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छत्तीसगढ़ एक खोज : चौवनवीं कड़ी : प्रवीर चंद्र भंजदेव : एक अभिशप्त नायक या आदिवासियों के देव पुरुष
05-Feb-2022 1:49 PM
छत्तीसगढ़ एक खोज : चौवनवीं कड़ी  : प्रवीर चंद्र भंजदेव : एक अभिशप्त नायक या आदिवासियों के देव पुरुष

-रमेश अनुपम

आखिरकार 25 मार्च सन 1966 का दिन बस्तर के लिए ही नहीं समूचे देश के लिए एक शर्मसार कर देने वाला दिन साबित हुआ।

25 मार्च आजादी के उन्नीस वर्षों बाद ही देशी हुक्मरानों के असली चेहरों को उजागर कर देने वाला एक काला दिन सिद्ध हुआ।

इस दिन सत्ता का चरित्र साफ-साफ दिखाई दे रहा था और आदिवासी हितों की पैरवी करने का दिखावा करने वाला सत्ता का मुखौटा भी उतर चुका था।

बस्तर के आदिवासियों के हितों की लड़ाई लडऩे वाले प्रवीर चंद्र भंजदेव जैसे महाराजा की जरूरत कांग्रेस को नहीं थी। पंडित जवाहरलाल नेहरू जैसे उदारमना प्रधानमंत्री की मृत्यु भी सन 1964 में हो चुकी थी।

महाराजा प्रवीर चंद्र भंजदेव मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री द्वारका प्रसाद मिश्र की आंखों में पहले से ही खटक रहे थे। बस्तर के कांग्रेसी नेताओं के लिए तो शुरू से ही महाराजा प्रवीर चंद्र भंजदेव आंख की किरकिरी साबित हो रहे थे।

तो 25 मार्च सन 1966 की कहानी पहले ही लिखी जा चुकी थी, यहां तक कि पटकथा भी पहले से ही तैयार हो चुकी थी। केवल इसे अंजाम देना भर बाकी रह गया था।

25 मार्च की घटना के संबंध में यह भी सच है कि महाराजा प्रवीर चंद्र भंजदेव के अनुज विजय चंद्र भंजदेव को जब महल में उत्पन्न विषम परिस्थितियों की जानकारी मिली तो वे तुरंत राजमहल की ओर दौड़ पड़े थे , पर पुलिसवालों ने उन्हें राजमहल के भीतर प्रवेश करने नहीं दिया।

विजय चंद्र भंजदेव लगातार बुदबुदा रहे थे कि पुलिस उनके भाई को मार डालेगी। वे पुलिस वालों से बार-बार राजमहल के भीतर जाने और अपने भाई से मिलने के लिए अनुनय-विनय कर रहे थे, पर पुलिस वाले तो पुलिस वाले थे ।

 ऊपर से आला अधिकारियों का आदेश था कि राजमहल में परिंदे भी पर न मार पाएं क्योंकि आज जो कुछ भी राजमहल में होने जा रहा था उसकी भनक इंसान तो क्या परिंदे तक को भी न होने पाए ।

इसलिए महाराजा प्रवीर चंद्र भंजदेव के अनुज विजय चंद्र भंजदेव को भी भीतर नहीं जाने दिया गया। उन्हें मुख्य द्वार से ही वापस लौटा दिया गया था।
 
25 मार्च की सायंकाल चार बजे तक महाराजा प्रवीर चंद्र भंजदेव अपने राजमहल में जीवित थे।

25 मार्च को राजमहल के बाहर सशस्त्र पुलिस की अनेक टुकडिय़ां मौजूद थीं। बाहर लाउडस्पीकर पर घोषणा की जा रही थी कि आदिवासी राजमहल से बाहर निकल कर आत्मसमर्पण कर दें नहीं तो पुलिस को मजबूरन गोली चलानी पड़ेगी ।

 महाराजा प्रवीर चंद्र भंजदेव स्वयं राजमहल के भीतर पुलिस के डर से घुसे हुए आदिवासियों को अपने साथ बाहर निकालने लग गए थे ताकि कोई भी निर्दोष आदिवासी पुलिस की गोलियों का निशाना न बन सके।

वे सोच रहे थे कि पुलिस के सामने आत्मसमर्पण कर देने से भोले भाले आदिवासियों की जान बच जाएगी।

महाराजा इस मुश्किल समय में भी वे आदिवासियों की चिंता करना नहीं भूले थे।

महाराजा प्रवीर चंद्र भंजदेव किसी तरह आदिवासियों को समझा बुझा कर अपने साथ राजमहल के भीतर से बाहर लाए।

आदिवासी ज्यों ही राजमहल के भीतर से निकल कर बाहर आए पुलिस वालों ने उन्हें घेर लिया और लाठियों से पीटना शुरू कर दिया। यही नहीं देखते ही देखते ताबड़तोड़ गोलियों की बरसात भी शुरू हो गई ।

महाराजा प्रवीर चंद्र भंजदेव पुलिस की इस क्रूरता को देखकर दंग रह गए थे। वे यह सब अपनी आंखों से देखकर विचलित हो उठे थे।

आदिवासियों के लिए कुछ न कर पा सकने की असमर्थता उनके चेहरे पर साफ-साफ पर दिखाई देने लगी थी।

पुलिस जिस निर्ममता के साथ आदिवासियों को लाठियों से पीट रही थी वह उनके लिए कल्पनातीत था।

आजाद भारत में आजाद भारत की पुलिस अपने ही आदिवासी भाई बहनों पर लाठियां बरसा रही थीं ।

पुलिस की बंदूकें भी गूंजने लगी थी ।

 महाराजा प्रवीर चंद्र भंजदेव जैसे ही राजमहल के भीतर वापस जाने के लिए मुड़े कि पुलिस वालों ने उन पर भी गोली दाग दी। जैसे उन्हें महाराजा प्रवीर चंद्र भंजदेव का ही अब तक इंतजार रहा हो कि कब वे राजमहल के बाहर निकलें और उन्हें निशाना बनाकर गोली दागी जा सके ।

गोली महाराजा के पावों को निशाना बनाकर दागी गई थीं । गोली लगते ही महाराजा प्रवीर चंद्र भंजदेव लहुलुहान होकर लडख़ड़ाते हुए अपने शयनकक्ष की ओर भागे।

वे जैसे-तैसे घायल अवस्था में कराहते हुए खून से लथपथ शयनकक्ष तक पहुंचे।

अपने शयनकक्ष के भीतर पहुंचकर वे बिस्तर पर निढाल हो गए।

इससे पहले वे कुछ और सोच-समझ पाते कि दनदनाते हुए पुलिस की टुकड़ी उनके शयनकक्ष के भीतर घुस गई और बिस्तर पर निढाल महाराजा को गोलियों से छलनी कर दिया।

पुलिस ने अपनी इस बहादुरी के बाद शयनकक्ष से महाराजा के क्षत-विक्षत शव को किसी तरह ड्रॉइंग रूम में लाकर रख दिया ।

इसके बाद शयनकक्ष से खून और गोलियों के दाग मिटा दिए गए ताकि पुलिस के वहशी होने के सारे सबूत मिट जाए। सत्यमेव जयते’ ऐसे ही थोड़े पुलिस का लोगो माना जाता है ।


महाराजा के पुलिस की गोली से मारे जाने की सूचना पूरी रात लोगों से छिपा कर रखी गई।

लेकिन तब भी जगदलपुर की फिजाओं में महाराजा के गोली से मारे जाने की खबर लगभग फैल चुकी थी।

जगदलपुर और बस्तर ही नहीं पूरा देश इस जघन्य कांड को लेकर शर्मशार हो रहा था।

पर अभी महाराजा के मारे जाने की विधिवत सरकारी घोषणा होनी बाकी थी।

26 मार्च को दोपहर में प्रशासन की ओर से विजय चंद्र भंजदेव और शहर के कुछ प्रमुख नागरिकों और पत्रकारों को सूचना दी गई कि महाराजा प्रवीर चंद्र भंजदेव और तेरह आदिवासी पुलिस की गोलियों से मारे गए हैं।

दोपहर तीन बजे के आस-पास विजय चंद्र भंजदेव और कुछ गणमान्य नागरिकों को भीतर जाकर महाराजा के अंतिम दर्शन की अनुमति प्रदान की गई।  

शाम को महाराजा प्रवीर चंद्र भंजदेव की अंतिम यात्रा में थोड़े से लोगों को ही शामिल होने की अनुमति दी गई।

अंतिम यात्रा की खबर पाकर पूरा जगदलपुर शहर अपने प्रिय महाराजा को अंतिम विदाई देने उमड़ पड़ा था। अश्रूपूरित नयनों के साथ रास्ते के दोनों ओर लोग खड़े हुए थे।

लोग रो रहे थे, चीख रहे थे, विलाप कर रहे थे। उनके प्रिय महाराजा को पुलिस ने जो गोलियों से भून दिया था।

 वे रुंधे हुए गले से बस एक ही सवाल बार बार पूछ रहे थे कि महाराजा प्रवीर चंद्र भंजदेव जैसे देवता तुल्य महाराजा के साथ पुलिस और प्रशासन ने ऐसा बर्बरतापूर्ण व्यवहार क्यों किया ?

पुलिस और प्रशासन को ऐसे देव पुरुष पर गोलियां क्यों बरसानी पड़ी ?

क्या महाराजा प्रवीर चंद्र भंजदेव देशद्रोही थे या बस्तर के भोले भाले आदिवासियों को लूट रहे थे ?

आखिरकार उनका गुनाह क्या था ?


पर इस सवाल का जवाब किसी के पास नहीं था। इस गोली कांड के पचपन वर्ष बीत जाने के बाद भी क्या इसका जवाब आज भी किसी के पास है?

देर शाम सात बजे महाराजा प्रवीर चंद्र भंजदेव का अंतिम संस्कार किया गया।

लगभग इसी समय बी.बी.सी के माध्यम से पूरे देश और दुनिया ने जाना कि बस्तर के महाराजा प्रवीर चंद्र भंजदेव अपने राजमहल में पुलिस की गोलियों के शिकार हो गए हैं।

पर एक गंभीर सवाल तो अब भी बस्तर की खामोश फिजाओं में गूंज रहा था कि क्या महाराजा प्रवीर चंद्र भंजदेव के साथ केवल तेरह आदिवासी ही पुलिस की गोलियों के शिकार हुए थे ?

क्या 25 मार्च को पुलिस की गोलियों से मारे गए आदिवासियों की संख्यां सैकड़ों में नहीं थी ?

पर आदिवासियों को इंसान कौन मानता है ? अगर मानते तो क्या आज भी बस्तर के आदिवासी पुलिस और नक्सलियों की गोली के शिकार होने को मजबूर होते ?

(बाकी अगले हफ्ते)


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