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जिन्होंने मेरी दोस्ती किताबों से कराई
13-Aug-2023 3:50 PM
जिन्होंने मेरी दोस्ती किताबों से कराई

 पुष्य मित्र

राकेश कुमार सिन्हा। यही इनका नाम है। एक अवकाश प्राप्त लाइब्रेरियन। जब मैं नवोदय विद्यालय पूर्णिया में पढ़ता था तो आप मेरे स्कूल में लाइब्रेरियन हुआ करते थे। मैं छठी कक्षा में था तो आपने मेरा परिचय प्रेमचंद से कराया। मैंने प्रेमचंद के सारे उपन्यास और मानसरोवर के सारे खंड पढ़ डाले। अपनी लाइब्रेरी के एक कोने में नेहरू की किताबें भारत एक खोज और डिस्कवरी ऑफ इंडिया दिखाई। मैने उन्हे पढ़ लिया। आपने कहा संस्कृति के चार अध्याय भी पढ़ लो।

मैं अक्सर क्लास के बाद लाइब्रेरी चला जाता। आप मेरे लिए किताबें छांटकर रखते। मैं उन्हें पढ़ लेता। किताबें पढऩे का मुझे शौक पहले भी था। मगर घर में एक स्टूडेंट के लिए कथा कहानी, उपन्यास वगैरह पढऩा ठीक नहीं माना जाता था। हम चोरी-छिपे पढ़ते थे। आपने पहली दफा यह बताया कि ऐसी किताबें पढऩा अपराध नहीं है, अच्छा काम है। फिर तो लत लग गई। बारहवीं के बाद नवोदय से निकला और इंजीनियरिंग की तैयारी के लिए दिल्ली भेजा गया था वहां की एक लाइब्रेरी में मेरे मामा ने नाम लिखा दिया। उन्होंने कहा, किताबें क्यों खरीदोगे, यहीं से ले आया करना।

मगर दिल्ली के इंदरपुरी के बोहरिया वाला थल्ला पुस्तकालय से मैंने फिजिक्स, केमेस्ट्री और मैथ की किताबें कम, मंटो और जोगिंदर पाल और कृशन चंदर की किताबें अधिक इश्यू कराया। इंजीनियर बन नहीं पाया, पत्रकारिता विवि में जरूर पहुंच गया। खैर यह अलग कहानी है।

आज सर से मिलने इनके घर गया था। पटना के अनीसाबाद में इनका अपना घर है। हालांकि पटना में कम रहते हैं। ज्यादातर बेटों के पास रहते हैं। खबर मिली थी कि इन दिनों पटना में हैं, और आज अखबार में पढ़ा कि नेशनल लाइब्रेरियन डे भी है। तो सहज ही सर की याद आ गई।

वैसे, मैं इनका जो भी परिचय लिख रहा हूं, वह काफी कम है। इनके शिष्यों में आज कई जिलाधिकारी और पुलिस अधीक्षक हैं। सबा करीम जैसे क्रिकेटर हैं। ये सभी लोग अक्सर इन्हें याद करते हैं और इनसे मिलने आते हैं।

मगर यह भी इनका असली परिचय नहीं है। इनका असली परिचय वे छात्र हैं जो आज सिर्फ इनकी वजह से अपने जीवन में कुछ कर पाए हैं। अगर सिन्हा सर नहीं होते तो उनमें से ज्यादातर कहीं मजदूरी या छोटी मोटी नौकरी कर रहे होते। नाम लेना उचित नहीं है, मगर इनकी एक छात्रा सिर्फ इनकी वजह से दसवीं से आगे पढ़ पाई और आज इनकम टैक्स डिपार्टमेंट में बड़ी अफसर है। उस छात्रा के पिता दसवीं से पहले ही उसकी शादी कराने पर तुले थे।

एक छात्र जो आज एक कॉलेज में प्रोफेसर है, कभी एक घरेलू नौकर हुआ करता था। इन्होंने उसे सहारा दिया और रास्ता दिखाया। ऐसे दर्जनों लोग हैं जिनका कैरियर आज सिर्फ सिन्हा सर की वजह से है। सर के बेटे गौरव के साथ एक दफा मेरी बात भी हुई थी कि ऐसे तमाम लोगों के अनुभव को जुटाया जाए। और सबको बताया जाए कि एक शिक्षक कैसे अपने छात्रों का जीवन बदल देता है। वह काम अभी अटका हुआ है, मगर किया जाएगा।

बहरहाल, नेशनल लाइब्रेरियन डे पर इनके बारे में जानकर आपको जरूर अच्छा लगा होगा। यह उम्मीद मुझे है।


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