विचार / लेख
डॉ. आर.के.पालीवाल
पहले कार्यकाल में प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी देश के अधिकांश नागरिकों के लिए अबूझ पहेली की तरह थे। गुजरात में उन्होंने बहुत लंबा और उतना ही विवादित प्रशासन चलाया था। वहां की अधिसंख्य आबादी में उनकी लोकप्रियता भी चरम पर थी जिसका लाभ उन्हें पहले भारतीय जनता पार्टी के शीर्ष पुरुष बनने में हुआ और फिर उनकी संसद की धरती को चूमने वाली, कभी खुद को चौकीदार, फकीर और चाय बेचने वाला आदि प्रचारित करने वाली मनमोहक अदाओं ने गुजरात के बाहर भी देश की बडी आबादी को सम्मोहित कर लिया था।प्रधानमन्त्री के रुप में उनका दूसरा कार्यकाल उतना सम्मोहन भरा नहीं रहा जैसे पहला था जिसमें बिना खास तैयारी किए नोटबंदी जैसे जल्दबाजी में उठाए गए और देश की अर्थ व्यवस्था को बहुत सुस्त कर देने वाले गलत कदम को भी जनता ने हंसी खुशी यह मानकर स्वीकार कर लिया था कि इससे आतंकवादियों और भ्रष्टाचारियों का काला धन नष्ट हो जाएगा हालांकि ऐसा हुआ नहीं।
दूसरे कार्यकाल में उनके कीमती और फैशनेबल कपड़ों ने उनकी फकीरी और चाय बेचने वाली गरीबी की धज्जियां उड़ा दी हैं। बहुत महंगे सूट से लेकर त्रासदी के समय में भी डिजाइनर ड्रेसों ने उनकी शालीन और संवेदनशील छवि को धूमिल किया है। सबसे ज्यादा अडानी समूह से आत्मीय संबंधों को लेकर उनकी चौकीदार वाली छवि भी काफ़ी हद तक तार तार हुई है। इसका खामियाजा भारतीय जनता पार्टी को कर्नाटक और हिमाचल प्रदेश के विधानसभा चुनावों में भुगतना पड़ा है।उनके कार्यकाल में हुए जम्मू कश्मीर से धारा 370 हटाने और राम मंदिर विवाद सुलझने के बाद उसके निर्माण को गति प्रदान करने आदि कई कामों ने उनकी लोकप्रियता को अभी भी काफ़ी हद तक बचाकर रखा है लेकिन वह अब पहले जैसे उच्च शिखर पर नहीं है।
कुछ-कुछ इसी तरह की स्थिति यू पी ए सरकार में प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह के दूसरे कार्यकाल के दौरान भी हुई थी। लम्बे समय तक एक दल के शासन में सरकार के खिलाफ जन आक्रोश उभरना स्वाभाविक भी है। जिस तरह से तत्कालीन भारतीय जनता पार्टी नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में सीधे मनमोहन सिंह पर कोयला घोटाले की जिम्मेदारी डाल रही थी उसी तरह विपक्षी दलों ने भी अब सीधे प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी पर निशाना साधना शुरु कर दिया है। संसद से सडक़ और सार्वजनिक सभाओं में उनकी कार्यशैली पर बारंबार उंगलियां उठ रही हैं। चाहे मणिपुर की लंबी हिंसा और महिलाओं के साथ आज़ादी के बाद के जघन्यतम अपराधों पर उनकी लंबी चुप्पी हो या प्रवर्तन निदेशालय, सी बी आई और इनकम टैक्स विभाग की विरोधियों पर ताबड़तोड़ कार्यवाही हों या हिंडनवर्ग रिर्पोट में अडानी समूह पर आर्थिक अपराध के आरोपों पर समुचित कार्यवाही नहीं करने के आरोप हों उन्हें उसी तरह से विपक्ष कठघरे में खड़ा कर रहा है जैसे कभी वे ख़ुद और भारतीय जनता पार्टी के दूसरे नेता तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को उनके दूसरे कार्यकाल में कठघरे में खड़ा किया करते थे।
इतिहास खुद को बार बार दोहराता है। जिस तरह 2014 के लोकसभा चुनाव से पहले आर्थिक घोटालों, गैस सिलेंडर, पेट्रोल और डीजल के बढते दामों, महंगाई और बेरोजगारी पर यू पी ए सरकार को घेरा जा रहा था वैसी ही स्थिति में दूसरे कार्यकाल में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी घिरते नजर आ रहे हैं। उन्हें घेरने के लिए पिछ्ले दो तीन महीने से कई विपक्षी दल निरंतर लामबंद हो रहे हैं। पटना के बाद बैंगलोर में दो लम्बी बैठकों के दौर के बाद तीसरे दौर की बैठक हाल ही में मुंबई में हुई है।2019 में विपक्ष बुरी तरह बिखरा हुआ था जिसका सीधा लाभ भारतीय जनता पार्टी को मिला था। इस बार विपक्ष भी करो या मरो की स्थिति से गुजर रहा है इसलिए पूरी आक्रामकता के साथ सीधे सीधे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को कटघरे मे खड़ा कर रहा है। इस बार 2024 का लोकसभा चुनाव प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए उनके जीवन की अब तक की सबसे कड़ी अग्नि परीक्षा साबित हो सकता है।


