विचार / लेख
बड़ा सवाल - क्या 'अधिकारी' तय करेंगे शंकराचार्य की सनद?
-ओंकारेश्वर पांडेय
हिंदू प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और हिंदू मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के राज में एक ऐसे सुविख्यात हिंदू शंकराचार्य से उनके शंकराचार्य होने का सबूत मांगा गया है, जिनका आशीर्वाद स्वयं मोदी ले चुके हैं। कानूनी सबूत तो शंकराचार्य ने दे दिये हैं, किंतु संवैधानिक धार्मिक स्वतंत्रता, हिंदू आस्था और धर्म के मामले में इस अपमानजनक हस्तक्षेप का अधिकार मेला अधिकारियों को किसने दिया? देशभर में अपने शंकराचार्य के इस घोर अपमान से वह हिंदू आस्था आहत हुई है, जो राजनीति के स्वयंभू ठेकेदारों से अलग धर्म को केवल धर्म के रूप में देखती है।
कमाल है! क्या कोई सरकारी अधिकारी किसी संत से, खासकर एक शंकराचार्य से, पूछ सकता है कि "आप शंकराचार्य हैं, इसका सबूत दो"? प्रयागराज मेला प्राधिकरण का वह नोटिस, जो स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती को मिला है, यही पूछ रहा है। इस सवाल ने भारत के संविधान, धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार और सत्ता की मनमानी के बीच एक बड़ी लड़ाई खड़ी कर दी है।
प्रयागराज प्रशासन ने यह नोटिस कैसे दे दिया? यह मामला केवल उत्तर प्रदेश सरकार का नहीं है, समूचे देश का हिंदू समाज इस नोटिस से आहत है। क्या यह नोटिस किसी अन्य पार्टी के शासन में किसी शंकराचार्य को दिया जाता, तब भाजपा चुप रहती? ऐसे देशव्यापी संवेदनशील मामले में भारत का संविधान, न्यायालय एवं आचार्य परंपरा क्या कहती है, इसका विश्लेषण आवश्यक है। माघ मेला और संगम की सदियों पुरानी पवित्र स्नान परंपरा से आस्था देशभर के हिंदुओं की जुड़ी है, लिहाजा इस गंभीर सवाल पर गहन विवेचन जरूरी है।
अकाट्य कानूनी और संवैधानिक आधार संविधान और सुप्रीम कोर्ट का रुख यहाँ बिल्कुल स्पष्ट है:
संविधान का अनुच्छेद 26: यह प्रत्येक धार्मिक सम्प्रदाय को "धर्म के मामलों का स्वयं प्रबंध करने का अधिकार" देता है। इसमें धार्मिक पदों पर नियुक्ति और उत्तराधिकार शामिल है। शंकराचार्य का पद इसी "प्रबंधन" का हिस्सा है। राज्य का इसमें हस्तक्षेप निषिद्ध है।
सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला – शिरूर मठ केस (1954/1980): कोर्ट ने साफ़ शब्दों में कहा था:
"A religious denomination or organization enjoys complete autonomy in the matter of deciding as to what rites and ceremonies are essential according to the tenets of the religion they hold and no outside authority has any jurisdiction to interfere with their decision in such matters."
(हिंदी अनुवाद): "एक धार्मिक सम्प्रदाय या संगठन को यह तय करने की पूर्ण स्वायत्तता है कि उनके धर्म के सिद्धांतों के अनुसार कौन-से संस्कार और अनुष्ठान आवश्यक हैं। ऐसे मामलों में उनके निर्णय में किसी बाहरी प्राधिकारी का हस्तक्षेप करने का कोई अधिकार क्षेत्र नहीं है।"
यह फैसला साफ शब्दों में कहता है कि शंकराचार्य पद पर अभिषेक एक आवश्यक धार्मिक अनुष्ठान है और इस पर राज्य का कोई अधिकारी हस्तक्षेप नहीं कर सकता।
मुगलों ने जो नहीं किया, क्या 'हिंदू सरकार' वह कर रही है?
इलाहाबाद (प्रयागराज) के संगम तट पर स्थित मुगल शासक अकबर का किला 1575 में बना था, जो आज भी सत्ता की धमक का गवाह है। लेकिन पवित्र स्नान तब भी होता था, साधु-संत तब भी आते थे। मुगलों ने कभी किसी शंकराचार्य से 'सबूत' नहीं मांगा। इतिहास गवाह है कि औरंगजेब जैसे कट्टर शासकों के दौर में भी किसी कोतवाल ने 'अभिषेक का प्रमाणपत्र' नहीं मांगा, बल्कि उनके स्नान की व्यवस्था की। मेला प्रशासन का काम सुविधाएं देना है, अपमान करना नहीं।
ऐतिहासिक साक्ष्य: औरंगजेब के काल (1658-1660) के 'शाही फरमान' (जंगमबाड़ी मठ के संदर्भ में) स्पष्ट करते हैं कि मुगल प्रशासन ने मठों की आंतरिक व्यवस्था और उत्तराधिकार को कभी चुनौती नहीं दी।
ब्रिटिश हुकूमत: अंग्रेजों ने 'रिलिजियस एंडोमेंट्स एक्ट, 1863' बनाया, लेकिन उन्होंने भी 'जगद्गुरु' और 'शंकराचार्य' जैसे पदों को 'Corporation Sole' (संप्रभु पद) माना और उनके राजकीय सम्मान (छत्र-चंवर और एस्कॉर्ट) को मान्यता दी।
विडंबना यह है कि आज मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ स्वयं एक गौरवशाली नाथ संप्रदाय की पीठ के महंत हैं। उनकी सरकार के अधीन एक 'मेला अधिकारी' का यह दुस्साहस धार्मिक स्वायत्तता पर सीधा प्रहार है।
प्रशासनिक 'अज्ञान' को कानूनी आईना : अधिवक्ता का प्रत्युत्तर
प्रयागराज प्रशासन शायद संविधान के उस बुनियादी ढांचे को भूल गया है जिसे सर्वोच्च न्यायालय ने 70 साल पहले ही स्पष्ट कर दिया था। प्रशासन जिस 14 अक्टूबर 2022 के सुप्रीम कोर्ट के आदेश की बात कर रहा है, वह 'भविष्यगामी' (Prospective) था। स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का अभिषेक 12 सितंबर 2022 को ही संपन्न हो चुका था। कानून का सिद्धांत है कि वह पिछली तारीख से प्रभावी नहीं होता।
शंकराचार्य जी के अधिवक्ता अंजनी कुमार मिश्रा के आधिकारिक जवाब (20.01.2026) ने भी प्रशासन की दलीलों की धज्जियां उड़ा दी हैं। नोटिस के जवाब में स्पष्ट किया गया है कि:
अभिषेक की पूर्णता: स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद जी का अभिषेक 12.09.2022 को ही लाखों लोगों की उपस्थिति और वेदोक्त मंत्रोच्चार के बीच पूर्ण हो गया था।
न्यायालय का संरक्षण: सुप्रीम कोर्ट ने 21.09.2022 के अपने आदेश में पहले ही रिकॉर्ड पर लिया था कि तीन अन्य शंकराचार्यों और भारत धर्म महामंडल ने इस नियुक्ति का समर्थन किया है।
अवमानना का आरोप: अधिवक्ता ने स्पष्ट किया है कि प्रशासन का यह नोटिस न केवल दुर्भावनापूर्ण है, बल्कि सुप्रीम कोर्ट के विचाराधीन मामलों में हस्तक्षेप कर 'न्यायालय की अवमानना' (Contempt of Court) की श्रेणी में आता है। प्रशासन उन 15 छद्मवेशी लोगों के खिलाफ कार्रवाई नहीं कर रहा जो शंकराचार्य की पदवी का दुरुपयोग कर रहे हैं, बल्कि असली पीठ के उत्तराधिकारी को निशाना बना रहा है।
कानूनी पेंच और 'अकाट्य प्रमाण' प्रशासन की फाइलों में दबे तीन बड़े सबूत :
शृंगेरी पीठ की मुहर: 11 सितंबर 2022 को श्रृंगेरी के जगद्गुरु श्री भारती तीर्थ महास्वामी ने लिखित रूप में स्वीकार किया कि स्वामी स्वरूपानंद जी ने स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को ही उत्तराधिकारी नियुक्त किया था। यह 'धार्मिक सर्वोच्च न्यायालय' का फैसला है।
लोकतांत्रिक स्वीकृति: स्वयं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कई मंचों पर स्वामी जी से भेंट की और उन्हें शंकराचार्य के रूप में सम्मान दिया (संदर्भ: काशी विश्वनाथ कॉरिडोर, 2021)।
सरकारी स्मारिका (2024-25): खुद उत्तर प्रदेश सरकार और मेला प्राधिकरण की आधिकारिक मार्गदर्शिका में उन्हें 'जगद्गुरु शंकराचार्य, ज्योतिष्पीठ' लिखकर प्रकाशित किया गया है।
प्रशासनिक दोहरे मापदंड: ग्लैमर को छूट, गुरुओं पर कूट?
मेला प्राधिकरण का रवैया संदेहास्पद है। एक तरफ ग्लैमर मॉडल्स, इंस्टाग्राम इन्फ्लुएंसर्स और रसूखदार नेताओं के लिए रेड कार्पेट बिछाया जाता है, वहीं देश के शीर्ष धर्मगुरु द्वारा 'मौनी अमावस्या' पर शांतिपूर्ण धरना दिए जाने के तुरंत बाद उन पर 'पहचान' का डंडा चलाया जाता है।
जो प्राधिकरण ग्लैमर मॉडल्स के शूट, विभिन्न मठों के भव्य व लग्ज़री काफिलों और राजनेताओं के आने-जाने में पूरी सुविधा और सहूलियत देता है, बड़े-बड़े तंबू, सुरक्षा घेरा, विशेष पास – सब मुहैया कराता है, वही मेला प्राधिकरण देश के एक शीर्ष धार्मिक गुरु, वह भी एक शंकराचार्य को उनके साथ मात्र 200 अनुयायियों को लेकर आने पर भी क्यों रोक लगा रहा है और फिर उनके पद पर ही सवाल किस अधिकार से खड़े कर दिए जाते हैं। क्या प्रशासन की नज़र में एक धर्मगुरु का अधिकार एक मॉडल या राजनेता से कम है?
नोटिस का असली कारण: क्या यह आलोचना का दमन है?
देश ने देखा है कि अनेक मौकों पर स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने शास्त्रोचित बातें बिना डरे कही हैं। क्या मौनी अमावस्या पर उनके धरने के ठीक बाद यह नोटिस आना, उनकी मुखर आवाज़ को दबाने की कोशिश है?
अयोध्या प्राण-प्रतिष्ठा: "अधूरे मंदिर में प्रतिष्ठा शास्त्र सम्मत नहीं"
जब पूरा देश उत्सव में था, स्वामी जी ने एक गंभीर शास्त्रीय प्रश्न उठाया।
सटीक कथन: "मंदिर अभी पूर्ण नहीं हुआ है, शिखर अभी बना नहीं है। शास्त्रों के अनुसार, शिखर विहीन मंदिर भगवान का शरीर विहीन होना है। अधूरे मंदिर में प्राण-प्रतिष्ठा करना शास्त्र विरुद्ध है और इससे देश में अशांति फैल सकती है।" * परिणाम: इस शास्त्रीय आपत्ति को राजनीतिक रंग देकर उन्हें 'राम-विरोधी' घोषित करने का दुष्प्रचार किया गया।
काशी-अयोध्या में मंदिर तोड़ने पर प्रहार
स्वामी जी ने विकास के नाम पर प्राचीन विग्रहों को हटाने का कड़ा विरोध किया था।
काशी विश्वनाथ कॉरिडोर (नवंबर 2021): "विकास के नाम पर काशी के प्राचीन विग्रहों को मलबे में फेंक दिया गया। क्या यह सनातन का सम्मान है? हम मंदिर बनाने के नाम पर मंदिरों को ही तोड़ रहे हैं।"
*अयोध्या मंदिर विध्वंस: उन्होंने अयोध्या में भी छोटे प्राचीन मंदिरों को तोड़े जाने पर तीखा प्रहार करते हुए कहा था— "भगवान राम के भव्य मंदिर के लिए अन्य विग्रहों का अपमान स्वीकार्य नहीं है।"
केदारनाथ में सोने की चोरी का आरोप
स्वामी जी ने केदारनाथ मंदिर के गर्भगृह में सोने की परतों को लेकर हुए घोटाले पर सीधे सरकार और ट्रस्ट को घेरा।
सटीक कथन: "केदारनाथ में 228 किलो सोना गायब हुआ है, उसकी जाँच क्यों नहीं हो रही? अब दिल्ली में केदारनाथ मंदिर बनाने की तैयारी है, क्या केदारनाथ कोई दुकान है जिसे कहीं भी खोल दिया जाएगा?"
तटस्थता का प्रयास और राहुल गांधी पर सवाल
जब उन पर 'विपक्षी' होने का ठप्पा लगा, तो उन्होंने अपनी तटस्थता सिद्ध करने के लिए राहुल गांधी पर भी टिप्पणी की।
कथन (2024): "राहुल गांधी को मंदिर नहीं आना चाहिए था क्योंकि उनकी पार्टी ने हलफनामा देकर भगवान राम के अस्तित्व पर सवाल उठाए थे। जो राम का विरोध करे, उसे मंदिर में राजनीति नहीं करनी चाहिए।"।
यह महज इत्तेफाक नहीं हो सकता कि जिस धर्मगुरु ने काशी के प्राचीन मंदिरों को तोड़े जाने पर सत्ता को 'अधर्मी' कहा, जिसने केदारनाथ के सोने के गायब होने पर हिसाब माँगा और जिसने अयोध्या की प्राण-प्रतिष्ठा की शास्त्रीय त्रुटियों पर उंगली उठाई, उसी धर्मगुरु से आज एक 'मेला अधिकारी' उसकी पहचान का सबूत मांग रहा है। क्या यह नोटिस दरअसल उन कड़वे सवालों का जवाब है, जिनका उत्तर सत्ता के पास नहीं था? यह 'राजदंड' की वह कुंठा है जो 'धर्मदंड' की सत्यवादिता को सह नहीं पा रही।"
मौनी अमावस्या पर उनके धरने के ठीक बाद यह नोटिस आना, उनकी इसी मुखर व सिद्धांतवादी आवाज़ को दबाने की कोशिश माना जा रहा है। साफ है कि यह नोटिस 'प्रक्रिया' नहीं, बल्कि 'प्रतिशोध' है—उस मुखर आवाज के खिलाफ जिसने अयोध्या मंदिर के 'अधूरे शिखर' और शास्त्रीय मर्यादाओं पर सवाल उठाए थे।
सबसे बड़ा सवाल
'अजय सिंह बिष्ट' से 'योगी आदित्यनाथ' बने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ खुद गोरखपुर पीठ के महंत हैं और एक धार्मिक पद से सीधे राजनीति में आए। उनके नेतृत्व वाली सरकार का शंकराचार्य से सबूत माँगना देश के हिंदू समाज के मामले के लिए सबसे चौंकाने वाला और विडंबनापूर्ण पहलू है। योगी आदित्यनाथ की सरकार के अधीन उन्हीं का प्राधिकरण, देश की सनातन आचार्य परंपरा के शीर्ष प्रतिनिधि से उनके पद का सबूत माँग रहा है! क्या भारतीय संविधान किसी सरकारी अधिकारी को यह अधिकार देता है? बिल्कुल नहीं। देश भर में इससे गलत संदेश गया है।
यह लड़ाई संविधान और स्वाभिमान की है
यदि आज एक प्रशासनिक अधिकारी शंकराचार्य से प्रमाण मांगेगा, तो कल वह किसी मंदिर के गर्भगृह में घुसकर पुजारी से उसकी योग्यता का लाइसेंस मांगेगा। यह 'राजदंड' द्वारा 'धर्मदंड' को नियंत्रित करने का एक खतरनाक प्रयास है। स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के पास केवल कागज नहीं, बल्कि शास्त्र, गुरु-शिष्य परंपरा और करोड़ों अनुयायियों की श्रद्धा का वह 'प्रमाण' है जिसे कोई मजिस्ट्रेट निरस्त नहीं कर सकता।
इतिहास खुद को दोहराता नहीं, लेकिन वह उन लोगों पर जरूर हंसता है जो मर्यादाओं को भुलाकर सत्ता के मद में चूर हो जाते हैं। प्रयागराज मेला प्राधिकरण का यह नोटिस आधुनिक भारत के लोकतांत्रिक और आध्यात्मिक इतिहास का सबसे काला अध्याय माना जाएगा। करोड़ों हिंदुओं की आस्था से जुड़े ऐसे संवेदनशील मसले पर हिंदू संगठनों की रहस्यमय चुप्पी विस्मयकारी है।


