विचार / लेख
राहुल कुमार सिंह
‘मुर्गा मुर्गी प्यार से देखे नन्हा चूजा खेल करे‘ गीत आपने सुना है? स्वतंत्रता दिवस के साथ मुझे यह गीत एक बार याद आता ही है।
हमारे स्कूल में तब रिकॉर्ड प्लेयर पर 78 आरपीएम वाले तवा-रिकॉर्ड बजते थे। मुख्यत: प्रेरक, देश-प्रेम वाले और बच्चों वाले गीत होते थे। इसी में एक फिल्म ‘दो कलियां‘ का रिकॉर्ड था, जिसका गीत ‘बच्चे मन के सच्चे, सारी दुनिया के आंख के तारे‘ बजाया जाता था। रिकॉर्ड बजाने की जिम्मेदारी प्रयोगशाला सहायक शंभू साहू जी की होती थी। रिकॉर्ड बजते देखना भी रोमांचकारी होता था।
साहू जी का बुलावा आया, गीत ‘बच्चे मन के सच्चे‘ आधा बज चुका था, साहू जी ने हम रिकॉर्ड प्लेयर दर्शक साथियों से कहा कि गीत पूरा हो तो सुई उठा कर रख दें, ऐसी जिम्मेदारी पा कर हम मित्र मंडली में उत्साह की लहर फैल गई।
गाना पूरा हुआ, सुई उठा कर रख दी गई। शांति छा गई, यह ठीक नहीं लगा तो रिकॉर्ड दूसरी तरफ पलट कर रिकॉर्ड पर सुई टिका दी गई। किसी ने ध्यान नहीं दिया कि रिकॉर्ड के बीच वाले हिस्से पर कागज चिपका था- ‘बजाना मना है‘ और गीत बजने लगा ‘मुर्गा-मुर्गी प्यार से देखे‘। तब ‘प्यार‘ शब्द का सार्वजनिक खुलेआम उचार, वह भी स्कूल में कठोरता से निषिद्ध होता था, (संस्कार ऐसे कि प्यार शब्द, कान में खडख़ड़ाता था, जबान लडख़ड़ाती थी। )
साहू जी भागते हुए आए, गीत रोका, मगर तब तक यह प्रिंसिपल साहब चंदेल सर के कान में पड़ चुका था। पहले साहू जी, फिर हम सबकी पेशी हुई, मगर अनुशासन के पक्के प्रिसिपल साहब ने स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर सजा तजवीज नहीं की, चेतावनी दे कर छोड़ दिया।
अब इस दिन, खास कर खबर पढ़ते कि अच्छे चाल-चलन के कारण कैदियों की सजा में राहत-रिहाई हुई, 1973 की अपनी पेशी याद आती है।


