विचार / लेख

बाजार की साजिशों का अंत नहीं
11-Oct-2023 10:50 PM
बाजार की साजिशों का अंत नहीं

-सुजाता
यह बाजार एक बेहद चतुर व्यापारी है। वह मुफ्त में हमसे हमारी ही सारी सुविधाजनक पसंदीदा चीजें और आदतें छीनकर दोबारा हमें ही महंगे दामों में बेचता रहता है? और हमें आभास तक नहीं होता कि हम ठग लिए गए हैं।

दांत साफ करने के लिए दातुन, नमक, चारकोल, नींबू और अनेक जड़ी बूटियां को पहले तो बेहद हानिकारक बताकर, कैल्शियम के नाम पर कैमिकल्स से बना टूथपेस्ट आपको बेचता है और फिर सालों बाद उसी टूथपेस्ट को हानिकारक बताकर फिर से दातुन, नमक, चारकोल, नींबू और अनेक जड़ी बूटियों को टूथपेस्ट में मिलाकर आपको और अधिक महंगे दामों में बेचता है।

पहले आपके सादा चेहरे के मेकअप के लिए न जाने कितने ही प्रकार के प्रोडक्ट आपको बेचता है और फिर एक दिन ‘नो मेकअप लुक्स’ को ट्रैंड बनाकर पहले से भी महंगे प्रोडक्ट आपको बेचता है।

पहले तो दादी नानी की रसोईयों में इस्तेमाल होने वाले मिट्टी, लोहे, पीतल और तांबे के बर्तनों को सेहत के लिए खतरनाक बताकर आपको नान स्टिक, स्टील, एल्यूमीनियम आदि के बर्तन थमा देता है और अब वापिस उन्हीं मिट्टी, लोहे, पीतल आदि के बर्तनों को ब्रांड बना उन्हें महानगरों की यंगर जेनरेशन को महंगे दामों में बेच रहा है।

पहले चूल्हे पर पकाए खाने को स्वास्थ्य के लिए ख़तरनाक बताकर गैस, हीटर बाजार में उतारे जाते हैं और फिर ‘मिट्टी के चूल्हे की रोटी’ को एक लक्जरी खाद्य पदार्थ की श्रेणी में शामिल कर महंगे दामों पर बेचा जाता है।

बाकी प्लाजो, सलवार, शरारे, गरारे, टाईट फिट, घेरदार, बेलदार, बैलबाटम, फुल/हाफ/मिड स्लीव आदि ट्रैंड फैशन की दुनिया में हर छ: महीने एक साल में धरती की तरह अपनी धुरी पर घूमते ही पाए जाते हैं और हम आप उस ट्रैंड के गिर्द चक्करघिन्नी बने अपने पैसे खर्च करते ही रहते हैं।

पहले फ्लैट्स और बाल्कनियों को ही मॉडर्न लाइफस्टाइल ट्रैंड बनाकर उन्हें हद से महंगे दामों पर बेचने की कवायद के चलते जड़ से बने घरों को चलन से पहले बाहर किया गया और फिर उन्हीं जड़ से बने घरों को ‘विला’बताकर फ्लैटों से भी महंगे दामों पर बेचा जा रहा।

बाजार की चाल जितनी समझ आई है उससे तो यह लगता है कि अब ये हमसे हमारे छोटे शहरों को ओल्ड फैशन लिविंग स्टाइल बताकर उन्हें चलन से बाहर कर गली मुहल्ले खाली करवा कर दोबारा हमे ही इन्हें न्यू हाई फाई लाइफ स्टाइल लग्जरियस ट्रैंड बताकर और अधिक महंगे दामों में बेचने की साजि़श रच रहा है।

ये बाजार हमारी जरूरतें पूरी करने के लिए बना था और इसे हमारे पीछे भागना चाहिए था लेकिन कमाल की बात देखिए? कि हम अंधे होकर इसके पीछे भाग रहे हैं और ये हमसे हमारा सुख चैन सब छीनकर हमें ही दोबारा महंगे दामों में बेचने में व्यस्त है।

ये तो केवल कुछ उदाहरण हैं गौर करें तो हम हर प्रकार से ठगे जा रहे हैं। तो फिलहाल सुखी वही है जो बाजार के बहकावे में न आकर अपने निर्णय स्वयं ले रहा है। बाकि जनसंख्या/ रोजगार का अनुपात एक अलग समस्या है ही जिसका निदान शायद ही कभी हो पाए।


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