विचार / लेख
सनियारा खान
अभी कुछ दिनों पहले मुझे हिटलर के बारे में एक कहानी पढऩे का मौका मिला। एकबार हिटलर सदन में एक मुर्गी लेकर आया। फिर सभी सांसदों को हैरान करते हुए वह उस मुर्गी के सारे पंख एक एक करके नोंचने लगा। बेचारी मुर्गी पहले ही भूख के कारण परेशान हो रही थी । उसके बाद पंख नोच लिए जाने के कारण वह दर्द से बिलबिलाने लगी। वह मुर्गी छटफटाते हुए हिटलर को देखने लगी। अब हिटलर ने अपने जेब से थोड़े से अनाज के दाने निकाल कर अपने पैरों के चारों तरफ छिडक़ दिया। वह मुर्गी उसके पैरों के चारों तरफ घूम घूम कर अनाज खाने लगी। अनाज खा कर वह हिटलर के पैरों के पास आ कर फिर से खड़ी हो गई। हिटलर जानता था था कि लोगों से सब कुछ छीन कर भी अगर बाद में उन्हें थोड़ा सा खाना खिलाया जाए तो लोग सब कुछ भूल कर बेवकूफ की तरह उसी छीननेवाले का ही जय जय करने लगते हैं। अब मुर्गी को एक तरफ हटा कर हिटलर ने सदन के स्पीकर की तरफ देख कर गर्व से कहा कि गणतांत्रिक देशों की जनता और उस मुर्गी में कोई फर्क नहीं है। उनके नेता भी उनसे सब कुछ लूट कर उन्हें मजबूर कर देते हैं। ऐसी बदतर हालत में उन्हीं नेताओं से उन्हें जरा सा भी कुछ मिल जाए तो सारी जुल्म भूल कर उन नेताओं को ही अपना सब कुछ समझने लगते हैं। कितनी सच्ची बात है!
इलेक्शन के पहले पहले हर बार मुर्गियों के सामने दाना डालना शुरू हो जाता है, और मुर्गियां बिल्कुल भूल जाती है कि पंख नोंचने वाले भी यही लोग ही तो थे।


