विचार / लेख
डॉ. आर.के.पालीवाल
पुरानी कहावत है कि एक भैंस पूरे तालाब को गंदा कर सकती है। यदि ऐसी भैंसों की संख्या बढ़ती चली जाए तो तालाब के साथ झील नदी और समुद्र भी गंदे हो सकते हैं। सांप्रदायिक नफरत की दीवारों और आतंकवाद के साथ भी कुछ इसी तरह की स्थिति बनती जा रही है। कुछ लोग अपने धर्म के विस्तार के लिए जिस तरह से कहीं चूहों की तरह छिप छिप कर और कहीं सरेआम अपने धर्म की तारीफ में और दूसरे धर्मों के प्रति नफऱत की अतिश्योक्ति पूर्ण तकरीर का प्रचार प्रसार कर रहे हैं उससे उनके उस धर्म को ही ज्यादा नुक्सान हो रहा जिसके वे खुद को बहुत बड़ा शुभचिंतक समझते हैं।
कश्मीर फाइल्स और द केरल स्टोरी जैसी फिल्में संभवत: यथार्थ के नाम पर फिल्म में दर्शाई गई स्थितियों को काफ़ी बढ़ा चढ़ाकर प्रस्तुत करती हैं लेकिन इस तथ्य से कोई इंकार नहीं कर सकता है कि जिन असामाजिक तत्वों द्वारा पैदा की जा रही समाज को तोडऩे वाली समस्याओं को इन फिल्मों में दर्शाया गया है वे हकीकत में हमारे बीच सीमित मात्रा में मौजूद हैं।
भोपाल, छिंदवाड़ा और हैदराबाद के जिन दर्जन से ज्यादा हिज्ब उत तहरीर के लोगों को हाल में मध्य प्रदेश पुलिस की आतंक रोधी सेल ने पकड़ा है , ऐसे लोग शिक्षित होकर भी गलत राह पर निकले नकारात्मक मानसिकता के नागरिक हैं जो कभी लालच और कभी धार्मिक भावनाओं के ज्वार में बहकर नफऱत के प्रचारक बन जाते हैं। हिज्ब उत तहरीक की शुरुआत 1952 में येरुशलम में हुई बताई जा रही है जिसका लंदन में हेड क्वार्टर है। पाकिस्तान और बांग्लादेश में सक्रियता के बाद यह भारत में भी अपनी जड़ें जमा रहा है। हाल में पकड़ाए गैंग की मध्य प्रदेश और तेलंगाना में प्रसार की योजनाएं थी। पढ़े लिखे लोगों द्वारा चलाए गए ये गैंग बहुत खुफिया तरीके से उग्र स्वभाव के भावना प्रधान युवाओं को अपने नेटवर्क में सम्मोहित करते हैं जो अपनी जान की भी ज्यादा परवाह नहीं करते। पता नहीं यह धर्म की कैसा विध्वंशक आकर्षण है जो न अपनी जान की चिंता करता है और न दूसरों की जान की परवाह। पकड़े गए समूह में 25 से 40 साल के पढ़े लिखे इंजीनियर, डॉक्टर, कोचिंग क्लास चलाने वाले और प्रोफेसर आदि शामिल हैं। यह उम्र का वह दौर है जिसमें मेहनत और राष्ट्र भक्ति से कोई युवा भगत सिंह, अब्दुल कलाम, अब्दुल हमीद और सुभाष चंद्र बोस और विवेकानंद या महात्मा गांधी भी बन सकता है।
भोपाल के आसपास रायसेन, सीहोर और होशंगाबाद के जंगलों में अक्सर भोपाल वासी पिकनिक के लिए जाते हैं। इन लोगों ने अपने संगठन के ट्रैनिंग कैंप रायसेन के जंगल में लगाए थे।यह दो तीन कारणों से संभव हुआ है। विगत कुछ वर्षों में इको टूरिज्म के नाम पर वन्यजीव अभयारण्य के आसपास के बफर जोन के जंगलों में शहर के लोगों की आवाजाही बढ़ी है। शहरी समाज को प्रकृति से जोडऩे वाले इस तरह के अभियान के निश्चित रूप से कुछ लाभ भी हैं लेकिन खतरे भी कम नहीं हैं। भोपाल के पास कठोतिया में ऐसे ही जंगल कैंप शुरु हुए हैं जो बेतवा उदगम स्थल के पास है। वहां भी अक्सर देर शाम को असामाजिक तत्वों का जमावड़ा रहता है। इसी तरह होशंगाबाद रोड पर भीम बैठका से लगे वन क्षेत्र में बारिश के दिनों में छोटे छोटे झरनों और बरसाती नदियों के किनारे पर्यटन के नाम पर प्लास्टिक और पॉलिथीन का कचरा फैलाने वाली भीड़ जुटती में। यही हाल भोजपुर के आसपास की पहाडिय़ों और समरधा के भोपाल से सटे वन क्षेत्र का है। हिज्ब उत तहरीक जैसे संगठनों के अपराधी अक्सर इको टूरिस्ट बनकर यहां आ सकते हैं और गरीब स्थानीय लोगों को झांसे और लालच से अपने साथ मिलाकर वन्यजीवों के शिकार भी कर सकते हैं और आतंक के ट्रेनिंग कैंप भी चला सकते हैं।
यही कारण है कि वन विभाग को इन आतंकियों की भनक नहीं लगी। मध्य प्रदेश के वन विभाग और पुलिस को मिलकर इस तरह की गतिविधियां रोकने के सामूहिक प्रयास करने होंगे तभी इस तरह की गतिविधियों पर अंकुश लग सकता है। जिस तरह से मणिपुर से लेकर नूंह तक धार्मिक और अंतरसांप्रदायिक नफरत के बाजार गर्म हो रहे हैं आतंक और हिंसा को रोकना दिन ब दिन बडी चुनौती बनता जा रहा है।


