विचार / लेख
-सिद्धार्थ ताबिश
असल में अगर आप देखेंगे तो पायेंगे कि ‘मोह और माया’ रहित जीवन सिर्फ पश्चिम के लोग जीते हैं। उनका सारा जीवन उधार और क्रेडिट कार्ड में चलता है। धन संचय न के बराबर। सोना और चांदी तो बिल्कुल न के बराबर खरीदते हैं क्यूंकि उन्हें मुसीबत के दिनों की फिक्र नहीं होती है.. और रिश्तों का ये मामला होता है कि लडक़ों को अपने माता पिता से मिले भी चालीसों साल हो जाते हैं कभी-कभी बाकी रिश्तेदारी छोड़ ही दीजिये। अंकल, आंटी, कजिन के सिवा उनके शब्दकोष में और रिश्तेदारी के नाम ही नहीं होते हैं। शादी के बाद वो कभी भी माँ और पिता के पास नहीं रहते हैं। अपने 2 साल के बच्चे को भी अलग कमरे में सुलाते हैं.. दुनिया में कहीं भी जा कर एकदम अकेले बस जाते हैं। ठीक से सिर्फ एक त्यौहार क्रिसमस मनाते हैं बस.. मोह और माया से मुक्त होना उनके बचपन की ट्रेनिंग होती है। खतरों से खेलना और जग कर जीना उनके रोजमर्रा का जीवन होता है। इसलिए ज़्यादातर ‘जग’ कर और मोह माया से मुक्त होकर ही मरते हैं।
और भारतीय अपना जीवन उम्र भर सोना खरीदने, प्रॉपर्टी खरीदने, अपनी दस पुश्तों तक के लिए धन संचय करने, बेटा बेटी समेत दो दर्जन रिश्तेदारों को अपने आसपास रखने, कम से कम 50 तरह के रिश्तों के नाम, फुफेरी मौसी, चचेरी बुआ, लुटेरी ताई इत्यादि, इनका 35 साल का बेटा बहु को लेकर अलग जा कर रहने लगे तो कोई जतन नहीं छोड़ते हैं उसे अपने पास घसीटने में, सिर्फ परिवार और अपने परिवार को सीने से लगाने, सारी उम्र अपना और पराया करने, अम्मा बेटे के लिए मरी जाती है बेटा माँ के लिए भले दोनों 70 साल के हो गए हों, दुनिया में कहीं भी अकेले नहीं बस पाते हैं, सारा परिवार हर जगह ले जाते हैं, अकेलापन इनका सबसे बड़ा डर होता है। मरते दम तक अकेला रहने से डरते हैं.. साल में 300 त्यौहार मनाते हैं.. खतरे और जोखिम से कोसो दूर रहते हैं.. जाति और धर्म को अपना जीवन मानते हैं और जो कुछ भी भौतिक है बस उसी में जीवन बिताने में इनका सारा जीवन निकल जाता है फिर ये बेहोशी में मर जाते हैं और बाद में इनको मोक्ष दिलाने के लिए कव्वे को खाना खिला दिया जाता है जिस से इन्हें मोक्ष मिल जाता है।
भारतीय सिर्फ आध्यात्म के नाम पर गाल बजाते हैं और लोगों को उल्लू बनाते हैं। भारतीयों से बड़ा भौतिकवादी संसार में कोई दूसरा नहीं होता है।


