विचार / लेख
डॉ. आर.के. पालीवाल
आजादी के बाद से धीरे धीरे हमारे समाज के बहुत बड़े तबके में तिहरी दरिद्रता प्रवेश कर गई है। हमे ऊपर सतह पर दिखने वाली भौतिक संसाधनो की दरिद्रता तो साफ दिखाई पड़ती है लेकिन बाकी दो और भी ज्यादा खतरनाक दरिद्रता मन की दरिद्रता और दिमाग की दरिद्रता हैं जो अक्सर सतह पर दिखाई नहीं देती। मन की दरिद्रता के दो बड़े कारण हमारा बढ़ता लालस और आलस हैं। हम मेहनत मशक्कत से जी चुराने वाले नागरिक बनते जा रहे हैं। हम सरकारी नौकरी या सफेद कॉलर प्राइवेट नौकरी को सभ्य समाज में प्रवेश का द्वार मानते हैं, चाहे वह घूस देकर मिले, नकल करके मिले, फर्जी डिग्री या फर्जी जाति प्रमाण पत्र से मिले या किसी बड़े नेता या अफसर की सिफारिश का जुगाड करके मिले। हम शॉर्ट कट से आनन फानन में मंजिल पर पहुंचना चाहते हैं , चाहे उसके लिए कितने ही अनुचित साधन क्यों न इस्तेमाल करने पड़ें। विभिन्न जातियों और समुदायों के आरक्षण के लिए होने वाले आंदोलन भी इसी मानसिक दरिद्रता का राजनीतिक नमूना हैं।
हमारी दरिद्रताओं में दिमाग की दरिद्रता सबसे ज्यादा खतरनाक है। हमारा दिमाग विवेक का इस्तेमाल कर यह सोचना बंद कर देता है कि क्रिकेट में पाकिस्तान को हराने पर हमें ऐसा क्यों लगने लगता है कि हम खुशियों के एवरेस्ट के शिखर पर पहुंच गए। जब हम विवेक अग्निहोत्री की फिल्म कश्मीर फाइल के चार सौ करोड़ या शाहरुख ख़ान की फिल्म जवान द्वारा आठ सौ करोड़ कमाने पर नाचने लगते हैं ,और जब हम असली नायकों की उपेक्षा कर राजनीतिज्ञों, बॉलीवुड के कलाकारों और क्रिकेट खिलाडिय़ों को भगवान मानने लगते हैं, तब हम दिमागी दरिद्र होने लगते हैं।
इसके बरक्स जागरूक नागरिक के रुप में हमारे प्रश्न होने चाहिएं कि जो नेता दिन रात हमारे कल्याण की योजनाओं की गर्जना करते रहते हैं और अखबारों में इन्हीं योजनाओं के विज्ञापन प्रकाशित कराते रहते हैं, उनके शासन काल में हम क्यों दिन ब दिन कंगाल होते जा रहे हैं और अंबानी और अडानी आदि क्यों दिन दूनी रात चौगुनी तरक्की कर मालामाल होते जा रहे हैं! हमे सोचना चाहिए कि आखिर बड़े नेताओं के क्रिकेट का ककहरा नही समझने वाले बच्चे ही क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड के पदाधिकारी क्यों बन रहे हैं !
हमें इस बात पर भी चिंतन करना चाहिए कि लालू प्रसाद यादव के जेल जाने पर राष्ट्रीय जनता दल के अनेक वरिष्ठ और अनुभवी नेताओं के बजाय राजनीति की एबीसीडी नही समझने वाली राबड़ी देवी को ही मुख्यमंत्री की कुर्सी पर क्यों बैठाया गया और बाद में उनके नौसिखिया पुत्र तेजप्रताप को ही क्यों उप मुख्यमंत्री बनाया गया। मुलायम सिंह यादव ने राजनीति में दशकों से सक्रिय अपने दो भाइयों रामगोपाल यादव और शिवपाल यादव और आजम खान जैसे विश्वसनीय नेता के होते हुए पुत्र अखिलेश यादव को ही क्यों पार्टी की कमान और मुख्यमंत्री की गद्दी सौंपी।अजीत सिंह के दल की कमान जयंत चौधरी को ही क्यों मिली!
मध्यप्रदेश विधानसभा चुनावों की सबसे बडी घोषणा मल्लिकार्जुन खडग़े, कमलनाथ और दिग्विजय सिंह के रहते प्रियंका गांधी ने क्यों की!आखिर नरेंद्र मोदी में ऐसा क्या है कि हमारे लिए लिए मोदी है तो सब मुमकिन हो जाए ! फिर क्यों उन्हें किसान आंदोलन के सामने हथियार डालने पड़े और कृषि बिल वापस लेने पड़े। क्यों वे डबल इंजन सरकार होते हुए मणिपुर की हिंसा पर लगाम नहीं लगा सके। क्यों उनके कई फैसलों को सर्वोच्च न्यायालय को बदलना पड़ा और कड़ी टिप्पणी करनी पड़ी।
दरअसल सत्ता और बाजार के जबरदस्त गठजोड़ ने विज्ञापन और प्रोपेगंडा से हमारे चारों तरफ तर्क, विवेक और विचार शून्यता पैदा कर ऐसा माहौल निर्मित कर दिया है जो हमारा मन भटकाता है।उसकी भ्रामक चकाचौंध में हम आम नागरिक भूल जाते हैं कि हमारे शरीर में दिमाग नाम की भी कोई चीज मौजूद है। हम अपने दिमाग का इस्तेमाल करना भूलते जा रहे हैं। जब हम दिमाग को इस्तेमाल करना कम करते जाते हैं वह धीरे धीरे कुंद होता जाता है और हम दूसरों के हिसाब से चलने लगते हैं। इसी वजह से आजकल अधिकांश लोग मानसिक दरिद्र होकर राजनीति के गुलाम बन रहे हैं।


