विचार / लेख

साधनों के प्रति लापरवाह होती राजनीति
17-Oct-2023 3:38 PM
साधनों के प्रति लापरवाह होती राजनीति

डॉ. आर.के. पालीवाल

गांधी आज़ादी के आंदोलन के दौरान अपने नेतृत्व में चलने वाले सत्याग्रह और ग्राम स्वराज के रचनात्मक कार्यों में संसाधन जुटाते समय सबसे ज्यादा जोर साधनों की शुचिता पर देते थे। यह दो तरह से सुनिश्चित किया जा सकता है।सबसे आसान तरीका यह है कि हम अपने और अपने रचनात्मक कार्यों के लिए साधनों की आवश्यकता कम से कम करने का हर संभव प्रयास करें और साथ ही साधनों की आत्म निर्भरता का प्रयास भी करें।

फिर भी यदि बाहरी साधनों की बहुत आवश्यकता महसूस हो तो आने वाले साधनों के स्रोत की शुचिता की यथासंभव जानकारी अवश्य सुनिश्चित करनी चाहिए। चाहे तिलक फंड का मामला हो या हरिजन सेवा फंड अथवा कस्तूरबा फंड हो गांधीजी की कोशिश रहती थी कि फंड का अधिकांश हिस्सा आम जनता की छोटी छोटी राशि से एकत्र हो और फंड एकत्र करने वाले पूरी पारदर्शिता के साथ दानदाताओं का लेखा जोखा बनाएं। वर्तमान राजनीतिक दल इस मामले में हद दर्जे की लापरवाही बरतने लगे हैं। यही कारण है कि केन्द्र में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी पर अडानी समूह को अनुचित लाभ पहुंचाने के आरोप लगते रहे हैं। इसी तरह कांग्रेस पर विगत में अंबानी समूह से नजदीकियों के आरोप लगते रहे हैं और समाजवादी पार्टी पर सहारा समूह की नजदीकियों का सार्वजनिक प्रदर्शन आम रहा है। यही हाल अन्य क्षेत्रीय दलों का भी है। उन पर भी अपने प्रदेश के कुछ खास औद्योगिक घरानों से सांठगांठ के आरोप लगते रहते हैं। यह दूसरी बात है कि सरकारों के सरंक्षण में होने वाले घोटालों में पक्के सबूत जुटाना जांच एजेंसियों के लिए भी मुश्किल काम है।

दिल्ली में आम आदमी पार्टी की नजदीकियां भी शराब घोटाले में लिप्त व्यवसाईयों और रेस्टोरेंट चेन वालों से सामने आई है जिसमें पूर्व उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया और राज्यसभा सांसद संजय सिंह जेल में पहुंचे हैं और अरविंद केजरीवाल पर भी इसमें शरीक होने के आरोप लग रहे हैं। भले ही आम आदमी पार्टी यह कहे कि केंद्रीय एजेंसियां चुन चुन कर विपक्षी दलों का उत्पीडऩ कर रही हैं, लेकिन इस कथन में यह सच्चाई तो प्रतीत होती है कि केंद्रीय एजेंसियों और विशेष रूप से प्रवर्तन निदेशालय और सीबीआई के निशाने पर अधिकांश मामले विपक्ष से संबंधित हैं परंतु इसका मतलब यह नहीं है कि विपक्षी दल दूध के धुले हैं।

 मनीष सिसोदिया को हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट से अभी तक कोई राहत नहीं मिलने से यह तो स्पष्ट है कि जांच एजेंसियों का केस एकदम हवाई नहीं है अन्यथा मनीष सिसोदिया बड़े वकीलों की फौज के बावजूद जमानत तो पा ही सकते थे।

राजनीतिक दलों में साधनों की शुचिता के प्रति हद दर्जे की लापरवाही इस कदर फैल गई है कि इसमें उत्तर से लेकर दक्षिण और पूर्व से लेकर पश्चिम तक पूरे देश में सडऩ की स्थिति है। उदाहरण के तौर पर दिल्ली शराब कांड के तार भी उत्तर से दक्षिण तक के शराब सिंडिकेट से जुड़े हैं। दक्षिण में ही अवैध खनन के आरोपी रेड्डी बंधुओं से भारतीय जनता पार्टी की नजदीकियां और भगौड़े विजय माल्या को राज्य सभा सांसद बनाने में कई दलों द्वारा दिए गए सहयोग के मामले भी बहुत पुराने नहीं हैं।

आजकल छत्तीसगढ़ से महादेव लॉटरी सट्टे, जिसके तार दाऊद इब्राहिम और पाकिस्तान तक से जुड़े बताए जा रहे हैं, में राज्य की कांग्रेस सरकार और पुलिस प्रशासन के जुड़े होने की खबरें आ रही हैं।उपरोक्त तमाम मामलों में सभी राजनीतिक दल कम या अधिक इसी अपराध के दोषी हैं कि उन्होंने सत्ता प्राप्ति के लिए अपने दलों के आर्थिक संसाधनों को बेतहासा बढ़ाने के लिए आर्थिक साधनों की शुचिता के गांधी विचार को पूरी तरह ताक पर रख दिया है। इसी के चलते राजनीति की छवि बेहद धूमिल हो चुकी है और उसका सेवा तत्व कम होकर नगण्य रह गया है। लोकतंत्र और देश के लिए यह खतरनाक स्थिति है।


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