विचार / लेख

औरत की देह पर जख्मों का दस्तावेज
13-Oct-2023 4:16 PM
औरत की देह पर जख्मों का दस्तावेज

नीलिमा पांडेय

भारत का बटवारा 1947 के इतिहास के चंद गम्भीरतम झंझावातों में से एक था। एक करोड़ 20 लाख लोग बेघर हो गए । 10 लाख जान गई।

75000 स्त्रियों के बारे में कहा जाता है कि वह अगवे और तरह-तरह की ज़बरदस्तियों का शिकार हुईं।

परिवार बिखरे, संपत्ति लुटी और घर उजड़े। इन तमाम हिंसक तथा आपल्वनकारी घटनाओं की यादें अब जनस्मृति की चुप्पियों में खोई हुई हैं।

लेकिन देश के विभाजन से प्रभावित असंख्य लोग, जब अपने अकेलेपन के साथ होते हैं; इन छुट्टियों के पर्दे हटने लगते हैं और उन भयावह दिनों की दस्तक सुनाई देने लगती है। क्योंकि उनकी देहों और आत्माओं पर उन जख्मों की खरोंचें अभी भी बनी हुई हैं जो 1947 के उन खूनी दिनों की देन हैं।

उर्वशी बुटालिया की यह पुस्तक लगभग एक दशक के शोध कार्य, सैकडों स्त्रियों, प्रौढ़ों और बच्चों से लंबी अंतरंग बातचीत और ढेर सारे दस्तावेजों, रिपोर्ट, संस्मरणों, डायरी तथा संसदीय रिकॉर्ड के आधार पर लिखी गई है।

इसके पन्ने पन्ने पर उन बेशुमार आवाजों और वृतांतों को संवेदनशीलता के साथ उकेरा गया है , जो आजादी हासिल करने के 50 साल बाद भी हृदय हीनता और उपेक्षा के मलबे में दबी पड़ी थी। क्योंकि उनसे मुठभेड़ करने का साहस हम नहीं जुटा पाए हैं।

यह समझ पाना मुश्किल है कि किन लक्ष्यों को ध्यान में रखकर विभाजन स्वीकार किया गया और हकीकत में क्या क्या घटित हुआ, खासकर महिलाओं के साथ।


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