विचार / लेख
-सिद्धार्थ ताबिश
मेरे ऑफिस का ऑफिस बॉय ही ऐसा अकेला इंसान है जिसकी तीन से चार महीने की एडवांस सैलरी चला करती है। उसकी माँ अपने शराबी पति को गाँव छोडक़र इसके पास रह रही है अपने 12 साल के बच्चे के साथ ऑफिस बॉय का अभी 8 महीने का एक बेटा है। इसकी पत्नी दूसरे घरों में झाडू बर्तन करती है।
डिलीवरी के 5 महीने बाद ही वो वापस काम पर जाने लगी थी। इसलिए इस समय वो इतनी कमजोर हो गई है कि बीते दो हफ़्ते से उसका बुखार ही नहीं उतर रहा है। उसका अल्ट्रासाउंड करने के पैसे नहीं थे इन लोगों के पास मगर इस ऑफिस बॉय की माँ, खानदान की किसी भी शादी, किसी भी ब्याह, किसी भी मुंडन, किसी भी त्यौहार के मौके पर बड़ा बड़ा खर्च करने से गुरेज नहीं करती है। अब इसकी माँ ने प्लान बना रखा है अपने पोते के मुंडन का उसके लिए ऑफिस बॉय आज फिर ऑफिस में एडवांस मांग रहा था। मैंने पूछा कि ‘तुम्हारी सैलरी तीन से चार महीने की एडवांस चलती है.. और तुम्हें अब मुंडन करना है’.. कहने लगा ‘माँ और बाक़ी लोग नहीं मानेंगे’.. मैंने उस से पूछा कि ‘तुम्हारी पत्नी की दवा हो रही है ठीक से?’, कह रहा है वो ठीक है.. बस बुखार नहीं उतर रहा है उसका.. इसकी पत्नी को लगता है कोई सीरियस इशू है मगर उसकी इन लोगों को कोई चिंता नहीं है।
मैंने कहा कि तुम्हारे अकाउंट में कितने पैसे की सेविंग है? कहने लगा 600 रुपये हैं मेरे अकाउंट में। मैंने पूछा और तुम्हारी बीबी के.. कहने लगा 700 रुपये.. मैंने पूछा मुंडन में कितना लगेगा.. कहने लगा ‘25 हजार। ऑफिस से पैसा लूँगा और कुछ कर्जा लूँगा। क्यूंकि माँ भव्य मुंडन समारोह चाहती है.. मौसी और सबका अरमान है.. ऐसे कैसे अरमान छोड़ दूं सबका। सब लोग आयेंगे खाना खायेंगे.. बहनों को मुझे नेग देना होगा। ये सब ज़रूरी है न भईया.. इसके बिना कैसे चलेगा?’
इसकी पत्नी भी एक दिन मुझ से कह रही थी ‘भय्यिया, हमारी एक जमीन है, वो बिकने वाली है। पांच लाख की बिकेगी अगर तो हम लोग डेढ़ लाख का जगराता करेंगे.. सारे गाँव को बुलायेंगे.. ये मेरा और मेरी सास का प्लान है।’
भारत में लगभग आप जितने भी निम्न आय स्तर के लोगों को पायेंगे, पैसे को लेकर उन सभी का मैनेजमेंट आपको ऐसे ही मिलेगा। इन लोगों के सारे पैसे सिर्फ त्यौहार और शादी वगैरह की रस्में निभाने में खर्च होते हैं। सरकारी अस्पताल में इलाज करवाएंगे, राशन कण्ट्रोल से राशन लेंगे और अपनी सारी कमाई मुंडन, शादी, नेग, त्यौहार इत्यादि में खर्च करते रहेंगे। हर दूसरे महीने एक त्यौहार होता है भारत में जिस से निम्न और मध्यम आय वर्ग को पूरी उम्र कभी छुट्टी ही नहीं मिल पाती है।


