विचार / लेख

NEET PG –आरक्षण बनाम योग्यता
21-Jan-2026 7:34 PM
NEET PG –आरक्षण बनाम योग्यता

- डॉ. रवींद्र पीएस

आजकल NEET PG का ‘कट-ऑफ मार्क्स’चर्चा का केंद्र बना हुआ है। इसी बहाने आरक्षण का विरोध भी अपने चरम पर है। कुछ स्वघोषित ‘मेरिटोरियस’ लोग SC/ST/OBC वर्गों के प्रति अभद्र टिप्पणियाँ कर रहे हैं। यद्यपि यह क्षेत्र हम मानविकी (Humanities) के विद्यार्थियों से भिन्न है, परंतु आरक्षण जैसे राष्ट्र-निर्माण के गंभीर विषयों पर हो रही ओछी टिप्पणियों ने ध्यान आकर्षित किया। गहराई से देखने पर यहाँ मामला कुछ और ही नजर आता है।

MBBS उत्तीर्ण डॉक्टरों को क्कत्र में प्रवेश हेतु दो काउंसलिंग आयोजित की गईं। सरकारी सीटें तो भर गईं, लेकिन अधिकांश प्राइवेट कॉलेजों की सीटें खाली रह गईं। इन निजी मेडिकल कॉलेजों की सीटों को भरने के लिए ही कट-ऑफ में भारी गिरावट की गई है। केंद्र सरकार के निर्णय के अनुसार:

सामान्य श्रेणी: कट-ऑफ 50 परसेंटाइल से घटाकर 7 परसेंटाइल कर दी गई।

दिव्यांग श्रेणी: 45 परसेंटाइल से घटाकर 5 परसेंटाइल।

SC/ST/OBC : 40 परसेंटाइल से घटाकर 0 (शून्य) कर दी गई।

इस नीतिगत बदलाव के लिए सीधे तौर पर केंद्र सरकार जिम्मेदार है और सवाल भी उसी से पूछे जाने चाहिए। सरकार से पूछा जाना चाहिए कि इस निर्णय का वास्तविक उद्देश्य क्या है? यह किसके लाभ के लिए किया गया है? क्या यह केवल प्राइवेट कॉलेजों की मोटी फीस सुनिश्चित करने के लिए नहीं है? क्या यह उन ‘7 परसेंटाइल’ वाले रसूखदार ‘मेरिटधारियों’ के लिए नहीं है?

स्वास्थ्य मंत्रालय के पिछले आंकड़ों के अनुसार, काउंसलिंग के बाद भी निजी कॉलेजों में हजारों सीटें खाली रह जाती हैं क्योंकि उनकी वार्षिक फीस ही 25 लाख से 60 लाख रुपये तक होती है। कट-ऑफ को ‘जीरो’ या अत्यंत कम करने का यह प्रयोग पहले भी विवादों में रहा है। मेडिकल काउंसिल के विशेषज्ञों का मानना है कि योग्यता (Merit) का असली क्षरण आरक्षण से नहीं, बल्कि उस ‘कैपिटेशन फीस’ और ‘पेड सीटों’ से होता है जहाँ शून्य योग्यता वाला व्यक्ति भी केवल पैसे के दम पर डॉक्टर बन जाता है। इस प्रकार की नीतियां ‘हेल्थकेयर कमर्शियलाइजेशन’ को बढ़ावा देती हैं, जहाँ शिक्षा की गुणवत्ता से अधिक व्यापारिक लाभ को प्राथमिकता दी जाती है।

दुर्भाग्यपूर्ण है कि कुछ मानसिक रूप से संकीर्ण लोग अपनी कुंठा SC/ST और पिछड़ों को अपशब्द कहकर निकाल रहे हैं। सच्चाई यह है कि इन निजी कॉलेजों की 2 से 2.5 करोड़ रुपये की फीस भरना ‘धनपशुओं’ (जिनमें 99% सवर्ण संपन्न वर्ग है) के अलावा किसी के बस की बात नहीं है। भारत का आम जनमानस आज भी उच्च शिक्षा (मेडिकल और इंजीनियरिंग) के लिए सरकारी संस्थानों पर ही भरोसा करता है।

देखा जाए तो यह सीधा-साधा मामला महंगे निजी मेडिकल कॉलेजों को आर्थिक लाभ पहुँचाने का है। कट-ऑफ कम करने का वास्तविक लाभ उन संपन्न परिवारों के छात्रों को मिल रहा है, जो योग्यता (Merit) के आधार पर सरकारी कॉलेजों में स्थान नहीं बना पाए। यदि SC/ST/पिछड़ा वर्ग की कट-ऑफ ‘-1000’ भी कर दी जाए, तब भी उनकी सीटें खाली ही रहेंगी, क्योंकि 1% अपवादों को छोड़ दें तो इस वर्ग के पास 2-3 करोड़ रुपये देने की हैसियत नहीं है।

इसलिए, जातिवादी और आरक्षण विरोधी दुर्भावना से ग्रस्त लोगों को सलाह है कि वे NEET कट-ऑफ घटाने की इस धूर्त सरकारी नीति की जगह, वंचित वर्गों के खिलाफ विषवमन करना बंद करें। और हाँ, अगली बार जब इलाज कराने जाएं, तो डॉक्टर का ‘टाइटल’ जरूर देखें। कहीं वह भारी भरकम पैसे देकर प्राइवेट कॉलेज से पढ़ा हुआ (तथाकथित 7 परसेंटाइल वाला) डॉक्टर तो नहीं?


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