विचार / लेख
अपूर्व गर्ग
रविश कुमार ने सवाल उठाया कुत्ते हिंसक क्यों हो रहे? उन्होंने कुत्तों के हमला करने की पेपर कतरनें भी पोस्ट की।
पहली बात क्या कुत्ते इंसान से ज़्यादा हिंसक हुए ?
दूसरी बात, आज की दुनिया में घर से बाहर पैर रखते ही मौजूदा वातावरण में हमारा दिल-दिमाग, तेवर कैसे बदल जाते हैं। बीपी बढऩे के प्रकरण बताते हैं इंसान कितना परेशान, तनाव में और घुटन में जी रहा है।
शहर में आम आदमी के खुल कर सांस लेने की जगह नहीं बची।
बगीचे प्लाट बन गए, खेल के मैदान काम्प्लेक्स, व्यावसायिक मैदान बन चुके । बच्चे खेल नहीं सकते, बुजुर्ग आजादी से घूम नहीं सकते।
जरूरत से ज्यादा औद्योगिकीकरण ने धूल, धूप और हवा में जहर घोल दिया। बाकी जो बचा वो डीजे, तेज हॉर्न जैसे ध्वनि प्रदूषण ने पूरा कर दिया ।
सुनिए , ये दुनिया पागलखाना बन चुकी है । आज की भाषा न हिंदी है न उर्दू न इंग्लिश। आज सिफऱ् एक भाषा में बात लोग समझते हैं , वो है , पूँजी की भाषा। लालच, लूट, हवस, मुनाफे की।
शोषण कर सकते हैं तो आप इस दुनिया में फिट हैं वरना ये दुनिया जेल से भी बदतर हो चुकी।
इस दुनिया ने चैन, अमन, आराम,प्यार, मोहब्बत, दोस्ती-यारी, मुस्कराहट, ठहाके, स्वास्थ्य सब छीन लिया।
न तालाब छोड़े न पेड़, न समुद्र को बख़्शा न नदियों पर रहम किया, पहाड़ों को तो मटियामेट कर अपनी कब्र ही खोद डाली!
मैं आपको पर्यावरण, प्रदूषण, ग्लोबल वार्मिंग, ध्वनि के आतंवाद पर कोई निबंध नहीं पढ़ाना चाहता।
मैं तो सिर्फ ये बता रहा हूँ कि दुनिया का पागलपन चरम पर पहुँच चुका जहाँ इंसान भयानक हिंसक हो चुका और ठीक ऐसे दौर में ऐसे वातावरण में ऐसे पागलों के बीच रहते हुए अगर कुत्ते हिंसक न होंगे तो क्या अहिंसा का आंदोलन करेंगे ?
इंसानों के लिए ही नहीं मयस्सर खाना-पानी-छाया-मैदान तो कुत्ते जाएँ तो जाएँ कहाँ ?
परेशान इंसान आत्महत्या कर सकता है पर कुत्ते हिम्मत नहीं हारते वो आवाज उठाते हैं ,भौकते हैं और बेहद -बेहद विपरीत परिस्थितियों में होने के बाद काटते हैं ।
उनकी हिंसा को उनका प्रतिरोध समझिये और समीक्षा कुत्तों की नहीं सर्जरी इंसानों के बनाए इस पागलखाने की करिये।
कुत्ते तो बुनियादी तौर पर परिवार के सदस्य होते हैं।
वो इंसानों से ज़्यादा प्यार करते हैं।
उनके दिल में नफरत की एक बूँद नहीं सिर्फ मोहब्बत होती है । उनसे मोहब्बत चाहिए तो खुद को बदलिये और इस दुनिया को बदलिए ।


