ताजा खबर

संसद में पेश कृषि विधेयक का छत्तीसगढ़ में भी विरोध
18-Sep-2020 5:44 PM
 संसद में पेश कृषि विधेयक   का छत्तीसगढ़ में भी विरोध

किसान सडक़ पर उतरने की तैयारी में 

  कहा-खेती बर्बाद हो जाएगी, किसान आत्महत्या के लिए मजबूर होंगे  

‘छत्तीसगढ़’ संवाददाता
रायपुर, 18 सितंबर।
केंद्र सरकार द्वारा संसद में कल पेश कृषि विधेयक का यहां भी विरोध होने लगा है। किसान नेताओं ने कहा है कि इससे खेती बर्बाद हो जाएगी और किसान सडक़ पर आ जाएंगे। उन्हें न्यूनतम समर्थन मूल्य भी नहीं मिल पाएगा। बस, मजदूर बनकर खेती करेंगे और अपनी उपज को औने-पौने दाम पर कार्पोरेट सेक्टर को बेचने मजबूर होंगे। उन्होंने कहा है कि प्रदेश में सभी किसान संगठन इस पर चर्चा कर विरोध-प्रदर्शन की रणनीति बना रहे हैं। 

‘छत्तीसगढ़’ ने संसद में पेश कृषि विधेयक पर यहां के कुछ किसान नेताओं से चर्चा कर उनकी प्रतिक्रिया जानने का प्रयास किया। किसान नेता संकेत ठाकुर ने अपनी प्रतिक्रिया में कृषि विधेयक का विरोध करते हुए कहा कि केंद्र सरकार जो विधेयक लेकर आई है, वह मूलत: किसानों को बाजार के हवाले करने का प्रयास है। किसान, सालभर खेती करेंगे, पर अपनी उपज का दाम खुद तय नहीं कर पाएंगे। कार्पोरेट सेक्टर दाम तय कर कम से कम में उनकी उपज की खरीदी करेंगे। ऐसे में वाजिब दाम न मिलने से किसान बदहाल हो जाएंगे। आज यहां सब्जी-फल वाले किसान बर्बाद हो गए हैं। राज्य सरकार धान का 25 हजार रुपये समर्थन मूल्य न दे, तो यहां भी किसानों की हालत खराब होने लग जाएगी।
 
उन्होंने आरोप लगाते हुए कहा कि केंद्र की भाजपा सरकार, खेती को उद्योगपतियों के हवाले करने के प्रयास में शुरू से जुटी हुई है। इससे सरकार की समर्थन मूल्य की बाध्यता खत्म हो जाएगी, लेकिन किसानों को बड़ा नुकसान होगा। विधेयक का संसद में विरोध हुआ है। यहां भी किसान संगठन एकजुट होकर ऐसे विधेयक का विरोध करेंगे। उन्होंने कहा है कि भाजपा सरकार खेती को तबाह करने के प्रयास में लगी है। आज कोरोना के चलते मौका मिलते ही विधेयक पेश कर दिया गया, ताकि किसानों का कहीं कोई ज्यादा कुछ विरोध न हो पाए।
 
किसान नेता संजय पराते ने भी संसद में पेश कृषि विधेयक का विरोध किया है। उन्होंने कहा है कृषि संबंधी तीन अध्यादेशों को इस संसद सत्र में कानून का रूप दिया जा रहा है। हमारे देश की कृषि व्यवस्था के तीन महवपूर्ण पहलू है-उत्पादन, व्यापार और वितरण। ये अध्यादेश न्यूनतम समर्थन मूल्य और सार्वजनिक वितरण प्रणाली की वर्तमान व्यवस्था को ध्वस्त करते हैं। उत्पादन के क्षेत्र में ठेका कृषि लाने से किसान अपनी ही जमीन पर गुलाम हो जाएगा और देश की आवश्यकता के अनुसार और अपनी मर्जी से फसल लगाने से वंचित हो जाएगा। कृषि व्यापार के क्षेत्र में मंडी कानून के निष्प्रभावी होने और निजी मंडियों के खुलने से वह समर्थन मूल्य से वंचित हो जाएगा।
 
अध्यादेशों में इस बात का भी प्रावधान किया जा रहा है कि कॉर्पोरेट कंपनियां जिस मूल्य को देने का किसानों को वादा कर रही है, बाजार में भाव गिरने पर वह उस मूल्य को देने या किसान की फसल खरीदने को बाध्य नहीं होगी। यानी जोखिम किसान का और मुनाफा कार्पोरेटों का! सरकार धीरे-धीरे किसान का अनाज खरीदना बंद कर देगी और सार्वजनिक वितरण प्रणाली ध्वस्त हो जाएगी। आवश्यक वस्तु अधिनियम के दायरे से अनाज को बाहर करने से जमाखोरी, कालाबाजारी और मुनाफाखोरी बढ़ेगी।
 
कुल मिलाकर, ये तीनों अध्यादेश कार्पोरेटों के लिए एक पैकेज बनाते हैं और यह किसानों, उपभोक्ताओं और आम नागरिकों के हितों के खिलाफ जाता है। इससे हमारी खाद्यान्न आत्मनिर्भरता खत्म होती है, खेती-किसानी के घाटे का सौदा बनने से किसानों का जमीन से अलगाव बढ़ता है। इससे किसान आत्महत्याओं में और ज्यादा वृद्धि होगी। इन अध्यादेशों के जरिए सरकार कृषि के क्षेत्र में अपनी जिम्मेदारियों से छुटकारा पाना चाहती है। पूरे देश के किसान इसका विरोध कर रहे हैं और 25 सितम्बर को विरोध-प्रदर्शन करेंगे।

किसान नेता राजकुमार गुप्ता ने कहा है कि केंद्र की भाजपा सरकार शुरू से इस कृषि विधेयक को लाने के प्रयास में लगी थी। संसद में पेश इस विधेयक से आगे देश के किसान बर्बाद हो जाएंगे। उनकी खेती पर कार्पोरेट का कब्जा हो जाएगा। यह स्थति पहले गुजरात में बन चुकी है और सैकड़ों मामले कोर्ट में लंबित हैं। उन्होंने कहा कि कृषि विधेयक का सीधा असर छत्तीसगढ़ में कम, लेकिन पंजाब, हरियाणा, यूपी और राजस्थान के किसानों पर पहले होगा। क्योंकि  वहां के किसान अपनी उपज मंडियों में बेचते हैं।
 
उन्होंने मोदी सरकार पर आरोप लगाते हुए कहा कि उनका यह विधेयक किसानों की जमीन छीनने का प्रयास है। मुनाफाखोरी के चलते किसानों के उपज की खरीदी कम से कम दाम पर होगी। विधेयक में इसका कहीं रोक का प्रावधान भी नहीं है। छत्तीसगढ़ में फिलहाल किसान अपनी उपज सहकारी सोसायटियों के माध्यम से बेच रहे हैं और उन्हें ढाई हजार रुपये समर्थन मूल्य मिल रहा है। विधेयक का असर यहां के किसानों पर फिलहाल कम होगा। क्योंकि यहां की कांग्रेस सरकार, किसानों के हित में और कई योजनाएं चला रही है। 


अन्य पोस्ट