विचार / लेख

प्रेमचंद का धर्म?
19-Aug-2023 3:55 PM
प्रेमचंद का धर्म?

 विष्णु नागर

मैंने पूछा -आप हिंदू हैं या मुसलमान?

आपने हंस कर जवाब दिया-‘न मैं हिंदू हूं, न मुसलमान।

मैंने कहा- नहीं यह बात नहीं है, आप हिंदू तो हई हैं।

आपने कहा-‘जिस धर्म में रहकर लोग दूसरे का छुआ पानी नहीं पी सकते, उस धर्म में मेरे लिए गुंजाइश कहां? मेरी समझ में नहीं आता कि हिंदू धर्म किस पर टिका हुआ है?

मैं उन पर व्यंग करते हुए बोली--‘स्त्रियों के हाथ में।

आप बोले-‘हिंदू धर्म सबसे ज्यादा स्त्रियों को ही चौपट कर रहा है। जरा सी गलती स्त्रियों से हुई कि उन्हें हिंदू समाज ने बहिष्कार किया। सबसे ज्यादा हिंदू स्त्रियां चकलाखाने में हैं। सबसे ज्यादा हिंदू स्त्रियां मुसलमान होती हैं।ये आठ करोड़ मुसलमान बाहर के नहीं हैं, घर के ही हैं। यह सब तुम्हारी ही बहनें हैं और मैं यह भी कहता हूं कि ऐसे तंग धर्म में रहना भी नहीं चाहिए। पहली बार जब हिंदुओं के मौजूदा धर्म की नींव पड़ी, तब पुरुष कर्ताधर्ता थे। उन्होंने अपने लिए सारी सुविधाएं रख लीं। हिंदू स्त्रियों को छोटे से दायरे के अंदर बंद कर दिया। फिर वह कैसे उदार विचार का होता ?वे स्त्रियां न देवियां थीं, न मिट्टी का लोंदा।जो- जो अच्छाइयां या खराबियां, पुरुषों में होती हैं वे ही सब उन स्त्रियों में भी पाई जाती हैं। तो जब तक कि दोनों बराबर बराबर न हों, तब तक कैसे कल्याण होगा? पुरुषों की वे सुविधाएं स्त्रियों को भी मिलनी चाहिए। थोड़ी-थोड़ी गलतियों में अपनी बेटी- बहनों को निकाल देते हैं। फिर वे कहीं न कहीं तो जरूर जाएंगी। हिंदुओं की कोशिश तो यह होती है कि उन स्त्रियों को दुनिया ही से विदा कर दिया जाए। सरकार के भय से जरा चुप रहते हैं ।

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मैं बोली-‘आप किस मजहब को अच्छा समझते हैं?

आप बोले-‘अवश्य मेरे लिए कोई मजहब नहीं। राम, रहीम बुद्ध, ईसा,सब बराबर हैं। इन महापुरुषों में जो कुछ किया सब ठीक किया। उनके अनुयायियों ने उसको उल्टा किया। कोई धर्म ऐसा नहीं है कि जिस में इंसान से हैवान होना पड़े।इसीसे मै कहता हूं मेरा कोई खास मजहब नहीं है। सबको मानता भी हूं ।इस तरह के जो नहीं हैं, उनसे मुझे कोई मोहब्बत नहीं। यही मेरा धर्म समझो।

(‘प्रेमचंद घर में ’ पुस्तक के संपादित अंश। प्रेमचंद और उनकी पत्नी शिवरानी देवी के बीच हुआ संवाद)।)।


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