विचार / लेख
सनियारा खान
कहीं पर पढ़ा था कि जब अपनी शक्ति पर ज़्यादा घमंड हो जाए तब अक्सर युद्ध करने का जी करता है। और जब युद्ध खत्म हो जाता है तब उसके परिणाम की घोषणा करने वाला कोई भी इंसान जिंदा नहीं बच पाता है। सिर्फ आम लोग ही नहीं, युद्ध करने वाले सैनिक भी अपने घर परिवार का कोई न कोई सदस्य जरूर खो देते है। तो इस बदला लेने की प्रक्रिया में हर कोई पाने की होड़ में खोता ज्यादा है।
राजा अशोक ने युद्ध और हत्या का वीभत्स रूप देख कर पश्चाताप करते हुए शांति का मार्ग अपनाया था। लेकिन अब अशोक की राह को अपनाने वाले कम ही हैं। अब तो हम प्रगति के शिखर पर बैठ कर भी आदिम पाशविकता की तरफ कुछ ज़्यादा ही आकर्षित होते जा रहे हैं। दो दो विश्व युद्ध के परिणामों को देख कर भी हम सबक नहीं सीख रहे हैं। बस ‘हम ही सब से ताकतवर’ ये आत्ममुग्धता में जीते हुए हम मौत की तरफ जैसे भागे जा रहे हैं।
भारत पाकिस्तान, अमेरिका वियतनाम, इस्लामिक देशों की लड़ाई, इजराइल पेलेस्टाइन,रशिया यूक्रेन सभी मुल्क युद्ध के साए में जी ही रहे हैं। अब हमास ने इजराइल पर बर्बर हमला कर दिया। प्रतिक्रिया स्वरूप इजराइल भी तो पलट कर बर्बर हमला ही कर रहा है। चाहे यूएन में सभी देश एकजुट होकर आतंक के खिलाफ कितनी भी बड़ी बड़ी बातें करे.... युद्ध हो कर ही रहता है। आपसी रिश्तों को देख कर या फिर आगे पीछे का नफा नुकसान देख कर जिनको जो सही लगता है उन्हीं के साथ हो लेते हैं या अलग हो जाते हैं। इंसानियत की जगह इन सभी के बीच एक तरह से आपसी सौदा होना कहा जाए तो गलत नहीं होगा।
ये भी कटु सत्य है कि हथियार खरीदने बेचने वाले देश कभी नहीं चाहेंगे कि युद्ध बंद हो। अमेरिका और चीन जैसे हथियारों के सौदागरों के लिए ये अच्छी बात नहीं होगी। अगर दुनिया में सब से प्रख्यात माने जाने वाला मोसाद को धोखे में रख कर उसकी नाक के नीचे से इतना बड़ा आतंकी हमला किया जा सकता है तो फिर बाकी एजेंसियों को क्या ही कहें! अब तो विश्व का कोई भी देश सीना तान कर ये नहीं कह सकता हैं कि उसे कोई डर नहीं है चाहे कितना भी शक्तिशाली देश हो तो भी नहीं। साथ-साथ ये बात भी सच है कि दूध का धुला हुआ कोई भी नहीं है।
हर देश ने नफरत के लिए जगह बचा कर रखी है। ये नफऱत ही धीरे धीरे युद्ध में रूपांतरित हो जाती है। हिरोशिमा मानव इतिहास का एक बेहद कलंकित अध्याय है। प्रथम और द्वितीय विश्व युद्ध के बाद के इतने सालों में भी छोटे बड़े कितने युद्ध होते ही रहे हैं। विश्व भर में शांति स्थापना करने के उद्देश्य से ही राष्ट्र संघ गठन किया गया था। लेकिन पिछले 75 सालों से राष्ट्र संघ किसी भी लड़ाई को रोक नहीं पाया। पहले की वियतनाम और अमेरिका की लड़ाई, इराक ईरान की लड़ाई, रवांडा और बोस्निया में गृह युद्ध के साथ साथ व्यापक नर संहार के समय भी राष्ट्र संघ कमजोर दर्शक बना रहा। बहुत से मानवाधिकार कर्मी भी राष्ट्र संघ को ले कर हताश है।
मलेशिया के भूत पूर्व प्रधानमंत्री महाथिर मोहम्मद ने भी पेलेस्टाईन और इजरायल के बीच इस हद तक बात बिगडऩे के लिए राष्ट्र संघ को ही दोषी ठहराया। यही नहीं यूक्रेन की राष्ट्रपति जेलेनेस्की का भी कहना है कि राष्ट्र संघ में गलत लोगों की राजनैतिक आधिपत्य हो गया है। कई विशेषज्ञ भी यही मानते हैं कि अमेरिका,चीन, रशिया, ब्रिटेन और फ्रांस की विशेषाधिकार ताकत के सामने राष्ट्र संघ चाह कर भी अपनी मजऱ्ी से कुछ कर नहीं सकता है।
इतना सब कुछ होने के बाद फिर गांधी जी को ही याद करना जरूरी हो जाता है। क्यों कि उन्होने ही समझाया था कि हथियार की जगह शांति वार्ता से हल निकालने की कोशिश होनी चाहिए। अगर हथियार से समस्याएं सुलझा सकते होते तो अब तक विश्व की हर जगह शांति ही शांति होती। अफगानिस्तान कहे या इराक में ताकतवर हो कर भी अमेरिका कामयाब नही हो पाया। तो अब एक बार युद्ध की जगह शांति को तरजीह देकर हमें देखना चाहिए कि युद्ध से शांति को पाया जा सकता है या फिर शांति से युद्ध को हराया जा सकता है! तृतीय विश्व युद्ध शुरू होने से पहले ही इस दिशा में हम सब आगे बढ़ पाए तो शायद विश्व बच जाए।
इजराइली लेखक युवाल नोआ हरारी को सुना जाए तो हर देश के लिए ये जरूरी है कि आतंकी गतिविधियों को खत्म करने के साथ साथ ये भी ध्यान रखा जाए कि आम लोगों को एक बेखौफ और सुकून का माहौल दे सके। हालाकि उम्मीद बिल्कुल नहीं है, क्योंकि हाल ही में टाइम्स ऑफ इंडिया में छपी एक खबर के मुताबिक शिकागो में एक मकान मालिक ने अपनी किरायेदार महिला और उसके छ: साल के बेटे पर इसलिए हमला कर दिया कि वे फिलीस्तीनी मूल के मुसलमान थे। महिला को उसने चाकू से दर्जन भर वार किए और बच्चे को 26 बार गोदा। बच्चे की मौत हो गई और मां अस्पताल में है।
समझ में नहीं आ रहा है कि कौन कितना ज़्यादा हिंसक या कम हिंसक है, इसे नापने का कोई पैमाना भी है क्या! अन्त में साहिर लुधियानवी जी की बात याद आ रही है.....
जंग तो खुद ही एक मसअला है
जंग क्या मसअलों का हल देगी.....


