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घर की सफाई का जोखिम उठाना सबके वश की बात हो सकती है
09-Aug-2023 4:09 PM
घर की सफाई का जोखिम उठाना  सबके वश की बात हो सकती है

 प्रकाश दुबे

फिरोज गांधी ने मूंदड़ा कांड का भांडा फोड़ा। उनके ससुर प्रधानमंत्री समेत अनेक महानुभाव अप्रसन्न थे। उन दिनों अपनी बात जनता तक बेरोकटोक जस की जस पहुंचाने का एकमात्र माध्यम समाचार पत्र थे। अखबारों पर खतरे की तलवार लटक रही थी। जिन कारोबारियों का घोटाला उजागर किया गया था, वे खबर छापने वाले समाचार पत्रों के विरुद्ध मानहानि का मुकदमा दायर कर सकते थे। संसद ने 4 मई 1956 में कानून पारित किया, जिसे फिरोज गांधी अधिनियम कहा जाता है। संसद के अंदर कही गई बातों को छापने पर न्यायालय में मानहानि का खतरा टला। आपात्काल में इस कानून को निरस्त कर दिया गया था। संसद के बाहर फब्ती कसने पर राहुल गांधी की सदस्यता गई। सुप्रीम कोर्ट ने फैसले को पलट दिया। न्यायपालिका की दखलंदाजी मानने वाले आलोचकों ने भारत के मुख्य न्यायाधीश के पिता और बाबा की जन्म कुंडली खंगाली। यही सोचते कि न्यायपालिका अपने घर की सफाई में जुटी है।

न्यायपालिका में भ्रष्टाचार की बात करने पर वकील प्रशांत भूषण पर एक रुपया जुर्माना ठोंका गया। क्यों कि उन्होंने माफी मांगने से इन्कार किया। देश के पूर्व केंद्रीय विधि और न्याय मंत्री शांति भूषण ने बंद लिफाफा भेजा था। लिफाफा खुलने पर भ्रष्टाचार के छींटों की रंगत का पता लगता।  भ्रष्टाचार मुक्त भारत संवारने में सहज ही आसानी होती। वकीलों के राष्ट्रीय संगठन की कमान संभाल चुके दुष्यंत दवे ने खुले आम पारदर्शिता की मांग करते हुए न्यायपालिका की सफाई की तत्काल जरूरत पर जोर दिया। अपनी कलम से अजब गजब फैसले लिखकर इतिहास रचने वालों की लंबी सूची है। दूसरी तरफ ऐसे न्यायाधीश हैं जिन्होंने पद छोडऩा बेहतर समझा। न्यायमूर्ति रोहित देव ने बांबे हाईकोर्ट के न्यायाधीश पद से मुक्ति पाने की भरी अदालत में घोषणा की। जवाहरलाल नेहरू विवि के प्रो साईंबाबा को जमानत मंजूरी और गौण खनिज शुल्क माफी के सरकारी आदेश को न्यायविरुद्ध ठहराने वाले उनके फैसलों पर हलचल मची थी। कारण छुपा नहीं है।

देश की सबसे बड़ी अदालत की कमान संभाल चुके राजन गोगोई, दीपक मिश्रा, शरद बोबड़े सहित अनेक न्याय प्रक्रिया के अनुभवी बेहतर बता सकते हैं कि एक सांसद को दो साल की सजा देने के पक्ष में फैसले में कारण जताने के बजाय आरोपकर्ता की दलीलें देकर न्यायपालिका का कितना हित किया? राजनीति घसीटने की जरूरत नहीं है। फर्जी जाति प्रमाणपत्र देने, महिला पहलवानों से अभद्रता के आरोप के बावजूद सरेआम ताल ठोंकते घूमने, दंगों और हत्याओं के आरोपी व्यक्तियों के बारे में कार्रवाई में कमी पर सरकार और संसद की तरफ अंगुली उठाने के बजाय न्यायपालिका अपने घर की सफाई करने में जुट गई। लोकतंत्र के बाकी अंग भी पहल से प्रभावित होकर मैले कुचैले दाग धोने के लिए चुल्लू भर पानी की तलाश करेंगे। भारत रूस नहीं है जहां प्रतिपक्ष के नेता अलेक्सेई नवनलनी साढ़े 11 वर्ष  की जेल काट रहें हैं। दो दिन पहले एक अदालत ने 19 वर्ष की अतिरिक्त सजा भुगतने का फरमान सुनाया। न्यायपालिका मर्यादा पार करे तब हर नागरिक को सवाल पूछने का हक है। लोकतंत्र के खम्भे की मजबूती के लिए, न कि किसी आरोपित के बचाव के लिए। आपात्काल में उन दिनों के दो नौसिखिया वकील स्वराज कौशल और सुषमा स्वराज ने बड़ौदा बारूद कांड में कैदी जार्ज फर्नांडिस का मुकदमा लेने का साहस किया। मधुर नाम वाली उनकी बेटी बांसुरी ने सुप्रीम कोर्ट में दलील दी-अदालत मणिपुर की तरफ ही देखेगी? इस तरह के मामले अन्यत्र भी हो रहे हैं। मुख्य न्यायाधीश ने प्रश्न किया-आप कहना चाहती हैं कि जब तक बाकी किसी जगह कार्रवाई न हो, इतने गंभीर हादसे पर गौर नहीं किया जाए? राज्यपाल रह चुके पिता और कई जिम्मेदारियों और संघर्षों से जूझती मां की बेटी को समझ में आया कि कानून में भी पक्षपात और पारदर्शिता परस्पर विरोधी शब्द हैं।

न्यायपालिका के मंदिर में कहां फाइलों पर धूल चढ़ी है, किस कोने में विराजमान मठाधीश के कान किसी के फूंके मंत्र को सुनने में जुटे हैं? अपने परिसर की सफाई की पहल करने पर सब समझ में आता है। न्यायपालिका ने शुरुआत की। असर हुआ। सांसद रामशंकर कठेरिया को दो साल की सजा हुई।बलवा करने और मारपीट का मुकदमा 11 बरस से चल रहा था। पंजाब-हरियाणा उच्च न्यायालय ने नूंह में बुलडोजर न्याय रुकवा दिया। यदि यह पहल अन्य राज्यों में पहले होती तब कानून के शासन पर भरोसा जारी रहता। कई बार एक साथ थानेदार और न्यायाधीश बनने का शौक पूरे समाज के लिए परेशानी पैदा करता है।राजनीतिक शक्तियों और न्यायायिक प्रक्रिया की होड़ ऐसे मुद्दों पर है जिनसे जनहित का कोई वासता नहीं है। राज्यपालों और मुख्यमंत्रियों के विवाद चौराहे पर हैं। दिल्ली के उपराज्यपाल और मुख्यमंत्री महीनों से बिजली नियामक आयोग के अध्यक्ष पद को लेकर एकराय नहीं बना सके। उच्चतम न्यायालय की तीन सदस्यीय खंडपीठ ने चार अगस्त को न्यायमूर्ति जयंत नाथ की इस शर्त पर नियुक्ति की आम सहमति बनने तक वे काम देखें।

दिल्ली उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश नाथ की नियुक्ति का सबसे बड़ा सबक यह है कि न्यायपालिका और कार्यपालिका में अबोलेपन की खाई गहरी हो चुकी है। सार्वजनिक जीवन में स्वच्छता लाने के लिए शासन और न्यायपालिका के बीच सकारात्मक होड़ लाभदायी साबित होगी। संसद को आखिर  किस बात की झिझक है? सरकार को डर किस बात का है?चुनावी चंदे को गुप्त रखने की मंशा को अदालत ने मान लिया। उम्मीदवार चयन की प्रक्रिया सार्वजनिक करने की मांग पर अदालत ने टिप्पणी की-राजनीतिक दलों का निर्णय करने का अपना तरीका है। पारदर्शिता के नाम पर उनसे हर बात सार्वजनिक करने के लिए नहीं कहा जा सकता। आपसी विश्वास के अभाव से अमृतकाल में टकराव का जहर फैलेगा। दो कदम तुम भी चलो वाली भावना से दोनों का भला होगा।

(लेखक दैनिक भास्कर नागपुर के समूह संपादक हैं)


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