विचार / लेख
दिनेश श्रीनेत
जीवन के सबसे खूबसूरत अध्याय वे होते हैं, जिनमें आप लंबे अंतराल बाद अपने पुराने साथियों से मिलते रहते हैं। वक्त उनकी शख्सियत पर अपने निशान छोड़ता जाता है। वे आपके लिए एक ही वक्त में नए भी होते हैं और पुराने भी। थोड़े अजनबी और थोड़े चिर-परिचित। आप दोनों के पास बार-बार याद करने के लिए कुछ साझा कहानियां होती हैं और बहुत कुछ एक-दूसरे को सुनने के लिए भी होता है।
ऐसे साथी, ऐसे दोस्त बड़ी मुश्किल से मिलते हैं। जब मिलते हैं तो मन में आश्वस्ति होती है। हमें जीवन उतना एब्सर्ड नहीं लगता, जितना कि वह सचमुच में है। क्योंकि इस निरर्थक से जीवन में भी एक कहानी है। बीज से पुष्प बनने की भी एक कहानी है। हमें कहानियां संतोष देती हैं।
सामने बैठा शख्स सिर्फ इसलिए अहम नहीं है क्योंकि उसमें कुछ खास है, वह इसलिए भी अहम है क्योंकि उसके भीतर आप भी थोड़ा सा रह गए हैं। हमें उनसे दोबारा मिलना हमेशा सुखद लगता है जिनके भीतर हम रह जाते हैं। हम यानी वो जो समय के प्रवाह में कहीं पीछे छूट गया। जैसे अपनी ही 10-12 साल पुरानी लिखावट देखकर मन में खयाल आता है कि क्या ये हम ही थे, जिसने रोशनाई से सादे कागज पर ये शब्द उकेरे थे।
स्मृतियों के रूप में सहेजी गई चीजें यही सुकून देती हैं। छूट गई चीजें आपस में जुडक़र हमारी ही कहानी तो बयां करती हैं। छूट गए लोग अपनी कहानी में हमारी कहानी भी तो शामिल कर लेते हैं। तभी तो वे कह उठते हैं, ‘तुम जब पहली बार कोट पहनकर आए थे तो लगा था कि कोट को हैंगर में टांग दिया गया है...’ और ठहाका लगाते हैं।
वो बताते हैं कि दरअसल उनके भीतर आपकी वो छवि है जो समय की नदी में बहती हुई कहीं बहुत पीछे छूट गई है, मगर उनके भीतर उस नदी का पानी अभी भी मौजूद है। और बरसों पहले नदी की सतह पर हिलता हुआ आपका प्रतिबिंब खत्म नहीं हुआ है, छूटा नहीं है, खो नहीं गया...जिंदा है, उनके भीतर। और आप ये बात समझ जाते हैं कि भले वक्त आपको मिटा देगा और आप राख बनकर हवा और मिट्टी में खो जाएंगे, मगर जाने कितने लोगों के भीतर उनकी कहानी बनकर जीवित रहेंगे।
स्मृति-विहीन जीवन एक दु:स्वप्न है, और स्मृतियों के बोझ से दबा हुआ जीवन एक पीड़ा है। अच्छा ही हो कि जो नया है और जो अतीत बन गया है, दोनों की आवाजाही होती रहे। बर्गमैन की फिल्म ‘वाइल्ड स्ट्रॉबेरीज’ की तरह आप किसी खिडक़ी से झांकें और खुद को खाने की मेज पर देखें। अपने वर्तमान में अतीत की प्रतिध्वनियां सुन सकें।
अगली बार जब बहुत अरसा बीत जाने पर किसी दोस्त से मिलें तो गौर करें कि उसके व्यक्तित्व की कौन सी चीज आज भी समय की स्लेट से मिटी नहीं है। उसकी आँखें, उसके हँसने का तरीका या कोई बहुत छोटी सी बात। जैसे उसके चम्मच उठाने का अंदाज़। आप पाएंगे कि आज वह जो है उसकी शुरुआत तो बहुत पहले ही हो चुकी थी। कुदरत ने उसकी कहानी लिख रखी थी।
ठीक वैसे ही जैसे आपकी कहानी लिखी जा चुकी है। ठीक वैसे जैसे हम एक-दूसरे की कहानियों में शामिल हैं। और किसी अध्याय की तरह हमारी उनकी कहानियों की टकराहट होती है। पुराने प्रिय साथियों से मिलते रहें, उनसे मिलना खुद से मिलने जैसा है, नहीं तो ऐसे ही खो जाएंगे।


