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कनक तिवारी लिखते हैं-न्यूजक्लिक की न्यूज तो क्लिक है, गिरफ्तारी क्यों?
18-Oct-2023 3:57 PM
कनक तिवारी लिखते हैं-न्यूजक्लिक की न्यूज तो क्लिक है, गिरफ्तारी क्यों?

हालिया हुई पत्रकारों की गिरफ्तारी के कारण कुछ जनसमर्थक प्रेस संस्थानों ने भारत के चीफ जस्टिस को यह चिट्ठी लिखी है:-

3 अक्टूबर 2023 को दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने न्यूज पोर्टल ‘न्यूजक्लिक’ के 46 पत्रकारों, संपादकों, लेखकों और इससे किसी न किसी तरह से जुड़े लोगों के घरों पर छापा मारा। छापेमारी में दो व्यक्तियों को गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (यूएपीए) की विभिन्न धाराओं के तहत गिरफ्तार किया गया और उनके डेटा की सलामती सुनिश्चित किए बिना- एक बुनियादी प्रोटोकॉल जो उचित प्रक्रिया के लिए जरूरी है, उनके मोबाइल फोन और कंप्यूटर आदि को जब्त कर लिया गया। यूएपीए लगाया जाना विशेष रूप से डराने वाली बात है। पत्रकारिता पर ‘आतंकवाद’ का मुकदमा नहीं चलाया जा सकता।

जिस प्रकार पुलिस संविधान द्वारा गिरफ्तारी का आधार बताने के लिए बाध्य है, उसी प्रकार पूछताछ के लिए भी यह एक पूर्व शर्त होनी चाहिए। इसकी गैर-मौजूदगी में, जैसा कि हमने न्यूजक्लिक के मामले में देखा है, किसी अनाम अपराध की जांच को लेकर किए गए अस्पष्ट दावे, पत्रकारों से अन्य बातों के साथ-साथ, किसान आंदोलन, सरकार की कोविड महामारी से निपटने और नागरिकता (संशोधन) कानून के खिलाफ विरोध-प्रदर्शन की उनकी कवरेज के बारे में सवाल करने का आधार बन गए हैं।

हमें डर इस बात का है कि मीडिया के खिलाफ सरकार की कार्रवाइयां हद से ज्यादा बढ़ गई हैं, और अगर यह सब जिस दिशा में जा रहा है, उसे वहां जाने दिया गया, तो किसी सुधारात्मक कदम के लिए बहुत देर हो जाएगी। इसलिए, हम सभी का सोचना यह है कि अब उच्च न्यायपालिका को मीडिया के खिलाफ  जांच एजेंसियों के बढ़ते दमनकारी इस्तेमाल को खत्म करने के लिए हस्तक्षेप करना चाहिए।

विशेष रूप से, अगर अदालतें हमारी निम्न गुजारिशों पर गौर करेंगी, तो हम उनके आभारी रहेंगे:-

पत्रकारों के फोन और लैपटॉप कीअचानक जब्ती को हतोत्साहित करने के लिए मानक तैयार करना। प्रसिद्ध शिक्षाविदों- राम रामास्वामी और अन्य बनाम भारत सरकार, डब्ल्यू.पी. (सीआरएल) क्रमांक 138ध्2021- द्वारा दायर एक रिट याचिका के संबंध में सुप्रीम कोर्ट इस मुद्दे पर विचार कर रहा है और मामले में भारत सरकार द्वारा दायर हलफनामों से संतुष्ट नहीं है। जहां एक तरफ न्याय की लड़ाई जारी है, वहीं सरकार दंडमुक्ति के साथ अपनी कार्रवाइयां जारी रख रही है। उपकरणों की जब्ती से हमारे पेशेवर काम के साथ समझौता होता है। जैसा कि सुप्रीम कोर्ट ने (पेगासस मामले में) खुद कहा है कि स्रोतों की सुरक्षा मीडिया की स्वतंत्रता का एक ‘महत्वपूर्ण और जरूरी हिस्सा’ है। लेकिन लैपटॉप और फोन अब सिर्फ आधिकारिक कामकाज के लिए इस्तेमाल होने वाले डिवाइस नहीं रह गए हैं। वे मूलत: किसी व्यक्ति का ही विस्तार बन गए हैं। ये डिवाइस हमारे पूरे जीवन से जुड़े हुए हैं और इनमें महत्वपूर्ण व्यक्तिगत जानकारी शामिल हैं- बातचीत से लेकर तस्वीरों तक, परिवार और दोस्तों के साथ हुई बातें भी। ऐसा कोई कारण या औचित्य नहीं है कि जांच एजेंसियों को ऐसी सामग्री तक पहुंच मिलनी चाहिए।

0 पत्रकारों से पूछताछ और उनसे जब्ती के लिए दिशा-निर्देश तैयार करना, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि इन्हें महज किसी तरह की जानकारी जुटाने के किसी अभियान तौर पर इस्तेमाल जाए, जिसका वास्तविक अपराध से कोई लेना-देना न हो।

0 उन सरकारी एजेंसियों और व्यक्तिगत अधिकारियों की जवाबदेही सुनिश्चित करने के तरीके खोजना जो कानून का उल्लंघन करते पाए जाते हैं या पत्रकारों के खिलाफ उनके पत्रकारीय कार्यों के लिए अस्पष्ट और बिना किसी समय सीमा या उद्देश्यहीन जांच के जरिये अदालतों को जान-बूझकर गुमराह करते हैं।

पिछले कुछ सालों में ऐसे कई उदाहरण सामने आए हैं जब सरकारों द्वारा स्वतंत्र प्रेस पर हमलों को लेकर न्यायिक दखल की जरूरत पड़ी है, और हम ऐसे मामलों को आगे बढ़ाना जारी रखेंगे। लेकिन पिछले दो दिनों के घटनाक्रम के बाद हमारे पास बहुत विकल्प नहीं बचे हैं, सिवाय इसके कि आपसे अपील करें कि आप इस बाबत संज्ञान लें और हस्तक्षेप करें, इससे पहले कि बहुत देर हो जाए और एक निरंकुश पुलिस स्टेट किसी तरह का कायदा बनकर सामने आ जाए।‘‘

क्या गलत किया इन पत्रकारों ने जिनके खिलाफ लचर और गैरकानूनी घटिया नस्ल की पुलिस कार्यवाही की गई है? जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय नौजवान छात्रों की धडक़न का केन्द्र है। जामिया मिलिया विश्वविद्यालय भी उसी तरह छात्र चेतना का बौद्धिक प्रतीक है। अपने हक हुकूक के लिए लडऩे वाली षाहीन बाग में आंदोलनरत रही महिलाओं के बारे में रिपोर्टिंग नहीं करना तो अपराध होता। यह अपराध इन पत्रकारों ने नहीं किया। देश का गौरव बनी महिला पहलवान बेटियां लंबे अरसे तक एक कथित बलात्कारी अधिकारी के खिलाफ  आंदोलनरत रहीं। सरकार उन पर ही लाठियां बरसाती रही। भारतीय कुश्ती फेडरेशन की मान्यता रद्द कर दी गई। फिर भी उस भाजपाई सांसद का बाल बांका नहीं हुआ। उसने तो संविधान, महिला सम्मान और देश की राजनीति को ही चुनौती दे रखी थी। वह वोट बैंक मजबूत करने का एक एजेंट समझा जाता है। हैदराबाद का छात्र रोहित वेमुला हो। केरल का पत्रकार कप्पन हो। दिल्ली का षरजील इमाम हो। भीमा कोरेगांव के एक्टिविस्ट आंदोलनकारी हों। पारदर्शी पुलिस अधिकारी संजीव भट्ट का मामला हो। ऐसे दर्जनों, सैकड़ों मामले देष में हैं। वहां मोदी सरकार की गफलत के कारण भारत का गौरवशाली इतिहास पनाह मांग रहा है। उन्हें कोस रहा है। फिर भी प्रधानमंत्री के चेहरे पर न तो षिकन है और न मुंह से कोई आवाज निकलती है। ऐसा नहीं है कि उन्हें वाचालता नहीं आती। वे भारत के ताजा इतिहास के सबसे ज्यादा वाचाल राजनीतिक नेता हुए हैं। वे कम बोलना तो जानते ही नहीं। खासकर उन सब मुद्दों पर जहां उन्हें अपनी गुडविल और टी आर पी बढ़ाने की तबियत होती है। व्यापक इंसानी मसलों पर वे चुप्पी काढ़ लेते हैं। भले ही लोगों का कितना ही नुकसान क्यों न हो जाए। हो भी रहा है।

देश के सबसे लाड़ले पत्रकार रवीष कुमार का मामला कौन नहीं जानता? एनडीटीवी के चैनल पर रात को नौ बजे रवीष का प्राइम टाइम देखना समझदार भारतीयों की आदत और जरूरत बन गई थी। मोदी-अडानी जोड़ेे की तमाम तरह की कुटिल हरकतों के चलते आखिरकार एन. डी. टी.वी. के मालिक प्रणय राय और उनकी पत्नी को इस तरह फांसा गया और आर्थिक कुप्रबंधन के नाम से ऐसी साजिषें की गईं कि रवीष कुमार ने अपना आत्मसम्मान बरकरार रखते एनडीटीवी से इस्तीफा दे दिया। साजिशकर्ताओं को लगता था  रवीश त्रिशंकु की तरह हो जाएंग। अपने दमखम और कलम की प्रतिबद्धता के सिपाही रहते रवीष ने अपना यू-ट्यूब चैनल खड़ा किया। लाखोंं लोग आज उनके मुरीद, दर्शक और श्रोता हैं। पत्रकारिता के इतिहास में रवीष नया परिच्छेद हैं। यही साहस तो अभिसार षर्मा भी कर रहे हैं। वे हर मुद्दे पर अपनी साफगोई, तार्किकता और संप्रेशणीयता जैसे हथियारों के साथ सरकार की एक एक बदनीयती का पर्दाफाश कर रहे हैं। विपरीत परिस्थिति में भी अभिसार शर्मा की हिम्मत है। इकॉनॉमिक एण्ड पोलिटिकल वीकली के संपादक रहे प्रणंजय ठाकुर गुहार्ता को मैनेजमेंट पर मोदी अडानी दबाव के कारण इस्तीफा देेने पर मजबूर किया। यह धाकड़, पारदर्शी, तार्किक और सिलसिलेवार पत्रकारिता करने वाला कलमवीर अपनी सीरत के साथ समझौता नहीं कर सकता। वह आज भी मोर्चे पर डटा हुआ है। पुण्य प्रसून बाजपेयी को भी एक साजिश के तहत उनके नियोक्ता चैनल से हटने पर मजबूर होना पड़ा। अब वे भी अपने साथियों की तरह यू ट्यूब पर बेहद सक्रिय, संघर्षशील और दो टूक कहने की हिम्मत और आदत रखते हैं। कभी मैंने उनसे विनोद में कहा था कि उत्तर भारत में जातिवाद के खिलाफ  सबसे पहला संघर्ष कबीर और रैदास के गुरु स्वामी रामानंद ने किया था। यह संयोग है कि स्वामी रामानंद के पिता का नाम भी पुण्यप्रसून बाजपेयी ही था।

इतिहास अभिसार शर्मा के साथ काम कर रही भाषा सिंह, संजीव चौधरी, अजीत अंजुम तथा न्यूज 24 जैसे चैनलों को कैसे भूल सकता है?  उनका साहस किसी प्रमाणपत्र का मोहताज नहीं है। वे अपने आपमें प्रमाणित हैं।  उर्मिलेश जैसा उद्यमशील, अध्ययनप्रिय, खोजी और यायावर पत्रकार किसी सरकारी नियम कायदे या पुलिस की गिरफ्त में आने की हालत में कैसे हो सकता है? एक साधारण परिवार में पैदा होकर छात्र जीवन से अपने आदर्षों को कर्म में बदलने की कोशिश करते उर्मिलेश ने बहुत महत्वपूर्ण लेखन किया है। उनकी हालिया किताब ‘मेम का बाड़ा’ और ‘गोडसे की गली’ में उद्यम विस्तार के साथ गोडसे और सावरकर के परिवारों के सदस्यों से लंबी जिरह और प्रतिपरीक्षण करते अपने इतिहास ज्ञान और कलम के प्रति प्रतिबद्धता के साथ जो अब तक अज्ञात रहे तथ्यों का खुलासा किया है। उन सबको पढक़र तो सहजता के सबसे ऊंचे दरबार में  उर्मिलेश के खिलाफ , खफा, खौफ  और नफरत का आभास तो आया होगा। निजी चैनल ‘न्यूज़ क्लिक’ में वे मानसेवी तरह की प्रतिभागिता करते रहे। वहां चीन से आर्थिक सहायता प्राप्त होने का उसके मालिक प्रवीर पुरकायस्थ के खिलाफ  तितम्मा खड़ा किया गया। उर्मिलेष का भी नाम उसमें संबंद्ध करने संदेह पैदा किया गया। इन सभी पत्रकारों से बिल्कुल नियम विरुद्ध उनके लैपटॉप, टेलीफोन, कम्प्यूटर, किताबें वगैरह जबरिया जप्त कर लिए गए। ताकि उनके खिलाफ कोई सबूत जुटा सकें। यही तो हुआ था भीमा कोरेगांव के मामले में जब उनमें एक आरोपी रोना विल्सन के लैपटॉप से छेड़छाड़ कर कथित रूप से पुलिस ने उसमें ऐसी कई प्रविष्टियां भर दीं जो आरोपी विल्सन को फंसाने के लिए की गई थीं। इस बात का खुलासा अमेरिका की एक उच्च ज्ञान प्राप्त रिसर्च संस्था ने किया। उसका जवाब आज तक पुलिस देने में आनाकानी कर रही है, बल्कि पीठ दिखा रही है।

उपरोक्त चि_ी एक तरह का बचाव मांगती है लेकिन पत्रकारों को इस बात पर भी ध्यान देना होगा कि संविधान के अनुच्छेद 19 में प्रेस की आजादी को नहीं लिखते लगभग सरकार समर्थक स्थितियां बना दी गई थीं। उनको लेकर भी दो सदस्यों ने बहुमूल्य सुझाव दिए गए थे। वे आज भी कारगर हो सकते हैं। अधिकतर सरकार के समर्थन में रहते जागरूक सदस्य टी. टी. कृष्णमाचारी ने अनुच्छेद 19 (1) में एक तरह की सीमित नागरिक आज़ादी को लेकर सरकार का बचाव किया। साथ ही उन्होंने कहा कि अभी हमारा पिछला अनुभव ब्रिटिश हुकूमत के समय बहुत कड़वा रहा है। तब लोगों की आजादी को पूरी तरह कुचला गया है। सरकार भी उन्हीं के पदचिन्हों के आधार पर फिलक्त तो बनी है लेकिन इतिहास गतिषील होता है। एक आजाद देश में नागरिकों में आत्मविश्वास भी तो आ रहा है। पिछली सरकार का जनता से कोई संबंध नहीं था। वह तो नौकरशाही के दम पर हुकूमत करती थी। यह मानसिकता तो बदलेगी क्योंकि हमारे नेता बहुत नामचीन लोग हैं। खासतौर पर प्रधानमंत्री और उप प्रधानमंत्री के जरिए लाखों लोगों की जरूरतेें सुलझाई जा सकती हैं। हमें ऐसे नेताओं से उम्मीद है जो मौजूदा व्याख्याओं को जनसुलभ बनाएंगे। कृष्णमाचारी का यह आश्वासन तत्कालीन परिस्थितियों के कारणों पर आधारित था अर्थात यदि माहौल बदलता है। तो संविधान के अनुच्छेद को परिवर्तित करते हुए उसकी व्याख्या की जा सकती है। इसी तरह एक सदस्य श्यामनंदन सहाय ने बेहतर व्यावहारिक सुझाव दिया था कि यदि सरकार को नागरिक आजादी को प्रतिबंधित करने के लिए कोई कानून बनाना पड़े। तो ऐसे कानूनों की लागू करने की वैधता समय बाधित होनी चाहिए। साफ -साफ  उल्लेख होना चाहिए कि ऐसा प्रतिबंध एक सुनिश्चित अवधि तक ही रहेगा। यदि इस तरह के सुझाव मान लिए गए होते या आज भी उन्हें लागू किया जाए। तो प्रेेस की आजादी पर लगे वहषी कानून नागरिक आज़ादी को ख्ंाडित करने में कठिनाई महसूस करेंगे।

यह भी उल्लेखनीय है कि प्रसिद्ध विचारक और पत्रकार अभय कुमार दुबे के अनुसार चीफ  जस्टिस को कुछ राहत देने संबंधी पत्र लिखने के साथ साथ मीडिया को भी चाहिए कि वह खुद या जनहित याचिका के माध्यम से  सुप्रीम कोर्ट में रिट दायर करे जिसमे वांछित अनुतोश मांगे जाएं। सुप्रीम कोर्ट यह नहीं कह सकता कि वह सरकार को कानूनों में संषोधन या लचीलापन लाने के लिए सलाह नहीं दे सकता। संविधान के अनुच्छेद 44 में अम्बेडकर ने साफतौर पर वायदा किया था कि समान नागरिक संहिता तभी लागू की जाएगी जब उससे संभावित रूप में प्रभावित होने वाले लोग अपनी सहमति प्रदान करें। इसके बावजूद सुप्रीम कोर्ट में सरला मुद्गल सहित चार पांच मुकदमों में बार बार केन्द्र सरकार को सलाह दी है कि वह समान नागरिक संहिता बनाने की दिशा में आगे बढ़े। ऐसी राय मिलने के बाद ही केन्द्र की मौजूदा सरकार और भाजपा नियंत्रित कुछ राज्य सरकारें अपना वोट बैंक पुख्ता करने के लिए सांप्रदायिक सद्भाव बिगाड़ते हुए समान नागरिक संहिता लाने के लिए लगातार आत्मप्रचार कर रही हैं। ऐसी हालत में सुप्रीम कोर्ट नागरिक आज़ादी को बचाए रखने के लिए सरकार से अनुच्छेद 19 में प्रेस का अधिकार एक आधार के रूप में षामिल करने के लिए क्यों नहीं कह सकता। वैसे भी बाबा साहेब अम्बेडकर ने अपने लिखित नोट में इसकी तजबीज तो की थी लेकिन बहुमत के सामने वे चुप रहे थे।

कोलकाता से प्रकाषित अंगरेजी अखबार ‘टेलीग्राफ’, प्रसिद्ध अखबार ‘हिन्दू’, कभी कभार ‘इंडियन एक्सप्रेस‘ वगैरह में सरकार को आईना दिखाने वाले समाचार रहते हैं। ‘टेलीग्राफ’ ने ठीक लिखा कि नरेन्द्र मोदी ने बहुत कुशलतापूर्वक देष की मीडिया को दो फांकों में बांट दिया है। एक अखबार कई झूठी खबरें छापकर जनता की तकलीफों को देखने के बदले सोता रहता है। अपना नाम लेकिन ‘जागरण’ रखता है। एक अखबार सूर्य की तरह उजाला करने की कोशिश में ‘भास्कर’ कहलाता है। कभी-कभी सरकारी दबाव के कारण उन बादलोंं में छिप जाता है जिनमें भारतीय सेना के राडार प्रधानमंत्री के अनुसार छिप जाते हैं। फिर पाकिस्तान की फौजें राडार को देख नहीं पातीं। ‘न्यूज क्लिक’ से जुड़ी छापेमारी के खिलाफ  रोष प्रदर्शित करने में प्रेस क्लब की बैठक में बड़े अखबारों के सम्पादक गायब थे। जबकि 1975 में इंदिरा गांधी द्वारा लगाए गए आपातकाल के विरोध मार्च में कुलदीप नैयर, बी.जी. वगीज, अरुण शौरी वगैरह जैसे शीर्ष पत्रकार शामिल हुए थे।

जनता को जम्हूरियत में जानने का तो पूरा हक है। यही तो भारत के कई पत्रकार अपनी लेखनी और रपट के जरिए मणिपुर की जनता और देष के नागरिक अधिकारों को लेकर कर रहे थे। कोई जवाब नहीं है देश के राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के पास कि संविधान का अनुच्छेद 78 कहता है कि प्रधानमंत्री का कर्तव्य होगा कि वह देश के कार्यकाल के प्रशासन संबंधी सभी विषयों की जानकारी राष्ट्रपति के मांगने पर उन्हें दें। देश जानना चाहता है, बल्कि दुनिया जानना चाहती है कि मणिपुर में क्या हो रहा है। कैसे प्रधानमंत्री हैं जिन्हेंं वहां तबाही और कत्लेआम की घटनाएं होने पर जाने तक की फुर्सत नहीं मिलती? अलबत्ता वह अपनी पार्टी के लिए चुनाव प्रचार और विदेश यात्रा तथा कई मनोरंजन कार्यक्रमों में जाने का समय निकालते रहते हैं। मणिपुर की घटनाएं इतिहास में मोदी शासन पर कलंक हैं। सरकारी प्रशासन का कोढ़ हैं। इक्कीसवीं सदी में मनुष्य जानवर से भी ज़्यादा गया बीता हो गया है। इसी का सबूत मणिपुर ही तो है।


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