विचार / लेख

क्लाउडिया गोल्डिन के नोबेल से आगे की बात...!
25-Oct-2023 4:11 PM
क्लाउडिया गोल्डिन के नोबेल से आगे की बात...!

  संजय वर्मा

मेरे एक मित्र की रेडीमेड कपड़ों की दुकान थी। मित्र खुले विचारों के थे और उनकी पत्नी पढ़ी-लिखी! उन्होंने अपनी पत्नी को प्रोत्साहित किया कि वह व्यापार में उनकी मदद करे।

भाभी जी ने दुकान पर बैठना शुरू किया। पर एक अजीब मुश्किल हो गई। सबसे नजदीकी सार्वजनिक शौचालय एक किलोमीटर दूर था। हर कुछ घंटे में उन्हें दुकान के कर्मचारी की मोटरसाइकिल पर बैठकर वहां तक जाना पड़ता। यह उनके लिए बहुत एंब्रेसिंग था।

कुछ ही महीनों में उन्होंने दुकान जाना बंद कर दिया । एक संभावना खत्म हो गई!

क्लाउडिया गोल्डिन को क्या यह पता है की हम अब तक यह टॉयलेट जैसी बुनियादी समस्या ही हल नहीं कर पाए हैं , उनकी रिसर्च पर क्या बात करें?

भारत में कामकाजी महिलाओं की कम तादाद के लिए टॉयलेट सबसे बड़ी वजह है।

कुछ साल पहले जब मैंने अपनी एक छोटी सी फैक्ट्री शुरू की तो मैं चाहता था मेरी फैक्ट्री में महिलाएं भी काम करें।

संयोग से उस इलाके में बहुत सी महिला मजदूर दूसरे कारखानों में काम करती थीं। जल्दी ही हमारे यहां स्त्री पुरुष अनुपात समान हो गया।

मैं खुश था। महिला मजदूर न गुटखा खाने का ब्रेक लेती थी न सुपरवाइजर से झगड़ा करती थीं। हमारे पुरुष कामगार जल्दी-जल्दी नौकरी छोडक़र चले जाते थे पर महिलाएं टिकी रहती।

मैंने एक दिन अपने सुपरवाइजर पूछा इसकी वजह क्या है? उसने कहा-सर ये महिलाएं हमारे यहां से काम कभी नहीं छोड़ेंगी क्योंकि हमारे यहां टॉयलेट है..!

मैंने कहा वह तो दूसरे कारखानों में भी होता होगा? उसने कहा- नहीं दूसरे कारखानों में महिलाएं पास के किसी खाली प्लाट में जाती हैं , एक घेरा बना लेती हैं, या फिर एक साड़ी को परदे की तरह दो महिलाएं पकड़ कर खड़ी हो जाती हैं और इस तरह काम निपटाया जाता है।

उस दिन मुझे अपने पुरुष होने और एंप्लॉयर बिरादरी का सदस्य होने के नाते बहुत शर्म आई।

इस बात को 15 साल बीत चुके हैं। अब स्थिति बेहतर हुई है । मगर आज भी किसी महिला सिपाही को चौराहे पर खड़ा देखता हूं तो मन में पहला सवाल यही आता है कि इसे टॉयलेट जाना होगा तो ये क्या करेगी?

टॉयलेट नहीं होने की वजह से ज्यादातर महिलाएं पानी नहीं पीती या दबाव को लगातार बर्दाश्त करती हैं। जाहिर है अपनी सेहत की कीमत पर!

मेरी बड़ी इच्छा थी कि मेरे दफ्तर में भी महिला कर्मचारियों को काम पर रखूं। मगर मेरी कोई बड़ी कंपनी नहीं बस एक छोटी सी दुकान थी, वह भी एक ऐसे इलाके में जो थोड़ा शेडी है।

आम दुकानों की तरह मेरी दुकान में भी दिन भर लोग एक दूसरे को गालियां देते थे (मैं शामिल)! 2010 के आसपास मैंने एकाउंटस के लिए एक लडक़ी को काम पर रखा। पर एक नई मुश्किल आने लगी।

हमारे ग्राहक सप्लायर ट्रांसपोर्टर उसे लगातार घूरते रहते। असल में वे अभी तक जिस तरह की दुकानों में जाते थे वहां कोई महिला कर्मचारी नहीं होती थी । बावले गांव में ऊंट आ गया। वे बेवजह उससे बात करने की कोशिश करते।

एक सप्लायर तो इतना ढीठ था कि काम खत्म होने के बाद भी बैठा रहता। मुझे उसे लगभग हकालना पड़ता। कुछ ही समय में वह लडक़ी चली गई।

मगर मैंने हिम्मत नहीं हारी। मैंने अपने यहां की भाषा सुधारी, माहौल सुधारा। समय लगा, लेकिन आज मेरे यहां पर चार लड़कियां काम करती हैं जिनमें से एक फैक्ट्री सुपरवाइजर है।

मुझे उन लोगों से चिढ़ है जो लड़कियों को सजी-धजी गुडिय़ा की तरह ग्राहकों को आकर्षित करने के लिए काम पर रखते हैं या उनसे टेलीकॉलिंग करवाते हैं।

मैं चाहता था मेरी लड़कियां जमीनी काम करें। वे बच्चियां जो कभी किराने का सामान लेने भी अकेले नहीं गई थीं , मैंने उन्हें हौसला दिया ,काम सिखाया।

अब वे हमारे बैंक मैनेजर से बहस करने जाती हैं कि चेक अभी तक खाते में क्रेडिट क्यों नहीं हुआ? ट्रक वालों से भाड़े को लेकर झगड़ती हैं , वकीलों के दफ्तर में जाती हैं, ऑडिट रिपोर्ट बनवाती हैं , लोडिंग रिक्शा में माल लोड करवाती हैं, मजदूरों को तनख्वाह बांटती हैं ।

यह सच है कि इसकी शुरुआत मेरे भीतर के एक्टिविस्ट ने की थी, मगर यह आर्थिक रूप से भी मेरे लिए बहुत फायदेमंद रहा।

लड़कियां बहुत अच्छी एम्पलाई होती हैं। वे चोरी नहीं करती। मक्कारी नहीं करतीं । लंबे समय तक एक ही कंपनी में टिकती हैं। शायद इसलिए क्योंकि उन पर खुद को साबित करने का दबाव लडक़ों के मुकाबले ज्यादा होता है। उन्हें बड़ी मुश्किल से काम करने , बाहर निकलने का जो मौका मिला है वे इसे गंवाना नहीं चाहतीं।

यदि आपकी भी दुकान ऑफिस या कोई कारखाना है तो मेरी आपको सलाह है लड़कियों को काम पर रखिए। बस उन्हें एक साफ टॉयलेट और सुरक्षित माहौल दीजिए फिर देखिए वे आपके लिए क्या कमाल कर दिखाएंगी।


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