अंतरराष्ट्रीय
सैन फ्रांसिस्को, 19 मई । गूगल के अनुसार, दुनिया में अब 3 अरब से ज्यादा सक्रिय एंड्रॉयड डिवाइस हैं। एंड्रॉयड और गूगल प्ले पर उत्पाद प्रबंधन के उपाध्यक्ष समीर समत ने गूगल आई / ओ डेवलपर सम्मेलन 2021 के दौरान इसका खुलासा किया।
गूगल ने 2019 में आई / ओ इवेंट के बाद से 500 मिलियन से ज्यादा सक्रिय एंड्रॉयड डिवाइस और 2017 से एक अरब डिवाइस जोड़े हैं।
हालांकि, मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, अगर चीनी एंड्रॉइड-आधारित डिवाइसों को ध्यान में रखा जाए तो सक्रिय डिवाइस में नकली ज्यादा हो सकते हैं।
एप्पल ने इस साल की शुरूआत में खुलासा किया था कि अब 1 अरब से ज्यादा सक्रिय आईफ ोनस हैं और कुल मिलाकर 1.65 अरब सक्रिय एप्पल डिवाइस उपयोग में हैं।
जनवरी 2019 में, एप्पल ने कहा था कि वह 90 करोड़ सक्रिय आईफोन उपयोगकतार्ओं तक पहुंच गया है।
आई/ओ सम्मेलन 2021 में, गूगल ने अपने मोबाइल ऑपरेटिंग सिस्टम के लिए एक बिल्कुल नए रूप का अनावरण किया।
समीर समत के अनुसार, एंड्रॉयड 12 में एंड्रॉयड के इतिहास का सबसे बड़ा डिजाइन परिवर्तन शामिल है।
समीर समत ने सम्मेलन के दौरान कहा, "हमने रंगों से लेकर आकार, प्रकाश और गति तक पूरे अनुभव पर फिर से विचार किया। इसका परिणाम यह हुआ कि एंड्रॉयड 12 पहले से कहीं ज्यादा अभिव्यंजक, गतिशील और व्यक्तिगत है।" (आईएएनएस)
घायल बच्चों को ढोते पिता, लाशों पर रोती माएं, टूटते घरों को देखते उदास बच्चे. इस्राएल और हमास के बीच गजा में जारी संघर्ष के बीच इस तरह की तस्वीरें सोशल मीडिया पर दिख रही हैं. क्या वे सारी तस्वीरें सच्ची होती हैं?
जब भी कोई बड़ा हादसा या हमला होता है तो लोग उसकी तस्वीरों और वीडियो को सोशल मीडिया पर जल्द से जल्द शेयर कर देना चाहते हैं. अक्सर इन तस्वीरों के साथ लिखा होता है कि वे उनके अपनों की तस्वीरें हैं जो खो गए हैं या नहीं रहे. लेकिन कई बार यह विवाद की ओर ध्यान खींचने या गलत सूचना फैलाने की तरकीब भी होती है.
भावनात्मक ब्लैकमेल के लिए बच्चों का इस्तेमाल
सीरिया, कश्मीर या फिर मौजूदा गजा विवाद के बाद सोशल मीडिया पर ऐसी तस्वीरों की बाढ़ आ जाती है जो अक्सर फर्जी निकलते हैं. घायल हुए बताए जाने वाले लहु-लुहान बच्चों की तस्वीरें अक्सर एक तरफ को ध्यान खींचने के लिए पोस्ट की जाती हैं. कई बार ये तस्वीरें किसी दूसरे देश, दूसरे समय या दूसरे विवाद की होती हैं और इनका मकसद होता है भावनात्मक ब्लैकमेल. कई बार तस्वीरें सही होती हैं लेकिन उन्हें गलत तरीके से या गलत परिप्रेक्ष्य में पेश कर दिया जाता है. या फिर ऐसा भी होता है कि सही तस्वीरों को फर्जी बता दिया जाता है. यहां कुछ ऐसे ही उदाहरण हैं.
इस तस्वीर में मलिक नाम की एक छोटी बच्ची है जो कथित तौर पर गजा पर इस्राएल के हमले में मारी गई. इस तस्वीर को सैकड़ों बार अलग-अलग भाषाओं में ट्वीट किया गया जबकि असल में एक सामान्य से रिवरिस सर्च से पता चला कि यह तस्वीर रूस की सोफी की है, जो अब पांच साल की हो चुकी है. दो साल पहले यह तस्वीर सोफी की मां ने इंस्टाग्राम पर पोस्ट की थी और सोफी की ताजा तस्वीर मॉस्को के एक चिड़ियाघर की है जहां वह जानवरों के साथ अठखेलियां करती दिखती है.
पुरानी तस्वीरों का इस्तेमाल
गजा किस दर्द से गुजर रहा है यह दिखाने के लिए अपनी किताबें हाथ में थामे एक रोती छोटी बच्ची की तस्वीर न जाने कितनी बार वायरल हो चुकी है. यह तस्वीर असल में कहां ली गई, यह तो पता नहीं है लेकिन फिलीस्तीनी फोटोग्राफर फादी अब्दुल्लाह दावा करते हैं कि उन्होंने यह तस्वीर उत्तरी गजा में 2014 में ली थी. उसके बाद से जब भी विवाद बढ़ता है, यह तस्वीर वायरल होने लगती है. लेकिन यही तस्वीर काबुल के स्कूल पर तालिबान के हमले और सीरिया में इदलिब के सिलसिले में भी पोस्ट की जाती रही है.
हाल के दिनों में एक और तस्वीर जो फलस्तीन के बच्चों की जिंदगी का हाल बताते हुए पोस्ट हुई, उसमें एक बच्चा गिरे हुए मकानों के मलबे के बीच खड़ा दिखता है. यह तस्वीर है तो गजा की ही, लेकिन गेटी इमेज के मुताबिक यह 19 अक्टूबर 2014 को ली गई थी. एजेंसी के अनुसार फलस्तीनी बच्चा गजा के शेजैया इलाके में है जो हमास और इस्राएल के बीच 50 दिनों तक चले विवाद में तहस नहस हो गया था.
अन्य विवादों की तस्वीरें
ऐसा नहीं है कि बच्चों की तस्वीरों का यह इस्तेमाल एकतरफा है. इसका एकदम उलटा भी होता है. जैसे गजा में जारी मौजूदा विवाद पर सोशल मीडिया को खंगालते हुए डॉयचे वेले ने पाया कि पुराने विवादों की तस्वीरें जैसे सीरिया आदि के वक्त की तस्वीरों को तकनीकी की मदद से एक दूसरे के साथ मिलाकर इस तरह पोस्ट किया जाता है कि उन्हें पहचानना मुश्किल हो जाए. जैसे कि अपनी छोटी बहन को थामे एक लड़के की तस्वीर अलेपो में 14 फरवरी 2014 को हुए एक हवाई हमले के बाद की है. एक अन्य तस्वीर इलाज करवाते एक सीरियाई बच्चे की है, जिसे 29 अक्टूबर 2015 को फोटोग्राफर और पैरामेडिक अब्द डूमैनी ने खींचा था.
फोटो कोलाज में तीसरी तस्वीर अपने बच्ची की मौत पर सिसकते फिलीस्तीनी पिता की है. गेटी इमेज के मुताबिक यह तस्वीर मोहम्मद आबिद ने गजा पट्टी के एक अस्पताल में 10 मई 2021 को ली थी. एजेंसी ने कहा है कि स्थानीय प्रशासन के अनुसार हवाई हमले में 9 लोग मारे गए, लेकिन ये साफ नहीं था कि वे इस्राएली हमले के शिकार हुए थे.
डॉयचे वेले ने बहुत ज्यादा शेयर हो रहे एक वीडियो की भी जांच की. इस वीडियो में दावा किया गया कि फलस्तीन में हमलों की वजह से तबाही को बढ़ा-चढ़ाकर दिखाने के लिए मेकअप किया जा रहा है. लेकिन जांच में पता चला कि वीडियो तो असली है लेकिन एक फर्जी दावे के साथ पेश किया जा रहा है. असली वीडियो 2017 का है जब फलस्तीन के कुछ मेकअप आर्टिस्ट यह वीडियो फ्रांस की एक समाजसेवी संस्था डॉक्टर्स ऑफ द वर्ल्ड के लिए एक प्रोजेक्ट के तहत यह वीडियो बना रहे थे. यह वीडियो 2017 से ही शेयर किया जा रहा है और सीरिया युद्ध के संदर्भ में भी इसे पोस्ट किया जाता रहा है.
रिपोर्ट: तात्याना क्लूग, रैचल बेग
ऑस्ट्रेलिया ने अपने दरवाजे दुनिया के लिए बंद कर रखे हैं. ना कोई वहां से कोई आ सकता है, न जा सकता है. इसे नाकेबंदी ने एक विशाल मानवीय त्रासदी को जन्म दिया है जो अब लोगों का दम घोंटने लगी है.
डॉयचे वैले पर विवेक कुमार की रिपोर्ट
मानसी गर्ग और उनके पति को मिले एक साल से ज्यादा हो गया है. मानसी अभी भारत में हैं और उनके पति ऑस्ट्रेलिया के सिडनी में. फरवरी 2020 में मानसी गर्ग अपने माता-पिता से मिलने भारत गई थीं लेकिन लौट नहीं पाईं. कोविड-19 महामारी के कारण ऑस्ट्रेलिया ने सीमाएं बंद कर लीं और हजारों लोग स्वदेश नहीं लौट पाए. सिर्फ भारत में ऐसे लोगों की संख्या 50 हजार से ज्यादा थी. अब एक साल बाद भी मानसी जैसे लगभग नौ हजार लोग सिर्फ भारत में हैं. बाकी देशों में भी ऐसे ही लोग बड़ी संख्या में हैं जो ऑस्ट्रेलिया के रहवासी हैं लेकिन अपने यहां नहीं लौट पा रहे हैं.
कोविड-19 महामारी को रोकने में ऑस्ट्रेलिया काफी कामयाब रहा है. ऑस्ट्रेलिया के लोवी इंस्टीट्यूट ने एक शोध के बाद उन देशों की सूची जारी की है जिन्होंने कोविड-19 के खिलाफ सबसे अच्छा प्रदर्शन किया. इस सूची में भूटान और न्यूजीलैंड पहले नंबर हैं तो ऑस्ट्रेलिया भी टॉप 10 देशों में शामिल है. देश में अब तक कोरोना वायरस के कुल मामलों की संख्या 30 हजार से कम रही है और 910 जानें गई हैं. लेकिन स्थानीय अकादमिक निशा थपलियाल कहती हैं कि इस प्रदर्शन के लिए ऑस्ट्रेलिया ने भारी कीमत चुकाई है. वह कहती हैं, "ऑस्ट्रेलिया नाम के इस किले ने अपने ही लोगों को उनके अपनों से सालभर से ज्यादा तक दूर रखा है. दुनियाभर में जगह-जगह फंसे लोगों ने इसकी भारी कीमत चुकाई है, मानसिक, भावनात्मक और आर्थिक हर तरह से. और अब भी चुका रहे हैं."
दरअसल, महामारी के आते ही पिछले साल 23 मार्च को ऑस्ट्रेलिया ने सीमाएं बंद कर दी थीं. इसका ऐलान 21 मार्च को किया गया था और तब विदेशों में मौजूद लोगों को वापस आने के लिए सिर्फ दो दिन का वक्त दिया गया था. उस वक्त बहुत कम लोग वापस आ पाए. और जो नहीं आ पाए, उनके सामने नियमों की बेहद ऊंची दीवार खड़ी हो गई जिससे लांघ कर आना संभव नहीं था.
मसलन, ऑस्ट्रेलिया के स्थायी निवासी और नागरिक ही स्वदेश लौट सकते हैं. बिना विशेष इजाजत के अस्थायी वीजा धारकों को ऑस्ट्रेलिया आने की इजाजत नहीं है. देश में रहने वाले स्थायी निवासी और नागरिक अपने परिजनों को ऑस्ट्रेलिया बुला सकते हैं. लेकिन परिजनों में माता-पिता शामिल नहीं हैं, सिर्फ बच्चे और जीवनसाथी ही परजिन की परिभाषा में आते हैं. ऑस्ट्रेलिया आने वालों को कोविड-19 से पूरी तरह मुक्त होने का सबूत देना होता है. कोविड-पॉजिटिव कोई व्यक्ति ऑस्ट्रेलिया नहीं आ सकता, फिर चाहे वह यहां का नागरिक ही क्यों ना हो. इसके अलावा ऑस्ट्रेलिया के स्थायी निवासी और नागरिक देश छोड़कर जा भी नहीं सकते.
इस सबके ऊपर से, हाल ही में जब भारत में कोरोना की दूसरी लहर का कहर शुरू हुआ तो ऑस्ट्रेलिया ने भारत से ऑस्ट्रेलिया आने को अपराध बना दिया और पांच साल तक की जेल व 35 लाख रुपये तक के जुर्माने का प्रावधान कर दिया. हालांकि चौतरफा आलोचना और विरोध के बाद इसे वापस ले लिया गया.
मानवीय त्रासदी
मानसी गर्ग कहती हैं, "मेरे माता-पिता की उम्र 60 पार कर चुकी है. अब वह यहां भारत में हैं और कोई उन्हें देखने वाला नहीं है. क्या मैं उन्हें बेसहारा छोड़कर ऑस्ट्रेलिया चली जाऊं? उन्हें तो मैं अपने साथ ले जा नहीं सकती क्योंकि ऑस्ट्रेलिया की सरकार उन्हें मेरे परिवार के सदस्य ही नहीं मानती. मान लीजिए मैं चली जाऊं और तब किसी को कुछ हो जाए, तो मैं वापस भी नहीं आ सकती क्योंकि ऑस्ट्रेलिया ने तो अपने यहां से लोगों के बाहर जाने पर भी बैन लगा रखा है." मानसी गर्ग इस कारण सिडनी में अपनी नौकरी छोड़कर भारत में ही रह रही हैं ताकि अपने माता-पिता की देखभाल करती रहें. वह पूछती हैं कि माता-पिता परिवार के सदस्य नहीं हैं, ऐसे फैसले कौन करता है.
ऑस्ट्रेलिया के सख्त नियमों ने कई मानवीय त्रासदीयों को जन्म दिया है. ऐसा भी हुआ कि लोगों के परिवारों में मौत हो गई और वे वहां नहीं जा पाए. कई लोगों को अपने बीमार माता या पिता को अकेला या किसी और के सहारे छोड़ देना पड़ा. बहुत से लोग अपनों की शादियों या अन्य उत्सवों में शामिल नहीं पाए. चूंकि नियमानुसार छोटे बच्चे अपने माता या पिता के अलावा किसी के साथ यात्रा नहीं कर सकते, इसलिए सैकड़ों बच्चे ऑस्ट्रेलिया नहीं लौट पाए हैं. सिर्फ भारत में ऐसे बच्चों की संख्या 170 बताई गई है. ऐमनेस्टी ऑस्ट्रेलिया के जोएल मैके कहते हैं कि ऑस्ट्रेलिया की सरकार के ये नियम मानव जीवन पर एक नस्लीय हमला हैं.
‘टरबन्स फॉर ऑस्ट्रेलिया' नामक एक संस्था चलाने वाले सामाजिक कार्यकर्ता अमर सिंह कहते हैं कि ऑस्ट्रेलिया वाहिद ऐसा देश है जिसने अपने ही नागरिकों को बाहर बेसहारा छोड़ दिया है. वह कहते हैं, "सैकड़ों बच्चे अपनी मांओं से नहीं मिल पा रहे हैं. हजारों बुजुर्ग माता-पिता ऑस्ट्रेलिया में रह रहे अपने बच्चों से दूर अकेले रह रहे हैं. परिवार टूट गए हैं.”
सरकार की कोशिशें और राजनीतिक आलोचना
ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री स्कॉट मॉरिसन का कहना है कि विदेशों में फंसे लोगों को वह जल्द से जल्द वापस लाना चाहते हैं लेकिन ऑस्ट्रेलिया की सुरक्षा को खतरे में डालने की कीमत पर नहीं. हाल ही में एक फेसबुक पोस्ट में उन्होंने लिखा, "हमारे बनाए नियम काम कर रहे हैं. उनका असर नजर आ रहा है. भारत से आने पर हमने जो रोक लगाई थी उसने हमारे क्वारंटीन सिस्टम पर बोझ कम किया है और उसे बहुत जरूरी राहत दी है, ताकि हम तीसरी लहर से बचे रहें. ये सारी कोशिशें ऑस्ट्रेलिया के लोगों को सुरक्षित रखने के लिए हो रही हैं. हम यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि हम वैसे ही जीते रहें जैसे हम अभी रह रहे हैं.”
साथ ही ऑस्ट्रेलिया ने भारत में फंसे लोगों को वापस लाने के लिए महीने में छह उड़ानों की व्यवस्था की है. हर फ्लाइट में 150 लोगों को वापस लाया जा रहा है. हालांकि पहली ही फ्लाइट उस वक्त विवादों के घेरे में घिर गई जब तय 150 लोगों में से सिर्फ 70 को विमान में जगह मिली. 40 लोग उड़ान से पहले हुए टेस्ट में कोविड-पॉजिटिव पाए गए, जिसके बाद उन्हें और उनके संपर्क में आए 30 अन्य लोगों को वहीं छोड़ दिया गया. छोड़े गए लोगों में ऑस्ट्रेलिया के सार्वजनिक ब्रॉडकास्टर एबीसी के भारत संवाददाता जेम्स ओटन भी थे जिन्होंने बाद में खुद अपना टेस्ट कराया और पाया कि वह पॉजिटिव थे ही नहीं. कई अन्य लोग भी बाद में हुए टेस्ट में नेगेटिव निकले जिसके बाद लोगों को वापस लाने की पूरी प्रक्रिया की निंदा होने लगी.
दुनिया के लिए देश के दरवाजे खोलने की मांग अब कई तबकों से आ रही है जिनमें सत्तारूढ़ लिबरल-नैशनल गठबंधन के नेता भी शामिल हैं. लिबरल पार्टी के सांसद टिम विल्सन ने मीडिया से कहा कि सीमा बंद करना एक अस्थायी विकल्प था और यह लंबे समय तक नहीं चल सकता. विक्टोरिया राज्य के मुख्य स्वास्थ्य अधिकारी ब्रेट सटन ने कहा है कि ऑस्ट्रेलिया को अपने दरवाजे खोलने पर विचार शुरू कर देना चाहिए. न्यू साउथ वेल्स राज्य में ग्रीन्स पार्टी के विधायक डेविड शूब्रिज तो फौरन प्रतिबंध हटाने की बात कहते हैं. वह कहते हैं, "हम सरकार से मांग करते हैं कि फौरन यह बैन हटाया जाए. हर ऑस्ट्रेलियाई बराबर है, हर ऑस्ट्रेलियाई की कद्र होनी चाहिए, और हर ऑस्ट्रेलियाई को अपने घर लौटने का हक है.”
न्यू कासल में रहने वालीं निशा थपलियाल, जो खुद पिछले साल 10 महीने तक भारत में फंसी रही थीं, कहती हैं कि पता नहीं इस किलेबंदी को खोलने के लिए कितनी कीमत चुकानी होगी. वह कहती हैं, "हमारी मौजूदा सीमा संबंधी नीति में बायोसिक्यॉरिटी, रोगों से रोकथाम, खतरों से बचाव जैसे शब्द भरे हुए हैं. फिर भी, देश के स्वास्थ्य विशेषज्ञ बता रहे हैं कि हमारी क्वारंटीन व्यवस्था इस नीति को संभालने लायक तक नहीं है. पता नहीं यह किलेबंदी कब खत्म होगी और मानवता और दोस्ती को जगह मिलेगी.” सरकार कहती है कि अगले साल के मध्य से पहले ऐसा होनी की गुंजाइश कम ही है. (dw.com)
इस्राएल और हमस के बीच हिंसक संघर्ष को अब दो हफ्ते होने वाले हैं लेकिन अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन की प्रतिक्रिया बहुत संभली सी रही है, जिसे जानकार अमेरिका की पुरानी नीति का ही एक रूप मान रहे हैं.
इस्राएल ने जब गजा पर बम बरसाने शुरू किए तो अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन ने इस्राएल के आत्मरक्षा के अधिकार का बचाव किया. फिर उन्होंने इस्राएली प्रधानमंत्री बेन्यामिन नेतनयाहू से युद्धविराम की अपील की. असल में ये दोनों ही बातें इस्राएल को अपनी कार्रवाई जारी रखने के लिए और समय देने में सहायक सिद्ध हुई हैं. इस मामले के जानकार कहते हैं अमेरिकी नेताओं को उम्मीद है कि एक समय पर दोनों ही पक्ष युद्ध विराम के लिए राजी हो जाएंगे.
और मिस्र जैसे पक्षों के जरिए अंदरखाने चल रही कूटनीति इसमें सहायक साबित होगी. लेकिन ऐसा ना हुआ, और संघर्ष बढ़ने से ज्यादा जानें गईं तो बाइडेन के संभलकर चलने की नीति मुश्किल में पड़ सकती है. मध्य पूर्व में शांति वार्ता के लिए रिपब्लिकन और डेमोक्रैट्स दोनों ही सरकारों में मध्यस्थ रह चुके ऐरन डेविड मिलर कहते हैं कि मौजूदा सरकार भी पुराने ढर्रे पर ही चल रही है लेकिन कुछ अप्रत्याशित की गुंजाइश हमेशा रहती है.
जनवरी में सत्ता संभालने के बाद से बाइडेन ने स्पष्ट कर दिया था कि उनका ध्यान महामारी और अर्थव्यवस्था पर रहेगा. विदेशी नीति में चीन, रूस और ईरान ही उनकी प्राथमिकता थे. अमेरिकी राष्ट्रपतियों को दशकों से परेशान करता आया इस्राएल-फिलीस्तीन विवाद उनकी प्राथमिकताओं में ही नहीं था. हालांकि उन्होंने अपने पूर्ववर्ती डॉनल्ड ट्रंप की कुछ नीतियों में फेरबदल का वादा किया था जो कि बहुत ज्यादा ही इस्राएल के पक्ष में मानी जाती थीं.
दक्षिणपंथी नेता नेतनयाहू ने ट्रंप के साथ अच्छी समझ कायम कर ली थी और बाइडेन ने तो उनसे शुरुआती कई हफ्तों तक बात भी नहीं की थी. इसलिए हाल में जब गजा में बम बरसने लगे तो नई अमेरिकी सरकार सोते से जगी. बाइडेन लंबे समय से इस्राएल के समर्थक रहे हैं. सेनेटर के तौर पर भी और ओबामा प्रशासन में उप राष्ट्रपति रहते हुए भी. इस बार भी उन्होंने शुरुआत इस्राएल के आत्मरक्षा के अधिकार की वकालत के साथ की. यही बात उनके पहले भी अमेरिकी राष्ट्रपति कहते रहे हैं.
लेकिन यह तब हो रहा है जबकि अमेरिका ईरान के साथ परमाणु समझौते पर वापसी कर रहा है और इस्राएल अपने हितों के मुताबिक उसे लेकर चिंतित है. इस्राएल ने जब गजा में असोसिएटेड प्रेस और अलजज़ीरा के दफ्तरों पर हमला किया, तब जाकर बाइडेन ने युद्ध विराम की बात कही. लेकिन जाहिर हो गया था कि वह इस्राएल को नाराज नहीं करना चाहते थे क्योंकि उन्होंने इस्राएल से युद्ध विराम की मांग नहीं की थी.
प्रगतिशील धड़े का दबाव
फिलीस्तीनी उग्रवादी संगठनों और इस्राएल के बीच मौजूदा संघर्ष हाल के वर्षों में सबसे ज्यादा हिंसक और तीव्र है. और इस बार तो संघर्ष गजा से बाहर इस्राएल के शहरों तक पहुंच गया है जहां अरब और यहूदी संघर्षरत हैं. गजा के स्वास्थ्य अधिकारी बताते हैं कि फिलीस्तीन में 63 बच्चों समेत 217 लोग मारे गए हैं और 14,00 से ज्यादा घायल हैं. उधर इस्राएल में दो बच्चों समेत 12 लोगों की जान गई है.
दोनों पक्षों के हताहतों की संख्या में फर्क ने अमेरिका में डेमोक्रैट पार्टी के उस प्रगतिशील धड़े को सक्रिय किया है जिसने पहले पार्टी नामांकन और फिर चुनाव जीतने में बाइडेन की मदद की थी. यह धड़ा चाहता है कि बाइडेन इस्राएल पर सख्ती दिखाएं. अमेरिकी सांसद रो खन्ना कहते हैं, "फौरन युद्ध विराम की जरूरत है. राष्ट्रपति इसे जोर देकर कहना होगा. सिर्फ इतना कहना काफी नहीं कि हम इसका समर्थन करते हैं.”
वैसे अब तक तो बाइडेन ने ऐसे कोई संकेत नहीं दिए हैं कि वह इस मांग के सामने झुकने वाले हैं. और वामपंथी झुकाव वाले डेमोक्रैट्स भी इस मुद्दे पर भिड़ने के मूड में नहीं दिखते. हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स की विदेश मामलों की समिति की सोमवार को बैठक हुई जिसके बाद कुछ सदस्यों ने कहा कि समिति के अध्यक्ष सांसद ग्रेगरी मीक्स बाइडेन को एक पत्र भेजकर इस्राएल को 735 मिलियन डॉलर के स्मार्ट बम की बिक्री रोकने को कहेंगे. लेकिन मीक्स ने बाद में अपना मन बदल लिया.
बाइडेन सरकार पर हमले
उधर रिपब्लिकन पार्टी गजा विवाद को बाइडेन सरकार पर हमले के लिए हथियार बना रही है. इस्राएल समर्थक वोटर रिपब्लिकन पार्टी के लिए मजबूत आधार हैं लेकिन वे कई डेमोक्रैट्स और निर्दलीय सांसदों को भी वोट देते हैं. सेनेट में अल्पमत के नेता मिच मैकॉनल ने कहा है कि जो भी युद्धविराम की वकालत करता है वह दरअसल दोनों पक्षों को नैतिक रूप से बराबर रख रहा है, यानी इस्राएली और हमस की बराबरी जबकि हमस को अमेरिका एक आतंकी संगठन मानता है.
मैकॉनल कहते हैं, "ऐसे डेमोक्रैट्स बड़ी संख्या में हैं जो इस्राएल की बलि चढ़ाना चाहते हैं.” बाइडेन सरकार इस मुद्दे पर संयुक्त राष्ट्र में भी अलग-थलग पड़ गई है. अमेरिका ने सुरक्षा परिषद को किसी भी तरह की कार्रवाई से रोक दिया और कूटनीति तेज करने की बात कही. लेकिन बाइडेन ने अब तक भी इस्राएल में अपने राजदूत के नाम का ऐलान नहीं किया है और मध्यम दर्जे के नेता डेप्युटी असिस्टेंट विदेश मंत्री हाएडी अम्र को ही भेजा है.
सूत्र बताते हैं कि बाइडेन सरकार आने वाले दिनों में गजा में राहत सामग्री भेजने और राहत अभियान चलाने की तैयारी कर रही है. लेकिन मंगलवार को जब बाइडेन एक दौरे पर मिशिगन पहुंचे तो उन्हें फिलीस्तीनी मूल की पहली अमेरिकी महिला सांसद राशिदा तालिब का सामना करना पड़ा, जो एक प्रगतिशील डेमोक्रैट हैं. उनके एक नजीदीकी के मुताबिक उन्होंने राष्ट्रपति से कहा, "फिलीस्तीनियों के मानवाधिकारों की सुरक्षा होनी चाहिए, मोलभाव नहीं.”
वीके/सीके (रॉयटर्स)
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वाशिंगटन, 19 मई | वैश्विक स्तर पर कोरोना के मामलों की संख्या बढ़कर 16.39 करोड़ हो गई है और इस महामारी से अबतक 33.9 लाख लोग अपनी जान गंवा चुके हैं। जॉन्स हॉपकिन्स यूनिवर्सिटी ने यह जानकारी दी।
बुधवार सुबह अपने नवीनतम अपडेट में, यूनिवर्सिटी के सेंटर फॉर सिस्टम साइंस एंड इंजीनियरिंग (सीएसएसई) ने बताया कोरोना के वर्तमान मामले और इससे होने वाले मौतों की संख्या क्रमश: बढ़कर 16,39,46,965 और 33,99,045 हो गई है।
सीएसएसई के अनुसार, अमेरिका दुनिया में सबसे अधिक मामलों और मौतों क्रमश: 32,996,565 और 587,199 के साथ कोरोना से सबसे ज्यादा प्रभावित देश बना हुआ है।
संक्रमण के मामले में भारत 25,228,996 मामलों के साथ दूसरे स्थान पर है।
30 लाख से अधिक मामलों वाले अन्य देश ब्राजील (15,732,836), फ्रांस (5,959,593), तुर्की (5,139,485), रूस (4,900,995), यूके (4,466,218), इटली (4,167,025), स्पेन (3,619,848), जर्मनी (3,615,896) हैं। , अर्जेंटीना (3,371,508) और कोलंबिया (3,144,547) हैं।
मौतों के मामले में ब्राजील 439,050 मौतों के साथ दूसरे नंबर पर है।
भारत (278,719), मैक्सिको (220,493), यूके (127,953), इटली (124,497), रूस (114,619) और फ्रांस (108,201) में 1,00,000 से अधिक लोगों की मृत्यु हुई है। (आईएएनएस)
काठमांडू, 19 मई| उत्तरी-मध्य नेपाल के लामजंग जिले में बुधवार को तड़के तेज भूकंप आया जिसकी रिक्टर पैमाने पर तीव्रता 5.8 दर्ज की गई। इसमें कम से कम तीन लोग घायल हो गए। इसकी जानकारी स्थानीय अधिकारी ने दी।
राष्ट्रीय भूकंप केंद्र के अनुसार, मर्सियांगडी ग्रामीण नगर पालिका के भुलभुले में भूकंप का केंद्र राजधानी काठमांडू सहित देश के विभिन्न हिस्सों में सुबह 5:42 बजे (स्थानीय समयानुसार) महसूस किया गया।
अधिकारियों के अनुसार, झटके के बाद लोग अपने घर से भाग गए। लामजुंग के मुख्य जिला अधिकारी होम प्रसाद लुइंटेल ने सिन्हुआ को बताया, "तेज झटके से लोग दहशत में हैं।"
घरों की दीवारें गिरने से घायल हुए तीन लोगों का इलाज चल रहा है, जबकि कई घरों के क्षतिग्रस्त होने की खबर है।
मुख्य जिला अधिकारी लुइंटेल ने कहा कि नुकसान के सभी विवरण अभी तक नहीं बताए गए हैं।
नुकसान का ब्योरा जुटाने और जरूरतमंदों की मदद के लिए पुलिस की एक टीम तैयार की गई है।
ग्रामीण नगरपालिका के अध्यक्ष अर्जुन गुरुंग ने भूकंप के केंद्र से फोन पर सिन्हुआ को बताया, "झटका बहुत तेज था। हालांकि, किसी के हताहत होने की कोई खबर नहीं है। हम अभी नुकसान के बारे में विवरण इकठ्ठे कर रहे हैं।"
2015 में नेपाल में आए विनाशकारी भूकंप में कम से कम 9,000 लोग मारे गए थे। (आईएएनएस)
मध्य-पूर्व के इस्लामिक देश इसराइल के ख़िलाफ़ और फ़लस्तीनियों के समर्थन में एकजुट होने की कोशिश कर रहे हैं लेकिन उनके आपसी विवाद ही नहीं थमते दिख रहे हैं.
सोमवार को लेबनान के विदेश मंत्री के बयान पर सऊदी अरब समेत खाड़ी के बाक़ी पाँच देशों ने कड़ी आपत्ति ज़ाहिर की है. लेबनान इसराइल और फ़लस्तीनियों के टकराव में फ़लस्तीनियों का साथ दे रहा है लेकिन फ़लस्तीन के समर्थन में बयान देने वाले देश भी आपस में ही उलझते दिख रहे हैं.
इससे पहले 16 मई को इसराइल को लेकर इस्लामिक देशों के संगठन ऑर्गेनाइज़ेशन ऑफ़ इस्लामिक कोऑपरेशन यानी ओआईसी की बैठक हुई थी और इसमें भी बहरीन, यूएई निशाने पर आ गए थे.
तुर्की और फ़लस्तीनी प्रतिनिधि ने यूएई और बहरीन को इसराइल से रिश्ते सामान्य करने के लिए आलोचना की थी. तुर्की और पाकिस्तान इसराइल को लेकर सबसे ज़्यादा आक्रामक हैं लेकिन सऊदी और यूएई के बहुत संतुलित बयान आ रहे हैं.
लेबनान के विदेश मंत्री चर्बेल वहबे ने सोमवार को एक टीवी इंटरव्यू में सऊदी अरब को लेकर जो कुछ कहा है, उसे लेकर भारी विवाद और तनाव पैदा हो गया है.
इस मामले में लेबनान के राष्ट्रपति माइकल इयोन को सफ़ाई देनी पड़ी है और उन्होंने कहा कि खाड़ी के देशों के बारे में उनके विदेश मंत्री का बयान लेबनान की आधिकारिक नीति नहीं है.
सऊदी अरब ने भारत-पाकिस्तान के बीच अपनी भूमिका मानी
लेबनान को खाड़ी के देशों से मदद मिलती है लेकिन विदेश मंत्री के विस्फोटक बयान के कारण रिश्ते पटरी से उतरते दिख रहे हैं.
विदेश मंत्री चर्बेल ने अल हुर्रा टीवी से इराक़ और सीरिया में इस्लामिक स्टेट के उभार के लिए खाड़ी के देशों को ज़िम्मेदार ठहराया था. चर्बेल ने कहा था, ''जो देश दोस्ती और भाईचारा चाहते हैं, उन्होंने ही यहां इस्लामिक स्टेट को लाया.
1975 से 1990 तक चले गृह युद्ध के कारण लेबनान आर्थिक संकट से उबर नहीं पाया है. जब लेबनान में हिज़्बुल्लाह का प्रभाव बढ़ा तो खाड़ी के अमीर सुन्नी मुस्लिम देशों से मिलने वाली वित्तीय मदद भी बंद हो गई. हिज़्बुल्लाह एक लेबनानी चरमपंथी समूह है और कहा जाता है कि शिया मुस्लिम बहुल देश ईरान से उसे मदद मिलती है.
सऊदी अरब ने लेबनान के विदेश मंत्री की टिप्पणी पर कड़ी आपत्ति जताई है और लेबनान के राजदूत को समन किया है.
सऊदी विदेश मंत्रालय ने कहा है कि लेबनान के राजदूत को एक ज्ञापन सौंपा गया है. सऊदी अरब ने चर्बेल के बयान पर कहा है, ''यह बयान राजनयिक रिश्तों के बुनियादी नियमों के ख़िलाफ़ है. लेबनान और सऊदी के बीच जो ऐतिहासिक रूप से भाईचारे का रिश्ता रहा है, उसके भी ख़िलाफ़ है.''
यूएई के विदेश मंत्रालय ने लेबनानी विदेश मंत्री के बयान का विरोध करते हुए कहा है, ''लेबनान के कार्यवाहक विदेश मंत्री ने आपत्तिजनक और नस्लीय बयान दिया है. चर्बेल का बयान सऊदी अरब और बाक़ी के ख़ाड़ी के देशों के ख़िलाफ़ है. लेबनान के राजदूत को विरोध में एक हमने ज्ञापन सौंपा गया है.''
विवाद बढ़ने पर मंगलवार को चर्बेल ने कहा कि उनके बयान की ग़लत व्याख्या की गई है. गल्फ़ कोऑपरेशन काउंसिल के छह देशों ने चर्बेल से औपचारिक माफ़ी मांगने के लिए कहा है. समाचार एजेंसी रॉयटर्स के अनुसार लेबनान में विदेश मंत्री से इस्तीफ़े की बात हो रही है. हालाँकि अभी तक इसे लेकर कोई फ़ैसला नहीं हो पाया है.
साद अल-हरीरी लेबनान के नामित सुन्नी प्रधानमंत्री हैं और अभी एक कैबिनेट बनाने की कोशिश कर रहे हैं. हरीरी के परिवार की सऊदी में संपत्ति भी है. उन्होंने पूरे विवाद पर कहा है कि अरब का समर्थन बहुत ज़रूरी है. उन्होंने कहा कि लेबनान अभी जिस संकट से गुज़र रहा है, उसमें अरब को नाराज़ करना दुखद है.
टीवी पर लेबनानी विदेश मंत्री ने क्या कहा?
सोमवार की रात लेबनानी विदेश मंत्री ने टीवी पर सऊदी अरब के एक मेहमान के लिए आपत्तिजनक शब्द का इस्तेमाल किया था. सऊदी मेहमान ने टीवी कार्यक्रम में लेबनान में ईरान और हिज़्बुल्लाह के बढ़ते प्रभाव को लेकर लेबनान के राष्ट्रपति की आलोचना की थी.
सऊदी के गेस्ट ने टीवी कार्यक्रम में कहा, ''मैं इसे स्वीकार नहीं करूंगा. मैं लेबनान में हूँ और मुझे बद्दू (अरब की एक जनजाति) कहकर अपमानित किया जा रहा है.''
इसी बहस में चर्बेल ने ये भी कहा कि खाड़ी के देशों ने सीरिया और इराक़ में इस्लामिक स्टेट को बढ़ावा दिया. (bbc.com)
एसईजी प्लाज़ा चीन के शेंनज़ेंन में स्थित है. यह चीन की 104 नंबर की सबसे ऊंची इमारत है.
दक्षिणी चीन के शेनज़ेन शहर में स्थित एक बहुमंज़िला इमारत में कंपन महसूस किए जाने के बाद, उसे आनन-फ़ानन में खाली कराना पड़ा.
स्थानीय प्रशासन के अनुसार यह घटना मंगलवार शाम को हुई, जब 980 फ़ीट ऊंचे एसईजी प्लाज़ा में मौजूद लोगों को यह इमारत हिलती हुई लगी.
उस वक़्त चीन में कोई भूकंप दर्ज नहीं किया गया. यही वजह है कि अब इस घटना की जाँच की जा रही है.
बीस साल पुरानी इस 73 मंज़िला इमारत में कई दफ़्तर हैं और इसमें इलेक्ट्रॉनिक्स का एक बड़ा बाज़ार लगता है.
यह इमारत शेंनज़ेन शहर के बीचोंबीच स्थित है. क़रीब सवा करोड़ की आबादी वाले इस शहर में लोग इस इमारत को एक बड़े शॉपिंग सेंटर के तौर पर जानते हैं.
सोशल मीडिया पर इस घटना के कई वीडियो शेयर किये जा रहे हैं जिनमें लोगों को इस इमारत से बाहर निकलकर भागते हुए देखा जा सकता है.
剛剛中午時分,位於深圳華強北,樓高73層的賽格電子大廈突然搖晃,原因不明也沒地震!樓宇內人群和樓下人群紛紛逃命! pic.twitter.com/aoixkH6OeY
— 風再起時【香港挺郭后援會3】 (@dZnJUCdo4FlZqgd) May 18, 2021
सोशल मीडिया पर सैकड़ों लोगों ने इसे लेकर चिंता जताई है जिसकी मुख्य वजह है कि बिना भूकंप के आख़िर ऐसा क्यों हुआ?
चीन के सरकारी अख़बार द ग्लोबल टाइम्स ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है कि शेनज़ेन के फूशियाँ ज़िले में, जहाँ एसईजी प्लाज़ा स्थित है, वहाँ के स्थानीय प्राधिकरण को चीनी समय अनुसार दोपहर क़रीब साढ़े 12 बजे बिल्डिंग के हिलने की ख़बर मिली थी और दोपहर दो बजे तक बिल्डिंग को खाली करा लिया गया था. जिस वक़्त यह घटना हुई, तब इमारत में काफ़ी लोग मौजूद थे.
शेनज़ेन के स्थानीय प्राधिकरण ने जो ताज़ा बयान जारी किया है, उसमें कहा गया है कि "बिल्डिंग के आसपास ज़मीन में कोई दरार हमें नहीं मिली है. इसके अलावा बिल्डिंग की बाहरी दीवार को भी कोई क्षति नहीं पहुँची है. लेकिन बिल्डिंग का इस तरह हिलना चिंताजनक है. हम इस घटना की विस्तृत जाँच कर रहे हैं."
एसईजी प्लाज़ा साल 2000 में बनकर तैयार हुआ था. यह चीन में 104 नंबर की सबसे ऊंची इमारत है. वहीं दुनिया में इसका स्थान 212वाँ है.
टेनसेंट और ख्वावे जैसी नामी चीनी कंपनियों के इस शहर में दफ़्तर हैं. दुनिया की चौथी सबसे ऊंची इमारत भी इसी शहर में स्थित है.
चीन में इमारतों के गिरने की ख़बरें आती रहती हैं. पिछले साल मई में एक होटल के गिरने की ख़बर आयी थी जिसमें 29 लोगों की मौत हो गई थी.
इस होटल को कोरोना काल में मरीज़ों के आइसोलेशन सेंटर के रूप में इस्तेमाल किया गया था.
हालांकि, चीन बहुत तेज़ी से निर्माण कार्य करने को लेकर भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में रहता है.
पिछले साल चीनी प्रशासन ने वुहान शहर में महज़ छह दिनों के भीतर 1000 बेड का एक अस्पताल बनाकर तैयार कर दिया था. (bbc.com)
इस्लामाबाद, 18 मई | इस्लामाबाद में ईशनिंदा के आरोप में हिरासत में लिए गए एक व्यक्ति की पीट-पीटकर हत्या करने की कोशिश में भीड़ ने एक पुलिस थाने पर हमला कर दिया। मीडिया ने मंगलवार को यह जानकारी दी। वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों ने डॉन न्यूज को बताया कि दर्जनों ग्रामीणों ने डंडों और लोहे की रॉड से सोमवार को गोलरा पुलिस थाने पर हमला किया और पुलिस से उस व्यक्ति को हिरासत में लेने की मांग की।
शिकायत के बाद शख्स को थाने लाए जाने के बाद गुस्साई भीड़ गेट पर जमा हो गई।
अधिकारियों ने डॉन न्यूज को बताया कि वे पुलिस थाने में घुसने में सफल रहे।
जवाब में, आतंकवाद निरोधी विभाग के कर्मियों सहित पुलिस सु²ढ़ीकरण ने आंदोलनकारी भीड़ के खिलाफ अत्यधिक आंसू गैस के गोले दागे और लाठीचार्ज किया।
एक घंटे की मशक्कत के बाद पुलिस ने ग्रामीणों को खदेड़ दिया।(आईएएनएस)
चीन के एक मनोरंजन पार्क में टाइटैनिक की हुबहू नकल का एक जहाज बनाया जा रहा है. यह छह सालों से बन रहा है और इसके बनने में 15 करोड़ डॉलर से भी ज्यादा की लागत आई है.
टाइटैनिक के समंदर में डूबने के सौ सालों बाद उसे चीन के एक मनोरंजन पार्क में समुद्र की गहराइयों में से बाहर निकाल फिर से खड़ा किया जा रहा है. इस परियोजना के मुख्य स्पान्सर को यह ख्याल 1997 में आई टाइटैनिक की कहानी पर बनी फिल्म देख कर आया था. सू शाओजूं कहते हैं कि उनकी तमन्ना थी की 260 मीटर लंबे इस डुप्लीकेट जहाज को बनवा कर असली टाइटैनिक की यादें जिंदा रखी जाएं.
वो इस चुनौती से इतने उत्साहित हुए कि उन्होंने इसमें निवेश करने के लिए ऊर्जा उद्योग में स्थित अपनी संपत्ति बेच दी. इसमें कई पनबिजली परियोजनाओं में उनके शेयर भी शामिल थे. टाइटैनिक अपने समय का सबसे बड़ा जहाज था और उसके मालिकों ने उसे "कभी ना डूबने वाला" बताया था. लेकिन 1912 में एक हिम-पर्वत से टकराने के बाद टाइटैनिक एटलांटिक समुद्र की गहराइयों में समा गया.
150 डॉलर में एक रात टाइटैनिक पर
उस हादसे में 1500 से भी ज्यादा लोग मारे गए थे. लेकिन सू उसकी यादें जिंदा रखने पर आमादा हैं. वो कहते हैं, "मैं उम्मीद करता हूं कि यह जहाज यहां 100-200 सालों तक रहेगा. हम टाइटैनिक के लिए एक संग्रहालय बना रहे हैं." इस जहाज को बनाने में छह साल लग गए, जो टाइटैनिक को बनाने में लगे समय से भी ज्यादा है. इसमें 23,000 टन स्टील का इस्तेमाल हुआ है और इसे बनाने में 100 से भी ज्यादा कामगारों की मेहनत लगी है.
इसके निर्माण में 15 करोड़ डॉलर से भी ज्यादा पैसा खर्च हो चुका है. खाना खाने के कमरे से लेकर लक्जरी केबिन तक और यहां तक की दरवाजों के हत्थे भी, हर चीज टाइटैनिक की नकल की है. सिचुआन प्रांत के जिस मनोरंजन पार्क में इसे रखा गया है वो समुद्र से 1,000 किलोमीटर से भी ज्यादा दूर है. पार्क के अंदर सॉउथैंप्टन बंदरगाह की नकल का एक बंदरगाह भी बनाया गया है, ठीक वैसा जैसा फिल्म में था.
जहाज तक ले जानी वाली बसों में सेलीन डियोन का गाया हुआ फिल्म का गाना "माई हार्ट विल गो ऑन" लगातार बजता है. इस नकली टाइटैनिक पर एक रात बिताने का खर्च करीब 150 डॉलर है. सू कहते हैं कि इस खर्च में अतिथियों को "पांच सितारा क्रूज सेवा" के अलावा एक चालू भाप इंजन की बदौलत बिलकुल समंदर में होने का एहसास होगा. हालांकि, खुलने से पहले ही यह जहाज कई विवादों में घिर गया है.
सफेद हाथी ना बन जाए
इंटरनेट पर लोग सवाल उठा रहे हैं कि इसे देखने पर्यटक आएंगे भी या नहीं, क्योंकि टाइटैनिक को तो दुर्घटना के पर्याय के रूप में याद किया जाता है. कुछ लोगों ने यह भी कहा कि यह इस तरह की उन कई चीनी परियोजनाओं में शामिल हो जाएगा जो बाद में बस एक सफेद हाथी बन कर रह गईं. इनमें 2008 में बनी अमेरिकी नौसेना के जहाज यूएसएस एंटरप्राइज की नकल शामिल है, जिसे बनाने में 1.8 करोड़ डॉलर खर्च हो गए थे लेकिन उसे पर्यटन के लिए खोलने के कुछ ही दिनों बाद छोड़ दिया गया था.
लेकिन सू को उम्मीद है कि उनके जहाज को देखने हर साल पचास लाख लोग आएंगे. वो कहते हैं, "इससे हमारे निवेश का सारा पैसा वापस आ जाएगा." सू और उनके सहयोगी पर्यटकों को आकर्षित करने के लिए कुछ बड़े नामों का सहारा लेने की भी योजना बना रहे हैं. टाइटैनिक फिल्म के किरदारों का नाम लेते हुए सू ने बताया, "हम जैक, रोज और जेम्स कैमेरॉन को उद्घाटन समारोह में आने के लिए निमंत्रणन देना चाहेंगे ." (dw.com)
सीके/एए (एएफपी)
दुनिया के सबसे धनी लोगों में से एक और सॉफ़्टवेयर की दुनिया की सबसे कामयाब कंपनियों में गिने जाने वाले माइक्रोसॉफ़्ट के सह-संस्थापक बिल गेट्स का नाम एक बार फिर चर्चा में है.
कुछ दिनों पहले ही उन्होंने और मेलिंडा गेट्स ने अलग होने की घोषणा की थी. 27 साल तक साथ रहने के बाद उनके तलाक़ की ख़बर काफी चर्चा में रही.
अब ख़बर आ रही है कि बिल गेट्स ने पिछले साल जब माइक्रोसॉफ़्ट के सह-संस्थापक ने कंपनी के बोर्ड से इस्तीफ़ा दिया तो उस समय उन पर एक जांच चल रही थी.
यह जांच बिल गेट्स के 20 साल पुराने अफ़ेयर को लेकर की जा रही थी लेकिन वो इसके बीच ही कंपनी के बोर्ड से हट गए.
माइक्रोसॉफ़्ट ने की जांच की पुष्टि
माइक्रोसॉफ़्ट ने इस बात की पुष्टि की है कि उनके व्यवहार को लेकर कुछ चिंताएं ज़ाहिर की गई थीं जिसके बाद ये जांच शुरू की गई थी.
कंपनी का कहना है कि उसने एक लॉ-फ़र्म के साथ मिलकर इस मामले की जांच शुरू की थी और जिस कर्मचारी ने गेट्स के व्यवहार को लेकर रिपोर्ट की थी उसे पूरा सहयोग दिया गया.
हालांकि बिल गेट्स की प्रवक्ता ने इस बात से साफ़ इनक़ार किया है.
उनका कहना है कि बोर्ड से हटने के फ़ैसले का इस मामले से कोई भी लेना-देना नहीं था.
सोमवार को, माइक्रोसॉफ़्ट के एक प्रवक्ता ने बयान जारी कर बताया कि - कंपनी को साल 2019 के अंतिम महीने में एक शिकायत मिली थी जिसमें कहा गया था कि बिल गेट्स ने साल 2000 में कंपनी की एक महिला कर्मचारी से "अंतरंग संबंध शुरू करने की मांग" की थी.
उन्होंने आगे कहा कि "बोर्ड की एक समिति ने पूरे मामले को गंभीरता से देखा और पूरे मामले की जांच के लिए एक बाहरी लॉ-फ़र्म की सहायता ली."
"जांच के दौरान माइक्रोसॉफ़्ट ने उस कर्मचारी को पूरा-पूरा सहयोग किया जिसने ये शिकायत दर्ज की थी."
हालांकि यह जांच किसी नतीजे पर नहीं पहुंच सकी क्योंकि बिल गेट्स ने जांच पूरी होने से पहले ही बोर्ड से इस्तीफ़ा दे दिया था.
बीते साल मार्च में लिंक्डइन पर एक पोस्ट में बिल गेट्स ने कहा था, "उन्होंने यह फ़ैसला इसलिए लिया था ताकि वह बिल एंड मेलिंडा गेट्स फ़ाउंडेशन के साथ अपने चैरिटी के काम को अधिक समय दे सकें."
उनका यह पोस्ट उनके दोबारा बोर्ड चुने जाने के तीन महीने बाद आया था.
उस समय उन्होंने लिखा था, "माइक्रोसॉफ़्ट के बोर्ड से हटने का मतलब किसी भी तरह से कंपनी से दूर जाना नहीं है. माइक्रोसॉफ़्ट हमेशा मेरे जीवन के कामों का एक महत्वपूर्ण हिस्सा रहेगा. मैं पहले से कहीं अधिक आशावादी महसूस करता हूं कि कंपनी तरक्की कर रही है और यह कैसे लगातार दुनिया को लाभ पहुंचाना जारी रख सकती है."
बिल गेट्स ने कंपनी के बोर्ड ऑफ़ डायरेक्टर्स से ये कहते हुए इस्तीफ़ा दे दिया था कि वह सामाजिक कार्यों की तरफ़ अधिक ध्यान देना चाहते हैं.
हालांकि उन्होंने यह भी कहा था कि कंपनी उनके लिए हमेशा ही महत्वपूर्ण रहेगी और वह मौजूदा सीईओ सत्या नडेला और अन्य अधिकारी के सलाहकार के रूप में काम करते रहेंगे.
हालांकि वॉल स्ट्रीट जर्नल ने रविवार को अपने एक लेख में लिखा कि - माइक्रोसॉफ़्ट के बोर्ड ने फ़ैसला किया था कि बिल गेट्स का कंपनी की एक महिला कर्मचारी के साथ संबंध अनुचित था और उन्हें अपना पद छोड़ देना चाहिए.
बिल गेट्स की ओर से मौजूद प्रवक्ता से जब अख़बार ने इस संबंध में पूछा तो उन्होंने बिल गेट्स के अफ़ेयर की पुष्टि की लेकिन उन्होंने इस बात से साफ़ मना किया कि बोर्ड के पद से हटने के फ़ैसला का इस मामले से कोई संबंध है.
गेट्स की महिला प्रवक्ता ने कहा, "क़रीब 20 साल पहले एक अफ़ेयर था जो कि आपसी सहमति से समाप्त हो गया."
वो कहती हैं, "बोर्ड से हटने के बिल गेट्स के निर्णय का इस मामले से कोई लेना-देना नहीं था. वास्तव में उन्होंने बहुत साल पहले ही अपने चैरिटी के काम को अधिक से अधिक समय देने की बात कही थी."
बिल एंड मेलिंडा गेट्स फ़ाउंडेशन ने बीबीसी को बताया कि वे अपने बयान पर क़ायम हैं.
गेट्स दंपति ने दुनिया भर में चैरिटी के अपने काम के लिए अरबों रुपये दान किये हैं. दोनों ने अपने तलाक़ की घोषणा के साथ ही ये भी कहा कि वे आगे भी अपने फ़ाउंडेशन के काम को साथ मिलकर जारी रखेंगे.
अमेरिकी मीडिया के मुताबिक़, दोनों ने अपने तलाक़ की घोषणा करने से पहले ही संपत्ति और दूसरी चीज़ों के बंटवारे को लेकर सहमति दे दी थी.
फ़ोर्ब्स के अनुसार, 65 साल के बिल गेट्स दुनिया के चौथे सबसे धनी शख़्स हैं. उनकी कुल संपत्ति की क़ीमत क़रीब 124 बिलियन डॉलर है.
बिल गेट्स ने 1970 के दशक में माइक्रोसॉफ़्ट की सह-स्थापना की थी और साल 2008 तक वह पूरे समय तक कंपनी का हिस्सा रहे. माइक्रोसॉफ़्ट अब दुनिया की सबसे बड़ी सॉफ़्टवेयर कंपनी है.
ऐसा माना जाता है कि बिल और मेलिंडा के पास वॉशिंगटन, फ़्लोरिडा और व्योमिंग राज्यों में कई मिलियन डॉलर की संपत्ति है.
उनका मुख्य निवास स्थान एक झील के किनारे आलीशान बंगला है. रिपोर्ट्स के अनुसार, मेदिना में स्थित इस बंगले की क़ीमत क़रीब 127 मिलियन डॉलर है. (bbc.com)
ऑस्ट्रेलिया के सबसे बड़े राज्य न्यू साउथ वेल्स ने अपने स्कूलों में सिख धार्मिक चिह्न कृपाण लेकर आने पर प्रतिबंध लगा दिया है. एक स्कूल में एक छात्र द्वारा कथित तौर पर कृपाण से दूसरे को घायल करने के बाद यह फैसला लिया गया.
डॉयचे वैले पर विवेक कुमार की रिपोर्ट
6 मई को सिडनी के ग्लेनवुड हाई स्कूल में पुलिस और एंबुलेंस बुलाई गई. एक छात्र लहुलुहान पड़ा था. पुलिस को बताया गया कि एक अन्य छात्र ने उसे चाकू मार दिया था. 16 साल के छात्र को फौरन अस्पताल ले जाया गया जबकि 14 साल के एक छात्र को गिरफ्तार कर लिया गया. उस पर जानलेवा हमला करने के आरोपों में मुकदमा दर्ज किया गया है और फिलहाल वह जमानत पर है.
दो छात्रों के बीच झगड़े का मामला लगने वाले इस वाकये में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लहर पैदा कर देने की संभावना है क्योंकि इस घटना के मूल में धर्म भी है बुलिंग भी. आरोप है कि सिख समुदाय से आने वाले आरोपी छात्र ने अपनी कृपाण से सहपाठी पर हमला किया था. इसके बाद ऑस्ट्रेलिया में स्कूलों में कृपाण लेकर आने की इजाजत पर विवाद हो रहा है. न्यू साउथ वेल्स की मुख्यमंत्री ने कहा कि उन्हें तो हैरत है कि छात्र स्कूलों में चाकू लेकर आ सकते हैं.
सरकार चिंतित
मीडिया से बातचीत में मुख्यमंत्री ग्लैडिस बेरेजिकलियान ने कहा, "छात्रों को किसी भी आधार पर स्कूलों में चाकू लेकर आने की इजाजत नहीं होनी चाहिए. मुझे तो लगता है कि सामान्य समझ भी यही कहती है. भले ही वे उन्हें हथियार के तौर पर इस्तेमाल नहीं कर रहे हैं, दूसरे उनसे ले सकते हैं. मुझे तो जब यह पता चला तो बड़ी हैरत हुई.”
इस बयान के एक ही दिन बाद ऑस्ट्रेलिया के सबसे बड़े राज्य ने स्कूलों में किसी भी तरह के चाकू को लाने पर प्रतिबंध लगा दिया. राज्य की शिक्षा मंत्री सारा मिचेल ने कहा कि एक गंभीर घटना ने कानून पर कई वाजिब सवाल उठाए हैं, खासकर समरी ऑफेंसेस ऐक्ट को लेकर जिसके तहत ‘वाजिब कारणों से' किसी व्यक्ति को सार्वजनिक स्थानों पर चाकू लेकर जाने की अनुमति दी जा सकती है.
उन्होंने कहा, "इसलिए हमने इस कानून की समीक्षा करने का फैसला किया है. हम देखेंगे कि क्या बदलाव किए जा सकते हैं ताकि स्कूलों में छात्रों और स्टाफ की सुरक्षा सुनिश्चित कि जा सके. तब तक हम सरकारी स्कूलों में किसी भी तरह के चाकू को प्रतिबंधित कर रहे हैं, फिर चाहे वह वाजिब धार्मिक कारणों से ही क्यों न हो.” मिचेल ने कहा कि इस मुद्दे पर बातचीत में सिख समुदाय को भी वह हिस्सेदार बनाना चाहती हैं.
सिख नाराज
ऑस्ट्रेलिया का सिख समुदाय सरकार के इस फैसले से ज्यादा खुश नहीं है. ऑस्ट्रेलियन सिख एसोसिएशन के अध्यक्ष रवींद्रजीत सिंह कहते हैं कि कृपाण को सिख सदियों से एक धार्मिक चिह्न के रूप में धारण कर रहे हैं. वह कहते हैं, "ब्रिटेन, फ्रांस, ऑस्ट्रेलिया और अन्य कई देशों की सेनाओं ने पहले और दूसरे विश्व युद्ध में सिखों की बहादुरी को सम्मान देने के लिए कृपाण को मान्यता दी है. इसमें गलीपली की लड़ाई भी शामिल है.” पहले विश्व युद्ध में तुर्की के गलीपली में हुई लड़ाई में बहुत से सिख ऑस्ट्रेलिया की ओर से लड़े थे.
सिंह कहते हैं कि ग्लेनवुड हाई स्कूल की घटना दुर्भाग्यपूर्ण है लेकिन उसकी वजहों में बुलिंग भी हो सकती है जिसने एक बच्चे को अपने सहपाठी पर हमला करने के लिए उकसाया हो. वह बताते हैं, "ऑस्ट्रेलियन सिख एसोसिएशन पिछले हफ्ते से शिक्षा मंत्रालय के संपर्क में है. हम स्कूल की प्रिंसिपल से भी मिले थे और कृपाण के मुद्दे पर बात की थी. हम सरकार और पुलिस के साथ हर तरह की बातचीत के लिए तैयार हैं ताकि इस मुद्दे का हल धार्मिक भावनाओँ को ध्यान में रखते हुए निकाला जा सके.”
ग्लेनवुड सिडनी के पश्चिम में एक बड़ा इलाका है. ब्लैकटाउन काउंसिल के तहत आने वाले इस इलाके में सिख समुदाय की बड़ी आबादी रहती है. इसी इलाके में ऑस्ट्रेलिया के प्रमुख गुरुद्वारों में से एक पार्कली गुरुद्वारा भी है. ब्लैकटाउन के काउंसलर मनिंदर सिंह प्रतिबंध से सहमत नहीं हैं. वह कहते हैं कि सरकार को स्कूलों में हो रही घटनाओं को धार्मिक स्वतंत्रता पर पाबंदियां लगाने के बहाने के तौर पर इस्तेमाल करने से बचना चाहिए और उनके कारणों की जड़ में जाना चाहिए.
वह कहते हैं, "ब्लैकटाउन ऑस्ट्रेलिया के सबसे बहुसांस्कृतिक इलाकों में से है. यहां 188 देशों के लोग रहेत हैं. वे सिख धर्म के चिह्नों के बारे में अच्छे से जानते हैं. इस तरह के प्रतिबंध नई बहस को जन्म देंगे और असली मुद्दों से ध्यान भटकाएंगे.”
स्कूलों में बुलिंग
सिख समुदाय का कहना है कि 6 मई की घटना परेशान करने के कारण हुई है. हालांकि सीधे तौर पर कोई भी यह बात कहने से बच रहा है लेकिन नाम न छापने की शर्त पर कुछ लोग कहते हैं कि आरोपी छात्र को घायल छात्र लगातार परेशान कर रहा था जिसकी उसने शिकायत भी की थी. हालांकि डॉयचे वेले इन आरोपों की पुष्टि नहीं कर सकता. इस बारे में एक ऑनलाइन याचिका भी शुरू की गई है जिस पर 16 हजार से ज्यादा लोग दस्तखत कर चुके हैं. इस याचिका में सिखों के खिलाफ बुलिंग रोकने और स्कूल पर कार्रवाई करने की मांग की गई है. काउंसलर मनिंदर सिंह कहते हैं, "बुलिंग के कारण विभिन्न धर्मों के कई मासूम छात्र परेशान हुए हैं. स्कूल प्रशासन को इस घटना को गंभीरता से लेना चाहिए.”
ठोस नीति की जरूरत
रवींद्रजीत सिंह कहते हैं कि सिखों को कृपाण धारण करने की इजाजत समरी ऑफेंसेस एक्ट 1988 के तहत मिली है और कृपाण को स्कूलों या दफ्तरों में हथियार के तौर पर नहीं ले जाया जाता है बल्कि यह एक धार्मिक प्रतीक है. लेकिन ग्लेनवुड स्कूल की घटना ने इस कानून को बहस के केंद्र में ला दिया है. सरकार ने इस कानून की समीक्षा का फैसला किया है और बहुत से लोग इस समीक्षा को जरूरी मानते हैं.
मेलबर्न स्थित अकादमिक और फिल्मकार डॉ विक्रांत किशोर कहते हैं कि एक ठोस नीति की जरूरत है जिसमें सुरक्षा और धार्मिक स्वतंत्रता दोनों का ध्यान रखा जाए. डॉ किशोर कहते हैं, "एक पिता होने के नाते तो मैं यही समझता हूं कि स्कूल में किसी भी तरह के हथियार पर पाबंदी होनी चाहिए, फिर आधार चाहे कुछ भी हो. लेकिन मैं इस बात को भी मानता हूं कि धार्मिक स्वतंत्रता को पूरा सम्मान मिलना चाहिए और सभी को धार्मिक स्वतंत्रता की पूरी समझ भी होनी चाहिए. इसलिए समुदाय से बात करके एक नीति बनानी चाहिए जिसमें छात्रों की सुरक्षा प्राथमिकता में रहे.”
वैश्विक बहस
कृपाण को लेकर बहस नई नहीं है. ऑस्ट्रेलिया में ही कृपाण को लेकर अलग-अलग वक्त पर कानून बदलते रहे हैं. 2012 में सरकार ने वेपन्स एक्ट 1990 में एक बदलाव किया था जिसके तहत कृपाण स्कूलों में प्रतिबंधित हो गई थीं. इसके खिलाफ तब सिख समुदाय ने काफी विरोध किया था.
लेकिन अन्य देशों की सरकारें भी कृपाण को लेकर पसोपेश में रही हैं. कनाडा में वहां के सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि धार्मिक चिह्नों को बैन करना संविधान का उल्लंघन है जिसके बाद वहां स्कूलों में सीलबंद करके कृपाण ले जाए जाने को इजाजत दी गई है. इसके उलट डेनमार्क में ही हाई कोर्ट ने छह सेंटीमीटर से ज्यादा लंबा चाकू रखने के लिए धर्म को आधार मानकर इजाजत देने से इनकार कर दिया था.
2017 में यही मुद्दा इटली में भी गरमा गया था जब एक सिख आप्रवासी कृपाण धारण करना चाहता था और उस पर जुर्माना लगा दिया गया था. इसके खिलाफ उसने अदालत में गुहार लगाई थी. तब देश के सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि जो आप्रवासी इटली में रहना चुनते हैं उन्हें यहां के कानूनों का पालन करना होगा और लोगों की सुरक्षा सर्वोपरि है. (dw.com)
चिली के सत्तारूढ़ दक्षिणपंथी गठबंधन को बड़ा झटका लगा है क्योंकि उसे देश का नया संविधान बनाने वाली काउंसिल में एक तिहाई सीटें भी नहीं मिल पाई हैं. सबसे ज्यादा सीटें निर्दलीयों को मिली हैं.
रविवार को हुए मतदान में राष्ट्रपति सेबास्टियन पिन्येरा के चिली वामोस गठबंधन के उम्मीदवार बीस प्रतिशत वोट ही जीत पाए हैं जबकि ज्यादातर मत निर्दलीय उम्मीदवारों को मिले हैं. देश का नया संविधान बनाने के लिए चुने जा रहे ये लोग एक अहम काउंसिल चिली वामोस बनाएंगे, जिसके प्रस्ताव को पास होने के लिए दो तिहाई मतों की जरूरत होगी. यानी सरकार के पास संविधान परिषद के प्रस्ताव रोकने या पास करवाने के लिए पर्याप्त मत नहीं होंगे.
चिली वामोस के उम्मीदवारों को हाल के दिनों में मेयर, गवर्नर और म्यूनिसिपल चुनावों में करारी हार मिली है जिसके बाद गठबंधन के लिए नवंबर में होने वाले आम चुनावों की राह मुश्किल हो गई है. देशा का नया संविधान बनाने की मांग अक्टूबर 2019 में उठी जब जगह-जगह गैरबराबरी के खिलाफ जोरदार प्रदर्शन हुए थे. मौजूदा संविधान 1973-1990 के बीच ऑगस्टो पिनोशे की तानाशाही के दौरान बनाया गया था और आमतौर पर इसे बड़े व्यापारियों के पक्ष में माना जाता है.
निर्दलीयों की जीत
नया संविधान बनाने वाली काउंसिल के लिए 155 उम्मीवारों का चुनाव होना है. इन सीटों के लिए देश के विभिन्न दलों के बीच तीखा मुकाबला चल रहा था. हालांकि चिली वामोस को भरोसा था कि उसके उम्मीदवार आसानी से काउंसिल में एक तिहाई जगह बना लेंगे. लेकिन जनता ने राष्ट्रीय दलों के बजाय आजाद उम्मीदवारों को चुनकर सबको हैरान कर दिया है.
सीएनएन के स्थानीय चैनल के मुताबिक काउंसिल में निर्दलीय उम्मीवारों को 45 सीटें मिलेंगी. चिली वामोस को 39, उदार वामपंथियों को 25 और उग्र वामपंथियों को 28 सीटें मिलने की संभावना है. एक सीट एक अन्य छोटे गठबंधन को जा सकती है. 17 सीटें देश के आदिवासी समुदाय के लिए आरक्षित हैं. संविधान का नया चार्टर बनाने के लिए 12,00 से ज्यादा लोगों ने चुनाव लड़ा था जिनमें ऐक्टर, लेखक, सामाजिक कार्यकर्ता, राजनेता, टीवी होस्ट और फैशन मॉडल तक शामिल थे.
जीतने वालों में फ्रैंचिस्का लिंकोनाओ शामिल हैं. वह मापुशे आदिवासी समुदाय की माची अध्यात्मिक नेता हैं और आतंकवादियों से संपर्कों के आरोपों में उन्हें जेल में डाल दिया गया था. हालांकि बाद में सारे आरोप वापस ले लिए गए.
राजनीतिक दलों को संदेश
मतदान के नतीजों के बाद राष्ट्रपति पिन्येरा ने कहा कि सरकार और अन्य दलों को जनता के स्पष्ट संदेश को सुनना चाहिए कि वे जनता की जरूरतों पर ध्यान नहीं दे रहे हैं. उन्होंने कहा कि यह चिली के लोगों के ले एक निष्पक्ष, समावेशी, स्थिर और विकासशील देश बनाने का बड़ा मौका था. वैसे पिन्येरा ने संविधान परिषद को संविधान में बहुत बड़े बदलाव करने के खिलाफ भी आगाह किया है. कई लोगों ने आशंका जताई है कि संविधान में बड़े बदलाव दक्षिण अमेरिका में चिली एक स्थिर लोकतांत्रिक और धनी देश के दर्जे के लिए खतरनाक हो सकते हैं.
सत्तारूढ़ चिली वामोस की टिकट पर परिषद में चुनी गईं मार्चेला क्यूबिलोस कहती हैं कि दक्षिणपंथियों को अब नए गठबंधन बनाने होंगे. उन्होंने मीडिया से कहा, "नतीजों ने ऐसे गठबंधनों को जरूरी बना दिया है.” कोविड महामारी के दौरान फैली बेरोजगारी और गरीबी ने सरकार की लोकप्रियता को खासा नुकसान पहुंचाया है. अपनी पेंशन में से धन निकालने से रोके जाने जैसे कदमों को लेकर लोग सरकार से नाराज हैं.
नए संविधान से उम्मीदें
जिन बदलावों को लेकर ज्यादा चर्चा है उनमें जमीन और पानी पर निजी अधिकार और रोजगार कानूनों में फेरबदल शामिल हैं. देश के उग्र वामपंथी ब्रॉड फ्रंट गठबंधन के नेता गैब्रिएल बोरिस कहते हैं कि चुनाव के नतीजों ने दुनिया के सबसे बड़े तांबा उत्पादक चिली में एक बड़े बदलाव की राह तैयार कर दी है. उन्होंने कहा, "हम अपनी आदिवासी आबादी के लिए एक नए समझौते की उम्मीद कर रहे हैं
हम अपने प्रकृतिक संसाधनों को वापस चाहते हैं और ऐसा देश बनाना चाहते हैं जिसमें सबके लिए अधिकार सुनिश्चित हों. नया चिली बनाने के लिए हम शून्य से शुरू करने जा रहे हैं.” नया संविधान बनाने के लिए सदस्य अधिकतम एक साल का समय लेंगे और फिर अंतिम प्रस्तावों पर देश के लोग फिर से मतदान करेंगे. अगर ये प्रस्ताव पारित नहीं होते हैं तो मौजूदा संविधान ही लागू रहेगा.
वीके/सीके (रॉयटर्स)
-क्रिस्टोफ़र गाइल्स, जैक गुडमैन
दुनिया की सबसे घनी आबादी वाले इलाक़ों में से एक ग़ज़ा गूगल मैप पर धुंधला क्यों दिखाई देता है?
ओपन सोर्स, सार्वजनिक तौर पर उपबल्ध जानकारी (मैपिंग डेटा जो हमलों और नुकसान के डॉक्यूमेंटेशन के लिए इस्तेमाल किया जाता है) की मदद से शोधकर्ताओं ने इस मुद्दे को सामने रखा.
पेशे से ओपन-सोर्स इन्वेस्टिगेटर समीर कहते हैं, "वास्तविकता ये है कि हमें इसराइल और फ़लस्तीनी क्षेत्रों से हाई-रेज़ोल्यूशन वाली सैटेलाइट इमेज नहीं मिलती हैं."
दरअसल, इसराइल और फ़लस्तीन के ज़्यादातर इलाक़े गूगल अर्थ पर लो-रेज़ोल्यूशन सैटेलाइट इमेज के तौर पर दिखते हैं, भले ही सैटेलाइट कंपनियों के पास उच्च गुणवत्ता वाली तस्वीरें मौजूद हों.
सैटेलाइट इमेज में ग़ज़ा शहर में कारों को देख पाना बहुत ही मुश्किल से संभव है.
अगर इसकी तुलना उत्तर कोरिया की 'रहस्यमयी' राजधानी प्योंगयांग से करें, तो यहां भी कारें एकदम स्पष्ट तौर पर दिखाई पड़ती हैं. साथ ही लोगों को भी देख पाना संभव है.

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बायीं ओर गूगल अर्थ से ली गई ग़ज़ा का तस्वीर, दाहिनी ओर हाल ही में ली गई प्योंगयांग की तस्वीर
सैटेलाट से ली गईं तस्वीरों का महत्व क्या है?
अगर आप हिंसा और संघर्ष प्रभावित क्षेत्रों की पत्रकारिता कर रहे हैं तो ऐसी तस्वीरें रिपोर्टिंग का एक अहम हिस्सा बन चुकी हैं.
इसराइल-फ़लस्तीन के बीच जारी संघर्ष को समझने के लिए जांचकर्ता सैटेलाइट से ली गई तस्वीरों का इस्तेमाल करना चाह रहे हैं. ताकि ये समझ सकें कि मिसाइल से हमला कहां हुआ और ग़ज़ा में किस इमारत को निशाना बनाया गया.
सामान्य तौर पर गूगल अर्थ इस तरह की तस्वीरों के लिए इस्तेमाल किया जाना जाने वाला सबसे लोकप्रिय और आसान प्लेटफॉर्म है लेकिन गूगल अर्थ पर अगर ग़ज़ा की हालिया तस्वीर देंखें तो ये लो-रेज़ोल्यूशन की हैं और इसलिए काफी धुंधली भी हैं.
बेलिंगकैट के पत्रकार एरिक टोलर ने इस संदर्भ में एक ट्वीट किया है.
वो लिखते हैं, "गूगल अर्थ पर सबसे नवीनतम तस्वीर साल 2016 की है और ये बिल्कुल बेकार दिखती है. मैंने सीरिया के कुछ ग्रामीण इलाकों को ज़ूम-इन करके देखने की कोशिश की और उस समय से इसकी क़रीब 20 तस्वीरें हैं जो हाई-रेज़ोल्यूशन में ली गई हैं."
वहीं, गूगल का कहना है कि वो पूरी कोशिश करता है कि घनी आबादी वाले इलाक़ों की तस्वीर को नियमित तौर पर री-फ्रेश करता रहे लेकिन ग़ज़ा के मामले में ऐसा नहीं है.
क्या हाई-रेज़ोल्यूशन वाली तस्वीरें उपलब्ध हैं?
पिछले साल तक अमेरिका ने इसराइल और फ़लस्तीन के इलाक़ों की सैटेलाइट तस्वीरों की गुणवत्ता पर प्रतिबंध लगा रखा था जिसे अमेरिकी कंपनियों को कारोबारी आधार पर दिये जाने की अनुमति थी.
इस प्रतिबंध का उल्लेख साल 1997 में बने अमेरिकी क़ानून काइल-बिंगमैन संशोधन (केबीए) में किया गया था. ये कानून इसराइल की सुरक्षा चिंताओं के मद्देनज़र लाया गया था.
केबीए के तहत, अमेरिकी सैटेलाइट इमेज मुहैया कराने वालों को इस बात की अनुमति थी कि वे कम रेज़ोल्यूशन की तस्वीर दे सकते हैं.
हालांकि ये कोई नई बात नहीं है कि सैन्य ठिकानों जैसी जगहों को धुंधला दिखाया जाए. लेकिन केबीए इकलौता ऐसा मामला था जिसके तहत एक पूरे देश के लिए यह प्रतिबंध लागू था.
एक और बात, केबीए के तहत सिर्फ़ इसराइल का ज़िक्र किया गया था लेकिन इसे फ़लस्तीनी क्षेत्रों पर भी लागू किया गया था.
हालांकि एक बार गैर-अमेरिकी कंपनी जैसे फ्रांस की कंपनी एयरबस इन तस्वीरों को हाई-रेज़ोल्यूशन में मुहैया कराने की स्थिति में आ गई थी, जिसके बाद अमेरिका पर अपने प्रतिबंधों को समाप्त करने का दवाब बढ़ गया.
साल 2020 की जुलाई में केबीए को हटा दिया गया. जिसके बाद अब अमेरिकी सरकार ने अमेरिकी कंपनियों को इन क्षेत्रों की हाई-रेज़ोल्यूशन वाली तस्वीरें देने की अनुमति दे दी है.
ऑक्सफ़र्ड यूनिवर्सिटी में ऑर्कियोलॉजिस्ट मिशेल फ्रेडले के मुताबिक़, "प्रारंभिक प्रेरणा वैज्ञानिक थी."
फ्रेडले उन शिक्षाविदों में से एक हैं जिन्होंने इस संशोधन को बदलने के लिए अभियान चलाया था.
उनके अनुसार, "हम अपने प्रोजेक्ट्स पर काम करने के लिए सही डेटा स्रोत चाहते थे इसलिए हमें कब्ज़े वाले फ़लस्तीन क्षेत्रों की हाई-रेज़ोल्यूशन वाली तस्वीरें चाहिए थीं. हम किसी क्षेत्र विशेष के अध्ययन के लिए इन तस्वीरों का इस्तेमाल करते हैं."

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बाएं- गूगल अर्थ से ली गई ग़ज़ा के हनादी टावर की तस्वीर, दाएं- हाई रेज़ोल्यूशन तस्वीर में दिख रहा है कि टावर नष्ट हो चुका है
तो ग़ज़ा अभी भी धुंधला क्यों है?
बीबीसी ने समझने के लिए गूगल और ऐपल से बात की. (जिनके मैपिंग ऐप्स भी सैटेलाइट इमेज दिखाते हैं.)
ऐपल ने कहा कि वो जल्द ही अपने मैप्स को 40cm के हाई-रेज़ोल्यूशन पर अपडेट करने के लिए काम कर रहा है.
गूगल ने बताया कि उसके पास जो इमेज होती हैं उसका कोई एकमात्र सोर्स नहीं, वो कई प्रोवाइडर्स से आती हैं और जब हाई-रेज़ोल्यूशन की इमेज मिलती है तो वह उसे अपडेट करने पर भी विचार करता है.
लेकिन उन्होंने यह भी कहा कि फिलहाल "अभी ऐसा करने की उनकी कोई योजना नहीं" है.
बेलिंगकैट के ओपन-सोर्स इंवेस्टिगेटर के तौर पर काम करने वाले निक वॉटर्स कहते हैं, "मौजूदा घटनाओं के महत्व को देखते हुए, मुझे ऐसा कोई कारण समझ नहीं आता है कि आख़िर क्यों इस क्षेत्र को लो-रेज़ोल्यूशन का दिखाया जा रहा है."
लेकिन ये तस्वीरें लेता कौन है?
पब्लिक मैपिंग प्लेटफ़ॉर्म जैसे गूगल अर्थ और ऐपल मैप्स आमतौर पर उन कंपनियों पर निर्भर हैं जिनके पास तस्वीरें देने के लिए अपने सैटेलाइट्स हैं.
मैक्सार और प्लैनेट लैब्स वो दो सबसे बड़ी कंपनियां हैं जो फिलहाल इसराइल और ग़ज़ा की हाई-रेज़ोल्यूशन तस्वीरें मुहैया करा रही हैं.
मैक्सार ने अपने एक बयान में कहा है कि "हाल के सालों में जिस तरह अमेरिका ने अपने नियमों में बदलाव किया है उसके फलस्वरूप इसराइल और ग़ज़ा की सैटेलाइट तस्वीरें 40 सेंटीमीटर रेज़ोल्यूशन पर दी जा रही हैं."
वहीं प्लैनेट लैब्स ने इस बात की पुष्टि की है कि वो 50 सेंटीमीटर रेज़ोल्यूशन पर सैटेलाइट तस्वीरें देता है.
ओपन सोर्स जांचकर्ता हालांकि फ्री-टू-यूज़ मैपिंग सॉफ़्टवेयर पर बहुत अधिक भरोसा करते हैं और अक्सर उनकी इन हाई-रेज़ोल्यूशन वाली तस्वीरों तक सीधी पहुंच नहीं होती.

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सैटेलाइट से ली गई बर्बाद हो चुके रोहिंग्या गांवों की तस्वीरें
हाई रेज़ोल्यूशन वाली तस्वीरों से क्या पता चल सकता है?
ह्यूमन राइट्स वॉच के शोधकर्ता ने साल 2017 में प्लैनेट लैब्स के साथ मिलकर म्यांमार में सेना द्वारा रोहिंग्या गांवों को नष्ट किये जाने की बात ज़ाहिर की थी.
इन तस्वीरों से उन्होंने उस क्षेत्र के दो सौ गांवों की पहले और बाद की तस्वीरों की तुलना करते हुए मैप तैयार किया था. जिससे गांवों को हुए नुकसान को समझना आसान हुआ. ये सभी तस्वीरें 40 सेंटीमीटर की हाई-रेज़ोल्यूशन वाली थीं.
इन तस्वीरों ने रोहिंग्या लोगों के दावों की पुष्टि करने में अहम भूमिका निभाई.

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चीन में री-एजुकेशन कैंप
इसके अलावा चीन के शिनझियांग क्षेत्र में क्या हो रहा है, इस पर नज़र रखने के लिए भी सैटेलाइट तस्वीरें अहम रही हैं.
जिनकी मदद से ही वीगर मुसलमानों के लिए चीन द्वारा चलाए जा रहे "री-एजुकेशन" केंद्रों का भी पता चला. (bbc.com)
इसराइल के प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू ने रविवार को ट्वीट करके कहा था कि मौजूदा समय में 25 देशों ने उसका समर्थन किया है लेकिन उनके दावों को ख़ारिज करते हुए बोस्निया और हर्ज़ेगोविना की विदेश मंत्री ने कहा कि उनके देश ने ऐसा कोई समर्थन नहीं किया था.
बोस्निया और हर्ज़ेगोविना की विदेश मंत्री बिसेरा तुर्कोविच ने कहा है कि उनके देश ने कभी भी इसराइल का समर्थन नहीं किया है.
उन्होंने बयान जारी किया है जिसे उनके ट्विटर हैंडल से ट्वीट किया गया है.
ट्वीट में लिखा है, "बोस्निया और हर्ज़ेगोविना का ध्वज केवल शांति का समर्थन करता है और फ़लस्तीनी क्षेत्रों के ध्वज के लिए एक उचित समाधान प्राप्त करने के प्रयासों का समर्थन करता है. इज़राइल का ध्वज हिंसा, स्थायी शांति और स्थिरता की ओर नहीं ले जाता है."
"हम उन हमलों को तत्काल समाप्त करने का आह्वान करते हैं जिनमें निर्दोष लोग मारे जाते हैं, और हम दोनों देशों को शामिल करने वाले समाधान का समर्थन करते हैं, यह मानते हुए कि केवल बातचीत ही स्थायी शांति ला सकती है. हम उन पहलों का भी समर्थन करते हैं जो हिंसा की लहर को रोकने में मदद करेंगी."
विदेश मंत्री के अलावा बोस्निया और हर्ज़ेगोविना के राष्ट्रपति परिषद के बोस्नियाई सदस्य सेफ़िक ज़ाफ़ेरोविच ने भी कहा है कि उनका देश मासूम नागरिकों की हत्या का समर्थन नहीं करता है.
उन्होंने फ़ेसबुक पर लिखा, "मेरा प्रधानमंत्री नेतन्याहू को यह संदेश है कि बोस्निया और हर्ज़ेगोविना ग़ज़ा में इसराइली सैन्य बलों द्वारा मासूम लोगों की हत्या का समर्थन न ही करता है और न ही कर सकता है."
उन्होंने नेतन्याहू से ग़ज़ा पर 'लगातार हमले' बंद करने और फ़लस्तीनी और इसराइली लोगों के लिए शांति स्थापित करने में योगदान देने को कहा है.
इसराइल के प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू ने रविवार सुबह एक ट्वीट किया था जिसमें उन्होंने मौजूदा समय में इसराइल का समर्थन कर रहे 25 देशों को शुक्रिया कहा था.
नेतन्याहू ने अपने ट्वीट में सबसे पहले अमेरिका, फिर अलबेनिया, ऑस्ट्रेलिया, ऑस्ट्रिया, बोस्निया और हर्ज़ेगोविना, ब्राज़ील, कनाडा, कोलंबिया, साइप्रस, जॉर्जिया, जर्मनी, हंगरी, इटली, स्लोवेनिया और यूक्रेन समेत कुल 25 देशों का ज़िक्र किया था.
उन्होंने लिखा था कि "आतंकवादी हमलों के ख़िलाफ़ आत्मरक्षा के हमारे अधिकार का समर्थन करने और इसराइल के साथ मज़बूती से खड़े होने के लिए आप सभी का धन्यवाद."
हालांकि, इस ट्वीट में नेतन्याहू ने भारत का ज़िक्र नहीं किया था.
जबकि भारत की सत्ताधारी पार्टी बीजेपी के कई नेता और दक्षिणपंथी विचारधारा के समर्थक लगातार इसराइल की पीठ थपथपा रहे हैं और उसके समर्थन में सोशल मीडिया पर लगातार सक्रिय हैं. (bbc.com)
अफगानिस्तान में 8 मई को एक स्कूल के बाहर हुए बम धमाके के बाद भी लड़कियों के मन में किसी तरह का खौफ नहीं है. वे स्कूल जाना नहीं छोड़ना चाहती और अपनी पढ़ाई को जारी रखना चाहती हैं.
राजधानी काबुल के एक स्कूल के पास हुए बम धमाके में फरजाना असगरी की 15 साल की छोटी बहन की मौत हो गई. फरजाना अपनी छोटी बहन की कब्र पर खड़े होकर सिसक रही हैं. दोनों बहन इसी स्कूल में पढ़ती थी. सैयद उल शहादा स्कूल के पास हुए धमाके में 80 लोगों की मौत हो गई थी और 160 लोग घायल हुए थे. धमाका ऐसे वक्त हुआ था जब लड़कियां स्कूल से घर जाने के लिए निकली थीं. फिर भी छात्र, परिवार और शिक्षक जिन्होंने थॉमसन रॉयटर्स फाउंडेशन से बात की सभी ने शिक्षा के प्रति अपनी प्रतिबद्धता जाहिर की है.
देश में तालिबान के 1996 से 2001 के शासन के दौरान लड़कियों के स्कूल जाने पर रोक थी. फरजाना अपनी तीन बहनों के साथ इसी स्कूल में पढ़ाई करती हैं, वह भी धमाके के दौरान फंस गई थी, लेकिन वह स्कूल के फिर से खुलने पर लौटने के लिए दृढ़ संकल्प वालों में से हैं. वह कहती हैं, "मैं दोबारा जाऊंगी, एक और हमला होता है तो भी मैं जाऊंगी." 18 साल की फरजाना कहती हैं, "मैं निराश होने वालों में से नहीं हूं. हमें ज्ञान और शिक्षा हासिल करने के लिए डरना नहीं चाहिए."
शिक्षा के लिए बेताब हैं लड़कियां
फरजाना के 53 साल के पिता मोहम्मद हुसैन कहते हैं कि वे डरे हुए हैं लेकिन लड़कियों को घर पर नहीं रखेंगे. उनके लिए यह फैसला कड़ा है. हुसैन कहते हैं, "मेरी सात बेटियां हैं और मैं सभी को शिक्षित होता देखना चाहता हूं." अमेरिका और कई अन्य पश्चिमी देशों ने लड़कियों की शिक्षा को अफगानिस्तान में विदेशी सैनिकों की मौजूदगी को सालों की प्रमुख सफलताओं में से एक के रूप में माना है. लेकिन सुरक्षा स्थिति बिगड़ती जा रही है क्योंकि विदेशी सेना देश से लौटने की तैयारी कर रही है. विदेशी सेना की वापसी के कारण लड़कियों की शिक्षा के क्षेत्र में जो कामयाबी हासिल हुई है उस पर खतरा मंडराता जा रहा है. तालिबान का कहना है वह लड़कियों की शिक्षा के लिए राजी है लेकिन वह शरिया या फिर इस्लामी कानून का हवाला देता है.
दो दशक में महिलाओं ने काफी तरक्की की
दोहा में शांति वार्ता में कुछ महिला वार्ताकारों में से एक फौजिया कूफी कहती हैं कि अफगानिस्तान ने पिछले दो दशक में परिवर्तनकारी बदलाव देखे हैं. कूफी कहती हैं, "मैंने तालिबान के साथ वार्ता में इसी अफगानिस्तान के बारे में ध्यान आकर्षित करने की कोशिश की थी. मैंने उन्हें आधुनिक वास्तविकताएं अपनाने के लिए कहा था." वे कहती हैं कि लड़कियों के शिक्षा केंद्रों पर हमले बढ़े हैं. 1996-2001 तक तालिबान ने अपने शासन के दौरान इस्लामी कानून का एक ऐसा रूप लोगों पर थोपा जो महिलाओं के अधिकारों के प्रति पूरी दुनिया में सबसे कठोर कानूनों में से था. महिलाओं को अपने शरीर और चेहरे को पूरी तरह से बुर्के से ढकना अनिवार्य था. यूएस एजेंसी फॉर इंटरनेशनल डेवलपमेंट (यूएसऐड) के मुताबिक अफगानिस्तान में 35 लाख लड़कियां स्कूल जाती हैं. संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक चार दशकों के युद्ध के बाद अफगानिस्तान की साक्षरता दर 43 प्रतिशत है, लेकिन सिर्फ 30 फीसदी महिलाएं ही साक्षर हैं.
ह्यूमन राइट्स वॉच में महिला अधिकार डिवीजन की अंतरिम सह-निदेशक हीथर बर कहती हैं कि 8 मई जैसा हमला गंभीर प्रभाव डालता है. बर कहती हैं, "जब हम लड़कियों और उनके-माता से पूछते हैं कि लड़कियां स्कूल क्यों नहीं जाती तो हमें अक्सर स्कूलों पर हमले के बारे में कहा जाता." वे कहती हैं, "यह वास्तव में दिखाता है कि कैसे कई माता-पिता हैं जो अपनी बेटियों को पढ़ाने के लिए बेताब हैं. लेकिन वे इस डर से अपनी इच्छा को मार देते हैं कि उनकी बेटी स्कूल जाएगी और घर नहीं लौटेगी."
16 साल की हमीदा नवी सदा काबुल के जिन्ना अस्पताल में भर्ती है. स्कूल के बाहर हुए धमाके में उसके दाहिने हाथ में चोट लगी थी, अब उसके हाथ पर प्लास्टर लगा है. धमाके वाले दिन का मंजर उसे आज भी याद है. फिर भी अपनी शिक्षा जारी रखने का उसका संकल्प अटल है. वह कहती है, "यह हमला अफगानिस्तान की नई पीढ़ी के खिलाफ था. वे नई पीढ़ी को अंधकार में धकेलना चाहते हैं लेकिन हम उज्ज्वल भविष्य की ओर जाएंगे." नवी सदा को अब भी नहीं पता है कि उसके साथ पढ़ने वाली कितनी लड़कियां बच पाई या नहीं. (dw.com)
एए/सीके (थॉमसन रॉयटर्स फाउंडेशन)
अमेरिका, ब्रिटेन और यूरोप के देशों से अपील की जा रही है कि वो कोविड के टीकों की कमी से जूझ रहे देशों की मदद करें. दुनिया की मदद करने के लिए अमीर देशों को अपने टीकों में से सिर्फ 20 प्रतिशत साझा करने की जरूरत है.
संयुक्त राष्ट्र की बाल अधिकार संस्था यूनिसेफ ने कहा है कि जी7 और यूरोपीय संघ के सदस्य देश बिना अपने हितों के साथ समझौता किए उन देशों को कोविड टीकों की 15 करोड़ खुराकें दे सकते हैं जो इस समय इनकी कमी से जूझ रहे हैं. ब्रिटेन की एक कंपनी एयरफिनिटी द्वारा किए गए एक अध्ययन में सामने आया है कि इन देशों ने जून, जुलाई और अगस्त में इस्तेमाल करने के लिए अपने पास टीकों की जो खुराक जमा कर रखी है, वो अगर उसमें से सिर्फ 20 प्रतिशत दुनिया के साथ साझा करें तो दुनिया में टीकों की कमी को कुछ कम किया जा सकता है.
यूनिसेफ की निदेशक हेनरियेट्टा फोर ने कहा, "और ये देश अपने नागरिकों से किए गए टीकाकरण के वादों को पूरे करने के साथ-साथ ऐसा कर सकते हैं." कनाडा, फ्रांस, जर्मनी, इटली, जापान और अमेरिका जी7 समूह के सदस्य हैं और जून में ब्रिटेन में जी7 का शिखर सम्मलेन होने वाला है. यूनिसेफ ने कहा कि उस समय तक टीकों के अंतरराष्ट्रीय वितरण के लिए बने गठबंधन गावी के पास उसकी योजना के मुकाबले 15 करोड़ खुराकों की कमी हो जाएगी.
भारत की भूमिका
गावी के तहत कोवैक्स नाम का कार्यक्रम चल रहा है जिसमें उसका साथ विश्व स्वास्थ्य संगठन और कोअलिशन फॉर एपिडेमिक प्रिपेयर्डनेस (सीईपीआई) दे रहे हैं. टीकों में आई कमी के लिए आंशिक रूप से भारत में संक्रमण की ताजा लहर भी जिम्मेदार है. कोवैक्स कार्यक्रम के तहत टीकों की अधिकतर खुराकों का उत्पादन भारत में ही होना था, जहां से उनका निर्यात भी होता, लेकिन अब भारत टीकों का इस्तेमाल अपने ही नागरिकों के लिए कर रहा है. यूनिसेफ के बयान में इस कमी को दूर करने के लिए तुरंत कार्रवाई करने की अपील की गई है.
बयान में कहा गया है, "जो अतिरिक्त खुराक उपलब्ध हैं उन्हें तुरंत साझा करना एक न्यूनतम, आवश्यक, आपात और काम-चलाऊ उपाय है और इसकी तुरंत जरूरत है." अमेरिका के पास साझा करने के लिए ऐस्ट्राजेनेका की छह करोड़ अतिरिक्त खुराक हैं. फ्रांस ने पांच लाख और स्वीडन ने 10 लाख खुराकों का वादा किया है, स्विट्जरलैंड भी ऐसी ही संख्या में खुराकें देने पर विचार कर रहा है. अभी तक दुनिया में टीकों की करीब 1.4 अरब खुराक दी जा चुकी हैं जिनमें से लगभग 44 प्रतिशत खुराक ज्यादा आय वाले देशों में दी गई हैं, जहां की आबादी दुनिया की कुल आबादी का सिर्फ 16 प्रतिशत है.
अमीर-गरीब देशों के बीच खाई
दुनिया की नौ प्रतिशत आबादी वाले और सबसे कम आय वाले 29 देशों में सिर्फ 0.3 प्रतिशत खुराक दी गई हैं. इसी अंतर की वजह से पिछले सप्ताह विश्व स्वास्थ्य संगठन ने कहा कि जिन देशों के पास पर्याप्त टीके हैं वो बच्चों और किशोरों को टीका देने की जगह वो खुराकें कोवैक्स को दे दें. इसके पीछे चिंता का कारण यह है कि जहां भी वायरस का फैलना जारी रहेगा वहां उसके नए नए घातक स्वरूप आते रहने की संभावना है, जिससे इम्युनिटी की दिशा में मिली सारी तरक्की धुल में मिल सकती है.
यूनिसेफ ने कहा है, "हमें चिंता है की भारत की घातक लहर इस बात का संकेत है कि इन चेतावनियों को अगर गंभीरता से नहीं लिया तो क्या हो सकता है. कई देशों में संक्रमण के मामलों में असाधारण उछाल आ रही है और स्वास्थ्य प्रणालियों चरमरा रही हैं, चाहे वो नेपाल, श्रीलंका और मालदीव्स जैसे भारत के आस पास के देश हों या अर्जेंटीना और ब्राजील जैसे दूर के देश." (dw.com)
सीके/एए (एएफपी)
इस्राएल और हमास के बीच लड़ाई थमने के कोई इमकान नजर नहीं आ रहे हैं. रविवार रात को दोनों तरफ से तेज हमले हुए और शांति के सारे प्रयास स्वाहा हो गए.
और गजा स्थित उग्रवादी संगठन हमास के बीच जारी संघर्ष दूसरे हफ्ते में प्रवेश कर गया है. हालांकि अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने दोनों पक्षों से संयम की अपील की है लेकिन फिलहाल लड़ाई का कोई अंत नजर नहीं आ रहा है. रविवार, 16 मई को भी गजा पर इस्राएली हमले जारी रहे और फलस्तीन में 42 लोग मारे गए. इनमें दस बच्चे भी हैं. उधर गजा की ओर से भी इस्राएल पर रॉकेट हमले जारी हैं. इस्राएली सेना के मुताबिक पिछले एक हफ्ते में हमास की ओर से 2,800 से ज्यादा रॉकेट दागे गए हैं.
200 से ज्यादा मौतें
इस्राएल के प्रधानमंत्री बेन्यामिन नेतन्याहू ने कहा है कि गजा में उनकी सेनाओं का अभियान पूरी ताकत से जारी है. नेतन्याहू ने रविवार को अपने मंत्रीमंडल की बैठक के बाद एक टीवी संबोधन में इस्राएली नागरिकों से कहा, "हम अब कार्रवाई कर रहे हैं, आपके लिए शांति स्थापित हो. इसमें कुछ समय लगेगा."
रविवार आधी रात के बाद उग्रवादियों ने इस्राएल के दक्षिणी शहरों बीरशीबा और अशकेलों पर रॉकेट दागे. चश्मदीदों ने बताया कि इस्राएली विमानों ने दर्जनों हमले किए. इस्राएली सेना का कहना है कि उसके निशानों में हमास का जासूसी केंद्र भी शामिल है. गजा में अब तक 197 लोग मारे गए हैं, जिनमें 58 बच्चे और 34 महिलाएं शामिल हैं. इस्राएली अधिकारियों ने अपने दस नागिरकों के मरने की बात कही है जिनमें दो बच्चे हैं.
अंतरराष्ट्रीय प्रयास जारी
अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने दोनों पक्षों को शांत करने की कोशिशें तेज की हैं, जिनका फिलहाल कोई असर नहीं दिख रहा है. अमेरिकी विदेश मंत्री ऐंटनी ब्लिंकन ने मिस्र के विदेश मंत्री से इस मुद्दे पर बातचीत के बाद ट्विटर पर लिखा, "सभी पक्षों को तनाव कम करना चाहिए. हिंसा फौरन बंद होनी चाहिए."
रविवार को यूएन सुरक्षा परिषद की बैठक हुई जिसमें अमेरिका ने कहा कि उसने सभी पार्टियों को बता दिया है कि युद्ध विराम के लिए राजी हों तो वह मदद करने को तैयार है. हालांकि इसका असर होता नहीं दिख रहा है. अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन ने कहा कि उनकी सरकार सभी पक्षों के साथ काम कर रही है. ईद के उपलक्ष्य में टीवी पर जारी किए गए एक रिकॉर्डेड संदेश में बाइडेन ने कहा, "हम भी मानते हैं कि इस्राएली और फलीस्तीनी दोनों को लोकतांत्रिक माहौल में सुरक्षित और स्वतंत्र जिंदगी जीने का समान अधिकार है."
न्यूयॉर्क में सुरक्षा परिषद के महासचिव अंटोनियो गुटेरेश ने सुरक्षा परिषद से कहा कि इस्राएल और गजा में आक्रामकता बेहद आपत्तिजनक है और लड़ाई को एकदम बंद करने की मांग होनी चाहिए. उन्होंने कहा, "यूएन सभी पक्षों से सक्रिय तौर पर संवाद कर रहा है ताकि तुरंत युद्धविराम हो सके." इस्राएल और हमास के बीच शांति स्थापना में पहले भी संयुक्त राष्ट्र के दूत अहम भूमिका निभा चुके हैं.
जॉर्डन के शासक अब्दुल्ला ने कहा है कि उनका राज्य कूटनीति के जरिए इस्राएली सेना की चढ़ाई रोकने की कोशिश कर रहा है. किंग अब्दुल्ला का परिवार येरुशलम में मुस्लिम और ईसाई स्मारकों का संरक्षक है. 1994 में इस्राएल और जॉर्डन के बीच शांति समझौता हुआ था.
वीके/एए (रॉयटर्स, एपी, एएफपी, डीपीए)
1960 में अंतरिक्ष में इन्सान के पहुंचने के बाद से सैकड़ों छोटे बड़े रॉकेट धरती और अंतरिक्ष के बीच आ-जा चुके हैं. इस्तेमाल के बाद अक्सर ये रॉकेट समुद्र में फेंक दिए जाते हैं. क्या यह अच्छी बात है?
लगभग एक हफ्ते तक दुनिया टकटकी लगाए देखती रही कि चीन का भेजा रॉकेट धरती पर कहां गिरेगा. चीन का यह विशाल अनियंत्रित रॉकेट सीजेड 5बी अंतरिक्ष से 9 मई को पृथ्वी पर लौटा. इन्सान का इस रॉकेट के गिरने की जगह पर कोई नियंत्रण नहीं था. 30 मीटर लंबा और पांच मीटर मोटा यह रॉकेट कहीं भी गिर सकता था. वैज्ञानिकों ने शुक्र मनाया कि रॉकेट मालदीव के निकट हिंद महासागर में गिरा. एक साल पहले एक रॉकेट आइवरी कोस्ट में एक घर पर गिरा था.
अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा के प्रशासक बिल नेल्सन कहते हैं कि चीन अंतरिक्ष के कूड़े को लेकर अपनी जिम्मेदारी निभाने में असफल हो रहा है. ऐसी राय रखने वाले नेल्सन अकेले नहीं हैं. हालांकि तस्वीर सिर्फ इतनी नहीं है कि चीन का रॉकेट धरती पर गिर रहा है. अमेरिका के हाथ भी इस ‘अपराध' में रंगे हैं.
सब हैं शामिल
ऑस्ट्रेलिया के ऐडिलेड की फ्लिंडर्स यूनिवर्सिटी में असोसिएट प्रफेसर एलिस गोरमन कहती हैं कि चीन थोड़ा शरारती तो रहा है. ‘डॉक्टर स्पेस जंक वर्सेस द यूनिवर्स' नामक किताब की लेखिका गोरमन ने डॉयचेवेले से बातचीत में कहा, "वे इस भरोसे पर चल रहे हैं कि ज्यादातर चीजें या तो वायुमंडल में प्रवेश करते हुए भस्म हो जाती हैं या फिर समुद्र या खाली पड़ी जमीन पर जा गिरती हैं. लेकिन पिछले साल आइवरी कोस्ट वाले अनुभव के बाद कहा जा सकता है कि यह भरोसा ज्यादा भरोसेमंद नहीं है.”
जब चीनी रॉकेट पृथ्वी पर लौट रहा था तो कई वैज्ञानिकों ने चिंता जताई थी. हालांकि चीन के विशेषज्ञों ने इन चिंताओं को खारिज कर दिया था. रॉकेट के धरती पर लौटने से पहले एक विशेषज्ञ सोंग जोंगपिंग ने ग्लोबल टाइम्स अखबार से कहा कि रॉकेट के अवशेषों का पृथ्वी पर लौटना एक सामान्य घटना है.
और वाकई यह एक सामान्य घटना है. उपग्रह और यहां तक कि स्पेस स्टेशन के टुकड़े भी पृथ्वी पर लौटते या गिरते हैं. और संख्याओं को देखा जाए तो चीन का रिकॉर्ड सबसे बुरा नहीं है. कई अन्य देश और निजी कंपनियां भी इसमें भागीदार हैं. गोरमन कहती हैं, "सबसे बड़े प्रदूषक हैं अमेरिका और रूस.”
अंतरिक्ष का ज्यादातर कचरा समुद्र में गिरता है, क्योंकि पृथ्वी पर जमीन कम है और समुद्र ज्यादा. विशेषज्ञ पॉइंट नीमो के पास दक्षिणी प्रशांत महासागर के निर्जन क्षेत्र को लक्ष्य करते हैं क्योंकि यह सबसे दूभर और निर्जन इलाका है. यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी की 2018 की एक ब्लॉग पोस्ट के मुताबिक 1971 से अब तक 260 रॉकेट इसी इलाके में गिरे हैं. यह संख्या सालाना बढ़ रही है. शायद इसीलिए पॉइंट नीमो को अंतरिक्ष यानों का कब्रिस्तान भी कहते हैं. लेकिन रॉकेट सिर्फ यहीं नहीं गिरते.
हार्वर्ड-स्मिथसोनियन सेंटर फॉर एस्ट्रोफिजिक्स इन केंब्रिज में अंतरिक्षविज्ञानी जोनाथन मैकडॉवल कहते हैं, "पॉइंट नीमो तो एक नाम है. लेकिन असल में यह जगह दक्षिणी प्रशांत, न्यूजीलैंड और चिली के बीच हर कहीं है. यह कोई एक केंद्र नहीं है. और अब लोग अन्य कई जगहों का इस्तेमाल कर रहे हैं.”
समुद्री जीवन के लिए खतरा?
मैक्डॉवल के मुताबिक अंतरिक्ष जगत में एक चलन चला है कि अंतरिक्ष में कम कचरा छोड़ा जाए क्योंकि यह भविष्य के अभियानों में रुकावट हो सकता है और संचार में भी बाधा पैदा कर सकता है. लेकिन इसका अर्थ है कि ज्यादा कचरा पृथ्वी पर आएगा. अब 2028 में स्पेस स्टेशन को तोड़ने की बात हो रही है. यानी यह भी दक्षिणी प्रशांत की तहों में गिरेगा. इसका समुद्री जीवन पर क्या असर होगा?
विशेषज्ञ इसके असर के बारे में अभी ज्यादा नहीं जानते. गोरमन कहती हैं, "कुछ अंतरिक्ष यानों के ईंधन जहरीले होते हैं. जैसे कि हाइड्राजीन. लेकिन क्रायोजेनिक ईंधन जहरीले नहीं होते. बेरिलियम और मैग्निशयम जैसी धातुएं भी होती हैं और बेरिलियम तो बहुत खतरनाक है.” यानी असर तो संभव है, लेकिन कितना इसके बारे में अभी जानकारी का अभाव है. गोरमन कहती हैं कि समुद्र का नमकीन पानी चीजों को जल्दी गला सकता है इसलिए बड़ा खतरा पृथ्वी की कक्षा में मौजूद खतरा है.
संयुक्त राष्ट्र में भारत के दूत टीएस तिरूमूर्ति ने सुरक्षा परिषद की बैठक के बाद कहा है कि भारत यरुशलम और ग़ज़ा में जारी हिंसा को लेकर चिंतित है.
भारतीय दूत ने कहा कि "भारत हर तरह की हिंसा की निंदा करता है, तत्काल तनाव ख़त्म करने की अपील करता है."
भारतीय दूत तिरूमूर्ति ने कहा, "भारत फ़लस्तीनियों की जायज़ माँग का समर्थन करता है और दो-राष्ट्र की नीति के ज़रिए समाधान को लेकर वचनबद्ध है."
उन्होंने कहा, "भारत ग़ज़ा पट्टी से होने वाले रॉकेट हमलों की निंदा करता है, साथ ही इसराइली बदले की कार्रवाई में भी बहुत बड़ी संख्या में आम नागरिक मारे गए हैं जिनमें औरतें और बच्चे भी शामिल हैं जो बहुत दुखद है."
एक भारतीय नागरिक की भी मौत
उन्होंने कहा, "इस हमले में एक भारतीय नागरिक की मौत हो गई है जो अश्कलोन में एक परिचारिका थीं, हमें उनके निधन से गहरा दुख पहुँचा है."
यह पहला मौक़ा है जब भारत ने इसराइल और फ़लस्तीनियों के बीच जारी ताज़ा संघर्ष के बारे में खुलकर अपना पक्ष सामने रखा है, इससे पहले भारत की ओर से कोई औपचारिक बयान जारी नहीं किया गया था.
भारतीय दूत ने कहा कि तत्काल तनाव घटाना समय की माँग है ताकि स्थिति न बिगड़े और नियंत्रण से बाहर न हो जाए.
तिरूमूर्ति ने कहा, "दोनों पक्षों को एकतरफ़ा कार्रवाई करके मौजूदा यथास्थिति में बदलाव की कोशिश नहीं करनी चाहिए, इसमें यरुशलम में किसी भी तरह का बदलाव न करना शामिल है."
उन्होंने कहा कि यरुशलम लाखों लोगों की आस्था का केंद्र है, भारत से हज़ारों लोग यरूशलम आते हैं क्योंकि यहाँ वह गुफ़ा है जिसमें भारत के सूफ़ी संत बाबा फ़रीद ध्यान किया करते थे. भारत ने इस गुफा का संरक्षण किया है.
उन्होंने कहा कि "यरुशलम के धार्मिक स्थलों पर ऐतिहासिक रूप से चली आ रही यथास्थिति का सम्मान किया जाना चाहिए जिनमें हरम शरीफ़ और टेंपल माउंट भी शामिल हैं."
उनका कहना है कि ताज़ा संघर्ष के बाद इसराइल और फ़लस्तीनी प्रशासन के बीच बातचीत दोबारा शुरू करने की ज़रूरत और बढ़ गई है. उन्होंने कहा, "किसी तरह का संवाद न होने की वजह से दोनों पक्षों के बीच अविश्वास और बढ़ रहा है."
उन्होंने कहा कि बातचीत न होने की स्थिति में भविष्य में भी ऐसे टकराव होंगे, उन्होंने बातचीत के लिए सकारात्मक माहौल तैयार करने पर ज़ोर दिया. (bbc.com)
-सलीम रिज़वी
अमेरिका में कई भव्य मंदिरों का निर्माण करने वाली संस्था बोचासंवासी अक्षर पुरुषोत्तम स्वामीनारायण संस्था या बैप्स के ख़िलाफ़ न्यूजर्सी के मंदिर में काम करने वाले मज़दूरों ने मुक़दमा किया है.
उनका आरोप है कि उनसे बंधुआ मज़दूरों की तरह काम कराया गया और उनको सही मेहनताना भी नहीं दिया गया.
मई की 11 तारीख को जिस दिन मुक़दमा किया गया उसी दिन अमेरिकी जांच संस्था एफ़बीआई ने रॉबिन्सवील इलाके में 159 एकड़ भूखंड पर स्थित बैप्स मंदिर पर छापा भी मारा.
छापे में अमेरिका के होमलैंड सिक्योरिटी और श्रम विभाग के एजेंट भी शामिल थे. खबरों के अनुसार, एफ़बीआई छापे के बाद करीब 90 कामगारों को मंदिर परिसर से बसों में बिठाकर ले गई. अब वे मज़दूर पुलिस के संरक्षण में हैं.
न्यूजर्सी में अमेरिका की संघीय अदालत में बैप्स ट्रस्ट के ख़िलाफ़ 200 से अधिक मज़दूरों की तरफ़ से दायर मुकदमे में अमेरिकी श्रम कानून के घोर उल्लंघन का आरोप लगाया गया है.

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मज़दूरों के पासपोर्ट ले लिए गए थे
मज़दूरों की तरफ़ से दायर मुकदमे के दस्तावेज़ों में कहा गया है कि स्वामी नारायण संस्था या बैप्स के अधिकारियों ने मज़दूरों को भारत से अमेरिका लाने के लिए वीज़ा अधिकारियों से भी सच छिपाया और मज़दूरों को वॉलंटियर्स की तरह पेश किया.
जब वे अमेरिका पहुंचे तो उन मज़दूरों के पासपोर्ट भी उनसे ले लिए गए थे.
मज़दूरों का कहना है कि उनको ठीक से खाना भी नहीं दिया जाता था, और सिर्फ़ दाल और आलू खाने को दिया जाता था. उनको ट्रेलर में रहने की जगह दी गई थी जहां बकौल मज़दूरों के उनको कई मुश्किलों का सामना करना होता था.
और उनको मंदिर परिसर से बाहर जाने या किसी बाहरी व्यक्ति से बात करने की भी अनुमति नहीं थी. मज़दूरों को डराया धमकाया जाता था कि उनको गिरफ़्तार करवा कर भारत भेज दिया जाएगा.
अदालती दस्तावेज़ों में दावा किया गया है कि सन 2018 से सन 2020 के दौरान मज़दूरों से रोज़ाना 12 घंटे से अधिक काम करवाया जाता था जिसमें पत्थर तोड़ना, भारी मशीनें चलाना, सड़क बनाना, सीवर लाईन बनाना आदि शामिल था.

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बीमारी के बाद एक मज़दूर की मौत
मज़दूरों का कहना है कि इतनी कड़ी मेहनत के बाद उन्हे महीने में सिर्फ़ 450 डॉलर या 35 हज़ार रुपये दिए जाते थे. इस तरह उन्हें क़रीब एक डॉलर प्रति घंटा की दर से मेहनताना दिया जाता था जो न्यूजर्सी के सरकारी क़ानून के मुताबिक़ कम से कम 12 डॉलर प्रति घंटा होना चाहिए.
अदालती दस्तावेज़ों में मज़दूरों ने आरोप लगाया है कि उन्हें अच्छी नौकरी का लालच देकर भारत से अमेरिका लाया गया था, मगर अमेरिका में उनको बंधुआ मज़दूर की तरह रखा गया. इन हालात में कम से कम एक मज़दूर की बीमारी के बाद मौत भी हो गई थी.
मज़दूरों के अनुसार इस घटना के बाद मुकेश कुमार नामक एक मज़दूर ने मदद के लिए एक वकील से संपर्क किया और अदालत जाने का फ़ैसला किया. 37 वर्षीय मुकेश कुमार अब भारत लौट गए हैं.
इन मज़दूरों की मदद करने वाली न्यूजर्सी की भारतीय मूल की एक वकील स्वाति सावंत ने न्यूयॉर्क टाइम्स से कहा कि मज़दूरों के साथ बुरा बर्ताव किया जा रहा था.
स्वाति सावंत ने कहा, "मज़दूर समझते थे कि अमेरिका में उन्हें अच्छी नौकरी मिलेगी और घूम-फिर सकेंगे. लेकिन उनको ये नहीं मालूम था कि उनके साथ जानवरों जैसा बर्ताव किया जाएगा और उनको मशीन समझा जाएगा कि जिनको कभी छुट्टी की ज़रूरत नहीं होगी."

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मज़दूरों द्वारा किए गए मुकदमे से जुड़े दस्तावेज़ की तस्वीर
स्वामीनारायण संस्था ने किया आरोपों से इनकार
इन मज़दूरों में से अधिकतर का संबंध भारत की अनुसूचित जाति से बताया जाता है.
अदालती दस्तावेज़ों में कहा गया है कि बैप्स के अधिकारियों ने मज़दूरों से अंग्रेज़ी में लिखे कई कागज़ात पर हस्ताक्षर कराए थे और इन मज़दूरों को नहीं मालूम था कि उनमें क्या लिखा है.
अदालत में इन मज़दूरों का मुकदमा लड़ने वाले एक वकील डैनियल वर्नर ने कहा, "ये मज़दूरों की प्रताड़ना का एक भयानक मामला है. और यह अधिक चिंताजनक इसलिए भी है क्यूंकि ये प्रताड़ना एक मंदिर के परिसर में कई वर्षों से जारी थी. इन मज़दूरों को झूठ बोलकर भारत से अमेरिका लाया गया और उनको बंधुआ मज़दूर की तरह रखा गया."
उधर, स्वामीनारायण संस्था या बैप्स ने इन आरोपों को नकारा है.
संस्था के एक प्रवक्ता लेलिन जोशी ने अमेरिकी समाचार पत्रों से बात करते कहा कि मंदिर में पत्थरों को खास तरह से तराशने के लिए इन मज़दूरों की विशेष महारत के तौर पर स्पेशलाइज़्ड आर्टीज़न्स की श्रेणी का वीज़ा लिया गया था.

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भारतीय मूल के देव भावेश का कहना है कि इस घटना से न तो मंदिर की पर और न ही हमारी आस्था पर कोई फ़र्क पड़ेगा
श्रद्धालुओं का क्या कहना है?
न्यूयॉर्क और न्यूजर्सी के इलाक़े में कई ऐसे लोग रहते हैं जो नियमित तौर पर बैप्स के मंदिरों में पूजा-पाठ करने जाते हैं. इमें से कई श्रद्धालुओं को मंदिर के ख़िलाफ़ लगे आरोपों पर हैरत हुई है.
न्यूजर्सी के एडिसन में रहने वाले भारतीय मूल के देव भावेश बीस सालों से अधिक समय से बैप्स के मंदिरों में पूजा और अन्य कार्यक्रमों में भाग लेते रहे हैं.
वह कहते हैं, "जब मैंने इन आरोपों के बारे में सुना तो मुझे बहुत झटका लगा. क्योंकि मेरा नाता इस संस्था से बहुत वर्षों से है और मैंने कभी कोई गलत काम होता नहीं देखा. मुझे नहीं पता कि आरोप क्यों लगाए गए लेकिन मैं कह सकत हूं कि इससे न तो मंदिर की गरिमा में और न ही हमारी आस्था पर कोई फ़र्क पड़ेगा."
न्यूजर्सी में भारतीय मूल के पूर्व असेंबली सदस्य उपेंद्र चिवुकुला भी इसी तरह के विचार रखते हैं. उन्होंने बैप्स के बारे में न्यूयॉर्क टाइम्स की खबर पर सवाल खड़े किए.
उपेंद्र चिवुकुला ने कहा, "मुझे नहीं मालूम कि इन आरोपों में कितनी सच्चाई है लेकिन जो मज़दूरों ने खाने की बात की है तो दाल तो हम भी खाते हैं. अब क्या मंदिर में चिकन दिया जाएगा खाने के लिए. और ट्रेलर में रहने की बात भी अजीब है. बैप्स के सीईओ हमारे मित्र हैं, वे भी कभी-कभार ट्रेलर में ही रहते हैं. न्यूयॉर्क टाइम्स ने तो ऐसी ख़बर को छाप कर सारे हिंदू मंदिरों को ही बदनाम किया है."

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मज़दूरों ने की हर्जाने की मांग
चिवुकुला बताते हैं कि बैप्स ट्रस्ट और उसके संतों और अधिकारियों से उनका कई दशक पुराना नाता है. वह कई वर्षों पहले उस समय को याद करते हुए बताते हैं कि जब बैप्स मंदिर में ही उस समय गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी से भी उनकी मुलाकात हुई थी. चिवुकुला का मानना है कि इस मामले में कुछ होने वाला नहीं है.
उधर, कई और संस्थाएं भी इस तरह बैप्स पर छापा मारे जाने से विचलित लग रही हैं. न्यूजर्सी में ही बैप्स समेत कई अन्य संस्थाओं ने कई जगहों पर मंदिर निर्माण का काम करवाया है और कुछ में अभी भी निर्माण जारी है. लेकिन उन मंदिरों के ख़िलाफ़ मज़दूरों की प्रताड़ना और कम वेतन के आरोप सामने नहीं आए हैं.
न्यूजर्सी में एडिसन इलाक़े में साई दत्ता पीठम मंदिर में निर्माण का काम जारी है.
साई दत्ता पीठम मंदिर के चेयरमैन और पुजारी रघु शर्मा संक्रमांची बताते हैं, "हम मंदिर के लिए कुछ सामान भारत से ले आए, और अमेरिका में ही मौजूद कई भारतीय मूल के इंजीनियर और आर्किटेक्ट मंदिर के निर्माण में मदद करते रहे, और यह सिलसिला 2 वर्षों से जारी है. अब तो निर्माण काम तक़रीबन पूरा होने वाला है."
इस मंदिर के अधिकारियों ने ज़ोर देकर कहा कि उनके मंदिर में सारा काम क़ानूनी तौर पर किया जा रहा है.
अदालत में मामला ले जाने वाले बैप्स मंदिर के मज़दूरों ने मांग की है कि उनको हर्जाना दिया जाए और उनके काम की पूरी तनख्वाह भी दी जाए. बैप्स मंदिर के वकीलों की टीम भी अदालत में अपने पक्ष का बचाव करने के लिए तैयारी में लगी है.
जानकारों का मानना है कि मज़दूरों द्वारा दायर किया गया यह मामला अदालत में लंबे समय तक चल सकता है. (bbc.com)
काबुल, 16 मई | इस्लामिक स्टेट (आईएस) के आतंकी समूह ने काबुल की एक मस्जिद में हुए विस्फोट की जिम्मेदारी ली है, जिसमें इमाम समेत कम से कम 12 लोग मारे गए। समाचार एजेंसी डीपीए के मुताबिक, आतंकवादी समूह के आधिकारिक प्रचार के लिए इस्तेमाल होने वाली समाचार एजेंसी नशीर के माध्यम से शनिवार देर रात जारी एक बयान में कहा गया कि हमले के लिए इमाम यानी मोहम्मद नुमान जिम्मेदार है, जो जिहादियों के खिलाफ लड़ाई को प्रोत्साहित करता है।
बयान में कहा गया है, "खिलाफत के सैनिकों ने मस्जिद में एक विस्फोटक उपकरण लगाया था।"
बयान की प्रामाणिकता को स्वतंत्र रूप से सत्यापित नहीं किया जा सका।
अफगान सुरक्षा अधिकारियों के अनुसार, शुक्रवार को रमजान के अंत को चिह्न्ति करने के लिए ईद-उल फितर त्योहार के दौरान काबुल प्रांत के शकर दारा जिले में किए गए हमले में कम से कम 15 अन्य घायल हो गए।
यह हमला उस समय हुआ, जब अफगान सरकार और तालिबान इस्लामिक ईद की छुट्टियों के लिए संघर्ष विराम में थे।
संघर्ष विराम शनिवार की आधी रात को समाप्त हुआ।
आईएस ने हाल ही में अफगानिस्तान में इलाका, नेताओं और अन्य लड़ाकों को खो दिया है।
तालिबान अफगान सरकार के अलावा चरमपंथियों से भी लड़ रहा है।
संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के अनुसार, आतंकवादी समूह अभी भी देश के विभिन्न हिस्सों में हमले करने में सक्षम है। (आईएएनएस)
इस्लामिक देशों के संगठन ऑर्गेनाइज़ेशन ऑफ़ इस्लामिक कोऑपरेशन यानी ओआईसी ने रविवार को हुई आपात बैठक में फ़लस्तीनियों पर हमलों के लिए इसराइल की आलोचना की.
बैठक के बाद एक बयान जारी कर ओआईसी ने चेतावनी दी कि धार्मिक संवेदनाओं को भड़काने की जानबूझकर की जा रही कोशिशों, फ़लस्तीनी लोगों और इस्लामिक दुनिया की भावनाओं को भड़काने की इसराइल की कोशिशों के भयानक परिणाम होंगे.
रविवार को हुई इस वर्चुअल बैठक के बाद ओआईसी ने बयान जारी कर कहा है कि वो इसराइल द्वारा फ़लस्तीनी इलाकों के कब्ज़े और वहां भेदभाव वाली व्यवस्था लागू करने का विरोध करता है.
ओआईसी की बैठक में इसराइल के ख़िलाफ़ अंतरराष्ट्रीय क़ानूनी कार्रवाई की मांग की गई है.
बयान में कहा गया है कि एक ख़ास अंतरराष्ट्रीय न्यायालय और विभिन्न संयुक्त राष्ट्र संघ की एजेंसियों के ज़रिए इसराइल को फ़लस्तीनी इन्फ़्रास्ट्रक्चर के साथ-साथ सार्वजनिक और निजी संपत्तियों को नुक़सान पहुंचाने के लिए हर्जाना और ज़रूरी सामग्री देने के लिए बाध्य किया जाना चाहिए.
बयान में कहा गया है कि "अल-क़ुद्स (यरूशलम) और अल-अक़्सा मुसलमानों के दो पहले क़िब्ला और तीसरी सबसे पवित्र मस्जिद है. इस्लामी दुनिया के लिए यह एक लाल रेखा है और वहां कोई स्थिरता या सुरक्षा नहीं है सिवाय इसके कि उसे क़ब्ज़े से मुक्त कराया जाए."
बयान में पूर्वी यरूशलम समेत फ़लस्तीनियों के इलाक़ों पर इसराइल के कब्ज़े और उनके धार्मिक स्थलों पर इसराइली हमले और ग़ज़ा पर हो रहे हमलों की निंदा की गई और कहा गया कि ये अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा के लिए सीधे तौर पर ख़तरा है.
"इन हालातों से पूरे इलाक़े और बाहर के लिए अस्थिरता पैदा हो सकती है और इसका असर पूरे क्षेत्र की सुरक्षा पर पड़ सकता है."
"ओआईसी ने तुरंत हिंसा रोकने की मांग की और कहा इस लड़ाई में आम लोगों और लोगों की संपत्ति का नुक़सान हो रहा है, जो अंतरराष्ट्रीय क़ानूनों और फ़लस्तीन के सवाल पर संयुक्त राष्ट्र के प्रस्ताव का उल्लंघन है."
ओआईसी ने फ़ैसला किया है कि इस मुददे पर जो प्रस्ताव पेश हुआ है उसे तुरंत लागू किया जाएगा और इस बारे में यूरोपीय कमिशन, संयुक्त राष्ट्र महासचिव, मानवाधिकारों के लिए संयुक्त राष्ट्र के हाई कमिश्नर और दूसरी अंतरराष्ट्रीय संगठनों को अवगत कराया जाएगा.
ओआईसी ने सभी सदस्य देशों से अपील की है कि वो फ़लस्तीनियों की मदद और अपने हक़ के लिए उनकी लड़ाई का समर्थन करने के लिए आगे आएं और उनके लिए आर्थिक सुरक्षा नेटवर्क भी बनाएं. ख़ासकर उन लोगों की मदद करें जिनके घर इसराइली हमलों में ध्वस्त हो गए हैं और जो बघर हो गए हैं. साथ ही सैकड़ों लोगों की मदद करने वाले राहत शिविरों की भी मदद करें.
इसराइल और ग़ज़ा के बीच जारी संघर्ष को लेकर रविवार को इस्लामिक देशों के संगठन ऑर्गेनाइज़ेशन ऑफ़ इस्लामिक कोऑपरेशन यानी ओआईसी ने एक आपातकालीन बैठक बुलाई.
लगातार गहराते टकराव को देखते हुए सऊदी अरब के अनुरोध पर ओआईसी ने यह बैठक बुलाई थी.
पाकिस्तान ने कहा, इसराइल की निंदा करने के लिए शब्द नहीं बचे
बैठक में पाकिस्तान के विदेश मंत्री शाह महमूद क़ुरैशी ने अपनी बात रखते हुए कहा कि इसराइल की निंदा करने के लिए उनके पास शब्द नहीं बचे हैं.
बैठक के दौरान शाह महमूद क़ुरैशी ने कहा कि पाकिस्तान फ़लस्तीनियों के समर्थन की पुष्टि करता है और इसराइली हमले से उनकी सुरक्षा की मांग करता है.
उन्होंने बैठक के दौरान कहा कि इस समय संयुक्त राष्ट्र के संकल्पों को लागू करने और मानवता के ख़िलाफ़ इसराइली अपराधों को जवाबदेह ठहराने की ज़रूरत है.
उन्होंने कहा, "पाकिस्तान संयुक्त राष्ट्र और ओआईसी के प्रस्तावों के तहत इस मसले के टू-स्टेट समाधान का पक्षधर है, जो 1967 से पहले की सीमाओं के आधार पर हो."
क़ुरैशी ने कहा, "फ़लस्तीनी लोगों और उनकी संपत्ति के ख़िलाफ़ जारी हमलों को तुरंत रोकने की ज़रूरत है."
उन्होंने कहा कि "फ़लस्तीनियों के ख़िलाफ़ व्यवस्थित बर्बर अपराधों की निंदा करने के लिए कोई शब्द नहीं हैं, इसराइल के क़ब्ज़े वाले फ़लस्तीनी क्षेत्रों में इसराइल के अवैध कामों, उसकी औपनिवेशिक नीतियों और निरंतर आक्रामकता और घेराबंदी के कारण हालात बिगड़े हुए हैं."
शाह महमूद क़ुरैशी ने कहा उनकी सरकार फ़लस्तीन के लोगों के साथ है और उनके साथ अटूट एकजुटता है.
उन्होंने कहा, "इसराइली अत्याचारों का सामना करने के लिए और अरब और इस्लामिक पहचान क़ायम रखने के लिए हम उनके साहस को सलाम करते हैं."
एक ट्वीट में उन्होंने लिखा, "राष्ट्रों के इतिहास में एक समय ऐसा आता है जब लिए गए निर्णयों को भावी पीढ़ी द्वारा याद किया जाता है और यह आवश्यक है कि इतिहास के सही पक्ष के ओर होना होता है. यह एक ऐसा ही क्षण है. हमें इस महत्वपूर्ण मोड़ पर फ़लस्तीनी लोगों को निराश नहीं करना है."
इसराइल से दोस्ती करने वाले अरब देशों पर भड़के फ़लस्तीनी विदेश मंत्री
वहीं, ओआईसी की बैठक के दौरान फ़लस्तीनी क्षेत्र के विदेश मंत्री रियाद अल-मलिकी ने इसराइल के साथ रिश्ते सामान्य करने वाले देशों को आड़े हाथों लिया.
उन्होंने कहा, "बिना शांति स्थापित किए और अरब और फ़लस्तीनी ज़मीन पर इसराइली क़ब्ज़े को समाप्त किए बिना सामान्यीकरण और औपनिवेशिक इसराइली व्यवस्था की ओर भागना भेदभाव भरे शासन और उसके अपराधों में भागीदारी का समर्थन करना है."
"इस औपनिवेशिक कब्ज़े का सामना किया जाना चाहिए और इसे ख़त्म करना चाहिए. हाल में रिश्ते सामान्य करने की रफ़्तार अरब जगत की भावनाओं पर असर नहीं डालेगी या उनका आंकलन नहीं बदलेगा."
इसराइल और फ़लस्तीनियों के बीच जारी हिंसा से उन देशों को ख़ासी शर्मिंदगी का सामना करना पड़ रहा है जिन्होंने इसराइल से रिश्ते सामान्य करने की कोशिशें की थीं. इनमें सूडान, मोरक्को, संयुक्त अरब अमीरात यूएई) और बहरीन जैसे देश शामिल हैं.
बैठक में यूएई के विदेश मंत्री रीम अल हाशिमी भी थे. उन्होंने भी हिंसा को रोकने की मांग की लेकिन इसराइल के साथ रिश्ते सामान्य करने की आलोचना पर वो कुछ नहीं बोले.
ओआईसी की आपात बैठक की मेज़बानी सऊदी अरब कर रहा है. हालांकि, उसके इसराइल के साथ औपचारिक साधारण रिश्ते नहीं हैं.
सऊदी अरब ने बैठक में क्या कहा
ओआईसी की बैठक में सऊदी अरब न इसराइल की कड़ी आलोना करते हुए अंतरराष्ट्रीय समुदाय से 'तुरंत कार्रवाई' की मांग की है.
सऊदी अरब के विदेश मंत्री प्रिंस फ़ैसल बिन फ़रहान ने बैठक में देश का नेतृत्व करतेहुए कहा कि 'यरूशलम का संरक्षण हम सब की ज़िम्मेदारी है.'
सऊदी अरब के विदेश मंत्री ने कहा, "पूर्वी यरूशलम में फ़लस्तीनी लोगों को जबरन घरों से निकालने और वहां पर संप्रभूता लगाने करने की भड़काने वाली इसराइली योजना को सऊदी अरब पूरी तरह ख़ारिज करता है और उसकी निंदा करता है. इसके साथ ही सैन्य कार्रवाई की भी निंदा की जाती है जिसके कारण मासूम महिलाओं, बच्चों और नागरिकों की जानें जा रही हैं. इसके कारण अरब शांति पहल को नज़रअंदाज़ किया गया है."
इसराइली हमले में अपने ऑफिस ध्वस्त होने पर बोले एपी और अल-जज़ीरा
2002 में सऊदी ने इसराइल के साथ रिश्ते सामान्य करने और शांति के लिए पहल की थी. इसके बदले में पूर्वी यरूशलम को फ़लस्तीनी राष्ट्र की राजधानी बनाना था.
सऊदी अरब ने कहा कि "इस्लाम शांति के लिए कहता है, हम सब शांति के हिमायती हैं."
वहीं, ओआईसी महासचिव ने बैठक के दौरान कहा कि वो फ़लस्तीनी लोगों के अल-अक़्सा मस्जिद में संघर्षों को सलाम करते हैं और अल-क़ुद्स (यरूशलम) फ़लस्तीन का अभिन्न अंग है.
ओआईसी देशों के विदेश मंत्री हुए शामिल
इस बैठक में ओआईसी सदस्य देशों के विदेश मंत्री शामिल हुए. ओआईसी की ओर से जारी बयान में कहा गया था कि फ़लस्तीनी क्षेत्रों में इसराइली हमले पर बैठक में बात होगी.
इसराइल की सेना अब ग़ज़ा सीमा पर पहुँच गई है. दूसरी तरफ़ हमास रॉकेट से इसराइली शहरों पर हमला कर रहा है.
मध्य-पूर्व में इसे लेकर बहुत तनाव की स्थिति है. यूएन ने बढ़ते तनाव को देखते हुए युद्ध की आशंका जताई है.
वहीं, अमेरिका ने इसराइल में अपना दूत भेजा है. अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन ने कहा है कि अमेरिका सऊदी अरब और मिस्र से संपर्क में है ताकि तनाव को कम करने का कोई रास्ता निकाला जा सके.
गुरुवार को व्हाइट हाउस की प्रेस सचिव जेन साकी ने कहा था कि मिस्र, ट्यूनीशिया और अन्य देश वर्तमान हालात में तनाव को कम करने में भूमिका अदा कर सकते हैं.
रविवार को आपातकालीन बैठक बुलाने पर ओआईसी ने अपने बयान में कहा था, "ओआईसी में इस्लामिक समिट के अध्यक्ष सऊदी अरब के अनुरोध पर रविवार, 16 मई को विदेश मंत्रियों की कार्यकारी कमिटी की वर्चुअल बैठक होगी. इसमें फ़लस्तीनी इलाक़े में इसराइली आक्रामकता पर बात होगी. ख़ासकर अल-क़ुद्स अल शरीफ़ और अल-अक़्सा मस्जिद में हिंसा पर बातचीत केंद्रित रहेगी."
इससे पहले इसी हफ़्ते 12 मई को ओआईसी के स्थायी प्रतिनिधियों की कमिटी की वर्चुअल बैठक हुई थी.
इस बैठक के बाद ओआईसी की तरफ़ से बयान जारी किया गया था. अपने बयान में ओआईसी ने कहा था कि फ़लस्तीनी इलाक़े में इसराइली क़ब्ज़े और ख़ासकर के अल-क़ुद्स अल-शरीफ़ को लेकर बात हुई. (bbc.com)
कोलंबो, 16 मई | श्रीलंका में भारी बारिश और उसके बाद आई बाढ़ से कम से कम चार लोगों की मौत हो गई और 42,000 से अधिक लोग प्रभावित हो गये। आपदा प्रबंधन केंद्र के मुताबिक ये बारिश और बाढ़ बंगाल की खाड़ी में एक सुपर साइक्लोन बनने के कारण आया। समाचार एजेंसी सिन्हुआ की रिपोर्ट के अनुसार, शनिवार को जारी एक बयान में डीएमसी ने कहा कि मौतें भीषण बाढ़ के कारण हुई हैं।
200 से अधिक घर पूरी तरह या आंशिक रूप से क्षतिग्रस्त हो गए थे, जबकि 175 लोगों को अस्थायी आश्रयों में रखा गया था।
नेशनल बिल्डिंग रिसर्च ऑर्गनाइजेशन (एनबीआरओ) ने भी राजधानी कोलंबो और दक्षिण समेत देश के कई जिलों में भूस्खलन की चेतावनी जारी की है।
एनबीआरओ ने उच्च जोखिम वाले क्षेत्रों में रहने वाले लोगों से सुरक्षित स्थानों पर जाने का अनुरोध किया है।
सेना ने बाढ़ से प्रभावित कई जिलों में बचाव दल भेजे हैं और बढ़ते जल स्तर से फंसे कई लोगों को बचाया है।
सबसे बुरी तरह प्रभावित जिलों में डीएमसी अधिकारियों को भी तैनात किया गया था, जो प्रतिकूल मौसम की स्थिति से विस्थापित लोगों को समायोजित करने के लिए सुविधाएं स्थापित कर रहे थे।
मौसम रिपोटरें के अनुसार, बंगाल की खाड़ी में बना शक्तिशाली चक्रवात अब सीधे भारत-बांग्लादेश सीमा की ओर बढ़ रहा है, जिससे बड़े विनाश और उथल-पुथल की संभावना है।
श्रीलंका के मौसम विभाग ने अपने नए मौसम अपडेट में कहा कि आने वाले दिनों में और बारिश की उम्मीद है। (आईएएनएस)
लंदन, 16 मई | विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने कहा कि अमीर देशों को अपने बच्चों और टीनएजर्स को कोविड-19 के खिलाफ टीकाकरण की अपनी योजना में देरी करनी चाहिए और इसके बजाय कम आय वाले देशों को खुराक दान करनी चाहिए। डब्ल्यूएचओ के महानिदेशक डॉ ट्रेडोस एडनॉम ग्रेबियसिस ने शुक्रवार को जिनेवा में एक सम्मेलन में संवाददाताओं से कहा, "मुट्ठी भर अमीर देशों ने टीके की आपूर्ति का अधिकांश हिस्सा खरीदा है, वो अब कम जोखिम वाले समूहों को टीका लगा रहे हैं। "
ग्रेबियसिस ने कहा, "मैं समझता हूं कि कुछ देश अपने बच्चों और टीनएजर्स का टीकाकरण क्यों करना चाहते हैं, लेकिन अभी मैं उनसे पुनर्विचार करने और इसके बजाय कोवैक्स के टीके दान करने का अनुरोध करता हूं।"
एक बयान के मुताबिक, पिछले हफ्ते, अमेरिका, कनाडा और स्विटजरलैंड ने किशोरों के लिए कोरोनावायरस वैक्सीन शॉट्स शुरू करने की योजना बनाई है।
कोविड के टीकों का वैश्विक वितरण काफी असमान है। 1.2 अरब (वैश्विक जनसंख्या का 16 प्रतिशत) की आबादी वाले दुनिया के उच्च आय वाले चार देशों के पास 4.6 अरब खुराक (सभी खरीदी गई खुराक का 53 प्रतिशत) मौजूद है। दूसरी ओर, ड्यूक ग्लोबल हेल्थ इनोवेशन सेंटर के एक अध्ययन के अनुसार, कम आय वाले देशों में सिर्फ 77 करोड़ खुराक हैं। अध्ययन में पाया गया है कि अमेरिका में जुलाई के अंत तक 30 करोड़ या अधिक कोरोनावायरस वैक्सीन की अतिरिक्त खुराक होने की उम्मीद है।
अमेरिका, उसके बाद चीन और भारत ने कुल मिलाकर वैक्सीन की सबसे अधिक खुराक दी है। लेकिन, अफ्रीका के कुछ देशों ने अभी तक टीकाकरण अभियान शुरू भी नहीं किया है।
ग्रेबियसिस ने कहा, वर्तमान में वैक्सीन की आपूर्ति का केवल 0.3 प्रतिशत ही कम आय वाले देशों में जा रहा है। इस तरह, कई निम्न और निम्न-मध्यम आय वाले देशों में स्वास्थ्य और देखभाल कर्मियों के टीकाकरण के लिए टीके की आपूर्ति नहीं है।
उन्होंने कहा, "ट्रिकल डाउन टीकाकरण एक घातक श्वसन वायरस से लड़ने के लिए एक प्रभावी रणनीति नहीं है।"
ग्रेबियसिस ने कहा, "सार्वजनिक स्वास्थ्य उपायों और टीकाकरण के संयोजन के साथ जीवन और आजीविका को बचाना, एक या दूसरे का नहीं बल्कि महामारी से बाहर निकलने का एकमात्र तरीका है।"
उन्होंने कहा, "कोविड -19 में पहले ही 30 लाख से अधिक लोगों की जान जा चुकी है और हम इस महामारी के दूसरे साल के लिए पहले की तुलना में कहीं अधिक घातक होने की राह पर हैं।" (आईएएनएस)



