विचार / लेख
डॉ. आर.के. पालीवाल
जलवायु परिर्वतन के लिए किसान सबसे कम जिम्मेदार है लेकिन इसका कहर सबसे ज्यादा किसान पर ही टूट रहा है। यह ऐसा ही है जैसे किसी दुष्ट अपराधी के अपराधों की सजा निर्दोष लोगों को मिले।करे कोई और भरे कोई।
अक्तूबर मध्य में अचानक तेज हवा के साथ आधा घंटे जोर की बारिश ने लगभग अधपके धान के खेतों को धरती पर औंधे मुंह लिटा दिया। जिस धान के खेत मे जितना ज्यादा बड़ा और अच्छा धान था उसमें उतना ही ज्यादा नुक्सान हुआ है। यह हमारी आपबीती भी है और धान के असंख्य अन्य किसानों की भी। हम भी अपने खेत के जिस सबसे अच्छे धान की क्यारी को रोज निहार कर खुश हो रहे थे कि अगले हफ्ते इससे खुशबूदार धान और चावल मिलेगा, उसका नुक्सान देखकर आहत हैं।
करीब चार पांच दशक पहले जब परंपरागत प्राकृतिक खेती होती थी तब किसानों की फसलें मौसम की प्रतिकूलताओं को काफी हद तक झेल जाती थी। इसका सबसे बड़ा कारण यह था कि किसान ज्यादातर ऐसी फसल उगाते थे जो मौसम के उतार चढ़ाव को बर्दाश्त कर सकें। मोटे अनाज और स्थनीय देशी बीजों में अपने इलाके के मौसम से तालमेल की क्षमता होती है। इधर सरकार और सरकार से ज्यादा बाजार किसानों को हाइब्रिड बीजों से ऐसी नकदी फसल उगाने के लिए प्रोत्साहित करते हैं जिनसे ज्यादा पैदावार हो। ऐसी फ़सल एक तरफ मौसम की प्रतिकूलता बर्दाश्त नहीं कर पाती और दूसरी तरफ़ उसमें कीट काफी नुकसान पहुंचाते हैं जिनके नियंत्रण के लिए जहरीले कीटनाशक का प्रयोग करना पड़ता है।
बीज, खाद और कीटनाशक खरीदने के कारण किसानों को अतिरिक्त लागत लगानी पड़ती है लेकिन जलवायु परिवर्तन के कारण अक्सर फसल की बुवाई के तुरंत बाद या जब फसल पकने के कगार पर होती है ऐसे में बारिश, ओले और आंधी फसल का बड़ा हिस्सा बर्बाद कर देते हैं। उदाहरण के तौर पर इस बार मध्य प्रदेश में पहले मई में असामान्य बारिश हुई, फिर जून जुलाई में लंबा सूखे का असामान्य दौर रहा और सितंबर के अंतिम सप्ताह में असामान्य बारिश हुई और अब अक्तूबर मध्य में तेज हवा के साथ असामान्य बारिश ने मक्का, उड़द, सोयाबीन और धान की फसलों को काफी नुक्सान किया है। बरसात के एक सीजन में तीन चार बार मौसम का असामान्य होना अब आम होता जा रहा है।
किसानों की साक्षरता और जागरूकता औसत से बहुत कम है। ऐसी विषम परिस्थितियों से निबटना अल्प आय वाले किसानों के लिए असंभव है। इन्ही परिस्थितियों से दुखी होकर किसानों की आत्महत्या बढ़ रही हैं।
किसानों के लिए अब पानी सर के ऊपर आ चुका है। जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभाव से भारतीय किसानों को बचाने के लिए किसी महत्वाकांक्षी योजना बनाना बहुत जरूरी हो गया है। इस योजना में सभी फसलों की उचित कीमत, बाजार के अभाव में सरकार की शत प्रतिशत खरीदी की गारंटी, सरकार समर्थित हर सीजन की फसल का अनिवार्य बीमा और फ़सल खराब होने की स्थिति में त्वरित सर्वे कर त्वरित मुआवजे की अदायगी ऐसे जरूरी कदम हैं जिन्हें प्राथमिकता के आधार पर लागू किया जाना चाहिए। किसानों को भी पारंपरिक और प्राकृतिक खेती की तरफ लौटने की जरुरत है। जो किसान इस दिशा में पहल करते हैं सरकार को उन्हें विशेष प्रोत्साहन राशि उपलब्ध कराई जानी चाहिए ताकि निकट भविष्य में जलवायु परिवर्तन के कारण किसानों को होने वाली परेशानियों से बचाया जा सके और देश की बडी आबादी को उचित मात्रा में जहर मुक्त अन्न, दलहन, तिलहन, सब्जी और फलों की अबाधित आपूर्ति सुनिश्चित हो सके। प्राकृतिक खेती से प्रकृति और पर्यावरण संरक्षण भी होगा और जैविक आहार मिलने से लोगों का स्वास्थ भी ठीक रहेगा।


