विचार / लेख
शिल्पा शर्मा
एक बार किसी एकांत में जाकर, आंखें बंद कर के ख़ुद से पूछिए आप जिस राह चल निकले हैं वह हीरो बनने की राह है या विलन या फिर विलन का पंटर बनने की? आपको सही जवाब मिल जाएगा, क्योंकि हमारा अंतर्मन हमें हमेशा सही राह दिखाता है। जो व्यक्ति अपने अपने काम को सही तरीक़े से करता है वही देश का सच्चा हीरो होता है, न कि उन्माद फैलाने वाला। आपके उस धर्म को, जो आपके जन्म के हज़ारों साल पहले से बचा हुआ है और आप रहें या न रहें यह आगे भी बचा रहेगा, उसके नाम पर आपको आपस में लड़ाने वालों का मोहरा बनकर विलन के पंटर न बनें।
जब हमारे देश को कम लोग पढ़े-लिखे हुआ करते थे, तब से भी किस्सागोई के जरिए हम सब तक कई तरह की कहानियां पहुंच ही जाती थीं। अब जबकि हमारे देश में शिक्षा का स्तर बढ़ा है, कहानियों की पहुंच और गहरी हुई है। फिर बात दादी-नानी की कहानियों की यानी बेड टाइम स्टोरीज की हो या किताबों की हो या फिर रील्स के जरिए। और टीवी सीरीयल्स, वेबसीरीज और फिल्में तो कहानियों की आमद का बड़ा जरिया हैं ही।
अच्छा, अधिकतर कहानियों का आप विश्लेषण करें तो पाएंगे कि कुछ उसमें एक हीरो होता है, कुछ उसके अपने लोग और समर्थक होते हैं। वहीं कहानी में एक विलन होता है और कुछ लोग उसके समर्थक होते हैं। अमूमन हीरो के समर्थक भले लोग और विलन के समर्थक बुरे लोग होते हैं। हम सभी जो लोग 70’ के दशक से लेकर वर्ष 2000 या उसके बाद की भी कुछ फिल्मों को देखकर बड़े हुए हैं या फिर वे युवा जिन्होंने ये फिल्में देखी हैं, वे हीरो और विलन के बेसिक, मेलो ड्रमेटिक कंसेप्ट से परिचित होंगे। वर्ष 2000 के बाद की फिल्मों की कहानियों की यदि चर्चा करें तो ज्यादातर हीरो और विलन के बीच का यह फर्क बड़ा हल्का या मामूली सा रह गया। कई, बल्कि अधिकतर फिल्मों में असल जिंदगी के विलन को हीरो बनाकर पेश करने और उसका महिमामंडन करने की भी परंपरा चल पड़ी, जो कई बार ग़लत भी नहीं होती, क्योंकि वह हमें कहानी को दूसरे नजरिए से देखना सिखाती है।
अपनी बात मैं तब की फिल्मों के हवाले से अपनी बात कहना चाहूंगी, जब कहानियों में हीरो और विलन का या यूं कहें कि अच्छाई और बुराई अंतर बड़ा साफ दिखाया जाता था। तब लोग (दर्शक/पाठक) विलन या उसके साथी होने की बजाय, हीरो और उसके साथी की ओर रहना पसंद करते थे। यदि आपने उन फिल्मों में विलन के खेमे के पंटरों को देखा हो, जो अपने आका के कहने पर, बिना अक्ल लगाए किसी से भी मार-पीट को तैयार हो जाते थे और ख़ुद भी चोटिल हो जाते थे। उनका कोई पूछने वाला नहीं होता था। अगर मान लो बच-बचा के वे अपने बॉस तक यह सूचना देने पहुंच भी जाते थे तो उनका बॉस उन्हें मार देता था या मरवा देता था।
यूं तो कहानियां सुनने के बाद हर कोई अपने आपको उस कहानी के हीरो की जगह रखकर देखता है, उसका हीरो समझता है या वैसा बनना चाहता है। लेकिन फिर भी भला क्यों कई लोग विलन के पंटर बनकर ही रह जाना चाहते हैं? नहीं समझे आप? मेरा इशारा उन छुटभैया मोहल्ला नेताओं से है, जो चंद पैसों और अपने इलाक़े में हल्की-सी धौंस जमाने का रुतबा पाने के लिए स्थानीय स्तर के छोटे-मोटे दंगा फैलाने, बलवा करने वाले ग्रुप्स का हिस्सा बन जाते हैं। उन्हें लगता है या फिर उनके मन में यह बिठा दिया जाता है कि ऐसा करके वे अपने धर्म को बचा रहे हैं और इसे वे हीरो होना समझ लेते हैं। लेकिन जब उपद्रव के वीडियोज़ में उनके फ़ुटेज सामने आते हैं तो उन्हें हवालात में जाना पड़ता है और उनका परिवार उन्हें छुड़ाने की क़वायद में परेशान होता रहता है। तब इन ग्रुप्स के बड़े नेता इन्हें बचाने तक के प्रयास नहीं करते। तो विलन के खेमे में क्षणिक हीरो बनने का क्या फ़ायदा होता है इन्हें?
कई लोग जो ग्रुप्स के बाहर से धर्म के नाम पर इनका ऊपरी समर्थन करते हैं, वक्त पडऩे पर वो आपके किसी काम आना तो दूर, उनसे बचना शुरू कर देते हैं। एक बार यदि ये लोग सहज रूप से सोचें कि जो धर्म (सनातन हो या मुस्लिम) हजारों या सैकड़ों साल से चला आ रहा है, जब आप नहीं थे तब भी था और आपके बाद भी रहेगा ही, उसे बचाने की आखिर क्या जरूरत है? वह तो बचा ही हुआ है, बचा ही रहेगा। बस, आप अमन-चैन से रहो।
हम सभी जानते हैं कि इन दिनों सोशल मीडिया ट्रोल आर्मी में युवाओं को महज़ कुछ पैसों के लिए भर्ती किया जा रहा है। इन युवाओं को रोजग़ार की ज़रूरत है और देश में रोजग़ार के अवसर आवश्यकता से बहुत कम हैं (और मौजूदा सरकार चाहती भी नहीं है कि वह रोजगार पैदा करे, क्योंकि वह सत्ता पाने के लिए, वोटों के लिए अपनी जनता का धार्मिक ध्रुवीकरण चाहती है) तो वे इन छोटे-मोटे ग्रुप्स या बड़ी पार्टियों के मीडिया सेल एजेंट के रूप में काम करने लगते हैं। पर क्या इस तरह का उन्माद फैलाना या उसका हिस्सा होना हीरो होना है? या फिर वह किसी विलन के पंटर की तरह गुमनाम, दुत्कारे जाने वाले जीवन की ओर ले जाता है? यह सोचकर देखिए।
और एक बात ये कि विलन या विलन के पंटर बनने से कहीं आसान है हीरो बनना। किसी सच्चे हीरो को किसी दूसरे व्यक्ति से इस बात की आस नहीं होती कि दूसरे लोग उसे हीरो मानें। दरअसल, जब हम ख़ुद को हीरो मानते हैं, तभी हम सच्चे हीरो होते हैं और तभी हम सबसे ज़्यादा सशक्त होते हैं। और ख़ुद को हीरो मानना आसान नहीं होता। आपका कॉन्शस आपको ख़ुद को तब तक हीरो मानने देता, जब तक कि उसे भरोसा न हो जाए कि आप जहां हैं, वहां अपना बेहतरीन योगदान इस तरह दे रहे हैं, जिससे दूसरे लोगों का सचमुच भला हो रहा है। आज की बेरोजगार युवा पीढ़ी, जो सांप्रदायिक उन्माद फैलाने वाले ग्रुप्स से जुड़ रही है, उसके सदस्यों को मैं बताना चाहती हूं कि एक सामान्य नागरिक बनकर, जो अपना काम सही तरीक़े से करे आप अपने देश के सबसे बड़े हीरो बन सकते हैं।
जो व्यक्ति अपने देश को आगे ले जाने के लिए अपने काम को, भले ही वह काम कुछ भी हो, आपकी नौकरी, बिजनेस, दुकान, ठेला वगैरह, सही तरीक़े से करता है वही इस देश का सच्चा हीरो होता है, न कि उन्माद फैलाने वाला। एक बार किसी एकांत में जाकर, आंखें बंद कर के ख़ुद से पूछिए आप जिस राह चल निकले हैं वह हीरो बनने की राह है या विलन या फिर विलन का पंटर बनने की? आपको सही जवाब मिल जाएगा, क्योंकि हमारा अंतर्मन हमें हमेशा सही राह दिखाता है। और यदि आपका मन कहता है कि आप विलन या उसके पंटर वाली राह पर चल निकले हैं तो याद रखिए-आप जहां भी हैं, वहीं से एक नई हीरोइक शुरुआत की जा सकती है और आप चाहेंगे तो ऐसा करने का रास्ता आपको मिल ही जाएगा। (oyeafltoon)


