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पैसा, ताकत, रसूख और यौन हिंसा के मर्दाना तंत्र का नाम है एपस्टीन फाइल्स
17-Feb-2026 10:24 PM
पैसा, ताकत, रसूख और यौन हिंसा के  मर्दाना तंत्र का नाम है एपस्टीन फाइल्स

-नासिरुद्दीन

बहुत मुश्किल है, खुद के साथ हुई यौन हिंसा के बारे में बोलना। यह तब और मुश्किल हो जाता है, जब मुलजिम हर तरह से ताकतवर कोई मर्द हो।

मगर मुश्किलों और ख़तरों के बाद भी ताकतवारों के खिलाफ बोलना कितना जरूरी है, यह बार-बार सामने आता है। कई बार आवाज उठाने में काफी वक्त भी लगता है।

ऐसी कई मिसालें अपने देश में भी मिल जाएँगी। आवाज़ उठाने में देरी का यह मतलब कतई नहीं होता कि कोई जुर्म हुआ ही नहीं है।

हाँ, इन सबके दौरान बोलने वाली बहादुर स्त्रियों को जो झेलना पड़ता है, वह बेहद तकलीफ़देह होता है। उनकी नीयत, चरित्र और चुप्पी पर सवाल उठाए जाते हैं।

ताकत किसी चीज़ की हो सकती है। पैसा, रसूख, सत्ता, पद और जब मर्द के पास ये सब ताक़त होती है तो कई इनका बेख़ौफ इस्तेमाल यौन उत्पीडऩ और हिंसा के लिए करते हैं।

यौन अपराधी जेफऱी एपस्टीन और उसके दोस्तों की मंडली की भी कहानी कुछ ऐसी ही है।

इसी वजह से कुछ वक्त से जेफऱी एपस्टीन और उसके दोस्त- मददगार लगातार सुर्खिय़ों में बने हैं। यह यौन अपराधी कौन था या उसके दोस्त कौन हैं, इनके बारे में काफ़ी कुछ जानकारी सामने आ चुकी है।

उसके दोस्तों में पढ़ाने वाले, लेखक, कलाकार, बिजनेसपर्सन, कम्प्यूटर दिग्गज, राजनेता, नौकरशाह, अफसर। सब शामिल हैं। इसकी आँच भारत तक भी पहुँची है।

इस हंगामे के बीच, यह भी बार-बार कहा जा रहा है कि एपस्टीन फ़ाइल में नाम आना, इस बात का सुबूत नहीं है कि वह शख्स यौन शोषक या उत्पीडक़ है। सही बात है। वैसे तो ‘यौन शोषक’और ‘उत्पीडक़’ भी तब तक मुजरिम नहीं है, जब तक कानून उन्हें दोषी न ठहराए।

इसलिए ज़रूरी है क?ि एपस्टीन केस के बारे में थोड़ी जानकारी यहाँ साझा की जाए।

20 साल पहले लगा था आरोप

बात आज से लगभग 20 साल पहले साल 2005 में शुरू होती है। चौदह साल की एक लडक़ी के माँ-बाप ने इल्जाम लगाया कि जेफरी एपस्टीन ने अपने घर में उनकी बेटी पर यौन हिंसा की।

यही नहीं, एपस्टीन के घर की तलाशी के दौरान कई और लड़कियों की तस्वीरें भी मिलीं।

इसके बाद साल 2008 में एपस्टीन को यौन अपराध के लिए दोषी ठहराया गया। उसे 18 महीने की सजा हुई।

लेकि न उसे 12 घंटे के लिए बाहर जाने और काम करने की इजाजत भी मिल गई। लगभग 13 महीने तक ऐसी सजा काटने के बाद उसे रिहा कर दिया गया।

सजा के साथ ही एपस्टीन का नाम साल 2008 में ही न्यूयॉर्क के यौन उत्पीडक़ों के रजिस्टर में जिंदगी भर के लिए दर्ज कर लिया गया। यौन अपराध के मामले में यह एक अहम रजिस्टर है।

इसमें जिनका नाम दर्ज होता है, उन पर कई तरह की पाबंदी और निगरानी होती है।

लेकिन इन सबके पहले उसके वकीलों ने कम सजा और ज़्यादा बचाव का तरीका निकाला। सरकारी वकीलों के साथ समझौता हुआ। इस समझौते की शर्तों ने जाँच का दायरा सीमित कर दिया।

यानी आगे इसकी जाँच नहीं होगी कि इस मामले में यौन हिंसा की पीडि़त और भी लड़कियाँ हैं या नहीं। या एपस्टीन के साथ-साथ और कौन-कौन लोग इस अपराध में शामिल थे।

इसलिए उस वक््त पता भी नहीं चल पाया कि इस जुर्म में उसके साथ और कौन-कौन शामिल थे। यही नहीं, इस समझौते की जानकारी एपस्टीन के खिलाफ़ आवाज़ उठाने वालों को नहीं दी गई।

रसूख़दारों को बचाने के आरोप

आपराधिक न्याय प्रक्रिया को ताकतवर मर्द अपने हक में कैसे इस्तेमाल करते हैं, एपस्टीन केस इसका नमूना है। कई बार पूरा तंत्र ही उन्हें बचाने में लग जाता है।

भारत में भी यौन उत्पीडऩ या अपराध के किसी ताकतवर मुलजिम के मामले में ऐसे एक नहीं बल्कि अनेक उदाहरण आसानी से मिल जाते हैं। आज भी आरोप लग रहे हैं कि एपस्टीन के साथ शामिल ताक़तवर मर्दों को बचाया जा रहा है।

बहरहाल, एपस्टीन के यौन उत्पीडऩ से जुड़ी चर्चाओं ने तब गति पकड़ ली जब ‘मियामी हेराल्ड’ की खोजी पत्रकार जूली के। ब्राउन और उनके साथियों ने इसकी तफ़्तीश करनी शुरू की।

उनकी रिपोर्ट ने एपस्टीन के ‘यौन हिंसा के जाल’ की तरफ लोगों का ध्यान खींचा। रिपोर्ट के मुताबिक, जूली ब्राउन लगभग 80 सर्वाइवरों की पहचान करने में कामयाब रहीं।

इनमें लगभग 60 महलिाओं को तलाश भी लिया। आठ बात करने के लिए तैयार हुईं और सिर्फ चार अपनी पहचान के साथ बात करने के लिए राज़ी हुईं।

ताकतवर लोगों के जुल्म और ज़्यादती के खिलाफ स्त्री का बोलना कितना मुश्किल होता है, यह इससे भी पता चलता है।

रिपोर्ट के मुताबकि, वे अपने साथ हुई हिंसा पर शमर्दिंा थीं। उन्हें कहीं न कहीं इस बात का भी अहसास था कि ऐसे ताकतवर लोगों के साथ कुछ नहीं हो सकता। इन बहादुर आवाजों के सामने आने के बाद, साल 2019 में एपस्टीन की फिर गिरफ़्तारी हुई।

महीने भर बाद ही वह अपनी जेल की कोठरी में मृत मिले। अब नए सिरे से उनकी मौत की जांच को लेकर मांग उठ रही है।

यौन हिंसा से जुड़े जेफऱी एपस्टीन के केस में तीन अहम पड़ाव हैं- साल 2005, साल 2008 और साल 2019।

इन सालों में उस पर कई इल्जाम लगे। जुर्म साबित हुआ। फिर इल्जाम की लंबी फेहरिस्त सामने आई। दोबारा गिरफ्तारी हुई।

दिलचस्प है कि यह सब उस अमेरिका में हो रहा था, जिसकी ताकतवर सत्ता खुद को आधुनिक और इंसाफपसंद मानती रही है।

लेकिन आधुनिक और इंसाफ़पसंद होने का सबसे बड़ा पैमाना है, वंचित तबकों ख़ासकर स्त्रिियों के बारे में नजरिया और उनके साथ इंसाफ़ का सुलूक।

यौन हिंसा की जड़ में श्रेष्ठता और गैरबराबरी

एपस्टीन और उसकी मर्दाना मंडली उस पूरी व्यवस्था को बेनकाब करते हैं, जहाँ स्त्रियाँ, मर्दों के लिए महज एक यौन वस्तु हैं। ऐसा नहीं है कि यह सब दुनिया के बाकी हिस्सों में नहीं होता।

मर्द सत्ता, पद, पैसा, रसूख जैसी ताकतों के बूते स्त्री को सेवक और यौन दासी बनाना चाहते हैं। क्योंकि उनके लिए स्त्री महज एक देह है। उनका यकीन है कि ये देह उनके ही इस्तेमाल के लिए है। इसलिए इसे वे हर तरह से अपने काबू में करना चाहते हैं।

इस यौन शोषण और यौन हिंसा की जड़ में है- श्रेष्ठता और गैरबराबरी का खयाल। यानी मर्द ही श्रेष्ठ है। स्त्री उसके बराबर नहीं है और ना ही हो सकती है। स्त्री, मर्द की सेवा के लिए है।

एप्सटीन की फाइल में कुछ स्त्रियाँ भी हैं। वे एपस्टीन को बचाती हैं। यही नहीं, सामने आए दस्तावेजों के मुताबिक़, उससे उनकी बातचीत महज पेशेवर मामलों तक नहीं सिमटी होती है।

वे भी लड़कियों को महज शरीर के दायरे में देखती हैं। इनमें से भी कुछ तो मर्दों की टोली के यौन उत्पीडऩ के लिए मासूम, कम उम्र लड़कियों को बहलाती-फ़ुसलाती और तैयार करती हैं।

अपने साथ हुई यौन हिंसा और उत्पीडऩ के खिलाफ बोलने वाली एक लडक़ी ने बताया कि उन्हें सिखाया जाता था कि कैसे सब कुछ चुपचाप करना है। सहना है। जो-जो जेफरी कहे, वह करके उसे ख़ुश करना है। वह कहती हैं कि स्त्री के नाते उन्हें यह ज़्यादा चुभता था कि एक स्त्री ही यह सब होने दे रही है बल्कि ऐसा होने में मदद कर रही है।

यह पितृसत्ता का उदाहरण है। स्त्रिियों को भी लगता है कि मर्दों की दुनिया ऐसे ही चलती है। अगर उन्हें भी इसमें चलते रहना है तो मर्दों के मुताबिक काम करना होगा।

मर्दाना ताकत का कुचक्र

एपस्टीन की ऐसी ही एक महत्वपूर्ण सहयोगी गिलेन मैक्सवेल को साल 2021 में नाबालिग लड़कियों को फुसलाने और उनका यौन शोषण कराने में सहयोग के इल्ज़ाम में मुजरिम ठहराया गया।

लड़कियों के लिए मर्दाना ताकत का कुचक्र अँधेरे कुएँ की तरह है। उन्हें फँसाया जाता है। वे फिर मानो किसी दलदल में फँसती चली जाती हैं। इनके लिए बोलना, आसान नहीं होता।

उनके साथ जुर्म हुआ है और उन्हें ही शर्मिंदगी का अहसास कराया जाता है। जुर्म उनके साथ होता है और यह समाज सजा भी उन्हें ही देता है। तभी तो एपस्टीन के मामले में भी शुरुआत में चंद बहादुर लड़कियाँ ही बोलने की हिम्मत जुटा पाईं।

यही नहीं, एपस्टीन फाइल और भी कुछ बताती है। जहाँ तक स्त्रिियों के साथ सुलूक का सवाल है, प्रगतिशील माने जाने वाले मर्दों पर भी यकीन करना मुश्किल है।

एपस्टीन दुनिया के बेहतरीन दिमाग से मदद माँग रहा था और वे उसे इस बात की सलाह दे रहे थे कि मीडिया में उसके यौन अपराधों के बारे में छप रही ख़बरों से कैसे निपटा जाए। ऐसे लोगों के शामिल होने ने अनेक लोगों का भरोसा तोड़ा है। कई गुस्से और सदमे में हैं।

यानी, दुनिया की सत्ता-संरचना अब भी बड़े पैमाने पर मर्दाना है। दबंग मर्दानगी का दबदबा है। 

जहरीली मर्दानगी का बोझ समाज पर बहुत ज़्यादा है। आज भी स्त्री की गरिमा वाला समाज बनना बाक़ी है।

लेकिन ढेरों स्त्रियाँ खामोश रहने को राजी नहीं हैं। वे यह सब बदलना चाहती हैं। इनमें जेफरी एप्सटीन और उसके दोस्ताना समूह के यौन उत्पीडऩ, शोषण और हिंसा सहने वाली अनेक लड़कियाँ शामिल हैं।

 इन स्त्रियों में एक लिज़ा फिलिप्स कहती हैं, ‘हम चाहते हैं कि पूरी फाइल और (एप्सटीन के सभी कथित सहयोगियों के) नाम उजागर किए जाएँ। मेरे लिए, इंसाफ का मतलब है यौन तस्करी के जाल का पर्दाफाश करना ताकि आगे वे किसी को नुक़सान न पहुँचा सकें।’

ये सब बहादुर स्त्रियाँ अब अपनी आवाज़, नाम, चेहरा भी छिपाने को तैयार नहीं हैं। वे बरसों की यौन हिंसा की यातना के खिलाफ ख़ामोशी तोड़ रही हैं। आवाज बुलंद कर रही हैं। अमेरिकी संसद के चौखट पर दस्तक दे रही हैं। (bbc.com/hindi)


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