राष्ट्रीय

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Date : 02-Apr-2020

लॉकडाउन : कल सुबह 9 बजे देशवासियों के नाम वीडियो संदेश देंगे मोदी
नई दिल्ली, 2 अप्रैल (न्यूज18)।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश में कोरोना संक्रमण के कारण उत्पन्न हो रही स्थितियों और लॉकडाउन को लेकर गुरुवार को सभी राज्यों के मुख्मंत्रियों के साथ वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिये चर्चा की। इसके बाद पीएम मोदी ने अपने ट्विटर अकाउंट पर जानकारी दी कि वह कल यानी 3 अप्रैल को सुबह 9 बजे देशवासियों के लिए एक वीडियो संदेश जारी करेंगे। बता दें कि इससे पहले देशवासियों को संबोधित करते हुए पीएम मोदी ने देश में 21 दिन के लॉकडाउन की घोषणा की थी।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कोरोना वायरस को रोकने के उपायों सहित इससे जुड़े मुद्दों पर गुरुवार को राज्यों के मुख्यमंत्रियों से चर्चा की और स्पष्ट किया कि पूरे देश का साझा लक्ष्य जीवन का न्यूनतम नुकसान सुनिश्चित करना है।
पीएम ने मुख्यमंत्रियों से कहा कि अगले कुछ हफ्तों में सभी का ध्यान कोरोना वायरस से जुड़ी जांचों, संक्रमितों का पता लगाने, उन्हें अलग-थलग रखने पर केंद्रित रहना चाहिए।
प्रधानमंत्री ने राज्यों के मुख्यमंत्रियों से वीडियो कान्फ्रेसिंग के जरिये संवाद में कहा कि लॉकडाउन (बंद) समाप्त होने के बाद आबादी के फिर से घर से बाहर निकलने को ध्यान में रखते हुए राज्यों और केंद्र को एक रणनीति तैयार करनी चाहिए।
कोरोना वायरस के खिलाफ लड़ाई में समन्वित प्रयासों की जरूरत को रेखांकित करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा, जिला स्तर पर इस उद्देश्य के लिए आपदा प्रबंधन समूह बनाया जाना चाहिए । इसके साथ ही जिला निगरानी अधिकारियों को नियुक्त किये जाने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि कोरोना संबंधी आंकड़े मान्यता प्राप्त प्रयोगशालाओं से ही लिये जाने चाहिए । इससे जिला, राज्य और केंद्र स्तर पर आंकड़ों में एकरूपता आएगी।


Date : 02-Apr-2020

मोदी से राज्यों ने मांगे बकाये पैसे, पूछा- क्या बढ़ाया जा सकता है लॉकडाउन?
नई दिल्ली, 2 अप्रैल।
कोरोना को लेकर जंग लड़ रही राज्य सरकारों ने केंद्र से अपने बकाये पैसे की मांग की है। दरअसल, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आज वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए सभी प्रदेशों के मुख्यमंत्रियों से बात रहे थे। इस दौरान राज्यों ने केंद्र से मेडिकल किट, बकाये पैसे के साथ ही आर्थिक मदद की मांग की है। राज्यों ने केंद्र से पूछा कि लॉकडाउन कब तक लागू रहेगा?
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने 2500 करोड़ के मदद की मांग की है। इसके साथ ही 50 हजार करोड़ के पुराने बकाये की भी मांग की गई है। पश्चिम बंगाल की ही तरह पंजाब ने भी 60 हजार करोड़ के पुराने बकाये की मांग की है। इसके साथ ही पंजाब ने नए फसल के आने से पहले केंद्र सरकार से दो लाख मीट्रिक टन गेहूं को रखने की व्यवस्था करने की मांग की।
पश्चिम बंगाल और पंजाब की तरह बाकी राज्यों ने भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से कोरोना से जंग लडऩे के लिए पर्सनल प्रोटेक्शन इक्वीपमेंट की सप्लाई की मांग की। साथ ही पुराने बकाया राशि को भी देने की मांग की गई है। राज्यों ने पीएम मोदी से कहा कि इस बार लॉकडाउन की वजह से राजस्व कलेक्शन में कमी आएगी, इसकी भरपाई केंद्र को करनी चाहिए।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने प्रधानमंत्री गरीब कल्याण स्कीम को प्रदेशों सरकारों से लागू करने की अपील की। उन्होंने कहा कि राज्य सरकारें कोशिश करें कि पलायन को रोका जा सके, इसके साथ ही गरीबों को उनके खाते में पैसा और राशन मिल जाए। राज्य सरकारों ने केंद्र से लॉकडाउन को बढ़ाए जाने को लेकर सवाल पूछे। सरकारों ने पूछा कि क्या लॉकडाउन को बढ़ाने का प्लान है।
मुख्यमंत्रियों से बात करते हुए पीएम नरेंद्र मोदी ने कहा कि हम कोशिश कर रहे हैं कि राज्य सरकारों से बेहतरीन समन्वय स्थापित किया जा सके, क्योंकि कोरोना की लड़ाई हम सबको मिलकर लडऩी है। केंद्र सरकार हर कदम पर राज्य सरकार का साथ देगी। उन्होंने राज्यों के मेडिकल सुविधाओं के बारे में भी जाना। साथ ही क्वारनटीन सेंटर की हालत की विस्तृत रिपोर्ट ली। (आजतक)


Date : 02-Apr-2020

बीमा प्रीमियम के भुगतान की अंतिम तारीख सरकार ने बढ़ा दी 

सभी स्वास्थ्य और थर्ड पार्टी मोटर वाहन बीमा प्रीमियम के भुगतान की अंतिम तारीख सरकार ने बढ़ा दी है। यानी 25 मार्च से 14 अप्रैल के बीच जिन बीमा पालिसियों का रीन्यूअल होन था उन्हें अब 21 अप्रैल 2020 तक रिन्यूअल करा सकते हैं।  यह घोषणा वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने की।


Date : 02-Apr-2020

-अव्यक्त
नई दिल्ली, २ अप्रैल । 'राम’ भारतीय परंपरा में एक प्यारा नाम है। वह ब्रह्मवादियों का ब्रह्म है। निर्गुणवादी संतों का आत्मराम है। ईश्वरवादियों का ईश्वर है। अवतारवादियों का अवतार है। वह वैदिक साहित्य में एक रूप में आया है, तो बौद्ध जातक कथाओं में किसी दूसरे रूप में। एक ही ऋषि वाल्मीकि के 'रामायण’ नाम के ग्रंथ में एक रूप में आया है, तो उन्हीं के लिखे 'योगवसिष्ठ’ में दूसरे रूप में। 'कम्ब रामायणम’ में वह दक्षिण भारतीय जनमानस को भावविभोर कर देता है, तो तुलसीदास के रामचरितमानस तक आते-आते वह उत्तर भारत में घर-घर का बड़ा और आज्ञाकारी बेटा, आदर्श राजा और सौम्य पति तक बन जाता है।
लेकिन इस लंबे कालक्रम में रामायण और रामकथा जैसे १००० से अधिक ग्रंथ लिखे जाते हैं। तिब्बती और खोतानी से लेकर सिंहली और फारसी तक में रामायण लिखी जाती है। १८०० ईसवी के आस-पास उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर के मुल्ला मसीह फारसी भाषा के करीब ५००० छंदों में रामायण को छंदबद्ध करते हैं। लेकिन इसी क्रम में पुराणों में यहां-वहां राम की अलग-अलग कथाएं ठूंस दी जाती हैं। प्राचीन पाठ में शंबूक वध और राम की रासलीला जैसे विचित्र-विचित्र प्रकार के क्षेपक जोड़ दिए जाते हैं। श्रद्धातिरेक में आनंद रामायण (१६०० ईसवी) और संगीत रघुनन्दन जैसी कितनी ही रामकथाएं अस्तित्व में आती हैं जिनमें विवाह के पूर्व ही राम रासलीला हुए करते दिखाई देते हैं। जैन संप्रदाय के ग्रंथ 'पउमचरियं’ में तो ऐसी रामकथा आती है जहां राम की आठ हज़ार और लक्ष्मण की १६००० पत्नियां बताई जाती हैं। लक्ष्मणाध्वरि जैसे १७वीं सदी के श्रृंगारिक कवि 'रामविहारकाव्यम्’ के ११वें सर्ग में राम-सीता की जलक्रीड़ा और मदिरापान तक का वर्णन करने लगते हैं।
और आधुनिक भारत में आते-आते पौराणिक कथाओं के अंधानुकरण, ऐतिहासीकरण और राजनीतिकरण का ऐसा दौर शुरू होता है कि राम और रामकथा का पूरा स्वरूप ही गड्ड-मड्ड हो जाता है। सीता की अग्निपरीक्षा लेने और लोकोपवाद के चलते उनका त्याग करने वाला राम नारीवादियों को खटकने लगता है। हमारे वामपंथी मित्रों और दलित चिंतकों के लिए वह शंबूक शूद्र का कथित वध करनेवाला सवर्ण क्षत्रिय बन जाता है। और हिंदूवादी राजनीति करनेवालों तक आते-आते वह अचानक ही कथित 'सांस्कृतिक राष्ट्रवाद’ का राजनीतिक प्रतीक बन जाता है। इन तमाम विरोधाभासों के बावजूद यह तो है ही कि वह आज तक भारतीय लोकमानस में एक मेटा-नैरेटिव के रूप में मौजूद दिखता है। टीवी, सिनेमा और आधुनिक साहित्य तक उसे अपने-अपने तरीके से भुनाता है। इसलिए राम हमारे अवचेतन से कहीं जाता नहीं है। वह बना रहता है, क्योंकि उसे अलग-अलग रूपों में बनाकर रखने वाले लोग हैं हम। वह बना रहता है, क्योंकि हम ही ऐसा चाहते हैं।
लेकिन फिर भी टकराव है। टकराव इसलिए नहीं है कि राम अपने आप में कैसा है। बल्कि टकराव इसलिए है कि उसे अलग-अलग स्वरूपों में बनाकर रखने वाले हम जैसे लोगों के बीच इस पर सहमति नहीं है। लेकिन सवाल है कि जब हम उसे अलग-अलग विरोधाभासी रूपों में बनाकर रखना ही चाहते हैं, तो नई पीढिय़ां उस राम को कैसे समझें। धर्म, भक्ति, श्रद्धा और साहित्य से लेकर इतिहास और राजनीति तक को चटपटे प्रोडक्ट के रूप में परोसनेवाला यह दौर हमारी तुरंता पीढ़ी को राम का कौन सा स्वरूप परोसेगा?
पूछा जा सकता है कि मानवता और विज्ञान के स्वाभाविक विकास के क्रम में यह चिंता ही क्यों होनी चाहिए? चिंता इसलिए कि यह विकास शायद इतना स्वाभाविक और सहज भी नहीं रह गया है। नई पीढिय़ां जिस राम को जानेंगी वह तुलसी का राम होगा, या कबीर का? या फिर वह सूर्यकांत त्रिपाठी निराला का राम होगा या रामानंद सागर वाला राम होगा? या फिर इस सबसे अलग वह अयोध्या की कथित पुश्तैनी जमीन के लिए कोर्ट-कचहरी से लेकर राजनीतिक दलों के कार्यालयों तक के चक्कर लगानेवाला एक ठेठ राजनीतिक राम होगा? क्या वह शंबूक-वध के लगातार आरोपों से अवसादग्रस्त या प्रतिक्रियावादी हो जानेवाला राम होगा? क्या वह लड़ाकू तेवर में जोर-जोर से अपने जयकारे लगवाने वाला हिंदू हृदय सम्राट राम होगा, जो नवपीढिय़ों के हाथों में लाठी, तलवार और त्रिशूल देखकर प्रसन्न होगा? असल बेचैनी की वजह यही प्रश्न होने चाहिए।
आठवीं सदी यानि आदि शंकर के आस-पास के समय में रचित ग्रंथ 'अष्टावक्र गीता’ अद्वैत वेदांत का सर्वोत्कृष्ट ग्रंथ माना जाता है। आत्मवादी इस ग्रंथ ने 'आत्माराम’ शब्द का सुंदर प्रयोग करते हुए कहा- 'आत्मारामस्य धीरस्य शीतलाच्छतरात्मन:’ — यानी निरंतर आत्मा में रमने वाला आत्माराम ही शीतल और स्वच्छ हृदय का धीरवान संत है। अपनी ही अंतरआत्मा में रमण करने वाले चेतन जीव या ब्रह्म के अर्थ में राम शब्द का प्रयोग संभवत: इससे पूर्व के वैदिक ग्रंथों में भी देखने को मिलता है। लेकिन अष्टावक्र गीता एक ऐसा ग्रंथ है जिसने जाति, वर्ण, संप्रदाय और ब्रह्मचर्य-सन्यास आदि आश्रमों के झूठे अहंकार या हीनताबोध से स्वयं को दूर करने का आह्वान करते हुए उद्घोष किया था— न त्वं विप्रादिको वर्णो नाश्रमी नाक्षगोचर:। असङ्गोऽसि निराकारो विश्वसाक्षी सुखी भव।। (यानी न तुम ब्राह्मण या क्षत्रिय आदि वर्ण हो, न तुम ब्रह्मचारी, सन्यासी आदि हो, न तुम आंख, नाक, कान, जीभ, त्वचा आदि इंद्रियों से ग्रहण किए जाने वाले हो, बल्कि तुम तो अकेला, अदृश्य और विश्व के द्रष्टा हो। ऐसा समझकर तुम सुखी होओ।)
आगे चलकर कबीर, नानक और रैदास जैसे संतों की वाणी में हमें ऐसे ही आत्माराम रूपी 'राम’ के दर्शन होते हैं। तुलसीदासजी ने भले ही यह कहते हुए कि 'राम न सकहिं नाम गुन गाहीं।’ (यानी स्वयं राम भी इतने समर्थ नहीं हैं कि वह अपने ही नाम के प्रभाव का गान कर सकें) अपने श्रद्धेय के प्रति भक्तिभाव दर्शाया हो, लेकिन राम के नाम को कबीर ने एक अलग ही अर्थ प्रदान करते हुए एक नई ऊंचाई दे दी। जब उन्होंने कहा कि 'दसरथ सुत तिहुं लोक बखाना, राम नाम का मरम है आना’ (यानि दशरथ के बेटे राम को तो सभी भजते हैं, लेकिन राम नाम का मरम तो कुछ और ही है), तो उन्होंने रामकथाओं में आए राम की तमाम स्थापनाओं को ही एक किनारे रख दिया।
राम नाम और राम की महिमा पर वाद-विवाद में उलझे रहनेवालों पर संत कबीर ने एक बार करुणास्पद कटाक्ष करते हुए कहा— राम गुण न्यारो न्यारो न्यारो। / अबुझा लोग कहां लों बूझै, बूझनहार विचारो।। / केतेहि मुनिजन गोरख कहिये, तिन्ह भी अन्त न पाया।। / जाकी गति ब्रह्मै नहिं जानी, शिव सनकादिक हारे।। / ताके गुण नर कैसेक पैहौ, कहहिं कबीर पुकारे।। हिंदू और मुसलमान के नाम पर लडऩेवाले लोगों को भी कबीर ने यही कहा कि 'राम रहीमा एकै है रे काहे करौ लड़ाई’ या फिर यह भी कि — राम रहीमा एक है, नाम धराया दोई, कहे कबीर दुइ नाम सुनि, भरम परो मत कोई। और जब इससे भी सरल रूप में समझाने की जरूरत महसूस हुई तो उन्होंने कहा— राम रमैया घट-घट वासी यानी वह तो हर मनुष्य के भीतर है। हर मनुष्य ही अपने आप में देवता है, देवी है, ब्रह्मा है आदम है।
महात्मा गांधी ने जब 'रघुपति राघव राजा राम’ और 'ईश्वर-अल्लाह तेरो नाम की डोर पकड़ी’ तो उनके जेहन में भी राम का एक बहुत ही सुलझा और कबिराहा स्वरूप ही था। २२ जनवरी, १९२१ को यंग इंडिया में उन्होंने रामनाम सुमिरन के नुस्खे का मर्म बताते हुए लिखा था- 'मेरे लिए राम, अल्लाह और गॉड सभी एक ही अर्थ वाले शब्द हैं।’ इसी तरह राम, कृष्ण या बुद्ध को अवतार घोषित किए जाने के प्रश्न पर विनोबा ने एक बार कहा था- 'विचार का भी अवतार होता है, बल्कि विचार का ही अवतार होता है। लोग समझते हैं कि रामचन्द्र एक अवतार थे, कृष्ण, बुद्ध, अवतार थे। लेकिन उन्हें हमने अवतार बनाया है। वे आपके और मेरे जैसे मनुष्य थे। ...हम अपनी प्रार्थना के समय लोगों से सत्य प्रेम, करुणा का चिन्तन करने के लिए कहते हैं। भगवान किसी न किसी गुण या विचार के रूप में अवतार लेता है और उन गुणों या विचार को मूर्त रूप देने में, जिनका अधिक से अधिक परिश्रम लगता है, उन्हें जनता अवतार मान लेती है। अवतार व्यक्ति का नहीं विचार का होता है और विचार के वाहन के तौर पर मनुष्य काम करते हैं। किसी युग में राम के रूप में सत्य की महिमा प्रकट हुई, किसी में कृष्ण के रूप में प्रेम की, किसी में बुद्ध के रूप में करुणा की।’
राम के नित नए रूपों में निरूपण का सिलसिला शायद अभी भी थमा नहीं है। कुछ साल पहले शिर्डी के साईबाबा को साई 'राम’ घोषित किए जाने को लेकर उनके अनुयायियों और द्वारिका पीठ के शंकराचार्य के बीच कटु संवादों का आदान-प्रदान शुरू हो गया था। डेरा सच्चा सौदा वाले गुरमीत सिंह ने अपने नाम के साथ 'राम-रहीम’ का तखल्लुस जोड़कर फिल्मी माध्यम से भी इसका एक अलहदा प्रतिमान गढऩे की कोशिश की। फिल्मों में वैसे भी 'राम’ नाम को भुनाने के कुछ अनोखे व्यावसायिक प्रयास हुए हैं। जैसे १९८८ में जब 'राम-अवतार’ नाम की एक बहुचर्चित हिंदी फिल्म आई, तो गांव-देहात के भोले-भाले लोगों को लगा कि यह भगवान राम के अवतार की कहानी है। फिर क्या था तांगे और ट्रैक्टरों में भर-भरकर बेचारे ग्रामीण कस्बाई सिनेमाघरों में आने लगे। लेकिन जब वे सिनेमाघर के भीतर सिनेमा देखना शुरू करते, तो उन्हें 'राम’ के रूप में एक ऐसा 'नायक’ देखने को मिलता जो अपनी मोटरकार के रेडिएटर में ही खड़े-खड़े लघुशंका निवारण कर रहा होता।
लेकिन इस सबसे अलग पिछले करीब पच्चीस वर्षों से जब भी छह दिसंबर का दिन आता है, तो लोकमानस में कुछ तस्वीरें उभरने लगती हैं। जैसे कोई टूटता गुम्बज, उसपर चढ़े कुछ उन्मादी लोग। माथे पर भगवा पट्टी बांधे लोगों की भीड़ जिसमें कोई ध्वजा-पताका-झंडा से लैस है, तो कोई लाठी, त्रिशूल या तलवार से। इसके साथ ही किसी ऐसे अवतारी पुरुष की बहुत ही चतुराई से गढ़ी गई एक छवि उभरती है, जिसमें उन्हें भगवा वस्त्र में ही धनुष चलाते हुए एक गठीले शरीर वाले लड़ाके के रूप में चित्रांकित किया गया है। भारतीय आध्यात्मिक परंपरा को वास्तव में समझने वाले लोगों के लिए यह प्रश्न शायद बराबर बना रहेगा कि ये कैसे रामभक्त थे, जिन्होंने स्वयं राम के नाम पर ही यह सब किया होगा।
उस घटना के लगभग २७ साल बाद भी अब जब रामनवमी के जुलूसों में नई पीढिय़ां कई स्थानों पर अपना ऐसा ही उन्माद प्रदर्शित करती नजऱ आती हैं, तो उन्हें यह बताना जरूरी जान पड़ता है कि इसी देश में आध्यात्मिक और व्यापक अर्थों वाले राम को संकीर्ण राजनीतिक राम में बदलने जैसी मूढ़ता भी हुई है। और नई पीढिय़ां इस राजनीतिक राम वाले हिंसक प्रतीकों से जुडऩे के बजाय उस आध्यात्मिक राम को जानने की कोशिश करें, जो अयोध्या वाले किन्हीं दशरथ के बेटे राम से बहुत पहले से ही एक समृद्ध आध्यात्मिक और मुक्तिकारी चिंतन का हिस्सा रहे थे।
विज्ञान युग की नई पीढिय़ां राम और रहीम जैसे शब्दों के ऐतिहासिक, आध्यात्मिक और वैज्ञानिक अर्थों और संदर्भों को अपनी वैज्ञानिक अनुभूतियों से अवश्य ही समझ पाएंगी। बस उसमें तात्कालिक अड़ंगा लगाने वाला अगर कुछ है, तो वह यही कि राम के नाम पर कथित राम-भक्त और राम-विरोधी दोनों अपनी-अपनी राजनीति करते रहने के लोभ से बाज नहीं आ रहे हैं। यही बात रहीम और रहमान वालों पर भी ठीक उसी तरह लागू होती है। अयोध्या और बाबरी को लेकर लडऩे वाले दोनों तरफ के लोग न तो राम को समझ पाए हैं, न रहीम को।(सत्याग्रह)
 


Date : 02-Apr-2020

पुलकित भारद्वाज
भीलवाड़ा, २ अप्रैल । राजस्थान का भीलवाड़ा देश का पहला शहर था जहां कोरोना वायरस की वजह से कफ्र्यू लगाया गया। यहां बीती २० मार्च को एक निजी अस्पताल के तीन डॉक्टर और तीन नर्सिंग कर्मचारियों के कोरोना संक्रमित होने की खबर सामने आई थी। लेकिन बात इतनी भर नहीं थी। पता चला कि संक्रमित होने के बाद ये छहों, पांच हज़ार से ज़्यादा मरीजों के संपर्क में आए थे। जानकारी मिलते ही शासन-प्रशासन में हड़कंप मच गया और तुरत-फुरत उस अस्पताल के साथ जि़ले की सीमाओं को भी सील कर दिया गया। मौजूदा स्थिति की बात करें तो राजस्थान के कुल ६९ कोरोना पॉजि़टिव मरीज़ों में से २६ भीलवाड़ा से आते हैं। इनमें से अधिकतर के संक्रमित होने के तार बांगड़ अस्पताल से जुड़े हैं। इन मरीज़ों में से दो की मौत हो चुकी है।
कैसे लापरवाही इस महामारी की वाहक बनी?
पूरी दुनिया में कोरोना एक विस्फोटक महामारी में कैसे तब्दील हो गया, इसे भीलवाड़ा के उदाहरण से समझा जा सकता है। स्थानीय जानकार बताते हैं कि शहर के बांगड़ अस्पताल में कार्यरत डॉक्टर नियाज़ में १२ मार्च को ही कोविड-१९ के लक्षण नजऱ आने लगे थे। १५ मार्च को उनके कोरोना वायरस से संक्रमित होने की पुष्टि हो गई। लेकिन बांगड़ अस्पताल प्रबंधन ने यह बात प्रशासन और अपने मरीजों से छिपाए रखी। यह उस पूरे घटनाक्रम का हूबहू छोटा मॉडल था जैसा कि चीन ने किया था और खामियाज़ा पूरी दुनिया को उठाना पड़ा।
इसके बाद जब १९ मार्च को इसी अस्पताल के एक और डॉक्टर आलोक मित्तल में भी कुछ ऐसे ही लक्षण दिखाई दिए, तब जाकर बात खुल गई। लेकिन तब तक काफी देर हो चुकी थी। जानकारों का कहना है कि दुनिया भर में भीलवाड़ा जैसा कोई अन्य मामला नजऱ नहीं आता जहां मरीजों से डॉक्टर को नहीं बल्कि डॉक्टरों से मरीजों को यह बीमारी लगी है।
इसे लेकर अभी तक कुछ भी निश्चित तौर पर नहीं कहा जा सका है। शुरुआत में अफवाह फैली थी कि डॉक्टर नियाज के कुछ रिश्तेदार सऊदी अरब से लौटे थे जो कोरोना संक्रमित थे। उनके संपर्क में आने की वजह से नियाज भी इस बीमारी की चपेट में आ गए और चेन बढ़ती चली गई। लेकिन जल्द ही भीलवाड़ा सीएमएचओ ने इस बात को नकार दिया।
इस बारे में कुछ का यह भी कहना है कि ८ मार्च को कोरोना के लक्षणों से ग्रस्त एक बुजुर्ग बांगड़ अस्पताल में भर्ती हुए थे। वहां उन्हें न्यूमोनिया का इलाज दिया गया जो बेअसर रहा। हालात न सुधरने पर इन बुजुर्ग को जयपुर के एक निजी अस्पताल में ले जाया गया जहां उनकी मौत हो गई। उनके शव को वापस भीलवाड़ा लाकर परिजनों ने उसका दाह संस्कार कर दिया। आशंका है कि वे बुजुर्ग कोरोना संक्रमित थे। इस मामले में भीलवाड़ा और जयपुर के अस्पतालों की घोर लापरवाही रही कि लक्षण दिखने के बावजूद उन्होंने बुजुर्ग का कोरोना टेस्ट नहीं करवाया।
शासन-प्रशासन के क्या इंतजाम हैं?
हालांकि यह तो नहीं कहा जा सकता है कि भीलवाड़ा में इस समय स्थिति पूरी तरह नियंत्रण में है। लेकिन स्थानीय विश्लेषकों की मानें तो शासन-प्रशासन ने जिस तरह यहां युद्धस्तर पर मोर्चा संभाला है, वह तारीफ का हकदार है। भीलवाड़ा से ही ताल्लुक रखने वाले सामाजिक कार्यकर्ता भंवर मेघवंशी इस बारे में बताते हैं कि 'जरा सी भी चूक होने पर भीलवाड़ा गंभीर स्थिति में पहुंच सकता था। लेकिन जिले के चिकित्सकों, पुलिस और प्रशासन ने हालात संभालने में पूरी ताकत झोंक दी जिसकी वजह से अभी तक स्थिति तुलनात्मक तौर पर नियंत्रण में है।’ हालांकि मेघवंशी आगे यह भी जोड़ते हैं कि जिले में अब भी कई अंदरूनी इलाकों तक जरूरी इमदाद नहीं पहुंच सकी है।
आगे हुई चर्चा में मेघवंशी हमारे ध्यान में लाते हैं कि इतनी बड़ी लापरवाही के बावजूद बांगड़ अस्पताल प्रबंधन पर अभी तक कोई कार्रवाई नहीं की गई है। इस अस्पताल के मालिक भारतीय जनता पार्टी के नेता और लोकसभा अध्यक्ष ओम बिड़ला के समधी हैं। उनके कांग्रेस के भी बड़े नेताओं से गहरे ताल्लुकात बताए जाते हैं।
भीलवाड़ा के वरिष्ठ पत्रकार प्रमोद तिवारी भी भंवर मेघवंशी से सहमति जताते हुए जिले में शासन व्यवस्था के इंतजामों को संतोषजनक बताते हैं। वे कहते हैं, 'शहर के पांच निजी अस्पतालों को अधिगृहीत कर प्रशासन ने वहां आइसोलेशन के लिए दो सौ बेड तैयार किए हैं। शहर के कई होटलों को भी नियंत्रण में लेकर प्रशासन ने चार हजार लोगों की क्षमता का क्वारंटाइन भी तैयार किया है। अभी शहर में तीस से ज़्यादा मोबाइल वैनों की मदद से रोजमर्रा के सामान की आपूर्ति की जा रही है।’ बकौल तिवारी, 'भीलवाड़ा में शुरुआती सात दिनों में ही तीन हजार टीमों की मदद से साढ़े चार लाख घरों के तकरीबन २४ लाख लोगों की स्क्रीनिंग कर ली गई थी।’ सर्वे जैसी इस स्क्रीनिंग प्रक्रिया के तहत सरकारी कर्मचारियों ने घर-घर जाकर लोगों की सेहत से जुड़ी जानकारियां जुटाई थीं।
यहां यह बात राहत देती है कि राजस्थान की अशोक गहलोत सरकार भीलवाड़ा ही नहीं बल्कि पूरे प्रदेश में कोरोना महामारी से निपटने के लिए वाजिब प्रयास करती नजर आई है। गौरतलब है कि राजस्थान उन शुरुआती राज्यों में शुमार था जहां कोरोना के खतरे को देखते हुए पहले धारा १४४ लगाई गई और उसके तुरंत बाद ही लॉकडाउन कर दिया गया था। इस फैसले के साथ ही गहलोत सरकार ने पेंशनधारी, राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम से जुड़े परिवारों, दिहाड़ी मजदूरों और अन्य जरूरतमंद लोगों के हितों को ध्यान में रखते हुए कई घोषणाएं कीं जिन्हें आलोचकों से भी सराहना मिली। जबकि केंद्र की मोदी सरकार इन तैयारियों के बिना ही लॉकडाउन लागू करने की वजह से कटघरे में खड़ी की जा रही है।
चिकित्सकीय क्षेत्र से जुड़े विभिन्न विश्लेषक कोरोना के जांच-इलाज के मोर्चे पर भी राजस्थान की अशोक गहलोत सरकार के प्रदर्शन को संतोषजनक बताते हैं। रिपोर्ट लिखे जाने तक प्रदेश के सभी जि़लों में क्वारेंटाइन के लिए कुल ९५ हजार से ज़्यादा बेड चिन्हित किए जा चुके थे। वहीं आइसोलेशन के लिए चिन्हित बेडों की संख्या करीब सोलह हजार थी। राजस्थान सरकार से जुड़े विश्वसनीय सूत्र बताते हैं कि जल्द ही कोरोना वायरस के संक्रमितों की जांच और उपचार में जुटे चिकित्सक/नर्सिंग कर्मियों के लिए कुछ प्रोत्साहन राशि देने का फैसला लिया जा सकता है। रिपोर्ट लिखे जाने तक राजस्थान में करीब आधी आबादी यानी सवा तीन करोड़ लोगों की स्क्रीनिंग की जा चुकी है।
प्रदेश के अतिरिक्त मुख्य सचिव (स्वास्थ्य विभाग) रोहित कुमार सिंह की मानें तो राजस्थान कोरोना टेस्टिंग के मामले में देश में पहले पायदान पर है और पॉजिटिव केस मिलने के मामले में सबसे आखऱिी राज्यों में शामिल है। राहत इस बात की भी है कि रिपोर्ट लिखे जाने तक भीलवाड़ा में मिले कोरोना के सभी २६ मरीजों में से १३ की रिपोर्ट निगेटिव आ चुकी है।
राजस्थान में इस पूरे मामले को सक्रियता से देख रहे पत्रकार आशुतोष शर्मा बताते हैं कि 'अशोक गहलोत सरकार इस बात के लिए तारीफ की हक़दार है कि वह बड़े स्तर पर कोरोना संक्रमण को रोक पाने में अभी तक सफल दिखी है।’ आशुतोष शर्मा के शब्दों में, '(भीलवाड़ा को छोड़कर) राज्य में पाए गए कोरोना मरीजों में से अधिकतर दूसरे देशों या राज्यों से संक्रमित होकर आए थे और यहां उनके सीधे संपर्क में आने वाले लोगों को भी इस बीमारी ने अपनी चपेट में ले लिया। ऐसे किसी भी केस की सूचना मिलते ही सरकार ने बिना देर किए उस पूरे इलाक़े में कफ्र्यू लगा दिया और पल-पल की निगरानी रखी। शायद इस मुस्तैदी का ही असर रहा कि इनमें से किसी भी इलाक़े से कोरोना संक्रमण का कोई नया मामला सामने नहीं आ पाया है।’
लेकिन राजस्थान सरकार की इस सक्रियता की वजह से प्रदेश के सरकारी अस्पताल इस समय बेहद दबाव में हैं। शर्मा इस वजह से यहां के डॉक्टरों और नर्सिंग कर्मचारियों की सुरक्षा को लेकर चिंता जताते हुए कहते हैं, 'ऐसे हालात में निजी अस्पतालों की तुलना में सरकारी अस्पतालों में हर एक बात की मॉनिटरिंग बहुत मुश्किल साबित हो रही है। ऐसे में प्रदेश के सरकारी अस्पतालों के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपने कर्मचारियों को संक्रमण से बचाए रखने की है। इस मामले में हुई जरा सी चूक बहुत भारी पड़ सकती है!’
भीलवाड़ा की मौजूदा स्थिति के हवाले से भंवर मेघवंशी बताते हैं कि 'शहर के मुख्य मार्गों पर सन्नाटा रहता है। लेकिन शहर की गलियों, बाहरी इलाकों और ग्रामीण क्षेत्रों में जुटने वाली भीड़ पर इस मुश्किल वक्त का कोई खास प्रभाव नजर नहीं आता है। पुलिस की गाड़ी का खटका होते ही सभी घरों में चले जाते हैं और पुलिस के जाते ही हालात जस के तस हो जाते हैं।’
वहीं, भीलवाड़ा प्रेसक्लब के अध्यक्ष सुखपाल जाट रोष जताते हुए कहते हैं कि 'सोशल डिस्टेंसिंग को तार-तार करने पर तुले ये लोग एक तरफ तो चिकित्साकर्मियों के लिए थाली बजाते हैं और दूसरी तरफ़ अपने घरों पर स्क्रीनिंग के लिए आने वाले कर्मचारियों को ऐसी संदेहभरी नजरों से देखते हैं मानो वे ही कोरोना को धरती पर लाए हों। लोग स्क्रीनिंग-सर्वे करने वालों के साथ बदसलूकी से पेश आ रहे हैं और उन्हें सही जानकारी देने से कतरा रहे हैं।’
स्थानीय जानकारों के मुताबिक जि़ले के कलेक्टर और पुलिस के अधिकारियों की लगातार समझाइश और सख़्ती के बाद भी भीलवाड़ा के बाशिंदों पर कोई खास फर्क पड़ता नहीं दिख रहा है। सख्त जरूरत पडऩे पर ही घर से निकलने की कुछ घंटों की छूट का यहां जबरदस्त दुरुपयोग किया जा रहा है। हालांकि कोरोना की वजह से हुई दो मौतों के बाद यहां कुछ दिन लोगों में अनुशासन महसूस किया गया था। लेकिन अब स्थिति फिर पहले जैसी ही नजर आती है। नतीजतन सरकार ने भीलवाड़ा में ३ अप्रैल से १३ अप्रैल तक पूरी तरह कफ्र्यू लगाए जाने का फैसला लिया है।
राजस्थान के स्वास्थ्य एवं चिकित्सा राज्य मंत्री सुभाष गर्ग इस पूरे मामले पर सत्याग्रह को बताते हैं कि 'सरकार अपनी तरफ से इस महामारी से लडऩे की हरसंभव कोशिश कर रही है। लेकिन इस मुहीम में हमें लोगों का भी सहयोग चाहिए। इसके लिए हम लगातार समझाइश भी कर रहे हैं। लेकिन कुछ लोगों पर इस बात का कोई असर नहीं होता दिख रहा। वे लोग ख़ुद पर मंडरा रहे ख़तरे को भांप नहीं पा रहे हैं।’ गर्ग आगे जोड़ते हैं, 'आपके माध्यम से राजस्थान सरकार लोगों से यही अपील करती है कि वे ज़्यादा से ज़्यादा अपने घरों में रहें। क्योंकि यही सबसे बड़ी मानवता है कि हम बेवजह न तो अपनी जान को ख़तरे में डालें और न ही किसी और की।’(सत्याग्रह)
 


Date : 02-Apr-2020

नई दिल्ली, 2 अप्रैल। केंद्र ने बुधवार को उच्चतम न्यायालय को सूचित किया कि ईरान के क़ुम शहर में फंसे २५० भारतीय नागरिकों में कोरोना वायरस के संक्रमण की पुष्टि हुई है और उन्हें नहीं निकाला गया है, जबकि ५०० से ज्यादा दूसरे भारतीयों को वापस लाया जा चुका है।
लाइव लॉ के मुताबिक केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया है कि ८५० तीर्थयात्रियों में से अधिकांश को भारत ले आया गया है और बाकी २५० के आसपास तीर्थयात्रियों को हालात में सुधार होने के बाद ही वापस लाया जा सकता है।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ईरान में २५० फंसे हुए भारतीय नागरिकों की स्थिति की भारतीय दूतावास द्वारा कड़ी निगरानी की जाएगी और वर्तमान में उन्हें वापस लाने का फैसला नहीं लिया जा सकता है। इन सभी को कोरोना वायरस पॉजिटिव पाया गया है।
शीर्ष अदालत ने कहा कि वह भारतीय दूतावास को स्थिति पर लगातार निगाह रखने और ईरान में फंसे भारतीय के संपर्क में बने रहने का निर्देश देने के बारे में सोच रही है।
जस्टिस डीवाई चन्द्रचूड़ और जस्टिस एमआर शाह की पीठ ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिये सुनवाई की और कहा कि वह इस मामले में याचिकाकर्ताओं के पक्ष में आदेश देगी ओर भारतीय दूतावास से कहेगी कि इनकी नई जांच करायी जाए और उन्हें जब भी संभव हो स्वदेश लाने की संभावना पर गौर करे। पीठ ने टिप्पणी की कि सरकार इस मामले को गंभीरता से ले रही है।
इससे पहले सुनवाई शुरू होते ही केंद्र की ओर से सॉलिसीटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि ईरान में फंसे अधिकांश भारतीयों को वापस लाया जा चुका है।
याचिकाकर्ता मुस्तफा एमएच की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता संजय हेगड़े ने कहा कि ईरान में फंसे सभी भारतीयों को वापस नहीं लाया गया है और अभी भी करीब २५० भारतीय, जिनमें कोरोना वायरस के संक्रमण की पुष्टि हो गई है, वहीं हैं और ईरान प्रशासन के रहम पर हैं।
याचिकाकर्ता मुस्तफा एमएच केंद्रशासित राज्य लद्दाख के रहने वाले हैं। उन्होंने अपनी याचिका में कहा है कि पिछले साल दिसंबर में उनके रिश्तेदार तकरीबन १००० तीर्थयात्रियों के एक समूह के साथ ईरान गए थे।
मेहता ने कहा कि इस समय सारी अंतरराष्ट्रीय उड़ानें रद्द हैं और संबंधित प्राधिकारियों को विदेश मंत्रालय के फैसले का इंतजार है। मेहता ने कहा, 'ईरान में हमारा दूतावास वहां फंसे २५० भारतीयों के संपर्क में है। वे जब भी संभव होगा उन्हें वापस लाएंगे।’ उन्होने कहा कि यह याचिका अब निरर्थक हो चुकी है।
इस पर पीठ ने हेगड़े से कहा कि ईरान में फंसे लोगों का ध्यान रखा जा रहा है और इस मामले को अब सरकार पर छोड़ देना चाहिए। पीठ ने कहा, 'आप इस मामले को आवश्यकता पडऩे पर फिर से उठा सकते हैं।’
हेगड़े ने कहा कि ईरान में अभी भी फंसे कई भारतीयों में इस वायरस के कोई लक्षण नहीं हैं और उन्हें चार-पांच के समूह में होटलों में ही ठहरने के लिए कहा गया है, जहां इस संक्रमण से प्रभावित लोगों को अलग रखा जा रहा है, तो वे भी इस वायरस की चपेट में आ सकते हैं।
उन्होंने कहा कि ईरान में फंसे २५० लोगों के पास पैसा, दवा और दूसरी सुविधाएं नहीं हैं। वैसे भी उन्हें लेह जैसे स्थान पर वापस क्यों नहीं लाया जा सकता?
इस पर मेहता ने जवाब दिया कि ईरान से वापस लाकर लेह और दूसरे स्थान पर भेजे गए इन भारतीयों में से कई में अब कोरोना वायरस के लक्षण उभर आए हैं। पीठ ने कहा कि वह ईरान में फंसे भारतीयों की सेहत की स्थिति में सुधार होने पर उन्हें वापस लाने के बारे में आदेश देगी।
ईरान में फंसे भारतीय नागरिक दिसंबर २०१९ से अलग-अलग तारीखों पर अपनी यात्रा शुरू की थी। यात्रा तीन महीने की अवधि के लिए निर्धारित थी और तीर्थयात्रियों का २६ फरवरी से शुरू होने वाली कई तारीखों पर लौटने का कार्यक्रम था। याचिकाकर्ता के रिश्तेदार ६ मार्च को लौटने वाले थे।
२७ मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने दुनिया भर में कोविड-१९ महामारी के चलते स्वास्थ्य आपातकाल के बीच, ईरान के क़ुम शहर में फंसे लगभग ८५० भारतीय नागरिकों को निकालने के लिए केंद्र से निर्देश मांगने वाली याचिका पर नोटिस जारी किया था।
ईरान कोरोना वायरस महामारी से सबसे अधिक प्रभावित होने वाले देशों में शामिल है। ईरान में बीते २४ घंटों में कोरोना वायरस से संक्रमित १३८ लोगों की मौत के बाद देश में मृतकों की संख्या तीन हजार से पार हो गई।
स्वास्थ्य मंत्रालय के प्रवक्ता कियानूश जहानपुर ने कहा कि अब मृतकों की संख्या ३,०३६ से हो गई है। उन्होंने कहा कि कोरोना वायरस से संक्रमण के २,९८७ नये मामले सामने आने के बाद इससे संक्रमित लोगों की संख्या ४७,५९३ हो गई है। १५,४७३ लोग ठीक हो गए हैं। (भाषा)
 


Date : 02-Apr-2020

मनोज सिंह
नई दिल्ली, 2 अप्रैल। कोरोना संक्रमण के चलते भारत की अंतरराष्ट्रीय सीमाएं सील हैं। इसके चलते भारत से नेपाल जाने की कोशिश कर रहे ३२६ नेपाली कामगार २२ घंटे तक बॉर्डर के 'नो मैंस लैंड’ पर कैद रहें।
उन्हें नेपाली सुरक्षाकर्मियों ने नेपाल के अंदर दाखिल नहीं होने दिया। वे वापस भारतीय सीमा में भी नहीं आ पा रहे थे। मंगलवार रात ८.३० बजे इन नेपाली कामगारों को भारतीय सीमा में लाकर नौतनवां इंटर कॉलेज ले जाया गया।
सोमवार की रात जब इन नेपाली नागरिकों ने नेपाल में दाखिल होने की कोशिश की, तब नेपाल के सुरक्षाकर्मियों ने उन पर लाठीचार्ज कर दिया था, जिससे नाराज होकर उन्होंने नारेबाजी की थी।
उधर १०० से अधिक भारतीय भी नेपाली सीमा में फंसे हुए हैं, जिन्हें बॉर्डर से हटाकर नेपाल के अंदर ले जाया गया है।
मंगलवार पूरे दिन दोनों देश के अधिकारी नेपाली और भारतीय नागरिकों को अपने-अपने देश जाने देने के बारे में बातचीत करते रहे लेकिन कोई निर्णय नहीं हो सका।
भारत में २५ मार्च से देशव्यापी लॉकडाउन है। नेपाल ने इसके एक दिन पहले २४ मार्च से ३१ मार्च तक लॉकडाउन करने की घोषणा की थी। अब नेपाल सरकार ने लॉकडाउन की अवधि को एक अप्रैल तक बढ़ा दिया है।
नेपाल में सुरक्षाकर्मी लॉकडाउन का सख्ती से पालन कराने की कोशिश कर रहे हैं। दोनों देश में लॉकडाउन के कारण यूपी के महराजगंज जिले में स्थित सोनौली बॉर्डर पर आवाजाही बंद हैं। दोनों देशों की ओर के बैरियर गिरे हुए हैं। हालांकि इस दौरान सब्जी, रसोई गैस जैसे जरूरी वस्तुओं वाले वाहनों को भारत से नेपाल जाने दिया जा रहा है।
सोनौली बॉर्डर से बड़ी संख्या में लोगों की आवाजाही होती है। भारत से बड़ी संख्या में मालवाहक वाहन भी नेपाल में जाते हैं। लॉकडाउन के कारण जगह-जगह फंसे प्रवासी मजदूरों के लिए जब २९ मार्च को यूपी सरकार द्वारा १,००० बसें चलायीं गईं, तो नोएडा, फरीदाबाद, गुडग़ांव आदि स्थानों पर काम करने वाले नेपाली कामगार भी अपने देश के लिए रवाना हो गए।
बस व अन्य साधनों से ये सोनौली तो पहुंच गए लेकिन बॉर्डर बंद होने के कारण वे भारतीय सीमा में फंस गए। इन नेपाली नागरिकों की संख्या ३२६ है। ये २९ मार्च की सुबह से सोनौली बस स्टैंड के शेड में रह रहे थे और बॉर्डर खुलने का इंतजार कर रहे थे। सोमवार रात ९.३० बजे के करीब वे सीमा की तरफ बढ़ चले।
भारतीय सीमा पर तैनात पुलिस और एसएसबी ने उन्हें जाने दिया लेकिन नेपाली सुरक्षाकर्मियों ने उन्हें लॉकडाउन का हवाला देते हुए रोक दिया।
काफी देर तक जब ये नेपाली नागरिक अपने देश में दाखिल नहीं हो सके तो वे नारेबाजी करने लगे। वे जबरन नेपाल में दाखिल होने की कोशिश भी करने लगे।
यह देख नेपाली सुरक्षाकर्मियों ने उन पर लाठीचार्ज किया और उन्हें नो मैंस लैंड की तरफ धकेलते हुए बैरियर गिरा दिया। सोमवार रात से लेकर मंगलवार रात ८।३० बजे तक ये नेपाली कामगार नो मैंस लैंड पर बैठे रहे।
उधर नेपाल सीमा में १०० से अधिक भारतीय बॉर्डर पर इंतजार कर रहे थे कि भारत में दाखिल होने दिया जाएगा।
नो मैंस लैंड भारत और नेपाल सीमा को निर्धारित करने वाली १० गज की पट्टी है, जिसके दोनों तरफ दोनों देशों के कस्टम, पुलिस, इम्रीगेशन व सुरक्षाकर्मियों के पोस्ट हैं।
मंगलवार शाम से दोनों देश के अधिकारी नेपाली और भारतीय नागरिकों को अपने-अपने देश में जाने देने के बारे में बातचीत करते रहे लेकिन कोई हल नहीं निकला।
महराजगंज के डीएम और एसपी भी इस मसले को हल करने के लिए बॉर्डर आये थे। रात तक कोई फैसला नहीं होने पर आखिरकार नेपाली कामगारों को भारतीय सीमा में नौतनवा इंटर कालेज लाया गया।
उधर नेपाली सीमा में रूके भारतीयों को भी नेपाली अधिकारी किसी शेल्टर होम में ले गए। (द वायर)
(लेखक गोरखपुर न्यूजलाइन वेबसाइट के संपादक हैं।)
 


Date : 02-Apr-2020

इंदौर, 2 अप्रैल। देश में कोरोना वायरस का प्रकोप तेजी से बढ़ते जा रहा है और हर दिन कोविड-१९ के मामलों में बड़ा इजाफा देखने को मिल रहा है। कोरोना संकट के इस दौर में खतरनाक महामारी के कहर से लोगों की जान बचाने के लिए स्वास्थ्यकर्मी अपनी जान की बाजी लगा कर डटे हुए हैं, मगर कुछ लोग हैं कि उन पर पत्थर बरसा रहे हैं और थूक रहे हैं। ताजा मामला मध्य प्रदेश के इंदौर का है, जहां कोरोना वायरस के मद्देनजर एक बुजुर्ग महिला की स्क्रीनिंग करने गए स्वास्थ्य कर्मियों की टीम पर पत्थर बरसाए गए और उन्हें दौड़ा-दौड़ा कर मारा गया है। बता दें कि इससे पहले भी कोरोना लॉकडाउन में स्वास्थ्यकर्मियों और पुलिस की टीम पर देश के अलग-अलग हिस्सों से हमले की खबर आ चुकी है।
दरअसल, घटना इंदौर के टाट पट्टी बाखल इलाके की है, जहां स्वास्थ्य कर्मियों पर पथराव किया गया। दरअसल, बुधवार को इंदौर के टाट पट्टी बाखल इलाके में कोरोना वायरस से संदिग्ध एक बुजुर्ग महिला का मेडिकल चेकअप करने के लिए स्वास्थ्य कर्मियों की टीम, जिसमें डॉक्टर, नर्स और आशा कार्यकर्ता शामिल थे, लाने आई थी, जिसका वहां के लोगों ने विरोध किया और लोगों ने पथराव कर दिया। उन्होंने लाठी-डंडों से उनका पीछा किया और फिर किसी तरह स्वास्थ्यकर्मियों की टीम जान बचाते भागी। 
यह घटना ऐसे वक्त में हुई है जहां पूरा देश डॉक्टरों के लिए तालियां बजा रहा है और उनके योगदान को सराह रहा है, मगर वहीं कुछ लोग इन्हें गालियां भी दे रहे हैं और पत्थर भी मार रहे हैं। 
समाचार एजेंसी ने इसका एक वीडियो भी जारी किया है, जिसमें साफ देखा जा सकता है कि कैसे स्वास्थ्य कर्मियों की टीम पर भीड़ हमला करने के लिए दौड़ती दिख रही है। लाठी-डंडे के साथ भीड़ टीम पर हमला करती है और उसके बाद किसी तरह स्वास्थ्यकर्मी वहां से जान बचाकर भागते हैं। दरअसल, वीडियो में कुछ अपशब्द का इस्तेमाल किया गया है, इस वजह से हम उसे नहीं दिखा सकते। पत्थरों से हमला करने वाले लोगों ने बैरिकेड भी तोड़ा।
हाालंकि, इस घटना के बाद पुलिस पहुंची। पुलिस की सख्ती के बाद उपद्रवी माने और पुलिस ने कुछ लोगों पर केस भी दर्ज किया है। बताया जा रहा है कि स्वास्थ्यक र्मियों की टीम उस संदिग्ध व्यक्ति की पहचान के लिए आई थी, जो कोरोना वायरस संक्रमित व्यक्ति के संपर्क में आया था। बता दें कि इंदौर में कोरोना वायरस के मामलों में लगाता इजाफा हो रहा है और यह आंकड़ा ७५ हो गया है। बुधवार को मध्य प्रदेश के इंदौर में कोरोना वायरस के १२ नए मामले सामने आए, जिसके बाद पूरे राज्य में यह आंकड़ा ९८ हो गया है। 
जमातियों ने स्वास्थय कर्मियों पर थूका
दरअसल, यह पहला मामला नहीं है, जिसमें कोरोना वायरस के खिलाफ जंग में अगली कतार में खड़े स्वास्थ्य कर्मियों के साथ बदसलूकी की घटना हुई है। इससे पहले दिल्ली के मरकज में तबलीगी जमाती के लोगों ने भी स्वास्थ्य कर्मियों पर थूका। दक्षिण-पूर्वी दिल्ली में रेलवे के पृथक केंद्रों में रखे गए तबलीगी जमात के कार्यक्रम से जुड़े करीब १६० लोगों ने उनकी जांच कर रहे डॉक्टरों और स्वास्थ्य कर्मियों के साथ दुर्व्यवहार किया और यहां तक कि उनपर थूका भी। 
तबलीगी जमात के १८९ लोग कोरोना वायरस पॉजिटिव
कोरोना वायरस के डर के बीच दिल्ली के निजामुद्दीन में स्थित तबलीगी जमात के मरकज का मामला लगातार गंभीर होता जा रहा है। स्वास्थ्य मंत्रालय ने बुधवार को बताया कि जमात के कार्यक्रम के कारण कोरोना वायरस संक्रमण के मामले बढ़े हैं। २४ घंटों में सामने आए संक्रमण में से १८९ मामले तबलीगी जमात में शामिल लोगों के हैं। वहीं, मरकज में शामिल लोगों की तलाश में देशभर में तलाशी अभियान चलाया जा रहा है। (लाइव हिन्दुस्तान)
 


Date : 02-Apr-2020

मनोज्ञा लोइवाल/शरत कुमार
कोलकाता/जयपुर, २ अप्रैल। देश में कोरोना वायरस के मामले में तेजी से बढ़ते जा रहे हैं। गुरुवार को सुबह १० बजे तक महाराष्ट्र, राजस्थान, जम्मू-कश्मीर में नए मामले सामने आए। कोरोना नॉर्थ ईस्ट में भी पैर पसार रहा है। यहां अब तक २० केस आ चुके हैं। अरुणाचल प्रदेश में पहला केस आया है। देशभर में मरीजों की संख्या २००० को पार कर गई है।
राजस्थान में गुरुवार को ९ मामले आए। इसमें से जयपुर के रामगंज में ७, जोधपुर में एक और झुंझुनु में एक मामले सामने आए है। खास बात है कि रामगंज में एक आदमी में संपर्क में आने से ७ लोग संक्रमित हुए हैं। यह शख्स अब तक अपने १७ करीबियों को संक्रमित कर चुका है। इससे पता चलता है कि सोशल डिस्टेंसिंग कितना जरूरी है। राजस्थान में कोरोना के अबतक १२९ मामले आए हैं। झुंझनु का संक्रमित शख्स तबलीगी जमात से जुड़ा था।
वहीं, जम्मू-कश्मीर में गुरुवार को सात नए केस आएं। इस वजह से प्रदेशों में संक्रमित लोगों की संख्या बढ़कर ६२ हो गई है। इसमें दो लोगों की मौत हो चुकी है और दो ठीक हो चुके हैं। जम्मू-कश्मीर में ही तबलीगी जमात से लौटे शख्स की मौत हुई थी। यहां पर जमात के लोगों की तलाश की जा रही है। साथ ही कई लोगों को क्वारनटीन किया गया है।
कोरोना से सबसे अधिक महाराष्ट्र प्रभावित है। गुरुवार सुबह महाराष्ट्र में तीन नए केस आएं। इसमें दो पुणे और एक बुलढाना में केस आया है। अब तक महाराष्ट्र में कोरोना मरीजों की संख्या ३३८ है, जिसमें १७ लोगों की मौत हो चुकी है, जबकि ४१ लोग ठीक हो चुके हैं। पूरे महाराष्ट्र में २४ हजार से अधिक लोगों को होम क्वारनटीन किया गया है, जबकि १८२८ लोगों को अलग-अलग संस्थानों में क्वारनटीन किया गया है। (आजतक)
 


Date : 02-Apr-2020

गोपी उन्नीथन
तिरुवनंतपुरम, २ अप्रैल (आजतक)। कोरोना वायरस की महामारी को देखते हुए पूरे देश में लॉकडाउन है। लोगों ने अपने सभी जरूरी काम बंद कर दिए हैं। शादी-ब्याह से लेकर धार्मिक जलसे रुके पड़े हैं। लेकिन इंटरनेट के इस जमाने में ऐसी भी खबरें आ रही हैं कि ऑनलाइन काम निपटाए जा रहे हैं। स्कूल-कॉलेज के काम ऑनलाइन हो रहे हैं तो जरूरी मीटिंग भी इसके माध्यम से निपटाए जा रहे हैं। कोर्ट कचहरी भी अपना काम वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए कर रहे हैं। इस बीच एक दिलचस्प खबर केरल से आई है जहां एक परिवार ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से सगाई की रस्म अदा की।
दरअसल, सगाई दोनों परिवारों के मिलने पर होनी थी लेकिन तब तक लॉकडाउन हो गया। लॉकडाउन के कारण दूल्हा और दुल्हन के परिजन जहां-तहां फंसे हैं। लिहाजा उन्हें ऑनलाइन रस्म अदायगी के अलावा दूसरा कोई रास्ता नहीं था। रिपोर्ट के मुताबिक दुल्हन का नाम अमृता है जो बेंगलुरु के बीपीसीएल में कार्यरत है। जबकि दूल्हा राकेश इंजीनियर हैं और चेन्नई की एक प्राइवेट कंपनी में काम करते हैं। लॉकडाउन के कारण दोनों अपने-अपने शहर में फंसे हैं। इनके परिजन भी घरों में रुकने को मजबूर हैं। अमृता और राकेश की सगाई २९ मार्च को होनी थी जिसे वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से निपटाया गया।
वीडियो कॉन्फे्रंसिंग में दूल्हा और दुल्हन अपने-अपने शहर से ऑनलाइन आमने-सामने आए और सगाई की रस्म पूरी हुई। दोनों का परिवार एर्नाकुलम और त्रिचूर में रहता है। यहां से इन दोनों के परिजन वीडियो कॉलिंग के माध्यम से एक-दूसरे के परिवारों से जुड़े। शादी २६ अप्रैल को होनी है, उसके पहले दोनों परिवारों ने अपनी-अपनी तैयारी जारी रखी है।


Date : 01-Apr-2020

पहली से 8वीं कक्षा के छात्रों को बिना परीक्षा प्रमोट करेगी सीबीएसई, सरकार ने दिए निर्देश

नई दिल्ली, 1 अप्रैल : देश भर में कोरोना वायरस के चलते मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने सीबीएसई (CBSE) को निर्देश दिया है कि वो पहली से लेकर आठवीं तक के बच्चों को बिना परीक्षा के ही अगली कक्षा में प्रमोट कर दें. मंत्रालय ने कहा है कि 9वीं और 11वीं कक्षा के छात्रों को भी अगली कक्षा में उनके प्रोजेक्ट्स, पीरियॉडिक टेस्ट और टर्म एग्ज़ामिनेशन के आधार पर आगे के लिए प्रमोट कर दिया जाए.

मानव संसाधन विकास मंत्री रमेश पोखरियाल ने ये फैसला शिक्षा सचिव अमित खरे सहित दूसरे अधिकारियों के साथ मीटिंग करके लिया. उन्होंने ट्वीट करके कहा, 'कोविड-19 के मद्देनज़र मैंने सीबीएसई को सलाह दी है कि वो पहली से लेक आठवीं तक के छात्रों को उनकी अगली कक्षा या ग्रेड में प्रमोट कर दें. कई राज्य बोर्ड्स पहले ही इस तरह की घोषणाएं कर चुके हैं. लेकिन सीबीएसई के स्टूडेंट्स के लिए अभी तक इस तरह की घोषणा नहीं की गई थी.'

10वीं और 12वीं के केवल 29 विषयों की होगी परीक्षा

10वीं और 12वीं के केवल 29 विषयों की ही परीक्षा कराई जाएगी. इससे पहले मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने भी कहा था कि सिर्फ 29 विषयों के लिए ही परीक्षा ली जाएगी. जिन पेपर्स के अंक हायर एजुकेशन इन्स्टीट्यूशन में एडमिशन के लिए ज़रूरी नहीं होते उनका एग्जाम नहीं लिया जाएगा. इसलिए बिजनेस स्टडीज़, भूगोल, सामाजिक विज्ञान और इंग्लिश जैसे पेपर की परीक्षा होगी. इस रिवाइज़्ड एग्जाम की डेट शीट उम्मीद की जा रही है कि जल्द ही जारी की जाएगी. (news18)

 


Date : 01-Apr-2020

कृष्ण कांत

नई दिल्ली, 1 अप्रैल। हमने 21 तारीख से रोटी का शकल नहीं देखा, जो कि इसी हाथ से रोटी बनाकर देने वाला आदमी हूं। हम कारीगर इंसान हैं। मैं ही नहीं, यहां बहुत से ऐसे कारीगर हैं। एक टाइम का खिच्चड़ खाने के लिए घंटों लग जाते हैं। बड़े मुश्किल से पेट के लिए जीना पड़ रहा है। क्या फायदा?। इतना कहकर वह हंसने लगता है। उसकी हंसी में एक अजीब तरह का दर्द छलक रहा है, जिसे वह छुपाने की कोशिश कर रहा है, लेकिन वह साफ दिख रहा है।

उसके बाद कैमरा दूसरे चेहरे पर शिफ्ट होता है। उसने सिर पर गमछा बांधा है। वह बोलता है, आज चार दिन से पेट भर खाना नहीं खाया हमने। मैं तंदूर कारीगर हूं। 600 डेली मिलता है। हम रोज कमाते हैं, रोज खाते हैं। हमारा कोई आधार कार्ड भी नहीं है। मेरा कोई परिवार भी नहीं है। हम कहां जाएं?।

इसी क्रम में तीसरा कहता है, होटल में जॉब करता हूं मैं, नॉर्थ इंडियन डिश बनाता हूं। जो भी पांच छह सौ मिलता है, मैं डेली ले लेता हूं। फिलहाल होटल बंद है, इसलिए मजबूरी में यहां पड़े हैं। वे कहते हैं कि हमारे बीच हर तरह का काम करने वाले हैं। यहां अच्छे अच्छे कुक भी हैं जिनके पास खाने को नहीं है।

एक चौथा आदमी थोड़ा गुस्साए लहजे में कहता है, भूख के मारे बीमारी नहीं होएगी इन सबको? ये कहां पे जाएंगे? सब अलग अलग प्रांत के हैं। न इनको छुपाने के लिए छत है बारिश आए तो, न सोने की जगह, इधर पुलिस मारती है।

यह लॉकडाउन का दूसरा ही दिन था। द क्विंट पर प्रकाशित यह वीडियो पूर्व आईएएस अधिकारी हर्षमंदर की संस्था कारवां-ए-मोहब्बत ने बनाया है। वीडियो में हर्षमंदर कहते हैं, जो देश में हो रहा है, यह उसकी एक झलक है। यमुना पुस्ता में दस हजार लोग इक_ा बैठे हैं। कहीं एक हजार, कहीं दो हजार। वे कई घंटे इंतजार करते हैं, फिर कोई आकर उन्हें एक मु_ी कुछ खाने को दे जाता है। इस भीड़ में सिर्फ पुरुष हैं। औरतों और बच्चों की हालत इससे भी बुरी है। वे इसमें शामिल भी नहीं हो पा रहे हैं। 21 दिन में उनकी क्या हालत होगी?

कोरोना वायरस बड़ा रोग है, लेकिन उससे बड़ा रोग है गरीबी और भूख।

वीडियो में सादी खिचड़ी बंट रही है। लोग एक एक चमचा खिचड़ी पाते हैं और पेट में उतार लेते हैं। यह कोई 1943 का अकाल नहीं है, लेकिन लोग भूख से तड़प रहे हैं।

(लेखक एक वरिष्ठ पत्रकार हैं)


Date : 01-Apr-2020

नई दिल्ली, 1 अपै्रल। सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को केंद्र को यह सुनिश्चित करने का निर्देश दिया कि आश्रय गृहों में रखे गए कामगारों को भोजन और चिकित्सा सहायता उपलब्ध हो।

कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि प्रवासी मजदूरों को दहशत से उबरने में मदद करने के लिए प्रशिक्षित परामर्शदताओं और सभी धर्मों के नेताओं की मदद ली जाए क्योंकि कोरोना वायरस के मुकाबले दहशत से ज्यादा जिंदगियां बर्बाद होंगी।

न्यायालय ने कोरोना वायरस की वजह से कामगारों के पलायन को रोकने और 24 घंटे के भीतर इस महामारी से जुड़ी जानकारियां उपलब्ध कराने के लिए एक पोर्टल बनाने का भी केंद्र को निर्देश दिया।

न्यायालय ने कहा कि इस पोर्टल पर महामारी से संबंधित सही जानकारी जनता को उपलब्ध करायी जाए, ताकि फर्जी खबरों के जरिए फैल रहे डर को दूर किया जा सके।

केंद्र की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि लॉकडाउन की वजह से अपने घरों को रवाना हुए प्रवासी मजदूरों में से अब कोई भी सडक़ों पर नहीं है।

 

चीफ जस्टिस एसए बोबडे और जस्टिस एल नागेश्वर राव की पीठ ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से दो जनहित याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान केंद्र को यह निर्देश दिया।

पीठ ने कहा, ‘यह दहशत वायरस से कहीं ज्यादा जिंदगियां बर्बाद कर देगी।’ साथ ही पीठ ने केंद्र से कहा कि देश के तमाम आश्रय गृहों में पनाह लिए इन कामगारों का चित्त शांत करने के लिए प्रशिक्षित परामर्शदाताओं और सभी धर्मों के नेताओं की मदद ली जाए।’ इसने कहा कि इन आश्रय गृहों का संचालन पुलिस को नहीं, बल्कि स्वंयसेवकों को करना चाहिए और उनके साथ किसी प्रकार का बल प्रयोग नहीं होना चाहिए।

पीठ ने केंद्र से कहा कि वह पलायन कर रहे इन कामगारों को रोके और उनके भोजन, रहने और चिकित्सा सुविधा आदि का बंदोबस्त करे।

केंद्र ने इन कामगारों को सैनिटाइज करने के लिए उन पर रसायनयुक्त पानी का छिडक़ाव करने के एक याचिकाकर्ता के सुझाव पर कहा कि यह वैज्ञानिक तरीके से काम नहीं करता है और यह उचित तरीका नहीं है।

इस बीच, शीर्ष अदालत ने उच्च न्यायालयों को इन कामगारों के मसले पर विचार करने से रोकने से इंकार कर दिया और कहा कि वे अधिक बारीकी से इस मामले की निगरानी कर सकते हैं। हालांकि, न्यायालय ने केंद्र सरकार से कहा कि वह शीर्ष अदालत के आदेशों के बारे में उच्च न्यायालयों को अवगत कराने के लिये सरकारी वकीलों को निर्देश दे।

पीठ ने केंद्र से कहा कि वह कोरोना वायरस महामारी के मुद्दे के संदर्भ में केरल के कासरगोड के सांसद राजमोहन उन्नीथन और पश्चिम बंगाल के एक सांसद की पत्र याचिकाओं पर विचार करे। न्यायालय ने इन याचिकाओं की सुनवाई सात अप्रैल के लिए स्थगित कर दी।

मेहता ने कहा कि इस समय लोगों को दूसरे स्थान पर जाने की अनुमति नहीं दी जा सकती क्योंकि इससे कोरोना वायरस को फैलने का अवसर मिलेगा। उन्होंने कहा कि करीब 4।14 करोड़ कामगार काम के लिए दूसरे स्थानों पर गए थे लेकिन अब कोरोना वायरस की दहशत से लोग वापस लौट रहे हैं।

सालिसिटर जनरल ने कहा कि इस महामारी से बचाव और इसके फैलाव को रोकने के लिए समूचे देश को लॉकडाउन करने की आवश्यकता हो गयी है ताकि लोग दूसरों के साथ घुले मिलें नहीं और सामाजिक दूरी बनाने के सूत्र का पालन करते हुए एक दूसरे से मिल नहीं सकें।

मेहता ने कहा, ‘हम यह सुनिश्चित करने का प्रयास कर रहे हैं कि कामगारों का पलायन नहीं हो। ऐसा करना उनके लिए और गांव की आबादी के लिए भी जोखिम भरा होगा। जहां तक ग्रामीण भारत का सवाल है तो यह अभी तक कोरोना वायरस के प्रकोप से बचा हुआ है लेकिन शहरों से ग्रामीण क्षेत्रों की ओर जा रहे 10 में से तीन व्यक्तियों के साथ यह वायरस जाने की संभावना है।’

उन्होंने कहा कि अंतरराज्यीय पलायन पूरी तरह प्रतिबंधित करने के बारे में राज्यों को आवश्यक परामर्श जारी किए गए हैं और केंद्रीय नियंत्रण कक्ष के अनुसार करीब 6,63,000 व्यक्तियों को अभी तक आश्रय प्रदान किया जा चुका है।

मेहता ने कहा कि 22,88,000 से ज्यादा व्यक्तियों को भोजन उपलब्ध कराया जा रहा है क्योंकि ये सभी जरूरतमंद, एक स्थान से दूसरे स्थान जा रहे कामगार और दिहाड़ी मजदूर हैं जो कहीं न कहीं पहुंच गए हैं और उन्हें रोककर आश्रय गृहों में ठहराया गया है।

पीठ ने शुरू में टिप्पणी की, ‘हम 24 घंटे के भीतर सूचनाएं उपलब्ध कराने के लिए पोर्टल के बारे में आदेश पारित करेंगे। आपको यह सुनिश्चित करना होगा कि जिन लोगों को आपने रोका है, उनकी सही तरीके से देखभाल हो और उन्हें भोजन, रहने की जगह, पौष्टिक आहार और चिकित्सा सुविधा मिले। आप उन मामलों को भी देखेंगे जिनकी पहचान आपने कोविड-19 मामले और अलग रहने के लिए की है।

मेहता ने पीठ से कहा कि सरकार जल्द एक ऐसी व्यवस्था लागू करेगी जिसमें कामगारों के व्याप्त भय पर ध्यान दिया जाएगा और उनकी काउन्सलिंग भी की जायेगी।

पीठ ने मेहता से सवाल किया, ‘आप कब ये केंद्र स्थापित कर देंगे? परामर्शदाता कहां से आ रहे हैं? उन्हें आप कहां भेजेंगे?’

इस पर मेहता ने कहा कि जिला मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रमों से इन प्रशिक्षित काउंसलर को भेजा जायेगा, इस पर पीठ ने कहा, ‘देश में 620 जिले हैं। आपके पास कुल कितने काउंसलर हैं? हम आपसे कहना चाहते हैं कि यह दहशत वायरस से कहीं ज्यादा जिंदगियां बर्बाद कर देगी।’ पीठ ने कहा, ‘आप भजन, कीर्तन, नमाज या जो चाहें कर सकते हैं लेकिन आपको लोगों को ताकत देनी होगी।’

इस पर मेहता ने कहा कि प्राधिकारी आश्रय गृहों में पनाह लिए कामगारों को सलाह देने और उनमें आत्मविश्वास पैदा करने के लिए धार्मिक नेताओं को लाएंगे ताकि ये श्रमिक शांत होकर वहां रह सकें। मेहता ने कहा, ‘मैं यहां बयान दे रहा हूं कि 24 घंटे के भीतर हम प्रशिक्षित परामर्शदाताओं और धार्मिक नेताओं को तैयार कर लेंगे।

पीठ ने कहा कि इस काम में सभी आस्थाओं के धार्मिक नेताओं की मदद ली जानी चाहिए ताकि कामगारों के मन में व्याप्त भय समाप्त किया जा सके। मेहता ने पीठ से कहा कि इन कामगारों के पलायन को लेकर केरल उच्च न्यायालय में भी एक याचिका दायर की गयी है। चूंकि अब शीर्ष अदालत इस पर गौर कर रही है, इसलिए अन्य अदालतों को इस पर विचार नहीं करना चाहिए।

पीठ ने कहा, ‘इस तरह की स्थिति में, हमें इन मामलों की सुनवाई करने से उच्च न्यायालयों को नहीं रोकना चाहिए। उच्च न्यायालय ज्यादा बारीकी से इनकी निगरानी करने में सक्षम हो सकते हैं।’ इसके साथ ही पीठ ने मेहता से कहा कि वह अपने सरकारी वकीलों को शीर्ष अदालत के आदेशों से उच्च न्यायालयों को अवगत कराने की हिदायत दें।

मालूम हो कि देश में कोरोना वायरस से मरने वालों की संख्या 35 हो चुकी है और इस महामारी के संक्रमण से पीडि़त होने वालों की संख्या बढक़र 1,397 हो गई है। (भाषा)


Date : 01-Apr-2020

जुगल पुरोहित
नई दिल्ली, 1 अप्रैल। विदेश से लौट रहे भारतीयों या कोरोना वायरस से संक्रमित होने के संदिग्ध विदेशियों को लाने-ले जाने, आइसोलेट करने, क्वारंटीन करने, पनाह देने और इलाज करने के लिए भारत सरकार ने काफी पहले ही आर्मी, नेवी और एयरफोर्स की काबिलियत पर भरोसा करते हुए उन्हें इन चीजों की जिम्मेदारी सौंप दी थी। इस काम में इंडो-तिब्बत बॉर्डर पुलिस (आईटीबीपी) को भी लगाया गया था।
क्या इन संस्थानों का इस्तेमाल राष्ट्रीय राजधानी में पैदा हुए प्रवासी मजदूरों के संकट से निबटने में भी किया जा सकता था? अगर ऐसा ही कोई संकट देश के किसी दूसरे हिस्से में पैदा होता है तो क्या ये एक भूमिका निभा सकते हैं?
सरकार किस तरह से आम्र्ड फोर्सेज का इस्तेमाल कर सकती थी?
सेंट्रल रिजर्व पुलिस फोर्स (सीआरपीएफ) के डायरेक्टर जनरल ए।पी माहेश्वरी के मुताबिक, अभी तक इस तरह की कोई चर्चा नहीं हुई है। लेकिन हम इस आइडिया को लेकर ओपन हैं। सीआरपीएफ सबसे बड़ा केंद्रीय आम्र्ड पुलिस फोर्स है। केंद्रीय निर्देशों के अभाव में, हर फोर्स अपने खुद के तरीके से सहयोग करने की कोशिश कर रही है।
मिसाल के तौर पर, सीआरपीएफ ने पूरे देश में अपनी फॉर्मेशंस को लिखा कि वे राज्य सरकारों के संपर्क में रहें और उनकी मदद करें।
प्रवासी मजदूरों के लिए सीआरपीएफ ने ट्रांसपोर्टेशन, लॉजिस्टिक सपोर्ट, टेंट्स लगाने और हाइवे के किनारे जहां फोर्स उन्हें पानी और खाना मुहैया कराने जैसी मदद दे सकती थी, ऐसी चीजों की पहचान की। वो कहते हैं, अभी भी हम अपने कुछ कैंपस में खाना बनाकर ज़रूरतमंदों को खिला रहे हैं। हम प्रोटेक्टिव इक्विपमेंट वितरित कर रहे हैं। हम एक असाधारण वक्त से गुजर रहे हैं और हमें हर मुमकिन मदद की कोशिश करनी चाहिए।
नेशनल डिजास्टर रेस्पॉन्स फ़ोर्स (एनडीआरएफ़) बिहार के कई हिस्सों में प्रवासी मज़दूरों के बोझ को मैनेज करने में राज्य सरकार की मदद कर रही है। इसके डायरेक्टर जनरल एस।एन प्रधान ने कहा, अगर हमसे कहा गया तो हम देश के दूसरे हिस्सों में भी चीजों को संभालने में मदद दे सकते हैं। हम स्टैंडबाई पर हैं।
भारतीय सेना के प्रवक्ता ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी, लेकिन हमने जिन अफसरों से बात की उन्होंने कहा कि आर्मी को मदद करने के लिए कोई रिक्वेस्ट नहीं मिली।
चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ (सीओएएस) जनरल एम एम नरवणे ने हाल में ही कोविड-19 के मसले पर कहा था, जब भी आह्वान किया जाता है तब भारतीय सेना नागरिक प्रशासन की मदद करती है। उन्होंने कहा, आने वाले दिनों में भारतीय सेना में और नागरिक प्रशासन की ओर से मेडिकल सेवाओं की मांग में इजाफा होने की संभावना है। जरूरी निर्देश कमांड हेडक्वार्टर्स को जारी कर दिए गए हैं। हालांकि, सरकार प्रवासी मजदूरों के संकट को पहले से समझ नहीं पाई और इस संबंध में जरूरी कदम उठाए नहीं जा सके।
2013 में उत्तराखंड में बतौर चीफ ऑफ इंटीग्रेटेड डिफेंस स्टाफ राहत कामकाज की निगरानी कर चुके लेफ्टिनेंट जनरल अनिल चैत (रिटायर्ड) कहते हैं, मुझे यह देखकर अचरज हो रहा है कि क्यों प्रवासी मजदूरों की समस्या का पहले से अंदाज़ा नहीं लगाया गया और इसे रोकने के कदम नहीं उठाए गए। हमारा आपदाओं से निबटने का अनुभव है और 2013 में उत्तराखंड में हम कऱीब एक लाख लोगों को निकाल चुके हैं। लेकिन, पीएम के एक बेहतरीन मक़सद से उठाए गए क़दम के खऱाब एग्जिक्यूशन को देखकर मुझे दुख हो रहा है।
नेशनल सिक्योरिटी गार्ड (एनएसजी) के पूर्व डायरेक्टर जनरल और भारतीय पुलिस सेवा (आईपीएस) अफसर रहे रंजन मेधेकर बताते हैं, हमारे पास पूरे देश में मैन-पावर है। यह एक ट्रेंड मैन-पावर है। साथ ही हमारे पास बड़े पैमाने पर ज़मीन भी है जिसका इस्तेमाल फ़ैसिलिटीज लगाने में किया जा सकता है। इनमें हज़ारों लोगों को रखा जा सकता है। यह एक सबक के तौर पर सीखा जा सकता है। केंद्र और राज्यों के बीच संवाद और आम्र्ड फोर्सेज की एक्सपर्टीज के इस्तेमाल से ऐसे संकटों से ज़्यादा अच्छी तरह से निबटा जा सकता है।
देश में डिफ़ेंस मिनिस्ट्री के पास सबसे बड़ा लैंड बैंक है। आर्म्ड फ़ोर्सेज के पास कऱीब 1.6 लाख एकड़ जमीन इसके कैंटोनमेंट इलाक़ों के भीतर मौजूद है। इसके अलावा 16।35 लाख एकड़ ज़मीन इन कैंटोनमेंट्स के बाहर है। इनमें भी आर्मी के पास सबसे ज़्यादा 14.14 लाख एकड़ जमीन है।
आईटीबीपी, सीआरपीएफ़ जैसे दूसरे आम्र्ड पुलिस फोर्सेज के पास देशभर में कैंपस हैं।
नाम न ज़ाहिर करने की शर्त पर सेंट्रल आम्र्ड फोर्सेज के कई अफसरों ने कहा कि अगर इजाजत दी जाए तो वे मदद करना चाहते हैं।
मिसाल के तौर पर, एक सीआरपीएफ अफसर ने कहा, हम हर साल अमरनाथ यात्रा कराते हैं जिसके अपने चैलेंज होते हैं। ऐसे में हमारे पास बड़ी भीड़ को संभालने में विशेषज्ञता है। एक अन्य अफसर ने कहा, केंद्र को राज्यों को इन प्रवासी मजदूरों को मैनेज करने से फ्री कर देना चाहिए। इनकी देखभाल हम कर सकते हैं। (बीबीसी)
 


Date : 01-Apr-2020

नई दिल्ली, 1 अप्रैल। केंद्रीय मंत्री मुख्तार अब्बास नकवी ने निज़ामुद्दीन के तबलीग़ी जमात मरकज़ मामले पर कहा है कि इस जमात ने तालिबानी अपराध किया है, इस आपराधिक काम को माफ़ नहीं किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि तबलीग़ी जमात मरकज़ ने कई लोगों की जान को ख़तरे में डाला।
नक़वी ने मांग की है कि उन लोगों और संगठन के खिलाफ़ कड़ी कार्रवाई की जानी चाहिए जिन्होंने सरकार के निर्देशों का पालन नहीं किया।
ग़ौरतलब है कि दिल्ली के निज़ामुद्दीन में तबलीग़ी जमात का मरकज़ (केंद्रीय मुख्यालय) है। यहां पर मार्च महीने में हुए एक धार्मिक आयोजन की ख़ासी चर्चा है।
इस धार्मिक आयोजन में हज़ारों लोग शामिल हुए थे जिसके बाद देशभर में लागू लॉकडाउन के बावजूद बड़ी संख्या में लोग वहीं रह रहे थे।
इस मरकज़ से निकाले गए कई लोगों मे कोरोना वायरस के लक्षण पाए गए हैं जबकि इस आयोजन से अपने राज्यों में गए कई लोगों की मौत हुई है। (बीबीसी)
 


Date : 01-Apr-2020

इमरान कुरैशी
बेंगलुरु से, 1 अप्रैल । वे चिड़चिड़ा रहे थे और डॉक्टरों पर नाराज हो रहे थे क्योंकि हॉस्पिटल में उन्हें इंटेंसिव केयर यूनिट (आईसीयू) में अलग-अलग रखा गया था।
आखिर में डॉक्टरों को अस्पताल में दो कमरे मिल गए जो कि एक ग्लास पार्टिशन के जरिए अलग-अलग थे, ऐसे में दोनों लोग एक-दूसरे को देख सकते थे। पति की उम्र 90 साल से ज़्यादा है, जबकि उनकी पत्नी 88 साल की हैं। वे दोनों ही कोरोना वायरस से हाल में रिकवर हुए हैं।
कोरोना वायरस 60 साल और उससे ऊपर के लोगों के लिए ज्यादा जोखिम भरा साबित होता है। साथ ही अगर किसी को डायबिटीज या दिल की बीमारी है तो उनके लिए यह बीमारी खतरनाक हो जाती है।
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, उम्र के लिहाज से पति इस वायरस से जंग जीतने वाले दुनिया के दूसरा सबसे उम्रदराज़ शख्स बन गए हैं।
दुनिया भर में यह वायरस हजारों लोगों की जिंदगियां लील चुका है।
कोट्टयम मेडिकल कॉलेज हॉस्पिटल, केरल के रेजीडेंट मेडिकल ऑफिसर डॉ। आर पी रेनजिन ने बीबीसी हिंदी से कहा, इस बीमारी से जीतने वाले सबसे उम्रदराज 96 साल के एक शख्स हैं पिछले 20 दिनों से हम सब उन्हें फादर कहकर बुलाते हैं क्योंकि वे दूसरे सबसे उम्रदराज व्यक्ति हैं।
एक दिन पहले हुए कोविड-19 के टेस्ट में पिता निगेटिव निकले साथ ही उनकी पत्नी जिन्हें पूरा अस्पताल मदर कहता है वे भी निगेटिव निकले।
तीन हफ्ते पहले दोनों को अस्पताल में भर्ती कराया गया था। दोनों को कोरोना वायरस के टेस्ट में पॉजिटिव पाया गया था। दोनों ही अपनी बेटी और दामाद के संपर्क में आए थे। इन्हें इटली कपल कहा जा रहा है क्योंकि वे चार हफ्ते पहले इटली से वापस लौटे थे। एक बड़ी टीम को तैनात कर इन्हें ढूंढा गया। इस अभियान की अगुवाई एक वरिष्ठ आईएएस कर रहे थे। यह अभियान इस वजह से चलाया गया क्योंकि वे एयरपोर्ट पर स्क्रीनिंग से बचकर निकल गए थे।
डॉक्टर रेनजिन ने कहा, जब हमने उन्हें ग्लास पार्टिशन वाले आईसीयू कमरों में रखा तो वे खुश थे। एक दफा तो उन्होंने दूध पीने से मना कर दिया। वे केवल अपना उबला हुआ टैपिओका चाहते थे। वह भी केवल अपने खेत का। वह अपने इलाके के मशहूर किसान हैं। उनकी इस डिमांड से डॉक्टर आश्चर्यचकित थे।
डॉक्टर रेजिन ने कहा, इसके बाद उनके रिश्तेदार इसे रन्नी में उनके घर से लेकर आए जो कि करीब 60 किमी दूर है। हमें इसकी इजाजत देनी पड़ी क्योंकि ऐसे मामलों में मरीजों को खुश रखना भी जरूरी होता है। हमें उनके निर्देश मानने होते थे।
लेकिन, एक मौके पर पिता की कंडीशन में गिरावट आने लगी और उन्हें वेंटीलेटर पर रखना पड़ा। उनकी हालत में 24 घंटे बाद सुधार आया और उन्हें वेंटीलेटर से हटा लिया गया। इसके बाद डॉक्टरों और नर्सों को उनके बेड से रोके रखने में काफी मुश्किलें आईं।
डॉक्टर रेनजिन ने कहा, वे हमेशा बेड से उतरकर वॉक करना चाहते थे। मां बैठ जाती थीं और बेड से उतर जाना चाहती थीं। इसका मतलब है कि हमें हमेशा उनके कमरे में एक नर्स रखनी होती थी। हॉस्पिटल को एक नर्स और सपोर्ट स्टाफ हर चार घंटे में बदलना पड़ा। इसका मतलब था कि एक दिन में छह नर्सें बदलना।
डॉक्टर रेनजिन बताते हैं, आईसीयू में मास्क और दूसरे मेडिकल इक्विपमेंट्स की वजह से साफ देख नहीं पाते थे, लेकिन वे आवाज सुनकर नर्स को पहचान लेते थे। एक नर्स गाना गाती थी और वे जोर देते थे कि वह पिछले दिन जैसा गाए।
दूसरी ओर, मदर कुछ शांत रहती थीं। वह देर तक लेटी नहीं रह सकती थीं। वह उठ जाती थीं और खड़ी हो जाती थीं।
डॉक्टर कहते हैं, फिर हमें उन्हें समझाना पड़ता था और बताना होता था कि उन्हें बेड पर रहना चाहिए। हमारे लोग उनसे लगातार बात करते रहते थे।
डॉक्टर रेनजिन कहते हैं, वास्तविकता यह है कि फादर हमें जो चीजें सुनाते थे वे आश्चर्यजनक कहानियां थीं। वे जो बातें बताते थे उन्हें सार्वजनिक नहीं किया जा सकता, लेकिन हम शायद कभी उन पर कोई किताब लिख पाएं। उनके ग्रैंड-सन-इन-लॉ भी अपनी पत्नी और बच्चे के साथ वहां मौजूद थे।
उन्होंने बीबीसी हिंदी को बताया, डॉक्टरों और हॉस्पिटल स्टाफ ने उनका इलाज बेहद अच्छे से किया। वह अपनी खुद की डाइट और उबले हुए टैपिओका को खाने के लिए अड़े हुए थे। उनकी पोती, ग्रैंड-सन-इन-लॉ और ग्रेट-ग्रैंड डॉटर को दो दिन पहले ही अस्पताल से डिस्चार्ज किया गया है।
बेटी और दामाद उम्रदराज कपल हैं और उन्हें सोमवार को हॉस्पिटल से डिस्चार्ज किया गया है। इस उम्रदराज कपल को हॉस्पिटल से आज डिस्चार्ज किया जाना चाहिए था। लेकिन, मेडिकल बोर्ड के साथ दो मीटिंग्स के बाद उन्हें गैर-एसी वाले माहौल में रखने का फैसला किया गया ताकि वे घर जाने से पहले इससे रूबरु हो जाएं।
डॉ. रेनजिन ने कहा, केवल मेडिकल वजहों से हम उन्हें कुछ दिनों के लिए रख रहे हैं। उन्हें एक घंटे का सफर तय करके अपने घर पहुंचना है और हम चाहते हैं कि वे अगले 14 दिनों तक किसी से न मिलें।(बीबीसी)
 


Date : 01-Apr-2020

कमलेश
नई दिल्ली, 1 अप्रैल । हमारे आस-पास खाना नहीं मिल रहा है। घर में बनाने के लिए कुछ नहीं हैं। अगर कहीं रैन बसेरे में मिल भी रहा है तो वो घर से बहुत दूर है। लॉकडाउन में इतनी दूर कैसे जाएं?
नोएडा में सेक्स वर्कर का काम करने वालीं ट्रांसजेंडर आलिया लॉकडाउन के दौरान ऐसी ही कई दिक्कतों से गुजर ही हैं। उनके पास कमाने का जरिया नहीं बचा और अब खाने, किराए की चिंता सता रही है। कोरोना वायरस से संक्रमण के कारण फिलहाल पूरे भारत में 21 दिन का लॉकडाउन लगा हुआ है।
इस बीच मजदूरों और कामगारों की तरह ट्रांसजेंडर कम्युनिटी के सामने भी रोजी-रोटी के संकट खड़ा हो गया है। हालांकि उनकी समस्या विकट है।
आलिया बताती हैं, हमारे काम के बारे में पुलिसवाले जानते हैं। हम बाहर निकलते हैं तो उन्हें लगता है कि अपने काम के लिए ही निकल रहे हैं। इसलिए वो हमें टोक देते हैं। ऐसे में हमारी कमाई बंद हो गई है। हम आपस में पैसे इक_े करके गुजारा कर रहे हैं। हमारा किराया ही पांच हजार रूपये है तो अगले कुछ महीनों में उसे कैसे चुकाएंगे?
बिहार की रहने वाली सोनम टोला बधाई का काम करती हैं। वो हाल में अपने गांव से लौटी हैं। वो कहती हैं कि लॉकडाउन के बाद अब उन्हें अपनी ही नहीं बल्कि पूरे परिवार की चिंता है।
सोनम कहती हैं, बिहार में मेरे मां-बाप रहते हैं और मैं ही उनका खर्चा चलाती हूं। अभी मैं गांव से होकर आई हूं। वहां काफी खर्चा हो गया। सोचा था यहां आकर कमा लूंगी लेकिन अब तो सब बंद हो गया है। आगे अपने घर में क्या भेजूंगी ये समझ नहीं आता। कुछ पैसे बचे हैं वो दुख-बीमारी के लिए रखे हुए हैं। वरना उसमें हमारी कौन मदद करेगा? कोरोना से मरें ना मरें लेकिन बिना काम के घर पर रहकर ज़रूर मर जाएंगे।
सोनम कहती हैं कि उन्होंने कोशिश की थी लेकिन राशन कार्ड नहीं बन पाया। इस कारण फिलहाल राशन की सरकारी मदद उन्हें नहीं मिल सकती है। वह अपने दोस्तों से मांगकर गुज़ारा कर रही हैं लेकिन उन्हें डर है कि जब उधार भी नहीं मिला तो वो क्या करेंगी।
ट्रांसजेंडर्स के लिए काम करने वाली स्वंयसेवी संस्था बसेरा की संयोजक रामकली बताती हैं कि इस वक्त कई ट्रांसजेंडर्स बेरोजग़ारी और खाने की कमी से जूझ रहे हैं।
वो बताती हैं, मेरे पास मदद के लिए रोज कई फोन आते हैं। हमारे समुदाय में ज़्यादातर लोग वहीं हैं जो रोज कमाते और खाते हैं। अब उनकी कमाई होनी बंद हो गई है तो पैसा कहां से आएगा। उनका अपना घर नहीं है। वो किराए पर रहते हैं तो किराया भी चुकाना ही होगा।
हम लोगों की सबसे बड़ी दिक्कत ये है कि हमारे पास ना तो परिवार का सपोर्ट होता है और ना ही प्यार। लोगों के पास परिवार का सहारा तो होता है। अपने जेंडर के कारण घर से दुत्कारे जा चुके हैं, समाज से त्यागे जा चुके हैं तो बुरे वक़्त में हमारी मदद कौन करेगा? मजदूर अपने घरों की तरफ जा रहे हैं लेकिन हम कहां जाएं?
दिल्ली के रहने वाले आकाश पाली ने पहले ट्रांसजेंडर होने का दंश झेला और अब वो लॉकडाउन में लगे प्रतिबंधों की मार झेल रहे हैं।
आकाश पाली ने अपना जेंडर बदलकर खुद को एक पुरुष की पहचान दी थी। वो एक पार्लर में काम करते थे लेकिन कुछ दिनों पहले ही उनकी नौकरी छिन गई।
आकाश पाली ने बताया, जब मेरे ऑफिस वालों को पता चला कि मैं ट्रांसजेंडर हूं तो मुझे नौकरी से निकाल दिया गया। ये लॉकडाउन से कुछ ही दिन पहले हुआ था। तब मैं कहीं बाहर गया था। जब लौटा तो कुछ दिन बाद लॉकडाउन ही लग गया। अब वो कंपनी वाले मेरे बचे हुए पैसे भी नहीं दे रहे हैं।
मेरे पास कमाने का कोई और जरिया भी नहीं। कुछ पैसे मैंने जमा किए थे लेकिन घरवालों को ज़रूरत पड़ी तो उन्हें दे दिए। मुझे लगा था कि शायद मेरी मदद के बाद वो मुझे अपना लेंगे। लेकिन, ऐसा नहीं हुआ। अब मैं अकेला रह गया हूं और घर चलाने के लिए उधार मांग रहा हूं। मकान मालिक भी किराया मांगने के लिए आया था।
दिल्ली सरकार ने बेघरों के लिए रैन बसेरा और कई स्कूलों में खाने की व्यवस्था की है। कई लोग वहां जाकर मदद ले रहे हैं।
इस सुविधा को लेकर आकाश कहते हैं कि सरकार ने सुविधा तो दी है लेकिन हमारा वहां पहुंचकर खाना आसान नहीं है। लोग हमें अच्छी निगाह से नहीं देखते। कुछ दिन पहले बाहर निकलने पर पुलिस टोकने लगी कि तुम लोग अब कहां जा रहे हो। खान खाने जाओ तो बहुत लंबी लाइन होती है और फिर लोग हमें ही घूरकर देखते हैं।
रामकली कहती हैं कि ट्रांसजेडर्स के साथ एक बड़ी समस्या ये है कि उनके अपने समुदाय के बाहर बहुत ही कम दोस्त होते हैं। जब इस समुदाय के कई लोग खुद बेरोजगार हो गए हैं तो वो एक-दूसरे की मदद करें कैसे। वह कहती हैं कि परिवार से अलग होने के कारण उनके पूरे दस्तावेज नहीं होते, जैसे आधार कार्ड, राशन कार्ड और कुछ के पास तो वोटर कार्ड भी नहीं होते।
समुदाय के कई लोग टोला बधाई का काम करते हैं जिसमें वो लोग किसी के घर में शादी, बच्चा होने या कोई शुभ काम होने पर गाने-बजाने के लिए जाते हैं। इस तरह के आयोजनों से ही उनकी आय होती है।
हैदराबाद की फिजा जान भी टोला बधाई का काम करती हैं। वो अपने टोला की गुरु हैं। फिलहाल सभी के सामने कमाने का संकट बना हुआ है।
फिजा जान कहती हैं, हमारा पूरा टोला खाली बैठा है। हमारे पास ना खाने को कुछ है और ना किराया देने के लिए पैसे हैं। पहले तो हमें कई बार आटा-चावल मिलता था तो हम ज़रूरतमंदों में बांट देते थे। अब तो हमें खुद जरूरत पड़ गई है। कुछ लोग कहते भी हैं कि हमारी मदद करेंगे पर फिर कुछ नहीं होता।
रामकली बताती हैं कि कुछ दिनों पहले एक राजनीतिक पार्टी से जुड़े एक शख्स ने ट्रांसजेंडर्स के लिए राशन देने का वादा किया था। उन्होंने संस्था से जुड़े सभी लोगों को बता भी दिया कि मदद आने वाली है लेकिन उस शख्स ने अभी तक कोई मदद नहीं की है।
वह सवाल करती हैं कि कोरोना वायरस महामारी की मुश्किल घड़ी में अलग-अलग वर्गों के बारे में सोचा जा रहा है तो हमारे लिए क्यों नहीं। वर्ष 2011 की जनगणना के मुताबिक भारत में ट्रांसजेंडर्स की संख्या 49 लाख के करीब है। पिछले साल उनके अधिकारों को ध्यान में रखते हुए ट्रांसजेंडर पर्सन्स (प्रोटेक्शन ऑफ़ राइट्स) एक्ट, 2019 बनाया गया था। हालांकि, ट्रांसजेंडर कम्यूनिटी की इस कानून के प्रवाधानओं पर कई आपत्तियां हैं।
ट्रांसजेंडर इस समुदाय की मांग रही है कि उन्हें अपनी पहचान तय करने की आजादी हो और अन्य लोगों की तरह ही सम्मान व अधिकार मिलें। वहीं, भारत में कोरोना वायरस के मामले भी बढ़ते जा रहे हैं। यहां कोरोना वायरस से संक्रमित लोगों की संख्या एक हजार से ज़्यादा हो चुकी है और 27 लोगों की मौत हो चुकी है।(बीबीसी)
 


Date : 01-Apr-2020

मोहर सिंह मीणा
राजस्थान से, 1 अप्रैल। राजस्थान में कोरोना वायरस के पॉजिटिव मामले बढ़कर 30 मार्च तक 83 पहुंच गए हैं। राज्य और जिलों की सभी सीमाएं सील हैं और कई इलाक़ों में कफ्र्यू लगा दिया गया है। देश में लॉकडाउन के दौरान भी मीडिया पर सख्ती नहीं की गई और कफ्र्यू पास भी जारी किए हैं।
लेकिन अब भीलवाड़ा राजस्थान का ही नहीं बल्कि देश का एकमात्र ऐसा जिला होगा, जहां मीडिया कर्मियों को बैन किया जाएगा, कफऱ््यू में जारी पास भी रद्द किए जाएंगे। किसी के भी बाहर निकलने पर पूर्णरूप से पाबंदी लागू की जाएगी।
जिला कलेक्टर राजेंद्र भट्ट ने बीबीसी को बताया, तीन से 13 अप्रैल तक पूर्णरूप से सब कुछ बंद रहेगा। अगले 10 दिन भीलवाड़ा के लिए बहुत अहम हैं। मीडियाकर्मी और एनजीओ भी बैन रहेंगे। जरूरी सामानों की दुकान और सभी कुछ बंद रहेगा। सबको मना कर दिया गया है। हम बैरिकेडिंग की तैयारी कर रहे हैं। पुलिस व्यवस्था रहेगी, फिर भी जरूरत पड़ी तो सेना की टुकड़ी बुला सकते हैं।
राजस्थान के भीलवाड़ा में सर्वाधिक पॉजि़टिव मामले होने के कारण यहां 20 मार्च से ही कफऱ््यू लगा हुआ है। जि़ले की सीमाएं सील होने के साथ ही धारा 144 लागू है। लेकिन अब 3 से 13 अप्रैल तक प्रशासन और अधिक सख्ती करने जा रहा है।
भीलवाड़ा के एक निजी बांगड़ अस्पताल के एक डॉक्टर से फैलना शुरू हुआ कोरोना अब पूरे जिले के लिए खतरा बन गया है। दो हजार मेडिकल टीमों से जिलेभर के लोगों की स्क्रीनिंग कराई गई है।
राजस्थान में 30 मार्च तक कोरोना के 79 मामले सामने आए हैं और अब तक 17 पॉजिटिव मरीज ठीक भी हो चुके हैं।
अकेले भीलवाड़ा से मिले 26 पॉजिटिव मामलों में 11 मरीजों के इलाज के बाद कोविड-9 रिपोर्ट निगेटिव आई है। लेकिन प्रशासन को अब भी बड़ी संख्या में पॉजिटिव मामले आने की आशंका सता रही है, जिसके चलते और सख़्ती की जा रही है।
भीलवाड़ा में कोरोना के कारण नारायण सिंह और सुवालाल जाट की मौत भी हो चुकी है। हालांकि डॉक्टर्स ने इनकी मौत का कारण अन्य बीमारियां भी बताया है।
अजमेर रेंज के इंस्पेक्टर जनरल ऑफ़ पुलिस (आईजी) हवा सिंह घुमारिया ने भीलवाड़ा में 3 से 13 अप्रैल तक की सख़्ती के सवाल पर कहा, कलेक्टर और एसपी को लग रहा है कि हमें कफऱ््यू और बढ़ाना है तो हम उनके फ़ैसले को सपोर्ट करेंगे।
आईजी घुमारिया का कहना है, डीम ने कहा है तो हम उसको इंपोज करेंगे। जितना वहां स्ट्रिक्ट किया है उसके परिणाम भी आ रहे हैं, हम कम्युनिटी स्प्रेडिंग को रोके हुए हैं। वर्ना स्थिति और खऱाब हो सकती है।
भीलवाड़ा के ग्रामीण इलाकों में लोगों को खाद्य सामग्री नहीं मिलने की शिकायतें भी आ रही हैं। लोगों की शिकायत है कि पिछले 8 दिन में जो बचा था सब खत्म हो गया है। अब उनके पास खाने के लिए कुछ नहीं है।
असल में यहां ग्रामीण इलाकों में मजदूर वर्ग के लोग अधिक हैं। लॉकडाउन और धारा 144 लागू होने के कारण इनके पास काम नहीं है और खाने के लिए पैसे भी नहीं बचे हैं। ऐसे में इन मज़दूरों के लिए आने वाले समय में बिना खाद्य सामग्री के यह पाबंदी भारी पड़ सकती है।
बिजौलिया ब्लॉक के सुखपुरा गांव के निवासी महेंद्र का कहना है, हमारे गांव और आस पास के कई गांव में अधिकतर दिहाड़ी मजदूर हैं, इनको कई दिन से खाना नहीं मिला है। लोगों के पास काम न होने से अब संकट हो गया है।
बिजौलिया के ब्लॉक विकास अधिकारी महेश चंद मान ने बताया, हम खाने की व्यवस्था करा रहे हैं। सभी गांवों में एक-एक व्यक्ति नियुक्त किया गया है, जो सूचना देता है कितने लोगों को खाना देना है। हम यहां से खाद्य सामग्री वाले पैकट भी गांवों तक भिजवा रहे हैं।
बीडीओ मान ने कहा कि, कुछ लोगों की इस संबंध में ऑनलाइन शिकायत मिली थी, जिसकी जांच के बाद सुविधा दी गई है। लोगों के लिए खाने की व्यवस्था करने के लिए एक समिति बनाई गई है जिसमें गांव, पंचायत और ब्लॉक स्तर पर लोगों की ड्यूटी लगाई गई है।
राजस्थान के चिकित्सा एवं स्वास्थ्य मंत्री रघु शर्मा ने बीबीसी को बताया, हमने भीलवाड़ा में संक्रमण को कंट्रोल किया है। 28 लाख लोगों की स्क्रीनिंग की है, ताकि कम्युनिटी स्प्रेड को रोका जाए। भीलवाड़ा के कुछ कोरोना पॉजिटिव मरीज इलाज से ठीक भी हुए हैं।
मंत्री शर्मा का कहना है कि पूरे राज्य में 3 करोड़ 26 लाख लोगों की स्क्रीनिंग की जा चुकी है और अगले 3 दिन में बाकी बचे लोगों की स्क्रीनिंग करने का मैकेनिज्म मुख्यमंत्री अशोक गहलोत को सजेस्ट किया गया है।
राजस्थान स्वास्थ्य विभाग के अतिरिक्त मुख्य सचिव रोहित कुमार सिंह ने बताया, इस बीमारी का एक ही इलाज है सोशल डिस्टेंसिंग और कंटेनमेंट। हमने 14 हजार लोग इंफ्लुएंजा लाइक इलनेस की कैटेगरी में आईडेंटिफाई किया है। अब हमें मालूम है कि कहां फोकस करना है।
क्वारंटाइन में रखे गए भीलवाड़ा के 6445 लोगों की मोबाइल ऐप से निगरानी भी की जा रही है। लोगों को इस ऐप पर रोजाना स्थिति अपडेट करनी होती है। क्वारंटीन शख्स या घर का कोई और सदस्य बाहर निकलता है तो कंट्रोल रूम को इसकी जानकारी मिल जाती है।
क्यों जरूरी है ज़्यादा सख्ती
हाल ही में गुजरात से पलायन कर 50 हजार से ज्यादा मजदूर राजस्थान के डूंगरपुर, बांसवाड़ा, भीलवाड़ा समेत अन्य जिलों में पहुंचे हैं।
पहले से ही संक्रमित लोगों के संपर्क या बाहर से आए लोगों में किसी के संक्रमित होने पर अन्य लोग संक्रमित न हो जाएं। इसलिए प्रशासन कड़े कदम उठा रहा है।
एसीएस रोहित सिंह ने बताया, बाहर से आए लोगों की लिस्ट हमारे पास है, कौन कहां आया है, 90 प्रतिशत लोगों की जानकारी हमारे पास है। हम निगरानी रख रहे हैं।
महात्मा गांधी मेडिकल कॉलेज और अस्पताल के प्रिंसिपल डॉ अरुण गौड़ का कहना है, जो भी बांगड़ अस्पताल के कॉन्टैक्ट में रहे हैं, उन मरीज़ों को हम ट्रेस कर सैंपलिंग करा रहे हैं। अब तक 900 लोगों की सैंपलिंग की जा चुकी है। सोशल डिस्टेंसिंग न होने से अगले 14 दिनों में और लोग संक्रमित न हो जाएं इसलिए प्रशासन की ओर से ऐसे क़दम उठाए जा रहे हैं।
कलेक्टर राजेंद्र भट्ट ने कहा, हमने भीलवाड़ा में 20 मार्च से कफ्र्यू लगाया है, जिसे 3 अप्रैल को 14 दिन हो रहे हैं। जिनमें लक्षण नहीं थे, उनमें इन 14 दिन के अंदर लक्षण आ गए हैं, जैसे बांगड़ अस्पताल से मिला पॉजिटिव मामला। लेकिन अगर उनसे कोई संक्रमित हुए होंगे तो उनमें अगले 14 दिन में लक्षण आ जाएंगे।
ऐसे संक्रमित लोगों को आईसोलेट कर चेन ब्रेक करेंगे तो वायरस पर काबू हो सकेगा। हमारा मक़सद चेन ब्रेक करना है।
बांगड़ अस्पताल से मिले कोरोना पॉजिटिव डॉक्टर और स्टाफ के संपर्क में आए कऱीब 5 हज़ार लोगों में से सभी की जांच अब तक नहीं हो पाई है।
कोरोना का संक्रमण सबसे पहले बांगड़ अस्पताल के एक डॉक्टर को हुआ जो सऊदी अरब से आए अपने मित्र से मिले थे। संक्रमित डॉक्टर ने अस्पताल में लगातार कई दिनों तक मरीज़ों का इलाज किया।
कोरोना की जांच के दौरान इसी अस्पताल से जुड़े 24 पॉजिटिव मामले सामने आए। इसमें डॉक्टर, स्टाफ़ और यहां इलाज करा रहे मरीज़ शामिल हैं।
राज्य में 30 मार्च तक पॉजिटिव लोगों का आंकड़ा 79 पहुंच गया है। पिछले 24 घंटे में यहां 20 पॉजिटिव मामले मिले, इनमें ईरान से लाए गए लोगों में से 7 पॉजिटिव मामले भी शामिल हैं।
जयपुर में पिछले दिनों पॉजिटिव मिले 35 वर्षीय युवक के परिवार के 8 लोग कोरोना पॉजिटिव पाए गए हैं। इसके साथ ही अजमेर में भी एक ही परिवार के 4 लोग पॉजिटिव मिले हैं। हालांकि लगातार पॉजिटिव मिल रहे भीलवाड़ा से 1 ही मामला मिला है और यहां अब तक 11 की रिपोर्ट नेगेटिव आई है।
राजस्थान में इलाज के बाद 4 लोगों को डिस्चार्ज भी कर दिया गया है। जबकि अभी राज्य में 444 सैंपल जांच की रिपोर्ट आना बाक़ी है।(बीबीसी)


Date : 01-Apr-2020

महाराष्ट्र, 1 अप्रैल। कोरोना वायरस संकट के चलते अर्थव्यवस्था में मंदी गहराने की आशंकाओं के बीच महाराष्ट्र सरकार ने एक बड़ा ऐलान किया है। सरकार ने अगले पांच साल तक बिजली की दरों में 20 फीसदी तक की कटौती कर दी है। उसने यह फैसला कोरोना वायरस के चलते पैदा हुए हालात से निपटने में कारोबारियों और आम लोगों की मदद करने के लिए किया है।
इस कटौती में सबसे ज्यादा फायदा महाराष्ट्र के उद्योग जगत को दिया गया है जबकि किसानों को सबसे कम। औद्योगिक इकाइयों के लिए यह कटौती 18 से 20 फीसदी तक है जबकि किसानों के लिए महज एक फीसदी। आवासीय इकाइयों के लिए यह आंकड़ा 10-11 फीसदी है। सरकार ने लोगों से यह अपील भी की है कि वे ऊर्जा की बर्बादी न करें।
कोरोना वायरस के चलते देश में 21 दिनों का लॉकडाउन है। इस दौरान जरूरी सेवाओं को छोड़कर सभी प्रतिष्ठान बंद हैं। माना जा रहा है कि इस संकट के चलते अर्थव्यवस्था को बड़ी चोट लगनी तय है। केंद्र सरकार और आरबीआई भी बीते दिनों इससे निपटने के लिए कई बड़े ऐलान कर चुके हैं। (सत्याग्रह)
 


Date : 01-Apr-2020

अभय शर्मा
नई दिल्ली, 1 अप्रैल। दुनिया भर में कोरोना वायरस संकट के बीच विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्लूएचओ) ने सिगरेट पीने वालों के लिए विशेष चेतावनी जारी की है। संस्था ने कहा है कि जब तक कोरोना वायरस का प्रकोप बना हुआ है, तब तक सिगरेट पीने और तंबाकू का सेवन करने वालों को अपनी यह आदत छोड़ देनी चाहिए। डब्लूएचओ से जुड़े विशेषज्ञों का कहना है कि धूम्रपान करने वालों को कोरोना वायरस संक्रमण से ज्यादा खतरा है।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों की मानें तो तंबाकू और धूम्रपान से श्वसन प्रणाली, सांस की नली और फेफड़ों को भारी नुकसान पहुंचता है। इससे टीबी, फेफड़ों के कैंसर सहित तमाम ऐसे रोग होते हैं जिनमें फेफड़े कमजोर हो जाते हैं और सांस लेने में परेशानी होती है। चंडीगढ़ के फोर्टिस अस्पताल के स्वास्थ्य विशेषज्ञ डॉ हरमिंदर सिंह पन्नू एक समाचार पत्र से बातचीत में कहते हैं कि कोरोना वायरस (कोविड-19) मुख्य रूप से इंसान की श्वसन प्रणाली पर ही असर करता है। एक स्टेज आने पर कोरोना के मरीजों को सांस लेने में भी काफी परेशानी होती है। डॉ हरमिंदर के मुताबिक पहले से ही खराब श्वसन तंत्र पर जब कोई (जानलेवा) वायरस हमला करेगा तो स्थिति गंभीर होनी ही है।
कोरोना वायरस फेफड़ों के लिए कितना खतरनाक है इसका असर हाल में आयी एक रिपोर्ट से भी लगता है। हांगकांग में कोरोना संक्रमित लोगों का इलाज कर रहे डॉक्टरों ने पाया है कि हर तीन में से दो ठीक होने वाले रोगियों के फेफड़ों की कार्य क्षमता 20-30 फीसदी तक कम हो गई।
चीन में हाल ही में हुए एक रिसर्च से भी यह पता चलता है कि जिन लोगों को तंबाकू, सिगरेट या अन्य किसी वजह के चलते सांस संबंधी परेशानियां हुई थीं, उनमें कोरोना वायरस संक्रमण ज्यादा तेजी से खतरनाक स्थिति में पहुंच गया। यह रिसर्च करीब 56 हजार कोरोना संक्रमित लोगों पर किया गया था। इस अध्ययन में यह भी सामने आया कि सामान्य व्यक्ति की तुलना में ब्लड प्रेसर, टीबी, कैंसर और मधुमेह के रोगियों में कोरोना वायरस के लक्षण ज्यादा तेजी से फैले।
सिगरेट और तंबाकू को दिल की बीमारियों के प्रमुख कारणों में गिना जाता है। कुछ अध्ययनों में यह भी सामने आया है कि कोरोना वायरस के जिन मरीजों को दिल की बीमारियां थीं, उनमें कोविड-19 के लक्षण तेजी से गंभीर स्थिति में पहुंच गए और मौत का खतरा बढ़ गया। हालांकि, अभी तक कोई ऐसा रिसर्च नहीं हुआ है जिससे हृदय रोग और कोरोना वायरस संक्रमण के बीच सटीक संबंध होने का पता लग सके। लेकिन, कई रिसर्च से यह बात साफ हो चुकी है कि कोरोना वायरस (कोविड-19 या सार्स कोव-2 वायरस) पिछले सालों में सामने आये 'मार्स-कोवÓ और 'सार्स-कोवÓ वायरसों की फैमिली का ही हिस्सा है। 'मार्स-कोवÓ और 'सार्स-कोवÓ के मामले में प्रमाणित हो चुका है कि ये दोनों वायरस दिल के मरीज को ज्यादा नुकसान पहुंचाते हैं। चूंकि तंबाकू और सिगरेट दिल की हालत खराब करते हैं इसलिए उनका सेवन करने वालों को कोरोना वायरस का खतरा भी ज्यादा है।
डब्लूएचओ से जुड़े स्वास्थ्य विशेषज्ञ एक और बात बताते हैं। ये लोग कहते हैं कि धूम्रपान के दौरान लोगों की उंगलियां बार-बार उनके होठों के संपर्क में आती हैं। इससे भी संक्रमण होने का खतरा बढ़ जाता है। हुक्के या चिलम के मामले में संक्रमित होने का डर और भी ज्यादा हो जाता है क्योंकि एक ही हुक्के या चिलम से कई लोग धूम्रपान करते हैं।
यहां पर एक बात और कही जा सकती है। पिछले कुछ दिनों से लॉकडाउन होने के चलते भारत और पूरी दुनिया में वायु प्रदूषण काफी कम हो गया है। दिल्ली जैसे शहरों में इसे सबसे ज्यादा महसूस किया जा सकता है। प्रदूषण का संबंध भी श्वास और फेफड़ों से संबंधित बीमारियों से होता है और कहा जाता है कि दिल्ली में रहने वाला हर व्यक्ति हर रोज कई सिगरेटों के बराबर प्रदूषण की मार झेलता है। इसलिए यह भी कहा जा सकता है कि लॉकडाउन न केवल कौरोना वायरस के फैलाव को रोकने में मदद करता है बल्कि इससे संक्रमित होने पर उसकी गंभीरता को कम करने में भी मददगार साबित हो सकता है। (सत्याग्रह)
 


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