विचार / लेख

शब्दों और व्यक्तियों की गरिमा तार-तार करते जन प्रतिनिधि
10-Aug-2023 3:48 PM
शब्दों और व्यक्तियों की गरिमा तार-तार करते जन प्रतिनिधि

डॉ. आर.के.पालीवाल

मनोज तिवारी भारतीय जनता पार्टी के सासंद हैं, दिल्ली प्रदेश में भाजपा के अध्यक्ष की कुर्सी को भी सुशोभित कर चुके हैं। माननीय सासंद किसी दिन माननीय मंत्री बनकर देश का कोई मंत्रालय भी संभाल सकते हैं। विगत में जिन भोजपुरी फिल्मों के वे नायक रहे हैं वे फूहड़ता, अश्लीलता और द्विअर्थी गीत और आइटम सांग के मामले में संभवत: भारतीय सिनेमा में नंबर एक पर आती हैं। फिल्मों में शब्दों की गरिमा पर अश्लीलता बहुत भारी रहती है और उसे मनोरंजन के नाम पर दबी ढकी स्वीकार्यता भी मिल गई है। लेकिन राजनीति में जब अपने समकक्षों के लिए शब्दों की गरिमा तार तार होने लगती है तब हम यह कह सकते हैं कि हम भारत के नागरिक बहुत बड़े दोषी हैं जिन्होंने शब्दों की गरिमा तार तार करने वाले लोगों को अपना प्रतिनिधि चुना है।

एक वीडियो में मनोज तिवारी विपक्ष के सांसदों को बेशर्म और नामर्द कह रहे हैं। जिन विपक्षी सांसदों को मनोज तिवारी इन अपशब्दों से संबोधित कर रहे हैं उनमें कई उम्र और अनुभव में उनसे बहुत बड़े होंगे जिन्होंने राजनीति की गंगा में बहुत पानी प्रवाहित हुए देखा है। जिस राजनीतिक दल में स्वर्गीय अटल बिहारी बाजपेई जैसे शब्दों के अप्रतिम चितेरे रहे हैं, मुरली मनोहर जोशी और लालकृष्ण आडवानी जैसे धुर विरोधियों के प्रति भी शालीन शब्दों का उपयोग करने वाले वरिष्ठ मार्गदर्शक अभी भी मौजूद हैं, उस दल में फिल्मों की प्रसिद्धि के कारण सासंद बने मनोज तिवारी जैसे सांसदों द्वारा विपक्षी सांसदों के प्रति अगर इतनी निकृष्ट भाषा का उपयोग किया जाता है तब इसकी सहज कल्पना कर सकते हैं कि उनका व्यवहार उस आम भारतीय नागरिक के प्रति क्या होगा जो उनकी विचारधारा और दल का विरोधी है।

जैसी भाषा किसी दल के वरिष्ठ राजनीतिज्ञ करते हैं, उस दल के छुटभैये नेता और कार्यकर्ता भी उनका अनुसरण कर उनसे दो हाथ आगे बढ़ कर गाली गलौज की भाषा और मारपीट करने लगते हैं। कुछ दिन पहले देश के गृह मंत्री भोपाल आए थे। उन्होंने सार्वजनिक कार्यक्रम में मध्य प्रदेश के दो कांग्रेस नेताओं को मिस्टर बंटाधार और करप्सन नाथ कहकर संबोधित किया था। गृह मंत्री यदि यह मानते हैं कि कांग्रेस का कोई बड़ा नेता करप्शन नाथ है तो केन्द्र और प्रदेश में उनके दल की सरकार होते हुए उस नेता को सजा क्यों नहीं मिली। केंद्र के पास करप्शन रोकने के लिए सीबीआई, ईडी और आयकर विभाग हैं और प्रदेश सरकार के पास लोकायुक्त का भारी-भरकम अमला है, सीआईडी है और पुलिस की आर्थिक अपराध शाखा है। यदि करप्शन रोकने की आपकी आधा दर्जन एजेंसी एक व्यक्ति का करप्शन रोकने में असमर्थ हैं तो यह आपकी सरकारों की अक्षमता है या आप गैर जिम्मेदार बयान देकर जनता को गुमराह कर रहे हैं। दुखद यह है कि मुख्यधारा का मीडिया गृह मंत्री को इस बयान पर घेरने के बजाय इस खबर को नमक मिर्च मिलाकर चटखारे ले रहा है।

हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय ने मानहानि मामले में गुजरात की अदालत द्वारा राहुल गांधी को दी गई सजा पर अंतरिम रोक लगाते हुए उन्हें सार्वजनिक भाषणों में शालीनता बरतने को कहा है। इसके पहले गुजरात हाई कोर्ट ने उनकी सजा को बरकरार रखते हुए उन्हें सार्वजनिक भाषणों में शालीनता बरतने के लिए नसीहत दी थी। यह नसीहत गुजरात उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय ने भले ही राहुल गांधी को दी है लेकिन इसका व्यापक अर्थ है जो सभी नेताओं और नागरिकों पर लागू होता है। न्यायालय केवल उन मामलों में ही सुनवाई करते हैं जो उनके सामने पीडि़त पक्ष द्वारा लाए जाते हैं। आधिकांश लोग महंगी और बेहद लम्बी हो चुकी न्याय व्यवस्था का लाभ उठाने से कतराते हैं क्योंकि यह समय और संसाधन जाया करने जैसा है। इसी लचर व्यवस्था का लाभ बड़बोले नेता उठाते हैं।


अन्य पोस्ट