विचार / लेख

भय की अपनी ही भाषा..
31-Jan-2022 5:24 PM
भय की अपनी ही भाषा..

-चैतन्य नागर

भय की अपनी ही भाषा होती है। अपना एक खास स्वाद और रंग। भय में फंसे मन में अँधेरा छा जाता है और कुछ भी नहीं सूझता। यह पंगु बना देता है। अँधेरे कमरे का भय, अकेले होने का भय, बीमार पडऩे का भय, इम्तेहान में फेल हो जाने का भय——न जाने कितनी तरह के भय हैं। यदि आप फोबिया के बारे में जानना चाहें तो आपको सैकड़ों ऐसे भयों की फेहरिश्त मिलेगी कि आप ताज्जुब में पड़ जायेंगें कि ऐसे-ऐसे  भय भी हुआ करते हैं। और ये सिर्फ नाम नहीं, इनसे लोग वास्तव में गुजरते हैं और इनकी भयावहता का पूरा अनुभव करते हैं। मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि सात साल की उम्र तक बच्चे का मस्तिष्क पूरा विकसित हो जाता है, उतना ही जितना कि किसी वयस्क का। पर सात साल की उम्र तक अपने विकसित होते मस्तिष्क में एक बच्चा अजीबो-गरीब भयों का अनुभव करता है। जऱा हम अपने बचपन तक जाने की कोशिश करें। तार पर टंगे कपड़ों के उडऩे का भय, आंधी में तेजी से हिलते पेड़ों का भय, किसी बालकनी के किनारे तक जाने का भय, छत से पंखे के टूट कर गिर जाने का भय, और न जाने कैसे कैसे भय! कुछ विचारक यह भी कहते हैं कि बुनियादी तौर पर इंसान में बस दो ही भाव होते हैं, भय और प्रेम। जब तक उसमे प्रेम का जन्म नहीं होता, वह भय की गिरफ्त में होता है! भय के साथ ही कई मनोदैहिक, भावनात्मक प्रतिक्रियाएं चलती हैं। इसकी श्रृंखलित प्रतिक्रियाएं भी होती हैं। क्रोध और हिंसा भी भय के चक्र का ही हिस्सा हैं। भयभीत इंसान को बहुत गुस्सा आ सकता है और वह इस गुस्से को हिंसात्मक तरीके से व्यक्त कर सकता है। भय के पीछे असुरक्षा का भाव भी प्रबल तरीके से काम करता है।

दरअसल हमें जिस तरह शिक्षित किया जाता है, चाहे घरों में या स्कूलों में, वहां हमें कभी भी यह नहीं सिखाया जाता कि भय से कैसे निपटें। और इसका परिणाम यही होता है कि चाहे हम कहीं भी चले जाएँ, किसी भी पेशे या नौकरी में जाएँ, एक तरफ बाहरी तरक्की करते चले जाते हैं, पर अपने पुराने और गहरे भावों को नहीं समझ पाते और ये भाव लगातार हमारे जीवन को जटिल बनाते चले जाते हैं। माँ-बाप और शिक्षकों के पास न ही धैर्य होता है, न ही समय और न ही इतनी प्रज्ञा कि वे इन मुद्दों पर खुद के साथ और बच्चों के साथ संवाद कर सकें। आम तौर पर हम भय को जीवन का हिस्सा मान लेते हैं और जब इसपर संवाद करते भी हैं तो अपने अपने भयों के उदाहरण देकर संतुष्ट हो जाते हैं। एक सीमा के बाद इस नासमझी की दीवार को हम भेद नहीं पाते।

बारहवीं कक्षा में पढने वाली एक छात्रा ने कहा- ‘मुझे अपनी उम्र के लोगों के साथ रहना अच्छा ही नहीं लगता क्योंकि मेरा अनुभव तो यही है कि मेरे दोस्त मुझे छोड़ देंगे और ऐसा मेरे साथ इतनी बार हो चुका है कि मैं अब अपनी उम्र या अपने से छोटे बच्चों के साथ ही नहीं रहती। बड़े लोगों के साथ रहने में मैं सुरक्षित महसूस करती हूँ, ऐसा लगता है जैसे वे मुझे कभी छोड़ कर नहीं जायेंगे।’

आठवीं में पढ़ रहे एक बच्चे का अपना ही अलग अनुभव था। उसने कहा कि मुझे ट्राइपोफोबिया है। इस शब्द से मैं परिचित नहीं था, तो उसने स्पष्ट किया कि उसे ऐसी चीज़ें भयभीत करती हैं जो खुरदुरी हों और जिनमे छोटे छोटे छिद्र हों। बच्चे बड़े कल्पनाशील होते हैं और इन्टरनेट या दूसरे माध्यमों की मदद से वे अपनी भावनाओं के लिए शब्द भी ढूंढ लेते हैं।

बच्चों के कई सवाल होते हैं। बच्चे मृत्यु के बारे में जिज्ञासु जरुर होते हैं पर उनकी जिज्ञासा को एक तरफ कर देते हैं, उन्हें डांट-डपट कर चुप करवा देते हैं। पर इससे जुड़े सवाल उसके मन में लगातार कुलबुलाते रहते हैं। हम बच्चों को चुप कराने के लिए भय का प्रयोग करते आये हैं। कोई बच्चा नहीं पढ़ रहा, नहीं खा रहा या नहीं सो पा रहा तो उसे तुरंत किसी काल्पनिक भूत प्रेत का भय दिखाते हैं। बस इसलिए क्योंकि यह आजमाया हुआ उपाय है, इसमें ज्यादा सोचने समझने की जरुरत नहीं और इसका परिणाम तुरंत मिलता है। पर इसका भयंकर दुष्परिणाम यह होता है कि इस तरह के भय बच्चे के मन में जड़ें जमा लेते हैं और इन्हें वह जाने अनजाने में जीवन भर इन्हें ढोता रहता है। वयस्कों के लिए जरूरी है कि पहले तो वे अपने भयों को समझें और फिर साथ ही साथ बच्चों को भी उनके भय की व्यर्थता दिखाएँ। पर हममें से कितने हैं जो अपने मन की भावनात्मक संरचना को समझना चाहते हैं? इसके प्रति जिज्ञासा को न ही बढ़ावा दिया जाता है और न ही उसे पोषित किया जाता है। बल्कि उसे दबाने कुचलने का काम हम बखूबी करते रहते हैं।


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