विचार / लेख
डॉ. आर.के. पालीवाल
इस 15 अगस्त को लाल किले से प्रधानमंत्री को लगातार दसवीं बार भाषण देने का सौभाग्य मिला था। इस भाषण ने उन्हें सर्वाधिक बार लाल किले से भाषण देने वाले चुनिंदा प्रधानमंत्रियों यथा मनमोहन सिंह, इंदिरा गांधी और जवाहर लाल नेहरू आदि प्रधान मंत्रियों की श्रेणी में पहुंचा दिया। भारतीय जनता पार्टी के वे सर्वाधिक झंडा फहराने वाले नेता पहले ही बन चुके हैं। इतनी बार लाल किले से झंडा फहराने वाले किसी भी प्रधानमंत्री से उत्तरोत्तर बेहतर भाषण की उम्मीद निरंतर बढ़ती जाती है। भारतीय जनता पार्टी के नेता और कार्यकर्ता भले ही अमृत महोत्सव काल के प्रधान मंत्री के इस उदबोधन की प्रशंसा करें लेकिन दूसरे कार्यकाल के अंतिम वर्ष लाल किले से प्रधानमंत्री के उद्बोधन की अधिकांश नागरिकों और विशेष रूप से प्रबुद्धजनों ने तरह-तरह से आलोचना की है।
पत्रकारिता जगत के वर्तमान दौर में विशिष्ट स्थान बना चुके रवीश कुमार सहित बहुत से लोग इस भाषण में बोले गए तथ्यों को झूठ का पुलिंदा बता रहे हैं जिसे थोड़ी उदार भाषा में गलत बयानी कहा जा सकता है। रवीश कुमार और बिहार के लोगों ने इस बात की कड़ी आलोचना की है कि प्रधानमंत्री ने बिहार में नए एम्स का श्रेय लिया है जबकि ऐसा कोई एम्स बनाने में उनकी कोई भूमिका नहीं रही है। चुनावी सभाओं में इस तरह के अतिश्योक्तिपूर्ण बयानों को भले ही प्रधान मंत्री के शुभचिंतक जुमला मानकर भुला दें लेकिन लाल किले से स्वतंत्रता दिवस के ऐतिहासिक दिन प्रधान मंत्री से सही तथ्यों पर आधारित बड़े नीतिगत मामलों में बोलने की उम्मीद रहती है।प्रधान मंत्री के साथ सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि वे चाहे संसद में अविश्वास प्रस्ताव पर बोल रहे हों या अपनी पार्टी के कार्यकर्ताओं को संबोधित कर रहे हों, किसी सार्वजनिक सभा में चुनावी भाषण दे रहे हों या देश के प्रधान मंत्री के रुप में लाल किले से स्वतंत्रता दिवस का ऐतिहासिक संदेश दे रहे हों, उनकी भाषा और भाव भंगिमा समय और परिस्थितियों के अनुरूप नहीं होती बल्कि वे हमेशा चुनावी मोड़ में दिखाई देते हैं।
इधर प्रधानमंत्री के उद्बोधनों में अहंकार की मात्रा और अपने विरोधियों की कटु आलोचना निरंतर बढ़ती जा रही है जिसे किसी भी दृष्टि से उचित नहीं ठहराया जा सकता। उनके अहंकार पूरित संबोधनों से प्रेरित होकर उनके दल के अधिकांश नेता उनसे भी ज्यादा अहंकार पूर्ण भाषा का प्रयोग करते हैं। ऐसे लोगों की संख्या में भी लगातार बहुत तेजी से वृद्धि हो रही है। इस संबोधन में भी प्रधान मंत्री ने कांग्रेस को निशाना बनाकर परिवार वाद से मुक्त राजनीति की बात की है। कर्नाटक के मुख्यमंत्री ने सोशल मीडिया पर इसकी कड़ी आलोचना की है। यह सही भी है। आज की राजनीति में ऐसा कोई राष्ट्रीय या क्षेत्रीय राजनीतिक दल नहीं है जिसमें परिवारवाद हावी नहीं है। कांग्रेस के नेताओं की असंतुष्ट संततियों को भारतीय जनता पार्टी में प्रवेश कराने के बाद और अपने दल के वरिष्ठ नेताओं के परिजनों और नजदीकी रिश्तेदारों को विधान सभाओं और लोकसभा मे भेजने के बाद भाजपा को परिवारवाद की आलोचना करने का कोई नैतिक आधार नहीं है। भाजपा ने जिन क्षेत्रीय दलों से गठबंधन किया है परिवार वाद के मामले में वे दल भी कटघरे में हैं।
परिवार वाद के साथ उन्होंने राजनीतिक भ्रष्टाचार और तुष्टिकरण की नीति पर विपक्ष को घेरा है। यदि प्रधानमंत्री दस साल के निरंतर कार्यकाल में भ्रष्टाचार पर नियंत्रण नहीं कर पाए तो यह उनकी सरकार की विफलता है। वे इसका ठीकरा किसी अन्य के सिर पर नहीं फोड़ सकते। जहां तक तुष्टिकरण का प्रश्न है उसमें यदि कांग्रेस पर अल्प संख्यक समुदाय के तुष्टिकरण के आरोप लगते रहे हैं वैसे ही आरोप बहु संख्यक वर्ग के बारे में भाजपा पर भी लगते रहे हैं। प्रधान मंत्री का यह दावा कि अगले साल भी वही प्रधान मंत्री के रुप में आएंगे , यह न केवल उनका व्यक्तिगत अहंकार है अपितु लोकतंत्र की मूल भावना के भी खिलाफ है क्योंकि लोकतंत्र में अपना नेता चुनने का अधिकार सांसदों को है। कुल मिलाकर स्वतंत्रता दिवस पर प्रधानमंत्री के संबोधन से आम नागरिकों को निराशा ही हुई है।


