन हो और पुछनड़ी से शुरू कर अद्धी, चांदतारा, मोढ़ा, तिरंगा, नागिन पतंगे उड़ा चुका हो। ऐसे लोगों की जेबें कंचों से खनखनाती थीं और ये अपने-अपने ‘अड्डो’ में ‘होड़ा’ ही नहीं ‘गीर’ भी खेलते!
24 गुणा 7 टीवी, इंटरनेट फेसबुक, व्हाट्सएप, इंस्टा का जब इतिहास लिखा जायेगा तो ये दर्ज होगा कि ये सभ्यता, संस्कृति, मेल-मिलाप के ही नहीं देशी खेलों के भी कातिल हैं।
बड़े-बड़े दानवी विकास ने छोटी-छोटी उन चीजों को छीन लिया या अप्रासंगिक कर दिया जिसमें वो पुराना रायपुर खुशियाँ ढूंढता, जिसमें उसकी मोहब्बत बसी होती। इंसानी सभ्यता ने कब और कैसे इतनी भयानक करवट ली कि इसके तले सर्कस, मीना बाजार क्या नागपंचमी की कुश्ती, पोला के बैल, दशहरे की पतंगें, दिवाली का राउत नाचा सब कुछ दब गया।
कभी रंग-बिरंगी पतंगों से ढंके आकाश को निहारते पलकें नहीं झुकती थीं, आज वही नजरें आभासी दुनिया में टिकी रहती हैं।
कभी ठेलों और गुमटियों के स्वादिष्ट खाने पर लोग जान छिडक़ते थे, आज उपेक्षित से पड़े उन्हीं ठेले और गुमटी वालों की जान पर बन आई है।
जो रिक्शे वाला कभी हमारे परिवार का सदस्य था आज वो अपने रिक्शे से ही नहीं अपने परिवार से दूर कहाँ मजदूरी कर रहा कोई नहीं जानता। सब कुछ मशीनी धुंए में खो चुका।
आज सडक़ों पर 2-4 गाय भैंस दिख जाये तो ट्रैफिक अव्यवस्था वाला फोटो छप जाता है। कभी इन्हीं सडक़ों पर साइकिल-रिक्शे इन मवेशियों के बीच आराम से गुजरते। स्कूल के बाहर ये ऐसे इंतजार करते मानों छुट्टी के इंतज़ार में हों। एक पुराने स्कूल को छेरी कुरिया भी कहा गया पर उसकी प्रतिष्ठा पर आंच न आई। क्योंकि न तो ये शहर बनावटी था न ही तब लोग इतने बनावटी, नाटकीय और मतलबी थे।
रायपुर की अपनी एक अलग विशिष्ट संस्कृति थी। उस रायपुर में घर के दरवाजे छोटे पर दिल बड़े थे।
घर के आंगनों में वो प्यार बरसता, दिल से खातिरदारी होती जो आज चमचमाते ड्राइंग रूम में महसूस भी न हो। गली-मोहल्लों में सब अपने थे, अपनापन था, पर अब सब कुछ बेगाना है, बंट गया-बंटता जा रहा, भाईचारा टूट गया-टूटता जा रहा। चबूतरे सूने हैं। शतरंज, पत्ते, चौपड़ बिछते नहीं। आँगन की अड्डेबाजी खत्म सी हो गई। मोहल्ला रिपोर्टर अब मिलते नहीं। मुझे ये सब कुछ आभासी दुनिया पर याद करना पड़ रहा।
आप भी इसे आभासी दुनिया में पढ़ रहे। पर इस आभासी दुनिया में रहते हुए हमें वही पुराना शहर, पुराने लोग, पुराने खेल, पुराने दिन की यादें हवा के ताजे झोके की तरह तन मन को तृप्त कर जाती हैं।
जैसे-जैसे अक्टूबर महीना गुजरता जा रहा, दशहरे से हम दिवाली की ओर बढ़ रहे वो दिन याद आ रहे जब दुर्गा पूजा से दिवाली तक बच्चों की दिवाली मनती थी।
तब और आज के बीच पतंगें, कंचे, भौरें, गिल्लियों की यादें बिखरी हुई हैं।
सोचा सबको एक-एक कर याद करूँ पर न जाने सब कुछ एक साथ याद आ गया।
‘वो दिन भी हाय क्या दिन थे जब अपना भी तअल्लुक था। दशहरे से दिवाली से बसंतों से बहारों से।’
-रमेश अनुपम
यह दुर्लभ संयोग हैं कि ‘बस्तर भूषण’ जैसी अमर कृति की रचना करने वाले केदार नाथ ठाकुर ने सपने में भी यह नहीं सोचा होगा कि ‘बस्तर भूषण’ की रचना के पश्चात् लोग उन्हें ही बस्तर भूषण जैसी पदवी से अलंकृत करेंगे।
सन् 1908 में जब वे बस्तर के वन-प्रांतर में बैठकर ‘बस्तर भूषण’ की रचना में निमग्न थे, तब शायद स्वयं भी नहीं जानते थे कि वे एक ऐसे महान और कालजयी ग्रंथ का सृजन कर रहे हैं, जिसके बिना बस्तर को समझ पाना किसी भी काल में बेहद कठिन होगा।
‘बस्तर भूषण’ अपने आप में वह तिलिस्मी कुंजी है जिसके बिना बस्तर के किसी भी ताले को खोल पाना मुश्किल है।
बस्तर में जंगल विभाग के इस साधारण से मुलाजिम ने ‘बस्तर भूषण’ के माध्यम से ऐसा असाधारण कार्य कर दिया है, जिसके लिए बस्तर या छत्तीसगढ़ ही नहीं संपूर्ण हिंदी साहित्य, भूगोल, इतिहास, समाज शास्त्र, राजनीति विज्ञान सभी उनके सदैव ऋणी रहेंगे।
‘बस्तर भूषण’ सन् 1908 में (आज से एक सौ तेरह वर्ष पूर्व) काशी के भारत जीवन प्रेस से प्रकाशित हुआ था। इस ग्रंथ के प्रकाशित होते ही हिंदी के अनेक विद्वानों का ध्यान इस ग्रंथ तथा इसके ग्रंथकार की ओर जाना स्वाभाविक था।
सन 1908 में नागरी प्रचारिणी सभा की सुप्रसिद्ध पत्रिका ‘सरस्वती’ में इस ग्रंथ की समीक्षा प्रकाशित हुई और इस ग्रंथ की भूरि-भूरि प्रशंसा की गई।
बस्तर के राजगुरु पंडित रंगनाथ ठाकुर के परिवार में उनका जन्म हुआ था। पिता गंभीर नाथ ठाकुर और मां श्रीमती कुलेश्वरी देवी ठाकुर के घर रायपुर में सन 1870 में उन्होंने जन्म ग्रहण किया था।
‘बस्तर भूषण’ के लेखक केदारनाथ ठाकुर बस्तर के सदर्न सर्किल में फॉरेस्ट रेंजर के पद पर कार्यरत थे। जंगल विभाग में नौकरी के पश्चात् बस्तर में उनकी पदस्थापना हुई। जंगल विभाग में नौकरी के दरम्यान उन्होंने बस्तर को काफी निकट से देखा और समझा।
बस्तर के भूगोल, इतिहास, समाज विज्ञान को वैज्ञानिक नजरिए के साथ देखने और विश्लेषण करने का प्रयास किया। उनके पास साहित्य की गहरी और गंभीर समझ होने के कारण उन्होंने अपने अनुभवों को शब्दबद्ध करने का प्रयास किया, जिसका सुपरिणाम है ‘बस्तर भूषण।’
केदार नाथ ठाकुर ने ‘बस्तर भूषण’ के अतिरिक्त ‘बसंत विनोद’, ‘बस्तर विनोद’ तथा ‘विपिन विज्ञान’ जैसे दुर्लभ ग्रंथों की रचना की है जो अब अप्राप्य हैं।
केदारनाथ ठाकुर को सर्वाधिक ख्याति ‘बस्तर भूषण’ से प्राप्त हुई है। देश के अनेक विद्वानों सहित अनेक विदेशी विद्वानों ने उनके इस ग्रंथ की प्रशंसा की है।
‘द माडिय़ा गोंड्स ऑफ बस्तर’ के लेखक ग्रिगस ने ‘बस्तर भूषण’ पढक़र केदारनाथ ठाकुर की मेधा की प्रशंसा की थी तथा इस ग्रंथ को अपनी तरह का एक अलग और विशिष्ट ग्रंथ होने की संज्ञा दी थी।

केदार नाथ ठाकुर ने स्वयं अपने विषय में एक स्थान पर लिखा है-
‘मैंने अपने जीवन का अधिकांश समय अध्ययन में ही बिता दिया और अब भी बिना पढ़े एक दिन गुजारना मेरे लिए पहाड़ हो जाता है। मैंने सन 1908 में ‘बस्तर भूषण’ नामक एक पुस्तक लिखी। मैं सोचता हूं यह पुस्तक उस समय भारत में अपने ढंग की प्रथम उपलब्धि थी। मुझे एहसास होता है कि उन दिनों मेरी पुस्तक ‘बस्तर भूषण’ से प्रेरणा प्राप्त कर ‘दमोह दीपक’ जैसी कृतियां अवतरित हुईं। मुझे बस्तर वासियों से यह शिकायत रही है कि मेरी पुस्तक ‘बस्तर भूषण’ के प्रति कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई, जबकि विदेशियों ने बड़े चाव से मेरी पुस्तक पढ़ी और उसे काफी सराहा।’
आज छत्तीसगढ़ एक स्वतंत्र राज्य है और बस्तर इस राज्य का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण आदिवासी अंचल है। केदारनाथ ठाकुर और बस्तर दोनों ही आज उपेक्षित हैं। ‘बस्तर भूषण’ ही क्यों हमें आज अपने किसी भी साहित्यकार या साहित्यिक कृति पर न कोई गर्व है और न ही उसे संरक्षित या संवर्धित करने की कोई भाव या चेष्टा है।
‘बस्तर भूषण’ के इस रचयिता के नाम पर आज बस्तर में ही ऐसा कुछ नहीं है जो भावी पीढ़ी को उनके अमूल्य अवदान से परिचित करवा सके।
(बाकी अगले हफ्ते)
बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक
प्रसिद्ध फिल्म अभिनेता आमिर खान दिवाली पर पटाखेबाजी के विरुद्ध किसी टायर कंपनी की पहल पर टीवी चैनलों पर विज्ञापन दे रहे हैं। उसमें वे देश के करोड़ों लोगों से अनुरोध कर रहे हैं कि दिवाली के मौके पर वे सड़कों पर पटाखेबाजी न करें। अंधाधुंध पटाखेबाजी से सड़कों पर यातायात में तो बाधा पड़ती ही है, प्रदूषण भी फैलता है और विस्फोटों से लोग भी मरते हैं। इसके अलावा पटाखों के नाम पर हम चीनी पटाखा-निर्माताओं की जेबें मोटी करते हैं।
आजकल जब फिल्म-अभिनेता लोग चड्डी-बनियान और जूते-चप्पल का विज्ञापन करते हैं तो उन्हें देखकर मुझे शर्म आती है। सिर्फ पैसा कमाने के लिए वे अपनी लोकप्रियता का सौदा करने लगते हैं। मैं तो सिनेमा नहीं के बराबर देखता हूं लेकिन फिर भी आमिर खान को थोड़ा अलग किस्म का अभिनेता मानता हूं। मैं चाहता हूं कि आमिर खान की तरह हमारे सभी अभिनेता और अभिनेत्रियाँ ऐसे विज्ञापनों में भाग लें, जो आम लोगों को समाज-सुधार के लिए प्रेरित करें। इससे अपराध घटेंगे और सरकार का भार भी हल्का होगा। लेकिन आमिर खान ने जो मांग की है, उसे सांप्रदायिक रंग देना उचित नहीं है।
कर्नाटक के भाजपा सांसद अनंत हेगड़े की यह मांग भी बिल्कुल उचित है कि मस्जिदों में लाउडस्पीकरों से होनेवाली शोर-शराबेवाली अजान के विरुद्ध भी आवाज उठनी चाहिए। मैं कहता हूं कि जैसे सीएट टायर के हिंदू मालिक ने दीपावली के पटाखों के विरुद्ध पहल की, कोई मुस्लिम सेठ आगे आए और वह चिल्लपों अजान के विरुद्ध पहल करे। स्वयं आमिर खान इसका बीड़ा उठायें। सर्वोच्च न्यायालय ने पहले से ही अजान के शोर की सीमा बांध रखी है और रात 10 बजे से सुबह 6 बजे तक लाउडस्पीकरों पर प्रतिबंध लगा रखा है।
इंडोनेशिया दुनिया का सबसे बड़ा मुस्लिम देश है। वहां पिछले हफ्ते ही कई तरह के प्रतिबंधों की घोषणा हुई है। मैं खुद लगभग 15-20 मुस्लिम देशों में रहा हूं। एकाध जगह को छोड़कर नमाज या अजान के नाम पर मैंने शोर-शराबा कभी नहीं सुना। 52 साल पहले अफगानिस्तान के हेरात शहर में मैंने मिस्री कुरान की मधुर आयतें सुनीं तो मैं दंग रह गया। किसी भी धर्मग्रंथ में नहीं लिखा है कि उसके मंत्र या वर्स या आयतें या वाणी आप कानफोड़ू ढंग से पढ़ें।
अपना भजन कानफोड़ू ढंग से सुनने पर सामनेवाले के दिल में क्या प्रतिक्रिया होती है, इसका हम ध्यान करते हैं या नहीं ? ईश्वर या अल्लाह अगर सर्वशक्तिमान और सर्वव्यापक है तो उसे आपके घंटे और घडिय़ाल की जरुरत क्यों होनी चाहिए? इस मामले में संत कबीर ने मूर्तिपूजकों की तगड़ी खबर ली है तो उन्होंने शोरपसंद मुसलमानों को भी नहीं बख्शा है। वे कहते हैं—
कांकर-पाथर जोडि़ के मस्जिद लई चुनाय ।
ता चढि़ मुल्ला बांग दे, बहरा हुआ खुदाय ।
(नया इंडिया की अनुमति से)
-अशोक पांडे
आपने छोटे बच्चों और किशोरों को वीडियो गेम खेलते देखा होगा। पिछले दस-पंद्रह सालों में ये गेम बहुत हिंसक हुए हैं। प्लास्टिक से बना भावहीन मुखौटा पहने एक नायक बंदूक लेकर दनादन लोगों को मारता हुआ आगे बढ़ता है। गोली की एक धांय होती है, हल्की सी इलेक्ट्रॉनिक चीख के साथ खून का छोटा सा धब्बा स्क्रीन पर उभरता है और एक चलता फिरता पात्र गिरी हुई लाश में बदल जाता है। लगातार चलती रहने वाली इस हिंसा का अन्त या तो कम्प्यूटर की जीत और नायक के मारे जाने में होता है या खेल का एक लेवल पूरा होने में। अगला लेवल पिछले वाले से अधिक मुश्किल होता है, उसमें पहले से ज्यादा हिंसा होती है और ज्यादा लोग मारे जाने होते हैं। गोली चलाने और लोगों की हत्या करने के इस खेल से बच्चे जऱा भी बोर नहीं होते। उन्हें घंटों ऐसे खेलों में मुब्तिला देखना आज के घरेलू जीवन की भयानक सच्चाई बन चुका है।
फर्ज कीजिए ऐसे ही किसी वीडियो गेम में मारे जाने वाले काल्पनिक चरित्रों को वास्तविक लोगों में बदल दिया जाय। फर्ज कीजिये उनमें से हर किसी के पास आपको सुनाने के लिए दिल दहला देने वाली कोई कथा भी हो। नेटफ्लिक्स पर सितम्बर के महीने में रिलीज हुई दक्षिण कोरिया में बनी ताज़ा वेब सीरीज ‘स्च्डि गेम’ ऐसा ही करती है। इस सीरीज ने तीन हफ्ते के भीतर व्यूअरशिप के सारे रेकॉर्ड तोड़ डाले हैं। एक अनुमान के मुताबिक शुरू के तीन हफ्तों में ही करीब ग्यारह करोड़ लोग इसे देखना शुरू कर चुके हैं। यह संख्या लगातार बढ़ती जा रही है।
जीवन में लगातार बेहद मुश्किल परिस्थितियों से गुजऱ रहे और उधार के बोझ तले दबे चार सौ छप्पन लोगों को बड़ी रकम का लालच देकर एक गुप्त स्थान पर इकठ्ठा किया जाता है जहाँ उन्होंने एक-एक करके बच्चों के छ: गेम खेलने हैं। इन खेलों को सफलतापूर्वक पूरा कर लेने पर उन्हें एक अकल्पनीय धनराशि मिलनी तय है। उन्हें एक सी पोशाकें पहना कर एक विशाल डोरमेट्री में रखा जाता है जहाँ उन पर नियंत्रण करने वाले, उन्हें खाना परोसने वाले और उन्हें आदेश देने वाले हथियारबंद लोग वीडियो गेम्स के पात्रों जैसे भावहीन मुखौटे पहने हैं।
धीरे-धीरे आप इन चार सौ छप्पन लोगों में से कुछ के जीवन के बारे में जानना शुरू करते हैं। वे सारे आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग से आए हैं और अपने जीवन को ढर्रे पर वापस लौटाने के लिए उन्हें काफी सारे पैसों की जरूरत है। इनमें से ज्यादातर पात्र मूलत: भले लोग हैं लेकिन लगातार बदहाली ने उनके भीतर के मनुष्य को बुरी तरह पराजित कर दिया है।
मांस की दुकान चलाने वाली एक एक बूढ़ी माँ है जिसे इस बात की खुशफहमी है कि बचपन से होनहार रहा उसका बेटा अमेरिका में नौकरी कर रहा है जहाँ से वह बहुत से पैसे कमाकर लाने वाला है। असलियत यह है कि समय पर उधार न चुका सका बेटा छिपकर सियोल में ही रह रहा है। माँ को पता तक नहीं उसके बेटे ने उसकी दुकान तक गिरवी रख छोड़ी है। पॉकेटमारी करने वाली एक किशोरी है, माँ-बाप के अलग हो जाने के कारण सात-आठ साल का जिसका छोटा भाई अनाथालय में रहने को मजबूर है। पाकिस्तान से आया एक आप्रवासी है जिसे उसके फैक्ट्री मालिक ने छह महीने से तनख्वाह नहीं दी है। कहानी का मुख्य पात्र सांग गी-हुन एक अधेड़ होता तलाकशुदा जुआरी है। एक तरफ तो अपनी बूढ़ी माँ के साथ रहने वाला गी-हुन माँ के बचाए पैसों की चोरी करने में भी नहीं हिचकता, दूसरी तरफ उसका दिल माँ और सौतेले बाप के साथ रह रही अपनी बेटी के लिए धडक़ता है जिसे कानूनी तौर पर अपने पास रख सकने के लिए उसे बहुत सारे पैसों की जरूरत है। उधार का बोझ उस पर भी है।
ये सारे पात्र मूलत: भले लोग हैं जिनके भलेपन की बहुत छोटी-छोटी झलकियां भी हमें दिखाई जाती हैं। खुद पाई-पाई का मोहताज एक आदमी उस गरीब पाकिस्तानी को बस के टिकट के लिए पैसे देने में जऱा भी नहीं हिचकता। घर पर बनाने के लिए मछली खऱीद कर ला रहा सांग गी-हुन एक आवारा बिल्ली को देखकर पसीज जाता है और बड़े प्यार से उसे मछली का एक टुकड़ा खाने को देता है।
इन भले लेकिन निर्धन लोगों को जब पहला खेल खेलने को मैदान में लाया जाता है कोई नहीं जानता उन पर क्या बीतने वाली है। लाउडस्पीकर पर नियम बताये जाते हैं। फिर चेतावनी दी जाती है कि एक भी चूक करने वाले को खेल से बाहर कर दिया जाएगा। ठीक जैसा बच्चों के वीडियो गेम्स का नियम होता है। फिर किसी सदमे की तरह हमें मालूम चलता है कि खेल से बाहर कर दिए जाने का मतलब था जीवन से बाहर कर दिया जाना। जरा सी गलती करने वालों को तुरंत मशीनगनों से भून दिया जाता है। इस दहला देने वाले इस पहले रक्तरंजित खेल की समाप्ति पर हमें बताया जाता है कि आधे से ज्यादा खिलाड़ी खेल से हटाए जा चुके हैं यानी मार डाले गए हैं। खेल के संचालकों के हाथों इस तरह मारे जाने को तैयार बैठे इन पात्रों के बीच आपसी प्रतिद्वंद्विता भी शुरू हो जाती है। इस प्रतिद्वंद्विता का अंत भी कुछ हत्याओं में होता है।
स्क्रीन पर चल रहे भयानक मनोवैज्ञानिक हॉरर की बुनियाद पर खड़े किये गए इस खेल को देखने के बाद दर्शक अपने आप को बहुत बुरी तरह से भीतर तक उद्वेलित महसूस करता है। आप खौफ और हैरत से भर जाते हैं। इसी मनोविज्ञान में इस सीरीज की सफलता का राज छिपा है।
हिंसा और उसकी अतिरंजना को देखकर आपको उबकाई तो आती है लेकिन आप उसकी तरफ देखने के आकर्षण से बच भी नहीं पाते। यह मूलभूत मानवीय व्यवहार है।
जैसे-जैसे इस खूनी खेल के संचालकों और उसे देख कर मन बहला रहे दर्शकों के बारे में पता चलना शुरू होता है, समाज के तमाम विद्रूपों और विसंगतियों का चेहरा उघड़ कर सामने आता है। पैसा इस घृणित सामाजिक असमानता के पीछे काम कर रही सबसे बड़ी शक्ति है जिसके लालच में लाकर किसी को भी फंसाया जा सकता है। ‘स्च्डि गेम’ मानव प्रवृत्ति के इस आयाम पर किया गया एक शोध है जो यह दिखाता है कि बुरी तरह फंसे हुए मनुष्यों को क्या-क्या करने पर मजबूर किया जा सकता है। खासतौर पर जब दांव पर बड़ी रकम लगी हो। सीरीज के निर्देशक ह्वांग डाँग-ह्युक ने इस फैंटेसी के लिए जिस तरह के बेहद आकर्षक, रंगीन और अतियथार्थवादी सेट्स का इस्तेमाल किया है, उनसे वे कहानी में एक ऐसा सौंदर्यशास्त्र गढ़ते हैं जिसे स्क्रीन पर इस से पहले नहीं देखा गया था। विषयवस्तु के लिहाज से यह सीरीज वर्ष 2013 की अमेरिकी फिल्म-सीरीज ‘द हंगर गेम्स’ की याद दिलाती तो है लेकिन ‘स्च्डि गेम’ के निर्देशक के सरोकार अधिक वास्तविक और मानवीय लगते हैं। हिंसा और रक्तपात के अतिरेक के बावजूद पूरी सीरीज लगातार इन प्रवृत्तियों की कुरूपता को रेखांकित करती चलती है।
दुनिया के सबसे अधिक बिकने वाले लेखकों में गिने जाने वाले जापानी उपन्यासकार हारूकी मुराकामी ने आज से करीब 15 साल पहले आधुनिक समय में कहानी सुनाने की कला को लेकर एक इंटरव्यू में कहा था कि बाजार की मांग को देखते हुए कहानी लिखने और सुनने वालों ने अकल्पनीय प्रयोग करने होंगे और फिल्म, संगीत, खेल और वीडियो गेम्स से तकनीकें चुरानी होंगी। मुराकामी ने आगे कहा कि आज के समय में वीडियो गेम्स फिक्शन के जितना करीब हैं, उतना कुछ और नहीं। मुझे नहीं पता ‘स्च्डि गेम’ के निर्देशक ने मुराकामी का वह इंटरव्यू पढ़ा या नहीं लेकिन उनकी दी हुई सलाह पर उन्होंने अमल जरूर किया है। उन्होंने बताया है कि इस सीरीज का विचार उनके मन में एक कॉमिक को पढऩे के बाद आया था जिसके पात्र एक ऐसा ही खतरनाक खेल खेलते थे।
सीरीज का निर्माण ऐसी कुशलता से किया गया है कि एक एपिसोड देखने के बाद अगला देखने के लालच से बच पाना असंभव है। यह जरूर है कि हर एपीसोड में ढेर सारी हिंसा, मनोवैज्ञानिक भय और रक्तपात है लेकिन उसके समानांतर मानव जीवन का नाटक चलता रहता है जिसके भीतर हर चरित्र एक बेहद जटिल अलबत्ता त्रासद तरीके से विकसित भी होता जाता है।
कहना न होगा अधिकतर पात्रों ने बेहतरीन अभिनय किया है। कहानी इस कदर सधी हुई रफ़्तार से आगे बढ़ती है कि उसमें खोट निकाल पाना मुश्किल लगता है। अधिक समय नहीं बीता जब दक्षिण कोरिया के एक और निर्देशक बोंग जून-हो की फिल्म ‘पैरासाइट’ ने चार ऑस्कर जीत कर सनसनी फैला दी थी और दुनिया के सामने कहानी कहने का एक अनूठा तरीका पेश किया था। विषयवस्तु, फिल्मांकन, निर्देशन और पटकथा के स्तरों पर ‘स्च्डि गेम’ किसी भी मामले में उससे उन्नीस नहीं ठहरती।
-डॉ राजू पाण्डेय
जम्मू-कश्मीर में हिंसा का तांडव जारी है। बावजूद इस आंकिक सत्य के कि मारे गए लोगों में अधिकतर स्थानीय मुसलमान हैं मीडिया में इस बात की चर्चा जोरों पर है कि आतंकी टारगेटेड किलिंग की रणनीति का उपयोग करते हुए अल्पसंख्यक समुदाय और बाहर से आने वालों को निशाना बना रहे हैं और 90 के दशक की स्थितियां दुहराई जा सकती हैं- घाटी में निवास करने वाले बचे खुचे कश्मीरी पंडितों को भी पलायन के लिए विवश होना पड़ेगा।
5 अगस्त 2019 को पहले से कमजोर हो चुकी धारा 370 के कतिपय प्रावधानों को अप्रभावी बनाकर हमारी केंद्र सरकार ने गर्वोक्ति की थी कि आजादी के इतने वर्षों के बाद पहली बार कश्मीर भारत का अभिन्न अंग बन गया है और अब वह विकास की मुख्य धारा से जुड़ चुका है। अब कश्मीरी पंडित अपने घरों को लौट सकेंगे।
हो सकता है कि धारा 370 वाले प्रकरण से सरकारी राष्ट्रवाद के समर्थकों में यह संदेश गया हो कि उनकी सरकार ने पाकिस्तान परस्त कश्मीरी नेताओं और उनके समर्थकों को करारा झटका दिया है लेकिन इन दो वर्षों में आम कश्मीरी के जीवन में कोई सकारात्मक परिवर्तन नहीं आया है। शायद विश्व की सबसे लंबी इंटरनेट बंदी की सौगात ही उन्हें मिली। हिंसा कुछ समय के लिए रुकी रही क्योंकि सुरक्षा बलों की व्यापक उपस्थिति थी और आम जनजीवन बाधित था,प्रदर्शन आदि पर भी पाबंदी थी। धारा 35 ए की समाप्ति के बाद उस निजीकरण की आहट अवश्य दिखाई दे रही है जो स्थानीय निवासियों का सुख-चैन छीनकर ऐसी भौतिक समृद्धि लाता है जिसका उपभोग कॉरपोरेट मालिक और उनके आश्रित करते हैं। जनसंख्या की प्रकृति में बदलाव का डर यदि कश्मीरियों में न भी होता तब भी भाजपा नेताओं की आक्रामक बयानबाजी और जहरीली पोस्ट्स के कारण इसे उत्पन्न होना ही था। हमें यह भी ध्यान रखना होगा कि यदि धारा 370 के कुछ फायदे थे तो वे हर कश्मीरी के लिए थे, जिसमें कश्मीरी पंडित भी शामिल थे।
धारा 370 के 'हटाने' और उसके बाद के सरकार के सख्त नियंत्रण ने कश्मीरियों के इस संदेह को पुख्ता अवश्य किया होगा कि सब कुछ ठीक नहीं है, सरकार उन पर अविश्वास कर रही है और संभावित अपराध के भावी संदिग्धों के रूप में उन्हें चिह्नित किया जा रहा है।
कश्मीरी पंडितों और उनके साथ हुई त्रासदी को पिछले कुछ वर्षों में विज्ञापन की वस्तु भांति इस्तेमाल किया जाता रहा है। कभी उन्हें सरकारी राष्ट्रवाद के प्रबल समर्थकों और लाभान्वितों के रूप में प्रस्तुत किया जाता है तब स्वाभाविक रूप से वे पुराने सहिष्णु-समावेशी राष्ट्रवाद की "कमजोरियों" और "भेदभाव" के भुक्तभोगी के रूप में चित्रित किए जाते हैं। कभी उनका उपयोग यह भय उत्पन्न करने हेतु किया जाता है कि यदि मुस्लिम आबादी सारे देश में बहुसंख्यक हो गई तो हिंदुओं का वही हाल होगा जो कश्मीरी पंडितों का हुआ है। कभी उन्हें पाकिस्तान परस्त, भारत विरोधी कश्मीरी नेताओं के छल के शिकार हिंदुओं के रूप में दर्शाया जाता है और कभी उन्हें नफरत के उस नैरेटिव को मजबूती देने के लिए इस्तेमाल किया जाता है जिसके अनुसार सवर्ण उच्चवर्गीय हिन्दू सर्वाधिक पीड़ित है- न उसे आरक्षण मिलता है, न नौकरियां और वजीफे, बस उसे हिंसा का शिकार बनाया जाता है और उसकी कुछ सुनवाई भी नहीं है। जब "जागो हिन्दू जागो वरना कश्मीरी पंडितों जैसा हाल हो जाएगा" जैसे हिंसा भड़काने वाले विषैले नारे हवा में तैरते हैं तो इनका लक्ष्य सवर्ण हिन्दू समुदाय को उत्तेजित करना होता है। जब यह प्रश्न पूछा जाता है कि "कश्मीरी पंडितों पर हुए अत्याचार पर कथित धर्म निरपेक्ष ताकतें मौन क्यों" तब इन कश्मीरी पंडितों का उपयोग यह सिद्ध करने के लिए हो रहा होता है कि हमारे देश में धर्म निरपेक्षता का अर्थ मुस्लिमों का अंध समर्थन करना और बहुसंख्यक हिंदुओं की अनदेखी करना है।
कश्मीरी पंडितों को यह समझना होगा कि सरकारी राष्ट्रवाद के समर्थक और साम्प्रदायिक शक्तियां उनकी पीड़ा की नुमाइश करके हिंसा और घृणा फैलाने का अपना मकसद पूरा कर रही हैं। यह ताकतें इन कश्मीरी पंडितों की समस्याओं के समाधान को लेकर गंभीर नहीं हैं। यह कश्मीरी पंडितों की सहायता से अधिक इस सहायता का विज्ञापन कर रही हैं।
देश का हर सभ्य और सजग नागरिक, हर धर्म निरपेक्ष राजनीतिक दल उस हिंसा और बर्बरता के विरुद्ध है जो कश्मीरी पंडितों के साथ पहले या आज हुई है। देश का हर सच्चा नागरिक इन पर हुई हिंसा को जघन्य, निंदनीय और दंडनीय मानता है और इससे उसी प्रकार आहत है जैसे वह लखीमपुर खीरी की घटना से व्यथित है। वह कश्मीरी पंडितों के हत्यारों की मानसिकता से उतना ही घबराया हुआ है जितना कि वह असम के दरांग जिले में पुलिस की गोलियों से मारे गए व्यक्ति के शव के साथ बर्बरता करने वाले शख्स की दिमागी हालत को लेकर डरा हुआ है। किसी सच्चे देशवासी की रूह कश्मीर के पत्थरबाजों के नारों को सुनकर उतना ही कांपती है जितना कि वह मॉब लिंचिंग कर रही दंगाई गोरक्षकों की भीड़ के नारों को सुनकर सिहरती है।
यदि हम अपनी सुविधानुसार हिंसा का महिमामंडन करते हैं, अपनी सहूलियत के अनुसार इस पर चुप्पी साध लेते हैं अथवा अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकने के लिए इसकी निंदा करते हैं और इस समर्थन-विरोध एवं चुप्पी को चर्चा में बनाए रखते हैं तो हम चालाक नेता या धूर्त मीडियाकर्मी अवश्य बन सकते हैं किंतु बतौर देशवासी हम इस देश की बुनियाद "अहिंसा" को कमजोर करने का काम कर रहे होते हैं।
कश्मीर के हालात का उपयोग जब तक चुनावी सफलता अर्जित करने हेतु किया जाता रहेगा तब तक इसे हल करने की सरकार की नीयत पर संशय बना रहेगा। उत्तरप्रदेश के चुनाव निकट हैं। कश्मीर में हिंसा बढ़ रही है। सीमापार के आतंकवादियों को दुश्मन देश में घुस कर मार गिराने के लिए सर्जिकल स्ट्राइक की चर्चा जोरों पर है। ऐसा संयोग पिछले लोकसभा चुनावों के पहले पुलवामा हमले और उसके बाद हुई सर्जिकल स्ट्राइक के रूप में भी बना था। तब भाजपा को इससे बहुत चुनावी फायदा मिला था। जब संयोग निरंतर बनने लगें तब उनके संयोग होने पर संशय होने लगता है। यह जानते हुए भी कि कश्मीर की समस्या का सैन्य समाधान संभव नहीं है, सरकार सर्जिकल स्ट्राइक का सहारा लेती है। फिर हमारी पराक्रमी और अनुशासित सेना के शौर्य को चुनावी राजनीति के बाजार में उतारा जाता है। शायद इससे चुनावों में सरकार को कुछ मदद मिलती होगी लेकिन अंततः होता यही है कि हमारे आंतरिक मामले का अंतरराष्ट्रीयकरण हम खुद कर रहे होते हैं।
हमारा देश बहुभाषिक और बहुजातीय है। हमने भाषा के सवाल पर उत्तर और दक्षिण में मनोमालिन्य होते देखा है। आर्य और द्रविड़ विवाद जब तब सुगबुगाता रहता है। महाराष्ट्र में शिव सेना और बंगाल में तृण मूल कांग्रेस प्रादेशिक अस्मिता की राजनीति करते रहे हैं। इनका यह प्रान्त प्रेम अक्सर उग्र रूप लेता रहा है और इतर प्रान्त वासियों पर हिंसा हुई है। 'स्थानीय मूल निवासी बनाम बाहरी' का मुद्दा उत्तरपूर्व की राजनीति को प्रभावित करता रहा है। सिख अस्मिता के नाम पर कुछ दशक पहले हमने पंजाब को जलते देखा है। जल-जंगल-जमीन की अनियंत्रित कॉरपोरेट लूट ने आदिवासी असंतोष को हवा दी है जिसका लाभ नक्सलियों ने उठाया है। छत्तीसगढ़, बिहार, झारखंड,उड़ीसा और आंध्र प्रदेश जैसे राज्य नक्सल हिंसा से पीड़ित रहे हैं।
यह सारे विवाद मीडिया में उतना ही स्थान पाते हैं जितना इन्हें मिलना चाहिए बल्कि यह कहना उचित होगा कि मीडिया अनेक बार इनकी उपेक्षा करता है। फिर क्या कारण है कि कश्मीर के लोगों के असंतोष को पड़ोसी मुल्क की साजिशों और राष्ट्रीय सुरक्षा के प्रश्न से जोड़ा जाता है और वर्ष भर इन पर टीवी डिबेट्स चलती रहती हैं? क्या इसका कारण वह धारा 370 है जो अपने भ्रष्ट प्रशासन और बहुसंख्यक विरोधी नीतियों के कारण अलोकप्रिय राजा हरि सिंह के साथ हस्ताक्षरित इंस्ट्रूमेंट ऑफ ऐक्सेशन की कंडिका 5 और 7 की भावना को संवैधानिक दर्जा देने के लिए अस्तित्व में आई। इस समय तक शेख अब्दुल्ला एवं उनके सहयोगी संविधान सभा का हिस्सा बन चुके थे। कालांतर में धारा 370 कश्मीरी अस्मिता एवं कश्मीरियों की स्वायत्तता की प्रतीक बन गई। सरकारें समय समय पर धारा 370 में प्रदत्त अधिकारों में कटौती करती रहीं। 1954 के राष्ट्रपति के आदेश के द्वारा संघीय सूची में अंकित लगभग सभी 97 विषयों पर विधि निर्माण का भारतीय संसद का अधिकार जम्मू कश्मीर में लागू हो गया। भारतीय संविधान की 395 धाराओं में 260 जम्मू कश्मीर में पहले से लागू थीं। श्रीमती इंदिरा गांधी ने प्रधानमंत्री और सदर ए रियासत के पदों को मुख्यमंत्री एवं गवर्नर में परिवर्तित कर दिया। सदर ए रियासत निर्वाचित होता था किंतु अब गवर्नर नामांकित होने लगा। केंद्र की सरकारें कानूनी और संवैधानिक रूप से कश्मीर को भारत से जोड़ने के लिए अवश्य प्रयत्नशील हुईं किंतु भावनात्मक रूप से कश्मीरियों का जुड़ाव शायद उस गति से न हो पाया।
कश्मीर की जनता को राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में निर्णय लेने हेतु राजनीतिक रूप से प्रशिक्षित करने के लिए कांग्रेस सर्वाधिक उपयुक्त पार्टी थी। किंतु कांग्रेस धीरे धीरे कमजोर पड़ती चली गई। नेशनल कांफ्रेंस और पीडीपी जैसी क्षेत्रीय पार्टियों के लिए कट्टर क्षेत्रीयतावाद का आश्रय लेना एक अनिवार्यता थी। स्थिति तब तक भी ठीक थी। किंतु जैसे जैसे बीजेपी ने पॉलिटिकल डिस्कोर्स को बदलना शुरू किया और बहुसंख्यक-अल्पसंख्यक, हिन्दू-मुसलमान तथा पाकिस्तान परस्त विरुद्ध देशभक्त जैसे विभाजनकारी मुद्दे उछाले वैसे वैसे इन क्षेत्रीय पार्टियों के लिए कट्टरपंथ की राजनीति में गहरे पैठना जरूरी हो गया। यही कारण है कि हम महबूबा मुफ्ती को पाकिस्तान के विषय में नरम रुख अपनाते और महबूबा- फारुख दोनों नेताओं को तालिबान की प्रशंसा करते देखते हैं।
वर्तमान सरकार के नेता जिस वैचारिक पृष्ठभूमि से आते हैं और जिन संगठनों से प्रशिक्षण प्राप्त करते हैं वहाँ कश्मीर समस्या को बलपूर्वक हल करने की ही बात की जाती है। यही हम देख रहे हैं। सरकार को यह समझना होगा कि पुलिस और अर्धसैनिक बलों की तैनाती, इंटरनेट बंदी, प्रदर्शनों पर रोक, सर्जिकल स्ट्राइक आदि अस्थायी रूप से हिंसा रोकने वाले उपाय हैं। किंतु हिंसा का स्थायी इलाज तो जनविश्वास जीतने तथा चर्चा एवं विमर्श से ही संभव है। प्रतिबंधों और दमन से तो कदापि नहीं।
इस पूरे घटनाक्रम में सर्वाधिक चिंता का विषय यह है कि हमें संदेह,घृणा और हिंसा की भाषा में सोचने के लिए प्रशिक्षित किया जा रहा है। कश्मीर में भारत विरोधी नारे लग रहे हैं और भारत में कश्मीर के खिलाफ नारेबाजी हो रही है। देश में कश्मीरियों को संदेह की दृष्टि से देखा जा रहा है, इधर कश्मीरी अपने हमवतन लोगों की नीयत को लेकर आश्वस्त नहीं हैं।
पता नहीं भाषाई आधार पर प्रान्तों के पुनर्गठन का विचार कितना अनुचित था या उचित लेकिन आबादी की धार्मिक संरचना के आधार पर नए प्रदेश गढ़ने का प्रयोग आत्मघाती सिद्ध हो सकता है।
यह देश बहुसंख्यक वर्चस्व की भाषा में सोचने से नहीं चल सकता। बहुसंख्यक वर्चस्व की सोच जब हममें घर कर जाएगी तो भाषा, जाति और प्रांतीयता के आधार पर किसी स्थान पर अधिक संख्या में निवास करने वाले लोग भाषिक, जातीय और प्रांतीय दृष्टि से अल्पसंख्यकों पर हमलावर होने लगेंगे। जब अल्पसंख्यकों का जीवन खतरे में पड़ेगा तो वह भी हिंसक प्रतिकार करेंगे।
आज से वर्षों पहले महात्मा गांधी ने न केवल इन परिस्थितियों का अनुमान लगा लिया था बल्कि इनके समाधान की युक्ति भी बताई थी। गांधी के अनुसार - "अगर स्थिति यह हो कि बड़े संप्रदाय को छोटे संप्रदाय से डर लगता हो तो वह इस बात की सूचक है या तो (1) बड़े संप्रदाय के जीवन में किसी गहरी बुराई ने घर कर लिया है और छोटे संप्रदाय में पशु बल का मद उत्पन्न हुआ है (यह पशु बल राजसत्ता की बदौलत हो या स्वतंत्र हो) अथवा (2) बड़े संप्रदाय के हाथों कोई ऐसा अन्याय होता आ रहा है जिसके कारण छोटे संप्रदाय में निराशा से उत्पन्न होने वाला मर मिटने का भाव पैदा हो गया है। दोनों का उपाय एक ही है बड़ा संप्रदाय सत्याग्रह के सिद्धांतों का अपने जीवन में आचरण करे। वह अपने अन्याय, सत्याग्रही बनकर चाहे जो कीमत चुका कर भी दूर करे और छोटे संप्रदाय के पशु बल को अपनी कायरता को निकाल बाहर करके सत्याग्रह के द्वारा जीते। छोटे संप्रदाय के पास यदि अधिक अधिकार, धन, विद्या, अनुभव आदि का बल हो और इस बड़े संप्रदाय को उससे डर लगता रहता हो तो छोटे संप्रदाय का धर्म है कि शुद्ध भाव से बड़े संप्रदाय का हित करने में अपनी शक्ति का उपयोग करे। सब प्रकार की शक्तियां तभी पोषण योग्य समझी जा सकती हैं जब उनका उपयोग दूसरे के कल्याण के लिए हो। दुरुपयोग होने से वे विनाश के योग्य बनती हैं और चार दिन आगे या पीछे उनका विनाश होकर ही रहेगा। यह सिद्धांत जिस प्रकार हिंदू- मुसलमान- सिख आदि छोटे-बड़े संप्रदायों पर घटित होते हैं उसी प्रकार अमीर-गरीब, जमींदार-किसान, मालिक-नौकर, ब्राह्मण-ब्राह्मणेतर इत्यादि छोटे-बड़े वर्गों के आपस में संबंधों पर भी घटित होते हैं।"(किशोर लाल मशरूवाला, गांधी विचार दोहन, पृष्ठ 73-74)
यह देखना दुर्भाग्यजनक है कि गांधी के देश में हिंसा हमारे सामाजिक-राजनीतिक जीवन का मूल भाव बनती जा रही है।
(रायगढ़, छत्तीसगढ़)
-लक्ष्मण सिंह देव
22 अक्टूबर को महान क्रांतिकारी अशफाक उल्लाह खान जी की जयंती हैं। अशफाक उल्ला खान जंग-ए-आजादी के महानायक थे। अंग्रेजों ने उन्हें अपने पाले में मिलाने के लिए तरह-तरह की चालें चलीं लेकिन वे सफल नहीं हो पाए। स्वतंत्रता संग्राम पर कई पुस्तकें लिख चुके इतिहासकार सर्वदानंदन के अनुसार काकोरी कांड के बाद जब अशफाक को गिरफ्तार कर लिया गया तो अंग्रेजों ने उन्हें सरकारी गवाह बनाने की कोशिश की और कहा कि यदि हिन्दुस्तान आजाद हो भी गया तो उस पर हिन्दुओं का राज होगा तथा मुसलमानों को कुछ नहीं मिलेगा।
इसके जवाब में अशफाक ने ब्रितानिया हुकूमत के कारिन्दों से कहा कि फूट डालकर शासन करने की अंग्रेजों की चाल का उन पर कोई असर नहीं होगा और हिन्दुस्तान आजाद होकर रहेगा। अशफाक ने अंग्रेजों से कहा था, तुम लोग हिन्दू-मुसलमानो में फूट डालकर आजादी की लड़ाई को नहीं दबा सकते।उनके इस जवाब से अंग्रेज दंग रह गए। उन्होंने कहा भारत माँ अगर हिन्दुओं की माँ है तो हम मुसलमान भी इसी माँ के लाल है अब हिंदुस्तान में क्रांति की ज्वाला भडक़ चुकी है जो अंग्रेजी साम्राज्य को जलाकर राख कर देगी। अपने दोस्तों के खिलाफ मैं सरकारी गवाह बिल्कुल नहीं बनूंगा। 22 अक्टूबर 1900 को उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर में जन्मे अशफाक उल्ला खान अपने छह भाई बहनों में सबसे छोटे थे।
अशफाक पर गांधी का काफी प्रभाव था लेकिन जब चौरी चौरा की घटना के बाद गांधी ने असहयोग आंदोलन वापस ले लिया तो वह प्रसिद्ध क्रांतिकारी रामप्रसाद बिस्मिल से जा मिले। जो कि अशफाक के बचपन के मित्र थे । बिस्मिल और चंद्रशेखर आजाद के नेतृत्व में क्रांतिकारियों की आठ अगस्त 1925 को शाहजहांपुर में एक बैठक हुई और हथियारों के लिए रकम जुटाने के उद्देश्य से ट्रेन में ले जाए जाने वाले सरकारी खजाने को लूटने की योजना बनाई गई। क्रांतिकारी जिस खजाने को हासिल करना चाहते थे, दरअसल वह अंग्रेजों ने भारतीयों से ही लूटा था।
9 अगस्त 1925 को रामप्रसाद बिस्मिल, चंद्रशेखर आजाद, अशफाक उल्ला खान, राजेंद्र लाहिड़ी, ठाकुर रोशन सिंह, सचिंद्र बख्शी, केशव चक्रवर्ती, बनवारी लाल मुकुंद और मन्मथ लाल गुप्त ने लखनऊ के नजदीक काकोरी में ट्रेन में ले जाए जा रहे सरकारी खजाने को लूट लिया। इस घटना से ब्रितानिया हुकूमत तिलमिला उठी। क्रांतिकारियों की तलाश में जगह-जगह छापे मारे जाने लगे। एक-एक कर काकोरी कांड में शामिल सभी क्रांतिकारी पकड़े गए लेकिन चंद्रशेखर आजाद और अशफाक उल्ला खान हाथ नहीं आए। इतिहास में यह घटना काकोरी कांड के रूप में दर्ज हुई।
अशफाक शाहजहांपुर छोडक़र बनारस चले गए और वहां एक इंजीनियरिंग कंपनी में 10 महीने तक काम किया। इसके बाद उन्होंने विदेश जाने की योजना बनाई ताकि क्रांति को जारी रखने के लिए बाहर से मदद करते रहें। इसके लिए वह दिल्ली आकर अपने एक मित्र के संपर्क में आए लेकिन इस मित्र ने अंग्रेजों द्वारा घोषित इनाम के लालच में आकर पुलिस को सूचना दे दी। यार की गद्दारी से अशफाक पकड़े गए। अशफाक को फैजाबाद जेल भेज दिया गया। उनके वकील भाई रियासत उल्ला ने बड़ी मजबूती से अशफाक का मुकदमा लड़ा लेकिन अंग्रेज उन्हें फांसी पर चढ़ाने पर आमादा थे और आखिरकार अंग्रेज जज ने डकैती जैसे मामले में अशफाक को फांसी की सजा सुना दी। 19 दिसंबर 1927 को अशफाक को फांसी दे दी गई जिसे उन्होंने हंसते-हंसते चूम लिया। इसी मामले में राम प्रसाद बिस्मिल को भी 19 दिसंबर 1927 को फांसी पर लटका दिया गया।
-कृष्ण कांत
भारत में किसी फर्जी हिंदू की अभी इतनी औकात नहीं हुई है कि तुलसीदास से उनका ‘गरीबनवाज’ छीन ले। हालांकि, वे अश्लील कोशिश करते रहते हैं।
किसी कम्पनी ने त्योहारों के मौसम में एक विज्ञापन दिया। विज्ञापन का शीर्षक था- ‘जश्न-ए रिवाज’। कम्पनी के ऐतिहासिक गुलामों को ये बात बहुत बुरी लगी क्योंकि ये दो शब्द उर्दू के हैं। उर्दू के दो शब्द सुनकर फर्जी हिंदुओं का धर्म खतरे में आ जाता है।
अब आप बताएं कि भगवान राम कहां पैदा हुए? हमारे अवध में। मनुष्य के रूप में राम का सबसे बड़ा भक्त कौन हुआ? बेशक रामचरितमानस रचयिता महाकवि तुलसीदास।
तुलसीदास जी ने सिर्फ रामचरितमानस में अरबी-फारसी मूल के लगभग हजार शब्दों का प्रयोग किया है. उन्होंने भगवान राम के लिए गरीब नवाज शब्द का इस्तेमाल किया है।
रामचरितमानस सिर्फ एक धर्मग्रंथ नहीं है। वह भारत की पारंपरिक बहुलता का ऐतिहासिक दस्तावेज भी है। अवधी, भोजपुरी, ब्रज, बुंदेली समेत कई बोलियां इसे अपना मानती हैं।
शाहजहां के शासनकाल में साअद उल्लाह मसीह पानीपती ने फारसी भाषा में ‘रामायण मसीही’ लिखी। उर्दू भाषा में 1855 में प्रथम रामायण ‘रामायण खुश्तर’ लिखी गई थी। यह रामचरितमानस का उर्दू अनुवाद है। रामचरितमानस के अनेक उर्दू अनुवाद हुए हैं। 19वीं सदी के उर्दू भाषा विद्वान मुंशी द्वारका प्रसाद उफुक की कालजयी कृति है ‘मसनवी यक काफिया’ जो राम कथा पर आधारित है।
ये सब चीजें जानने और समझने के लिए नेहरू जैसा व्यक्तित्व चाहिए। पैदाइशी दंगाई इसे नहीं समझते। उर्दू भारत में पैदा हुई भाषा है जो अरबी, फारसी और स्थानीय बोलियों को मिलाकर विकसित हुई। खड़ी बोली इसके बहुत बाद में पैदा हुई। भारत एक इसी मामले में धनी है कि यहां सैकड़ों भाषाएं और बोलियां हैं।
इसीलिए महात्मा गांधी संस्कृतनिष्ठ हिंदी की जगह हिंदुस्तानी लिखने बोलने के पक्षधर थे। इसीलिए मुंशी प्रेमचंद हिंदुस्तानी में लिखते थे।
अपने ही देश में पैदा हुई एक भाषा से नफरत कीजिएगा तो नफरत की यह टोकरी बड़ी होती जाएगी। अब जबरन नासिका बोलने के चक्कर में अपनी नाक कटवाने पर क्यों तुले हैं? हमारा जश्न-ए-रिवाज़ यही है कि हम इस धरती पर मौजूद हर धर्म, हर भाषा, हर आस्था, हर परंपरा का जश्न मनाते आये हैं, मनाते रहेंगे।
उन्मादी मूर्खों की बात पर कान मत दीजिए। मेरी बात सुना कीजिए, फायदे में रहेंगे।
-ध्रुव गुप्त
काकोरी के शहीद अशफाकुल्लाह खां स्वतंत्रता संग्राम के एक क्रांतिकारी सेनानी और ‘हसरत’ उपनाम से उर्दू के एक अजीम शायर थे। उत्तरप्रदेश के शहर शाहजहांपुर में जन्मे अशफाक ने किशोरावस्था में अपने ही शहर के क्रांतिकारी शायर राम प्रसाद बिस्मिल के व्यक्तित्व और विचारों से प्रभावित होकर अपना जीवन वतन की आजादी के लिए समर्पित कर दिया था। वे क्रांतिकारियों के उस जत्थे के सदस्य बने जिसमें पंडित रामप्रसाद बिस्मिल, चंद्रशेखर आजाद, मन्मथनाथ गुप्त, राजेंद्र लाहिड़ी, शचीन्द्रनाथ बख्सी, ठाकुर रोशन सिंह, केशव चक्रवर्ती, बनवारी लाल, मुकुंदी लाल जैसे लोग शामिल थे।
चौरी-चौरा की हिंसक घटना के तुरंत बाद महात्मा गांधी द्वारा असहयोग आंदोलन वापस लेने के फैसले से इस जत्थे को पीड़ा हुई थी। 8 अगस्त, 1925 को शाहजहांपुर में रामप्रसाद बिस्मिल और चन्द्रशेखर आजाद के नेतृत्व में इस क्रांतिकारी जत्थे की एक अहम बैठक हुई जिसमें क्रांतिकारी अभियान हेतु हथियार की खरीद के लिए ट्रेन से सरकारी खजाने को लूटने की योजना बनी। उनका मानना था कि यह वह खजाना अंग्रेजों का नहीं था, अंग्रेजों ने उसे भारतीयों से ही हड़पा था। 9 अगस्त, 1925 को अशफाक और बिस्मिल के नेतृत्व में आठ क्रांतिकारियों के एक दल ने सहारनपुर-लखनऊ पैसेंजर ट्रेन से अंग्रेजों का खजाना लूट लिया।
अंग्रेजों को हिला देने वाले काकोरी षडय़ंत्र के नाम से विख्यात इस कांड में गिरफ्तारी के बाद जेल में अशफाक को असह्य यातनाएं दी गईं। उन्हें धर्म के नाम पर भडक़ा कर सरकारी गवाह बनाने की कोशिशें हुईं। अंग्रेज अधिकारियों ने उनसे कहा कि हिन्दुस्तान आजाद हो भी गया तो उस पर मुस्लिमों का नहीं, हिन्दुओं का राज होगा। मुस्लिमों को वहां कुछ भी नहीं मिलने वाला। इसके जवाब में अशफाक ने कहा था- ‘तुम लोग हिन्दू-मुस्लिमों में फूट डालकर आजादी की लड़ाई को नहीं दबा सकते। हिन्दुस्तान आज़ाद होकर रहेगा। अपने दोस्तों के खिलाफ मैं सरकारी गवाह कभी नहीं बनूंगा।’
संक्षिप्त ट्रायल के बाद अशफ़ाक, राम प्रसाद बिस्मिल, राजेंद्र लाहिड़ी और ठाकुर रोशन सिंह को फांसी की सजा और बाकी लोगों को चार साल से लेकर आजीवन कारावास तक की सज़ा सुनाई गई। अशफाक को 19 दिसंबर, 1927 की सुबह फैजाबाद जेल में फांसी दी गई। फांसी के पहले जो हुआ वह अशफाक के व्यक्तित्व का आइना है। उन्होंने वजू कर कुरआन की कुछ आयतें पढ़ी, कुरआन को आंखों से लगाया और खुद जाकर फांसी के मंच पर खड़े हो गए। वहां मौज़ूद जेल के अधिकारियों से उन्होंने कहा- ‘मेरे हाथ इंसानी खून से नहीं रंगे हैं। खुदा के यहां मेरा इंसाफ होगा।’ उसके बाद उन्होंने अपने हाथों फांसी का फंदा अपने गले में डाला और झूल गए। यौमे पैदाईश (22 अक्टूबर) पर शहीद अशफाक को कृतज्ञ राष्ट्र की श्रद्धांजलि, उनकी लिखी एक नज्म के साथ !
जाऊंगा खाली हाथ मगर,
यह दर्द साथ ही जाएगा
जाने किस दिन हिंदोस्तान
आजाद वतन कहलाएगा
बिस्मिल हिन्दू हैं, कहते हैं
फिर आऊंगा, फिर आऊंगा
फिर आकर ऐ भारत माता
तुझको आजाद कराऊंगा
जी करता है मैं भी कह दूं
पर मजहब से बंध जाता हूं
मैं मुसलमान हूं पुनर्जन्म की
बात नहीं कर पाता हूं
हां खुदा अगर मिल गया कहीं
अपनी झोली फैला दूंगा
और जन्नत के बदले उससे
एक पुनर्जन्म ही मांगूंगा!
-कनुप्रिया
आज फेसबुक पर शाहरुख खान छाए हुए हैं, मैं शाहरुख की कभी बड़ी फैन नहीं रही, कुछ फिल्मों में अच्छे लगे हैं, मगर ये समझ नहीं आ रहा कि आर्यन खान के मामले में उन्हें क्यों घसीटा जा रहा है। सिर्फ शाहरूख को ही नहीं उनके पिता की जन्म कुंडली भी खोली जा रही है। अगर शाहरुख के पिता स्वतंत्रता सेनानी थे तब भी आर्यन खान के मामले में उससे कुछ सिद्ध नहीं होता, और अगर आर्यन खान दोषी हैं तब भी शाहरुख दोषी नहीं होते। क्या सलमान खुान के मामले में भी जो साफ़ दोषी होने पर भी सत्ता की साँठ गाँठ से निर्दोष सिद्ध हो गए थे, सलीम खान को घसीटा गया था? तब शाहरुख दोषी की तरह क्यों ट्रीट किए जा रहे हैं। क्या शाहरुख़ द्वारा आर्यन ख़ान पर हो रही कार्यवाही को रोकने या प्रभावित करने का कोई मामला सामने आया है? संतान की गलती की सजा शाहरुख या गौरी यूँ भी भुगत ही रहे हैं, मगर क्या इसमें शाहरुख खान को अपने बारे में कोई सफाई देने की जरूरत है?
बाकी मीडिया किस तरह व्यवहार करता है, सरकारें कैसी द्वेषपूर्ण कार्यवाही कर रही हैं और बहुसंख्यक तबका इस सरकार और मीडिया के चलते किस तरह सोचने और प्रतक्रिया देने लगा है उस बारे में तो कोई सन्देह ही नहीं है।
संविधान के मूल्यों के हिसाब से तो बिगाड़ की पावर होने पर भी जो सरकार न्यायपूर्ण बनी रहती है वही चुनी चाहिए मगर वर्तमान सरकार तो संविधान को पूज भले ले, उसकी लगभग सारी कसौटियों पर फेल है। इसलिये फिलहाल बेगुनाह होने और देशभक्त होने का आपकी कारगुजारियों से कोई लेना देना नहीं है, सही क्या है गलत क्या, आपकी गलती कितनी बड़ी है, और उसके मुकाबले सजा कैसी है, ये सब कुछ संविधान नहीं, धर्म, जाति, जेंडर और सत्ता तय कर रहे हैं।
वरना सावरकर वीर और गोडसे देशभक्त सिद्ध न हो रहे होते, दिल्ली दंगों के असली दोषी बाहर और बेगुनाह जेल में न होते। आतंकवादियों को शरण देने वाला देवेंद्र सिंह बरी न हुआ होता, और ट्विटर पर टूल किट लिखने भर से मुकदमे न हो रहे होते। सचिन तेंदुलकर अब भी म्यूच्यूअल फंड का विज्ञापन न कर रहे होते, पनामा और पेंडोरा फाइल्स से न आय पर फर्क पड़ रहा है न देशभक्ति पर। 3000 किलो की अफीम के अडानी बंदरगाह पर उतरने के बावजूद अडानी वैसे ही मासूम हैं जैसे इस देश मे सब कुछ गलत होने पर भी प्रधान सेवक जी बेदाग और मासूम बने रहते हैं।
मगर आर्यन खान के जरा से नशे के पीछे शाहरुख खान को अपना और पुरखों का हिसाब देने की जरूरत है और ऐसा हिसाब माँगने वालों के पास झाँकने के लिए गिरेबाँ भी नहीं है।
-सुबीर भौमिक
माना जा रहा है कि बांग्लादेश की सत्तारूढ़ अवामी लीग सरकार ने 1972 के धर्मनिरपेक्ष संविधान की वापसी का फ़ैसला कर लिया है और इसके साथ ही राष्ट्रीय धर्म के तौर पर इस्लाम की मान्यता खत्म कर दी जाएगी। ये फैसला ऐसे वक्त में लिए जाने की चर्चा है जब देश में ईशनिंदा की अफवाहों को लेकर हिंदुओं पर हमले हो रहे हैं। 13 अक्टूबर से शुरू हुए ऐसे हमलों में अब तक आठ लोगों की मौत हुई है और सैकड़ों हिंदुओं के घर और दर्जनों मंदिरों में तोडफ़ोड़ की घटनाएं सामने आ रही हैं।
कट्टरपंथी इस्लाम समर्थकों ने अवामी लीग सरकार को धमकी देते हुए कहा है कि अगर 1972 के धर्मनिरपेक्ष संविधान को वापस लाने के लिए प्रस्तावित विधेयक को संसद में पेश किया तो और अधिक हिंसा होगी। साल 1988 में सैन्य शासक एचएम इरशाद ने इस्लाम को राष्ट्रीय धर्म घोषित किया था।
यहां तक कि ढाका शहर के पूर्व मेयर सईद खोकोन जैसे कुछ अवामी लीग के नेताओं ने भी सूचना मंत्री मुराद हसन की उस घोषणा का विरोध किया है जिसमें उन्होंने कहा कि बांग्लादेश एक धर्मनिरपेक्ष देश है और राष्ट्रपिता शेख़ मुजीबुर्रहमान द्वारा बनाए गए 1972 के संविधान की देश में वापसी होगी।
सईद खोकोन ने इस फैसले के समय पर सवाल उठाते हुए कहा है कि ‘ये आग में धी का काम करेगा।’
मुराद हसन ने कहा कि ‘हमारे शरीर में स्वतंत्रता सेनानियों का खून है, किसी भी कीमत पर हमें 1972 के संविधान की ओर वापस जाना होगा। संविधान की वापसी के लिए मैं संसद में बोलूंगा...कोई नहीं बोलेगा तो भी मुराद संसद में बोलेगा।’
सूचना मंत्री मुराद हसन ने एक सार्वजनिक आयोजन में कहा, ‘मुझे नहीं लगता कि इस्लाम हमारा राष्ट्रीय धर्म है। हम 1972 का संविधान वापस लाएंगे। हम बिल को प्रधानमंत्री शेख हसीना के नेतृत्व में संसद में अधिनियमित करवाएंगे। जल्द ही हम 1972 के धर्मनिरपेक्ष संविधान को फिर अपनाएंगे।’
अगर ऐसा होता है तो आने वाले वक्त में 90 प्रतिशत से अधिक मुस्लिम आबादी वाले बांग्लादेश का राजकीय धर्म इस्लाम नहीं होगा।
ऐलान का विरोध और हिंसा की धमकी
जमात-ए-इस्लामी और हिफाजत-ए-इस्लाम जैसे कट्टरपंथी समूहों के मौलवियों ने धमकी दी कि अगर ऐसा कोई बिल पेश किया गया तो एक खूनी अभियान शुरू हो जाएगा।
हिफाजत के महासचिव नुरुल इस्लाम जिहादी ने कहा है, ‘इस्लाम राज्य धर्म था, यह राज्य धर्म है, यह राज्य धर्म रहेगा। इस देश को मुसलमानों ने आजाद किया और उनके धर्म का अपमान नहीं किया जा सकता। इस्लाम को राजकीय धर्म बनाए रखने के लिए हम हर बलिदान देने को तैयार हैं।’
यहां तक कि पूर्व मेयर खोकोन जैसे अवामी लीग के नेताओं ने भी मुराद हसन की घोषणा का विरोध इस आधार पर किया है कि ‘पार्टी के भीतर इस पर विस्तार से चर्चा नहीं की गई।’
कुछ लीग के नेता ये भी मानते हैं कि ‘मुराद हसन का कद बतौर नेता इतना बड़ा एलान करने योग्य नहीं है और अगर वो ये कर रहे हैं तो उन्हें प्रधानमंत्री शेख़ हसीना का पूरा समर्थन है।’
नाम न छापने की शर्त पर एक शीर्ष अवामी लीग नेता ने कहा, ‘अगर इस तरह की घोषणा से पहले शेख़ हसीना को इसकी जानकारी नहीं होती, वो भी ऐसे समय में जब देश में हिंदुओं के खिलाफ इतनी हिंसा हो रही है, तो निश्चित रूप से मुराद हसन को पार्टी हाईकमान से डांट मिलती। चूंकि ऐसा नहीं हुआ है, इसलिए यह मानना उचित होगा कि प्रधानमंत्री ने इस फैसले को हरी झंडी दे दी है।’
मुराद हसन ने ये घोषणा 14 अक्टूबर को की। इससे ठीक एक दिन पहले मुस्लिम भीड़ ने कुमिल्ला, चांदपुर, फेनी, नोआखाली और चटगांव में हिंदू मंदिरों पर हमला किया। दरअसल एक हिंदू भगवान के चरणों में इस्लाम के धार्मिक ग्रंथ कुरान की एक तस्वीर फेसबुक पर वायरल हुई जिसके बाद हिंसा शुरू हुई।
ये हिंसा 23 जि़लों में फैल गई जिसे देखते हुए पीएम शेख़ हसीना को दंगों को नियंत्रित करने के लिए सीमा रक्षक सैनिकों और एलीट रैपिड एक्शन बटालियन (आरएबी) की इकाइयों की तैनाती करनी पड़ी।
पुलिस ने साढ़े तीन सौ से अधिक दंगाइयों को गिरफ्तार किया जिनमें कुमिल्ला के वो दो दुकानदार भी शामिल है जिन्होंने कथित तौर पर कुरान को हिंदू देवता के चरणों में रखा था और फिर इस तस्वीर को वायरल किया।
इनमें से एक फोयाज अहमद हैं जिन्होंने कई सालों तक सऊदी अरब में नौकरी की और फिर बांग्लादेश आकर अपना बिजनेस शुरू किया।
अवामी लीग ने बीएनपी और जमात ए इस्लामी जैसे इस्लामी विपक्षी दलों पर धार्मिक दंगों को भडक़ाने और हिदुओं के बड़े त्योहार दुर्गा पूजा को बाधित करने का आरोप लगाया है।
धर्मनिरपेक्ष देश से कैसे इस्लामिक देश बना बांग्लादेश
अवामी लीग की कोमिल्ला महिला विंग की नेता आयशा ज़मान ने बीबीसी को बताया, ‘हिन्दू भगवान के चरणों में जो कुरान रखी गई वह सऊदी अरब में छपी थी। बीएनपी के मेयर मोनिरुल इस्लाम सक्कू और व्यवसायी फोयाज ने इसे इकबाल हुसैन की मदद से हिंदू देवता के कदमों में रखा। सीसीटीवी फुटेज में इकबाल ऐसा करते हुए दिख रहा है। यह मुसलमानों को उकसाने का एक सुनियोजित प्रयास था।’
आज से पांच साल पहले नासिरनगर में भी इसी समय के आस-पास सोशल मीडिया का इस्तेमाल इस तरह की तस्वीर वायरल करने के लिए किया गया था।
1971 में जब बांग्लादेश बना तो इसकी पहचान एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र के रूप में बनी और इसका आधार बंगाली सांस्कृतिक और भाषाई राष्ट्रवाद रहा, जिसने पाकिस्तान की रूढि़वादी इस्लामी प्रथाओं को समाप्त किया।
1972 में लागू हुए बांग्लादेश के संविधान ने सभी धर्मों की समानता को सुनिश्चित किया। लेकिन पाकिस्तान से आजादी के महज चार साल बाद यहां एक खूनी तख्तापलट हुआ और देश के संस्थापक शेख मुजीबुर्रहमान की उनके परिवार के साथ हत्या कर दी गई। केवल दो बेटियां वर्तमान प्रधानमंत्री शेख हसीना और उनकी बहन शेख रेहाना बच गईं।
सैन्य शासक जनरलों जियाउर्रहमान और एच एम इरशाद ने जमात ए इस्लामी जैसी इस्लामिक पार्टियों को समर्थन दिया। उन्हें चुनाव आयोग के साथ पंजीकरण करने की अनुमति दी और इस्लाम को राजकीय धर्म के रूप में स्थापित किया।
सैन्य तख़्तापलट पर किताब ‘मिडनाइट मैसेकर’ के लेखक सुखरंजन दासगुप्ता कहते हैं, ‘सैन्य शासक अवामी लीग को हाशिए पर लाना चाहते थे इस प्रयास में अवामी लीग के खिलाफ एक राजनीतिक आधार बनाने की कोशिश हुई। उन्होंने अवामी लीग के बंगाली राष्ट्रवाद का मुक़ाबला करने के लिए पाकिस्तान के तरह की इस्लामवादी राजनीति का विकल्प चुना। जिय़ा और इरशाद दोनों ने ऐसी पार्टियां बनाईं जिन्होंने धार्मिक कार्ड खेला।
अवामी युवा नेता और ‘डिजिटल बांग्लादेश’ के आयोजक सूफ़ी फ़ारूक़ कहते हैं, ‘इरशाद शराब पीने और महिलाओं के प्रति अपने रुझान के लिए जाने जाते थे, उन्होंने शायद ही कभी प्रार्थना की होगी। उन्होंने कुछ कविताएँ लिखीं। लेकिन उनके लिए इस्लाम एक राजनीतिक उपकरण था जैसे कि जिन्ना के लिए था जो सूअर का मांस खाते थे और स्कॉच व्हिस्की पीते थे और शायद ही कभी नमाज़ पढ़ी।’
‘सैन्य शासन के दो दशक के दौरान और सत्ता में बीएनपी और जमात ए इस्लामी गठबंधन सरकार की अवधि में (1991-1996 और 2001- 2006) हिंदुओं को भारी उत्पीडऩ का सामना करना पड़ा और हजारों लोगों ने भारत में शरण ले ली। बांग्लादेश की 22 प्रतिशत आबादी वाले हिंदू, साल 2010 की जनगणना में 10 प्रतिशत से भी कम हो गए।’
‘लेकिन बांग्लादेश सांख्यिकी विभाग के अनुसार, अवामी लीग के शासन के पिछले दस वर्षों में हिंदुओं की आबादी 12 प्रतिशत हो गई है। ये बताता है कि हिंदुओं का पलायन कम हो गया है।’
‘चुनाव के वक्त हिंदुओं के खिलाफ होती है हिंसा’
पूर्व सूचना मंत्री तराना हलीम का कहना है कि देश का इस्लामी माहौल चुनावों में हिंदुओं को निशाना बनाता है। वह कहती हैं, ‘दुर्गा पूजा के दौरान हुई इस हिंदू विरोधी हिंसा को उसी संदर्भ में देखा जाना चाहिए। अफगानिस्तान में तालिबान की वापसी से इस्लामवादियों को बढ़ावा मिला है, लेकिन दिसंबर 2023 में होने वाले संसदीय चुनावों में अवामी लीग की ही दोबारा जीत होगी।’
प्रधानमंत्री के विशेष सहायक और वर्तमान समय में ऑक्सफोर्ड फेलो बैरिस्टर शाह अली फराद कहते हैं, ‘ये शर्मनाक है, हमें हर कीमत पर हिंदुओं की रक्षा करनी होगी।’
यही कारण है कि प्रधानमंत्री शेख हसीना ने संभवत: 1972 के धर्मनिरपेक्ष संविधान की वापसी की योजना बनाई है। (bbc.com/hindi)
-सनियारा खान
लोकतंत्र में कोई भी जायज मांगों को लेकर आंदोलन कर सकता है और करना भी चाहिए, क्योंकि विरोध को लोकतंत्र का एक मजबूत अंग माना जाता है। लेकिन ऐसी किसी आंदोलन में अगर कोई वरिष्ठ शिक्षिका को सबके सामने बुरी तरह अपमानित किया जाए, वह भी उन्हीं छात्रों द्वारा जिन्हें वह शिक्षिका अब तक शिक्षा देती आ रही है। फिर तो ये बात पूरे देश के लिए सोचने वाली है। ऐसी घटना शिक्षा जगत में एक कलंक है।
अभी-अभी 5 सितम्बर को ही हम लोगों ने शिक्षक दिवस मनाकर सभी गुरुजनों को भरपूर सम्मान दिया और इसी 11 अक्टूबर को असम में फिलोबारी नामक जगह पर एक सीनियर सेकेंडरी स्कूल के छात्रवर्ग फीस वृद्धि के खिलाफ विरोध-प्रदर्शन कर रहे थे। शिक्षकों ने प्रदर्शन छोडक़र कक्षा में जाने को कहा। वरिष्ठ शिक्षिका निरदा बोरा आगे बढक़र उन्हें कठोर शब्द में विरोध बंद कर कक्षा में जाने को कहा। इसके तुरंत बाद सभी छात्र उक्त शिक्षिका का नाम लेकर भौंडे तरीके से नारेबाजी करने लगे। साथ ही उन्हें छात्रों के सामने घुटने टेककर माफी मांगने के लिए मजबूर किया गया। गलती चाहे जिस किसी की हो, एक वयोवृद्ध शिक्षिका को इस तरह अपमानित होते देखना यही दर्शाता है कि देश सच में बदल रहा है। जिन छात्र और छात्र नेताओं ने एक शिक्षिका को इस तरह अपमानित किया, उन्हें कुछ संगठनों से संरक्षण प्राप्त था।
ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन (आसू) का जिला स्तर का एक नेता भी इस घटना शामिल था। इस घटना के तुरंत बाद पार्टी ने उस नेता को निष्कासित कर दिया। न सिर्फ घुटने टेककर, बल्कि जमीन पर लेटकर छात्रों से माफी मांगने वाली एक शिक्षिका को देखकर सभी लोग हैरान रह गए थे। इतना ही नहीं, इस घटना का वीडियो बनाकर वायरल भी किया गया है।
समाज को गढऩे का काम करने वाली किसी शिक्षिका के साथ कोई ऐसा कैसे कर सकता है? शिक्षिका निरदा बरा पिछले 25 सालों से बच्चों को शिक्षा देने का काम कर रही हैं। रिटायरमेंट के लिए मुश्किल से शायद 7-8 साल ही बचे हैं। ये घटना बदलते समाजिक मानसिकता को दिखाकर हमें डरा रही है। लोगों को आक्रोशित होते देखकर बाद में बहुत से संगठनों के नेता और छात्र उस शिक्षिका के आवास पर जाकर उनसे माफी मांगी। लेकिन अब माफी मांगने से भी उस शिक्षिका के लिए सब कुछ सामान्य नहीं हो सकता है। कानून भी उन्हें सहायता करेगा तो भी क्या वह भूल पाएगी कि उन्होंने जिन छात्रों को सम्मान से जीने के लिए शिक्षा दी, उन्हीं छात्रों ने उन्हें सभी के सामने अपमानित किया। लगता तो यही है कि कुछ छात्र और छात्र नेता राजनीति करने वाले नेताओं से यही सीख रहे हैं कि मान से ज्यादा अपमान करने वाले ही आज प्रचार में रहते हैं।
बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक
ढाई महिने से गिरती-लुढ़कती हमारी विदेश नीति अपने पावों पर खड़े होने की कोशिश कर रही है, यह बात मेरे लिए विशेष खुशी की है। मैं बराबर पहले दिन से ही लिख रहा था कि भारत सरकार को तालिबान से सीधे बात करनी चाहिए लेकिन नौकरशाहों के लिए कोई भी पहल करना इतना आसान नहीं होता, जितना कि किसी साहसी और अनुभवी नेता के लिए होता है। जो भी हो, इस समय दो सकारात्मक घटनाएं हुई हैं। पहली, मास्को में तालिबान के साथ हमारी सीधी बातचीत और दूसरी, अमेरिका, इस्राइल, यूएई तथा भारत के नए नए चौगुटे की शुरुआत!
जहां तक मास्को-बैठक का सवाल है, उसमें रूसी विदेश मंत्री सर्गेइ लावरोव ने साफ़-साफ़ कहा है कि तालिबान की सरकार और नीतियां सर्वसमावेशी होनी चाहिए। उनमें सारे कबीलों और लोगों को ही प्रतिनिधित्व नहीं मिलना चाहिए, बल्कि विभिन्न राजनीतिक शक्तियों का भी उसमें समावेश होना चाहिए याने हामिद करजई और अब्दुल्ला-जैसे नेताओं को भी शासन में भागीदारी मिलनी चाहिए अर्थात तालिबान सरकार में कुछ अनुभवी और जनता में लोकप्रिय तत्व भी होने चाहिए। इसके अलावा लावरोव ने इस बात पर भी जोर दिया कि अब अफगानिस्तान के पड़ौसी देशों में आतंकवाद का निर्यात कतई नहीं होना चाहिए। इस बैठक में चीन, पाकिस्तान और ईरान समेत 10 देश शामिल हुए थे। रूस ने वही बात इस बैठक में कही, जो भारत कहता रहा है। भारत के प्रतिनिधि जे.पी.सिंग ने, जिन्हें काबुल में कूटनीति का लंबा अनुभव है, मास्को आए तालिबान नेताओं से खुलकर बात भी की और अफगान जनता की मदद के लिए पहले की तरह 50 हजार टन अनाज और दवाइयाँ भेजने की भी घोषणा की।
यदि अगले कुछ हफ्तों में तालिबान सरकार का बर्ताव ठीक-ठाक दिखा तो कोई आश्चर्य नहीं कि उसे अंतरराष्ट्रीय मान्यता मिलनी शुरु हो जाए। लेकिन गृहमंत्री सिराजुद्दीन हक्कानी ने कल-परसों ही तालिबानी खीर में कुछ नीम की पत्तियां डाल दी हैं। उन्होंने ऐसे 'शहीदोंÓ का सम्मान किया है और उनके परिजन को कुछ धनराशि भेंट की है, जिन्होंने पिछली सरकार के फौजियों और नेताओं पर जानलेवा हमले किए थे। ऐसी उत्तेजक कार्रवाई से उन्हें फिलहाल बचना चाहिए था। यदि भारत सरकार अपना दूतावास काबुल में फिर से खोल दे तो हमारे राजनयिक तालिबान को उचित सलाह दे सकते हैं। भारत ने अमेरिका के साथ मिलकर पश्चिम एशिया में जो चौगुटा बनाया है, वह अफगान-संकट के हल में तो मददगार होगा ही, इस्लामिक जगत से भी भारत के संबंध मजबूत बनाएगा, लेकिन भारत को दो बातों का ध्यान जरुर रखना होगा। एक तो वह अमेरिका का चप्पू होने से बचता रहे और दूसरा, इस नए चौगुटे को ईरान के खिलाफ मोर्चाबंदी न करने दे।
(नया इंडिया की अनुमति से)
-राघवेंद्र राव
साल 1975 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी के शासनकाल में देश में इमर्जेंसी लागू होने के साथ ही 21 महीनों का एक ऐसा दौर शुरू हुआ, जिसमें सरकार ने क़ानून के नाम पर भरपूर मनमानियाँ कीं।
यही वजह थी कि जब 1978 में इंदिरा गांधी के सत्ता से बेदख़ल होने के बाद संविधान का 44वां संशोधन किया गया तो उसमें अन्य मुद्दों के साथ इस बात पर भी खास गौर किया गया कि भारतीय नागरिकों के स्वतंत्रता के अधिकार को और मजबूत बनाया जाए।
इसी मंशा से इस संशोधन में ये कहा गया कि प्रिवेंटिव डिटेंशन या एहतियातन हिरासत के कानून के तहत किसी भी व्यक्ति को दो महीने से ज़्यादा हिरासत में रखने की अनुमति तब तक नहीं दी जा सकती, जब तक एक एडवाइजरी या सलाहकार बोर्ड ऐसा करने के लिए ठोस और पर्याप्त कारण न दे।
इस क़ानून के दुरुपयोग को रोकने के इरादे से संविधान संशोधन में ये भी कहा गया कि एडवाइजरी बोर्ड का अध्यक्ष हाई कोर्ट का एक सेवारत न्यायाधीश होगा और इस बोर्ड का गठन उस उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश की सिफ़ारिशों के अनुसार किया जाएगा। संशोधन के अनुसार इस बोर्ड के अन्य सदस्य किसी भी उच्च न्यायालय के सेवारत या सेवानिवृत्त न्यायाधीश होंगे।

43 साल बाद भी संशोधन लागू नहीं
इस संविधान संशोधन के 43 साल गुजऱ जाने के बाद भी इसके प्रावधानों को लागू नहीं किया जा सका है क्योंकि इन 43 सालों में बनी किसी भी सरकार ने संशोधन की धारा तीन को प्रभावी करने के लिए नोटिफिकेशन जारी नहीं किया है।
अब भारत के 100 रिटायर्ड प्रशासनिक अधिकारियों ने केंद्रीय कानून मंत्री किरण रिजिजू को एक खुली चि_ी लिखकर कहा है कि सरकार इस धारा को प्रभावी बनाने की तारीख़ तय करे।
जिन लोगों ने इस चिट्ठी पर दस्तख़त किए हैं उनमें पूर्व विदेश सचिव श्याम सरन, इंटेलिजेंस ब्यूरो और रॉ के पूर्व वरिष्ठ अधिकारी एएस दुलत, पूर्व मुख्य सूचना आयुक्त वजाहत हबीबुल्लाह, प्रधानमंत्री के पूर्व सलाहकार टीकेए नायर और पूर्व गृह सचिव जीके पिल्लई जैसे बड़े नाम शामिल हैं।
ये सेवानिवृत अधिकारी कॉन्स्टिटूशन कंडक्ट ग्रुप के सदस्य हैं और अपनी चिट्ठी में उन्होंने लिखा है कि उनका ‘किसी भी राजनीतिक दल से कोई संबंध नहीं है’ लेकिन वे भारत के संविधान के अनुरूप निष्पक्षता, तटस्थता और प्रतिबद्धता में विश्वास करते हैं।
कानून मंत्री को लिखी अपनी चिट्ठी में इस समूह ने कहा है कि वर्तमान में कोई भी वकील जो किसी उच्च न्यायालय के न्यायाधीश बनने के योग्य है, उसे सलाहकार बोर्ड में नियुक्त किया जा सकता है और इसका मतलब यह है कि दस वर्ष या उससे अधिक अनुभव वाला कोई भी वकील सलाहकार बोर्ड में बैठ सकता है।
इन सेवानिवृत अधिकारियों का कहना है कि ‘इस प्रकार यह प्रावधान सरकारी दुरुपयोग की चपेट में है, जो बोर्ड में तटस्थ, स्वतंत्र सदस्यों को नियुक्त करने के बजाय, अपनी पसंद के व्यक्तियों को नियुक्त कर सकते हैं, जिनमें सत्ता या राजनीतिक दल के प्रति निष्ठा रखने वाले भी शामिल हैं।’
चिट्ठी में कहा गया है कि इस अधिसूचना को जारी करने में 43 वर्षों की देरी की वजह से मानवाधिकारों का घोर उल्लंघन हुआ है।

क्या है प्रिवेंटिव डिटेंशन?
एहतियातन हिरासत का मतलब ये है कि पुलिस किसी भी व्यक्ति को इस शक के आधार पर हिरासत में ले सकती है कि वो अपराध करने वाला है।
भारत के संविधान के अनुच्छेद 22 के अनुसार गिरफ्तार किए गए किसी भी व्यक्ति को ऐसी गिरफ्तारी के कारणों के बारे में जल्द से जल्द सूचित किए बिना हिरासत में नहीं रखा जाएगा और न ही उसे परामर्श करने और बचाव करने के अधिकार से वंचित किया जाएगा।
साथ ही, ये अनुच्छेद ये भी कहता है कि गिरफ्तार किए गए और हिरासत में लिए गए प्रत्येक व्यक्ति को गिरफ्तारी के स्थान से मजिस्ट्रेट की अदालत तक यात्रा के लिए आवश्यक समय को छोडक़र ऐसी गिरफ्तारी के चौबीस घंटे की अवधि के भीतर निकटतम मैजिस्ट्रेट के सामने पेश किया जाएगा और ऐसे किसी भी व्यक्ति को मैजिस्ट्रेट के आदेश के बिना 24 घंटे के बाद हिरासत में नहीं रखा जाएगा।
लेकिन संविधान का अनुच्छेद 22 ये साफ़ कहता है कि ये प्रावधान उस व्यक्ति पर लागू नहीं होंगे जिसे एहतियातन हिरासत में लिया गया है।
इसका सीधा मतलब ये है कि पुलिस को एहतियातन हिरासत में लिए गए व्यक्ति को न तो कारण बताने की ज़रूरत है, न ही उसे वकील से परामर्श करने देने की ज़रूरत है और न ही मैजिस्ट्रेट के सामने 24 घंटे में पेश करने की ज़रूरत होती है।
क्या कहता है सुप्रीम कोर्ट?
इसी साल अगस्त में एक मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि प्रिवेंटिव डिटेंशन या एहतियातन हिरासत ‘केवल सार्वजनिक अव्यवस्था को रोकने के लिए एक आवश्यक बुराई है।’
साथ ही, अदालत ने ये भी कहा था कि सरकार को कानून-व्यवस्था की समस्याओं से निपटने के लिए मनमाने ढंग से एहतियातन हिरासत का सहारा नहीं लेना चाहिए और ऐसी समस्याओं को सामान्य क़ानूनों से निपटाया जा सकता है।
सुप्रीम कोर्ट ने ये भी कहा था कि नागरिक की स्वतंत्रता एक सबसे महत्वपूर्ण अधिकार है जिसे हमारे पूर्वजों ने लंबे, ऐतिहासिक और कठिन संघर्षों के बाद जीता है और एहतियातन हिरासत की सरकार की शक्ति को बहुत सीमित होनी चाहिए।
क्या कहते हैं आंकड़े?
राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो की ताजा रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2020 में कुल 89,405 लोगों को विभिन्न कानूनों के तहत प्रिवेंटिव डिटेंशन में रखा गया। इसमें से 68,077 व्यक्तियों को एक महीने में, 2,651 व्यक्तियों को एक से तीन महीने के बीच और 4,150 व्यक्तियों को तीन से छह महीने के बीच एडवाइजरी बोर्ड की सिफारिश पर रिहा किया गया। फिर भी वर्ष के अंत में 14,527 व्यक्ति फिर भी प्रिवेंटिव डिटेंशन में रहे।
लोगों को प्रिवेंटिव डिटेंशन में रखने के लिए जिन कानूनों का इस्तेमाल हुआ उनमें मुख्यत: राष्ट्रीय सुरक्षा कानून, कालाबाजारी की रोकथाम का कानून, आवश्यक सेवा रखरखाव अधिनियम और गुंडा एक्ट शामिल थे।
अगस्त 2019 में जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 370 हटाए जाने के बाद से सैकड़ों लोगों को एहतियातन हिरासत में रखा जा चुका है।
आलोचकों का कहना है कि इन क़ानूनों का दुरुपयोग करके लोगों को हिरासत में ले लिया जाता है और बिना किसी सुनवाई के उनकी आजादी छीन ली जाती है। वे कहते हैं कि इस मनमानी पर अदालतें कभी-कभी ही सख़्त रवैया अपनाती हैं।
इस साल अप्रैल में छपी एक पड़ताल में अंग्रेजी अख़बार ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ ने पाया कि जनवरी 2018 और दिसंबर 2020 के बीच इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने नेशनल सिक्यॉरिटी एक्ट या राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम के तहत एहतियातन हिरासत को चुनौती देने वाली 120 बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिकाओं पर फ़ैसला सुनाया और 94 मामलों में जि़लों में डीएम के आदेशों को रद्द करते हुए बंदियों को रिहा करने का आदेश दिया।

रूल ऑफ़ लॉ के खिलाफ
सेवानिवृत आईएएस अधिकारी वजाहत हबीबुल्लाह भारत के पहले मुख्य सूचना आयुक्त थे। वे राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग के अध्यक्ष भी रह चुके हैं।
हबीबुल्लाह उन 100 पूर्व अधिकारियों में शामिल हैं जिन्होंने कॉन्स्टिटूशनल कंडक्ट ग्रुप की इस मसले पर लिखी चि_ी पर दस्तखत किए हैं।
हबीबुल्लाह ने बीबीसी से बात करते हुए कहा कि एहतियातन हिरासत के प्रावधान असंवैधानिक है क्योंकि इन पर रूल ऑफ लॉ या कानून के शासन के सिद्धांत लागू नहीं होते और इनका दुरुपयोग होता है।
वे कहते हैं, ‘हम अपने अनुभव के आधार पर कहना चाहते हैं कि इन चीजों की आवश्यकता लोकतंत्र में नहीं है। अगर हम खुद को दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र समझते हैं तो इस तरह के कानून हमारे विचार में अनुचित हैं।’
हबीबुल्लाह का कहना है कि इस तरह के कानूनों की जरूरत तब थी जब भारत एक नए राष्ट्र के तौर पर उभर रहा था और बहुत सारी सुरक्षा की चुनौतियाँ थीं। ‘हम ये नहीं कहते कि ऐसे कानूनों के पीछे देश की सुरक्षा से जुड़े कारण गलत हैं। लेकिन अब ऐसे कानूनों की जरूरत नहीं रही है।’
वे मानते हैं कि सर्वोच्च न्यायलय ने भी इन कानूनों को जायज ठहराया है लेकिन उनका कहना है कि ‘ये सब होते हुए भी हम अपने अनुभव के आधार पर ये कहना चाहते हैं कि अब एक लोकतंत्र के लिए ये अनुचित है क्यूंकि ये रूल ऑफ लॉ का उल्लंघन है।’
विरोध करने वालों को चुप कराने की कोशिश
रेबेका जॉन सुप्रीम कोर्ट में वरिष्ठ वकील हैं। बीबीसी से बात करते हुए उन्होंने कहा कि उन्हें ये समझ नहीं आता कि एक लोकतांत्रिक देश में एहतियातन हिरासत जैसे कानून कैसे हो सकते हैं।
वे कहती हैं, ‘मुझे लगता है कि ये बात क़ानूनी और संवैधानिक दृष्टि से घिनौनी है। सलाहकार बोर्डों की जो भी खामियां हों, तथ्य यह है कि एक रोकथाम के उपाय के रूप में मैजिस्ट्रेट के सामने पेश किए बिना लोगों को हिरासत में लेने की शक्ति का इस तरह से दुरुपयोग नहीं किया जाना चाहिए।’
जॉन कहती हैं कि नजरबंदी के क़ानून को ‘दिक्कत पैदा करने वाले लोगों’ को एहतियातन हिरासत में लेने के लिए इस्तेमाल किया जाता है। ‘दिक्कत पैदा करने वालों से मेरा आशय ऐसे लोगों से है जो किसी भी प्रकार के उत्पीडऩ के खिलाफ आवाज उठाते हैं।’
वे कहती हैं कि सलाहकार बोर्ड अपना काम करे या नहीं, लेकिन अंतत: इन एहतियातन हिरासत के आदेशों हाई कोर्ट रद्द कर देता है क्योंकि वे न्यायिक जांच में खरे नहीं उतरते।
जॉन के मुताबिक सलाहकार बोर्डों के सदस्यों की नियुक्ति की प्रणाली का पारदर्शी न होना एक समस्या है। वे कहती हैं, ‘समस्या इस तथ्य से उपजी है कि आपके पास एहतियातन हिरासत के कानून हैं, और फिर इन क़ानूनों को सही ठहराने के लिए सरकार वह सब कुछ करेगी जो वह कर सकती है।’
जॉन कहती हैं कि एडवाइजरी बोर्ड की भूमिका यह होती है कि वह गैर जरूरी इस्तेमाल और दुरुपयोग को रोके लेकिन वे ऐसा कभी नहीं करते। उनके अनुसार मूल समस्या ये है कि आजादी के 74 साल बाद भी एहतियातन हिरासत के कानूनों की आवश्यकता क्यों है?
वे कहती हैं, ‘ऐसे कानून पुराने दौर की विरासत हैं। हैरानी की बात यह है कि सुप्रीम कोर्ट ने इसकी संवैधानिक वैधता को बरकरार रखा है।’
निष्पक्षता सिर्फ कागज पर
जॉन का कहना है कि चूँकि किसी की नजरबंदी की पुष्टि करनी होती है इसलिए कागज पर ये सलाहकार बोर्ड निष्पक्ष दिखते हैं लेकिन व्यवहार में ये बोर्ड केवल नजरबंदी का ही समर्थन करते हैं।
वे कहती हैं, ‘कुल मिलाकर नजरबंदी की पुष्टि करने की प्रक्रिया निष्पक्ष और स्वतंत्र नहीं है। एहतियातन कानूनों में ज्यादातर देखा गया है कि दुरुपयोग रोकने की जि़म्मेदारी वाले लोग अपना काम नहीं करते।
बड़ा सवाल यह है कि संवैधानिक संशोधन के 43 साल बाद भी आज तक किसी सरकार न इन बदलावों को लागू क्यों नहीं किया?
जॉन कहती हैं, ‘इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि कौन-सी सरकार सत्ता में है लेकिन ये साफ है कि इस मसले में बहुत स्पष्ट राज्य हित शामिल है, सभी सरकारें ऐसे कानूनों को पसंद करती हैं, जिनका व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर सीधा असर पड़ता है। आप देखिए कि कश्मीर में इसका इस्तेमाल कैसे किया गया, खासकर अनुच्छेद 370 हटने के बाद।’
वे मानती हैं कि एहतियातन हिरासत के कानून और उन्हें असंवैधानिक घोषित करने में अदालतों की विफलता स्वतंत्र भारत की संवैधानिक स्थिति पर एक धब्बा है। (bbc.com/hindi)
बेबाक विचार : डॉ. वेदप्रताप वैदिक
पिछले ढाई महिने से हमारी विदेश नीति बगले झांक रही थी। मुझे खुशी है कि अब वह धीरे-धीरे पटरी पर आने लगी है। जब से तालिबान काबुल में काबिज हुए हैं, अफगानिस्तान के सारे पड़ौसी देश और तीनों महाशक्तियाँ निरंतर सक्रिय हैं। वे कुछ न कुछ कदम उठा रही हैं लेकिन भारत की नीति शुद्ध पिछलग्गूपन की रही है। हमारे विदेश मंत्री कहते रहे कि हमारी विदेश नीति है— बैठे रहो और देखते रहो की! मैं कहता रहा कि यह नीति है— लेटो रहो और देखते रहो की। चलो, कोई बात नहीं। देर आयद, दुरुस्त आयद! अब भारत सरकार ने नवंबर में अफगानिस्तान के सवाल पर एक बैठक करने की घोषणा की है। इसके लिए उसने पाकिस्तान, ईरान, उजबेकिस्तान, ताजिकिस्तान, चीन और रूस के सुरक्षा सलाहकारों को आमंत्रित किया है। इस निमंत्रण पर मेरे दो सवाल हैं।
पहला, यह कि सिर्फ सुरक्षा सलाहकारों को क्यों बुलाया जा रहा है? उनके विदेश मंत्रियों को क्यों नहीं? हमारे सुरक्षा सलाहकार की हैसियत तो भारत के उप-प्रधानमंत्री- जैसी है लेकिन बाकी सभी देशों में उनका महत्व उतना ही है, जितना किसी अन्य नौकरशाह का होता है। हमारे विदेश मंत्री भी मूलत: नौकरशाह ही हैं। नौकरशाह फैसले नहीं करते हैं। ये काम नेताओं का है। नौकरशाहों का काम फैसलों को लागू करना है। दूसरा सवाल यह है कि जब चीन और रूस को बुलाया जा रहा है तो अमेरिका को भारत ने क्यों नहीं बुलाया? इस समय अफगान-संकट के मूल में तो अमेरिका ही है। क्या अमेरिका को इसलिए नहीं बुलाया जा रहा है कि भारत ही उसका प्रवक्ता बन गया है? अमेरिकी हितों की रक्षा का ठेका कहीं भारत ने तो ही नहीं ले लिया है? यदि ऐसा है तो यह कदम भारत के स्वतंत्र अस्तित्व और उसकी संप्रभुता को ठेस पहुंचा सकता है। पता नहीं, पाकिस्तान हमारा निमंत्रण स्वीकार करेगा या नहीं? यदि पाकिस्तान आता है तो इससे ज्यादा खुशी की कोई बात नहीं है।
तालिबान के काबुल में सत्तारुढ़ होते ही मैंने लिखा था कि भारत को पाकिस्तान से बात करके कोई संयुक्त पहल करनी चाहिए। काबुल में यदि अस्थिरता और अराजकता बढ़ेगी तो उसका सबसे ज्यादा दुष्प्रभाव पाकिस्तान और भारत पर ही होगा। दोनों देशों का दर्द समान होगा तो ये दोनों देश मिलकर उसकी दवा भी समान क्यों न करें ? इसीलिए मेरी बधाई ! यदि तालिबान के सवाल पर दोनों देश सहयोग करें तो कश्मीर का हल तो अपने आप निकल आएगा। इस समय अफगानिस्तान को सबसे ज्यादा जरुरत खाद्यान्न की है। भुखमरी का दौर वहाँ शुरु हो गया है। यूरोपीय देश गैर-तालिबान संस्थाओं के जरिए मदद पहुंचा रहे हैं लेकिन भारत हाथ पर हाथ धरे बैठा हुआ है। इस वक्त यदि वह अफगान जनता की खुद मदद करे और इस काम में सभी देशों की अगुवाई करे तो तालिबान भी उसके शुक्रगुजार हो जाएंगे और अफगान जनता तो पहले से उसकी आभारी है ही। विभिन्न देशों के सुरक्षा सलाहकारों की बैठक में भारत क्या-क्या मुद्दे उठाए और उनकी समग्र रणनीति क्या हो, इस पर अभी से हमारे विचारों में स्पष्टता होनी जरुरी है।
(नया इंडिया की अनुमति से)
-प्रकाश दुबे
कोलंबो और रेडिओ सीलोन वाली लंका से परिचित लोग जानते होंगे कि भारत में कई जगह लंका होने का दावा किया जाता है। दावा तो रावण होने का भी किया जा सकता है। पौराणिक कालीन शबरी ने वर्तमान महाराष्ट्र में बेर खिलाए या गुजरात में? दावे करते रहें। नरेन्द्र मोदी सरकार आदिवासी बहुल डांग जिले में शबरी धाम बनवा चुकी है। शबरी के वंशज होने के दावेदार भूपेन्द्र पटेल सरकार की मेहरबानी से राम की अयोध्या मुफ्त में देख सकेंगे। भूपेन्द्र सरकार के पर्यटन मंत्री पूर्णेश मोदी ने रामजन्म भूमि दिखाने के लिए प्रत्येक आदिवासी को पांच हजार रुपए सरकारी खजाने से दिलाने का ऐलान कर दिया। पर्यटन के साथ पूर्णेश के पास तीर्थस्थान विकास का दायित्व भी है। इतनी राशि में पुष्पक विमान या उडऩ खटोले में नहीं बैठ सकते। फिलहाल आदिवासी सैलानियों को रेलगाड़ी या बस का ही आसरा है। पूर्णेश भाई की योजना में गुजरात के राम- कथा से जुड़े स्थलों में हर साल दशहरा मनाना शामिल है।
लड्डू प्रसाद
मंत्रियों की भरमार से कुछ लोगों को भ्रम हो सकता है कि केन्द्रीय मंत्रिमंडल की बैठक जम्मू-कश्मीर में तो नहीं है? होने को तो राष्ट्रपति भी थे। बहुत खुश थे। इससे पहले दो बार करगिल जाने की तैयारी से आते थे। कभी मौसम ने पानी फेर दिया कभी कुछ अलग संकट। तीसरी यात्रा में सफल रहे। इस खुशी में उन्होंने उपराज्यपाल मनोज सिन्हा को लड्डू भेंट किए। सारे लड्डू उप राज्यपाल ने गुपचुप अकेले नहीं खाए। उन्होंने कुछ पत्रकारों को लड्डू उत्सव में सहभागी बनाया। पत्रकारों से उपराज्यपाल की पहले से गहरी छनती है। नौकरशाह चेतावनी देते रहे। पद ग्रहण करने के बाद उन्होंने सारे पत्रकारों को बुलाकर बातचीत की। तीन मर्तबा मिल चुके हैं। केन्द्रशासित इकाई में सुरक्षा एजेंसियां चौकन्ना करती हैं। पत्रकार हैरान परेशान हैँ। आतंक से और कानून-कायदों की कड़ाई से भी। पत्रकार के टिफिन में बमगोला मिलने पर परेशानी सारे पत्रकार जगत को होती है। खबरों और खबरचियों के हालात बदलकर लड्डू की मिठास बढ़ाना आसान नहीं, और असंभव भी नहीं।
वाह रे शेर
इंसान को करिश्मा बनाने में छोटी सी भीड़ का हाथ रहता है। आम फहम भाषा में यूं समझें। नेता, अभिनेता आगे आगे। उनके आगे आगे चलने वाले बैंड बाजे की धुन पर या उसके बगैर जोर से चिल्लाते हैं-वाह रे शेर। आया रे शेर। नाचने गाने वाले शेरों से कभी कभार बब्बर शेर मुसीबत में फंस जाते हैं। मोठा भाई यानी तीसरे सरदार पटेल गृह मंत्री को वाह रे शेर वाले बैंड बाजे की जरूरत नहीं है। पणजी में अमित शाह ने कहा-मनोहर पर्रिकर के कार्यकाल में सर्जिकल स्ट्राइक हुआ। पर्रिकर ने बता दिया कि भारत को जवाब देना आता है। अमित भाई सरल-सुबोध हिंदी बोलते हैं। खबर भेजने वाले मेहरबान और गुजरात से लेकर उत्तर प्रदेश तक छापने वाले हितैषी कलमजीवियों ने मिर्च-मसाला मिलाया। सुर्खियों में खबरें छपीं-गृहमंत्री की चेतावनी। अगली स्ट्राइक। दुरुस्त कर देंगे—आदि-आदि। विदेश मंत्रालय, प्रधानमंत्री कार्यालय तक हलचल मची। साजिश की जांच की गई। निष्कर्ष-चापलूसों से बच कर रहें।
पहलगाम में भाईजान
सोमवार की सुहानी धूप में सलमान खान का जिक्र आते ही आपको हिरन से लेकर मुंबई के फुटपाथ तक बहुत कुछ याद आएगा। गाने, कुछ हीरोइनें। नीति आयोग के मुख्य कार्यकारी को बजरंगी भाईजान याद आया। सलमान की फिल्म की शूटिंग में अनंतनाग के पास हुई थी। योजना आयोग से लेकर नीति आयोग तक की यात्रा में अमिताभ ने दुनिया में प्रसिद्ध हिंगुल हिरण से लेकर बहुत कुछ देखा है। अकेले भी। सपरिवार भी। दर्जनों सरकारी और असरकारी योजनाओं, संस्थानों और विभागों में जिम्मेदारियां संभल रहे कांत ने नीति आयोग में पांच वर्ष छह महीने पूरे किए हैं। भारत में बहुत अधिक लोकतंत्र पर फब्ती कसकर कांत ने बखेड़ा मोल लिया था।
बहरहाल लोकशाही का इतना फायदा तो है। जहां भी चले जाते हैं, किसी न किसी दायित्व से वहां का संबंध जुड़ता है। बजरंगी भाईजान में शामिल स्थल को देखने के लिए अमिताभ कांत आतुर थे। भारत के 50 प्रभावशाली नौकरशाहों में शामिल कांत प्रधानमंत्री के नवरत्नों में शामिल हों या नहीं, दस भरोसेमंदों में जरूर गिने जाते हैं। इसलिए उनकी जियारत मायने रखती है।
(लेखक दैनिक भास्कर नागपुर के समूह संपादक हैं)
-संध्या शैली
यूनेस्को की 2021 की भारत में शिक्षा की स्थिति पर तीसरी रिपोर्ट अभी हाल में जारी हुयी। इसे 5 अक्टूबर विश्व शिक्षक दिवस पर जारी किया गया। रिपोर्ट में भारत में शिक्षा की स्थिति की हालत का इस रिपोर्ट के शीर्षक से ही पता चल जाता है। ‘‘शिक्षक नहीं-कक्षाएं नहीं’’ इसमें बिलकुल भी अतिरंजना नहीं है। यह हमारे देश में शिक्षा की वास्तविक स्थिति है। मुंबई के टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज के शोधकर्ताओं द्वारा यूनेस्को के दिशा-निर्देश पर बनाई। यह रिपोर्ट हमारे देश की शिक्षा की दयनीय स्थिति को उजागर करने वाली है। शिक्षा के अधिकार का कानून पारित करने के बावजूद इस स्थिति का होना खराब बात ही कहा जाएगा।
इस रिपोर्ट के बाद यूनेस्को द्वारा दिए गए सुझाव गौरतलब हैं। यह रिपोर्ट बताती है कि आज भी इस देश में ग्रामीण और शहरी शिक्षा संस्थानों की गुणवत्ता में जमीन आसमान का अंतर है। मोदी सरकार की 2020 में पारित शिक्षा नीति की कड़ी आलोचना करते हुए यह रिपोर्ट कहती है कि आश्चर्य है कि जब सारे शिक्षा संस्थान कोरोना महामारी के चलते बंद थे तब यह नीति घोषित हुयी और स्कूलों-कॉलेजों के बंद रहते हुए ही इस साल उसका एक वर्ष मना भी लिया गया।
रिपोर्ट बताती है कि देश के 15 लाख 51 हजार स्कूलों में 96 लाख शिक्षक हैं। इनमें 50 प्रतिशत महिला शिक्षक हैं। मध्यप्रदेश में यही प्रतिशत 44 प्रतिशत है। 30 प्रतिशत से अधिक स्कूल शिक्षक उन निजी स्कूलों में हैं जिन्हें कोई सरकारी मदद नहीं मिलती है। केवल 50 प्रतिशत शिक्षक सरकारी स्कूलों में हैं।
मजेदार और सोचने वाली बात यह है कि शिक्षा जिसकी नींव पर पूरे समाज का ढांचा खड़ा होता है उसे निजी हाथों में देने की पैरवी करने वाली सरकार के आका अमरीका में भी सरकारी स्कूलों पर सबसे अधिक जोर दिया गया है और आज वहां पर सरकारी स्कूलों में पढ़ाने वाले शिक्षकों की संख्या 32 लाख और निजी स्कूलों के शिक्षकों की संख्या 4 लाख है।
रिपोर्ट के मुताबिक देश में एक लाख से अधिक स्कूल एक शिक्षक के भरोसे पर हैं। इसमें सबसे अधिक 21,077 स्कूल मध्य प्रदेश में हैं। यह कुल स्कूलों का 14 प्रतिशत का है। ये एक शिक्षक वाले 89 प्रतिशत स्कूल ग्रामीण इलाकों में हैं। और स्वाभाविक रूप से इन स्कूलों में किसी भी प्रकार की सुविधाओं के बारे में सोचा नहीं जा सकता है। यह इकलौते मास्साब भी स्कूल कितने दिन जा पाते होंगे क्योंकि उन्हीं पर सरकारी योजनाओं के आंकड़े इक_ा करने से लेकर सारे कामकाज का बोझा भी लदा हुआ है।
इस पूरी स्थिति वाले देश के मुकाबले केरल एकदम अलग दिखाई देता है जहां पर 88 प्रतिशत स्कूलों में, जिसमें 80 प्रतिशत ग्रामीण स्कूल भी शामिल हैं। इंटरनेट की सुविधा है, लाइब्रेरी है, 90 प्रतिशत से अधिक स्कूलों में मुफ्त किताबों का वितरण होता है। यहां पर 99 प्रतिशत में साफ पीने के पानी की सुविधा है, 98 प्रतिशत स्कूलों में लड़कियों के लिए अलग शौचालय है और 99 प्रतिशत स्कूलों में अबाध बिजली की सुविधा है। डिजिटल इंडिया का नारा देने वाली भाजपा के द्वारा शासित प्रदेशों के स्कूलों में इंटरनेट की स्थिति उनमें बिजली की उपलब्धता से देखी जा सकती है। मध्यप्रदेश के केवल 11 प्रतिशत स्कूलों में इंटरनेट की सुविधा है।
शिक्षा की स्थिति पर यूनेस्को की यह रिपोर्ट आंखें खोलने वाली है इसीलिये इतिहास की गलतियों से सबक लेकर इस दिशा में काम करना शुरू करना और स्थाई वैश्विक लक्ष्य 2030 हासिल करने की ओर बढऩा पूरे देश की जनता की जिम्मेदारी है।


