विचार / लेख
कनाडा के पीएम का दुर्लभ दर्जे का भाषण
दुनिया इस वक़्त किसी बदलाव के दौर से नहीं, बल्कि एक टूटन के बीच खड़ी है। यह बात किसी वामपंथी लेखक ने नहीं, किसी तीसरी दुनिया के नेता ने नहीं, बल्कि कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी ने खुले मंच से कही है। उन्होंने साफ़ कहा— “हम किसी संक्रमण में नहीं, एक विध्वंस के बीच हैं।” यह वाक्य अपने आप में बताता है कि आज की अंतरराष्ट्रीय राजनीति में जो कुछ हो रहा है, वह सामान्य उतार-चढ़ाव नहीं है। अमेरिका जैसे ताक़तवर देशों का यह रवैया कि नियम उन्हें बाँधते नहीं, बल्कि वे नियमों को अपनी सुविधा से मोड़ सकते हैं— इसी ने दुनिया को अस्थिर किया है। ट्रम्प का नाम कार्नी ने नहीं लिया, लेकिन उनका इशारा बिल्कुल साफ़ है। जब कोई राष्ट्रपति खुलेआम टैरिफ़ को धमकी की तरह इस्तेमाल करता है, व्यापार को हथियार बनाता है, सहयोगियों को अपमानित करता है और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं को बेकार बताता है— तो यह केवल अमेरिकी राजनीति का सवाल नहीं रहता, यह पूरी दुनिया की व्यवस्था पर हमला बन जाता है।
कार्नी ने अपने भाषण में 1978 के एक पुराने लेकिन आज बेहद प्रासंगिक उदाहरण का ज़िक्र किया— चेकोस्लोवाकिया के लेखक और बाद में राष्ट्रपति बने वाक्लाव हावेल का। हावेल ने बताया था कि कैसे एक साधारण दुकानदार रोज़ अपनी दुकान पर एक नारा टाँग देता है— “दुनिया के मज़दूरों, एक हो जाओ।” वह खुद उस नारे में विश्वास नहीं करता, कोई भी नहीं करता, लेकिन फिर भी वह तख़्ती लगाता है। इसलिए नहीं कि वह झूठ को सच मानता है, बल्कि इसलिए कि वह परेशानी से बचना चाहता है। हावेल ने इसे कहा था— “झूठ के भीतर जीना।” आज की अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था भी कुछ ऐसी ही बन गई है— सब जानते हैं कि नियम सब पर बराबर लागू नहीं होते, फिर भी सब ऐसे पेश आते हैं मानो यही सच हो।
नियमों की बात, लेकिन सुविधा के हिसाब से
मार्क कार्नी ने बहुत ईमानदारी से यह स्वीकार किया कि नियमों पर आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था कभी पूरी तरह सच्ची नहीं थी। सबसे ताक़तवर देशों ने हमेशा अपने लिए कुछ छूट रखी। लेकिन पहले कम से कम दिखावे का एक ढाँचा था— एक भाषा थी, एक सहमति थी, एक मर्यादा थी। आज वह भी टूट रही है। ट्रम्प की राजनीति ने इस दिखावे को भी अनावश्यक मान लिया। वे खुले तौर पर कहते हैं— “अमेरिका पहले”, चाहे उसके लिए दुनिया की अर्थव्यवस्था हिल जाए, गठबंधन टूट जाएँ, या युद्ध का ख़तरा बढ़ जाए। कार्नी का कहना है कि जब ताक़तवर देश नियमों को सिर्फ़ कमज़ोरों पर थोपने का औज़ार बना लें, तो वह व्यवस्था देर तक टिक नहीं सकती।
पिछले बीस सालों में दुनिया ने एक के बाद एक संकट देखे हैं— 2008 की वित्तीय तबाही, कोविड महामारी, ऊर्जा संकट, यूक्रेन युद्ध, ग़ाज़ा संकट। इन सबने यह दिखा दिया कि वैश्वीकरण जितना फ़ायदे का था, उतना ही ख़तरनाक भी। लेकिन हाल के वर्षों में एक नया चलन शुरू हुआ है— आर्थिक रिश्तों को हथियार बनाना। टैरिफ़ अब व्यापार नीति नहीं, दबाव की भाषा हैं। सप्लाई चेन सहयोग का ज़रिया नहीं, कमजोरी खोजने का औज़ार बन गई है। बैंकिंग सिस्टम, डॉलर, भुगतान व्यवस्था— सबको राजनीतिक दबाव के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है। ट्रम्प की सोच इसी दिशा में जाती है— जो ताक़तवर है, वही तय करेगा; बाक़ी या तो मान लें या भुगतें।
कार्नी का यह कहना बहुत अहम है— “जब नियम आपकी रक्षा नहीं करते, तो आपको ख़ुद अपनी रक्षा करनी पड़ती है।” यही वजह है कि आज कई देश ऊर्जा, खाद्य सुरक्षा, खनिज संसाधन और रक्षा के मामले में आत्मनिर्भर होने की बात कर रहे हैं। यह राष्ट्रवाद नहीं, बल्कि असुरक्षा की प्रतिक्रिया है।
महाशक्ति बनाम मध्य शक्ति: असली लड़ाई
इस पूरी तस्वीर में एक दिलचस्प बात यह है कि ट्रम्प जैसे नेता मानते हैं कि बड़ी ताक़तें अकेले चल सकती हैं। उनके पास बाज़ार है, सेना है, पैसा है— तो उन्हें किसी की ज़रूरत क्यों हो? कार्नी इस सोच को सीधी चुनौती देते हैं। वे कहते हैं कि हाँ, महाशक्तियाँ कुछ समय के लिए अकेले चल सकती हैं। लेकिन मध्य शक्ति वाले देश— जैसे कनाडा, जर्मनी, जापान— यह जोखिम नहीं उठा सकते। और यही वजह है कि अगर ये देश महाशक्तियों से केवल द्विपक्षीय बातचीत करेंगे, तो वे हमेशा कमज़ोर स्थिति में होंगे। तब उन्हें वही स्वीकार करना पड़ेगा जो दिया जाएगा।
कार्नी बहुत साफ़ शब्दों में कहते हैं— “यह संप्रभुता नहीं है। यह अधीनता स्वीकार करते हुए संप्रभुता का अभिनय है।” यह वाक्य आज की दुनिया की सच्चाई बयान करता है। ट्रम्प की राजनीति इसी अभिनय को बढ़ावा देती है— दिखाओ कि तुम स्वतंत्र हो, लेकिन असल में शर्तें वही तय करेगा जिसके पास ताक़त है। ऐसे माहौल में मध्य शक्ति वाले देशों के सामने एक ही रास्ता बचता है— आपस में मिलकर एक तीसरा रास्ता बनाना।
कार्नी का कहना है कि अगर हम मेज़ पर नहीं हैं, तो हम मेन्यू में हैं। यानी निर्णय की जगह नहीं मिली, तो निर्णय का शिकार बनेंगे। यह बात भारत जैसे देशों के लिए भी उतनी ही प्रासंगिक है। आज दुनिया दो ध्रुवों में बँटती दिख रही है— लेकिन जो देश इन दोनों के बीच हैं, उनके लिए सबसे बड़ा सवाल यही है कि वे किस तरह अपनी आवाज़ बनाए रखें। ट्रम्प की दुनिया में सहयोग नहीं, सौदेबाज़ी है; मूल्य नहीं, मोलभाव है।
सच में जीना : दोहरे मानकों से बाहर निकलना
मार्क कार्नी अपने भाषण में बार-बार एक शब्द दोहराते हैं— “सच में जीना।” इसका मतलब क्या है? पहला— वास्तविकता को उसका नाम देना। नियमों पर आधारित व्यवस्था अब वैसी नहीं रही, यह स्वीकार करना होगा। दूसरा— दोहरे मानकों को छोड़ना। जब हम एक दिशा से आने वाले दबाव की आलोचना करते हैं और दूसरी दिशा से आने पर चुप रहते हैं, तो हम वही दुकानदार बन जाते हैं जो खिड़की में तख़्ती लगाए रखता है। तीसरा— सिर्फ़ पुरानी व्यवस्था के लौट आने की उम्मीद छोड़कर नई व्यवस्था बनाना।
यह बात सीधे ट्रम्प की राजनीति पर चोट करती है। ट्रम्प खुले तौर पर कहते हैं कि अंतरराष्ट्रीय संस्थाएँ बेकार हैं, संयुक्त राष्ट्र अप्रासंगिक है, WTO अमेरिका के ख़िलाफ़ है। लेकिन वे यह नहीं बताते कि अगर ये संस्थाएँ टूटती हैं, तो उनकी जगह क्या आएगा। कार्नी कहते हैं— नॉस्टेल्जिया कोई रणनीति नहीं है। पुरानी व्यवस्था वापस नहीं आएगी, लेकिन उससे बेहतर व्यवस्था बनाई जा सकती है— अगर ईमानदारी हो।
कनाडा की मिसाल देते हुए वे कहते हैं कि ताक़त केवल सेना या बाज़ार से नहीं आती। ऊर्जा संसाधन, शिक्षित समाज, लोकतांत्रिक बहुलता, खुला विमर्श— ये भी ताक़त हैं। और इन्हीं के आधार पर एक नई, अधिक न्यायपूर्ण व्यवस्था की नींव रखी जा सकती है।
ट्रम्प का नाम नहीं, लेकिन ट्रम्प की राजनीति कटघरे में
मार्क कार्नी का भाषण इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह ट्रम्प के ख़िलाफ़ गाली नहीं है, बल्कि ट्रम्प की सोच का पोस्टमॉर्टम है। यह बताता है कि समस्या सिर्फ़ किसी एक नेता की नहीं, बल्कि उस मानसिकता की है जो ताक़त को नियमों से ऊपर मानती है। ट्रम्प इस मानसिकता का सबसे बेशर्म चेहरा हैं, लेकिन अकेले नहीं हैं। फर्क यह है कि अब दुनिया के कुछ नेता खुलकर कह रहे हैं— “अब तख़्तियाँ उतारने का वक्त आ गया है।”
द इकोनॉमिस्ट मैगज़ीन के वॉल स्ट्रीट एडिटर माइक बर्ड ने भाषण को 'दुर्लभ अपवाद' बताया है. उन्होंने एक्स पर लिखा, "आमतौर पर राजनीतिक भाषणों का स्तर इतना गिर चुका है कि उन्हें सीधे पढ़ने की बजाय सिर्फ़ उनकी रिपोर्टिंग देखना ही काफ़ी माना जाता है, लेकिन कार्नी का दावोस में दिया गया भाषण एक दुर्लभ अपवाद है."
यह लेख किसी देश के पक्ष या विपक्ष में नहीं है। यह उस सवाल पर है जो आज पूरी दुनिया के सामने खड़ा है— क्या हम झूठ के भीतर जीते रहेंगे, या सच का सामना करेंगे? क्या लोकतंत्र सिर्फ़ ताक़तवर की सुविधा बन जाएगा, या नियमों और नैतिकता पर टिकेगा? ट्रम्प की राजनीति इस सवाल को और तीखा बना देती है। और मार्क कार्नी जैसे नेता यह याद दिलाते हैं कि विकल्प अभी भी मौजूद है— बशर्ते हम अभिनय छोड़ने का साहस करें। (chatgpt से 'छत्तीसगढ़' अख़बार द्वारा लिखवाया गया फ़रमाइशी लेख)


