संपादकीय

‘छत्तीसगढ़’ का संपादकीय : रिग मशीन देखने जैसा उत्साह जनता में डी-लिमिटेशन का!
सुनील कुमार ने लिखा है
17-Apr-2026 12:56 PM
‘छत्तीसगढ़’ का  संपादकीय : रिग मशीन देखने जैसा उत्साह जनता में डी-लिमिटेशन का!

हिन्दुस्तान बड़ा मजेदार देश है। किसी का मकान गिराया जा रहा हो, या बड़ी सी कोई मशीन नाले से कचरा निकाल रही हो, सडक़ों पर कोई मशीन झाड़ू लगा रही हो, या रिग मशीन ट्यूबवेल खोद रही हो, सौ-पचास लोग आसपास बैठकर उसे देखते रहते हैं। उन्हें हासिल कुछ नहीं होता, लेकिन शायद जिंदगी में उसे देखने से बेहतर कुछ करना उन्हें नसीब नहीं है। कुछ ऐसा ही लोकसभा और विधानसभा की सीटों के बढऩे को लेकर चल रहा है। जो नेता चुनाव लडक़र सांसद या विधायक बनना चाहते हैं, उनका तो उत्साही होना जायज है, लेकिन ऐसे नेता देश में कुछ लाख ही हैं। बाकी दसियों करोड़ लोग बेगानी शादी में दीवाने अब्दुल्ला की तरह डाँस कर रहे हैं। उन्हें यह भी समझ नहीं पड़ रहा है कि बढ़े हुए सांसदों और विधायकों का बोझ तो उन्हीं की जेब पर जाएगा। मामला कुछ ऐसा है कि किसी गैर की बारात में नाचने वालों से डीजे का पैसा लिया जाए, वैसा ही देश के आम नागरिक सांसद और विधायकों की संख्या बढऩे को लेकर खुश हैं। यह समझने की जरूरत है कि यह गिनती बढ़ जाने से क्या लोकतंत्र का संसदीय-संवैधानिक काम कुछ बेहतर हो जाएगा? 

पहले तो यह समझने की जरूरत है कि सांसद और विधायक गली-मोहल्ले के काम करने वाले पंच या पार्षद सरीखे नहीं रहते हैं। उनके जिम्मे सिर्फ संसद या विधानसभा में देश-प्रदेश के मामलों पर चर्चा करना, नए विधेयक, या पुराने कानून में संशोधन आने पर उन पर चर्चा करना, और जरूरत रहने पर मतदान करना आता है। उन्हें पार्षदों सरीखे नाली-पानी, रौशनी-सडक़ जैसे काम नहीं करने रहते। इसलिए एक सांसद पांच लाख लोगों पर रहे, या दस लाख लोगों पर, संसद के भीतर उनके बोलने की गुंजाइश एक सी रहती है, सीमित रहती है, और अब तो पार्टियों के अनुशासन में बंधे रहने के बाद रहती ही नहीं है। पार्टियां ही उन्हें मिले हुए समय को अपने सदस्यों के बीच अपनी मर्जी से बांटती हैं कि किस सदस्य को कितने मिनट मौका मिले। ऐसे में उन्हें चुनने वाली जनता का संसद में सांसदों के कहे हुए से कुछ भी लेना-देना नहीं रहता। सांसद अपनी पार्टी के अनुशासन से बंधे हुए अपने मन की बात भी नहीं कह सकते, अपनी सीट के मतदाताओं की बात कहना तो दूर रहा।

अब आज-कल में डी-लिमिटेशन के बाद लोकसभा की मौजूदा 543 सदस्यों की गिनती बढक़र 850 करने की तैयारी है। अगले लोकसभा चुनाव के बाद इस सदन में 33 फीसदी अधिक लोग बैठेंगे। अब हम संसद के कामकाज को देखें, तो पिछले 20 बरस में संसद साल में औसतन 60 दिन बैठी है। साल में 52 इतवार होते हैं, उससे जरा ही ज्यादा दिन संसद चली है। सरकारें अब कम दिनों में, कम या तकरीबन बिना बहस के अधिक बिल पास करवाने की कोशिश करती हैं, और संसद के बजट और मानसून सत्र अक्सर समय के पहले खत्म हो जाते हैं। बाकी बचे हुए दिनों में भी बहुत सारे दिन तो नारेबाजी, बहिष्कार, और बहिर्गमन में चले जाते हैं। काम की बात सीमित होती है, और कई नेताओं के बड़े-बड़े भाषण का संसदीय काम से कोई लेना-देना नहीं रहता है, वह देश के मतदाताओं को दिया जा रहा एक राजनीतिक संदेश रहता है जो कि वे किसी आमसभा के मंच से भी दे सकते थे, लेकिन वे संसद का इस्तेमाल इस काम के लिए करते हैं। अब जब 33 फीसदी अधिक सांसद इस सदन में बैठेंगे, तो जाहिर है कि लोगों के बोलने का औसत वक्त करीब-करीब एक-तिहाई तो कम हो ही जाएगा। 

भावनात्मक रूप से यह बात अच्छी लग सकती है कि अब 20 लाख वोटरों की जगह 13 लाख वोटरों पर एक सांसद होंगे। लेकिन क्या किसी सांसद का अपने चुनाव क्षेत्र की आबादी की गिनती से अधिक लेना-देना रहता है? इलाका तो उतने का उतना रहता है, अब जब सीटें बढ़ेंगी, तो चुनाव क्षेत्र का आकार घट जाएगा, मिसाल के तौर पर छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में 11 की जगह 17 सीटें हो जाने की चर्चा है, तो एक सांसद का चुनाव क्षेत्र कुछ छोटा हो जाएगा। लेकिन इससे लोकसभा सीट पर क्या फर्क पड़ेगा? जनता पर क्या इससे कोई फर्क पड़ेगा कि उसके सांसद के सिर पर अब 20 लाख वोटरों की जगह 13 लाख वोटरों का ही बोझ है? क्या इससे सांसद अपने वोटरों के पैर दबाने के लिए अधिक वक्त पाएगा, या पाएगी? यह पूरा सिलसिला रिग मशीन से बोरिंग खुदने जैसा है। खुदने वाले बोरिंग से किसी को पानी मिलेगा या नहीं, इस संभावना से भी परे लोग नजारा देखने बैठ जाते हैं। अब लोग यह नजारा देखने के लिए 33 फीसदी अधिक खर्च भी करेंगे। सांसदों के वेतन-भत्ते, उनके सफर की टिकटें, दिल्ली में उनके रहने-खाने का खर्च, यह सब बढ़ जाएगा। बेगानी शादी में नाचते अब्दुल्ला की जेब से यह बढ़ा हुआ खर्च निकालकर लोकसभा नाम की डीजे पार्टी को दिया जाएगा, लेकिन वोटरों को मिलेगा क्या? 
 

साल में औसतन 60 दिन चलने वाली लोकसभा में लोगों के सांसदों को बोलने का मौका अब एक तिहाई कम मिलेगा। जो संसद आज भी नई इमारत पाकर, विचार-विमर्श की पुरानी संसदीय परंपराएं खो चुकी है, उस संसद में बढ़े हुए सांसदों को बोलने का मौका कैसे मिलेगा? हमारा ख्याल है कि जिस तरह किसी भी कारोबार में निवेश की गई पूंजी पर मुनाफे की वापिसी का हिसाब लगाया जाता है, वैसा ही आरओआई, यानी रिटर्न ऑन इन्वेस्टमेंट संसद को लेकर भी करना चाहिए। जब जनता के मत्थे अतिरिक्त खर्च आ रहा है, तो उसे उसके एवज में सेवा देने के लिए, और संसद का सार्थक उपयोग करने के लिए भी सत्र के दिन एक तिहाई बढऩे चाहिए। 60 दिनों को बढ़ाकर 80 दिन करना चाहिए, तभी अधिक संख्या वाले सांसदों के हिस्से बोलने का मौका आएगा। जनता तो 60 दिनों के सत्र के लिए भी सांसदों को पूरे 365 दिन का तनख्वाह देती है, उसे भी उसके भुगतान का कुछ बेहतर काम मिले, और संसद में चर्चा बढ़ सके। 
हर पार्टी को सीटें बढ़ाने की बड़ी दिलचस्पी रहती है, क्योंकि वह अपने लोगों को अधिक उम्मीदवार बना पाएगी, उसके अधिक सांसद और विधायक हो जाएंगे। लेकिन सरकारों, लोकसभा और विधानसभाओं, पार्टियों, और नेताओं को देश की जनता के सामने यह भी साफ करना चाहिए कि सीटें बढ़ाने की जरूरत क्या थी? जनता के हिस्से के सवाल सामने रखने वाले मीडिया को भी ऐसे असुविधाजनक सवालों के बजाय डी-लिमिटेशन जैसी नाटकीयता वाली घटनाएं बेहतर लगती हैं, जिनसे कुछ खबरें निकलती हैं। अब चुनाव क्षेत्र बढ़ जाएंगे, उम्मीदवार बढ़ जाएंगे, तो मीडिया का इश्तहार का, और ‘दूसरे’ किस्म का कारोबार भी बढ़ जाएगा। इसलिए डी-लिमिटेशन की बारात में मीडिया का भी जीजा बनकर सज-धजकर चलना ठीक है, लेकिन बिना किसी रिश्तेदारी के इस बेगानी शादी में अब्दुल्ला नाम की जनता जिस तरह नाच रही है, उससे पता चलता है कि जनता की जागरूकता, समाज की सामूहिक चेतना किस गड्ढे में पहुंच चुकी है। और दिलचस्प बात यह है कि डीजे वाले को देने के लिए इसी अब्दुल्ला की जेब से पैसा निकाला जाएगा। फिलहाल संसद से सडक़ तक डी-लिमिटेशन का हल्ला इतना है, कि उसके शोरगुल में हमारी इस बात पर लोग अधिक गौर नहीं कर पाएंगे, लेकिन उससे कोई फर्क नहीं पड़ता। समसामयिक घटनाओं पर अपनी सोच सामने रखने की हमारी सार्वजनिक जिम्मेदारी पूरा करना तो हमारा रोज का काम है। अब जनता सोशल मीडिया पर यह चर्चा छेड़े कि 33 फीसदी अधिक सांसदों-विधायकों वाली संसद, और विधानसभाओं के काम के दिन 33 फीसदी बढ़ाए जाएं, जनता को यह याद दिलाना ठीक रहेगा कि बहुत ही कम तनख्वाह पाने वाले, बिना किसी सहूलियत वाले सांसद पहली लोकसभा में हर बरस 135 दिन काम करते थे। 1960-70 के दशक में लोकसभा औसतन 110-120 दिन चली। 1990 से 2000 के दशक में औसतन 80-90 दिन लोकसभा के सत्र हुए। और 2000-2025 के बीच औसत 60 दिन ही सत्र चले। नेहरू के वक्त का टेस्ट मैच आज टी-20 होकर रह गया है, और जनता पांच दिन की टिकट खरीदने पर मजबूर है!  

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