विचार / लेख
-डॉ. आर.के.पालीवाल
हमारे लोकतंत्र में नई-नई अजीबोगरीब परंपराएं जन्म ले रही हैं । दुर्भाग्य से ये परंपराएं लोकतंत्र के विकास के बजाय उसकी विकृतियां बढ़ा रही हैं। इसी कड़ी में मध्य प्रदेश सरकार ने अपने कार्यकाल के अंतिम समय के बाकी बचे डेढ़ महीने के लिए तीन मंत्रियों को मंत्रिमंडल में शामिल किया है। किसी भी मंत्री को अपने विभाग की कार्यशैली समझने में ही दो तीन महीने लग जाते हैं। ऐसे में सरकार के इस फैसले की चारों तरफ आलोचना हो रही है कि जनता के संसाधनों का नए मंत्रियों के तामझाम पर खर्च का क्या औचित्य है! यह माना जा रहा है कि चंद असंतुष्ट नेताओं को खुश कर उनके क्षेत्र और जाति के लोगों के वोट बटोरना इस मुहिम का एक मात्र उद्देश्य है। इस स्वार्थी राजनीतिक कार्य से संभव है पार्टी के कुछ वोट बढ़ जाएं लेकिन हकीकत यह भी है कि अभी भी बहुत से नाराज विधायक हैं जो बहुत दिनों से मंत्रिमंडल विस्तार में अपना नाम खोज रहे थे। सरकार का यह दांव उल्टा भी पड़ सकता है। जो मंत्री नहीं बने हैं वे और उग्र विरोधी बन सकते हैं।
अंतिम दिनों में मंत्रिमंडल विस्तार का यह एक नया प्रयोग है। भाजपा ने मध्य प्रदेश में मुख्यमंत्री बदलकर गुजरात और कर्नाटक जैसे प्रयोग नहीं किए जिनकी अक्सर समाचार पत्रों में चर्चा होती रहती थी। इसका कारण शायद यही है कि यहां मुख्यमंत्री के कई दावेदार होने से यह रास्ता आसान नहीं था। पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ ने इस विस्तार को भ्रष्टाचार की मित्र मंडली का विस्तार बताया है। दूसरी तरफ मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने इसके पीछे कोई तर्क नहीं देते हुए अहंकार पूर्ण तरीके से कहा है कि अगले पांच साल भी हमारी सरकार रहेगी। यह लालकिले से प्रधान मंत्री मोदी द्वारा दिए अहंकार पूर्ण बयान जैसा ही है। मध्य प्रदेश सरकार में पहले से ही तीस मंत्री हैं। तीस पुराने मंत्री तीन साल में जो नहीं कर पाए तो तीन नए मंत्री डेढ़ महीने में आखिर कितना काम कर लेंगे यह समझना किसी निष्पक्ष व्यक्ति की समझ से बाहर है। यदि यह तीन नेता इतने प्रतिभाशाली थे तो मुख्यमंत्री को इनकी प्रतिभा पहचानने में इतनी देर क्यों लगी और पार्टी संगठन में उन्हें कोई बडी जिम्मेदारी क्यों नहीं दी गई।यह कुतर्क भी दिया जा सकता है कि मंत्रीमंडल विस्तार मुख्यमंत्री का विशेषाधिकार है लेकिन यह भी उतना ही सच है कि मीडिया और नागरिकों को अपने मुख्यमंत्री के निर्णयों की आलोचना और समीक्षा का अधिकार है। जिस तरह से इतने कम समय के लिए तीन मंत्रियों को शपथ दिलाई गई है ऐसी स्थिति में सरकार के इस निर्णय पर चारों तरफ प्रश्नचिन्ह खड़े होना सामान्य है। नए मंत्रियों में राहुल लोधी मध्य प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती के भतीजे हैं। भाई भतीजे वाद की प्रबल आलोचक रही भारतीय जनता पार्टी खुद भाई भतीजेवाद को क्यों बढ़ावा दे रही है इसका जवाब भारतीय जनता पार्टी को देना चाहिए।
मीडिया, विरोधी दलों, लोकतंत्र सुधार के लिए कार्य करने वाली संस्थाओं और प्रबुद्ध नागरिकों को इन नए मंत्रियों के विभागों के काम काज पर लगातार नजर रखने की आवश्यकता है ताकि पता चल सके कि इनके मंत्री बनने से आम जनता को क्या लाभ हुआ है! नागरिकों को पता चलना चाहिए कि इस असामान्य परिर्वतन के पीछे सच में व्यापक जनहित की भावना थी या किन्हीं इतर कारणों से इन्हें मंत्री बनाया गया है जैसे कि आरोप लग रहे हैं।
यह जानकारी भी सामने आनी चाहिए कि इन नए मंत्रियों के बंगलों की मरम्मत और इनके कार्यालयों, वाहनों और स्टाफ आदि पर सरकार ने कितना खर्च किया है। लोकतंत्र की परिपक्वता और सही संचालन के लिए जनता की जागरूकता सर्वोपरि है। यदि लोकतंत्र के विकास के लिए कार्यरत संस्थाएं समय समय पर अपने अध्ययन और शोध से जनता को जागृत करती रहेंगी तो कोई दल सरकार बनने पर इस तरह की मनमानी नहीं कर सकेगा।


