विचार / लेख

शांति मार्च से डरती सरकार
13-Aug-2023 4:19 PM
शांति मार्च से डरती सरकार

 डॉ. आर.के.पालीवाल

महाराष्ट्र की राजधानी मुंबई में पिछ्ले सत्तर साल से हर साल नौ अगस्त को आज़ादी के आंदोलन के महत्त्वपूर्ण उदघोष ‘अंग्रेजों भारत छोड़ो’ की स्मृति में शांति मार्च का आयोजन किया जाता है। इस शांति मार्च की शुरुआत 1952 में स्वाधीनता सेनानी डॉ जी जी पारेख और मधु दंडवते की अगुवाई में हुई थी जिसमें मुंबई और महाराष्ट्र के शांति और सौहार्द पसंद करने वाले सर्वोदय और समाजवाद में आस्थावान नागरिक शिरकत करते रहे हैं। इस वर्ष महाराष्ट्र सरकार ने कानून और व्यवस्था को खतरा बताकर शांति मार्च की अनुमति नहीं दी। सरकार और प्रशासन के इस अलोकतांत्रिक रवैए के विरोध में देश भर में प्रमुख मीडिया सहित गांधी की सत्य, अहिंसा और शांति आधारित सह अस्तित्व की विचार धारा में आस्था रखने वाले प्रबुद्ध समाज में आक्रोश है । इस दुर्भाग्यपूर्ण घटना की सोसल मीडिया सहित चौतरफा निंदा हो रही है। अपने समाजसेवी जीवन के सौवें वर्ष की दहलीज पर खड़े डॉ जी जी पारेख, महात्मा गांधी के प्रपौत्र तुषार गांधी और सर्वोदय विचारधारा को मानने वाली विशिष्ट विभूतियों को पुलिस ने उनके घरों पर डिटेन कर इस आयोजन में शिरकत करने से रोक दिया था। शांति मार्च रोकने के पीछे यह कारण भी बताया जा रहा है कि जहां यह शांति मार्च समाप्त होना था वहां मुख्यमंत्री का कोई आयोजन होना था इसलिए शांति मार्च की अनुमति नहीं दी गई।

    इस घटना से यह प्रश्न उठता है कि क्या सरकार और प्रशासन को शांति खतरनाक लगती है! क्या सरकार को गांधी की शांति, अहिंसा, सर्व धर्म समभाव और सांप्रदायिक सौहार्द की विचार धारा खतरनाक लगती है ! या प्रशासन को ऐसी विशिष्ट विभूतियों से खतरा लगता है जो इस देश में शांति के विश्व दूत महात्मा गांधी की विचारधारा को भारतीय जनमानस में प्रतिष्ठित करना चाहते हैं!ऐसा लगता है कि सरकार और सरकार की कठपुतली बन चुका प्रशासन उपरोक्त तीनों से डरते हैं। शांति मार्च को अनुमति नहीं मिलना इस संदर्भ में और भी पीड़ादायक हो जाता है कि नूंह जैसे संवेदनशील इलाके में विश्व हिंदू परिषद द्वारा आहूत उस धार्मिक यात्रा की अनुमति बहुत आसानी से मिल जाती है जिसके लिए विवादित गौ रक्षक मोनू मानेसर सार्वजनिक अपील करता है, जिसकी वजह से पूरे इलाके में सांप्रदायिक तनाव फैलता है और जिसकी अंतिम परिणति कई इंसानों की जान जाने और न जाने कितने निर्दोष लोगों की कितनी ही संपत्ति नष्ट होने में हुई है और जिसकी वजह से दो समुदायों के बीच मौजूद दरार बहुत बडी खाई के रुप में परिवर्तित हो गई है।

   नौ अगस्त भारत की आज़ादी के उस इतिहास का अत्यन्त महत्वपूर्ण दिन है जिस आज़ादी का अमृत महोत्सव वर्ष इन दिनों मनाया जा रहा है। हर वर्ष आयोजित होने वाले अमृत महोत्सव वर्ष में तो इसे और ज़ोर शोर से वैसे ही मनाया जाना चाहिए था जैसे योग महोत्सव मनाने में सरकार दिल खोलकर जुड़ती है।जिस आयोजन में शतायु के आसपास पहुंच रहे स्वाधीनता सेनानी और इस उम्र में भी पूरी सक्रियता से विविध रचनात्मक कार्यों में जुटे समाजसेवी श्रद्धेय डॉ जी जी पारेख शिरकत कर रहे थे, जिस शांति यात्रा में उस महात्मा गांधी और कस्तूरबा गांधी के प्रपौत्र तुषार गांधी शामिल हो रहे थे जिनकी स्मृतियों को ताजा रखने के लिए इस शांति यात्रा का आयोजन किया जा रहा था, उस शांति मार्च को रोकने का कोई औचित्य समझ के बाहर है।सरकार और सरकार की कठपुतली बन चुके पुलिस प्रशासन यह अच्छी तरह से जानते हैं कि आम नागारिक और उनकी संस्थाएं उनके गैर कानूनी निर्णयों के खिलाफ उच्च न्यायालय या सर्वोच्च न्यायालय जाने में सक्षम नहीं हैं इसलिए वे सरकार को खुश करने के लिए मनमाने अलोकतांत्रिक निर्णय करते हैं। आजाद देश में शांति मार्च से परहेज निश्चित रूप से बहुत निंदनीय है। यह तब और भी निंदनीय हो जाता है जब सर्वोच्च न्यायालय कहता है कि सरकार नफरत फ़ैलाने वाले भाषणों और क्रियाकलापों को रोकने में विफल रही है।


अन्य पोस्ट