विचार / लेख

विज्ञापनों पर जन धन की शर्मनाक बर्बादी
18-Aug-2023 4:20 PM
विज्ञापनों पर जन धन की शर्मनाक बर्बादी

 डॉ. आर.के. पालीवाल

भारत जैसे गरीब देश में, जहां तीन चौथाई आबादी को मुफ्त में राशन देना पड़ता है, जहां करोड़ों लोग उचित स्वास्थ्य सुविधा के अभाव में सालोसाल असाध्य बीमारियों को सहते हों, वहां सरकारें अपनी छोटी छोटी योजनाओं के शिलान्यास के नाम पर आए दिन करोड़ों रुपए के विज्ञापन मीडिया में जारी कर जिस तरह से नागरिकों से तरह तरह के कमरतोड़ टैक्स के रुप में वसूली रकम को बेहयाई से खर्च करती हैं वह बेहद शर्मनाक है।

यह सब तब और भी ज्यादा शर्मनाक लगता है जब मणिपुर में कत्लेआम मचा हो, हरियाणा का बड़ा हिस्सा सांप्रदायिक आग में झुलस रहा हो, और सरकारें अपनी अक्षमता पर पर्दा डालने के लिए बे सिर पैर के कुतर्क गढ़ रही हों, ऐसी दुखद परिस्थितियों में प्रधानमन्त्री और मुख्यमंत्री का चमचमाते डिजाइनर कपड़ों में विज्ञापनों में मुस्कराता चेहरा कितना अशोभनीय लगता है उसे शालीन शब्दों में अभिव्यक्त करना मुश्किल है।

कुछ दिन पहले दैनिक भास्कर में एक ही समाचार के एक एक पेज के दो विज्ञापन प्रकाशित हुए थे। प्रधानमंत्री को मध्य प्रदेश के कुछ रेलवे स्टेशन के कायाकल्प की योजना का शिलान्यास करना था। इन दोनों विज्ञापनों के माध्यम से यही सूचना दी गई थी। इस आयोजन की सूचना पीटीआई, रेडियो और दूरदर्शन के प्रचार माध्यम से आसानी से जनता को दी जा सकती थी। लेकिन सरकार मीडिया को उपकृत कर अपने पक्ष में नियंत्रित करने के लिए दोनों हाथ से विज्ञापन जारी करती हैं।

इस कार्यक्रम का एक विज्ञापन भारत सरकार ने किया था और  उसी समाचार का दूसरा विज्ञापन मध्य प्रदेश सरकार ने किया था। दोनों सरकार भी एक ही राजनीतिक दल की हैं। सरकार के एक अखबार को एक दिन में दिए विज्ञापन की बात दो पेज के विज्ञापन पर ही खत्म नहीं हुई। इसी दिन मध्य प्रदेश की सरकार ने इसी अखबार में अपनी अन्य योजनाओं की पीठ थपथपाते हुए दो पेज के अन्य विज्ञापन भी दिए थे। कुल मिलाकर सरकार के एक ही अखबार में एक ही दिन चार पेज के विज्ञापन थे, जिनमें प्रदेश सरकार के तीन पेज के विज्ञापन थे। मध्य प्रदेश वह प्रदेश है जिसकी गिनती गलत कामों में बहुत ऊपर होती है। उदाहरण के लिए सबसे ज्यादा महिलाएं लापता होने में यह प्रदेश अग्रणी है। घातक एक्सीडेंट्स के मामले में तमिलनाडु के बाद यह प्रदेश देश में दूसरे नंबर पर आता है। यहां शिक्षा, स्वास्थ, बिजली और सडक़ों की स्थिति अत्यन्त दयनीय है। ज्यादा दुर्घटनाओं के पीछे बहुत खराब सडक़ें भी मध्य प्रदेश को शर्मशार करने में बराबर की सहयोगी हैं। इसके बावजूद मुख्यमंत्री सार्वजानिक मंच से प्रदेश की सडक़ों को अमेरिका से बेहतर बताते हैं जबकि सोशल मीडिया के माध्यम से मध्यप्रदेश के निवासी आए दिन खराब सडक़ों की शिकायत करते रहते हैं।

जहां तक विज्ञापनों का संबंध है इसका कुछ ईलाज कुछ साल पहले सर्वोच्च न्यायालय ने यह प्रतिबंध लगाकर किया था कि विज्ञापनों में केवल प्रधानमन्त्री या प्रदेश के मुख्यमंत्री की ही फोटो प्रकाशित हो सकती है। सर्वोच्च न्यायालय के फैसले से हर मंत्रालय से मंत्रियों की फोटो के साथ जारी होने वाले विज्ञापनों पर तो रोक लगी थी लेकिन वह इलाज आधा-अधूरा ही रहा। अब तमाम मंत्रालय प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री के नाम से विज्ञापन जारी करने लगे हैं।

 सर्वोच्च न्यायालय को इन विज्ञापनों की भी कोई सीमा निश्चित करनी चाहिए ताकि एक ही कार्यक्रम के दो दो विज्ञापनों में जन धन की बरबादी रोकी जा सके। यह भी देखने में आता है कि चुनावी वर्ष में सरकारी विज्ञापनों की संख्या बेतहासा बढ़ जाती है। इस पर चुनाव आयोग को भी नजऱ रखनी चाहिए क्योंकि सरकार अंधाधुंध विज्ञापन जारी कर अपने राजनीतिक दल की छवि चमकाने के लिए जन धन की बरबादी करती है। सर्वोच्च न्यायालय के दिशा निर्देश से चुनाव आयोग ही ऐसी धन बर्बादी को नियंत्रित कर सकता है।


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