विचार / लेख
दीपाली अग्रवाल
इस दौर के कितने ही शायर अपनी प्रेमिका को अमृता कहते हैं और साहिर की चौखट पर खुद को खड़ा करते हैं। हर गजल कहने वाला चाहता है कि उसकी कलम में साहिर का गम बहे, जि़न्दगी का अब्दुल हई से वास्ता है या नहीं ये दूर की बात है। वैसी जि़न्दगी तो आसान नहीं है लेकिन इश्क में किसी को अमृता कह देना आसान है। सो वहीं खुद को साहिर के कद से नापने की कोशिश करते हैं।
यक़ीनन साहिर सिर्फ जिस्म से ही लंबे नहीं थे उनकी कलम आसमान की सातवीं परत के भी तारे खोज लायी थी। अब्दुल हई जो बाद में साहिर लुधियानवी हो गए अजीयतों के तमाम दौर से गुजरे। तल्खिय़ों का शायर लिफ्ट से डरता था, अकेलेपन से घबराता था, उसे अपने लिए कपड़े चुनने में मुश्किल होती थी। लेकिन जब उसकी रौशनाई बहती तो दुनिया भर के कितने किस्से उसमें उछाल खाते थे।
चकलाघर से लेकर जंग टालने तक साहिर ने वो सब कुछ कहा जो कहा जाना था और जो आज भी उतना ही प्रासंगिक है जैसा तब था। सिर्फ नज्में और गजलें नहीं गीत भी। ‘हमने सुना है एक है भारत’ कईयों बार फेसबुक फीड में दिखा। 1959 में लिखा गीत जो खासतौर पर अपने बोलों की वजह से वायरल है। उसमें दूरदर्शिता है, जहन की बारीकी है। साहिर के हर गीत में यही तासीर है।
मैं सोचती हूँ साहिर अगर शायर या गीतकार न होते तो एक अच्छे दार्शनिक भी हो सकते थे।
‘ग़म और खुशी में फर्क न महसूस हो जहाँ
मैं दिल को उस मकाम पे लाता चला गया’
‘संसार की हर शय का इतना ही फसाना है
इक धुँद से आना है इक धुँद में जाना ह’
एक शेर में जिन्दगी के पूरे फसाने को समझाने वाले इस शायर जैसा फिर कौन न होना चाहेगा। लेकिन आज के दौर के प्यारे शायरों प्रेमिका को अमृता कहने से काम न चल पावेगा, वो जब जाएगी इमरोज के पास तो तुम कहोगे
‘मह़िल से उठ जाने वालो तुम लोगों पर क्या इल्ज़ाम
तुम आबाद घरों के वासी मैं आवारा और बदनाम’
साहिर की चौखट से कब तक काम चलाओगे। साहिर ने तो अपनी मोहब्बत के खुलासे कभी खुल कर नहीं किए, ये तमाम बातें तो अमृता की इक तरफा दास्तान हैं। हाँ, तुम अगर भीतर आँगन तक जाने की हिम्मत करो तो शायद कुछ राज़ खुलें।


