अंतरराष्ट्रीय
कोरोनावायरस पर हुए ताजा अध्ययन बताते हैं कि जिन लोगों को कोविड-19 के हल्के लक्षण होते हैं, उनका इम्यून सिस्टम इस बीमारी के खिलाफ प्रतिरक्षा तैयार कर लेता है.
कोविड-19 से उबरने के महीनों बाद, जब रक्त में ऐंटिबॉडी का स्तर कम हो जाता है, तब भी बोन मैरो में इम्यून सेल यानी कोरोनावायरस से लड़ने वाली कोशिकाएं चौकस रहती हैं ताकि हमला होने पर जवाब दे सकें. सोमवार को साइंस पत्रिका नेचर में छपे एक अध्ययन में शोधकर्ताओं ने कहा है कि कोविड-19 के सामान्य लक्षणों से उबरने के बाद शरीर की कोरोना वायरस से लड़ने की क्षमता बढ़ जाती है. शोध में पता चला कि संक्रमण होने पर बहुत तेजी से इम्यून सेल यानी वायरस से लड़ने वाली कोशिकाएं पैदा होती हैं.
ये कोशिकाएं अल्पजीवी होती हैं लेकिन रक्षक ऐंटिबॉडीज की एक लहर पैदा करती हैं. अपना काम करने के बाद इनमें से ज्यादातर कोशिकाएं मर जाती हैं और बीमारी ठीक होने पर ऐंटिबॉडीज की संख्या भी कम होती जाती है. इन कोशिकाओं का एक जत्था रिजर्व सुरक्षा बल के तौर पर लंबे समय तक जीवित रहता है. इन्हें दीर्घ-जीवी प्लाज्मा कोशिकाएं कहा जाता है. शोधपत्र के लेखकों में शामिल सेंट लुइस स्थित वॉशिंगटन यूनिवर्सिटी स्कूल ऑफ मेडिसिन के अली अलअब्दी समझाते हैं कि ज्यादातर दीर्घ-जीवी प्लाज्मा कोशिकाएं बॉन मैरो में जाकर रहने लगती हैं.
रिजर्व सुरक्षा बल की तैनाती
अलअब्दी और उनकी टीम ने ऐसे 19 मरीजों के बॉन मैरो से नमूने लिए थे जिन्हें सात महीने पहले कोविड-19 हुआ था. उनमें से 15 में दीर्घ-जीवी प्लाज्मा के अंश पाए गए. इन 15 में से भी पांच ऐसे थे जिनकी बॉन मैरो में कोविड-19 होने के 11 महीने बाद भी प्लाज्मा कोशिकाएं मौजूद थीं जो सार्स-कोव-2 के खिलाफ ऐंटिबॉडीज बना रही थीं.
इस अध्ययन के पीछे वैज्ञानिकों की ऐसी चिंता थी कि कोविड-19 होने के बाद मरीजों की इस वायरस से लड़ने की क्षमता कम हो जाती है और यह वायरस दोबारा भी एक मरीज पर हमला कर सकता है. शोधकर्ताओं ने नेचर पत्रिका में लिखा है, "ऐसी रिपोर्ट थी कि सार्स-कोव-2 से लड़ने वालीं कोशिकाएं संक्रमण के बाद के कुछ महीनों में तेजी से कम होती हैं जिस कारण दीर्घ-जीवी प्लाज्मा कोशिकाएं नहीं बन पातीं और वायरस से लड़ने की शरीर की क्षमता बहुत कम समय में खत्म हो जाती है.”
अलअब्दी ने एक बयान में बताया कि ये कोशिकाएं बस बॉन मैरो में मौजूद रहती हैं और ऐंटिबॉडीज बनाती रहती हैं. वह कहते हैं, "संक्रमण खत्म हो जाने के बाद से ही ये कोशिकाएं ऐसा कर रही होती हैं. और ऐसा वे अनिश्चित काल तक करती रहेंगी. ये कोशिकाएं तब तक ऐंटिबॉडीज बनाती रहेंगी जब तक मरीज जिंदा रहेगा.” हालांकि अध्ययन में यह स्पष्ट नहीं हो पाया है कि कोविड-19 के गंभीर लक्षणों से जूझकर बचने वाले मरीजों में भी दीर्घ-जीवी प्लाज्मा कोशिकाएं इसी तरह काम करती हैं या नहीं. (dw.com)
वीके/सीके (रॉयटर्स, नेचर)
वॉशिंगटन. इंटरनेट पर कब कौन सी चीज़ चर्चित हो जाए, इसका अंदाजा नहीं लगाया जा सकता. यू-ट्यूब पर 14 साल पहले 55 सेकंड के एक वीडियो ने ऐसी धूम मचाई कि पूरे परिवार की ही किस्मत बदल गई है. दो मासूम बच्चों का मजेदार वीडियो इस कदर लोगों को पसंद आ रहा है कि इसकी लोकप्रियता हर दिन बढ़ती जा रही है. ऐसे में अब इस वीडियो को NFT(अपूरणीय टोकन) के रूप में नीलाम भी किया गया है, जिसकी अंतिम बोली 5 करोड़ रुपये लगी है.
इस वीडियो का नाम ‘चार्ली बिट माई फिंगर’ है, जिसे यूएस (अमेरिका) में फिल्माया गया है. यूएस में रहने वाले एक आईटी कंपनी के मैनेजर हॉवर्ड डेविस-कैर ने इस वीडियो को मई 2007 में YouTube पर अपलोड किया था. इस वीडियो में दिख रहे दोनों बच्चे हैरी (3 साल) और चार्ली की उम्र (1 साल) थी. वीडियो में हैरी और चार्ली एक साथ कुर्सी पर बैठे हुए थे. उस समय चार्ली ने हैरी की उंगली काट ली थी.
हॉवर्ड ने बताया कि जिस समय इस वीडियो को यू-ट्यूब पर अपलोड किया था, तो उनका मानना था कि ये थोड़ा मजाकिया है, उससे ज्यादा कुछ नहीं. लेकिन कुछ महीने बाद जब वीडियो को वे हटाने गए, तो उन्होंने पाया कि इसे हजारों बार देखा जा चुका है. YouTube पर पोस्ट किया गया ये वीडियो लगभग 883 मिलियन बार देखा गया है, जो सर्वाधिक देखे जाने वाले वीडियो में से एक है.
इस वीडियो ने जहां भाइयों को इंटरनेट जगत में हीरो बना दिया, तो वहीं परिवार को भी मोटी कमाई मिलने लगी. इस वीडियो को कई विज्ञापन मिले, जिनसे कथित तौर पर बीते वर्षों में लाखों की कमाई भी हुई.
इस वीडियो में दिखने वाले बच्चे अब बड़े हो गए हैं. हैरी 6 फीट लंबा हो चुका है, जो ए-लेवल का छात्र है. 15 वर्षीय चार्ली भी पढ़ाई कर रहा है. इस वीडियो की जानकारी साझा करते हुए हॉवर्ड ने बताया कि जब इस वीडियो को बनाया गया था, तो इस वीडियो को बच्चों को दादा-दादी को भेजना था.
हॉवर्ड ने बताया कि ईमेल पर भेजने के लिए इस वीडियो का साइज बड़ा था, जिसके चलते इस वीडियो को एक निजी YouTube खाते में अपलोड कर दिया. इस वीडियो को और भी आसानी से एक्सेस करने में मदद करने के लिए सार्वजनिक कर दिया था.
एक विमान को मिंस्क में उतारकर पत्रकार रमान प्रतोसेविच को गिरफ्तार किया गया, लेकिन ऐसा क्या हुआ था कि बेलारूस के राष्ट्रपति आलेक्जांडर लुकाशेंको ने खुद एक लड़ाकू विमान को आदेश देकर एक नागरिक विमान को उतारा?
डॉयचे वैले पर हाना लुइबाकोवा की रिपोर्ट
रविवार को बेलारूस में में रायनएयर के एक विमान को जबरन मिंस्क में उतारा गया. कहा गया कि विमान पर बम होने की सूचना है. जब यह स्पष्ट हो गया कि विमान को मिंस्क की ओर मोड़ा जा रहा है, तो एक यात्री की प्रतिक्रिया सबसे अलग थी. उस युवा यात्री ने घबराहट में अपना सिर पकड़ लिया था. जब विमान हवाई अड्डे पर उतरा तो सभी यात्री विमान से उतरे. उनका सामान जांचा गया. तब सुरक्षाकर्मी उस युवक के पास पहुंचे. वह शांत दिख रहा था पर अब भी कांप रहा था. जब उसे एक अनजान जगह पर ले जाया गया, तब उसने अपने इर्द-गिर्द खड़े लोगों को बताया कि मौत की सजा उसका इंतजार कर रही है.
यह युवक बेलारूस के ब्लॉगर और पत्रकार 26 साल के रमान प्रतोसेविच थे. उन्हें पता था कि यूं औचक उनके मिंस्क में होने का अर्थ उनकी गिरफ्तारी था क्योंकि वह देश की आतंकवादी सूची में हैं. इस सूची को राष्ट्रीय सुरक्षा समिति ने तैयार किया है, जिसे आज भी केजीबी के नाम से जाना जाता है.
सुरक्षा के लिए खतरा
जब यह गिरफ्तारी हुई, तब प्रतोसेविच एथेंस से पोलैंड के विल्नियस जा रहे थे, जहां वह आजकल रहते हैं. बेलारूस के राष्ट्रपति आलेक्जांडर लुकाशेंको ने खुद आदेश दिया कि रायनएयर के नागरिक विमान को मिग-21 लड़ाकू विमान घेरकर मिंस्क में उतारे. एक बयान में रायनएयर ने कहा कि बेलारूस एयर ट्रैफिक कंट्रोल ने विमान के चालक दल को सुरक्षा का खतरा होने की सूचना दी थी और मिंस्क के नजदीकी एयरपोर्ट पर उतरने को कहा था.
2019 में गिरफ्तारी के डर से प्रतोसेविच बेलारूस छोड़ पोलैंड चले गए थे. उन्होंने प्रभावशाली टेलीग्राम चैनलों नेक्स्टा और नेक्स्टा लाइव के मुख्य संपादक के तौर पर काम किया था. अगस्त में विवादित राष्ट्रपति चुनावों के बाद इंटरनेट बंद किए जाने के दौरान यही चैनल प्रदर्शनों के लिए सूचना का मुख्य स्रोत थे.पिछले साल नवंबर से ही प्रतोसेविच और उनके साथी नेक्स्टा के सह-संस्थापक स्टीपान पुतिला बेलारूस की आतंकवादी सूची में शामिल हैं. इस सूची में 700 से ज्यादा लोगों के नाम हैं जिन्हें सरकार आतंकवादी गतिविधियों में शामिल मानती है.
पोलैंड से नाराजगी
बेलारूस के ज्यादातर विपक्षी नेता देश छोड़ चुके हैं. नेक्स्टा ने सूचनाएं फैलाने, रैलियों का वक्त और जगह बताने और पुलिस की ज्यादतियों को उजागर करने आदि में अहम भूमिका निभाई है. लुकाशेंको 1994 से देश की सत्ता पर काबिज हैं. उन्होंने सोशल मीडिया और निष्पक्ष पत्रकारों पर विरोधी रैलियां आयोजित करने के आरोप लगाए हैं.
जब प्रतोसेविच से पूछा गया कि उन्हें लुकाशेंको के एजेंटों द्वारा पोलैंड में निशाना बनाए जाने का डर तो नहीं, उन्होंने कहा था कि वह शरण लेने की प्रक्रिया में हैं और उन्हें निर्वासित नहीं किया जाएगा. रमान प्रतोसेविच के निर्वासन के लिए बेलारूस एक बार पोलैंड सरकार को अनुरोध भेज चुका है. लेकिन पोलैंड ने इसे नहीं माना था.
पोलिश अल्पसंख्यक समुदाय के चार अहम कार्यकर्ताओं को बेलारूस में गिरफ्तार किया गया था. इनमें आंजेलिका बोरिस और आंद्रेय पोजोबुत शामिल हैं जो वहां के बड़े सामुदायिक नेता हैं. उन पर एक लोक मेले में लोगों के जमा होने के नियमों के उल्लंघन के आरोप लगाए गए थे. साथ ही उन पर धार्मिक और राष्ट्रीय नफरत फैलाने जैसे गंभीर आरोप भी थे जिनमें 12 साल तक की जेल हो सकती है. देश के सरकारी टीवी पर पोलैंड विरोधी प्रोपेगैंडा भी जारी है.
मीडिया पर लुकाशेंका का हमला
लुकाशेंको सरकार ने पिछली गर्मियों में हुए चुनावों से कई महीने पहले ही मीडिया और निष्पक्ष पत्रकारों को निशाना बनाना शुरू कर दिया था. जून में रेडियो फ्री यूरोप के सलाहकार इहार लोसिक और एक अन्य टेलीग्राम चैनल बेलारूस ऑफ द ब्रेन के संस्थापक को हिरासत में ले लिया गया था. तब से हालात बेहद गंभीर हो चुके हैं.
18 मई को सुरक्षाकर्मियों ने tut.by के दफ्तरों पर हमला बोला, जो बेलारूस का सबसे बड़ा मीडिया संस्थान है. वेबसाइट के लिए काम करने वाले पत्रकारों के घरों पर भी छापे मारे गए. पोर्टल की संपादक मैरिना जोलतावा और कई अन्य पत्रकारों को गिरफ्तार कर लिया गया. 20 साल से यह पोर्टल देश में काफी लोकप्रिय रहा है. सत्तापक्ष और विपक्षी सभी के समर्थक इस पोर्टल के पाठक रहे हैं. मई में इस वेबसाइट की पहुंच रिकॉर्ड 33 लाख लोगों तक हो गई थी, जो देश में इंटरनेट इस्तेमाल करने वालों का 63 प्रतिशत है. मई में ही वेबसाइट को ब्लॉक कर दिया गया.
देश में दर्जनों निजी समाचार वेबसाइट ब्लॉक की जा चुकी हैं. सैकड़ों पत्रकारों को या तो गिरफ्तार कर लिया गया है या हिरासत में रखा गया है. दर्जनों अखबार बंद किए जा चुके हैं. लेकिन यह काफी नहीं था कि प्रतोसेविच को गिरफ्तार कर लिया गया.
प्रोतासेविच पर आरोप
रमान प्रतोसेविच पर कम से कम तीन आपराधिक मुकदमे दर्ज हैं. उनमें से एक दंगों की साजिश का है, जिसमें 15 साल तक की कैद हो सकती है. हालांकि उनकी कथित आतंकी गतिविधियों के आरोपों को सार्वजनिक नहीं किया गया है, लेकिन बहुत संभव है कि उन्हें मिंस्क स्थित केजीबी की जेल में रखा गया है. उन्हें वकील से भी नहीं मिलने दिया गया. उनके स्वास्थ्य आदि के बारे में भी कोई सूचना नहीं दी गई है. (dw.com)
पश्चिमी अफ्रीकी देश माली में सैनिकों ने अंतरिम राष्ट्रपति बाह अन डाव और प्रधानमंत्री मक्तार उआन को हिरासत में ले लिया है. जिसके बाद अंतरराष्ट्रीय नेताओं ने नाराजगी जताई है.
यूरोपीय संघ ने माली में सैनिकों द्वारा नागरिक नेताओं की गिरफ्तारी की निंदा की है. ईयू ने इसे "अपहरण" करार दिया है. माली के सैन्य अधिकारियों ने राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के अलावा रक्षा मंत्री सुलेमान डोकूर को भी गिरफ्तार किया है. सेना की कार्रवाई की अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने कड़ी आलोचना की है. गिरफ्तारी के बाद कथित तौर पर इन नेताओं को राजधानी बामाको के पास काती में सैन्य अड्डे ले जाया गया. कैबिनेट में फेरबदल के बाद सेना के दो सदस्यों के पदों को खोने के कुछ ही घंटों बाद यह गिरफ्तारियां हुईं.
अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया
संयुक्त राष्ट्र, अफ्रीकी संघ और पश्चिम अफ्रीकी आर्थिक समुदाय ने गिरफ्तारियों की निंदा की है और नेताओं की तत्काल रिहाई का आह्वान किया है. यूरोपीय संघ, अमेरिका और ब्रिटेन ने भी "संभावित तख्तापलट" की आलोचना की है. संयुक्त राष्ट्र महासचिव अंटोनियो गुटेरेश ने कहा कि वे अन डाव और उआन की गिरफ्तारी को लेकर ''बेहद चिंतित'' हैं. उन्होंने ट्विटर पर लिखा, "मैं शांति और उनकी बिना शर्त रिहाई का आग्रह करता हूं."
ब्रसेल्स में यूरोपीय संघ के शिखर सम्मेलन के दौरान पत्रकारों से बात करते हुए, यूरोपीय परिषद के अध्यक्ष चार्ल्स मिशेल ने कहा, "जो कुछ भी हुआ है वह बहुत गलत और गंभीर है और हम इसके खिलाफ आवश्यक कदमों पर विचार करने के लिए तैयार हैं."
माली की राजनीतिक स्थिति
पिछले साल अगस्त में, माली की सेना ने राष्ट्रपति इब्राहिम बाउबकर कीता को पद से हटने पर मजबूर किया था. सितंबर में अन डाव के नेतृत्व में एक अंतरिम सरकार का गठन किया गया था. अंतरिम सरकार 18 महीने के लिए बनी थी और उसे देश में सुधारों को लागू करने और चुनाव कराने का जिम्मा सौंपा गया था. अंतरिम सरकार में कई प्रमुख नेता सेना से हैं. अन डाव खुद सेना के अधिकारी के तौर पर काम कर चुके हैं. माली वर्तमान में कई सुरक्षा और मानवीय संकटों का सामना कर रहा है.
अलगाववादी और इस्लामी समूह 2012 से ही सरकार के खिलाफ सशस्त्र युद्ध छेड़े हुए हैं. युद्ध ने लाखों लोगों को बेघर कर दिया और हिंसा पड़ोसी बुरकिना फासो और नाइजर में फैल गई है. यही नहीं, पर्यावरण के मुद्दों ने देश की खाद्य आपूर्ति और कृषि क्षेत्र को बुरी तरह से प्रभावित किया है. तो दूसरी ओर कोविड-19 महामारी ने माली की अविकसित स्वास्थ्य प्रणाली पर अतिरिक्त दबाव डाला है.
एए/वीके (रॉयटर्स, एपी, डीपीए)
-जेक हॉर्टन
अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन से अब उन्हीं की डेमोक्रेटिक पार्टी के कुछ नेता इसराइल को अमेरिका द्वारा दिए जाने वाली आर्थिक मदद पर सवाल उठा रहे हैं.
सीनेटर बर्नी सैंडर्स ने कहा है कि अमेरिका को इस बात पर "अत्यधिक नज़र" रखनी होगी कि पैसे कहां खर्च हो रहे हैं.
अमेरिका कितनी आर्थिक मदद देता है?
साल 2020 में अमेरिका ने 3.8 बिलियन डॉलर की आर्थिक मदद इसराइल को की थी. ये एक लंबे समय के लिए की जाने वाली सालाना मदद का हिस्सा है जिसका वादा ओबामा सरकार ने किया था.
ओबामा सरकार ने साल 2016 में 38 बिलियन डॉलर के पैकेज के एग्रीमेंट पर दस्तखत किए थे जिसकी अवधि साल 2017-2028 की है.
ये रकम पिछले दशक के मुकाबले क़रीब 6 प्रतिशत ज़्यादा है.
इसके अलावा, पिछले साल अमेरिका ने शरणार्थियों को बसाने के लिए पांच मिलियन डॉलर की मदद की थी. इसराइल की लंब समय से चली आ रही नीति के तहत दूसरे देशों से आने वाले यहूदियों को वो अपने यहां बसाता है.
अमेरिका ने बीते कुछ सालों में इसराइल को दुनिया की सबसे उन्नत सेना में से एक बनाने में मदद की है. अमेरिकी फंड की मदद से इसराइल अमेरिका से सैन्य साज़ो सामान खरीदता है.
उदाहरण के लिए, इसराइल ने 50 एफ- 35 विमान खरीदे हैं जिनका इस्तेमाल मिसाइल हमलों के लिए किया जाता है. इनमें से 27 की डिलीवरी की जा चुकी है. हर विमान की कीमत 100 मिलियन डॉलर है.
पिछले साल इसराइल ने आठ केसी-46ए बोइंग 'पीगेसस' विमान ख़रीदे जिनकी कीमत क़रीब 2.4 बिलियन डॉलर बताई जाती है. ये एफ-35 जैसे विमानों में हवा में ईंधन भर सकते हैं.
इसराइल के पास आयरन डोम नाम का एक मिसाइल डिफेंस सिस्टम है. ये अपनी ओर दागी गई मिसाइलों को हवा में ही नष्ट कर देता है.
इसराइल को दिए गए 3.8 बिलियन डॉलर में से 500 मिलियन डॉलर इस मिलाइल डिफेंस के लिए थे. इसमें आयरन डोम को बनाने के लिए निवेश शामिल था.
साल 2011 से अमेरिका इसराइल के आयरन डोम में 1.6 बिलियन डॉलर का निवेश कर चुका है. इसके अलावा इसराइल ने अमेरिका के साथ सैन्य टेक्नॉलॉजी पर साथ काम करने के लिए लाखों मिलियन डॉलर खर्च किए हैं.
इनमें सुरंगों को डिटेक्ट करने की तकनीक भी शामिल है. इसराइल की सरकार सैन्य उपकरणों और ट्रेनिंग में काफ़ी पैसे खर्च करती है. इलाके के दूसरे देशों की तुलना में बहुत छोटे होने का कारण अपनी रक्षा प्रणाली को बेहतर बनाने के लिए वो दी गई मदद का इस्तेमाल करता है.
दूसरे देशों से तुलना
दूसरे विश्व युद्ध के बाद से अमेरिका ने सबसे ज्यादा आर्थिक मदद इसराइल को दी है. यूएस एड के मुताबिक साल 2019 में इसराइल को अफ़ग़ानिस्तान के बाद सबसे अधिक मदद दी गई.
अफ़ग़ानिस्तान को दी गई आर्थिक मदद का एक बड़ा हिस्सा अमेरिकी सैन्य अभियानों में खर्च हुआ, जिसका मक़सद देश में स्थिरता लाना था. लेकिन इस साल सितंबर में अमेरिकी सेनाएं वापस आ जाएंगी, इसलिए 2021 के लिए सिर्फ 370 मिलियन डॉलर की मांग की गई है.
मध्य पूर्व के दूसरे देशों के मुकाबलों इसराइल को बहुत ज़्यादा आर्थिक मदद मिलती है. मिस्त्र और जॉर्डन को भी अमेरिका बड़ी आर्थिक मदद देता है. दोनों देशों की इसराइल से एक लड़ाई के बाद शांति संधि हो गई थी. दोनों ही देशों को 1.5 बिलियन अमेरिकी डॉलर की मदद मिलती है.
इसके अलावा संयुक्त राष्ट्र की एक एजेंसी जो फ़लस्तीनी शरणार्थियों की मदद कर करती है, उसे मिलने वाली रकम को पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने रोक दिया था. लेकिन राष्ट्रपति बाइडन ने फिर से 235 मिलियन डॉलर की रकम देना शुरू कर दिया है.
2019 में सबसे अधिक अमेरिकी सहायता पाने वाले देश. बिलियन $ में. इसराइल को मिसाइल डिफ़ेंस के लिए दिए गए 50 करोड़ डॉलर शामिल नहीं.
अमेरिका इसराइल को इतनी आर्थिक मदद क्यों देता है?
इसके पीछे कई कारण हैं. अमेरिका ने 1948 में एक अलग यहूदी देश बनाने के लिए मदद का भरोसा दिया था. इसके अलावा इसराइल को अमेरिका मध्य पूर्व में एक महत्वपूर्ण सहयोगी की तरह देखता है - जो कि "एक साझा लक्ष्य और लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए प्रतिबद्ध हैं."
यूएस कॉन्ग्रेशनल रिसर्च सर्विस के मुताबिक, "अमेरिकी विदेशी मदद ने इस संबंध को बेहतर बनाने में अहम योगदान दिया है. अमेरिकी अधिकारी और नेता लंबे समय से इसराइल को इस इलाके का एक महत्वपूर्ण सहयोगी मानते रहे हैं."
अमेरिका की फॉरेन असिस्टेंस एजेंसी के मुताबिक, "अमेरिकी मदद से इसराइल उस इलाके में आसपास के ख़तरों से निपटने के लिए सैन्य बढ़त बनाए रखने में कामयाब रहता है."
" अमेरिकी मदद...ये सुनिश्चित करती है कि इसराइल फ़्लस्तीनियों के साथ एक ऐतिहासिक शांति समझौते और इलाके की शांति से जुड़े कदम उठाने के लिए सुरक्षित है."
डेमोक्रेटिक और रिपब्लिकन, दोनों ही पार्टी के राष्ट्रपतियों के कार्यकाल के दौरान इसराइली इलाक़े को महफूज़ रखने की कोशिश अमेरिकी विदेश नीति का हिस्सा रही है. 2020 के डेमोक्रेटिक पार्टी ने चुनावी मंचों से इसराइल को "लोहे की तरह सपोर्ट" देने की बात कही थी. लेकिन अब पार्टी के वाम धड़े के लोग अमेरिका की इस मदद पर सवाल उठा रहे हैं.
सीनेटर सैंडर्स और कुछ पार्टी सदस्य 735 मीलियन डॉलर के सैन्य उपकरणों की पहले से तय बिक्री को रोकने की कोशिश कर रहे हैं. (bbc.com)
(ब्लूमबर्ग) – सिंगापुर के नेशनल यूनिवर्सिटी (एनयूएस) ने एक बयान में कहा, कोविड -19 का पता लगाने और एक मिनट के भीतर सटीक परिणाम देने के लिए डिज़ाइन किए गए एक सांस परीक्षण को सिंगापुर में उपयोग के लिए अनुमोदित किया गया है।
एनयूएस स्पिन-ऑफ स्टार्टअप ब्रीथोनिक्स द्वारा विकसित परीक्षण, एक मानक श्वासनली परीक्षण की तरह काम करता है जिसका उपयोग पुलिस यह देखने के लिए कर सकती है कि एक अनियमित चालक नशे में है या नहीं। एक व्यक्ति एक तरफ़ा वाल्व माउथपीस में फूंक देता है, और व्यक्ति की सांस में यौगिकों की तुलना मशीन लर्निंग सॉफ़्टवेयर द्वारा की जाती है, जो उस तरह के सांस हस्ताक्षर के खिलाफ होती है जिसकी उम्मीद किसी ऐसे व्यक्ति से की जाएगी जो कोविड-पॉजिटिव है।
स्ट्रेट्स टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, सिंगापुर मलेशिया से आने वाले यात्रियों की जांच द्वीप के पश्चिमी हिस्से में स्थित तुआस चेकपॉइंट पर करेगा। सांस परीक्षण में सकारात्मक परीक्षण करने वाले किसी भी व्यक्ति की पुष्टि पीसीआर स्वैब परीक्षण में की जाएगी। सिंगापुर वर्तमान में एंटीजन रैपिड टेस्ट के साथ प्रवेशकों की स्क्रीनिंग करता है, जो सांस लेने वालों के साथ जारी रहेगा।
गति पर सटीक परीक्षण एक यात्रा क्षेत्र को अनलॉक करने में मदद करने के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है जो महामारी के दौरान क्रॉल में धीमा हो गया है। यहां तक कि जब अमेरिका और यूरोप के कुछ हिस्सों में उच्च वायरल केसलोएड के साथ फिर से खोलना शुरू हो गया, तो सिंगापुर और एशिया के अन्य “कोविड-शून्य” देश सीमाओं को खोलने में संकोच कर रहे हैं और भड़कने के किसी भी संकेत पर कठोर रूप से टूट गए हैं।
ब्रीथोनिक्स परीक्षण अब तक तीन नैदानिक परीक्षणों से गुजर चुका है, दो सिंगापुर में और दूसरा दुबई में। इसने सिंगापुर स्थित एक प्रारंभिक पायलट अध्ययन में ९३ प्रतिशत की संवेदनशीलता और ९५ प्रतिशत की विशिष्टता हासिल की जिसमें १८० रोगी शामिल थे। (aapannews.com)
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नेए पाई तौ, 24 मई | म्यांमार की अपदस्थ नेता आंग सान सू की सोमवार को अदालत में पेश हुईं, 1 फरवरी के तख्तापलट के बाद से "देशद्रोह के लिए उकसाने" के आरोप का सामना करने के लिए उनकी पहली व्यक्तिगत उपस्थिति हुई ।
डीपीए समाचार एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार उन पर राजद्रोह का आरोप सबसे गंभीर है, लेकिन उन पर राज्य के गुप्त कानून का उल्लंघन करने और कोरोनावायरस रोकथाम उपायों को तोड़ने का भी आरोप है।
बचाव पक्ष के वकील थे माउंग माउंग ने कहा कि सुनवाई से पहले वकील सू की से अलग से मिलने में सक्षम थे और उन्होंने कानूनी मामले पर चर्चा की।
तख्तापलट के बाद से 75 वर्षीय सू की नजरबंद हैं।
उन्होंने समाचार एजेंसी डीपीए को बताया कि सू की का स्वास्थ्य अच्छा है।
उसकी अगली अदालती सुनवाई 7 जून को निर्धारित है।
सू ची ने हाल के हफ्तों में वीडियो लिंक के माध्यम से अदालत में सवालों के जवाब दिए हैं, हालांकि, उनके वकील उनसे व्यक्तिगत रूप से मिलने में असमर्थ रहे हैं।
वकील मिन मिन सो ने डीपीए को बताया कि सू की के घर से ज्यादा दूर राजधानी ने पी ताव में सुनवाई के लिए एक विशेष अदालत कक्ष स्थापित किया गया था।
तख्तापलट के खिलाफ राष्ट्रव्यापी विरोधों को भयंकर सेना प्रतिशोध का साथ मिला था जिसमें सैकड़ों लोग मारे गए थे।
म्यांमार के सैन्य शासक, चीनी भाषा के प्रसारक फीनिक्स द्वारा 22 मई को प्रकाशित एक साक्षात्कार में, मिन आंग ह्लाइंग ने दावा किया कि मीडिया ने मृतकों की संख्या को लगभग 300 बताया था।
असिस्टेंस एसोसिएशन फॉर पॉलिटिकल प्रिजनर्स मॉनिटरिंग ग्रुप के अनुसार, अब तक कम से कम 818 लोग मारे गए हैं, जबकि 5,300 से अधिक लोगों को हिरासत में लिया गया है।(आईएएनएस)
अमेरिकी अखबार वॉल स्ट्रीट जनरल ने अमेरिकी खुफिया रिपोर्ट के हवाले से खबर छापी है कि चीन के वूहान इंस्टिट्यूट ऑफ विरोलॉजी के तीन शोधकर्ताओं ने कोरोनावायरस महामारी के आने से कई महीने पहले चिकित्सकीय मदद मांगी थी.
रविवार को अमेरिकी अखबार वॉल स्ट्रीट जर्नल ने दावा किया कि चीन के वूहान में तीन रिसर्चर्स ने वायरस की घोषणा होने से काफी पहले, नवंबर 2019 में चिकित्सकीय देखभाल का अनुरोध किया था. इस रिपोर्ट ने उन दावों को फिर से हवा दे दी है कि वायरस चमगादड़ों से मनुष्यों में नहीं आया बल्कि चीन की एक परीक्षण लैब से फैला है. कोरोना वायरस के स्रोत को लेकर और ज्यादा जांच की मांग उठती रही है. वॉल स्ट्रीट जरनल की यह रिपोर्ट तब आई है जबकि सोमवार को विश्व स्वास्थ्य संगठन की एक बैठक होने वाली है जिसमें कोविड-19 के स्रोत की जांच में अगले कदम पर चर्चा की जाएगी.
अमेरिकी सरकार ने रिपोर्ट पर कोई टिप्पणी नहीं की है लेकिन राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद की प्रवक्ता ने कहा कि बाइडेन सरकार के "कोविड-19 महामारी के शुरुआती दिनों को लेकर गंभीर सवाल हैं जिनमें इसके स्रोत का चीन के भीतर से होना भी शामिल है.” उन्होंने कहा कि अमेरिका की सरकार विश्व स्वास्थ्य संगठन और अन्य सदस्य देशों के साथ मिलकर काम कर रही है कि ताकि विशेषज्ञों की मदद से महामारी के स्रोत को खोजा जा सके और यह जांच राजनीतिक दखलअंदाजी से स्वतंत्र हो.
प्रवक्ता ने कहा, "हम सार्स-कोव-2 के स्रोत को लेकर जारी डब्ल्यूएचओ की जांच के बारे में कोई टिप्पणी नहीं करेंगे. लेकिन हम इस बात को लेकर पहले से ही स्पष्ट रहे हैं कि ठोस और तकनीकी रूप से विश्वसनीय सिद्धांतों को अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों द्वारा अच्छे से जांचा-परखा जाना चाहिए.” अमेरिका, नॉर्वे, कनाडा, ब्रिटेन और कई अन्य देशों ने मार्च में विश्व स्वास्थ्य संगठन की जांच को लेकर सवाल उठाए थे और इस बारे में आगे भी जांच करने की मांग की थी.
चीन की प्रतिक्रिया
रॉयटर्स न्यूज एजेंसी ने इस बारे में जब अमेरिका के वॉशिंगटन स्थित चीनी दूतावास से टिप्पणी चाही तो उन्हें कोई जवाब नहीं मिला. हालांकि वॉल स्ट्रीट जर्नल के सवालों के जवाब में रविवार को चीनी विदेश मंत्रालय ने कहा कि विश्व स्वास्थ्य संगठन के नेतृत्व वाली टीम ने फरवरी में वाइरॉलजी इंस्टिट्यूट के दौरे के बाद कहा था कि लैब से वायरस के लीक होने की संभावनाएं बेहद कम हैं. चीनी विदेश मंत्रालय ने कहा, "अमेरिका लैब से वायरस लीक होने के सिद्धांत को जरूरत से ज्यादा हवा देना जारी रखे हुए है. क्या वह वाकई स्रोत खोजने को लेकर चिंतित है या फिर ध्यान बंटाने की कोशिश कर रहा है?”
पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप की सरकार ने संदेह जताया था कि कोरोना वायरस किसी चीनी लैब से निकला था, जिसे चीन नकारता रहा है. पिछली अमेरिकी सरकार के आखिरी दिनों में तैयार एक फैक्ट शीट में कहा गया था, "अमेरिकी सरकार के पास इस बात को मानने के कई कारण हैं कि 2019 के पतझड़ में वूहान इंस्टिट्यूट ऑफ वाइरॉलजी के कई शोधकर्ता बीमार हो गए थे. यह महामारी के पहले केस की पहचान से पहले हुआ था.
उन शोधकर्ताओं में कोविड-19 और सामान्य मौसमी बीमारी दोनों के ही लक्षण थे.” फरवरी में अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों का एक दल चीन गया था और उसने वूहान इंस्टिट्यूट ऑफ वाइरॉलजी का दौर भी किया था. हालांकि चीन ने इस दल को कोविड-19 के शुरुआती मरीजों का डेटा देने से इनकार कर दिया था.
कहां से आया कोरोना वायरस
पिछले साल सबसे पहले ऑस्ट्रेलिया ने यह मांग की थी कि कोरोना वायरस महामारी फैलने के पीछे चीन की भूमिका की जांच होनी चाहिए. पिछले साल मई में भारत समेत 62 देशों ने विश्व स्वास्थ्य संगठन में एक मसौदा प्रस्ताव पेश किया था जिसमें कोविड-19 महामारी को लेकर डब्ल्यूएचओ की प्रतिक्रिया की स्वतंत्र जांच कराने का आग्रह किया गया था. इस मसौदे में कोरोना संकट की "निष्पक्ष, स्वतंत्र और व्यापक" जांच की मांग की गई थी.
इसके अलावा डब्ल्यूएचओ के कार्यों की जांच और कोविड-19 महामारी से जुड़ी उसकी समयसीमा की भी जांच की मांग की गई थी. ड्राफ्ट रिपोर्ट के मुताबिक, "सही समय पर और सदस्य देशों से सलाह करने के बाद निष्पक्ष, स्वतंत्र और व्यापक मूल्यांकन की एक चरणबद्ध प्रक्रिया शुरू हो, जिसमें मौजूदा प्रणाली का इस्तेमाल शामिल हो. कोविड-19 के लिए डब्ल्यूएचओ समन्वय अंतरराष्ट्रीय स्वास्थ्य प्रतिक्रिया से सीखे गए अनुभवों और प्राप्त सबक की समीक्षा होनी चाहिए."
हालांकि चीन और अमेरिका इस प्रस्ताव में शामिल नहीं हुए थे. यूरोपीय संघ समर्थित इस मसौदे को जापान, ब्रिटेन, न्यूजीलैडं, दक्षिण कोरिया ब्राजील, और कनाडा का समर्थन मिला था.
क्या कहती है डब्ल्यूएचओ की जांच
डब्ल्यूएचओ की एक टीम ने कोरोनावायरस स्रोत की जांच के लिए चीन का दौरा किया था. जनवरी के आखिरी में इस टीम ने चीन के कई अस्पतालों और लैब्स का दौर किया था. मार्च के आखिरी हफ्ते में इस टीम ने अपनी रिपोर्ट सौंपी थी जिसके बाद डब्ल्यूएचओ के महानिदेशक डॉक्टर टेड्रोस गेब्रेयेसुस ने कहा, "ये रिपोर्ट एक बहुत अच्छी शुरुआत है लेकिन ये अंत नहीं है. हमें अभी वायरस के स्रोत की जानकारी नहीं मिली है.”
चीन के 17 विशेषज्ञों और 17 अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों के समूह ने जांच के बाद यह रिपोर्ट तैयार की थी. 120 पेज की इस रिपोर्ट में वायरस की उत्पत्ति और उसके इंसानों में फैलने के संबंध में कई संभावनाएं बताई गई थीं. इन निष्कर्षों के मुताबिक इस बात के ठोस प्रमाण हैं कि इंसानों तक पहुंचे कई कोरोनावायरसों की उत्पत्ति जानवरों से हुई है. इन जानवरों में चमगादड़, पैंगोलिन या मिंक हो सकते जिन्होंने इंसानों को संक्रमित किया हो.
रिपोर्ट में संभावना जताई गई थी कि कोविड-19 वायरस खाने के सामान या उन्हें रखने वाले कंटेनर्स के जरिए इंसानों में पहुचा हो. इनमें फ्रोज़न फूड शामिल हैं जो आमतौर पर वूहान के बाज़ारों में बिकते हैं. हालांकि कोल्ड चेन से फैलने की भी संभावना बहुत कम बताई गई. एक संभावना प्रयोगशाला में हुई एक दुर्घटना के कारण वायरस के कर्मचारियों में फैलने की भी थी लेकिन रिपोर्ट में विशेषज्ञों ने कहा था कि उन्होंने इस संभावना का विश्लेषण नहीं किया कि किसी ने जानबूझकर वायरस फैलाया था. रिपोर्ट में कहा गया कि प्रयोगशालाओं में ऐसी दुर्घटनाएं दुर्लभ होती हैं लेकिन, ये हो सकती हैं.
वीके/सीके (रॉयटर्स, एएफपी)
अमेरिका के मिनियापोलिस में पूर्व पुलिसकर्मी डेरेक शॉविन के हाथों मारे गए जॉर्ज फ्लॉयड की पहली बरसी से पहले उनकी याद में परिवार और अधिकार कार्यकर्ताओं ने रैली निकाली.
अमेरिका में अश्वेत जॉर्ज फ्लॉयड की हत्या की पहली बरसी से पहले ही कई कार्यकर्ता और उनके परिवार वाले उन्हें याद करने के लिए इकट्ठा हुए. पिछले साल एक श्वेत पुलिस अधिकारी ने फ्लॉयड को घुटने से दबा कर मार डाला था. पिछले साल 25 मई को पुलिस हिरासत में मौत के बाद पूरे अमेरिकी में विरोध की लहर उठ गई. फ्लॉयड की मौत की पहली बरसी से दो दिन पहले रविवार 23 मई को मिनियापोलिस में एक रैली निकाली गई, जिसमें उनके परिवार समेत कई सामाजिक कार्यकर्ताओं ने हिस्सा लिया. मंगलवार, 25 मई को फ्लॉयड की मौत की पहली बरसी है. रविवार को फ्लॉयड का परिवार, कई मानवाधिकार कार्यकर्ता और पुलिस की बर्बरता के कई अन्य पीड़ितों के परिवार मिनियापोलिस में कोर्टहाउस के बाहर जमा हुए, जहां लगभग एक महीने तक मुकदमा पहले ही पूरा हो चुका है.
पिछले साल पुलिस अधिकारी ने फ्लॉयड की गर्दन अपने घुटने से दबा रखा था और उसकी गिड़गिड़ाहट को नहीं सुन रहा था, फ्लॉयड बार-बार कह रहे थे, "प्लीज, प्लीज, प्लीज, मैं सांस नहीं ले पा रहा हूं. प्लीज" इस दौरान वह कराह भी रहे थे. अधिकारी ने तब तक अपना घुटना नहीं हटाया, जब तक कि स्वास्थ्यकर्मियों ने उसे स्ट्रेचर पर नहीं चढ़ा दिया. इस दौरान बहुत सारे लोग वहां जमा हो गए और कुछ लोगों ने वीडियो भी बना लिया. यह वीडियो बहुत तेजी से वायरल हुआ था और दुनियाभर में इसको लेकर प्रदर्शन हुए थे.
रविवार को इस रैली में शामिल लोगों के हाथों में फ्लॉयड, फ्लैंडो कैसल और कई अन्य अश्वेत लोगों की तस्वीरें थीं, जो पुलिस ज्यादती के कारण मारे गए. रैली में शामिल लोगों ने ‘ब्लैक लाइव्स मैटर' के नारे लगाए. उन्होंने नारे लगाए, "न्याय नहीं, तो शांति नहीं." इसी साल अप्रैल में अमेरिका की एक अदालत ने फ्लॉयड की हत्या के मामले में पूर्व पुलिसकर्मी डेरेक शॉविन को सभी आरोपों में दोषी पाया था.
पिछला साल दर्दनाक रहा
रैली के दौरान कई कार्यकर्ताओं, फ्लॉयड के परिवार के कई सदस्यों और उनके वकील बेन क्रंप समेत कई अन्य लोगों ने सभा को संबोधित किया. फ्लॉयड की बहन ब्रिजेट ने कहा, "यह एक लंबा साल रहा है. यह एक बहुत ही दर्दनाक वर्ष रहा. मैं उनके लिए खड़ी रहूंगी. मैं उनके लिए आवाज बनूंगी और बदलाव के लिए आवाज उठाती रहूंगी." अधिकार कार्यकर्ता रेवरेंड अल शार्प्टन ने रैली के दौरान कहा, "अमेरिकी इतिहास के सबसे बड़े कलंक में से एक है." उन्होंने कहा, "जॉर्ज फ्लॉयड के साथ-साथ कई अन्य लोगों के साथ जो हुआ, वह न केवल अमेरिका बल्कि दुनिया भर में बदलाव ला रहा है."
न्यूयॉर्क में भी रैली
इसी तरह की एक रैली न्यूयॉर्क के ब्रुकलिन में रविवार को आयोजित की गई जिसमें फ्लॉयड के भाई टेरेंस भी शामिल हुए थे. टेरेंस ने समर्थकों से कहा कि उन्हें पुलिस द्वारा मारे गए अन्य पीड़ितों की खातिर अपने भाई, जॉर्ज फ्लॉयड का नाम जीवित रखने की जरूरत है. फ्लॉयड की मौत की बरसी से पहले इस आयोजन से संबंधित कई अन्य कार्यक्रम हुए और लोग भविष्य की रणनीतियों पर चर्चा करने के लिए ऑनलाइन भी मिले. रिपोर्टों के मुताबिक इस तरह के और भी कार्यक्रम सोमवार को निर्धारित हैं.
एए/वीके (एएफपी, एपी)
जर्मनी समेत यूरोपीय संघ के कई सदस्य देशों ने एक यात्री विमान को जबरन अपने यहां उतारकर एक पत्रकार को गिरफ्तार करने की कार्रवाई पर बेलारूस से सफाई मांगी है.
जर्मन विदेश मंत्रालय ने कहा है कि सरकार के आलोचक रहे रमान प्रतोसेविच की कथित गिरफ्तारी पर बेलारूस को जवाब देने होंगे. विदेश मंत्री हाइको मास ने कहा कि मिंस्क को इस कदम के लिए स्पष्ट नतीजे भुगतने होंगे. उन्होंने कहा, "बम होने का बहाना बनाकर यूरोपीय संघ के एक सदस्य देश से दूसरे सदस्य देश को जा रहे विमान को बीच में रोका गया. यह यूरोप में नागरिक विमान की आवाजाही में एक गंभीर कदम है. हम इन खबरों को लेकर काफी चिंतित हैं कि पत्रकार रमान प्रतोसेविच को इस तरह गिरफ्तार किया गया.”जर्मन विदेश मंत्रालय में सचिव मिगेल बेर्गर ने ट्विटर पर लिखा था कि जर्मनी इस पूरे घटनाक्रम पर तुरंत सफाई की मांग करता है.
फ्रांस के विदेश मंत्रालय ने भी इस घटनाक्रम को अस्वीकार्य बताया है. विदेश मंत्री ज्यां-इवेस ला ड्रियन ने कहा, "बेलारूस के अधिकारियों द्वारा रायनएयर के विमान का अपहरण अस्वीकार्य है. यूरोप से इसका एक ठोस जवाब दिया जाना चाहिए. बेलारूस के आलोचकों समेत विमान के सभी यात्रियों को बिना देर किए जाने की इजाजत मिलनी चाहिए.”
अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया
अमेरिका ने भी इस घटना की कड़ी निंदा की है. विदेश मंत्री एंटी ब्लिंकेन ने इसे खौफनाक कार्रवाई बताया और पत्रकार को फौरन रिहा करने की मांग की. यह विमान ग्रीस से लिथुआनिया जा रहा था और दोनों देशों की सरकारों ने इस घटना की आलोचना की है. ग्रीस के प्रधानमंत्री कीरियाकोस मित्सोताकिस ने इसे अभूतपूर्व और खौफनाक बताया. उन्होंने कहा, "हम सभी यात्रियों को फौरन रिहा करने की मांग करते हैं. ईयूसीओ में इस मुद्दे पर बात होनी चाहिए और बेलारूस पर दबाव बनाया जाना चाहिए. बस बहुत हो गया.”
लिथुआनिया के राष्ट्रपति गितानास नौसेदा ने पूरे घटनाक्रम को घृणास्पद करार दिया. उन्होंने कहा, "यह अभूतपूर्व है. एक नागरिक विमान को जबरन मिंस्क में उतारा गया है. बेलारूस के राजनीतिक कार्यकर्ता और नेक्स्टा के संस्थापक इस विमान में यात्रा कर रहे थे. उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया है. बेलारूस की सरकार इस घिनौने कृत्य के पीछे है. मैं रमान प्रतोसेविच को तुरंत रिहा करने की मांग करता हूं.” नौसेदा ने यूरोपीय संघ और नाटो से भी इस मामले में दखल देने की मांग की. उन्हंने कहा कि अंतरराष्ट्रीय नागरिक विमानन के लिए यह एक खतरा है और नाटो व यूरोपीय संघ को फौरन कार्रवाई करनी चाहिए.
कौन हैं रोमान प्रोतासेविच?
26 साल के रमान दिमित्रियेविच प्रोतासेविच एक राजनीतिक कार्यकर्ता हैं. बेलारूस में जन्मे प्रोतासेविच एक पत्रकार के तौर पर काम करते हैं और राष्ट्रपति आलेक्जांडर लुकाशेंको के आलोचक रहे हैं. उन्होंने एक राष्ट्रपति विरोधी सोशल नेटवर्किंग ग्रुप बनाया था जिसे 2012 में अधिकारियों ने हैक कर लिया. 2012 में उन्होंने बेलारूसियन स्टेट यूनिवर्सिटी के पत्रकारिता विभाग में दाखिला लिया था लेकिन जल्दी ही उन्हें वहां से निष्कासित कर दिया गया. 2017 में उन पर एक अनधिकृत आयोजन का आरोप लगा लेकिन अदालत में वह यह साबित करने में कामयाब रहे कि आयोजन के वक्त वह कहीं और थे. मार्च 2019 से वह यूरोरेडियो के लिए फोटोग्राफर के तौर पर काम कर रहे थे. 2019 में वह पोलैंड चले गए थे. 22 जनवरी 2020 में उन्होंने ऐलान किया कि उन्होंने पोलैंड से राजनीतिक शरण मांगी है. लगभग तभी से वह स्टेपान पुतिलो के साथ मिलकर नेक्स्टा नाम का एक ब्लॉग चला रहे हैं.
वीके/एए (एएफपी, रॉयटर्स)
-जेरेमी बॉवेन
इसराइल और हमास के बीच ताज़ा संघर्ष के दौरान ग़ज़ा के फ़लस्तीनी घरों में बंद थे क्योंकि बाहर निकलने पर जान जाने का ख़तरा था. संघर्षविराम होने के बाद ही वे बाहर निकले ताकि यह देख सकें कि इसराइल ने क्या किया है.
लोग कंक्रीट के ढेर में तब्दील हो चुकी उस इमारत के मलबे को देखने जुट गए जिसे इसराइल ने ज़मींदोज़ कर दिया था. कुछ जगहों पर सड़कें इसी तरह के मलबे से बंद हो चुकी थीं. बुलडोज़र चलाने वाले लगातार काम कर रहे थे.
हालाँकि, इन सबमें ऐसा कुछ नहीं था जो चौंकाने वाला हो. इस संघर्ष के दौरान जो कुछ हुआ, उसे टीवी चैनलों ने भरपूर कवर किया. मगर इंसान चाहता है कि वह एक बार अपनी आँखों से देख ले.
इसराइली नेता और सैन्य कमांडर दावा कर रहे हैं कि उन्होंने 'हमास और ग़ज़ा में सक्रिय दूसरे छोटे गुटों के आतंक के इन्फ्रास्ट्रक्चर को गंभीर नुकसान पहुंचाया है.'
यहां इमारतों को हुआ नुक़सान साफ नज़र आता है. मगर ग़ज़ा के सशस्त्र समूहों के समर्थकों के मनोबल की बात ही अलग है. 11 दिनों के युद्ध के बाद उनका मनोबल न सिर्फ बना हुआ है बल्कि यह बढ़ा हुआ नज़र आता है.
मैं ज़मीन के नीचे बनाए गए सैन्य ठिकानों को तो नहीं देख पाया मगर यहां चर्चा है कि हमास इस बात से हैरान है कि इसराइल कैसे एकदम सुरक्षित माने जाने वाले अंडरग्राउंड ठिकानों में बैठे लोगों को भी निशाना बना पाया.
ग़ज़ा के क़स्बे ख़ान यूनस में मैं उन नौ लड़ाकों के जनाज़े में शामिल हुआ जो सुरंगों के नेटवर्क के उस हिस्से में मारे गए थे, जिस पर इसराइल ने निशाना साधा था.
ख़ान यूनस थम सा गया था. हज़ारों लोगों ने खेल के मैदान पर दुआ की और जब फ़लस्तीनी झंडों में लिपटे शवों को कब्रिस्तान की ओर ले जाया गया तो वे नारे लगाते रहे.
इसराइली नेता गिना रहे हैं कि किन इमारतों को तबाह किया गया, हमास के किन कमांडरों और लड़ाकों को निशाना बनाया गया और मारा गया. इसके साथ ही इसराइल के आयरन डोम एंटी-मिसाइल सिस्टम की क़ामयाबी की भी बात की जा रही है.
सबसे पहले तो हमास अपना वजूद क़ायम रहने को जीत के तौर पर दिखाता है. जिस दिन संघर्षविराम हुआ, उस दिन ग़ज़ा में हमास के नेता याह्या सिनवार सामने आए जो अब तक छिपे हुए थे. हालांकि, हमास को इस बात का भी संतोष है कि उसे राजनीतिक रूप से भी फ़ायदा हुआ है.
ग़ज़ा के केंद्र से लगभग 96 किलोमीटर दूर, यरुशलम की अल-अक़्सा मस्जिद में नमाज़ के बाद हमास के समर्थन में नारे गूंजना दिखाता है कि हमास फ़लस्तीनियों को यह संदेश देने में सफल रहा है कि वह यरुशलम पर उनके हक़ के लिए लड़ने और बलिदान करने के लिए तैयार है.
इसराइल कहता है कि पूरा का पूरा यरुशलम उसकी राजधानी है और इसे बांटा नहीं जा सकता लेकिन फ़लस्तीनियों के विचार अलग हैं.
फ़लस्तीनी राष्ट्रपति से निराशा
फ़लस्तीनी राष्ट्रपति महमूद अब्बास को फ़लस्तीनियों के नेता के तौर पर अंतरराष्ट्रीय मान्यता मिली हुई है.
वह पीएलओ और फ़लस्तीनी प्रशासन का नेतृत्व करते हैं जिसका काम इसराइल के कब्ज़े वाले इलाक़े के कुछ हिस्सों की ज़िम्मेदारी संभालना है.
1990 के ओस्लो समझौते के तहत फ़लस्तीनी प्रशासन को एक स्वतंत्र राष्ट्र की सरकार में तब्दील होना था लेकिन अब यह समझौता लगभग अप्रभावी हो गया है.
हालाँकि राष्ट्रपति के काम को लेकर फ़लस्तीनी संतुष्ट नहीं हैं. उन्होंने मई में होने वाले चुनाव रद्द करवा दिए. माना जा रहा था कि इन चुनावों में उनकी हार होती. फ़लस्तीनी 2006 के बाद से ही राष्ट्रपति या किसी भी विधानमंडल के लिए वोट नहीं कर पाए हैं.
इसी बीच, हमास का यह संदेश देना कि वे लोग आख़िरी दम तक यरुशलम के लिए लड़ेंगे, उन फ़लस्तीनियों के दिल में उतर गया जो राष्ट्रपति अब्बास से नाराज़ हैं.
फ़लस्तीनी इस बात से नाराज़ हैं कि इसराइल की कब्ज़ा की गई ज़मीन पर यहूदियों को बसाए जाने को अब्बास रोक नहीं पाए जबकि यह अंतरराष्ट्रीय क़ानून के तहत अवैध है.
इसराइल की घरेलू राजनीति
संघर्षविराम के बाद इसराइल में प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू अब फिर से अपने राजनीतिक वजूद को बचाए रखने की लड़ाई में जुट जाएंगे. हमास के साथ 11 दिन तक हुए संघर्ष से पहले भी वह यही कर रहे थे.
नेतन्याहू पर मुक़दमा चल रहा है और आरोप इतने गंभीर हैं कि वह अपने पूर्ववर्ती एहुद ओलमर्ट की तरह भ्रष्टाचार के लिए जेल जा सकते हैं. 10 मई को जब हमास ने नाटकीय ढंग से यरूशलम पर मिसाइल दागकर संघर्ष तेज़ कर दिया, उस वक्त नेतन्याहू अपना पद गंवाने के बेहद क़रीब थे
इसराइल में दो सालों मे चार चुनाव हुए और चारों में किसी को निर्णायक बहुत नहीं मिल पाया. ऐसे में नेतन्याहू अभी कार्यवाहक प्रधानमंत्री हैं. लगभग एक महीने तक कोशिशें करने के बाद भी नेतन्याहू संसद में 61 वोट हासिल करने लायक गठबंधन बनाने में असफल रहे हैं.
अपनी बारी का इंतज़ार कर रहे नेतन्याहू के मुख्य प्रतिद्वंद्वी यार लापिड यह एलान करने से कुछ दिन या शायद कुछ घंटे ही दूर थे कि उनके पास सरकार बनाने लायक वोट हैं. लेकिन संघर्ष शुरू होने के कारण लापिड की योजना खटाई में पड़ गई.
अभी भी उनके पास बहुमत लायक वोट जुटाने का समय है मगर माना जा रहा है कि शायद वह सफल न हों और पांचवीं बार चुनाव करवाने पड़ें.
संघर्षविराम कब तक?
इसराइल के सामने एक और चुनौती है. यहूदी बहुसंख्यकों और 20 फ़ीसदी आबादी वाले फ़लस्तीनी अरब अल्पसंख्यकों के बीच सह-अस्तित्व और भाईचारे की भावना ख़त्म हो गई है. नेतन्याहू के ध्रुवीकरण वाले बयानों और अतिवादी यहूदी राष्ट्रवादियों से क़रीबी बढ़ाने से हालात और ख़राब हो गए हैं.
इसराइल और हमास के बीच पहले हुई लड़ाइयों की तरह ही इस बार का संघर्षविराम भी एक अल्पकालिक ठहराव है. न तो इससे विवाद सुलझा है और न ही दोनों पक्ष शांत हुए हैं.
युद्धविराम कितना स्थाई है इसका पता तब तक नहीं चलेगा जब तक उकसाने वाले कोई घटना नहीं हो जाती. यह घटना ग़ज़ा से रॉकेट का दाग़ा जाना या फिर यरुशलम में फ़लस्तीनियों पर इसराइली पुलिस की हिंसा भी हो सकती है.
या फिर वह मुक़दमा भी इस संघर्षविराम का इम्तिहान ले सकता है जिसमें कब्ज़ाए गए पूर्वी यरुशलम के शेख़ जर्रा ज़िले में आकर बसे यहूदी समूहों की ओर से यहां रहने वाले फ़लस्तीनियों को उनके घर से बेदखल करने की मांग की गई है.
यरुशलम में हिंसा की शुरुआत ही इस आशंका को लेकर हुई थी कि फ़लस्तीनी परिवारों को उनके घर से निकाला जा सकता है और यहां पर और यहूदी आकर बस सकते हैं.
इस मामले में अदालत ने अपने फैसले को इसीलिए टाल दिया था ताकि हालात को शांत किया जा सके. मगर यह केस बंद नहीं हुआ है. इसमें फैसला आना ही है. ऐसे में इस संघर्षविराम के लिए पहली बड़ी चुनौती इसराइली अदालत की ओर से ही आ सकती है. (bbc.com)
बांग्लादेश के विदेश मंत्रालय ने कहा है कि बांग्लादेशी पासपोर्ट वाले लोगों के इसराइल जाने पर पाबंदी अब भी जारी है. दरअसल सारा मामला उस समय शुरू हुआ, जब बांग्लादेश के नए पासपोर्ट पर से 'इसराइल छोड़कर सभी देश' लाइन हटा दी गई.
इतना ही नहीं, मामला उस समय और भी उलझ गया, जब इसराइली विदेश मंत्रालय के एक अधिकारी गिलाड कोहेन ने एक न्यूज़ रिपोर्ट को ट्वीट करते हुए कहा कि बांग्लादेश ने इसराइल जाने पर लगी पाबंदी हटा ली है. उन्होंने इस क़दम का स्वागत किया और बांग्लादेश सरकार से अपील की कि वो इसराइल के साथ कूटनीतिक संबंध स्थापित करे.
विदेश मंत्रालय ने अपने बयान में कहा है- मंत्रालय का ध्यान इस पर गया है कि इसराइली विदेश मंत्रालय ने बांग्लादेश के ई पासपोर्ट में इसराइल पर पाबंदी का ज़िक्र नहीं किया गया है और इसराइल ने इसका स्वागत किया है. ऐसा लगता है कि नए ई-पासपोर्ट से भ्रम पैदा हुआ है, जिसमें 'इसराइल को छोड़कर सभी देश' का ज़िक्र नहीं है. ये लाइन हटाने का फ़ैसला अंतरराष्ट्रीय मानदंडों के हिसाब से किया गया है. बांग्लादेश की मध्य पूर्व को लेकर विदेश नीति में कोई बदलाव नहीं आया है. बांग्लादेशी पासपोर्ट धारकों के इसराइल की यात्रा पर पाबंदी जारी है. बांग्लादेश की सरकार इसराइल को लेकर अपनी स्थिति पर क़ायम है और इसमें कोई बदलाव नहीं आया है.
बयान में आगे लिखा गया है कि बांग्लादेश ने अल अक़्सा मस्जिद और ग़ज़ा में नागरिकों पर इसराइली कार्रवाई की निंदा की है.
बांग्लादेश 1967 से पहले की सीमाओं और पूर्वी यरुशलम को फ़लस्तीनी राज्य की राजधानी के रूप में मान्यता देने वाले संयुक्त राष्ट्र के प्रस्तावों के आलोक में इसराइल-फ़लस्तीनी संघर्ष में दो राष्ट्र के समाधान पर अपनी स्थिति को दोहराता है.
पिछले दिनों पूर्वी यरुशलम के अल अक़्सा मस्जिद से शुरू हुआ संघर्ष इसराइल और ग़ज़ा के बीच कई दिनों तक चली लड़ाई में तब्दील हो गया था. इसराइल ने ग़ज़ा पर हवाई हमले किए, तो फ़लस्तीनी चरमपंथी संगठन हमास ने भी इसराइल के कई शहरों पर रॉकेट हमले किए.
पिछले दिनों इसराइल संघर्ष विराम पर राज़ी हो गया. लेकिन इसराइली कार्रवाई के दौरान ग़ज़ा में 250 से ज़्यादा लोग मारे गए, जिनमें महिलाएँ और बच्चे भी थे.
बांग्लादेश के विदेश मंत्री डॉक्टर एके अब्दुल मोमेन ने भी कहा है पासपोर्ट एक राष्ट्रीय पहचान है और इससे विदेश नीति को नहीं दर्शाता.
उन्होंने कहा कि इसराइल को लेकर बांग्लादेश की स्थिति में कोई बदलाव नहीं आया है और बांग्लादेश इसराइल को मान्यता नहीं देता है.
विदेश मंत्री अब्दुल मोमेन ने कहा है कि 'इसराइल को छोड़कर' जैसे शब्द पासपोर्ट से हटाने का मतलब इसराइल की यात्रा पर लगी पाबंदी हटाना नहीं है.
उन्होंने कहा कि बांग्लादेश के गृह मंत्रालय ने क़रीब छह महीने पहले ये महसूस किया था कि किसी भी देश के पासपोर्ट पर ऐसे शब्द नहीं हैं और इसी कारण नए ई पासपोर्ट में बदलाव किए गए ताकि अंतरराष्ट्रीय मानदंडों को बनाए रखा जाए.
फ़लस्तीनी राजदूत को आपत्ति
हालाँकि बांग्लादेश स्थित फ़लस्तीनी राजदूत को बांग्लादेश के इस फ़ैसले पर आपत्ति है. ढाका स्थित फ़लस्तीनी राजदूत यूसुफ़ एसवाई रमादान ने कहा है कि बांग्लादेशी पासपोर्ट से 'इसराइल को छोड़कर' शब्द हटाना स्वीकार्य नहीं है.
उन्होंने बांग्लादेश सरकार के इस तर्क को ख़ारिज कर दिया है कि अंतरराष्ट्रीय मानदंडों को बनाए रखने के लिए ऐसा किया गया है.
फ़लस्तीनी राजदूत ने कहा कि उन्होंने बांग्लादेश के गृह मंत्री असदुज़्ज़मां ख़ान से मिलने का समय मांगा है.
बांग्लादेशी अख़बार ढाका ट्रिब्यून से बातचीत में उन्होंने कहा, "मैं इस घटनाक्रम से वाकिफ़ हूँ. किसी भी संप्रभु राष्ट्र को पासपोर्ट या किसी अन्य मुद्दे पर फ़ैसला करने का अधिकार है. ये मानते हुए, मैं ये कहूँगा कि बांग्लादेश की सरकार का ये फ़ैसला हमें स्वीकार नहीं है."
ग़ज़ा में चल रही इसराइली कार्रवाई के दौरान बांग्लादेश में फ़लस्तीनियों के समर्थन में कई बड़ी बड़ी रैलियाँ हुईं. फ़लस्तीनी राजदूत ने भी समर्थन के लिए बांग्लादेश के लोगों का आभार जताया था.
1971 अपने गठन के बाद से ही बांग्लादेश ने इसराइल को मान्यता नहीं दी है. बांग्लादेश का कहना है कि वो अलग फ़लस्तीनी राष्ट्र का समर्थन करता है और वो ये चाहता है कि 1967 से पहले वाली स्थिति क़ायम की जाए और फ़लस्तीनी अलग राष्ट्र को मान्यता दी जाए.
वीडियो कैप्शन,
इसराइल-हमास के बीच संघर्ष विराम कब तक रह पाएगा?
इतना ही नहीं बांग्लादेश पूर्वी यरुशलम को फ़लस्तीनी राष्ट्र की राजधानी का दर्जा देता है. पूर्वी यरुशलम के अल अक़्सा मस्जिद से ही ताज़ा संघर्ष शुरू हुआ है. मुसलमान और यहूदी दोनों इसे अपना पवित्र स्थल मानते हैं.
नवंबर 2003 में बांग्लादेश के एक पत्रकार सलाह चौधरी ने तेल अवीव जाने की कोशिश की थी. लेकिन उन्हें गिरफ़्तार कर लिया गया था. उन पर देशद्रोह, राजद्रोह और ईशनिंदा का मामला चला था. उन्हें सात साल जेल की सज़ा हुई थी.
बीबीसी बांग्ला सेवा के संवाददाता शुभज्योति घोष के मुताबिक़ गठन के समय बांग्लादेशी पासपोर्ट पर तीन देशों का ज़िक्र था, जहाँ की यात्रा बांग्लादेश पासपोर्ट धारक नहीं कर सकते थे. ये देश थे- दक्षिण अफ़्रीका, ताइवान और इसराइल. दक्षिण अफ़्रीका का ज़िक्र उसकी रंगभेद की नीति के कारण और ताइवान का बांग्लादेश की वन चायना नीति के समर्थन के कारण और इसराइल का फ़लस्तीनी राष्ट्र के समर्थन के कारण.
बांग्लादेश ने बाद में पासपोर्ट से दक्षिण अफ़्रीका और ताइवान का नाम हटा दिया. लेकिन इसराइल का नाम अभी तक था.
जहाँ तक इसराइल बांग्लादेश संबंध की बात है, आधिकारिक तौर पर बांग्लादेश इसराइल को मान्यता नहीं देता. लेकिन बीबीसी संवाददाता शुभज्योति घोष का कहना है कि जानकार बताते हैं कि बांग्लादेश गुप्त रूप से इसराइल से बहुत कुछ ख़रीद रहा है. लेकिन सरकार ने खुले तौर पर कभी इस पर कुछ नहीं कहा.
उन्होंने बताया कि बांग्लादेश इसराइल से जासूसी उपकरण जैसे सर्वेलांस डिवाइस और फोन टेपिंग उपकरण धड़ल्ले से ख़रीदता है और उसका बांग्लादेश इस्तेमाल भी ख़ूब करता है.
इसराइल का संयुक्त अरब अमीरात और बहरीन के साथ कूटनीतिक रिश्ते बहाल होने के बाद से अरब जगत में ये चर्चा है कि अगला नंबर सऊदी अरब का हो सकता है. अमेरिका भी इसकी कोशिश में है कि इसराइल और सऊदी अरब के रिश्ते बहाल हो जाएँ.
जानकारों का कहना है कि अगर सऊदी अरब और इसराइल के रिश्ते सामान्य हो गए, तो बांग्लादेश भी उसी रास्ते पर जा सकता है. क्योंकि इसराइल ने खुलकर बांग्लादेश के साथ रिश्ते बहाल करने की पैरवी की है.
बांग्लादेश पर भी इसराइल के साथ कूटनीतिक रिश्ते बहाल करने का दबाव है, लेकिन बांग्लादेश अपनी आंतरिक स्थिति और धार्मिक भावनाओं के कारण इस पर खुलकर कुछ नहीं कहता. (bbc.com)
एक अमेरिकी ख़ुफ़िया रिपोर्ट में दावा किया गया है कि दुनिया में कोरोना महामारी फैलने से करीब एक महीने पहले वुहान लैब के तीन शोधकर्ता बीमार पड़ गए थे.
अमेरिकी अख़बार वॉल स्ट्रीट जर्नल की ख़बर के मुताबिक़ वुहान इंस्टिट्यूट ऑफ़ वायरॉलजी के तीन शोधकर्ता नवंबर 2019 में बीमार पड़े थे और उन्हें अस्पताल की मदद माँगी थी.
इस ख़ुफ़िया रिपोर्ट में वुहान लैब के बीमार शोधकर्ताओं की संख्या, उनके बीमार पड़ने के समय और अस्पताल जाने से जुड़ी विस्तृत जानकारियाँ हैं.
उम्मीद जताई जा रही है कि ख़ुफ़िया रिपोर्ट की जानकारियाँ उस दावे की जाँच करने पर बल देंगी जिनमें वुहान लैब से कोरोना वायरस फैलने की आशंका जताई गई है.
यह रिपोर्ट विश्व स्वास्थ्य संगठन की उस बैठक से एक दिन पहले आई जिसमें डब्ल्यूएचओ के कोरोना वायरस के उद्गम के बारे में अगले चरण की जाँच पर चर्चा का अनुमान है.
'जाँच को लेकर गंभीर है बाइडन प्रशासन'
अमेरिकी सिक्योरिटी काउंसिल की प्रवक्ता ने वॉल स्ट्रीट जर्नल की इस ख़बर पर कोई टिप्पणी नहीं की लेकिन उन्होंने कहा कि बाइडन प्रशासन ‘कोरोना वायरस के उद्गम की जाँच को लेकर गंभीर है.’
इससे पहले विश्व स्वास्थ्य संगठन की एक टीम महामारी से जुड़े तथ्यों का पता लगाने के लिए वुहान गई थी.
हालाँकि फिर डब्ल्यूएचओ ने कहा था कि यह साबित करने के लिए पर्याप्त तथ्य नहीं है कि कोरोना वायरस वुहान की लैब से दुनिया भर में फैला.
पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप कोरोना वायरस को ‘चीनी वायरस’ और ‘वुहान वायरस’ कहा करते थे और चीन ने इस पर कड़ी आपत्ति ज़ाहिर की थी.
चीन पर जाँच में विश्व स्वास्थ्य संगठन की टीम को पूरा सहयोग न देने और वुहान लैब से जुड़ी जानकारियाँ छिपाने के आरोप भी लगते रहे हैं. (bbc.com)
-अमृता शर्मा
कई दशक के युद्ध के बाद जब अमेरिकी सैनिक अफ़ग़ानिस्तान छोड़ने की तैयारी कर रहे हैं, तब भारत इस गतिविधि की पूरी चौकसी से निगरानी कर रहा है.
अमेरिकी सैनिकों के अफ़ग़ानिस्तान छोड़ने का फ़ैसला अमेरिका और तालिबान के बीच दोहा में 2020 में हुई संधि के बाद आया था.
इसकी आधिकारिक घोषणा इसी साल अप्रैल में हुई, जब अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन ने कहा कि 11 सितंबर तक अमेरिकी सैनिक लौट आएंगे.
11 सितंबर, 2021 को अमेरिका पर हुए आतंकी हमले की 20वीं बरसी भी है. इस हमले के बाद ही अमेरिका ने अफ़ग़ानिस्तान पर हमला किया था.
इस बारे में भारत ने कहा है कि अफ़ग़ान शांति प्रक्रिया पर उसकी नज़र है.
विशेषज्ञों की मानें तो भारत की चिंताएं अफ़ग़ानिस्तान में अस्थिरता, तालिबान के उभार और इन सबमें पाकिस्तान और चीन की भूमिका से जुड़ी हैं.
भारत हमेशा से अफ़ग़ानिस्तान में लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था का हिमायती रहा है.
इतना ही नहीं, वह अफ़ग़ान शांति प्रक्रिया की कई बैठकों में शामिल भी रहा जिनमें दोहा, जिनेवा और दुशान्बे में हुई बैठकें शामिल हैं.
अब जब अमेरिकी सैनिक अफ़ग़ानिस्तान से जा रहे हैं तब भारत को अफ़ग़ानिस्तान में अस्थिरता उत्पन्न होने का ख़तरा लग रहा है.
विश्लेषक अविनाश पालीवाल के मुताबिक़ क़ाबुल में पाकिस्तान के बढ़ते दख़ल से अफ़ग़ानिस्तान में अस्थिरता का ख़तरा बढ़ेगा.
भारत की एक बड़ी चिंता तालिबान के संभावित उभार से भी जुड़ी है. ऐसी स्थिति में अफ़ग़ानिस्तान एक बार फिर से चरमपंथियों का अड्डा बन सकता है.
ट्रंप प्रशासन में राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद की सदस्य रहीं लिज़ा कुर्टिस के मुताबिक, "अफ़ग़ानिस्तान से अमेरिकी सैनिकों के हटने से क्षेत्रीय देशों, ख़ासकर भारत को अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान के सशक्त होने को लेकर चिंता होगी."
इस चिंता की वाजिब वजहें भी हैं. साल 1990 के दशक में तालिबान ने लश्करे तैय्यबा और जैशे मोहम्मद जैसे चरमपंथी संगठनों से चरमपंथियों को नियुक्त किया था, जिन्होंने भारत विरोधी गतिविधियों को अंजाम दिया था.
इनमें 1999 में एक भारतीय विमान का अपहरण और 2001 में भारतीय संसद पर हमला शामिल था.
हाल ही में भारत के चीफ़ ऑफ़ डिफ़ेंस स्टॉफ़ बिपिन रावत ने अफ़ग़ानिस्तान से अमेरिकी सैनिकों के हटने पर ऐसी ही चिंताएं ज़ाहिर की हैं.
भारत की चिंताएं ख़ुफ़िया जानकारियों से भी बढ़ी हैं जिनमें कहा जा रहा है कि अमेरिकी सैनिकों के हटने की स्थिति में चरमपंथी संगठन बड़ी संख्या में अफ़ग़ानिस्तान का रूख़ कर रहे हैं.

अफ़ग़ानिस्तान युद्ध अमेरिका को कितना महंगा पड़ा है?
साल 2019 में जनरल बिपिन रावत तब भारतीय थल सेना के प्रमुख थे, तब उन्होंने अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान से बातचीत का समर्थन किया था. यह वो दौर था जब भारत तालिबान के साथ किसी तरह का संबंध नहीं रखने की नीति अपनाए हुए था.
भारत तालिबान के साथ सीधी बातचीत से बचता रहा है लेकिन अफ़ग़ानिस्तान पर आयोजित मॉस्को पीस कान्फ्रेंस में भारत ने ग़ैर-आधिकारिक दल को भेजा था.
पिछले साल दोहा में हुई बैठक में भारतीय विदेश मंत्री एस. जयशंकर शामिल हुए थे. इससे संकेत मिलता है कि भारत अपनी पहले की स्थिति से नरम रुख़ अपना रहा है.
पाकिस्तान और चीन पर नज़र
भारत की एक बड़ी चिंता यह भी है कि अमेरिका के हटने से अफ़ग़ानिस्तान में पाकिस्तान का राजनीतिक दख़ल बढ़ेगा.
पाकिस्तान ने दोहा में अमेरिका और तालिबान के बीच हुई बातचीत में अहम भूमिका अदा की थी. पाकिस्तान का तालिबान के साथ संबंध है लेकिन वो चरमपंथियों का साथ देने के आरोप से इनकार करता रहा है.
विश्लेषकों के मुताबिक़, अफ़ग़ानिस्तान में पाकिस्तान के असर को दरकिनार नहीं किया जा सकता.
देबीदत्ता अरबिंदो महापात्रा के मुताबिक़, अफ़ग़ानिस्तान की राजनीति पर पाकिस्तान की अहम भूमिका होगी, इसकी वजह उसकी भोगौलिक नज़दीकी, धार्मिक और नस्लीय निकटता तो है ही, साथ ही उसे मालूम है कि वो इन ताक़तों का इस्तेमाल भारत के ख़िलाफ़ कर सकता है.
हालाँकि, पाकिस्तान अभी एक खस्ताहाल अर्थव्यवस्था के दौर में है. जून में आईएमएफ़ और फ़ाइनेंशियल एक्शन टास्क फ़ोर्स पाकिस्तान को लेकर समीक्षा बैठक करने वाली है, ऐसे में वो अफ़ग़ानिस्तान में किसी तरह की शरारतपूर्ण हरकत का जोख़िम नहीं उठा सकता.
विश्लेषक केएन पंडिता के मुताबिक़, "उम्मीद की जानी चाहिए कि पाकिस्तान का नेतृत्व इतना समझदार होगा कि वो ऐसी किसी परिस्थिति को आमंत्रित नहीं करेगा."
लेकिन भारत चीन की भूमिका नज़रअंदाज़ नहीं कर सकता. स्नेहेश एलेक्स फ़िलिप के मुताबिक़, 'चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग का ड्रीम प्रोजेक्ट द बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव अफ़ग़ानिस्तान तक जा सकता है.'
पहले जनरल रावत ने भी संकेत दिया था कि अफ़ग़ानिस्तान को उन देशो से ख़तरा होगा जो अपने फ़ायदे के लिए उसके संसाधनों का इस्तेमाल करना चाहते हैं क्योंकि मोटे तौर पर अनुमान है कि अफ़ग़ानिस्तान में एक ट्रिलियन डॉलर के प्राकृतिक संसाधन मौजूद हैं.
भारत की एक चिंता ये भी होगी कि इस क्षेत्र में चीन पाकिस्तान का साथ दे सकता है.
फ़िलिप के मुताबिक़, पाकिस्तान और चीन के आपसी गठजोड़ से भारत के लिए स्थिति तनावपूर्ण हो सकती है.
व्यावहारिक नीति की ज़रूरत
वैसे अफ़ग़ानिस्तान, भारत एक मज़बूत साझेदार है. भारत ने अफ़ग़ानिस्तान की कई विकास परियोजनाओं में दो अरब डॉलर का निवेश किया हुआ है जिसमें अस्पताल, शैक्षणिक संस्थान और अफ़ग़ानी संसद की इमारत का निर्माण भी शामिल है.
अफ़ग़ान लोगों में भी भारत की छवि अच्छी है. महापात्रा के मुताबिक़ भारत ने अफ़ग़ानिस्तान के विकास में योगदान दिया है.
ऐसी स्थिति में भारत को अपनी रणनीतिक दूरदर्शिता का परिचय देते हुए क़ाबुल में अपने हितों की रक्षा करनी होगी.
इसके लिए उसे तालिबान सहित सभी प्रमुख साझेदारों से संपर्क बढ़ाना होगा. महापात्रा के मुताबिक़, व्यवहारिक नीति अपनाते हुए भारत को तालिबानी नेताओं से बात करने की ज़रूरत है.
पिछले साल भारत यात्रा के दौरान अफ़ग़ान शांति वार्ताकर अब्दुल्लाह अब्दुल्लाह ने कहा था कि अगर भारत तालिबान से बातचीत करता है तो भी अफ़ग़ानी नेतृत्व को कोई दिक़्क़त नहीं है.
महापात्रा के मुताबिक़, 'भारत को अफ़ग़ानिस्तान में लाभ लेने के लिए अपने बढ़ते आर्थिक और सैन्य दबदबे के साथ सॉफ़्ट पावर वाली भूमिका का इस्तेमाल भी करना चाहिए और यह चतुर कूटनीति से ही संभव है.' (bbc.com)
बीजिंग, 24 मई| अमेरिकी पूर्व विदेश मंत्री हेनरी अल्फ्रेड किसिंजर ने हाल ही में स्विट्जरलैंड के न्यू ज्यूरिख टाइम्स अखबार को दिए एक साक्षात्कार में कहा कि चीन के साथ प्रतिरोध करने से एक संघर्ष छिड़ेगा, जिसका कोई विजेता नहीं होगा। न्यू ज्यूरिख टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, वाशिंगटन और पेइचिंग शीतयुद्ध से कितने दूर होने के सवाल का जवाब देते हुए किसिंजर ने कहा कि पिछले एक साल में, विशेष रूप से पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के कार्यकाल के अंतिम कुछ महीनों में चीन और अमेरिका के बीच तनावपूर्ण स्थिति तेजी से गंभीर हुई है।
किसिंजर मानते हैं कि बाइडेन सरकार को समझ में आ गया है कि चीन के साथ प्रतिरोध करना चीन और अमेरिका के हितों के अनुकूल नहीं है और दुनिया के हित के अनुकूल भी नहीं है, जिससे प्रथम विश्व युद्ध जैसा एक संघर्ष छिड़ेगा, जिसका कोई विजेता नहीं होगा। संघर्ष दोनों पक्षों की थकावट के साथ-साथ समाप्त हो जाएगा।
इसके अलावा, किसिंजर ने अमेरिका की एक गंभीर घरेलू समस्या का उल्लेख करते हुए कहा कि अमेरिकी जनमत में चीन को स्थायी दुश्मन के रूप में माना जाता है। इस देश के लोगों को आशंका है कि अमेरिका में हुई सभी बुरी बातें चीन की इच्छा से हुई हैं।
रिपोर्ट के अनुसार किसिंजर ने यह भी कहा है कि बाइडेन सरकार के लिए टकराव छोड़कर एक निरंतर रणनीति तैयार करना और अधिक जटिल हो जाएगा।
किसिंजर ने हाल ही में चीन-अमेरिका संबंधों पर कई बार बयान दिये हैं। इससे पहले उन्होंने चेतावनी दी थी कि चीन और अमेरिका के बीच तनावपूर्ण संबंधों से दो प्रमुख सैन्य प्रौद्योगिकी दिग्गजों के बीच व्यापक संघर्ष छिड़ेंगे। इससे मानव के सामने कयामत के दिन का खतरा तेजी से बढ़ रहा है। चीन के प्रति अमेरिकी नीतियों की चर्चा करते हुए किसिंजर ने कहा कि अमेरिका के सिद्धांतों पर कायम रहते हुए चीन का सम्मान मांगना आवश्यक है और साथ ही चीन के साथ निरंतर संवाद बनाए रखने और सहयोग के क्षेत्रों की तलाश करने की जरूरत भी है। (आईएएनएस)
(साभार : चाइना मीडिया ग्रुप, पेइचिंग)
बीजिंग, 24 मई| बहुत-से विकसित देशों की सरकारों ने जरूरत से ज्यादा वैक्सीन जमा करके रख ली है। यह और कुछ नहीं बल्कि 'वैक्सीन राष्ट्रवाद' है। जब संकट का समय हो और दुनिया के बाकी लोगों की कीमत पर सरकारें सिर्फ अपने देश के लोगों को प्राथमिकता दें तो इसे गलत ही कहा जाएगा। यह खतरे की भयावहता और इसे दूर करने में वैक्सीन के महत्व की वजह से खासतौर पर बहस का मुद्दा बन गया है। वैक्सीन की जरूरत तो दुनिया के बहुत सारे देशों को है। ऐसे माहौल में इन देशों की सरकारों को इस बात को नैतिक जिम्मेदारी समझनी होगी। यह दुखद है कि अंतर्राष्ट्रीय तौर पर इसे लेकर कोई करार नहीं हुआ है।
लेकिन यह देखते हुए कि कोरोना दुनिया के किसी भी देश में फैल रहा है, व्यावहारिक रूप से इसको फैलने से रोकने के लिए वैक्सीन समानता बहुत जरूरी है।
वैक्सीन की समानता के सिद्धांत का मतलब है कि दुनियाभर के लोगों के लिए बराबर वैक्सीन मुहैया हो सकें। फिलहाल यह नहीं हो रहा है। अमेरिका की 35 प्रतिशत आबादी को पूरी तरह वैक्सीन लग चुकी है। वैश्विक पटल पर देखें तो यह आंकड़ा महज 2.3 फीसदी है और अफ्रीका में 1 फीसदी से भी कम है, जो कि बहुत बड़ी गैर-बराबरी है।
फिलहाल, इस वक्त सबसे जरूरी है कि वैक्सीन बनाने की क्षमता बढ़ाई जाए और विकासशील देशों तक वैक्सीन पहुंचाई जाए। यह समान वितरण होना बहुत जरूरी है। यह पेटेंट और वैक्सीन तकनीक धाराओं धारकों द्वारा दूसरे निमार्ताओं को वैक्सीन बनाने की छूट देने के बाद होगा। यह भी जरूरी है कि निर्माण और वितरण की तकनीक के ट्रांसफर में भी मदद की जाए। जीवन बचाने वाले बदलाव बहुत तेजी से किये जाने चाहिए। इसमें क्षमता बढ़ाना, सहायक तकनीक को मजबूत करना, विकासशील देशों में वैक्सीन बनाने में तेजी लाने के लिए उन्हें काम सिखाना आदि शामिल हैं।
इस काम में अमेरिका, भारत, चीन जैसे प्रमुख देशों की सरकारों को मध्स्थ की भूमिका निभानी होगी। वे एक उचित कीमत पर वैक्सीन गरीब देशों और स्वयंसेवी संस्थाओं को मुहैया करवाए। इसे वैक्सीन उत्पादन त्रिकोण कह सकते हैं और इसे यूगांडा में कुछ साल पहले सफलतापूर्वक लागू किया जा चुका है।
इस त्रिकोण में तीन पक्ष हैं- पहला, जिनके पास वैक्सीन की तकनीक और पेटेंट है। दूसरा, भारत, चीन जैसे देश जिनके पास वैक्सीन बनाने की क्षमता है। और तीसरा, वे विकासशील देश जिन्हें वैक्सीन खरीदनी है। जब ये तीनों चीजें साथ होंगी, तभी दवाएं बनाने में तेजी आएगी और इनका वितरण भी तेजी से हो सकता है, वरना यह संभव नहीं हो पाएगा।
यह सबसे मजबूत तर्क है और इसमें भी बड़ी बात यह है कि कोरोना वायरस लगातार विकसित हो रहा है, खुद को बदल रहा है। अगर विकासशील देशों को वैक्सीन आसानी से नहीं मिलेगी तो यह ज्यादा लोगों तक फैलेगा। जैसे-जैसे यह कोरोना वायरस ज्यादा विकसित होगा इसके नये-नये स्ट्रेन आएंगे। और यह तो सबको पता है कि वायरस में जितने बदलाव होंगे वह उतना ही ज्यादा वैक्सीन के लिए प्रतिरोधी साबित होंगे। जब उस पर वैक्सीन का असर नहीं होगा तो कैसे अंकुश लगा पाएंगे।
इसका मतलब यह है कि जब वैक्सीन समानता होगी तो इसका फायदा हरेक देश को होगा। हालांकि, कुछ देश भले ही अपनी सीमा सील करके वायरस को अपनी आबादी में फैलने से रोकने की कोशिश कर सकते हैं, लेकिन नैतिक रूप से गैर-जिम्मेदाराना बात है। (आईएएनएस)
(अखिल पाराशर, चाइना मीडिया ग्रुप, पेइचिंग)
बीजिंग, 24 मई| "एक दशक से अधिक समय पहले जब मैंने पहली बार तिब्बत की यात्रा की, तो वहां पाया कि तिब्बत में विकास और परिवर्तन अद्भुत है। स्थानीय लोगों का जीवन स्तर उल्लेखनीय रूप से उन्नत हुआ है, और चीन सरकार ने तिब्बती पारंपरिक संस्कृति के संरक्षण के लिए बड़ी कोशिश की है।" फ्रांसीसी दार्शनिक और लेखिका सोनिया ब्रेस्लर ने हाल ही में तिब्बत पर टिप्पणी करते हुए चीनी समाचार एजेंसी शिन्हुआ को दिए एक इंटरव्यू में यह बात कही। ब्रेस्लर ने क्रमश: साल 2007, 2012, 2016 और 2019 चार बार तिब्बत की यात्रा की। उन्होंने एक दशक से अधिक समय तक तिब्बत की अपनी यात्रा के दौरान जिन लोगों और चीजों का सामना किया, उन्हें रिकॉर्ड किया और तिब्बत की खोज जैसी कई किताबें प्रकाशित कीं, जो आज तिब्बत को समझने के लिए फ्रांसीसी पाठकों के लिए एक महत्वपूर्ण खिड़की बन गई है।
तिब्बत के विकास और परिवर्तनों ने ब्रेस्लर पर गहरी छाप छोड़ी। उन्होंने कहा कि पश्चिमी मीडिया हमेशा तिब्बती सांस्कृतिक विरासत के विनाश पर आरोप लगाती रहती है, लेकिन जब वह ल्हासा में पहली बार तिब्बत गई, उन्होंने मठों और मंदिरों के दर्शन के लिए दूर से बड़ी संख्या में पर्यटकों को आते देखा। यह बहुत चौंकाने वाला था, जो पश्चिमी मीडिया की रिपोटरें में स्थिति के बिल्कुल विपरीत है। उन्होंने तिब्बत में स्कूलों, अस्पतालों और बुनियादी संस्थापनों का तेजी से विकास देखा है। सांस्कृतिक अवशेषों को अच्छी तरह से संरक्षित किया गया है।
ब्रेस्लर ने कहा कि चीन सरकार तिब्बत के सामाजिक आर्थिक विकास को बढ़ावा देने के साथ-साथ तिब्बती पारंपरिक संस्कृति के संरक्षण के लिए सिलसिलेवार कदम उठाए। मसलन् तिब्बती सांस्कृतिक विरासतों की मरम्मत और संरक्षण। उन्होंने कहा कि चीन सरकार के समर्थन के बगैर, तिब्बती संस्कृति का आज जैसा विकास नहीं हो पाता।
हरेक बार की यात्रा से ब्रेस्लर ने चीन सरकार के प्रयासों से तिब्बत के स्थानीय लोगों के जीवन स्तर की उन्नति में प्राप्त फलों को महसूस किया। उन्होंने कहा कि इन प्रगतियों को पश्चिमी
मीडिया ने नजर अंदाज किया है। लंबे समय से तिब्बत के प्रति पश्चिमी समाज पक्षपातपूर्ण रहा है, पश्चिमी लोगों को वास्तविक तिब्बत को समझने की बड़ी आवश्यकता है।
ब्रेस्लर को उम्मीद है कि पश्चिमी विद्वान और लोग खुद तिब्बती क्षेत्रों में जा सकेंगे, वहां युवा पीढ़ी के जीवन को देख सकेंगे, तिब्बती उद्यमियों और आधुनिक भिक्षुओं की नई पीढ़ी को देख सकेंगे, तिब्बत के विकास को महसूस कर सकेंगे, और तिब्बती लोगों की आवाज सुन सकेंगे। रंगीन चश्मा उतार देंगे। तभी समझ सकेंगे कि तिब्बत में चीन सरकार के प्रयासों को झूठी पश्चिमी रिपोटरें में हस्तक्षेप नहीं किया जाना चाहिए। (आईएएनएस)
(साभार : चाइना मीडिया ग्रुप, पेइचिंग)
वाशिंगटन/सियोल, 23 मई | दक्षिण कोरियाई बायोफार्मास्युटिकल फर्म सैमसंग बायोलॉजिक्स ने अपने स्थानीय कारखाने में मॉडर्ना की कोविड वैक्सीन बनाने के लिए एक समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं।
समझौते के तहत, सैमसंग समूह की बायोटेक इकाई अमेरिकी दवा निर्माता को अपने एमआरएनए वैक्सीन के लिए अनुबंध निर्माण संगठन (सीएमओ) सेवाएं प्रदान करेगी। इसका मतलब है कि कुछ मॉडर्ना वैक्सीन का उत्पादन दक्षिण कोरिया में किया जाएगा।
योनहाप समाचार एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार दोनों पक्षों ने शनिवार को दक्षिण कोरिया-यूएस वाशिंगटन, डीसी में राष्ट्रपति मून जे-इन की उपस्थिति के साथ वैक्सीन साझेदारी कार्यक्रम आयोजित हुआ।
सैमसंग बायोलॉजिक्स के सीईओ जॉन रिम और उनके मॉडर्ना समकक्ष स्टीफन बंसेल के साथ-साथ एक अन्य अमेरिकी वैक्सीन उत्पादन कंपनी नोवावैक्स के सीईओ स्टेनली एर्क भी मौजूद थे।
मून के कार्यालय, चेओंग वा डे के अनुसार, '' इस सौदे से दक्षिण कोरिया में मॉडर्ना वैक्सीन की स्थिर और त्वरित आपूर्ति में योगदान की उम्मीद है।''
मून ने 'वैश्विक वैक्सीन उत्पादन केंद्र' के रूप में उभरने के देश के लक्ष्य का हवाला देते हुए, वैक्सीन डेवलपर्स और निर्माताओं के लिए अपनी सरकार के पूर्ण समर्थन का वादा किया।
मून ने बताया कि वह और अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन पिछले दिन अपनी शिखर वार्ता के दौरान सहयोगियों के बीच एक व्यापक वैश्विक वैक्सीन साझेदारी स्थापित करने पर सहमत हुए थे।
राष्ट्रपति ने इसे अमेरिका की मूल तकनीकों और दक्षिण कोरिया की दवा उत्पादन क्षमता को मिलाने में मदद करने के लिए 'वैक्सीन गठबंधन' का नाम दिया।
एस्ट्राजेनेका, नोवावैक्स और स्पुतनिक वी टीके पहले से ही देश में निर्मित किए जा रहे हैं।
मॉडर्ना ने दक्षिण कोरिया के व्यापार, उद्योग और ऊर्जा मंत्रालय और स्वास्थ्य और कल्याण मंत्रालय के साथ एक समझौता ज्ञापन (एमओयू) पर भी हस्ताक्षर किए।
एमओयू के तहत, मॉडर्ना दक्षिण कोरिया में एमआरएनए वैक्सीन उत्पादन सुविधा और जनशक्ति की भर्ती में निवेश के लिए प्रयास करने के लिए सहमत हुई। मंत्रालयों ने मॉडर्ना के निवेश और व्यावसायिक गतिविधियों के लिए सहायता प्रदान करने की योजना बनाई है।
दक्षिण कोरिया के राष्ट्रीय स्वास्थ्य संस्थान ने भी संक्रामक रोगों में अनुसंधान पर सहयोग को मजबूत करने के लिए मॉडर्ना के साथ एक समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए। (आईएएनएस)
एम्स्टर्डम, 23 मई | नीदरलैंड की राजधानी एम्स्टर्डम में चाकू मारने की घटना में एक की मौत हो गई और चार घायल हो गए। पुलिस ने यह जानकारी दी। समाचार एजेंसी सिन्हुआ की रिपोर्ट के अनुसार, पुलिस ने शनिवार को एक बयान में कहा कि घटना रात करीब 11 बजे शुक्रवार को शहर के केंद्र के पास फर्डिनेंड बोल स्ट्रीट में हुई। संदिग्ध के तौर पर एमस्टेलवीन के एक 29 वर्षीय व्यक्ति को गिरफ्तार किया गया है।
पुलिस घटना की जांच कर रही है और सभी विकल्प खुले रखे हुए हैं।
बयान में कहा गया, "अभी तक किसी आतंकवादी मकसद का कोई प्रत्यक्ष संकेत नहीं मिला है।" (आईएएनएस)
वाशिंगटन, 23 मई | कोरोना के वैश्विक मामले बढ़कर 16.64 करोड़ हो गए हैं, जबकि इस महामारी से मरने वालों की संख्या बढ़कर 34.3 लाख हो गई है। जॉन्स हॉपकिन्स विश्वविद्यालय ने यह जानकारी दी।
रविवार की सुबह अपने नवीनतम अपडेट में, यूनिवर्सिटी के सेंटर फॉर सिस्टम साइंस एंड इंजीनियरिंग (सीएसएसई) ने खुलासा किया कि वर्तमान वैश्विक मामले और इससे मरने वालों की संख्या क्रमश: बढ़कर 166,438,026 और 3,449,399 हो गई।
सीएसएसई के अनुसार, दुनिया के सबसे अधिक मामलों और मौतों की संख्या क्रमश: 33,103,118 और 589,670 के साथ अमेरिका सबसे ज्यादा प्रभावित देश बना हुआ है।
संक्रमण के मामले में भारत 26,289,290 मामलों के साथ दूसरे स्थान पर है।
30 लाख से अधिक मामलों वाले अन्य सबसे प्रभावित देश ब्राजील (16,047,439), फ्रांस (5,979,597), तुर्की (5,178,648), रूस (4,935,302), यूके (4,476,297), इटली (4,188,190), जर्मनी (3,653,019), स्पेन (3,636,453) हैं। , अर्जेंटीना (3,514,683) और कोलंबिया (3,210,787) हैं।
मौतों के मामले में ब्राजील 448,208 मौतों के साथ दूसरे नंबर पर है। (आईएएनएस)
वॉशिंगटन, 22 मई| टीकाकरण के लिए अधिक से अधिक लोगों को प्रेरित करने के लिए व्हाइट हाउस टिंडर, बम्बल और ओकेक्यूपिड जैसी प्रमुख डेटिंग वेबसाइटों के साथ मिलकर काम कर रहा है। इसके तहत टीकाकरण के बाद यूजर्स को इन साइटों पर कई फायदे दिलाए जाएंगे जैसे कि उनके लिए परफेक्ट मैच ढूंढ़ना वगैरह। व्हाइट हाउस कोविड-19 रिस्पॉन्स टीम ने शुक्रवार को ऐलान किया कि सोशल डिस्टेंसिंग और डेटिंग इन दोनों का कॉम्बिनेशन बेहद अलग है। "इसलिए आज बम्बल, टिंडर, हिंग, मैच, ओकेक्यूपिड, बीएलके, चिस्पा, प्लेन्टी ऑफ फिश और बाडो जैसे डेटिंग साइट्स ये घोषणा कर रहे हैं कि वैक्सीनेशन को प्रोत्साहित करने के लिए कई नए फीचर्स लाए जाएंगे, जिसके तहत शानदार लोगों से मिलने में आपकी मदद की जाएगी, वे लोग जिन्होंने कोविड-19 के खिलाफ अपना टीकाकरण करवा लिया है।"
अमेरिका में इन डेटिंग साइट्स का उपयोग 5 करोड़ से भी अधिक लोग करते हैं और ये काफी मशहूर भी हैं।
ओकेक्यूपिड के मुताबिक, जो लोग अपना वैक्सीनेशन स्टेटस डिस्प्ले करेंगे, उनके मैच मिलने की संभावना 14 फीसदी अधिक रहेगी।
व्हाइट हाउस की टीम ने कहा है, "हमने आखिरकार वह एक चीज ढूंढ ली है, जो हमें और अधिक आकर्षक बनाती है : टीकाकरण।" (आईएएनएस)
कोरोना महामारी की वजह से एलजीबीटी समुदाय के लोगों के बीच घरेलू हिंसा और मानसिक तनाव के मामले बढ़ गए हैं. महामारी में लगी पाबंदियों की वजह से इस समुदाय के लोगों को अपना पार्टनर खोजने में काफी समस्या हो रही है.
डॉयचे वैले पर मावरा बारी की रिपोर्ट
कोरोना महामारी ने पाकिस्तान में रह रहे एलजीबीटी समूह के लोगों की जिंदगी को और अधिक कठिन बना दिया है. पहले से ही ये लोग इस देश में काफी मुश्किलों का सामना कर रहे थे. मुस्लिम बहुल इस देश में एलजीबीटी समुदाय के लोगों को सामाजिक कलंक माना जाता है. सामाजिक तौर पर उनके साथ उत्पीड़न और भेदभाव होता है. समलैंगिक गतिविधियों पर कानूनी प्रतिबंध लागू है. कोरोना महामारी में यह उत्पीड़न और भेदभाव बढ़ गया है.
औपनिवेशिक ब्रिटिश सरकार ने 1860 में भारत में समलैंगिक गतिविधियों को अपराध घोषित कर दिया. इस अपराध के लिए सजा के तौर पर आजीवन कारावास या पत्थर से मार कर मौत भी दी जा सकती है. हालांकि, अधिकारी शायद ही कभी इन कानूनों को लागू करते हैं, क्योंकि समलैंगिक गतिविधियां काफी हद तक चोरी-छिपे होती हैं. ऐसा काफी कम होता है जब एलजीबीटी समुदाय के तौर पर पहचाने जाने वाले लोग खुलकर अपने परिवार के सामने आते हैं.
पहचान के लिए छोड़ना पड़ता है घर
जब कभी वे खुलकर सबके सामने आते हैं या समलैंगिक के तौर पर पहचाने जाते हैं, तो उन्हें हिंसा और अपमान की धमकियों का सामना करना पड़ता है. यही वजह है कि पाकिस्तान में एलजीबीटी समुदाय के लोग अपनी पहचान और सेक्सुअलिटी की आजादी के लिए घर छोड़ देते हैं. हालांकि, कोरोना महामारी के दौरान, इस समुदाय के कई लोगों के लिए आजादी से जीना और अपनी पहचान को व्यापक तौर पर उजागर करना खतरनाक हो गया है.
32 वर्षीय उस्मान राजधानी इस्लामाबाद से उत्तर में स्थित शहर, एबटाबाद में एक बहुराष्ट्रीय कंपनी में करते हैं. उन्होंने डॉयचे वेले को बताया कि महामारी के दौरान वह हर तीन महीने में केवल एक बार अपने बॉयफ्रेंड से मिल पाते हैं. वह कहते हैं, "मेरे बॉयफ्रेंड की उम्र 25 साल है. वह अपने परिवार के साथ गुजरांवाला में रहता है. उसके पास मेरे जैसी घर छोड़कर बाहर निकलने की आजादी नहीं है. लॉकडाउन में आने-जाने पर लगी पाबंदियों की वजह से हमारा मिलना काफी मुश्किल हो गया है.”
हुकअप कल्चर और ऑनलाइन एप्लिकेशन
हालांकि उस्मान को मोनोगैमी पसंद है, लेकिन पार्टनर के साथ ये समझौता हुआ है कि अलग-अलग शहरों में रहने की वजह से वे दूसरे पुरुषों के साथ शारीरिक संबंध बनाने के लिए स्वतंत्र हैं. इस तरह की मीटिंग बड़े पैमाने पर सोशल मीडिया, ऑनलाइन ग्रुप और डेटिंग एप्लिकेशन की मदद से होती है.
उस्मान का कहना है कि महामारी की वजह से डेटिंग एप्लिकेशन का इस्तेमाल और वास्तविक मुलाकातों की संभावना काफी कम हो गई है. वह कहते हैं, "कोविड की शुरुआत में, लोग आज की तुलना में उस समय काफी डरे हुए थे. डेटिंग ऐप पर कई लोग मुझसे कोविड की नेगेटिव जांच रिपोर्ट मांग रहे थे. मेरे पास उस समय रिपोर्ट नहीं था, इसलिए मैं उन लोगों के साथ आगे नहीं बढ़ पाया.”
उस्मान कहते हैं, "रमजान के महीने में कई पुरुष कैजुअल सेक्स और हुकअप से भी परहेज कर रहे हैं, क्योंकि कई समलैंगिक पुरुषों को अपनी सेक्सुअलिटी को लेकर शर्म आती है और वे इसे गलत मानते हैं. परिवार के लोग भी इस बात को स्वीकार नहीं करना चाहते हैं कि उनका बेटा समलैंगिक हो सकता है. अगर आप हमेशा किसी आदमी के साथ होते हैं, तो उसे सिर्फ एक दोस्त माना जाता है.”
उस्मान की योजना है कि वह यूरोप जाकर अपने पार्टनर के साथ नई जिंदगी की शुरुआत करे. पाकिस्तान में समलैंगिक पुरुषों को अपना प्यार पाने में काफी ज्यादा चुनौतियों का सामना करना पड़ता है. उन्हें लगता है कि कैजुअल सेक्स और डेटिंग के लिए समझौता करना होगा.
मुश्किल हुआ मिलना जुलना
30 साल के साद ने डॉयचे वेले को बताया कि एक अकेले व्यक्ति के तौर पर उन्हें खासकर महामारी के इस दौर में समान विचारधारा वाले लोगों और पार्टनर से मिलना मुश्किल हो गया है. वह कहते हैं, "कई लोग वापस अपने-अपने शहरों में चले गए. पाबंदियों की वजह से ज्यादातर जगहें बंद रहती हैं या वहां काफी ज्यादा संख्या में पुलिस के जवान मौजूद होते हैं. ऐसे में मिलना-जुलना भी कम हो गया है. पकड़े जाने का खतरा भी काफी ज्यादा बढ़ गया है.”
ऑनलाइन डेटिंग करने वालों को भी झटका लगा है. प्रधानमंत्री इमरान खान ने "गैर-इस्लामी व्यवहार" को रोकने के लिए पिछले साल की शुरुआत में टिंडर और ग्रिंडर जैसे डेटिंग ऐप्स के इस्तेमाल पर रोक लगा दी थी. हालांकि, साद कहते हैं कि अभी भी कुछ ऐसे ऐप्लिकेशन और वीपीएन हैं जिनके जरिए लोग एक-दूसरे से मिल सकते हैं पर इनके बारे में जानकारी बहुत कम लोगों को है.
डेटिंग ऐप का इस्तेमाल करने वाले लोगों ने अपने स्वास्थ्य के बारे में अधिक जानकारी देकर महामारी में भी रास्ता तलाश लिया है. साद बताते हैं कि कुछ ऐप मेंबर्स ने अपने ऑनलाइन स्टेटस को "कोविड से रिकवर" या "वैक्सीन ले चुके" में अपडेट कर लिया, ताकि वे सुरक्षित और तनाव-मुक्त तरीके से ज्यादा संभावित साथियों से जुड़ सकें. साद बताते हैं, "मैंने भी वैक्सीन लगवा लिया है, इसलिए मैं भी अब अपना स्टेटस बदलूंगा.”
बढ़ती जा रही घरेलू हिंसा
कार्यकर्ता इस बात को लेकर चिंतित हैं कि लोगों से बढ़ती दूरी और साथियों से मिलने में उत्पन्न हो रही बाधाओं की वजह से एलजीबीटी समुदाय के लोगों के मानसिक स्वास्थ्य पर नकारात्मक असर पड़ रहा है. 36 साल के मणि की पहचान ट्रांसजेंडर व्यक्ति के तौर पर है. वह मानवाधिकार के लिए काम करते हैं. उनकी संस्था ‘होप' ने कोविड की वजह से उनके समुदाय पर पड़ने वाले असर को लेकर कई अध्ययन किए हैं.
उन्होंने डॉयचे वेले को बताया कि लॉकडाउन के दौरान समलैंगिक और ट्रांसजेंडर पार्टनर के बीच घरेलू हिंसा के कई मामले सामने आए. आर्थिक और भावनात्मक तनाव के कारण काफी ज्यादा झगड़े हुए, खासकर ट्रांसजेंडर महिलाओं के साथ. वह कहते हैं, "कुछ ट्रांसजेंडर महिलाएं पुरुष प्रेमी के साथ रहना पसंद करती हैं, क्योंकि उनका पार्टनर उसके स्त्री होने और प्यार का एहसास करा सकता है. हालांकि, कोविड के दौरान, कई महिलाओं ने अधिक घरेलू हिंसा की शिकायत की.”
एलजीबीटी समुदायों के बीच पाकिस्तान में आत्महत्या की दर सबसे अधिक है. मणि का कहना है कि समुदायों ने छेड़छाड़ के तौर पर सेक्सुअल आइडेंटिटी को मजबूत करके कुछ तरीकों से खुद को कलंकित किया था. वह कहते हैं, "सेक्स एक स्वाभाविक आवश्यकता है. हमारा समुदाय इतना हाशिए पर है, इसलिए हम आपस में अधिक खुलकर सेक्स के बारे में बात करते हैं. इस वजह से लोगों को लगा कि हम काफी ज्यादा सेक्सुअल हैं.” मणि ने जोर देते हुए कहा कि काफी ज्यादा सेक्सुअल होने का यह स्टीरियोटाइप रोमांटिक पार्टनर खोजने में भी परेशानी उत्पन्न कर सकता है. (dw.com)
लेबनान के गृह युद्ध के दौरान वहां से कई परिवार भाग कर जर्मनी पहुंचे थे. आज इनमें से कई की पहचान जर्मनी के कुख्यात घरानों के तौर पर है जो अलग-अलग अपराधों में लिप्त हैं. इन गिरोहों पर फिल्में और टीवी सीरीज भी बन चुकी हैं.
डॉयचे वैले पर पीटर हिले की रिपोर्ट
अरब, कुर्द और तुर्की समुदायों के बीच संगठित अपराध जर्मन फिल्मों और टीवी सीरीज में एक केंद्रीय भूमिका निभा रहे हैं. हाल के समय में इन आपराधिक गिरोहों और इनसे जुड़ी कहानियों पर कई सीरीज बनी हैं. देश में हुए हाई-प्रोफाइल लूट के कुछ मामलों ने इन आपराधिक कहानियों में लोगों की दिलचस्पी और बढ़ा दी है.
इस सप्ताह उनमें से एक मामले ने फिर से तब सुर्खियां बटोरीं जब 2019 में ड्रेसडेन के ग्रीन वॉल्ट म्यूजियम में हुई चोरी के सिलसिले में बर्लिन में पांचवें संदिग्ध को गिरफ्तार किया गया. ड्रेसडेन के शाही महल के ग्रीन वॉल्ट में 4000 से ज्यादा अनमोल चीजें हैं. इनमें सोना, चांदी, जवाहरात और हाथीदांत भी शामिल हैं. 2019 में चोरों ने यहां से कुछ अनमोल चीजें चुरा ली थीं जिनमें एक बेशकीमती हीरा भी था जो 18वीं सदी में सैक्सनी के शासक ऑगस्टस के संग्रह का हिस्सा है.
कुख्यात मोटरबाइक गिरोह या माफिया समूहों के विपरीत, इन समूहों को जर्मनी की मीडिया और पुलिस ऐसे ‘कबीले' के तौर पर बताती है जो खुद को अपने परिवार से जुड़ा हुआ बताते हैं और अपनी जातीय पहचान साझा करते हैं. हालांकि, आलोचकों का कहना है कि "कबीलाई अपराध" शब्द परिवार के सदस्यों को भी संदेह के घेरे में रखता है. साथ ही, ऐसे लोगों के साथ भी भेदभाव करता है जो अपराधी नहीं हैं. संगठित अपराध में "कबीलाई अपराध" का हिस्सा 10 प्रतिशत से भी कम है.
द रेमो
साल 1992 में बर्लिन में एक रेस्तरां मालिक की हत्या के बाद से रेमो का परिवार पहली बार पुलिस के निशाने पर आया था. इसके बाद से करीब 500 सदस्यों वाला रेमो परिवार बर्लिन के कुख्यात गिरोहों में से एक बन गया. इसके सदस्यों पर हिंसा, मादक पदार्थों की तस्करी, मनी लॉन्ड्रिंग और धोखाधड़ी के कई मामले दर्ज हैं.
2017 में बर्लिन बोडे म्यूजियम से सौ किलो के सोने के सिक्कों की चोरी रेमो घराने की सबसे बड़ी सफलता मानी जाती है. पुलिस का मानना है कि €3 मिलियन यूरो (करीब 26 करोड़ रुपये) से अधिक मूल्य का सोना टुकड़ों में काटकर पिघला दिया गया. रेमो के परिवार के सदस्यों के कपड़े, उनके अपार्टमेंट और गाड़ियों से सोने के कण के साथ ही संग्रहालय के कांच के टुकड़े मिले. चोरी के इस मामले में रेमो के परिवार के दो युवा पुरुषों और उनके एक सहयोगी को 2020 में कई सालों की जेल की सजा दी गई. अभियोजकों का यह भी मानना है कि रेमो गिरोह के सदस्य ड्रेसडेन के ग्रीन वॉल्ट म्यूजियम में हुई चोरी में शामिल थे.
रेमो म्हलामी जातीय समूह से संबंधित है, जो मुख्य रूप से दक्षिणी तुर्की और लेबनान के मूल निवासी हैं. रेमो का परिवार युद्धग्रस्त लेबनान से भागकर 1980 के दशक में यूरोप आया था. म्हलामी ज्यादातर अरब के रूप में पहचाने जाते हैं और कभी-कभी कुर्द अल्पसंख्यकों से जुड़े होते हैं.
अबू-चकर
रेमो कबीले से छोटा होने के बावजूद अबू-चकर परिवार और उसके मुखिया अराफात अबू-चकर ने जर्मनी में मीडिया और अधिकारियों दोनों का ध्यान लंबे समय से अपनी ओर आकर्षित किया है. बर्लिन में रहने वाला अराफात अबू-चकर 2008 में जर्मनी के सबसे बड़े गैंगस्टर रैपर बुशिडो के साथ मिल गया. इन दोनों की दोस्ती करीब 10 साल चली. दोनों के व्यापारिक संबंधों ने हलचल मचा दी और इस पर एक हिट फिल्म भी बनी. इसके बाद, दोनों के दोस्ती में खटास आ गई. बुशिडो ने अराफात अबू-चकर के खिलाफ कोर्ट में केस किया और उस पर धमकी देने और उत्पीड़न करने का आरोप लगाया.
दूसरी ओर, इन वर्षों में अबू-चकर परिवार के सदस्यों के खिलाफ डराने-धमकाने, डकैती और शारीरिक चोट पहुंचाने जैसे कई अपराधों के लिए मामले दर्ज किए गए और उन्हें आरोपी बनाया गया. बर्लिन की एक अदालत ने फर्जी दस्तावेज के आधार पर अपार्टमेंट बेचने के जुर्म में चकर के कई सदस्यों को दोषी भी ठहराया.
अबू-चकर परिवार फलस्तीनी मूल का है. लेबनान में गृहयुद्ध छिड़ने पर यह परिवार वहां के एक शरणार्थी शिविर से यूरोप भाग आया था. अन्य संदिग्ध आपराधिक परिवारों की तरह, अबू-चकर जर्मनी में कई कार्यालयों और अचल संपत्ति का मालिक है.
द मिरिस
मिरि गिरोह में म्हलामी मूल के कई परिवार शामिल हैं. माना जाता है कि वे भी 1980 के दशक की शुरुआत में लेबनान गृहयुद्ध के समय भाग कर जर्मनी पहुंचे थे. मिरि गिरोह को कभी-कभी "एम-क्लैन" के नाम से भी जाना जाता है. यह कबीला जर्मनी के लोअर सैक्सनी राज्य में विशेष रूप से सक्रिय है. हालांकि बर्लिन, ब्रेमेन और नॉर्थ राइन वेस्टफेलिया में भी इस कबीले की आपराधिक गतिविधियां दर्ज की गई हैं.
मिरि कबीले के सदस्य मादक पदार्थों की तस्करी, जबरन वसूली और यौनकर्मियों की दलाली करने जैसे अपराधों में शामिल रहे हैं. कहा जाता है कि कबीले के कुछ प्रमुख व्यक्तियों का घनिष्ठ संबंध प्रतिबंधित मोटरसाइकिल गिरोह "मंगोल एमसी" के साथ है.
इस कबीले के नेता इब्राहिम मिरि को पूरे जर्मनी के लोग तब से जानने लगे, जब 2019 में लेबनान भेजे जाने के बाद वह प्रतिबंध तोड़कर वापस जर्मनी लौट आए थे. उस समय, जर्मनी के गृह मंत्री होर्स्ट जेहोफर ने "लेक्स मिरि" का प्रस्ताव रखा था, ताकि शरण मांगने वाले जिस व्यक्ति को उसके देश भेज दिया गया है उसे फिर से जर्मनी में आने की अनुमति न दी जाए या वापस आने पर उसे जेल में बंद कर दिया जाए.
अल-जीन
कई हजार सदस्यों वाला अल-जीन कबीला जर्मनी में संगठित अपराध में शामिल सबसे बड़े परिवारों में से एक हो सकता है. इसके कथित बॉस, महमूद अल-जीन ने 2020 में अपना संस्मरण प्रकाशित किया था. इसका शीर्षक था, "द गॉडफादर ऑफ बर्लिन: माई वे, माई फैमिली, माई रूल्स." अपने संस्मरण में, अल-जीन ने कबीले के अपराध की दुनिया के बारे में अहम जानकारी दी है, एक ऐसी दुनिया जहां पदानुक्रमों का सख्ती से पालन किया जाता है और उसका सम्मान किया जाता है.
महमूद अल-जीन 1982 में लेबनान से जर्मनी आया था. तब से, उसके नियम अक्सर जर्मन कानूनों से टकराते हैं. उसे मादक पदार्थों की तस्करी और अन्य अपराधों के लिए दोषी ठहराया गया है.
कई लोगों का मानना है कि जर्मन ड्रामा सीरीज 4ब्लॉक्स अल-जीन की कहानी पर आधारित है. समीक्षकों ने भी इस सीरीज की काफी तारीफ की है. यह सीरीज बर्लिन में एक लेबनानी अपराधी परिवार और ड्रग कार्टेल के बारे में है. (dw.com)
जब से दलाई लामा ने तिब्बत की निर्वासन सरकार की जिम्मेदारी छोड़ी है, निर्वासित तिब्बती लोकतंत्र की राह का परीक्षण कर रहे हैं. अभी हाल में हुए चुनावों के बाद पेन्पा शेरिंग तिब्बत के नए राष्ट्र प्रमुख चुने गए हैं.
डॉयचे वैले पर राहुल मिश्र की रिपोर्ट
मानव सभ्यता के पिछले 5000 सालों से अधिक के इतिहास में राजनीतिज्ञों, शासकों, और नीतिनिर्धारकों ने तरह-तरह के प्रयोग किए हैं. राजनीतिशास्त्रियों ने इन व्यवस्थाओं के अध्ययन के लिए सिद्धांतों और नियमों का प्रतिपादन भी किया. लेकिन दुनिया की तमाम शासन प्रणालियों में लोकतंत्र शायद न सिर्फ सबसे पुरानी व्यवस्थाओं में से एक है बल्कि आज की आधुनिक विश्व व्यवस्था में यह खुद अपने आप में एक आदर्श बन गया है. एक ऐसा दर्जा जिसे पाने के लिए तानाशाहों ने अपनी दमनकारी व्यवस्थाओं को कभी गाइडेड डेमोक्रेसी कहा तो कभी एनलाइटेड डेमोक्रेसी. ऐसे देश जहां एक ही राजनीतिक पार्टी दशकों से राज कर रही है, वह भी खुद को लोकतंत्रों की कतार में दिखाना चाहते हैं.
यह दिलचस्प है कि चीन जैसी साम्यवादी व्यवस्थाओं से अलग दिखने और बर्ताव करने की कवायद में ताइवान जैसे देशों ने खासी लोकप्रियता भी हासिल की है. चीन-प्रशासित हांगकांग में पिछले दो से अधिक बरसों से कैरी लैम सरकार के खिलाफ चल रहे विरोध प्रदर्शनों और दुनिया के तमाम देशों के समर्थन के पीछे वजह यह नहीं है कि वहां के लोग भूखों मर रहे हैं. वहां एक बड़ा नीतिपरक सवाल जनता की समान भागीदारी से जुड़ा है. लोगों की भागीदारी की आकांक्षा ही लोकतंत्र को मजबूत करती है.
तिब्बती समुदाय की लोकतंत्र की चाहत
लोकतंत्र के इसी आदर्श को जीने की कवायद तिब्बती समुदाय के लोग भी बरसों से करते आ रहे हैं. अपनी मातृभूमि से जुदा तिब्बत के लोगों के लिए दलाई लामा सबसे बड़े धर्मगुरु और तिब्बती लोगों के आध्यात्मिक मुखिया हैं. दलाई लामा की शुरू की गयी तिब्बत की निर्वासित सरकार तिब्बती लोगों के लिए सर्वमान्य सरकार है. हालांकि चीन के अधीन वाले तिब्बत को ही दलाई लामा अपनी मातृभूमि मानते हैं. दलाई लामा और उनके अनुयायी तमाम लोगों का सपना है कि एक दिन वह अपनी मातृभूमि वापस जा सकेंगे और उन्हें बिना किसी के अधीन रहे अपना धर्म, अध्यवसाय, और शासन व्यवस्था चुनने की आजादी होगी. यह सपना कहां तक और कब सच होगा, कहना मुश्किल है.
तिब्बत की निर्वासित संसद के सदस्यों और सिक्यांग के चुनावों का आखिरी चरण 11 अप्रैल 2021 को पूरा हुआ. आंकड़ों के अनुसार इस चुनाव में लगभग 64 हजार तिब्बती लोगों ने 23 अलग अलग देशों से अपने मताधिकार का प्रयोग किया. अगर दुनिया भर में बसे तिब्बतियों की संख्या के हिसाब से इस आंकड़े को देखा जाए तो साफ है कि लगभग 77 प्रतिशत लोगों ने इस चुनाव में भाग लिया.
चुनाव विश्लेषक यह भी मानते हैं कि 17वीं संसद के चुनावों में अब तक का सबसे रिकार्ड मतदान हुआ. 2011 में दलाई लामा के राजनीतिक क्षेत्र से वानप्रस्थ के बाद हुआ यह तीसरा सीधा चुनाव है जिसमें तिब्बती जनता ने अपना प्रतिनिधियों को चुना है. इन चुनावों में 45 संसद सदस्यों का निर्वाचन हुआ. तिब्बती चुनाव आयोग के अनुसार यह 45 संसदीय सीटें तिब्बती लोगों की दुनिया के विभिन्न हिस्सों में तादाद और भौगोलिक कारकों पर आधारित है.
नई सरकार की चुनौती कोरोना का सामना
इस चुनाव में सिक्योंग पद पर पेन्पा शेरिंग विजयी हुए. तिब्बती शासन व्यवस्था में सिक्योंग का पद राष्ट्रपति के बराबर माना जाता है. 34,324 मतों के साथ उन्होंने जीत हासिलकी. केंद्रीय तिब्बत प्रशासन की जिम्मेदारी अब उनके कंधों पर होगी. अबतक डॉक्टर लोबसांग सांगे तिब्बत के राष्ट्रपति थे. उन्होंने तिब्बत की निर्वासित सरकार की बागडोर एक दशक तक सम्भाल कर रखी. नव-निर्वाचित राष्ट्रपति पेन्पा शेरिंग 26 मई को पदभार ग्रहण करेंगे. कोविड महामारी से जूझती दुनिया में तिब्बती समुदाय के लोग भी इस महामारी की चपेट में आ रहे हैं. चीन के अलावा दुनिया की लगभग हर बड़ी आर्थिक शक्ति इस महामारी के चलते धीमी और कमजोर पड़ी है.
जाहिर है, पेन्पा शेरिंग के सामने भी फिलहाल सबसे बड़ी चुनौती होगी दुनिया भर में तिब्बतियों की सुरक्षा और महामारी की वजह से उन पर आई आर्थिक मुश्किलों से निपटने में मदद करना. अमेरिका में ट्रंप के राष्ट्रपति काल में तिब्बत को अच्छा समर्थन मिला था. लोबसांग सांगे ने नवंबर 2020 में अमेरिका की यात्रा कर और व्हाइट हाउस में बैठक कर रिश्तों को नया आयाम भी दिया था. पेन्पा शेरिंग अमेरिका के साथ सम्बंधों को कैसे सुदृढ़ करते हैं और भारत-चीन के खराब सम्बंधों के मद्देनजर कैसे संतुलन साधते हैं, यह देखना दिलचस्प होगा. (dw.com)
-रेहान फज़ल
29 अगस्त 1969 का दिन. रोम हवाई अड्डे पर सफ़ेद सूट और सनहैट पहने और बड़ा धूप का चश्मा लगाए एक 25 वर्षीय युवती फ़्लाइट TWA 840 का इंतज़ार कर रही थी.
अंदर से वो बहुत नर्वस थी. हॉलिवुड अभिनेत्री ऑडरी हेपबर्न की तरह दिखने वाली ये युवती एयरपोर्ट सिक्यॉरिटी को झाँसा देकर एक पिस्टल और दो हैंड ग्रेनेड अंदर लाने में सफल हो गई थी.
वो ये दिखाने की कोशिश कर रही थी कि वेटिंग लाउंज में बैठे एक और शख़्स सलीम इसावी को वो नहीं पहचानती है. ये शख़्स पॉपुलर फ़्रंट फॉर लिबरेशन ऑफ़ फ़लस्टाइन की चे ग्वारा कमाँडो यूनिट का एक महत्वपूर्ण सदस्य था और उस युवती का नाम था लैला ख़ालिद. लैला ख़ालिद बेरूत से अकेले उड़ कर रोम पहुंची थीं.
लैला और उसके साथी इसावी ने जानबूझकर फ़र्स्ट क्लास में अपनी सीटें बुक की थीं ताकि उन्हें विमान के कॉकपिट तक पहुंचने में आसानी हो.
लैला ख़ालिद 1973 में प्रकाशित अपनी आत्मकथा 'माई पीपल शैल लिव' में लिखती हैं, 'चूँकि मैं और इसावी अलग-अलग बैठे थे इसलिए शिकागो में रहने वाला एक ग्रीक अमेरिकन मुझमें कुछ ज़्यादा ही रुचि लेने लगा था.'
इमेज स्रोत,LEILA KHALED
'उसने मुझे बताया था कि वो 15 साल अमेरिका में रहने के बाद अपनी माँ से मिलने अपने घर ग्रीस जा रहा था. एक समय तो मेरे दिल में आया कि मैं उससे कहूँ कि ये वाला विमान छोड़ कर कोई दूसरा विमान पकड़ लो लेकिन फिर मैंने अपने आप को रोक लिया.'
लैला ख़ालिद और इसावी कॉकपिट तक पहुंचे
विमान में लैला ख़ालिद और सलीम इसावी की सींटें आसपास थीं. एयरहोस्टेस ने लैला को कॉफ़ी और इसावी को बियर सर्व की. लेकिन इसके बाद एयरहोस्टेस के बहुत ज़ोर देने के बावजूद लैला ख़ालिद ने कुछ नहीं खाया.
बल्कि उन्होंने एयरहोस्टेस से कहा कि उन्हें ठंड लग रही है और उनके पेट में दर्द है, इसलिए आप मुझे एक अतिरिक्त कंबल दे दीजिए. कंबल मिलते ही लैला ने अपने हैंड ग्रेनेड और पिस्टल कंबल के नीचे रख दिए ताकि उन तक आसानी से पहुंचा जा सके.
'शूट द वूमेन फ़र्स्ट' की लेखिका एलीन मेक्डॉनल्ड को दिए गए इंटरव्यू में लैला ख़ालिद बताती हैं, 'जैसे ही विमान कर्मियों ने खाना परोसना शुरू किया, सलीम उछल कर कॉकपिट तक पहुँच गया. उसके पीछे पीछे मैं भी अपनी गोद में रखे हैंड ग्रेनेड लिए दौड़ीं. इस चक्कर में एयर होस्टेस के हाथ से ट्रे नीचे गिर गई और वो ज़ोर से चिल्लाई. तभी मेरी कमर में फंसी पिस्टल मेरी पैंट के अंदर से होती हुई विमान के फ़र्श पर जा गिरी. मैंने और इसावी ने चिल्ला कर हुक्म दिया कि फ़र्स्ट क्लास के सभी यात्री और विमानकर्मी इकॉनमी क्लास में चले जाएँ.'

लैला ने विमान को इसराइल ले जाने का हुक्म दिया
इस हाइजैकिंग में लैला ख़ालिद को पायलट और एयर ट्रैफ़िक कंट्रोल से बात करने की भूमिका दी गई थी. शुरू में लैला ने पायलट को विमान को इसराइल के लोद हवाई अड्डे ले जाने के लिए कहा. इसे अब डेविड बेन गुरियों हवाईअड्डा कहा जाता है.
जैसे ही विमान ने इसरायली क्षेत्र में प्रवेश किया, तीन इसरायली मिराज विमान उसके दोनों तरफ़ उड़ने लगे. इससे विमान में बैठे यात्रियों में दहशत फैल गई. उन्हें लगा कि इसरायली विमान उनके विमान को मार गिराएंगे.
लैला ख़ालिद ने लोद के एयर ट्रैफ़िक कंट्रोल से संपर्क कर कहा कि अब आप हमें फ़्लाइट TWA 840 न कहकर फ़्लाइट PFLP फ़्री अरब फलस्टाइन कह कर संबोधित करेंगे. विमान के पायलट ने पहले लैला का निर्देश मानने से इनकार कर दिया था लेकिन जब लैला ने उन्हें अपना हैंड ग्रेनेड दिखाया तो उन्होंने विरोध करना छोड़ दिया.

विमान को दमिश्क की तरफ़ मोड़ा गया
लोद की तरफ़ जाने का आदेश सिर्फ़ इसरायलियों को झाँसा देने के लिए था. विमान लोद के ऊपर से गुज़रा. नीचे सैकड़ों इसरायली सैनिक और टैंक उनसे निपटने के लिए तैयार खड़े थे. तभी लैला ख़ालिद ने पायलट को आदेश दिया कि वो विमान को दमिश्क ले जाएं.
रास्ते में उन्होंने पायलट से कहा कि वो उनके जन्मस्थान हायफ़ा के ऊपर से उड़े.
बाद में लैला ख़ालिद ने अपनी आत्मकथा में लिखा, 'जब मैंने ऊपर से फ़लस्तीन को देखा तो एक मिनट के लिए मैं भूल गई कि मैं किसी अभियान का हिस्सा हूँ. मेरे मन में ये इच्छा जगी कि मैं अपनी दादी, अपनी बुआओं और हर किसी को जो वहाँ पर है चिल्ला कर कहूँ कि हम वापस आ रहे हैं. बाद में पायलट ने भी कहा कि जब हम हायफ़ा के ऊपर से उड़ रहे थे तो उसने मेरे चेहरे के रोंगटों को खड़े होते हुए देखा.'
विमान को विस्फोटक से उड़ाया गया
दमिश्क हवाई अड्डे पर उतरने के बाद सलीम इसावी ने विमान के कॉकपिट में विस्फोटक पदार्थ लगाए और उस विमान को उड़ा दिया. उनकी नज़र में फ़लस्तीनी लोगों की तरफ़ दुनिया का ध्यान खींचने का ये सबसे कारगर तरीका था.
लैला ख़ालिद को अक्सर पहली महिला हाइजैकर होने का श्रेय दिया जाता है, लेकिन कम लोगों को पता है कि तीन साल पहले 1966 में कॉनडोर्स संगठन की तरफ़ से विमान हाइजैक कर फ़ॉकलैंड द्वीप ले जाने वाली हाइजैकर भी एक महिला थी.
एलीन मेक्डोनल्ड अपनी किताब शूट द वूमेन फ़र्स्ट में लिखती हैं, 'PFLP का नेतृत्व इस हाइजैकिंग से मिले प्रचार से बहुत खुश हुआ. उन्होंने अपनी स्टार कॉमरेड लैला ख़ालिद को मध्य-पूर्व देशों के दौरे पर भेजा. उनको पता था कि इसरायली लैला ख़ालिद का अपहरण करने और मारने के लिए कुछ भी कर सकते हैं , लेकिन तब भी उन्हें अरब देशों की यात्रा के लिए भेजा गया. लेकिन उनके चारों तरफ़ अंगरक्षकों का एक सुरक्षा कवच तैनात कर दिया गया. लैला ख़ालिद अरब दुनिया की एक नायिका बन चुकी थीं.'
चेहरे की प्लास्टिक सर्जरी
इसके बाद लैला ख़ालिद ने अपनी नाक, गालों, आँखों और मुँह पर छह जगह प्लास्टिक सर्जरी करवाई ताकि उनके हुलिए को बदला जा सके और उन्हें दूसरी हाइजैकिंग के लिए तैयार किया जा सके.
सितंबर 1970 में लैला ख़ालिद ने लेबनान से यूरोप का रुख़ किया. चार सितंबर को स्टटगर्ट, जर्मनी में उन्होंने पैट्रिक आरग्यूलो से मुलाक़ात की जो कि अगली हाइजैकिंग में उनका साथ देने वाले थे. वो दोनों एक दूसरे से पहले कभी नहीं मिले थे. 6 सिंतबर को दोनों न्यूयॉर्क का टिकट ले कर स्टटगर्ट से एम्सटर्डम साथ साथ गए.
आरग्यूलो अमेरिका में पैदा हुए एक निकागुअन थे. एम्सटर्डम में ये दोनों न्यूयॉर्क जाने वाले इसरायली एयरलाइंस ELAI 219 के बोइंग 707 विमान में सवार हुए. सारा इरविंग अपनी किताब 'लैला ख़ालिद आइकॉन ऑफ़ पेलेस्टीनियन लिबरेशन' में लिखती हैं, 'जब ये दोनों विमान में सवार हुए तो उन्हें ये पता नहीं था कि उनके दो साथियों को जिन्हें इस हाइजैकिंग में उनकी मदद करनी थी, ELAI के स्टाफ़ ने सीट देने से इनकार कर दिया था.'
'हाइजैकिंग की योजना बनाने के दौरान ही ये तय हुआ था कि ELAI के विमान की हाइजैकिंग में दो से अधिक लोगों की ज़रूरत होगी क्योंकि उनके विमान में हथियारबंद सुरक्षा गार्ड मौजूद रहते हैं और विमान में सवार होने वाले लोगों की तीन बार तलाशी ली जाती है.'

पायलट ने कॉकपिट का दरवाज़ा बंद किया
इस बार लैला ख़ालिद और उसका साथी इकॉनमी क्लास में बैठे हुए थे. लैला ख़ालिद ने बीबीसी से बात करते हुए कहा था 'आरग्यूलो को पता था कि उसे क्या करना है और मुझे पता था कि मुझे क्या करना है. हमारे पास हमारे हथियार थे. मेरे पास दो हैंड ग्रेनेड थे. पैट्रिक के पास भी एक हैंडग्रेनेड था. मैं बहुत छोटा सा स्कर्ट पहने हुए थीं. मैंने सारे नक्शे उस स्कर्ट के अंदर छिपा रखे थे.'
जब ख़ालिद दौड़ कर कॉकपिट की तरफ़ गईं तो पायलट ने पहले ही उसका दरवाज़ा अंदर से लॉक कर दिया था. डेविड राब अपनी किताब 'टेरर इन ब्लैक सेप्टेंबर' में लिखते हैं, ' लैला ख़ालिद ने अपनी ख़ासतौर से बनाई गई ब्रा से दोनों हेंड ग्रेनेड निकाल लिए लेकिन तभी विमान में सवार मार्शलों ने गोली चलानी शुरू कर दी. पैट्रिक ने जवाबी फ़ायर किया जो मार्शल श्लोमो वाइडर के पैर में लगा. इस बीच पैट्रिक को भी गोली लग चुकी थी. ख़ालिद पर दो गार्डों और यात्रियों ने हमला बोला. लोग उन्हें मारने लगे जिससे उनकी कई पसलियाँ टूट गईं.'
मार्शल ने फ़ायरिंग शुरू की
इस बीच चालाक पायलट ने विमान को अचानक नीचे डाइव करा दिया जिससे लैला ख़ालिद असंतुलित हो कर नीचे गिर गईं. यात्रियों पर इसका कोई असर नहीं हुआ क्योंकि उनकी सीट बेल्ट बँधी हुई थी. विमान काफ़ी नीचे आ गया जिससे ये संभावना ख़त्म हो गई कि अगर ग्रेनेड से विस्फ़ोट होता भी है तो केबिन डिप्रेशराइज़्ड नहीं होगा और कम से कम नुकसान होगा.
बीबीसी से बात करते हुए लैला ख़ालिद ने बताया कि उस समय उन पर क्या गुज़र रही थी. 'आधे घंटे बाद हम खड़े हो गए और मैंने अपने दाँतों से हैंड ग्रेनेड का पिन निकालने की कोशिश की. जैसे ही हम खड़े हो कर चिल्लाए पीछे से सुरक्षाकर्मियों ने फ़ायरिंग शुरू कर दी. मैंने देखा कि कोई कॉकपिट की मैजिक आई से हमें देख रहा था.'
'मैंने उनको चेतावनी दी कि मैं तीन तक गिनती गिनूँगी. अगर तुमने तब तक कॉकपिट का दरवाज़ा नहीं खोला तो मैं जहाज़ को उड़ा दूँगी. लेकिन मैं विमान को उड़ाना नहीं चाहती थी. उन्होंने दरवाज़ा नहीं खोला. कुछ क्षणों बाद किसी ने मेरे सिर पर पीछे से वार किया और मैं बेहोश हो गई.'
लंदन में आपात लैंडिंग
लैला ख़ालिद अपनी आत्मकथा में लिखती हैं 'मैंने देखा कि एक मार्शल ने खून से लथपथ आर्ग्यूलो की कमर पर खड़े हो कर उसकी पीठ में चार गोलियाँ दागीं.'
घायल मार्शल श्लोमो वाइडर की हालत से चिंतित हो कर ELAI के पायलट ने लंदन में आपात लैंडिंग की. कुछ ही क्षणों में ELAI का एक दूसरा विमान लंदन के हीथ्रो हवाईअड्डे से टेक ऑफ़ करने वाला था.
डेविड राब अपनी किताब 'टेरर इन ब्लैक सेप्टेंबर' में लिखते हैं, 'आर्ग्यूलो पर गोली चलाने वाले मार्शल बार लेवाव को जहाज़ के हैच से उतार कर दूसरे ELAI विमान में चढ़ा दिया गया ताकि वो ब्रिटिश अधिकार क्षेत्र से बाहर निकल जाए और उसे आर्ग्यूलो की मौत का ज़िम्मेदार न ठहराया जाए. लैला ख़ालेद को कुछ यात्रियों की टाइयों की मदद से बाँध कर ज़बरदस्ती विमान के फ़र्श पर लिटा दिया गया. लैला ख़ालेद का भाग्य अच्छा था कि इसरायली सुरक्षा बलों ने उन्हें बंदी नहीं बनाया और ब्रिटिश पुलिस ने उन्हें गिरफ़्तार किया.'
'विमान के लैंड करते ही पैट्रिक आर्ग्यूलो के शव को एक एम्बुलेंस में लाद कर ले जाया गया. लैला ख़ालेद अपनी आत्मकथा 'माई पीपुल शैल लिव' में लिखती हैं, 'मैंने सुरक्षाकर्मियों से अनुरोध किया कि मेरे हाथ खोल दिए जाएं.'
'मैंने पैट्रिक के शव के बग़ल में खड़े हो कर उसके हाथ पकड़े. मैंने उसकी चोटों का जायज़ा लिया और दोस्ती की भावना में उसके होंठों का चुंबन लिया और फिर मैं रो पड़ीं. मेरे लिए ये बहुत दुख भरा था क्योंकि मैं सोच रही थी कि उसकी जगह मुझे मरना था, क्योंकि ये हमारी लड़ाई थी. वो तो हमारी मदद करने आया था.'
जेल में अच्छा व्यवहार
लैला ख़ालिद को लंदन के ईलिंग पुलिस स्टेशन ले जाया गया जहाँ अगले कुछ दिनों तक चीफ़ सुपरिनटेंडेंट डेविड प़्रिउ ने उनसे पूछताछ की. जेल में लैला के साथ अच्छा व्यवहार किया गया. कुछ महिला पुलिसकर्मियों ने उनके साथ टेबिल टेनिस भी खेली.
लैला ने पढ़ने के लिए कुछ सामग्री माँगी. जब उन्हें पढ़ने के लिए कुछ महिला पत्रिकाएं दी गईं तो उन्होंने नाराज़ हो कर उन्हें लेने से इंकार कर दिया. तब जा कर उनके लिए समाचारपत्र उपलब्ध कराए गए. लैला को नहाने के लिए स्टेशन चीफ का बाथरूम दिया गया. उनके लिए साफ़ कपड़े और तौलिए लाए गए.
जब उनके कमरे में एक महिला गार्ड को बैठाने की कोशिश की गई तो लैला ने नाराज़ हो कर जवाब दिया, 'मैं अपने को मारने नहीं जा रही. मुझे अभी और अभियानों में भाग लेना है.'
जब लैला ख़ालिद ने इच्छा प्रकट की कि वो कुछ देर खुली हवा में साँस लेना चाहती हैं तो उन्हें जेल की ऊपर की मंज़िल पर ले जा कर खिड़कियाँ खोल दी गईं ताकि वो ताज़ी हवा का आनंद ले सकें. उनको प्रतिदिन छह रॉथमेन सिगरेटें पीने की इजाज़त दी गई. कई बार पुलिसकर्मियों ने उनको छह से अधिक सिगरेट भी पीने के लिए उपलब्ध कराईं.
लैला को छुड़ाने के लिए ब्रिटिश जहाज़ की हाइजैकिंग
लैला ख़ालिद से पूछताछ के दौरान डेविड प्रिउ ने उन्हें जानकारी दी कि ELAI के विमानों के अलावा स्विस एयर, TWA, PANAM और ब्रिटिश एयर के विमानों को भी हाइजैक किया गया है.
ये सुनते ही लैला ख़ालिद ने कहा कि ब्रिटिश एयर के विमान को हाइजैक करने की योजना नहीं थी. फ़्रिउ ने उन्हें बताया कि 9 सितंबर को बहरीन से लंदन आ रहे ब्रिटिश एयर के विमान को हाइजैक कर जॉर्डन में डॉसन फ़ील्ड में ले जाया गया है.
लैला ख़ालिद ने जब उनसे पूछा कि उनकी माँग क्या है तो फ़्रिउ ने जवाब दिया, वो आपकी रिहाई चाहते हैं. 28 सिंतबर को पुलिसगार्डों ने लैला को रोते हुए देखा. उस दिन अख़बारों में मिस्र के राष्ट्रपति जमाल अब्दुल नासेर की मौत की ख़बर छपी थी.
लैला ख़ालिद की रिहाई
आख़िरकार ब्रिटिश सरकार ने बंधक बनाए गए अपने 114 यात्रियों के बदले लैला ख़ालिद को रिहा कर दिया. 24 दिनों तक ब्रिटिश जेल में रहने के बाद एक अक्तूबर, 1970 को लैला ख़ालिद को ले कर रॉयल एयरफ़ोर्स के विमान ने काहिरा के लिए उड़ान भरी.
इससे पहले 12 सिंतंबर को हाइजैक किए हुए सभी विमानों को डॉसन फ़ील्ड में विस्फोटकों से उड़ा दिया गया.
इस घटना के कई साल बाद बीबीसी ने लैला ख़ालेद से पूछा आपने जो कुछ किया उसका आपको दुख है? लैला ख़ालिद का जवाब था 'बिल्कुल भी नहीं.'
उनसे फिर सवाल किया गया कि 'आपकी वजह से विमान में सवार सैकड़ों यात्री आतंकित हुए और उन्हें मानसिक आघात पहुंचा और विमान का स्टीवर्ड बुरी तरह से घायल भी हुआ?'
लैला ख़ालिद ने जवाब दिया 'मैं इस बात की माफी माँग सकती हूँ कि उन्हें आघात पहुंचा लेकिन वो अंतत: सुरक्षित रहे. इस कार्रवाई का उद्देश्य उन्हें नुकसान पहुंचाना नहीं था. लेकिन आपको ये भी देखना चाहिए कि एक मानव के रूप में हमें और हमारे मानवाधिकारों को भी नज़रअंदाज़ किया गया गया था.''
77 वर्षीय लैला ख़ालिद इस समय अम्मान में रह रही है. उन्होंने एक डॉक्टर फयाज़ रशीद हिलाल से शादी की है जिनसे उनके दो बच्चे हैं बदर और बशर.
उन्हें देख कर अब कोई नहीं कह सकता कि एक ज़माने में चेक कफ़ाया पहने और हाथ में एक 47 लिए ये महिला फ़लस्तीनी संघर्ष की सबसे बड़ी पोस्टरगर्ल थीं. (bbc.com)


