विचार / लेख
न्यायपालिका विधायिका या कार्यपालिका की भूमिका अपने हाथों में नहीं ले सकती है, लेकिन हस्तक्षेप कर सकती है। अदालतें ऐसी जगह बन रही हैं जहां लोग समाज के लिए अभिव्यक्ति को बुलंद आवाज देने के लिए आते हैं। तात्पर्य यह हैं कि न्याय एवं न्याय प्रणाली से टूटता भरोसा लोकतंत्र के लिए गंभीर संकट की ओर इशारा करता है।
डॉ. लखन चौधरी
भारतीय उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश ने विगत दिनों भारतीय न्याय व्यस्था यानि भारतीय कानूनी प्रणाली के बारें में जो बातें कहीं हैं, वह वाकई बहुत गंभीर है। आजादी के 75 सालों में भारतीय न्याय व्यस्था यानि भारतीय कानूनी प्रणाली से आम आदमी वाकई निराश हुआ है। अब तो न्याय की उम्मीद रखना ही एक तरह से बेमानी होती जा रही है। सत्ता, कुर्सी, बड़े एवं जिम्मेदार पदों पर बैठे लोग सही-गलत, उचित-अनुचित, जायज-नाजायज, कानून एवं न्याय आदि की व्याख्याएं अपनी सहूलियत एवं अपने बचाव के हिसाब से करने लगे हैं। ऐसे में आम जनता के लिए न्याय की उम्मीद पालना या न्याय पर भरोसा करना ही निरर्थक सा लगता है। सीजेआई डीवाई चंद्रचूड़ का कथन है कि ‘इतिहास में लीगल सिस्टम यानि कानूनी प्रणाली का मिसयूज या कहें कि एक तरह से दुरूपयोग हुआ है या अनुचित उपयोग किया गया है। दरअसल में कानूनी प्रणाली अन्याय-भेदभाव के लिए एक तरह से हथियार की तरह होती है लेकिन इसी कानूनी प्रणाली ने हाशिए पर रह-रहे बहुसंख्यक समुदायों को नुकसान पहुंचाने का काम किया है।’
सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस का कहना है कि लीगल सिस्टम को अक्सर समाज के हाशिए पर रहे समुदायों को दबाने के हथियार के लिए इस्तेमाल किया गया है। अमेरिका में भेदभाव करने वाले कानूनों के बनने से गुलामी प्रथा को बढ़ावा मिला। अमेरिका और भारत दोनों देशों में लंबे समय तक कई समुदायों को वोट डालने का अधिकार नहीं दिया गया। इस तरह कानून का इस्तेमाल ताकतवर संरचना तंत्र को बनाए रखने और भेदभाव को बढ़ावा देने के लिए किया गया। इसका खामियाजा हाशिए पर रहे समुदायों को लंबे समय तक उठाना पड़ा। समाज में होने वाले भेदभाव और अन्याय को धीरे-धीरे सामान्य माना जाने लगा, जिससे कुछ समुदाय समाज की मुख्य धारा से अलग होते चले गए, इसके चलते हिंसा और बहिष्कार की घटनाएं बढ़ती चली गईं।
ऐसे वक्त में कानूनी प्रणाली ने भी हाशिए पर रह-रहे समुदायों के खिलाफ इतिहास में हुई गलतियों को कायम रखने में अहम भूमिका निभाई। गुलामी की प्रथा के चलते लाखों अफ्रीकन लोगों को अपना देश छोडऩा पड़ा। अमेरिका के स्थानीय लोगों को अपनी जमीन छोडक़र जाना पड़ा। भारत में जाति प्रथा के चलते निचली जातियों के लाखों लोगों को शोषण का शिकार होना पड़ा। महिलाओं और दूसरे अल्पसंख्यक समुदायों को दबाया गया। इतिहास अन्याय के ऐसे उदाहरणों से भरा हुआ है। आज अधिकार मिलने के बाद भी महिलाओं के साथ हिंसा हो रही हैं। भारत में आजादी के बाद शोषण सहने वाले समुदायों के लिए कई नीतियां बनाई गईं। उन्हें शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और प्रतिनिधित्व के अवसर दिए गए।
हालांकि संवैधानिक अधिकारों के बावजूद समाज में महिलाओं को भेदभाव और हिंसा का सामना करना पड़ रहा है। जाति के आधार पर होने वाले भेदभाव पर बैन लगने के बाद भी पिछड़े समुदायों के खिलाफ हिंसा की घटनाएं सामने आती हैं। सीजेआई ने कहा कि बुरा संविधान भी अच्छा बन सकता है, बशर्ते उसे चलाने वाले अच्छे लोग हों। अंबेडकर कहते थे कि ‘संविधान चाहे कितना भी अच्छा क्यों न हो, अगर वे लोग खराब निकलें, जिन्हें संविधान को अमल में लाने का काम सौंपा जाएगा तो संविधान का खराब साबित होना तय है। वहीं, संविधान चाहे कितना भी खराब क्यों न हो, अगर जिन लोगों को इसे अमल में लाने की जिम्मेदारी दी गई है, वे अच्छे हैं तो संविधान का अच्छा साबित होना तय है।’ भले ही न्यायाधीशों को जनता नहीं चुनती, लेकिन समाज में उनकी बहुत महत्वपूर्ण भूमिका है, न्यायपालिका का समाज के विकास में ’स्थिर प्रभाव’ है।
समाज में अदालतों की भूमिका पर चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने बड़ी टिप्पणी की है। उन्होंने कहा, समाज प्रौद्योगिकी के साथ तेजी से बदल रहा है। भारत बहुलतावादी समाज, न्यायाधीशों का तटस्थ रहना बेहद जरूरी होता है। न्यायाधीशों को ’समय के उतार-चढ़ाव’ से परे रहना चाहिए। भारत जैसे बहुलवादी समाज के संदर्भ में कोर्ट को सभ्यताओं, संस्कृतियों की समग्र स्थिरता में भूमिका निभानी है। सांस्कृतिक और सामाजिक पृष्ठभूमि के हिस्से के रूप में अदालतें नागरिक समाज और सामाजिक परिवर्तन की खोज के बीच जुड़ाव का केंद्र बिंदु बन गई हैं। लोग केवल नतीजों के लिए ही नहीं, बल्कि संवैधानिक परिवर्तन की प्रक्रिया में आवाज उठाने के लिए भी अदालतों का दरवाजा खटखटाते हैं। यद्यपि यह एक जटिल सवाल है कि लोग अदालतों में क्यों आते हैं ? और इसके कई कारण हैं।
दरअसल में विधायिका और कार्यपालिका की भूमिका जज नहीं निभाते हैं, लेकिन लोगों का कोर्ट में आना अदालतों के लिए बहुत महत्वपूर्ण है, क्योंकि देश में शासन की कई संस्थाएं हैं। संविधान में निश्चित रूप से शक्तियों के पृथक्करण का सिद्धांत है। न्यायपालिका विधायिका या कार्यपालिका की भूमिका अपने हाथों में नहीं ले सकती है, लेकिन हस्तक्षेप कर सकती है। अदालतें ऐसी जगह बन रही हैं जहां लोग समाज के लिए अभिव्यक्ति को बुलंद आवाज देने के लिए आते हैं। तात्पर्य यह हैं कि न्याय एवं न्याय प्रणाली से टूटता भरोसा लोकतंत्र के लिए गंभीर संकट की ओर इशारा करता है। यदि समय रहते सरकार इस पर गंभीरता से विमर्श नहीं करती है, तो आने वाले दिनों में समाज में अराजकता की स्थिति निर्मित होने को रोक पाना असंभव हो सकता है।


