विचार / लेख

गाजर और लाठी की वर्तमान नीति
08-Aug-2023 4:01 PM
गाजर और लाठी की वर्तमान नीति

डॉ. आर.के.पालीवाल

अंग्रेजी की बहु प्रचलित कहावत है कैरट एंड स्टिक पॉलिसी, जिसका मोटा मोटा सहज हिंदी अनुवाद गाजर और लाठी नीति बनता है। सरकार अपने अफसरों और अफसर अपने मातहद कर्मचारियों को नियंत्रण में रखने के लिए आदि काल से इस नीति का प्रयोग करते आए हैं। अंग्रेजी राज में इसका उपयोग देशी राजाओं, व्यापारियों और नौकरशाही पर शिकंजा कसने के लिए होता था। सरकार के पास प्रभावशाली लोगों को नियंत्रित करने के लिए तरह तरह की गाजर और लाठियां होती हैं। गाजर लालच देकर इंसान को पालतू पशु जैसा वफादार बनाने के लिए प्रयोग में आती हैं और लाठियां नियम कानून से चलने वालों को लाईन पर लाने के लिए दंड देने का काम करती हैं।

गाजर मलाईदार पद पर पोस्टिंग, कोई बड़ा पुरस्कार या सेवानिवृति के बाद एक्सटेंशन या कोई घोटाला होने के बाद भी जांच से बचाना आदि के रुप में मिलती हैं और लाठी किसी दूर स्थान पर लूप लाइन में डालना, सस्पेंड करने, सेवा से बर्खास्तगी और किसी तकनीकी गलती को अपराध बताकर जेल भेजना भी हो सकती है।

अंग्रेज यह सब खेल बहुत अच्छी तरह से खेलते थे। आज़ादी के आंदोलन में जब 1942 में निर्णायक घड़ी पास आ रही थी तब उन्होंने महात्मा गांधी से लेकर आज़ादी के आंदोलन के तमाम नेताओं को जेल में डाल दिया था लेकिन मुहम्मद अली जिन्ना को पाकिस्तान बनाने के लिए हिंसक गतिविधियों की खुली छूट दे रखी थी और डॉ भीमराव अम्बेडकर को सरकार में मंत्री पद दे दिया था ताकि अंग्रेज सरकार के खिलाफ राष्ट्रीय एकता का माहौल न बन सके। इसी तरह वे हर क्षेत्र के अग्रणी लोगों को अपना वफादार बनाने के लिए राय बहादुर आदि की उपाधियां बांटते थे ताकि अपने अपने इलाकों के ये असरदार लोग ब्रिटिश शासन को मजबूत बनाने के लिए तन मन धन से योगदान करें। आज़ादी के बाद नेताओं की जिस पीढ़ी ने सत्ता की बागडोर संभाली उनमें आधिकांश राजनीति को सेवा का सर्वोत्तम अवसर समझते थे इसलिए उन्होंने नौकरशाही से भी ऐसे लोगों को चुन चुन कर आगे बढ़ाया जिनकी योग्यता, क्षमता और कर्मठता उच्च स्तरीय थी और भावना लोक कल्याण से ओतप्रोत थी।

लाल बहादुर शास्त्री जी के कार्यकाल को देश की सत्ता में सेवाभाव के स्वर्ण काल का अंतिम अध्याय कहा जा सकता है। इंदिरा गांधी के शासन में नौकरशाहों पर गाजर और लाठी नीति की जबरदस्त शुरुआत हुई थी।आपात काल में अंग्रेजों की इस नीति को भारतीय लोकतंत्र ने नए आयाम दिए थे।उसके बाद उत्तर प्रदेश में समाजवादी और बहुजन समाज पार्टी की सरकारों ने इसे और ऊंचाई देते हुए ऐसे लोगों को भी प्रदेश की नौकरशाही का मुखिया बनाया जिन्हें आई ए एस एसोसिएशन ने महाभ्रष्ट अफसरों के रूप में चिन्हित किया था। गुजरात में भी नौकरशाही पर इस नीति को आजमाने के काफ़ी समाचार सामने आए हैं।वर्तमान दौर में केंद्र सरकार में भी नौकरशाही को लेकर कमोबेश ऐसी ही स्थितियां बनती जा रही हैं।नौकरशाही के सर्वोच्च पदों पर सरकार के इशारे समझने वाले और भ्रष्टतम अधिकारियों का चुना जाना न केवल ईमानदार और कर्मठ अधिकारियों का मनोबल तोड़ता है बल्कि ईमानदारी और भ्रष्टाचार के असमंजस में फंसे बहुत से अधिकारियों को भ्रष्टाचार की तरफ झुकने के लिए प्रेरित करता है।

सबसे पहले प्रमुख पदों के लिए जी श्रीमान कहने वालों का चुनाव कर गलती की जाती है फिर उन्हें बार बार एक्सटेंशन देकर गलती दोहराई जाती है। ऐसी परिस्थितियों में ही सर्वोच्च न्यायालय को इस तरह की कड़ी टिप्पणी करनी पड़ती है कि क्या सरकार अपने अन्य सभी अधिकारियों को नाकारा मानती है। चुनाव आयोग में ऐसे अधिकारियों की नियुक्ति करना जिसने व्यक्तिगत कारण बताकर कुछ दिन पहले सरकारी सेवा से ऐच्छिक निवृति ली हो सीधे सीधे सरकार और ऐसे अफसरों से मिलीभगत का प्रमाण है।वरिष्ठ आई ए एस और आई पी एस अधिकारियों को वी आर एस दिलाकर लोकसभा या विधानसभा चुनाव का टिकट देना भी इसी नीति के प्रत्यक्ष प्रमाण हैं।


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