विचार / लेख

प्रकृति के प्रति बेहद उदासीन मध्य प्रदेश सरकार
24-Aug-2023 4:03 PM
प्रकृति के प्रति बेहद उदासीन मध्य प्रदेश सरकार

 डॉ. आर.के. पालीवाल

मध्य प्रदेश देश के उन चंद राज्यों में शरीक है जिन्हें कुदरत से प्राकृतिक संसाधनों का असीम भंडार मिला है। यहां नर्मदा, बेतवा, चंबल और क्षिप्रा जैसी सदानीरा नदियां और उन पर बने बांधों से प्रदेश की जनता को भरपूर पीने का पानी मिलता है और किसानों को सिंचाई की सुविधा उपलब्ध हैं। 

सतपुड़ा और विंध्य पर्वत श्रृंखलाओं में पचमढ़ी और मड़ई आदि पर्यटक स्थल हैं,कान्हा, बांधवगढ़, सतपुड़ा, पन्ना और शिवपुरी जैसे अंतरराष्ट्रीय प्रसिद्धि पाए नेशनल पार्क हैं और पार्क बनने की कगार पर खड़ी रातापानी सरीखी वाइल्डलाइफ सैंक्चुअरी में विचरते बाघ, भालू, तेंदुए और हिरणों की विभिन्न प्रजातियों वाले सागौन के खूबसूरत वन हैं जिनकी सी पी टीक देश भर में प्रसिद्ध है। इतनी प्राकृतिक संपदा के बावजूद मध्य प्रदेश का नाम विकसित राज्यों में नहीं आता। इसका कारण सरकार की प्रकृति और प्राकृतिक संसाधनों के प्रति संवेदनशीलता का अभाव भी है। इसका ताजा प्रमाण नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल द्वारा प्रदेश सरकार पर लगाया गया पांच लाख का जुर्माना है।

वैसे तो देश भर में कस्बों, शहरों और महानगरों के पास से गुजरती छोटी-बड़ी तमाम नदियों की स्थिति बद से बदतर होती जा रही है लेकिन कुछ नदियों की हालत अत्यन्त दयनीय हो गई है। मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल के पास से बहती कलियासोत नदी की हालत भी पिछले बीस पच्चीस वर्षों में बहुत चिंताजनक हो गई है। चारों तरफ फैलते भोपाल में नदी के दोनों किनारों पर अतिक्रमण कर हजारों मकान बनाए जाने से नदी का प्राकृतिक मार्ग संकरा हो गया । कहीं कहीं उसकी प्राकृतिक धारा को ही मोड़ दिया गया है। भोपाल से निकलकर जैसे ही नदी पंद्रह किलोमीटर आगे बढ़ती है मंडीदीप के औद्योगिक क्षेत्र की कंपनियों के रसायनिक कचरे से यह नदी लगभग मर ही गई है। कुल मिलाकर भोपाल और मंडीदीप ने मिलकर अच्छी खासी शुद्ध जल की कलियासोत नदी को जहरीले नाले में तब्दील कर दिया है। कलियासोत की हालत बेहद चिंताजनक है।

बेतवा नदी की अध्ययन एवं जन जागरण यात्रा के दौरान नदी किनारे स्थित गांवों के निवासियों ने हमे भी बड़े दुखी मन से बताया था कि तीसेक साल पहले कलियासोत हमारी जीवन दायिनी नदी थी जिसमे हमने तैरना सीखा, जिसके जल से चर्म रोग ठीक हो जाते थे, जिसका पानी हम और हमारी गाय भैंस पीती थी लेकिन हमारे बच्चे नदी के प्रसाद से वंचित हैं। अब नदी का पानी इतना ज़हरीला हो गया कि इसके किनारे खड़े होने पर दुर्गंध आती है। इसमें घुसने पर चर्म रोग हो जाता है। मंडीदीप के औद्योगिक कचरे ने हमारी जीवन दायिनी नदी की हत्या कर दी। बड़ी-बड़ी औद्योगिक इकाइयों के पूंजीपतियों के सामने सरकार में हमारी कोई सुनवाई नहीं है। हाल ही में संपन्न हुई एनजीटी की सुनवाई में इन ग्रामीणों की व्यथा का बेंच के न्यायमूर्तियों ने भी अहसास किया है।

एनजीटी ने अपने पूर्व के आदेशों का अनुपालन नहीं होने के कारण मध्य प्रदेश के मुख्य सचिव को सुनवाई में बुलाया था ताकि सरकार द्वारा की गई कार्यवाही की सही जानकारी प्राप्त हो सके। प्रदेश के मुख्य सचिव भी बैंच को कोई संतोषजनक जवाब नहीं दे पाए कि पिछले साल दो साल में मध्य प्रदेश सरकार ने कलियासोत नदी के सरंक्षण के लिए क्या ठोस प्रयास किए हैं। मुख्य सचिव के बिना सही जवाब की तैयारी के आने पर बैंच ने नाराजगी जाहिर करते हुए सरकार के उदासीन रवेये के कारण सरकार पर पांच लाख रुपए की पेनल्टी लगाई है जिसे प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के खाते में तुरंत जमा करने के आदेश दिए हैं। यह देखना अत्यंत त्रासद है कि जब नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल के न्यायमूर्तियों के निर्देशों के प्रति भी मध्य प्रदेश शासन गंभीर नहीं है तब वह आम जनता और पर्यावरणविदों की कहां सुनेगा!


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