विचार / लेख
डॉ. आर.के.पालीवाल
अखबारों में भले ही आए दिन लोकायुक्त, सी बी आई, ई डी, एंटी करप्सन ब्यूरो और आयकर विभाग के छापों में बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार के मामले सामने आते हैं और जूनियर इंजीनियर, स्टोर कीपर,पटवारी और पंचायत सचिव आदि के यहां भ्रष्टाचार से अर्जित करोड़ों की काली कमाई की सूचनाएं अखबारों की सुर्खियां बनती हैं , लेकिन अब आम नागरिक सरकार के साए में होने वाले भ्रष्टाचार के बारे में मुंह खोलने या सोशल मीडिया आदि पर लिखने से पहले हजार बार सोचेंगे। मध्य प्रदेश में भ्रष्टाचार पर बोलने से कांग्रेस के बड़े राष्ट्रीय नेताओं पर ताबड़तोड़ एफ आई आर दर्ज होने के बाद लोग सकते में हैं। कांग्रेस के बड़े नेता, यथा प्रियंका वाड्रा, कमलनाथ और अन्य बड़े नेता तो पार्टी के बड़े वकीलों के माध्यम से हाई कोर्ट या सुप्रीम कोर्ट पहुंचकर आसानी से पुलिस प्रशासन के शिकंजे से बच जाएंगे लेकिन आम नागरिक के लिए हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचना चांद पर जाने जितना कठिन है इसलिए उनके लिए चुप्पी ही एकमात्र विकल्प बचता है।
कुछ दिन पहले प्रधान मंत्री ने भी एन सी पी पर भ्रष्टाचार का बहुत बड़ा आरोप लगाया था जिसका जिक्र एन सी पी की नेता सुप्रिया सुले ने संसद में भी किया था। यदि महाराष्ट्र में कांग्रेस और एन सी पी गठबंधन की सरकार होती तो मध्य प्रदेश की घटना की प्रतिक्रिया स्वरूप संभवत: प्रधान मंत्री के खिलाफ भी वैसी ही कार्यवाही हो सकती थी जैसी मध्य प्रदेश में कांग्रेस के शीर्ष नेताओं के खिलाफ हुई है। हाल ही में भाजपा अध्यक्ष जे पी नड्डा ने पश्चिम बंगाल में अब तक की तमाम सरकारों पर सूबे को भ्रष्टाचार में डुबाने का आरोप लगाया है। संभव है वहां की सरकार उन पर भी भी उसी तरह एफ आई आर करवा दे जैसे मध्यप्रदेश में हुई हैं।
यह बताने की आवश्यकता नहीं है कि सर्वोच्च न्यायालय के आदेशों और दिशा निर्देश के बावजूद अभी भी देश के अधिकांश थानों में आम आदमी को एफ आई आर के लिए कितना भटकना पड़ता है। इसकी पीड़ा वही जानते हैं जिन्होंने मजबूरी में थाने कचहरियों के चक्कर काटे हैं। दूसरी तरफ आम आदमी पर कोई खास व्यक्ति आसानी से एफ आई आर करवा देता है, फिर उसके लिए जमानत पाना जीवन मृत्यु का सबब बन जाता है। कुछ दिन पहले सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालय के न्यायमूर्तियों के सम्मेलन में महामहिम राष्ट्रपति महोदया ने बहुत भारी मन से ऐसे गरीब लोगों को त्वरित न्याय की अपील की थी जो सजा पाए बगैर सालों से जमानत के इंतजाम नहीं होने के कारण जेलों में बंद हैं।
सरकार के अधीन काम करने वाली पुलिस के पास एफ आई आर एक ऐसा ब्रह्मास्त्र है जो आम आदमी को अधमरा कर सकता है। यह लगभग हर प्रदेश की पुलिस का चरित्र बन गया है कि सत्ता धारी दल से जुडे लोगों की शिकायत पर आनन फानन में एफ आई आर की कार्यवाही सम्पन्न हो जाती है ताकि संबंधित पुलिस अधिकारी अपने राजनीतिक आकाओं की आंखों में ऊपर चढ़ सकें।
इसके विपरीत सत्ताधारी दल के लोगों के खिलाफ एफ आई आर दर्ज कराने में प्रतिष्ठित नागरिकों के भी पसीने छूट जाते हैं। कुछ दिन पहले दिल्ली पुलिस ने अंतरराष्ट्रीय पदक विजेता महिला पहलवानों की शिकायत पर तभी एफ आई आर दर्ज की थी जब देश भर से महिला पहलवानों के समर्थन की आवाज उठने पर सर्वोच्च न्यायालय में मामला पहुंचा था।
इसके बरक्स आम आदमी पार्टी के कार्यकर्ताओं और नेताओं के खिलाफ मामला दर्ज करने में दिल्ली पुलिस बहुत तेजी दिखाती है। पुलिस प्रशासन के इस व्यवहार की वजह से ही केन्द्र और दिल्ली सरकार प्रशासनिक अधिकारियों के नियंत्रण के लिए कई साल से लंबी कानूनी लड़ाई लड़ रहे हैं। मध्य प्रदेश में कांग्रेस नेताओं के खिलाफ त्वरित कार्रवाई भी इसी परिपेक्ष्य में हुई है क्योंकि इस मामले में वहां के गृह मंत्री का बयान आया था कि हम मध्य प्रदेश में कांग्रेस द्वारा लगाए गए पचास प्रतिशत कमीशन के भ्रष्टाचार के आरोप पर कार्यवाही कर सकते हैं।


